Friday, October 18, 2019

बातें बेवजह की

अपना ही तमाशा बनाकर हम स्त्रियों ने एक-दूसरे के बीच एक अटूट दीवार खड़ी कर ली है। इसके बीच जो भी खिड़की बनती है उससे विचारों के बीच-बीच करवाचौथ की थालियाँ फिराई जाने लगती हैं। आज चोखेरेबाली पर ममता सिंह का यह लेख साझा कर रही हूँ पढिए और सोचिए कि सुहाग के जिन त्यौहारों को  हम अपने जीवन में प्रेम का प्रतीक बना रहे हैं वे सभी त्यौहार मिलकर समस्त स्त्री-समाज के लिए दुर्गति का पहाड़ रच रहे हैं। हम कितनी खुशी से उन स्त्रियों को बाहर कर दे रहे हैं जिनके  लिए इस सबमें शामिल होना परम्पराविरुद्ध और दोष है। अजीब खुशी है यह। अक्सर अश्लील।  बेवजह की लगने वाली बातें स्त्रियों के सामूहिक अस्तित्व के ज़रूरी सवाल हैं।-     

 
 


बातें बेवजह की
-         - ममता सिंह
करवा चौथ, तीज आदि व्रत का उपहास उड़ाना कभी मन्तव्य नहीं रहा पर कई बार भौचक रह जाती हूँ जब देखती हूँ कि अभी हाल में ही जिस सखी ने रोते हुए फ़ोन पर अपनी व्यथा सुनाई,जिसकी भेजी तस्वीर में पड़े नील कई रातों तक मेरे सपनों को चीरते रहे वही करवाचौथ पर माँग टीका लगाए,मेहंदी रचाये पति के साथ डीपी में परफेक्ट कपल लग रहे। वैसे बताना ज़रूरी है कि सखी हमारी सरकारी नौकरी में है यानी आर्थिक रूप से कोई मजबूरी नहीं फिर भी आए दिन मार पीट जीवन का हिस्सा है। कुछ समझाओ सब बेकार,अगले व्रत,त्योहार पर वह सभ्य,भारतीय स्त्री बनी मुस्कुराते हुए पोज़ देते दिखती है,बाक़ी दिन रोते बिसूरते।

दाम्पत्य में झगड़े होना आम है पर यदि पति माँ-बहन की गाली दे, हर तिमाही  नियम से कूटे और पत्नी उसके मर जाने की दुआ करती हुई कुढती रहे तब यह व्रत और हैप्पी फैमिली, “मेड फ़ॉर ईच अदर” का दिखावा मन में वितृष्णा ही भरता है।

सहेली से पूछना चाहती हूँ कि दूसरी बेटी की पैदाइश पर हॉस्पिटल में ही बीबी को छोड़कर भाग जाने वाले पति के साथ वैष्णो देवी की यात्रा का स्टेटस फेसबुक से लेकर व्हाट्सप्प पर लगाना, हर वक्त दुनिया की नज़र में सुगढ़, सलीकेदार बनना और सबसे बड़ी बात स्वामिभक्ति का दिखावा कब तक चलेगा ! आसपास नज़र उठाकर देखती हूँ तो हर घर में स्त्रियों की त्रासद कहानियाँ बिखरी हैं,क्या पुराना ज़माना,क्या नया लगभग सब एक जैसी।

हाँ पहनावे ओढ़ावे में अंतर आया है,अभी दस वर्ष पहले लगभग एक पचास वर्षीया चाची जिन्होंने हाल में बेटा ब्याहा था ने जब ब्रा पहनना शुरू किया ख़ूब उपहास की पात्र बनीं। ये वही औरतें हैं जिन्होंने अपनी छोटी सी छोटी इच्छा को अच्छी औरत होने के तमगे के लिए मारा। अब ख़ूब दहेज लाई किसी बहू की सलवार-कुर्ता पहनने की मांग आराम से मान ली गई यह कहकर कि बड़े घर की बेटी है,नाज़ुक है।


पति द्वारा त्यागी पर ज़िन्दगी भर सिंदूर,बिछिया पहन सुहागिनों द्वारा किये जाने वाले व्रत उपवासों, पूजा में बैठने भर की सुविधा पर निहाल ये औरतें कब सच स्वीकारेंगी पता नहीं। मेरी एक सहेली की पढ़ाई दसवीं में ही इसलिए उसके पिता ने छुड़ा दी थी क्योंकि उसके बैग में किसी लड़के का दिया प्रेमपत्र मिला। शादी ढूंढने पर कम पढ़े होने के कारण परेशान होकर तीन साल  बाद उसे प्राइवेट इंटर और बाद में बी.ए. भी प्राइवेट कराया गया। शादी एक बहुत पिछड़े इलाके में हुई ,परिवार बहुत बड़ा और दकियानूसी था किन्तु पति सरकारी नौकरी में और पत्नी को प्रेम करने वाला था तो गुज़र ठीक से हो जा रही थी। एक बेटी भी पैदा हुई ही थी उसकी पैदाइश के छठवें दिन एक दुर्घटना में पति की मृत्यु हो गई। 

भाई और पिता उसे मायके ले आये थोड़ी कोशिशों के बाद बी.ए. होने के कारण अप्रोच से सहेली को नौकरी मिल गई। नौकरी और बच्ची के साथ वह सेटल हो ही रही थी कि समाज,परिवार ने फिर से उसके लिए फंदा तैयार किया,न पहली बार उससे कुछ पूछा,बताया गया न दुबारा। वह भी संस्कारी बेटी,बहन बनी चुप रही और उसका विवाह दसवीं पास, गुटखा खाने,आवारागर्दी करने वाले देवर से कर दिया गया। मायके वालों ने इज़्ज़त बचाई, ससुराल वालों ने कमाऊ बहू पाई। तिसपर एहसान यह कि एक विधवा को फिर से सुहागिन चोला पहना दिया। दूसरी बेमेल शादी इसलिए भी ज़रूरी थी कि भला रोज़ बाहर निकल सरकारी नौकरी करने वाली पच्चीस साल की स्त्री पर पिता,भाई समेत पूरा समाज भरोसा कैसे कर सकता था,क्या पता वह किस जगह फिसल जाए सो घर की इज़्ज़त को घर में ही महफूज़ कर दिया गया।

अब देवर तो हुआ पति तो उसके भीतर का पुरुष जाग पड़ा, घूंघट निकालकर वह ऑफिस जाती,पति पहुंचाने,लेने जाता।  दिन में भी अचानक ऑफिस में छापेमारी होती कि कहीं किसी से नैन मटक्का तो नहीं कर रही। पुरुष तो दूर की बात ऑफिस में महिला सहकर्मी से भी दोस्ती की इजाज़त नहीं। सारी सावधानी के बावज़ूद एकदिन भयंकर गलती हो गई। हुआ यूं कि एक सीनियर की माताजी का देहांत हो गया,सारा स्टाफ़ मातमपुर्सी के लिए जा रहा था तो सहेली भी चली गई। पतिदेव आये और उसे ऑफिस में न पाकर गुस्से से लाल-पीले हो उठे। उस रात पति ने हाथ उठाया। पिता को फ़ोन करके उल्टा सीधा कहा।

पिता भाई अगले रोज़ गए,उसका पक्ष सुने बिना उसे नसीहतों की पोटली थमा आए। देवर के भीतर  कम पढ़े होने, बेरोजगार होने की कुंठा को अब मारपीट और लांछन की शक्ल में बाहर निकलने का मौका मिल गया। सास- ननदें भी पति की मृत्यु का दोषी उसे ठहराती रहीं हालांकि उसने तीज,करवा चौथ के व्रत तब भी रखे थे,अब भी रख रही थी।

बात बिगड़ती गई,उसका झुका सिर और झुकता गया,आखिर में एकदिन नर्वस ब्रेकडाउन होने पर जब हॉस्पिटलाइज कराने की नौबत आई तब पिता,भाई पसीजे उसे लम्बी छुट्टी दिला मायके लाये। मायके में भी अक्सर पति आकर गाली गलौज, झगड़े करता तब ऊबकर उसका ट्रांसफर मायके कराया गया। एक कैद से निकलकर दूसरी कैद में रहने की शुरुआत थी यह क्योंकि वही नियम कानून मायके में भी थे कि ऑफिस में किसी से दोस्ती नहीं करना,मोबाइल नहीं रखना,कहीं अकेले आना-जाना नहीं। कई दिनों बाद देवर से तलाक हुआ पर अब भी वह चौड़ा पीला सिंदूर लगाती है, ख़ूब चौड़े पल्ले की साड़ी पहनती है और सिर झुकाकर चलती है। पूजा पाठ करना,सारे तीर्थ मायके वालों के साथ जाकर करना उसके जीवन में शामिल है।

उससे मिलने उसके घर नहीं ऑफिस जाती हूँ,वह भी चुपके से जबकि बचपन की सहेली हूँ, घरेलू ताल्लुक़ात हैं हमारे,फिर भी घर जाने पर माँ, भौजाइयाँ यूँ घेर कर बैठ जाती हैं कि हम बस दुनिया की बातें,साड़ी की डिजाइन,सोने के चढ़ते भावों पर ही बात करते हैं,अपनी बात करने की न इजाज़त न मोहलत। कई बार मैंने पूछा क्या इतने व्रत करने से तुम्हें शांति मिलती है,उसने कहा मन को शांति कहाँ पर घर में शांति रहती है। जब अपने माँ बाप,भाई भौजाई को ही नहीं होश कि मैं ज़िंदा इंसान हूँ,मुझमें भी कुछ ख़्वाहिशें हैं,कुछ सपने हैं तब और किसी से क्या शिकायत। एकबार तो भावावेश में उसने कहा कि यदि मेरी बेटी की ज़िंदगी का सवाल न होता तो कब की आत्महत्या कर चुकी होती। एक पति की मृत्यु,दूसरे से तलाक के बावजूद सिंदूर,चूड़ी,बिछुआ उसके लिए समाज की क्रूर निगाहों और पूजा,व्रत परिवार की निगाहों में तनिक सहानुभूति पाने का ज़रिया भर है।  साहस से काम लेने और एक फ़ोन रखने की सलाह को वह एक कान से सुनती है,दूसरे से निकाल देती है।

बात नए ज़माने की हो या पुराने, स्त्रियां एक ही नाव पर सवार दिखती हैं मुझे। हमारे टोले में एक काकी हैं तीन बेटों एक बेटी की माँ। सबसे छोटा बेटा साल भर का था कि उनके मियाँ जी को काकी में सौ कीड़े नज़र आने लगे मसलन काकी फूहड़ हैं,साफ़-सफ़ाई से नहीं रहतीं,पढ़ी-लिखी नहीं हैं,आगे के दाँत बड़े हैं वगैरह। मज़ेदार बात यह सब नुक्स उन्हें चार बच्चों की पैदाइश के बाद नज़र आए। वे पढ़े-लिखे सरकारी नौकरी वाले मर्द थे इसलिए उनकी शिकायत जायज़ ठहरी। काकी चार बच्चों,सास-ससुर,ननद के साथ गाँव में चौका-चूल्हा,गोबर-पानी,धान-पिसान करती रहीं,काका मात्र डेढ़ कोस पर पक्का घर बना अपनी पढ़ी लिखी प्रेमिका के साथ खुलेआम रहने लगे । काका के इस कदम पर समाज,समय,सभ्यता,संस्कृति का एक पत्ता भी नहीं हिला, बड़ी आसानी से लोगों ने उनके इस कदम को स्वीकार कर लिया,काकी की किस्मत में सुख नहीं बदा था ,इतनी भर सहानुभूति उनके हिस्से आई।
काकी पहले ही कम बोलती थीं,अब एकदम ख़ामोश हो गईं,घर बाहर की स्त्रियां उन्हें सब्र करने की घुट्टी पिलातीं और सीता मैया से लेकर जाने कहाँ कहाँ के उदाहरण देतीं। कोई भी उन्हें बिना बेचारी कहे नहीं बात करता था मसलन गंगा पार वाली बेचारी को कल बीछी(बिच्छु) मार दी,बेचारी का तीसरा बच्चा बहुत बीमार है,बेचारी सोलह साल से मायके नहीं गई। काकी का नाम क्या है हमें बरसों नहीं मालूम चला,काकी का मायका कहाँ है कुछ बरस पहले पता चला..काकी कभी हँसती नहीं थीं,काकी गुस्सा भी नहीं करती थीं,और तो और काकी रोती भी नहीं थीं।


हमने उन्हें जब भी देखा काम करते ही देखा, उनकी बेटी हमारी उम्र की थी,त्योहारों में काका हमारे यहाँ मिलने आते तब वह आती,चुपचाप खड़ी रहती काका उसपर निगाह भी नहीं डालते थे। अम्मा जबर्दस्ती उसे काका के सामने खड़ा कर देतीं और कहतीं देखो तो भैया कितनी सुंदर है यह,बिल्कुल तुम पर पड़ी है।पढ़ने में बहुत अच्छी है,बेटों को जाने दो कम से कम बेटी पर ध्यान दे दो,काका अनमने से दूसरी तरफ़ देखते रहते। हाँ जाते वक़्त कुछ रुपये बेटी को थमा जाते।

काकी सुहागिनों द्वारा की जाने वाली पूजा में बुलाई जातीं,यह सात,चौदह,इक्कीस सुहागिनों द्वारा पूजा जाता था,किसी सुहागिन को इससे नहीं मतलब था कि कोई स्त्री पति की प्रिया है या नहीं,उसने विवाह करके क्या खोया-क्या पाया! उनके लिए जरूरी था मांग में सिंदूर होना,भले ही पति उसे छोड़कर दूसरी दुनिया में रहने लगा हो,वह स्त्रियां इकट्ठी होकर  पति की लंबी उम्र के लिए कथा कहतीं,पैरों में आलता और एक दूसरे को नाक से लेकर पीछे मांग तक सिंदूर लगातीं,घंटों देवी गीत गातीं... देवी जी ने काकी के कौन से दुख दूर किये यह काकी ही जानें,पर वह बुलावे में जाती जरूर थीं।

वक़्त बीतता रहा हम बचपन से किशोरावस्था में आ गए,अब ज़रूरतों के साथ सपने भी बड़े होने लगे। हम रोज़ अम्मा से कुछ न कुछ फ़रमाइशें करते,कभी वह पूरी होतीं,कभी न होतीं...
काकी के बच्चे भी किसी तरह पलते रहे,मुझे नहीं पता कि उनके बच्चों ने कभी उनसे फ़रमाइशें की होंगी या नहीं,अगर वह कुछ माँगते होंगे तो काकी कैसे उन्हें समझाती रही होंगी।कई बार अम्मा हमारी चीजें काकी के बच्चों को ख़ासकर बेटी को देतीं तो हम लड़ने लगते।शहर से आये नए फैशन के कपड़े,बस्ते,रबरबैंड भला किसी को देना कैसे सुहाता हमें,वही चीजें तो हमें और बच्चों से अलग  करती थीं।सारी धौंस,सारा रौब नए कपड़ों,सामानों का ही होता था नहीं तो सब एक ही स्कूल में पढ़ते,एक साथ खेलते,तब कहाँ इतनी समझदारी और संवेदनशीलता थी हममें।

पूरे गाँव में काकी बस अम्मा से ही अपने मन का हाल कहती थीं वह भी जब अंधेरा होने पर टोले भर की औरतें शौच के लिए झुंड बनाकर जाती थीं,काकी और अम्मा सबसे दूर चली जातीं..आजी लोग भुनभुनाती कि जाने यह दोनों इतनी दूर क्यों जाती हैं,इतनी देर क्यों लगाती हैं।हमारी अम्मा शहर की पढ़ी-लिखी और नौकरी वाली थीं इसलिए वह बखूबी जवाब दे देती थीं उन औरतों को ,लेकिन काकी वह हमेशा चुप रहतीं।

काकी के बेटे पैसों के अभाव, देखभाल की कमी और खेतीबाड़ी में जुटने के कारण हाइस्कूल के बाद  नहीं पढ़ पाए पर बेटी पढ़ने में तेज थी,वह बीए तक पढ़ी।अब बात और ज़रूरतें पढ़ाई से ज़्यादा शादी पर केंद्रित हो गईं।काका भी रिटायर होने वाले थे,और इनदिनों उनकी प्रेमिका से उनके सम्बन्ध कुछ ठीक नहीं चल रहे थे सो वह उनके घर से चली गई थीं..बुज़ुर्गों ने मौके का फ़ायदा उठाकर एक दिन काकी और उनके बच्चों को लेकर उन्हें मनाने गए। हालांकि होना इसका उल्टा चाहिए था यानी काकी को नाराज़ होना और काका को मनाना चाहिए था पर एक तो पति ,दूजे सरकारी नौकरी वाला तो उसका रुतबा देवता से बड़ा होना ही था।

सारा लावलश्कर काका के घर पहुंचा...बुजुर्गों को बैठने के लिए काका ने कहा पर पत्नी और चार बच्चों से बोले तक नहीं...घण्टों काका चारपाई पर बैठे रहे काकी और बेटी पैर पकड़कर रोती रहीं,साथ गए बुजुर्गों ने काका से उनके बेटी-बेटों के ब्याह की समस्या,काका के आसन्न बुढ़ापे,उनके बड़े ब्लड प्रेशर और अन्य बीमारियों का हवाला देकर घर लौटने का दबाव बनाया,उस कहानी में काकी का कहीं ज़िक्र या फ़िक्र शामिल नहीं था।

बरहहाल काका लौटे पर काकी से अबोला ठाने रहे,उनका खाना-कपड़ा सब बेटे-बेटी करते। धीरे धीरे बेटों और बेटी का ब्याह हुआ,काकी उसी तरह चुपचाप काम करती रहीं,हां उनके आगे के दाँत जरूर टूट गए।

पिछले बरस गया जगन्नाथ जी की तीर्थयात्रा पर जाने के लिए होने वाले अनुष्ठान में काका-काकी गाँठ जोड़कर कथा सुनने बैठे। बेटे बहू, बेटी दामाद ,नाती पोतों से घर आँगन भरा था..काकी नई नवेली दुल्हन की तरह घूंघट किये,चुनरी ओढ़े गठरी बनी बैठी थीं..लग रहा था वह सो रहीं या शायद रो रहीं थीं। स्त्रियां उनके भाग्य और त्याग तपस्या को सराह रही थीं कि देखो इनका भाग्य,इनकी तपस्या  जो चालीस बरस बाद पति के साथ गाँठ जोड़ कथा सुन रहीं। मेरा मन किया काकी को झिंझोड़कर जगा दूँ और पूछुं कि इतने बरसों की घुटन,दर्द,अभाव, अकेलेपन की कीमत क्या यही गाँठ जोड़कर कथा सुनना भर है,काश काकी वह चमकीली चुनरी ओढ़ने से इंकार कर देतीं,काश वह पूजा में साथ न बैठतीं!

पर पिक्चर अभी बाकी है दोस्तों... अभी पता चला कि काकी आज अपनी तीनों बहुओं के साथ करवा चौथ का  व्रत रखी हैं,जिसने भी सुना पहले ताज़्जुब फिर व्यंग्य से हँस दिया..फिर सर्वसम्म्मति से कहा गया आख़िर सुहागिन होने जैसा बड़ा पद काकी को मिला है,उसको निभाना तो चाहिए ही।

हम तो बरसों से तमाशाई थे,आज भी हैं।

परिचय यह कि अम्मा बताती हैं कि शादी के बाद बरसों तक बांझ कहलाने के बाद जब दुनिया समेत वह भी नाउम्मीद हो चली थीं तो पहले भैया और फिर मेरा जनम हुआ..बरस था 1978 और महीना था कातिक(नवम्बर) तारीख़ थी तीन।
बचपन में जन्मदिन मनाने की ज़िद करती तो अम्मा बहलाती थीं कि तू तो छोटी दीवाली को हुई थी,सारे जग में अंजोर करने को सो बहुत साल छोटी दीवाली को जन्मदिन समझ ख़ुश होती रही।

अम्मा गाँव के प्राइमरी स्कूल में अध्यापिका थीं सो पढ़ना उन्हीं के स्कूल में शुरू हुआ,वह गज़ब की पढ़ाकू थीं,गाँव की पहली अंग्रेजी पढ़ी बहू, हिन्दी साहित्य की शौकीन...उन्होंने कोर्स की किताबों से ज़्यादा कहानी की किताबों को पढ़ने पर जोर दिया नतीज़न माँ से कुछ भी गुन ढंग नहीँ मिले पर मिल गई किताबें पढ़ने की लत।

किताबें पढ़कर दुनिया को जाना, समझा ..जीविकोपार्जन के लिए स्कूल मास्टरी कर रही,माँ के स्कूल में पढ़कर उसी में पढ़ाने गई तब तक माँ इस दुनिया से विदा हो गई थीं,था बस रजिस्टर में दर्ज़ उनका नाम।बच्चों और         किताबों के साथ गाँव की छोटी दुनिया में रहना-जीना.. रोज़ सीखना और खुद को बड़े होते देखना..

शौक के नाम पर यात्राएं करना,किताबें पढ़ना और आलसियों की तरह पड़े रहना ही है। हां एक सार्थक काम ज़िन्दगी में यह हुआ कि गाँव में एक छोटा सा निःशुल्क पुस्तकालय खोल लिया ताकि किताबों से इश्क़ फैलता रहे,अच्छी बात यह कि पुस्तकालय चल नहीं दौड़ रहा।
सम्पर्क: mamtathinks@gmail.com

Sunday, October 13, 2019

सत्य के साथ मौलिक प्रयोगों के बिना कोई पीढ़ी अपने युद्ध नहीं जीत सकती



(सत्य के साथ मेरे प्रयोग)
-         --- सुजाता  

गांधी पर बात करते हुए दो ग़लत रास्ते पकड़ना सबसे आसान है। एक भक्ति, दूसरा निंदा। मैं सोचती हूँ कि महात्मा की पदवी उन्हें भली ही लगती होगी। उसका जो दबाव बाकियों पर था उससे ज़्यादा गांधी पर खुद रहा होगा। दक्षिण अफ्रीका में मिली प्रसिद्धि के बाद जब वे भारत आए तो एक देशव्यापी असहयोग आंदोलन चला पाना उनकी पहली बड़ी सफलता थी। एक ऐसा काम था यह जिसके बारे में उस वक़्त ज़्यादातर प्रभावशाली लोग शंका में थे। यह व्याव्हारिक भी है या नहीं? यही गांधी की सबसे बड़ी ताकत बनी। अव्यावहारिक को व्याव्हारिक बना देना। लोगों को अपने साथ ले आना। उन्हें नेतृत्व देना। उन्हें वह रास्ता दिखाना जो सत्ता के विरुद्ध सामूहिक संघर्ष के लिए शायद सबसे उपयुक्त था उस वक़्त। अहिंसा और सत्याग्रह। आपको पता है कि आपके पास ताकत नहीं है, ऐसे में सत्ताधारियों के भीतर वह उदारता और करुणा जगाना कि वह अपनी ताकत का सही इस्तेमाल करे इसके लिए सत्याग्रह और अहिंसा औजार भी थे, कवच भी।लेकिन गांधी आजीवन खूब आलोचनाओं के शिकार हुए। चिट्ठियों में उन्हें लोग जी भरकर गालियाँ देते थे। वे कहते थे गाली और प्रशंसा मेरे लिए एक ही है। मैं इसे समझ सकती हूँ। जब आपका उद्देश्य विराट होता है तब निंदा-प्रशंसा एक ही हो जाती है। बहुत फर्क नहीं पड़ता इस बात से कि उनके किसी कदम पर भक्त या निंदक क्या कह रहे हैं। इसी स्थितप्रज्ञता और महानता के आस-पास कहीं एक तानाशाह मन होता है जिसे बरजते रहना, परखते रहना चाहिए। इस मुद्दे पर आगे बाते करूंगी ही।     

इस घपले की शुरुआत में मैं उस बोदे आदमी को देखना चाहती हूँ जो अपनी असफलताओं से घबराया हुआ था, सबके सामने बोलने से डरता था, जैसा कि हममे से कोई भी हो सकता था, आज भी है। कमज़ोर और भगौड़े जैसे!  अब तक उसके संघर्ष निजी थे। चोरी करके, माँसाहार करके,सिगरेट पीकर उसने अंतत: पिता को सब चिट्ठी में लिख दिया और रोकर अपनी आत्मा को पवित्र पाया। दक्षिण अफ्रीका में पहली बार इस अच्छे मारवाड़ी परिवार के लड़के को यह समझ आया कि सामूहिक अस्मिता के सवालों से जूझे बिना वैयक्तिक संघर्षों का इतिहास की नज़र में कोई मोल नहीं है। आगे के सारे प्रयोगों  के बीज यहीं पड़े थे। उसने अपनी कमज़ोरियों पर विजय पाने के लिए एक कठिन और निराली राह चुनी। यह राह थी- ज़िद ! न टूटने वाली ज़िद। सविनय अवज्ञा। पहले दर्जे का टिकट लेकर तीसरे दर्जे में नहीं बैठूंगा भले ट्रेन से बाहर फेंक दिया जाए। स्टेशन पर रात गुज़ारनी पड़े।वे पलट के घूसा भी मार सकते थे। अदालत में मैं अपनी पगड़ी नहीं उतारूंगा। यह ज़िद गांधी के बहुत काम आई आगे और उनके परिवार की पीड़ा भी बनी।

दक्षिण अफ्रीका ने यह तय कर दिया था कि गांधी का जीवन अब सार्वजनिक जीवन ही हो सकता है। वे अकेले में, पत्नी-बच्चों के साथ अपने छोटे से संसार में खुश रह सकने वाले जीव नहीं थे। सार्वजनिक जीवन में उन्हें अपनी उपादेयता महसूस हुई तो यह एक लत बन गई। दक्षिण अफ्रीका में ही अहिंसा और सत्याग्रह जैसे महत्वपूर्ण औजार उनके हाथ लग चुके थे जिनके साथ और प्रयोग हिंदुस्तान में अभी किए जाने थे। यहाँ मज़ेदार यह है, और जिस मुख्य बिंदु पर मुझे आना ही है, ये दोनो औजार उन्होने स्त्रियों से प्राप्त किए थे। इसमें  संदेह नहीं। अपनी कमज़ोरियों और अक्षमताओं से उलझते हुए उनके लिए कस्तूरबा से निबटना आसान नहीं था। कस्तूरबा की हठ, असहयोग, सहनशीलता और उत्सर्ग उनके लिए एक पथ-प्रदर्शक बने। साथ ही काली औरतों का उनपर गहरा असर हुआ। स्त्रियों के भीतर अहिंसात्मक तरीकों से लड़ने और बात मनवाने, सहते जाने और त्याग करने की अदम्य क्षमता के विविध प्रयोग अभी हिंदुस्तान में किए जाने थे।


मेरी नज़र में इसका सबसे सुन्दर प्रयोग साम्प्रदायिकता के मुद्दों से निपटने में गांधी ने किया। नोआखली में जो हुआ उसे कोई गांधी ही सम्भव कर सकता था। इससे ज़्यादा दुख की बात क्या हो सकती है कि एक व्यक्ति जो हिंदुओं से मुसलमानों का पक्ष लेने के लिए और मुसलमानों से हिंदुओं का पक्ष लेने के लिए आजीवन गाली खाता रहा वह आज फिर से गालियाँ खा रहा है।


यह कोई नई बात नहीं थी। उन्नीसवीं सदी के समाज-सुधारकों को पढते हुए मैंने यही महसूस किया कि स्त्रियों को लेकर उनकी सोच में कोई नई बात, कोई क्रांतिकारिता नहीं थी। अपनी किताब इण्डियन विमेन में गेराल्डाइन फोर्ब्स लिखती हैं कि यूरोप की नज़र में भारत एक अत्यंत पिछ्ड़ा हुआ देश था क्योंकि यहाँ की स्त्रियों की दुर्दशा जैसी दुनिया में कहीं नहीं थी। बाल-विवाह, सती-प्रथा, जहालत, अशिक्षा, अंध-विश्वास, ऊंची मृत्यु-दर, विधवाओं की स्थिति तो अत्यंत शोचनीय थी। ऐसे में सुधारकों को अपने राष्ट्र की छवि सुधारने के लिए सबसे ज़रूरी लगा कि स्त्रियों को इस नरक से निकाला जाए। लेकिन इन सब सुधारों का अंतिम लक्ष्य एक अच्छी, कुशल, शिक्षित, संस्कारित गृहिणी बनाना ही था। संरचना से टकराने का काम तो औरतों को खुद ही करना था। ज्योतिबा और सावित्री बाई, पंडिता रमाबाई ने यह काम किया भी। लेकिन यह और मज़ेदार है कि बीसवीं सदी की शुरुआत में राष्ट्रीय आंदोलन से रमाबाई की आवाज़ गायब कर दी गई।  1922 तक उनके जीवित रहने के बावजूद। महज़ इसलिए कि वे हर स्तर पर संरचना से टकरा रही थीं। संरचना, जो पितृसत्तात्मक ही नहीं थी हिंदू भी थी और रमाबाई दलित से विवाह करके ईसाई हो चुकी थीं। ख़ैर।  

सबको साथ लेकर चलना गांधी की वह खूबी थी और राष्ट्रीय आंदोलन की विवशता भी कि वे स्त्रियों के लिए कोई क्रांतिकारी ज़मीन तैयार करके अपनी ताकत को कमज़ोर नहीं करा सकते थे। स्त्रियों को अपनी अस्मिता के प्रति सचेत होने देने का मामला बड़ा नाज़ुक मामला था। इससे बड़ा लक्ष्य गांधी के सामने था। मुझे दूधनाथ सिंह की कहानी माई का शोकगीत याद आती है। गांधी जी के आंदोलन में जी-जान से लगी माई जब एक दिन अपने गाँव की स्त्री को घर में पिटता देखती हैं तो बापू को चिट्ठी लिखती हैं – देश के गोरे राचछ्सों से आप लड़िए, मेरे लिए गाँव में ही बहुत काम है, यहाँ तो घर-घर में गोरे राच्छस भरे पड़े हैं।


तो गाँधी ने भारत की स्त्रियों के भीतर आत्मोत्सर्ग और सहनशीलता की भावना को चुनौती दी, और बावजूद इसके कि गांधी के भारत आने से पूर्व ही स्त्रियाँ सार्वजनिक जीवन और कामों में आ चुकी थी, उन्होंने स्त्रियों के बाहर निकलने के कारणों को वैधता दी और बड़ी संख्या में उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन के हिरावल दस्ते में शामिल कर लिया। वे लिखते हैं –“भारत में स्त्रियों ने पर्दे को फाड़ फेंका और राष्ट्र के लिए काम करने को आगे आई। उन्होंने देखा कि राष्ट्र उनसे महज़ घर की देखभाल के अलावा भी कुछ और चाहता है” इस तरह वे मामूली स्त्रियाँ भी जो सदियों के शोषण और गुलामी की वजह से आत्म-सम्मान खो बैठी थीं उनमें एक गर्व का भाव भरा। देश के लिए उनका होना भी मानी रखता है !


लेकिन स्त्रियों के साथ इस प्रयोग में कई सीमाएँ थीं। विचारों और कर्मों से जो पवित्र हैं वे स्त्रियाँ ही उनके अभियान का हिस्सा हो सकती थीं। स्त्रियों के साथ इस पवित्रता को जोड़ना एक हिंदू सवर्ण की नैतिकता के अलावा क्या था कि 1925 में बंगाल कॉन्ग्रेस द्वारा वेश्याओं को संगठित करने को लेकर वे उखड़ गए ? राधा कुमार अपनी किताब हिस्टरी ऑफ डूइंग में इस पर विस्तार से बात करती हैं।

गाँधी स्त्री होना चाहते थे। वे चाहते थे आश्रम के लोग उन्हें बाप नहीं माँ मानें। मनु गाँधी ने उन्हें माँ ही कहा है। एक तरह से यह प्रयोग था। वे मानते थे कि साधना से पुरुष स्त्रियों के गुण पा सकते हैं। अपने एक सहयोगी कृष्ण्चंद्र को एक पत्रमें वे लिखते हैं- ‘the idea is that a man, by becoming passionless, transforms himself into a woman, that is, he includes woman into himself’ स्त्रैण और परुष विशेषताओं का आना-जाना लगे रहना और दुनिया के तमाम लोगों में स्त्रैण-परुष का समान बँटवारा होना एक बराबरी का समाज बनाएगा। लेकिन यहाँ कुछ अलग बात है।  यहाँ दो बातें अजीब हैं। हम सब उनके ब्रह्मचर्य के प्रयोगों के वाकिफ़ हैं। लेकिन पहली बात, ‘पैशन्लेसनेस से स्त्रीत्व को व्याख्यायित करना दिक्कततलब है। अपनी किताब द फीमेल यूनक में जर्मेन ग्रीयर उसी प्रक्रिया को खोलकर बताती हैं जिसके ज़रिए स्त्री को बधिया बनाया जाता है, आवेगहीन, शमित किया जाता है और फिर मूल्य की तरह यह उसके चरित्र के साथ नत्थी कर दिया जाता है।


दूसरी बात, दोषहीन, निष्कलंक ब्रह्मचारियों (यानी जो मात्र संतानोतपत्ति के लिए संसर्ग करें) का समाज बनाने का मकसद क्या हो सकता है? हम जानते हैं कि गाँधी का सारा संघर्ष अपनी कमज़ोरियों के खिलाफ लड़ने से शुरु होता है। यह संघर्ष बड़ा होता जाता है तो समस्त नैसर्गिक मानवीय प्रकृति के खिलाफ एक युद्ध में तब्दील हो जाता है। भोजन के साथ किए प्रयोग, इलाज के तरीकों में उनके प्रयोग और ब्रह्मचर्य ! सभी में एक सी हठ कि मेरा रास्ता सही है। स्त्री-यौनिकता से यह भय पूरी दुनिया की भिन्न संस्कृतियों का जैसे ज़रूरी हिस्सा है। अकेले में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन आसान है। लेकिन स्त्री के करीब रहकर उसके कामुक प्रभाव से बच निकलना सच्चा संत ही कर सकता है। सबरीमाला के भगवान तक स्त्री की उपस्थिति से आक्रांत हैं। माया महाठगिनी, पाप का द्वार,नर्क का द्वार। ऐसे में उसे खुद भी पवित्र रहना चाहिए और पुरुष को भी रहने देना चाहिए। संसार की सेवा के लिए अविवाहित स्त्री जो ब्रह्मचर्य का पालन करती है उससे बेहतर कोई भी नहीं।  
          पिता को चिट्ठी लिखकर मोहनदास इतना तो जान गए थे कि जो बात छुपाई जाती है वह पाप है। छिपाने का अपराध-बोध आपको पवित्र नहीं रहने देगा। इसलिए ब्रह्मचर्य के सभी प्रयोगों पर उन्होंने स्वयम बात की। यह साहस श्लाघनीय है। हमारे बीच में से कितने पुरुष स्वीकार कर सकते हैं कि बसों, सार्वजनिक जगहों पर स्त्रियों के बीच वे क्या-क्या महसूस करते रहे? उनके और प्रेमा कण्टक या बाकी के सहयोगियों के बीच का पत्राचार इस साहस का प्रमाण है। लेकिन जितना गांधी अपने अनुभवों की कहते हैं उन स्त्री-सहयोगियों की भावनाओं की एकदम नहीं बताते जो इन प्रयोगों में साथ थीं। उनका मह्ज़ गिनी पिग बना दिया जाना अक्षम्य है। आश्रम की तमाम स्त्री-सहयोगियों के बीच ईर्ष्या के कई सबूत मिलते हैं। तमाम आलोचनाओं के बाद भी गांधी कहते हैं कि उनकी सहयोगियों की सहमतिहै तो फिर बाकियों को क्या दिक्कत है? यहाँ सुचेता क्रपलानी के प्रेम विवाह की बात याद करनी चाहिए। गाँधी प्रेम विवाह और अंतरजातीय विवाहों के खिलाफ थे। शायद पूछा भी किसी ने कि जब दो लोग राज़ी हैं तो बाकियों को दिक्कत क्यों? इन तमाम वैचारिक विरोधाभासों पर बात करने से नीलिमा डालमिया तक बच निकलीं हैं जिन्होंने अपनी किताब कसूरबा की रहस्यमय दायरी में तथ्यों के आधारपर कस्तूरबाई की दृष्टि से एक फिक्शनल किताब लिखी है। 


मैं वापस लौटती हूँ राष्ट्रीय आंदोलन में भारतीय स्त्रीत्व के साथ उनके प्रयोग पर। तो स्त्री को माता बनाया गया और माता को पीड़िता। भारत माता का बिम्ब भी यही था। दुर्गा और काली। सरोजिनी नायडू अपने एक भाषण में देश के मर्दों को सम्बोधित करते हुए कहती हैं कि पालना झुलाने वाले हाथों ने आज आज़ादी की मशाल थाम ली है, अब तो शर्म करो भाइयों !

कुल मिलाकर गाँधीवादी आंदोलन में स्त्रियों की हर तरह की हिस्सेदारी ने उन्हें इस तरह भ्रमित किया कि उन्हें अपना असल शत्रु- पितृसत्ता नज़र ही नहीं आई। वे तो एक पवित्र उद्देश्य में अपने भाइयों, पतियों, पिताओं का साथ देने के लिए पर्दे को फेंककर दुर्गा और काली बन सामने आ गई थीं। सबसे पहला झटका उन्हें तब लगा जब हिंदू कोड बिल के समर्थन में वही हिंदू पुरुष खड़े मिले जिनके कंधे से कंधा मिलाकर वे आज़ादी के लिए प्राणोत्सर्ग करने निकली थीं। इस पर विस्तार से बात हो सकती है। बल्कि उन तमाम बिंदुओं पर जिन्हें मैंने अपने वक्तव्य में उठाया है।
यह भ्रमावस्था लम्बी चलती है। लगभग 1970 तक। यही हमारे राष्ट्रीय आंदोलन का स्वरूप था। आज हम देखते हैं कि उन्नीसवीं सदी के तमाम सुधारकों और राष्ट्रीय आंदोलन के महान नेताओं गोखले, तिलक, पटेल, जस्टिस रानाडे जैसे तमाम लोगों की धरोहर हिंदू राष्ट्र बनाने के काम आ रही है।      

एक बात साफ है कि गहरे अध्ययन के बिना इस व्यक्ति के बारे में कुछ भी ठसक से कहना निरी मूर्खता है और तमाम अध्ययन के बाद भी इसके बारे में बिना एक पक्ष पकड़े कुछ कहना मुश्किल है।
इतना ज़रूर है कि निजी और सार्वजनिक का भेद जिस तरह यह अपने जीवन में मिटा पाया वह असाधारण है। यह भी कि उसकी क़ीमत आप कभी अकेले नहीं चुकाते। गाँधी ने भी अकेले नहीं चुकाई गाँधी होने की क़ीमत। यह कोलेटरल डैमेज सम्भवतः सबसे ज़्यादा स्त्रियों के पल्ले पड़ा।
असल समस्या अब यह है कि सावरकर और गोडसे जैसों की मौजूदगी की क़ीमत चुकाना एक समाज को इतना भारी और महँगा पड़ता है कि पूरे इतिहास में गाँधी को एक ही बार पाया जा सकता था।

अब, सबको साथ लेकर चलने वाला भी गाँधी नहीं हो सकता, लेकिन गाँधी के रास्ते से गुज़रे बिना यह संभव भी नहीं।

दरअसल, मौलिकता के बिना कोई पीढ़ी अपने युद्ध नहीं जीत सकती। सत्य के साथ उसे अपने प्रयोग करने होंगे।



-रज़ा फाउंडेशन द्वारा महात्मा गाँधी की बीज पुस्तकों पर आधारित युवा-2019कार्यक्रम में दिया गया मेरा वक्तव्य

यह महज़ थप्पड़ की गूँज नहीं थी


-     ---- शिखा परी

यह मह्ज़ थप्पड़ की गूँज नहीं थी। 

 उस दिन जब स्कूल से वापिस आयी तो ताऊजी छोटू के लिए एक बड़ा सा एरोप्लेन लाये थे और मेरे लिए लाल छोटी - छोटी चूड़ियाँ मैंने पूछा भी कि मेरे लिए एरोप्लेन क्यों नहीं लाये तो बोले तुम उड़ा नहीं पाओगी।मुझे सुनके बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।
लड़की और लड़का की स्पेलिंग जब टीचर ने सिखाई थी तब ये नहीं सिखाया था कि नहीं, नो शब्द भी जुड़ते हैं लड़की के साथ ये फ़र्क किसी डिक्शनरी में भी मुझे नहीं दिखाई दिया।
आज ताऊजी ने मुझे एरोप्लेन न देकर ये भी बताया कि मैं नहीं उड़ा पाऊंगी इसे,मैंने कुछ नहीं कहा और चूड़ियाँ भी उन्हें वापिस कर दी।
मैंने बहुत सारी किताबों में ढूँढा कि छोटू और मुझमें क्या फ़र्क है?माँ भी बहला देती थी ,कुछ बिना कहे जब थोड़ी और बड़ी हुई तो पिताजी को दुकान खाना देने छोटू जाता था वो हाफ पेंट पहनकर दुकान चला जाता फिर पार्क में खेलकर आता देर रात, मैं घर में भी हाफ पैंट पहनती तो दादी गुस्सा होने लगती थी, मैं दुकान नहीं जा सकती थी,थोड़ी और बड़ी हुई तो अचार खाने से माँ और दादी ने रोका।
मुझे पता नहीं था कि लड़की होना और उसका बड़ा होना लोगों को अखरता है . बगल के पवन भैया  मुझे अजीब नज़रो से देखते थे एक दो बार छाती के पास भी हाथ ले गए तो मैं सहम गई ,मुझे समझ नहीं आया कि पवन भैया इतने कैसे बदल गए.इन्हें मेरे साथ ही खेलते देखा है लेकिन सीने के पास हाथ क्यों ले जाने लगे हैं मेरे ,हाँ मेरे सीने के पास. मेरा सीना उभरा था. थोड़ा मुझे समझ नहीं आया सीना तो इनके पास भी है फिर ये खुद के सीने को क्यों नहीं स्पर्श करते?
मैं उभरे सीने में उलझ गई थी, सोचा दादी से कहूँगी तो वो मेरा खेलना भी बंद करवा देंगी।छोटू से कहूँ तो क्या वो समझेगा?
हिम्मत करके माँ से कहा मुश्किल से, वो गुस्से से लाल थी पवन की माँ से उस दिन माँ ने बहुत लड़ाई की ।अब मैं और छोटू दोनों पवन भैया के साथ नहीं खेलते थे।माँ से कई बार पूछा कि ऐसा क्यों हुआ तो माँ ने कुछ नहीं बताया मुझे बोली लड़कियों के साथ होता है ऐसा, बेटी इसलिए तुझे मना किया था हाफ पैंट में खेलने मत जाया कर।
ये भेड़िये सी भूखी दुनिया हम लड़कियों के लिए कितनी भयानक थी समझ नहीं आती थी,दुनिया तो लड़कों के लिए भयंकर हो सकती थी, पर लड़कियों को ही ठीक से रहने के लिए कहा जाता है।मैं अब सातवीं कक्षा में पढ़ रही थी कि एक दिन मेरी सहेली की स्कर्ट पे मैंने खून से लतपथ धब्बे देखे मेरी चीख़ निकल गई।मेरी चीख़ अकेली नहीं थी ,उस चीख़ में मेरी सहेली की चीख़ और तेज़ थी जिसके स्कर्ट पे लाल धब्बे थे, वो ज़ोर ज़ोर से रो रही थी हम सब उसे देख रहे थे ।हम सबको लगा उसे कैंसर हो गया ।टीचर ने शांत रहने को बोला लड़कों को क्लास से बाहर भेजा और उसकी मम्मी को बुलाकर उसे घर भेज दिया ।मैंने मम्मी से घर आके बताया दादी ने सुन लिया बोली इसको गर्म चीजें बिल्कुल न दो ,छोटू को दादी गोंद के लड्डू खिलाती थी मैं माँगती तो आधा देकर भगा देती थी।मैंने माँ से शिकायत की पर दादी तो लीडर थी घर की माँ की कहाँ हिम्मत होती थी, माँ मुझे ही चुप कराती थी।
राखी पर हमेशा बुआ छोटू को सोने का लॉकेट देती थी, मुझे 200 रुपए. मैं गुस्सा हो जाती थी पर किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता था।छोटू रूठ जाता तो पिताजी उसके लिए समोसे लाते थे।

फिर वह दिन भी आया जब मेरी खुद की स्कर्ट पे लाल धब्बे थे। मैं अब समझ गई थी कि ये मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई है लड़की और लड़के में ये एक ख़ास फ़र्क को खून के धब्बे अलग करते थे।मेरी बचपन की सहेली चम्पा मुझसे अक्सर मिलने आती थी मैं और चम्पा ढेर सारी बातें करते थे, नवीं कक्षा में पहुँचे तो वो अक्सर आती थी, एक दिन छोटू को मैंने चम्पा को हाथ लगाते खुद देखा मुझे तुरंत पवन भैया याद आ गए मैंने छोटू के थप्पड़ रसीद दिया, उस दिन पिताजी ने घर आकर मुझे बहुत सारी बातें सुनाई,मैं कमरा बन्द करके रोती रही दो दिन तक ।मैं साईकल से स्कूल जाना चाहती थी पर जानती थी पिताजी नहीं मानेंगे ,पिताजी ने छोटू के साथ रिक्शे से जाने के लिए हिदायत दी मैंने बहुत मिन्नतें की पर पिताजी नहीं माने ।


ईस्टर एग गर्ल शीर्षक यह चित्र इंटरनेट से साभार 





मैं अब समझ गई थी कि ये मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई है लड़की और लड़के में ये एक ख़ास फ़र्क को खून के धब्बे अलग करते थे।






उस दिन गाँव से ताऊजी आये थे बोले बहुत मोटी हो रही हो, कुछ कम खाया करो मैं सोचने भी लगी कि घी के लड्डू, दाल में घी डालके तो छोटू खाता है मैं तो वो भी नहीं फिर मैं अपने बढ़ते वज़न के लिए ज़्यादा कैसे खाने लगी?
चम्पा से मेरा मिलना अब बन्द हो गया था, चम्पा ने मुझसे माफी मांगी उसे लगा उसकी वजह से छोटू और पिताजी से मेरी लड़ाई हो गई पर ऐसा नहीं था। छोटू को थप्पड़ रसीद के मैंने अपने दिल को ठंडक पहुंचाई थी, ऐसा लगा जैसे सारे पवन भैयाओं को जड़ा था मैंने वह थप्पड़। चम्पा को समझाया।
सभी सहेलियाँ पिकनिक के लिए बाहर घूमने जा रही थी, मैंने पिताजी से मुश्किलों से आग्रह किया कि वो मुझे बाहर जाने दे ये इंटर की आखिरी पिकनिक थी हम सब दोस्त इसके बाद कभी नहीं मिलते. संयोग से छोटू की कक्षा भी हमारे साथ उसी पिकनिक में गई।पिकनिक पे हमने बहुत मस्ती की खूब मजे मारे, लेकिन एक दिन जिसदिन वापिस आना था ,उसी दिन शाम को चम्पा के साथ छोटू ज़बरदस्ती करते हुए पकड़ा गया मैं तुरंत चम्पा के साथ खड़ी हो गई।
छोटू नफरत भरी आँखों से मुझे देख रहा था, मैंने चम्पा को पूरा सपोर्ट किया और प्रिंसीपल से छोटू को सख्त से सख्त सज़ा देने की रिक्वेस्ट भी की।
पिताजी ने घर आकर मुझे बहुत बातें सुनाई, दादी ने कहा एक ही भाई है तेरा कौन पूछेगा तुझे भाई की दुश्मन बन जाएगी तो ?
मुझे समझ नहीं आया कि छोटू ने चम्पा के साथ जो किया उसके लिए हर सज़ा कम थी लेकिन पिताजी और दादी लड़की लड़का की उस मात्रा को समझा रहे थे मुझे।मैं अब बाग़ी हो चुकी थी ,मैंने उस दिन पहली बार पिताजी और दादी से बहस की ,दादी तुरंत बोली पढ़ना बेकार था इस लड़की का।मैंने समझ लिया था कि अब हर चीज़ जो एक लड़की करती है वो बुरी ही होती है।छोटू मुझसे बहुत बुरी तरह नाराज़ हो गया था।
मैं बाहर पढ़ना चाहती थी पर फिर से घर में अपनी एक लड़ाई लड़ी।बाहर पढ़ने गई नए दोस्त मिले और मुझे अपना करीबी दोस्त भी मिला हमने शादी के ढेर सारे सपने सजा लिए थे,लेकिन उससे पहले ही पिताजी ने छोटू के कहने पर एक जगह मेरी शादी तय कर दी।मैंने मिन्नतें की लेकिन पिताजी को न नहीं कर पाई।शादी हुई और वो सब हुआ जो एक स्त्री जिसके लिए जन्म लेती है मैं माँ बनने वाली थी मेरे पति अच्छे थे या नहीं मुझे समझ नहीं आता था उन्हें मेरा कहीं आना जाना बात करना पसंद नहीं था।मैंने एक बेटी को जन्म दिया, मैं बहुत खुश थी लेकिन मेरी सास और पति उतने खुश नहीं हुए।पति मुझसे रात को जानवरों जैसा बर्ताव करते थे, मैं चुपचाप अपने शरीर पे निशान बनवाती, माँ से कहती तो वो बोलती बेटा किस्मत है क्या कर सकते हैं धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा।
धीरे धीरे मैं अपनी बेटी को बढ़ते देखने लगी, मैं फिर से गर्भवती थी ,शरीर जवाब देने लगा था अब दूसरा बच्चा बच नहीं पाया।मेरे पति की नफ़रत और सास का रूखापन दोनों का पैमाना बढ़ गया था।मैं एक अच्छी औरत नहीं, लड़की को जन्म देने से क्या फ़ायदा?वो वंश नहीं चला पाएगी
ये सारे ताने दिल में छेद कर रहे थे लगातार।
मेरी बेटी शुरू से दादी के रूखेपन को जीती हुई बड़ी होती गई, जेठ के बेटे को मेरे पति खूब प्यार करते और मेरी बेटी से हमेशा कहते भाई है तेरा माना कर उसे।मुझे अपनी और छोटू की उस लड़ाई, खींच तान याद आने लगी।मैंने ठान लिया कि मेरी बेटी कोई मामूली बेटी नहीं ये साबित कर के रहूँगी।
मेरी बेटी के अंदर एक आग थी वही आग जो मेरे अंदर सुलगती रहती थी।

वह  दिन रात पढ़ती और इतना पढ़ती कि मुझे उससे कहना होता कि बस कर।पर उसके अंदर तो जैसे ज्वाला थी बहुत तेज ज्वाला।उस साल आई आई टी में सेलेक्शन हुआ मेरी बेटी का।मैं खुशी से पागल हो गई थी।पर अभी भी मेरे पति खुश नहीं थे,उनका मानना था क्या कर लेगी ?इतना पढ़के भी। उसकी दादी तो और सुलग गयीं थी।
उसका दाखिला हुआ।फिर इंजीनियरिंग। मेरी बेटी ने इसरो का फॉर्म भरने और चुने जाकर हम सब को चौंका दिया।मैं रोने लगी ,खुशी के मारे पागल हो गई थी। मन ही मन उसे चाँद पर भेजने की तैयारी कर ली।
 उसके दीक्षांत समारोह में मेरे अपने ताऊजी भी शामिल होने आए,मेरे बगल में बैठे सकुचाते हुए जैसे कुछ बोले बेटा तुझे याद है मैंने तुझे एक बार एरोप्लाने न देकर चूड़ियाँ दी थी... वे आगे कुछ और भी कहना चाहते थे  लेकिन  मेरे लिए वह सब सुनना अब कोई मानी नहीं रखता था। मैंने बिना आगे सुने खुद बेटी के साथ चल दी स्टेज पर।
हम माँ-बेटी मंच से जो जवाब दे रहे थे उसकी गूंज न सिर्फ ताऊजी को अवाक कर गई बल्कि आगे की कई पीढियों तक सुनाई देने वाली थी।




शिखा परी , कानपुर उ. प्र. से हैं । इंजीनियरिंग और जर्नलिज़म करने के बाद लिखने में मन रमता गया। पिछले 9 साल से ब्लॉगिंग में सक्रिय। स्त्री-विषयक लेखन के लिए जानी जाती हैं। दो उपन्यास लिख चुकी हैं। देश की विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में लिखती रहती हैं।