Monday, December 2, 2019

'तुम हो' यह सिद्ध करने के लिए तुम्हारा आधार कार्ड और पासपोर्ट काफ़ी है


चोखेरबाली पर दस साल पहले हमने हाइमेन यानी कौमार्य झिल्ली की मरम्मत करने वाली सर्जरी के अचानक चलन में आने पर वर्जिनिटी/कौमार्य की फ़ालतू और बकवास धारणा पर एक पोस्ट लिखी थी।इन सालों में जब हम सोच रहे थे कि ऐसे फ़ितूर समाज में कम हो गए होंगे, एक दिन अचानक उस गोरखधंधे का पता लगा जिसमें अब सर्जरी की भी ज़रूरत खत्म हो गई थी। महज़ कैप्स्यूल्स के इस्तेमाल से पहली रात को कौमार्य की गवाही देने का और बाकी के वैवाहिक जीवन की सुख-शांति सुनिश्चित कर लेने का सरल उपाय लड़कियों के पास मौजूद था। जबकि इसकी कोई गारण्टी कभी नहीं होती। यही नहीं, चिर-कौमार्य का एह्सास फिर से ज़िंदगी में जगाया जा सके इसके लिए भी बिना सर्जरी के लेज़र से योनि को कसने की तकनीक बाज़ार में आ चुकी। स्तनों और बाकी देह को कसने की तो तकनीक उप्लब्ध थी ही सहजता से। आख़िर कितना खुद को ऑल्टर करना होगा स्त्री को, मन से, तन से ...अपने पुरुष के प्रेम को पाने के लिए? जब पतियों द्वारा पहली रात के नकली खून का परीक्षण करवाया जाने लगेगा तब किस दिशा में भागेंगी लड़कियाँ ? तब बाज़ार एक और जाल बिछाएगा ! एक सच छिपाने के लिए हज़ार झूठ बोलने पड़ते हैं।अब समय है एक एक झूठ को अनडू करने का।
आज चोखेरबाली पर पढिए प्रतिमा सिन्हा की यह टिप्प्णी जिसमें व्यक्त निराशा और ग़ुस्सा एकदम स्वाभाविक है, जायज़ है। सोशल मीडिया पर विरोध के बावजूद ऐसे उत्पाद आज भी अमेज़ॉन पर मौजूद हैं और ज़ाहिर सी बात है बिक भी रेह होंगे। हमें लगातार लिखना और विरोध करते रहना होगा। - सुजाता

'तुम हो' यह सिद्ध करने के लिए तुम्हारा आधार कार्ड और पासपोर्ट काफ़ी है 
- प्रतिमा सिन्हा 

एक जानी-मानी ऑनलाइन शॉपिंग कंपनी ने अपनी लिस्ट में एक प्रोडक्ट ऐड किया है। वर्जिनिटी साबित करने वाला ब्लड यानी खून। 'i-virgin, blood for the first night' नाम से खुलेआम बिक रही ये कैप्स्यूल्स मँगवा कर कोई भी लड़की शादी के बाद अपने पति के सामने अपना कौमार्य सुरक्षित होने का दावा कर सकती है और वह भी प्रमाण के साथ यानी सफेद चादर पर लाल खून के धब्बे। 
चित्र इंटरनेट से साभार 


पहले के ज़माने में यह ज़रूरी रस्म हुआ करती थी यह तो सुना था। लड़की की वर्जिनिटी चेक करने का यह नायाब और ग़ज़ब तरीक़ा तथाकथित बड़े-बड़े, कुलीन लोगों के घरों में अपनाया जाता था। पति से पहली बार सेक्स करने के बाद अगर खून के धब्बे, सफ़ेद चादर पर ना पड़ें तो लड़की ज़िन्दगी भर अपने आप को चरित्रवान साबित करते रहने को मजबूर होती थी। उसे जवाब देने होते थे पति के सामने, घर वालों के सामने और कभी-कभी दुनिया वालों के सामने भी। शादी और पति के साथ संसर्ग का सारा आनन्द इसी भय में घुलता रहा कि पता नहीं अंदर हाइमन की झिल्ली फटी है या बची है। एक ऐसी परीक्षा में फेल होने का डर जिसकी तैयारी में अपना कोई हाथ ही नहीं। 

 लेकिन दुनिया की तरक्की हुई औरत से जुड़ी प्रथाएँ वहीं की वहीं रह गई, गर्त में।
  
मेडिकल साइंस में सुबूत के साथ यह साबित कर दिया कि कुंवारेपन में कौमार्य का पर्याय कही जाने वाली हाइमन झिल्ली सेक्स के अलावा भी कई दूसरी वजह से फट सकती है जैसे दौड़ने से, कूदने से, खेलने से, साइकिलिंग करने से और ऐसी किसी भी गतिविधि में बहुत ज़्यादा सक्रिय रहने से लेकिन यह सारे दावे एक तरफ़ और समाज का फ़तवा दूसरी तरफ़। सिद्ध तो यह भी हो गया कि हाइमेन एकदम फिज़ूल और बकवास चीज़ है। जिसके होने न होने का कोई अर्थ नहीं है।

तुम किसी को सुबूत देने के लिए पैदा नहीं हुई और ना ही कोई ऐसा पैदा हुआ है जो तुमसे तुम्हारे होने का सबूत मांग सके। 'तुम हो' यह सिद्ध करने के लिए तुम्हारा आधार कार्ड और पासपोर्ट काफ़ी है। 






बहुत ख़ुशनसीब होंगी वे औरतें, जो आत्मा तक अपमानित करने वाले इस अनुभव से नहीं गुज़रीं लेकिन ज़्यादा संख्या ऐसी औरतों की रही जिन्होंने यह अपमान ही नहीं वैवाहिक जीवन में यौन-सम्बंधों से जुड़े तमाम अपमानों को न सिर्फ़ झेला है बल्कि उसकी पूरी कीमत भी चुकाई है। ऐसे हालात में बाज़ार इसे सबसे बेहतर ढंग से समझता है कि सफ़ेद चादर पर खून के लाल धब्बों की कीमत क्या है ?

उस जानी-मानी ऑनलाइन शॉपिंग कंपनी ने भी फ़ायदे का यही धंधा शुरू कर दिया है। अभी तक उसने कितनी 'आई-वर्जिन' पिल्स बेची हैं इसकी जानकारी मेरे पास नहीं है। मगर इस ख़बर को पढ़कर लगता है कि अब लड़कियाँ सचमुच "तू डाल-डाल, मैं पात-पात" वाले मूड में आ गई हैं। प्यारे पतिदेव अगर पत्नी के प्यार और समर्पण को परे रख कर उससे कुंवारे होने का सबूत मांगेंगे तो पत्नी भी पहले से तैयारी करके रखेगी। अपने वर्जिन होने का सबूत पेश कर देगी। दम हो तो काट कर दिखाओ। 


अब खुलेआम ऑनलाइन जो चीज़ बिक रही है, जाहिर है उसकी जानकारी सबको है। मतलब मियां जी खुल्लम खुल्ला उल्लू बनने को तैयार रहेंगे। फिर किसका सबूत सच्चा था और किसका खरीदा हुआ इसका फ़ैसला करना भी मुश्किल होगा। सीधी सी बात है कौमार्य की इच्छा रखने वालों की अहम तुष्टि के रास्ते निकाल लिए गये हैं। कल को पति लोग उस खून की भी जाँच कराने लगेंगे कि तुम्हारा ही है या कैप्स्यूल का कमाल है ! यह धंधा कितना आगे जाएगा यह नहीं कहा जा सकता लेकिन बेवकूफ़ी भरे रिवाजों से दो-दो हाथ करने के मूड में आई लड़कियों से एक बात कही जानी बेहद ज़रूरी है।

 लड़कियो, तुम्हारे पागलपन की कोई सीमा है या नहीं ?
उन्होंने कहा - 'गोरी चाहिए।' तुमने फेयरनेस क्रीम का धंधा चमका दिया। उन्होंने कहा - 'पतली चाहिए।' तुमने चर्बी घटाने वाले विज्ञापनों के व्यूज़ बढ़ा दिए।  वो कहते हैं - 'वर्जिन चाहिए।' अब तुम खून की गोलियाँ खरीदने लगोगी ? और फिर ज़ोर-शोर से ऐलान करती फिरोगी कि तुम आज की आज़ाद नारी हो ? अपने फ़ैसले खुद करती हो ? अपना जीवन अपने हिसाब से जीती हो ?


जब तक तुम अपने लिए बनाए हुए ऐसे बेवकूफ़ाना सांचों के हिसाब से ढलने की कोशिश करती रहोगी, तुम्हारी आज़ादी का ऐलान न सिर्फ़ अधूरा है बल्कि पूरा का पूरा झूठ भी है। बात तो तब है कि तुम इन सांचों को तोड़ो और अपनी शर्तों पर आगे बढ़ो।

यह समझ सको कि तुम्हें किसी के सामने अपना कुछ भी सिद्ध करने की ज़रूरत नहीं। ना ही को कौमार्य, ना ही संसर्ग। यह जीवन तुम्हारा है। देह तुम्हारी है। तुम जो चाहो, करो। तुम किसी को सुबूत देने के लिए पैदा नहीं हुई और ना ही कोई ऐसा पैदा हुआ है जो तुमसे तुम्हारे होने का सबूत मांग सके। 
'तुम हो' यह सिद्ध करने के लिए तुम्हारा आधार कार्ड और पासपोर्ट काफ़ी है। इसके अलावा किसी और प्रॉडक्ट पर तुम्हें विश्वास नहीं करना है।

उम्मीद करती हूँ यह और इस जैसे अन्य प्रॉडक्ट बाज़ार का सबसे फ्लॉप प्रॉडक्ट साबित हो।



प्रतिमा सिन्हा 


 20 वर्षों से वाराणसी में अपने उत्कृष्ट वाणी-शिल्प, मंच संचालन व उद्घोषणा
     रंगमंच और लेखनी के माध्यम से स्त्री केन्द्रित विषयों को स्वर देने के लिए भी जानी जाती  हैं।
कहानियों, कविताओं, ग़ज़लों, नज़्मों और नाटकों का निरंतर लेखन. हिन्दी-उर्दू अख़बारों के साथ ही विभिन्न वेब पोर्टल और ब्लॉग्स पर लगातार प्रकाशन। 





Thursday, November 14, 2019

कवयित्री बतौर गृहिणी


अनुराधा अनन्या इन दिनों विदेशी कवयित्रियों के अनुवाद कर रही हैं। चोखेरबाली के लिए उन्होंने एलिज़ाबेथ आइबर्स की कुछ कविताएँ भेजी हैं।

 एलिज़ाबेथ की कविताएँ कई खंडों में प्रकाशित हुई हैं।इनकी कविताओं में अफ्रीकी और डच भाषा का जो मेल है उसमें वहाँ की संस्कृति की झलक दिखाई देती हैं। 1915 में जन्मी एलिज़ाबेथ 1986 में डच नागरिक भी बनीं। अफ्रीका के अलावा इन्होने नीदरलैंड में भी प्रवास किया। इनकी कविताओं में अफ्रीका और नीदरलैंड के आम जनमानस के जीवन की झल है। ये कविताएँ जीवन के इतना क़रीब और सहज हैं कि  वैश्विक स्तर पर पढ़ी गई और अलग-अलग भाषाओं में अनूदित हुई। स्त्री-जीवन के विविध अनुभवों के अलावा एक प्रवासी की नज़र से देखी गई दुनिया भी इनकी कविताओं में दर्ज है।बतौर कवयित्री एलिज़ाबेथ को खूब सराहा भी गया और कई पुरस्कार भी प्राप्त हुए। अफ्रीका में जन्मी एक महिला के लिए लिखना ही बड़ी बात होती है वहां बतौर कवयित्री इस तरह से दर्ज होना और भी बड़ी बात है- अनुवादक 


Elisabeth Eybers


कवयित्री बतौर गृहिणी
हमेशा एक झाड़ू एक दीवार के

सहारे खड़ी पाई जाती है
कभी खाना आये भी
तो समय पर नहीं आता

बिना तारीखों के वो दिन

जिनमें वो इधर-उधर घूमती रहती है
ख़ाली,ज़िद्दी
और थोड़ी गड़बड़ाई सी

इस्त्री होने वाले कपड़े उदासी से

कुर्सी पर लटके रहते हैं
ये मुद्राएं ना जाने कहां से आती है

ढेर बन पड़ी हुई पुरानी चिठ्ठीयां
जिनके जवाब दिए जाने हैं 

कागज़, दवाइयां 
गहरे दराज़ में ठूंसे हुए हैं

शुक्रिया,कि वह तुम्हारे विशाल हृदय का

हिस्सा है
तब भी अभी भी अपनी छोटी खोपड़ी की सीमाओं के लिए समर्पित.

ओ क़ायदे के दोपाये(दो पैर वाले)

ध्यान दो
उसे अकेला छोड़ दो
उसे पढ़ने दो




प्रवासी

मेरे पास हाथ पैरों के सिवा कुछ भी नहीं है,
बाकी जो कुछ भी था, वो पारगमन में खो गया था
घबराया हुआ दिल,बेचैनी
लेकिन फिर, उनसे होगा क्या?

 तोलने के लिए, कि क्या खोया है, क्या आसपास है
रोशनी और आवाजों को समझने के लिए
हालाँकि इन्हें मैंने ना देखा या ना सुना
लेकिन मेरे चेहरे पर अब भी होश है।

और मेरी छाती और पेट की जगह पर
मुझे लगता है कि इनकी बजाय कुछ और ही था
उस जगह पर ।
किसे पता था, कि ख़ालीपन इतना भारी है
कि बेपर्दा होने का अंजाम ऐसी जकड़न है?



तर्क के लिये आख़िरी कोशिश

ख़ालीपन- जो कि एक आदमी के भीतर तक भर जाता है
जो धीरे-धीरे शुरू हुआ और आखिरकार लबालब भर गया है
फिर तेजी से एक ज़ख्म की शक्ल ले लेता है
और अक्सर एक झंझट बन जाता है

इसे छोटी-मोटी परेशानियों के साथ जोड़ना
वास्तव में एक जायज़ तर्क नहीं है
इससे पहले आप दिन-ब-दिन इसमें डूबते जा रहे थे.
अब कभी कभी पूरी तरह से
लगभग नाकारा

यहां तक कि आख़िर में भी
आप फ़ितरतन इसे टालते ही रहते हैं

रात में

हां, मैं अभी तक यहीं हूँ और शायद मुझे यहां से कभी ना जाना पड़े
तुम सोचते हो 
जब गहरी रात में चौंककर तुम उठ जाते हो.

जो तुम्हारे पीछे छूट जाएगा
वो ग़ायब नही हो जाएगा तुम्हारी निगरानी के बिना
रख लो जो रख सकते हो और बाक़ी जो बच जाए उसका खुद का जीवन होगा।

कभी पहुंच के भीतर, पर क्षय से अछूता

सुनहरे रंगों में गिरफ्त
हाल के दिनों से बचा हुआ।

तुमने वक्त के कटघरे से चौंकती हुई एक निगाह डाली
वहाँ, जहां वो सब जो ग़ायब हो चुका है जो गायब नही होना चाहता था, तुम्हारा इंतजार कर रहा है ।
और तुम खुद अनन्त की ओर
खिंचे जा रहे हो
वक्त दर वक्त
जब तुम गहरी रात में चौंक कर जाग जाते हो।



विरासत

मेरे पिता और मेरी माँ की तरह ही
मुझमे भी ऐसी ही जारी है जैसी उनकी रही
मेरे लंबे अंग जो पिता से मिले हैं
मेरे उलझे मोटे बाल, जो मुझे मेरी माँ से मिले हैं

पिता शांत और संशयमुक्त मनन करते रहते थे
इस दौरान कुछ भी,
चाहे कितना भी सम्मानीय हो
नही मिटा सकता था मेरी माँ की भेदती सी मुस्कान को
उन दोनों ने आपसी असमानताओं के बीच भी समझौते किये
और उनकी असहमतियों की आदतों
की पूरी क़ीमत चुकानी पड़ी मुझे

आख़िर, अब मेरे अस्सी के दशक में
मुझमें उन्हें बर्दाश्त करने की कुव्वत है

हर आदमी नष्ट हो जाता है
और निंदा करने वाला भी कोई नहीं रहता

सिर्फ: वे शायद ही कभी आराम करते हैं
और हर शय को अपनी तरह बनाने के लिये बेचैन रहते हैं

मुझे अहसास हुआ है कि इस तरह एक दूसरे के बगल में रहना
 दिन-ब-दिन थकाऊ होता जाता है

अनुवाद-  अनुराधा अनन्या

Wednesday, October 30, 2019

निर्वात की कड़ियाँ कब टूंटेगी?


- रश्मि रावत


‘आजादी’ शब्द ही ऐसा मनोहारी है कि कान में पड़ते ही मन में लुभावनी छवियाँ तिरने लगती हैं। खुले आकाश में पंख पसारे चहचहाते परिंदों की खुशनुमा उड़ानें, हँसते-गाते-मचलते-खेलते-दौड़ते बच्चे (बच्चियाँ अलग से बोलना पड़े तो कैसी आजादी),....हर ओर जीवन की उमंग, अपने होने का, जीने का उत्सव।

   जीवन जब बाधा दौड़ हो तो मनोजगत की ये छवियाँ देर तक नहीं चलतीं। मनुष्य होने के नाते जो मानवाधिकार हर किसी को मिले ही होने चाहिए, उन्हें हासिल करने के लिए भी अनवरत संघर्षों की दरकार हो तो मुक्ति की कल्पना भी अबाध क्योंकर हो। हाँ आँखें मुक्ति का यह सपना देख पाती हैं-इसका मतलब पहले से बेहतर स्थिति तक तो हम पहुँचे ही हैं। सपना देख पाना छोटी बात तो है नहीं। राजनीतिक स्वतंत्रता के आने से सामाजिक, आर्थिक आयामों में फर्क न पड़ा हो, ऐसा तो नहीं है, मगर उसकी गति काफी धीमी रही है। बेहतर समतामूलक स्वस्थ भविष्य की उम्मीद जगने लगी थी। मगर पिछले कुछ समय में स्वस्थ, सुंदर जिंदगी जीने की राह की अड़चनें बढ़ती जा रही हैं। संवैधानिक मूल्यों को जड़ परम्पराओं और उग्र उपभोक्तावाद की ताकतों के सामने लचर पड़ते देखने के अनुभवों में इजाफा ही हो रहा है। सामाजिक भेदभाव के खत्म हुए बिना आजादी की कल्पना की भी कैसे जा सकती है। तीन-चौथाई भारत शेष एक चौथाई इंडिया का उपनिवेश ही लगता है।


आज के समय की सबसे बड़ी विडम्बना है कि यथार्थ की विषमता का बोध ही लोगों को नहीं है। बोध नहीं है तो विषमता को दूर करने के उपक्रम भी भला कैसे होंगे। साहित्य और अच्छे लेखन की और लघु पत्र-पत्रिकाओं की वर्तमान में बहुत अधिक जरूरत है, मगर लोगों को अपनी इस जरूरत का पता ही नहीं है। इस चुनौती से निपटने के क्रम में अपनी भूमिका तलाशने की कोशिश की तो और भी तीखे ढंग से पता चला कि यह खाई कितनी बड़ी है।


यथार्थ बोध सम्पन्न चिंतन-मनन-लेखन करने वाले लोगों की संख्या इतनी बड़ी नहीं है कि समय की माँग को पूरा कर सके। लिखने-पढ़ने के अपने अनुभवों से एहसास हुआ कि इन चंद लोगों में भी बहुलांश की मानसिकता विभाजित है। दृष्टि खंडित है। समानता मूलकता अभी उनके लिए भी सुदूर भविष्य की कोई चीज है जो सिर्फ यूटोपिया में हो सकती है इसलिए उसके लिए कोशिश करने का हौसला ही नहीं पैदा हो पाता।  वस्तुत: सदियों से मन-मस्तिष्क में जड़ें जमाए हुए ढाँचों को दरकाने के लिए सजग और निरंतर कोशिशों की दरकार होती है। हमारी कोशिशें ढीली पड़ती हैं तो वे मजबूत होते हैं। दूसरी स्थिति यह है कि वर्चस्वशाली वर्ग के विशेषाधिकारों से चिपटे रहने की ललक ( मैं इस ललक को ‘वासना’ मानती हूँ) इतनी तीव्र है कि सामाजिक बराबरी वह चाहता ही नहीं है, सामाजिक मुक्ति का शब्दाडंबर रचना बस उसने सीख लिया है। भीतर परम्परा के ढाँचे कमोबेश अक्षुण्ण रहते हैं और अभिव्यक्ति में समानता के भाव का छद्म भी बना रहता है।

एक स्त्री होने के नाते अकादमिक-बौद्धिक जगत में मिले अपने अनुभवों की ही बात करूँ। स्त्री-दृष्टि की अवधारणा कुछ समय पहले तक मेरी वैचारिकी का अलग से हिस्सा नहीं थी। अब भी साफ समझ बन गई हो, कह नहीं सकती। स्पष्ट तौर पर तो बस यही जानती और मानती आई हूँ कि संविधान में स्त्री-पुरुष सब बराबर हैं और उन्हें समान अधिकार मिले हुए हैं। स्वतंत्र भारत के मध्यवर्गीय परिवार में जब जन्म लिया तब तक पढ़ने की, हँसने-बोलने, खाने-पीने, नौकरी करने की सुविधा जैसे बुनियादी अधिकार स्त्रियों को प्राप्त हो चुके थे। मतलब ऐसा दिखने लायक परिवर्तन सामाजिक गतिकी में हो चुका था कि इन जीवन-गतिविधियों में जाहिरा तौर पर बराबरी सी दिखे, आचरण और अभिव्यक्ति का इतना कौशल तो तब तक समाज ने अर्जित कर ही लिया था। तो उम्र का अब तक का हिस्सा अपने आप को स्वतंत्र भारत का आजाद नागरिक मानते हुए गुजारा। जिसमें स्त्रियों के कर्त्तव्य और अधिकार एकदम वही हैं जो कि पुरुष के। हर सार्वजनिक, सामाजिक परियोजनाओं में हमेशा खुद को एक व्यक्ति समझा, नागरिक समझा। व्यक्ति होने में जब-जब, जिस-जिस आयाम में हारती रही तब-तब अपने को कमतर समझने का बोध पुष्ट होता गया। उम्र बढ़ने के साथ व्यक्तित्व के कई आयामों में मैं खुद को हीन समझती गई। मगर ऐसे ही जैसे एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से कमतर या बेहतर होता ही है किसी काम में। उन क्षेत्रों में जिनमें वस्तुनिष्ठता अपेक्षाकृत अधिक पाई जाती है जैसे गणित, विज्ञान इत्यादि में खुद को हमेशा बराबर समर्थ पाया। साहित्य-लेखन जैसे क्षेत्र में जिनमें विषयनिष्ठता तुलनात्मक ढंग से अधिक पाई जाती है, कोई स्पेस कभी किसी चीज का बना नहीं पाई। स्पेस से मेरा मलतब है अपनी बात कहने का अवसर। तनिक प्रोत्साहन, या लिखे हुए या बोले हुए पर कोई भी प्रतिक्रिया, जिससे अपनी कमी या ताकत का पता चले। कम से कम इतना भर कि लिखा हुआ सम्प्रेषित होता भी है या नहीं। ‘स्पेस’ का अर्थ किसी मुकाम तक पहुँचना मेरे लिए कदाचित नहीं है। संवाद की स्थिति बनना ही स्पेस है हम स्त्रियों के लिए। कह-सुन भर पाने की स्थितियाँ होना काफी लगता है। अकादमिक कार्यक्रमों, पत्र-पत्रिकाओं, सोशल मीडिया सब जगह स्त्रियों की संख्या निरंतर बढ़ती दिखाई दे रही है इसलिए इन सब बाधाओं का स्त्री होने से कोई सम्बंध है, लम्बे समय तक कोई ध्यान नहीं गया। लगा कि जिसमें काबलियत होगी वह साहित्यादि लिख-पढ़ रहे होंगे। मुझे दुनिया के कुछ और काम खोज लेने चाहिए। इसलिए बीच के तमाम वर्षों में क्षेत्र बदल-बदल कर पढ़ाई और काम करती रही। दर्शन शास्त्र तो पहले पढ़ लिया था। मनोविज्ञान पढ़ा।  मानवाधिकार, पर्यावरण और पारिस्थितिकी, जेंडर अध्ययन, शिक्षा शास्त्र में औपचारिक अध्ययन किया। लैंगिक सौहार्द और सॉफ्ट स्किल की कई कार्यशालाओं में लोगों को प्रशिक्षित करने का अवसर मिला। जब पुलिसकर्मियों और अन्य कामगारों से जुड़ी जहाँ लैंगिक विभेद बाहरी आचरण में या एकदम ऊपरी सतह पर दिखाई देता है। मानसिक मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए की गई गुड़ाई में लैंगिक विषमता के मोटे-मोटे ढेले मिले। जिनके अस्तित्व से इंकार करना असंभव था। लैंगिक विभेद की सख्त चट्टानों, मोटे-मोटे ढेलों से टकराने के बारम्बार के अनुभवों के कारण समानता की छद्म चेतना को बनाए रखना असम्भव हो गया। उन ढेलों को निकालकर बाहर फेंकने में जब सफलता मिलती है तो क्रमशः महीन होती जाने वाली जकड़नें दिखाई देने लगती हैं। पुलिस कर्मचारी, छात्रों के लैंगिक संवेदीकरण के लिए अपने साहित्य के अध्ययन का न केवल प्रयोग करती थी। अपितु नई-नई रचनाएँ खोज-खोज कर पढ़ती थी जिससे सही बात सही ढंग से कह सकूँ। इस प्रक्रिया में प्रबुद्ध जन के व्यक्तित्व और उनके कृतित्व में गूँथा हुआ विभेद साफ नजर आने लगा। बौद्धिक, अकादमिक जगत में यह विषमतामूलकता महीन स्तर पर काम करती है इसलिए महीन बुद्धि या गहरी खुदाई से ही नजर आ सकती थी। कम से कम उस व्यक्ति की आँखों से तो कदाचित नहीं दिख सकती थी जो स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के जश्न की समारोही घोषणाओं पर भरोसा करके और संविधान को अपना धर्मग्रंथ मानते हुए बढ़ी हुई हो। अपने भीतर और बाहर के उस नशे की चेतना ही अगर न हो जिससे हम जाने-अनजाने संचालित होते हैं तो कैसे आधुनिक हो सकते हैं। सचेतन, सुचिंतित अनवरत सक्रियता के बिना भला कैसे कोई किताब (संविधान) आचरण और सोच को निर्धारित कर सकती है। विविध अनुभवों की इस मुठभेड़ ने मुझे महीन स्तर पर कार्यरत विषमता के विषफलों को पहचानने की दृष्टि दी तो रील की तरह वह अनुभव आँखों के सामने घूमने लगे जो पहले बोध न होने से समझ नहीं आए थे। उन पर अगली कड़ी पर बात करेंगे। एक स्त्री की आजादी के बारे में सोचती हूँ तो उन कानों को जन्म देना जो एक स्त्री को सुनना सीख पाएँ, मुझे अपना दायित्व लगता है, जो मेरे समय ने मुझे सौंपा है, जो किया जाना अगली पीढ़ी की स्त्रियों की आजादी के लिए नितांत जरूरी है।





नया कुछ सुनने के कान चंद ही लोगों के पास हैं। जिस दिन भी एक जोड़ी ऐसे कान मिल जाते हैं तो मन पूरा दिन प्रफुल्लित रहता है। अंग-अंग में ताजगी आ जाती है। प्रभा खेतान को कार की स्टीयरिंग थामने पर लगा था कि पहली ड्राइविंग के आनंद के सामने प्रथम चुम्बन का आह्लाद फीका है।









जिन रचनाकारों ने प्रतिबद्धता के साथ खुले दिमाग से लिखा है, उनका लेखन इस जरूरत को एक हद तक पूरा करता है। ममता कालिया की कहानी ‘तोहमत’ मेरी बात को बेहतर ढंग से साफ कर पाएगी। इसमें आशा और सुधा नाम की दो करीबी सहेलियाँ हैं जो साथ पढ़ती हैं, टहलती हैं, सपने देखती हैं। एक-दूसरे का साथ उन्हें सोद्देश्यतापूर्ण जीवन जीने और सपनों को पूरा करने की योजनाएँ बनाने का हौंसला देता है । एक शाम टहलते हुए सुरम्य प्रकृति के बीच दरिया की मौजों ने उन्हें अपनी ओर बरबस खींच लिया। चार कदमों के साथ होने ने स्त्री शरीर में होने से उपजी बंदिशों को भुला ही दिया। प्रकृति की ताल से तरंगित उनका मन निर्धारित सीमा रेखा से दूर उन्हें ले गया तो शाम घिर आयी और उस सुनसान माहौल से घबरा कर वे दौड़ते-भागते-हाँफते, कँटीली झाड़ियों में उलझतीं, गिरती-पड़तीं घर पहुँचीं। उनके कपड़े जगह-जगह से चिर गए थे, शरीर में जगह-जगह खरोंचें बन गईं थे। उनकी हालत देख कर बिना उनसे पूछे परिजनों ने मान लिया कि उनके साथ बलात्कार हुआ है। वे दोनों लाख कहती रह गईं कि हमारे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ। पर घर भर में मातम छाया रहा। खाना-पीना-सोना कुछ नहीं हुआ। “सुधा ने सारी घटना बताने की कोशिश की, लेकिन उसे महसूस हुआ, उसके सामने तीन बहरे बैठे हैं। वे ठूँठ बन उसे घूर रहे थे।...माँ घुटनों में सिर दिए सारी रात रोती रही, अपनी कोख को कोसती रही। सुबह पिता ने ऐलान कर दिया कि आज से सुधा का कॉलेज जाना बंद।” एक घटना उन मेधावी विद्यार्थियों की जिंदगी की सारी सम्भाव्यताओं को और उनके सारे रिश्तों-नातों को कुचल सकती है। यह शुचिता का मिथक कितना बेहूदा है। उस पर तो लम्बे समय से बहुत कुछ कहा-सुना जा ही रहा है। विडम्बना यह कि घटित का सच भी समाज अपने सीमित सामान्यता बोध से तय करेगा।


     हैरानी की बात है कि इक्कीसवीं सदी में दिल्ली जैसे महानगर के प्रबुद्ध वर्ग के बीच बोलते हुए भी कानों की कमी महसूस होती है। जिस बात को 2-3 सत्रों में पुलिस वालों या छात्रों को सम्प्रेषित कर पाती हूँ, वह भी इस बौद्धिक वर्ग के बीच सम्प्रेषित करना मुश्किल ही है। अक्सर इसी भावमुद्रा के साथ वे बैठे रहते हैं कि सच उनकी जेब में है। नया कुछ सुनने के कान चंद ही लोगों के पास हैं। जिस दिन भी एक जोड़ी ऐसे कान मिल जाते हैं तो मन पूरा दिन प्रफुल्लित रहता है। अंग-अंग में ताजगी आ जाती है। प्रभा खेतान को कार की स्टीयरिंग थामने पर लगा था कि पहली ड्राइविंग के आनंद के सामने प्रथम चुम्बन का आह्लाद फीका है। मेरे अलावा अन्य स्त्रियों के अनुभव भी ये रहे हैं कि ऐसे कान मिलने का अनुभव प्रेम से कम सुखकर नहीं। सन 2006 से ही मै कुछ-कुछ लिखती रही थी। 2008-2009 में तो जनसत्ता, दैनिक भास्कर, वागर्थ, लोकायत, आर्यकल्प आदि कई पत्र-पत्रिकाओं में छपा भी। भारतीय भाषा परिषद की महत्वकांक्षी परियोजना हिंदी साहित्य कोश के लिए भी कुछ प्रविष्टियाँ लिखीं हैं। एम-फिल, पी.एच.डी के दौरान प्रस्तुतियाँ पाठ्यक्रम का हिस्सा होती हैं। वे सब अच्छे से सम्पन्न हुई, काफी सराहना भी मिली। पर इस सब को तो कई वर्ष गुजर गए। आज तक कभी किसी अकादमिक काम में मुझे शामिल नहीं किया गया है। शोध जमा करने की अर्हता प्राप्त करने के लिए राष्ट्रीय सेमिनार में पेपर प्रस्तुति का प्रमाण पत्र चाहिए होता है। वह हासिल करने के लिए भी  अवसर उपलब्ध नहीं हुआ । अधिकतर जगह सिर्फ अवसरों, हितों के आदान-प्रदान या पद देख कर बुलाने का माहौल है। नागरिकता बोध सम्पन्न वैयक्तिक स्त्री पुरुषों को कतई रास नहीं आती। जेंडर संवेदित नई संवेदना वाले चंद पुरुषों को छोड़ दें तो बाकि के पुरुषों के बोध में दो ही तरह की स्त्री अटती है। पारम्परिक स्त्री और पौरुष गुणों को आत्मसात की हुई स्त्री। या तो स्त्री की आँखों में वह माधुर्य दिखना चाहिए जैसा घरों की शालीन स्त्रियों में दिखता है। न सही मधुरता कम से कम आँखों में एक निरीह सी कातरता तो दिखे कि सामने वाला कोई अवसर बताते हुए या सूचना देते हुए जमीन से कुछ ऊँचा उठा हुआ महसूस करे। व्यक्तित्वबोध सम्पन्न एक ऐसी ही आत्मविश्वासी निर्भय स्त्री को समाज से मिलने वाली चुनौतियों को नूर जहीर ने ‘नायिका अभिसारिका’ कहानी में बयां किया है। उसके ठोस व्यक्तित्व से घबरा कर कोई उससे शादी नहीं करना चाहता है तो उसे अपने गुणों को ढाँप कर रखना पड़ता है ताकि उचित समय पर उन्हें जिया जा सके। वर्ना अक्सर स्त्री के ये गुण अविकसित ही रह जाते हैं। उम्र के शुरूआती चरण में अनुकूल माहौल मिलने पर विकसित हो भी गए तो फिर बाद में कुंठित हो कर रह जाते हैं। मगर यह नायिका गुण कायम रखती है भले ही काफी समय तक अव्यक्त तौर पर। अर्चना वर्मा एक कहानी के संदर्भ में कहती हैं कि नायिका कभी अपने अस्तित्व के भीतर जाती थी कभी उसके बाहर। अपने अस्तित्व के साथ जीने के लिए अनुकूल स्थितियाँ स्त्री के लिए अब तक नहीं बनी हैं । उसे अपने वजूद को काट-छील कर या उसमें कुछ अनावश्यक जोड़ कर अपनी जगह बनाने की बहुत जद्दोजहद करनी पड़ती है, इस प्रक्रिया में बहुत कुछ अनमोल छूट जाता है। स्त्री का असली रूप सामने नहीं आ पाता और समाज को भी एक नई समावेशी दृष्टि से वंचित रहना पड़ता है। यथार्थ का बड़ा हिस्सा ओझल ही रह जाता है। अगर शिखा और आशा के परिजन उनकी बात सुन लेते तो उन्हें भी कितनी राहत मिलती। कान झाड़ कर बैठना सिर्फ आधी आबादी के नहीं पूरे समाज के स्वास्थ्य को बिगाड़ रहा है। यह विचार का अलग बिंदू है कि अगर उनके साथ यह घटा होता तो ऐसे सहयोग करना चाहिए परिवार को?
      अकादमिक, औपचारिक-अनौपचारिक बैठकियों में अपनी बात कहते हुए अक्सर यह महसूस हुआ है कि शब्दों को अपनी य़ात्रा करने के लिए जिस माध्यम की जरूरत होती है, वह हवा अचानक गायब हो गई है। एक निर्वात बन गया है जिससे आवाज गति नहीं कर पा रही। सब रुक गया है। थम गया है। लगने लगता है कि काश ऑक्सीजन का बैग होता तो पहले उसे उड़ेल कर हवा पैदा करूं तो अपनी कहूँ। सोचती हूँ क्या स्त्री-विमर्श ऑक्सीजन का सिलेंडर ही है जो अपनी बातें कहने के लिए माध्यम उपलब्ध करवा रहा है। पहले की स्त्री-पीढ़ी इतना कुछ लिख कर न छोड़ गई होती तो जो टुकड़ा-टुकड़ा बातें पहुँच भी पाती हैं, वे भी कहाँ पहुँचतीं। स्कूल के दौर में प्रेमचंद, रविंद्रनाथ टैगोर, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, टॉलस्टाय, चेखव,...इत्यादि क्लासिक लेखकों को खूब पढ़ा। बाद के सालों में भी इस कड़ी में कई नाम जुड़ते रहे। मगर दुर्भाग्य! स्त्री-रचनाकारों तक पहुँचने तक उम्र का एक बड़ा हिस्सा निकल गया। प्रौढ़ हो कर ही उनके लेखन से ठीक से सामना हुआ। उनके लेखन ने रगों में संकुचित हो कर बहने वाले खून को रवानगी दी है। खुद के प्रति स्वीकार भाव आया है। कभी-कभी लाड़ भी। अपराध भाव कम हुआ। कमतरी का एहसास कुछ कुंद हुआ। अगर जीवन की उठान के समय ही उन्हें पढ़ लिया होता तो सम्भवतः मेरा व्यक्तित्व और उपलब्धियाँ खुद पर गर्व करने लायक होतीं। वर्तमान में तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। समाज में सारे सामान्यीकरण पुरुष के हिसाब से हैं। जरा सा अलग सोचने पर दिमागी पेंच ढीला हो गया है’, समाज ऐसा सोचने पर मजबूर करता है। मेरे परिवार में मुझ से बड़े चार भाई हैं। चारों ही मेरे प्रति बेहद स्नेहशील और उदार हैं। रोक-टोक और संरक्षण का भाव तो उनसे कभी मैंने जाना ही नहीं। हम सब जेंडर समानता को स्थापित सच मान कर जी रहे थे। मगर आँखें बंद करने से काँटे चुभना तो मगर नहीं छोड़ते। हर वह काम जो वे करते थे मैं भी करती थी। उन्हें ये एहसास मगर नहीं था कि इतने बड़े मूल्य को लाने के लिए सायास, सचेतन ढंग से माहौल बनाना पड़ता है। देहरादून की उस समय की कस्बाई समझ के हिसाब से एक अच्छी लड़की होने की भूमिका और चारों भाई के साथ लड़का होने की दौड़ साथ-साथ करने में मेरी पूरी ऊर्जा और व्यक्तित्व का कचूमर निकल गया। घर में माँ, मौसी, आंटियों की अपेक्षा के अनुरूप सभी सामाजिक अपेक्षा पूरी करती रहूँ और बाहर भाइयों की। वे भी आखिर मेरी तरह समाज के उत्पाद ही हैं तो लाजमी ही है कि पुरुषों से समाज द्वारा अपेक्षित गुण उन्होंने जाने-अनजाने अर्जित कर लिए होंगे। भाई के विवाह के बाद भाभी घर आईं तो लगा कि जैसे मेरे घर में कान उग आए हैं। लगा पूरा घर हवा से भर गया है। जहाँ शब्द दोतरफा यात्रा करते हैं। उनकी आमद ने घर को जिस तरह मेरे लिए सुकून भरा आसरा बना दिया। लगता है काश ऐसा समाज में भी हो पाए। जेंडर संवेदना विकसित हो जाए तो सुनने वाले कान समाज में उग जाएँगे तब स्त्री-विमर्श की अलग से जरूरत नहीं पड़ेगी और आज जब वर्तमान की चुनौतियाँ इतने भयावह रूप में सामने खड़ी हैं।  ये समय है क्या अपने संघर्ष को अलग-अलग समूहों में विभक्त करने का?







रश्मि रावत दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट्स एण्ड कॉमर्स में अध्यापन कर रही हैं।  हिंदी में पीएच.डी के अलावा मानवाधिकार, जेंडर स्टडी, पर्यावरण , शिक्षा  शास्त्र पर औपचारिक अध्ययन। विभिन्न पत्रिकाओं में नियमित स्तम्भ लेखन। आलोचना इनका मुख्य क्षेत्र  है।  

Tuesday, October 29, 2019

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन


स्त्री-विमर्श के तमाम सवालों को समेटने की कोशिश में लगे अनुप्रिया के रेखांकन इन दिनों सबसे विशिष्ट हैं। अपने कहन और असर में वे कई तरह से पुनर्पाठ और नवोन्मेष की तरह हैं। अनुप्रिया इन दिनों जिस तरह डूब कर अपना काम कर रही हैं मानो वे उसी में जी रही हैं। उनके रेखांकन कविता की तरह अनंत अर्थ छवियाँ समेटे हैं। इनकी विशेषता है कि उनमें आधुनिक और परम्परागत जीवन के बीच स्त्री अस्मिता की छ्टपटाहट, उसके व्यक्तित्व की तमाम परतें, उलझने, उम्मीद और सपने अभिव्यक्ति पाते हैं। उसका अकेलापन है, एकांत है, बहनापा है। उनके रेखांकनों से महज़ गुज़र जाना सम्भव नहीं है, हमें ठहरना होता है और वे खुद किन्हीं प्रतीकों, किन्हीं कोड्स के साथ हमारे भीतर ठहर जाते हैं। कभी हम बुद्ध हो जाती और आधे हिस्से में तमाम कामनाएँ सजाती स्त्री का चेहरा घण्टों देखते रह सकते हैं, कभी देखते ही कोई भाव उतर आता है हृदय में, कभी बस आह! निकलती है या अचानक किसी रेखांकन में एक स्त्री की कुर्ती में लगा सेफ़्टी पिन दर्ज हो जाता है मन में, याद आ जाती है अनामिका की कविता या अपनी ही किसी मौसी, माँ का चेहरा। इनका पूरा शिल्प समझने के लिए स्त्री के साझा अनुभवों और संघर्षों तक जाना होता है और लोक-कला में बसी स्त्री, उसके भित्ति-चित्र, कलाकारी के ज़रिए एक कहानी कहने का कौशल समझना होगा। खुद अनुप्रिया के शब्दों में एक स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है अपने लिए अपने आप से ही।यह लड़ाई कब तक चलेगी नहीं जानती।होगी थकान ,कभी टूट भी जाएं बिखरने की हद तक ,लेकिन रुकना नहीं है ।चलते जाना है ।एक दूसरे का हाथ थामे ,उम्मीदों के बीज अपनी खुरदरी हथेली में लिए जलते जाना है  उस मद्धम रोशनी के लिए जो हमारे भीतर उग आयी है ।  

आज चोखेरबाली पर अनुप्रिया के इन दस रेखांकनों के साथ हम इसे एक स्थायी स्तम्भ की तरह शुरु करने जा रहे हैं। अनुप्रिया के रेखांकनों का यह चोखेरेबाली कोना इस पेज पर दर्ज रहेगा और नियमित अपडेट होता रहेगा।  - सुजाता 


अनुप्रिया