Saturday, January 18, 2020

मृदुला शुक्ला की कहानी - डीकोड


- मृदुला शुक्ल

पेंटिंग यहाँ से साभार 


अपनी क्रिस्टल शील्ड को टेबल पर रखते हुए वरून ने उसे गोद में उठा लिया था”हम जीत गए माँ हम जीत गए”कहते हुए उसने उसे पूरा एक गोल चक्कर घुमा दिया था। वह ख़ुशी और भय के मिले जुले भाव से बेटे के गले लगी हुई थी उतार ! "मुझे नीचे उतार वो बनावटी गुस्से से चिल्लाई थी" “नहीं बिलकुल नहीं” कहते हुए वरुण ने माँ को देखा अरे मुझे पीठ में दर्द हो जाएगा वरुण ने माँ का चेहरा देखा उसे महसूस हुआ माँ को ज्यादा ही घुमा दिया है ,अच्छा बाबा लो! कहते हुए वरुण ने उसे बगल में पड़े बेड पर बिठा दिया और उसके गले में हाथ डाल उसके पास बैठ गया । अचानक वरुण का हाथ घूमा और वह उसे गुदगुदाने लगा कमर के आस पास वरुण का हाथ तेजी से घूम रहा था यह बचपन से उसका प्रिय खेल था वह जब भी खुश होता माँ को गुदगुदा देता। जाने कहाँ थी वह जोर से खिलखिलाते हुए वे दोनों बेड पर लोट पोट हो गए| माँ ! वरुण चीखा था, " माँ देखो तुम हंस रही हो" "तुम्हे गुदगुदी लग रही है देखो माँ तुम्हे गुदगुदी लगती है बचपन से तुम झूठ बोलती रही हो, तुम्हे भी गुदगुदी लगती है माँ तुम्हे भी गुदगुदी लगती है " वरुण आश्चर्य से चीख रहा था वो अचानक शांत हो गयी। एकदम शांत
"क्या हुआ माँ तुम चुप क्यों हो गयी "
"कुछ नहीं रे तू भी न जाने कब बड़ा होगा जा जल्दी नहा ले "
"देख पसीने से लथपथ है मुझे भी पूरा गन्दा कर दिया" उसने दुपट्टे से खुद का माथा पोछते हुये कहा |

वरुण माँ के चेहरे के बदले हुए भाव को आश्चर्य से देख रहा था जा नहा न मैं दूध गर्म करती हूँ वो जानबूझ कर अनजान बनते हुए किचन की और मुड़ गयी। दूध के पैकेट फ्रिज में रखे थे उसने फ्रिज खोला और याद ही न आये फ्रिज क्यूँ खोला फ्रिज बंद कर वो किचन में आ गयी । माँ तुम्हे गुदगुदी क्यो नहीं लगती नन्हा वरुण उसके पेट पर हाथ फिराते हुए पूछ रहा था। माँ स्किन भी तो हमारी सेंसरी ऑर्गन है न ? आज वरुण को साइंस की क्लास में सेंसरी ऑर्गन पढाया जा रहा था । "हाँ बेटा है तो सेंसरी ऑर्गन " फिर माँ आपका सेंसरी ऑर्गन प्रोपरली काम क्यों नहीं करता ,भगवान् जी ने लोकल लगा दिया था क्या? वह मुस्कुरा दी ये तूने कहाँ से सीखा रे उसने वरुण का कान पकड़ते हुए कहा। अरे मां तुम ही तो प्लंबर से बहस कर रही थी की उसने लोकल पार्ट लगा दिए हैं और वो काम नहीं कर रहे उसने माथा पीट लिया था वरुण के भोलेपन पर ।

माँ दूध बन गया क्या? जरा मेरा प्रोटीन तैयार कर देना मुझे जिम जाना है । वह झटके से वर्तमान में लौट आई थी उसे याद आया वो फ्रिज से दूध निकालने गयी थी हड़बड़ी में उसने फ्रिज से दूध निकाला प्रोटीन तैयार करने लगी। वरुण तैयार हो रहा था आज के मैच की जीत उसके दिमाग पर सवार थी वो झूमते हुए कुछ गुनगुना रहा था । हडबडी में दूध पीते हुए वो जाने किस दुनिया में था घर से निकलते हुये वरुण ने उसके गालों को चूम मुस्कुराते हुए कहा “आई लव यू माँ” और और अपनी जीभ निकाल कर उसके गालो पर छुआ दी थी उसे सिहरन हुई थी हलकी मीठी सी उसने दुपट्टे से रगड़ कर गाल पोछते हुए कहा । जा भाग ! अब नहीं हो रही तुझे देर ।

वरुण भागता हुआ सीढियां उतर गया था वह थके कदमो से लौट रही थी अपने कमरे की तरफ माँ तुम्हारे सेंसरी ऑर्गन खराब हैं क्या ?भगवान् जी ने लोकल लगा दिए थे क्या? वह मुस्कुरा दी थी माँ तुम्हे गुदगुदी लग रही देखो माँ तुम हंस रही हो। स्टेच्यु बोल कर सामने वाले को जड़वत खड़ा कर देना बचपन का प्रिय खेल था उस पूरी टोली का आसिमा गौरी शबनम और रेखा वे सब कभी किसी को रास्ते में कहीं भी स्टेच्यु बोल खड़ा कर दिया करते थे और फिर एक दूसरे को हवा में हाथ हिला हिला कर गुदगुदी करते सब तो खुद को संभाल लेते मगर वो हर बार हवा में लहराते हाथ देख जोर से हंस पड़ती फिर पूरे घर में भागते हुए वे सब जोर जोर से हंसते । दादी भुनभुनाती “ई बैसैया मोहि न भावे सींक डोले हंसी आवे” दादी को देख वे थोडा सहम जाती मगर एक दिन दादी को डांटने के बाद पीछे पलट कर आंचल में मुंह छुपा कर हँसते हुए देख लिया फिर क्या था उस दिन से लडकियां दादी की डांट खाकर भी उनके सामने से खिलखिलाते हुए भागती थी । उसने दुपट्टा ओढना शुरू कर दिया था माँ कहती थी बाहर जाते हुए चुन्नी लिया करो तन कर मत चला कर गर्दन नीची करके चलती हैं अच्छे घर की बेटियाँ । उसे मानी नहीं पता थे इन बातो के मगर माँ कहती थी तो जरुर कुछ होगा उन दिनों सवाल जवाब भी नहीं होते थे अच्छे घर की बेटियाँ सवाल जवाब भी कहाँ करती थी|

ठण्ड के दिन शुरू हो रहे थे बडका नाउन दिनभर धूप में बैठ कथरी सिला करती थी माँ की पुरानी साड़ियाँ और और पुरानी चादरे सब टुकड़ों में फाड़ कर छत पर फैला दिया करते थी फिर एक आकार के कपड़ों को जोड़ हर शाम एक कथरी तैयार हो जाती थी । शाम को घर जाते हुए बड़का नाउन के हाथ में माँ का दिया सीधा होता साथ ही कुछ पैसे भी और फिर बड़का नाउन कम पैसे में किये काम को टुकड़ों में कभी दाल तो कभी नून मांग कर पूरा कर लेती थी बच्चे वही कथरी बिछाते और ज्यादा सर्दी बढ़ जाने पर उस पर गांधी आश्रम से आये कम्बल बिछा दिए जाते थे मेहमानों के लिए झक्क सफ़ेद चादरों वाले दो बिस्तर थे जिन पर सफ़ेद मारकीन के नील लगे कवर चढ़े होते थे सारे बच्चे एक कमरे के चार तख्तों पर सोते थे| वो मेहमानों वाला बिस्तर बाहर बरामदे में डला रहता था बरामदा बच्चों के कमरे के ठीक बाहर था उन दिनों ताऊ जी आये हुए थे सारे बच्चो के साथ वो कमरे में सोने आ गयी थी ताऊ जी ने उसे अपनी आँख में दवा डालने को बुलाया उसने एक आँख में दवा डाली और ताऊ जी के बिस्तर पर बैठ ऊँघने लगी थी ताऊ जी ने उसे रजाई में आने को बोला" ठण्ड बहुत है बच्ची आ अंदर बैठ जा "वो बैठ गयी थी “अभी जरा रुक के दूसरी आँख में डालना तब तक लेट जा यहीं” उसे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था मगर बुरा क्या था वो समझ नहीं पायी । वह ताऊ जी के बगल लेट गयी थी, थोड़ी देर बाद उसने पूछा अब डाल दूँ ताऊ जी मुझे नींद आने लगी है ,रुक न अभी आराम से डाल देना ताऊ ने धीरे से फुसफुसा के कहा था उसे झपकी आ गयी थी अचानक से नीद खुली तो ताऊ के हाथ उसके कमीज के अंदर थे वे धीरे धीरे हाथ को नीचे ले जा रहे थे । माँ ने कहा था यहाँ कोई छुवे तो पाप होता है कोई देखे तब भी इसलिए तो चुन्नी ओढती हैं लडकियां। वो, बर्फ सी जमती जा रही थी चीखना चाह कर भी चीख नहीं पा रही थी माँ ने कहा था पाप होने से माँ मर जाती है भय से कांपते हुए वह उठ कर भागना चाहती थी ताऊ जी उसे बेतहाशा चूमे जा रहे थे गर्दन पर छातियों पर होठों पर | अब वह जब भी स्टेच्यु बनती आसिमा गौरी शबनम रेखा उसे दूर से गुदगुदी लगाने की कोशिश करते उसे हंसी न आती सारे बच्चो में एक बात मशहूर हो गयी थी उसने गुदगुदी पर कंट्रोल कर लिया है ।


सब बच्चे जानना चाहते थे की वह ऐसा कैसे कर पायी ,स्टेच्यु के ओवर होते ही वो सब उसे मिलकर गुदगुदाते वो बुत बनी खड़ी रहती ,घर लौटते हुए बच्चे उसके बारे में बात करते कैसे बहादुरी से उसने अपनी गुदुगुदी पर कंट्रोल कर लिया है अब उसे स्टेच्यु में कोई नहीं हरा सकता । ताऊ जी को देखते ही वह सुन्न हो जाती वे हर बार वही सब दुहराने की कोशिश करते जरा सा एकांत पाते ही वो अपने हाथों और होंठो से उसकी देह टटोल डालते वो पहले सुन्न हुई फिर और,फिर और सुन्न होती चली गयी | आस पास पापा थे भाई थे चचेरे ममेरे फुफेरे उनके दोस्त थे बारहवी तक वो गर्ल्स स्कूल में पढ़ी थी कॉलेज में उसके साथ तमाम लडके थे अजीब भय और वितृष्णा से भरी रहती थी वह हर वक्त साथ पढने वालो लड़कों से ऐसे बचा कर चलती कोई असावधानी से उसकी चुन्नी तक न छू ले | बड़े भैया के दोस्त मधुकर उसके घर खूब आते थे साथ बैठना खाना पीना गप्पे मारना वो हमेशा सहमी सी रहती मधुकर उससे खूब बातें करता | धीरे धीरे वो मधुकर के साथ सहज होने लगी थी मधुकर का हंसोड़ पन उसे अच्छा लगता था उसके सुनाए चुटुकलों पर वो मुस्कुरा देती है मधुकर बहुत अच्छी मिमिक्री करता था वो पूरे परिवार में बाबूजी से लेकर ताऊ जी सबकी नकल उतारता था वह खूब हंसती मगर ताऊ जी का जिक्र आते ही वो उठ कर चली जाती, इतने बड़े परिवार में किसके पास वक्त था उसके व्यवहार में हुए बदलाव को महसूस करना | मधुकर उसमें खूब रूचि लेने लगा था ज्यादातर उसी वक्त आता जब वो घर में रहती दोनों खूब बातें करते हंसते खेलते कभी कैरम कभी लूडो । सभी भाई बहन इकट्ठे हों तब अन्त्याक्षरी, दोनों हर बार एक ही टीम होते साथ हारते साथ जीतते मधुकर को महसूस होने लगा था कि वह उसमे रूचि लेने लगी है दोनों आँखों ही आँखों में एक दुसरे से बात करने लगे फिल्मो में प्रेम के दृश्य अब उसे खूबसूरत लगने लगे । फ़िल्मी गानों में जब दो फूल एक दूसरे को चूमते तो उसे सिहरन हो जाती । गर्मियों की शाम थी बिजली नहीं होने के कारण सब लोग छत पर बैठे हुए थे थोडा अँधेरा सा घिर गया माँ ने उसे रसोई में हाथ बटाने के लिए नीचे से आवाज दी वह आखिरी सीढ़ी उतरने ही वाली थी की सामने मधुकर खड़ा था वो चीख पडती इससे पहले ही मधुकर उसके हाथ में एक पुर्जा पकड़ा कर गाएब हो गया वो भाग कर रसोई में आ चुकी थी उसने पुर्जे को चुपचाप अपनी कमीज में रख लिया था रात का सारा काम समेट माँ अपने कमरे में सोने चली गयी | सब बच्चे अपने पढ़ाई में लग गए थे वह भी अपने कुर्सी पर पढने के लिए बैठी मन तो कहीं और अटका हुआ था उसने धीरे से अपनों कमीज़ से वो पुर्जा निकाला और धडकते दिल के साथ खोला बस तीन अक्षर लिखे थे “आई लव यू” उसका दिल जोर जोर से धडकने लगा था उसने पुर्जे पर लिखी इबारत पर बेतरतीबी से पेन चला कर उसे ऐसा कर दिया कि उसे कोई और न पढ़ पाए रात भर जागती रही सुबह के जाने किस पहर में उसे नींद आई होगी सुबह मधुकर आया उसे देख गहरा सा मुस्कुराया उसका दिल धक् धक् करने लगा ।

इन दिनों वो अपने बालों पर चेहरे पर ख़ूब ध्यान देने लगी थी उसकी मुस्कान गुलाबी गहरी हो गयी थी मधुकर को सामने देख उसका चेहरा रक्ताभ हो जाता वह उसके सामने पड़ने से बचने लगी थी मधुकर बहाने ढूंढ ढूंढ कर उसके आस पास ही बना रहता था उस शाम सब नीचे खाने जा चुके मधुकर को भी माँ बुलाये जा रही थी मगर उसने कहा माँ मुझे भूख नहीं है मधुकर अकेला छत्त पर लेटा हुआ था| दादी ने उसे खाना खाते देख कर कहा ऊपर जाकर मधुकर की मदद से उनका बिस्तर लगा कर मच्छरदानी लगा दे । वह अपने मस्ती में उछलती कूदती छत पर आ गयी चारपाई बिछाकर कर उस पर बिस्तर बिछाने लगी अचानक मधुकर उठा और धीरे से जाकर उसे पीछे से पकड लिया वह धीरे से कसमसाई अचानक मधुकर ने अपने होंठ उसकी गर्दन पर रख दिए। जोर से चीखी थी वह बहुत जोर से, इतनी कि पूरा परिवार एक साथ छत की ओर भागा सब डर गए थे सबसे ज्यादा मधुकर डरा हुआ था वो बैठकर चीखे जा रही थी साथ ही साथ उल्टियां कर रही थी सब घबराए हुए से पूछ रहे थे उसे क्या हुआ वह कुछ बोलने की हालत में नहीं थी माँ ने उसे लिटाया खुद उसके साथ लेट कर रात भर उसका माथा सहलाती रही। इधर मधुकर को मारे घबराहट के नींद नहीं आई वो रात भर इस कल्पना से भयभीत होता रहा की अगर घर वालो को सच मालूम हुआ तो वो उसका क्या हाल बनायेगें सुबह सब उससे पूछते रहे की आखिर क्या हुआ था । वो क्यूँ चीखी ?वो किससे डर गयी थी ? लेकिन वो शांत बनी रही जब शाम तक घर में कोई हंगामा नहीं हुआ तब मधुकर घबराते घबराते उसके घर आया। उसके मन में अनेक सवाल थे वो सब कुछ जानना चाहता था मगर मारे डर के वो चुप रहा धीरे धीरे उसने वहां आना कम किया और फिर लगभग बंद ही कर दिया ।

उसकी शादी तय हो चुकी थी जैसे जैसे शादी की तारीख पास आ रही थी उसकी घबराहट बढती जा रही थी भाभियों की ठिठोली उसे गुदगुदाती नहीं उसे पसीना चुचुआ आता था ये सोचने भर से की आगे का जीवन उसे किसी पुरुष के साथ बिताना है ,साथ सोना हैं ये सोच कर ही उसे मितली आने लगती थी प्रेम सहवास तक तो वो कभी सोच भी नहीं पाती थी शादी के बाद प्रशांत के दुलारते हाथ उसे सुन्न कर देते शांत ठहरी हुई नदी सी दिखने वाली वो दरअसल जमी हुई थी ठंडी बर्फ से भी ठंडी ,जितनी बार छुई जाती उतनी जमती जाती देह, हर अन्तरंग स्पर्श उसे ठंडे पन की ओर ही ले जाता था| दिन भर हंसती खेलती वो शाम होते ही उलझन से घिर जाती रात उसे डराती थी दिन भर सोचती रहती थी कोई ऐसा था ही नहीं जिससे बात कर पाए | वो अपने आस पास की औरतों को देखती वे कितनी खुश दिखती थी रात का बिस्तर का जिक्र आते ही ,उनके गाल लाल हो जाते उसकी बड़ी जेठानी भी जेठ जी का नाम और फिर रात का जिक्र आते दुल्हन सी शरमा जाती थी । वो नई दुल्हन थी प्रशांत एक प्रेमिल पति ,प्रशांत उसे दिनभर खुश रखने की कोशिश करता उसके आसपास मंडराता रहता हंसी ठिठोली करता एकांत पाते ही चूम लेता गालों पर चुटकी ले लेता वो बुत की तरह खड़ी कभी कभी उदास सी मुस्कुरा देती

धीर गम्भीर शांत सी वो घर में सबकी लाडली थी सब उसका बहुत ख्याल रखते प्रशांत भी धीरज से उसके साथ रहते उसका बिस्तर पर असहज होना प्रशांत को चुभता था ,वो हर रात उससे उसके पिछले जीवन के बारे में घुमा फिर कर पूछते एक रात प्रशांत ने उससे सीधा प्रश्न किया | “क्या तुम्हारी शादी मुझसे जबरदस्ती हुई है तुम किसी और से प्रेम वेम तो नहीं करती थी ,जिस तरह से तुम मेरे छूते ही सुन्न हो जाती हो लगता तो ऐसा ही मैं तुम्हे बेहद नापसंद हूँ ,मुझे बहुत आत्मग्लानि होती है लगता है जैसे तुम्हारे साथ अन्याय हो रहा है तुम मुझे कहो तो सही हम मिलकर कोई रास्ता निकालेंगे तुम दिन भर कितनी अच्छी रहती हो, कितना ख्याल रखती हो मेरा घर का। माँ पापा भाई भाभी सब कितने खुश हैं तुमसे, दोस्तों ने मुझे कितना डराया था की पत्नियों के आते से परिवार में तनाव हो जाता है माँ पापा भाई बहनो से रिश्ते खराब हो जाते हैं ।यहाँ तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ मेरा खुद से ही भरोसा उठने लगा है कई बार मुझे लगता है मुझमे ही कोई कमी है मैं तुम्हे खुश नहीं रख पा रहा मैं जगा नहीं पा रहा हूँ तुम्हारी सोयी हुई देह को । वो सुबकने लगी प्रशांत उसे चुप कराते रहे और फिर दोनों अपने अपने किनारों पर सो गए उसे समझ आता था कि उसके साथ कोई दिक्कत है वो नार्मल नहीं है कई बार अपने चरम पर पहुंचा प्रशांत उसे परे धकेल कर कहता तुम लाश सी पड़ी रहती हो लगता है मैं जैसे तुम्हारे साथ बलात्कार कर रहा हूँ । प्रशांत अपना तकिया उठाते और दूसरे कमरे में सोने चले जाते ,धीरे धीरे प्रशांत अक्सर बाहर वाले कमरे में सोने लगे कभी कभार वो रात को जाती मनुहार करके उन्हें अपने पास ले आती मगर क्या करती अपनी ठन्डी पड़ी देह का। ननदों जेठानियों से सुनते सुनते वो इतना तो सीख चुकी थी की पत्नी बिस्तर में साथ कैसे देती है कई बार उत्तेजना का अभिनय करती हर बार पकड़ी जाती वो सर्दियों की छुट्टियां थी माँ पापा मामा के घर गए हुए थी भाई भाभी ऑफिस की तरफ से मिली छुट्टियां मनाने परिवार सहित बाहर गए थे प्रशांत के मन में आया की आज इसे ब्लू फिल्म दिखाई जाए शायद इसे कुछ फर्क पड़े। भूमिका बांधते हुए प्रशांत ने उससे पूछा सुनो तुमने कभी ब्लू फिल्म देखी है ? उसने नहीं में गर्दन हिला दी सुना है उसके बारे में उसने संकोच से कहा कहा हाँ उसमे गन्दी तस्वीरें होती है । गन्दी तस्वीरें नहीं उसमे प्यार करते आदमी औरत होते हैं आदमी और औरत की देह अलग होती है, इस तरह आदमी और औरत मिलकर एक दूसरे की देह को और अच्छे से जानते हैं छूते हैं समझते हैं| तुम देखोगी ब्लू फिल्म ? उसने नहीं में सर हिला दिया था | प्रशांत ने उसका हाथ पकडकर खुद के पास बिठा लिया था । अगर मैं कहूँ तब भी नहीं देखोगी? मेरे साथ तो देख सकती हो न उसने धीरे से स्वीकार में सर हिलाया प्रशांत ने पहले से ही अपने कमरे में पूरी तैयारी कर रखी थी पहली फिल्म जवान जोड़े की थी वो आँखे फाड़े देख रही थी उनके क्रियाकलाप, दिन के उजाले में पति को देख शरमा भी रही थी प्रशांत उसके शरमा कर लाल हो गए गालों को देख उम्मीद से भर उठा था । प्रशांत ने रिमोट से अगली फिल्म ऑन कर उसे अपनी तरफ खींच लिया था वो आँखे स्क्रीन पर जमाए हुए थी। अचानक वो जोर से चीख कर उठ खड़ी लगभग भागती हुई सी कमरे से बाहर निकल गयी वो थरथर काँप रही थी उसे उल्टियां होने लगी प्रशांत उसके पीछे भागा वो आंगन में खड़ी उल्टी कर रही थी प्रशांत ने उसे पानी दिया संभाल कर कमरे में ले आया टी वी बंद कर दिया था।

प्रशांत का मन उलझ गया था उसे समझ नहीं आ रहा था कि अचानक से उसे क्या हो गया वो चीख कर भागी क्यूँ उसे उल्टियां क्यूँ होने लगी प्रशांत उसके सोने का इंतजार करने लगा वह उसके बाल सहला रहा था धीरे धीरे धीरे उसे गहरी नीद आ गयी प्रशांत ने फिर से वो विडियो प्ले किया एक अधेढ़ सा आदमी का एक बहुत कम उम्र की लड़की के साथ सेक्स का विडियो था प्रशांत को कुछ समझ नहीं आ रहा था उसकी पत्नी अचानक चीख क्यूँ पड़ी वह बार बार रिवाइंड करता उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था । उसने सोचा की लड़की की सिसकारी को दर्द भरी चीख समझ कर वो डर गयी होगी। प्रशांत ने मन ही मन निश्चय किया वो उसे इसके बारे में समझाएगा सेक्स से सम्बंधित जो भी उलझने हैं उस पर उससे बात जरुर करेगा अपना घर बचाए रखने के लिए दृढ संकल्पित था प्रशांत बाहर से माँ की आवाज आ रही थी शायद घर वाले लौट आये थे प्रशांत ने सबको बता दिया था की उसकी तबियत ठीक नहीं आज दिन में उसे उल्टियां हुई थी उल्टियों के नाम से सब उम्मीद से मुस्कुरा पड़े थे। डॉ ने उसकी रिपोर्ट पोसिटिव बताई थी,घर में ख़ुशी का माहौल था प्रशांत पिता बनने के अनूठे अहसास से भरा हुआ था माँ पापा भाई भाभी सब उसका बहुत ख्याल रखते थे । प्रशांत के मन में पत्नी की उदासीनता खटकती रहती थी जिस रात उनके बीच सेक्स होता वो दिन भर अनमनी से दिखती प्रशांत अपराधबोध से भर जाता उसका बहुत मन हो फिर भी वो कई कई दिन तक उसे हाथ न लगाता ।अनमना सा होकर अक्सर बाहर के कमरे में सोने लगा था प्रशांत ने घुमा फिरा कर कुछ मित्रों से बात की सब यही कहते कुछ नहीं यार बीबियाँ नखरे करते हैं उन्हें भीतर भीतर सब अच्छा लगता है ।एक थोडा समझदार दोस्त ने कहा यार सेक्स को लेकर अपने परम्परागत परिवारों में इतनी नेगेटिव बातें की जाती हैं की लडकियां इसे गन्दा काम मानने लगती हैं और उनकी रूचि खतम हो जाती है,अगर रूचि बनी भी रहे तो खुलकर व्यक्त करना गन्दी स्त्रियों का काम मानती है एक और मित्र ने कहा वो मर्द कौन सा जो औरत को गरमा ने दे तुम थोडा शिलाजीत व् बादाम वदाम घोटो भाई । प्रशांत बेहद परेशान था हर वक्त उलझा सा रहता।पिता बनने की ख़ुशी भी उसे तसल्ली नहीं दे पाती थी उसका खुद से भरोसा उठने लगा था वो अक्सर रात को खुद को टटोल कर देखता क्या सचमुच उसमे कुछ कमी है अपनी पत्नी को खुश नहीं रख पा रहा है प्रशांत का मन भटकने लगा था वो अक्सर पेड सेक्स के बारे में भी सोचता रहता था वरुण का जन्म हुआ घर उल्लास से भर गया था माँ ने जन्मकुंडली दिखवाई थी ज्योतिषी ने कहा नवजात मूल नक्षत्र में हुआ था पूरे सताईस दिन तक उसे अपने कमरे से बाहर सोना था पिता पर भारी थे उसके ग्रह नक्षत्र वो मूल पूजन के बाद ही अपने बेटे को देख सकता था । घर में रिश्तेदारों मेहमानों का आना जाना लगा था माँ और बच्चे की खूब देखभाल हो रही थी ।प्रशांत गुलाबी होती थोड़ी सी भर आई पत्नी को दूर से देख मुग्ध होता रहता था माँ जच्चा बच्चा के कमरे में सोने लगी थी प्रशांत की कमरे में जाने की मनाही थी। नन्हा शिशु उसके बगल में लेटा रहता उसके छोटे छोटे हाथ पैर उसे छू जाते तो उसे लगता उसके बेजान सी में देह जान आने लगी है कपडे उतार उसकी मालिश करती उसकी देह उसका अपना हिस्सा है ये सोच कर अजीब मीठे अहसास से भर जाती, वो जीने लगी थी जागने लगी थी उसकी देह ,पुरुष देह के प्रति मन में बैठी जुगुप्सा स्नेह में बदलने लगी । बच्चे के सत्तीसा पूजने का दिन नजदीक आ गया था घर मेहमानों से भरने लगा था कई दिनों से उसकी प्रशांत से मुलाक़ात नहीं हुई थी दिन भर कमरे में मेहमान बैठे रहते उसका बड़ा मन करने लगा था प्रशांत से बात करने का चुपचाप उसके गले लगने का । अगले दिन सताईसा पूजा जाना था और उसके दूसरे दिन बड़ा सा भोज रखा था बाबू जी ने उसे पता था की दो तीन दिन तक तो उसकी मुलाक़ात प्रशांत से होने से रही ।

रात माँ के सो जाने के बाद वो चुपचाप उठी आज उसे प्रशांत को शुक्रिया कहना था प्रेम के लिए भरोसे के लिए वो सब कुछ जो उसके जीवन में खिला खिला सा है उजला उजला सा है हर उस बात के लिए। चुपचाप दबे कदमो से प्रशांत के कमरे की तरफ बढ़ रही थी प्रशांत का दरवाजा भीतर से बंद था उसने सोचा खिड़की से खटखटा कर प्रशांत को जगा लेगी खिड़की के पल्ले भिड़े हुए थे कमरे में मद्धम सी रौशनी थी उसने पल्ला धीरे से खिसका कर पुकारा सुनो जी! उसकी और प्रशांत की आँखे मिली और उस तीसरी स्त्री से जो उस समय प्रशांत के साथ थी । वह भागते हुए कमरे तक लौट आई थी आंगन में जाकर उल्टियां करती रही देर तक । और फिर जाने क्या क्या हुआ सताईसा पूजा गया बहुत बड़ा भोज हुआ नाच गाना ननदों ने बुआओ ने जी भर के नेग लिया उसे कुछ नहीं याद सब सिनेमा सा चल रहा था सब चले गए थे बस माँ बाबु जी भाई भाभी के अलावा कोई नहीं बचा था घर में प्रशांत अपराधी की तरह सर झुकाए अपने कमरे में लौट आये थे उससे आँखे नहीं मिला पा रहे थे । वह फिर से पहले जैसी हो गयी थी अच्छी बहू अच्छी पत्नी चुपचाप काम रसोई से लेकर बिस्तर तक वरुण बड़ा होने लगा था उसके बचपन में खो गयी थी वह वैसी ही ठंडी जमी हुई । सद्गृहस्थन औरत के पास वैसे भी देह नहीं होती उसके सेंसरी ऑर्गन काम न ही करें तो बेहतर ही रहता है ।वे काम करेंगे तो मुश्किल बढ़ा देंगे घर की भी और गृहस्थी की भी । प्रशांत इस औरत से उस औरत भटकते रहे अब शर्म नहीं आती थी उन्हें उसे ठंडी औरत कह हर बार पकडे जाने पर बचा लेते थे खुद को । वह जमती गयी पत्थर होती गयी ठंडी होती गयी । कभी कोई ऊष्मा पिघलाती भी थी तो वह था वरुण । छोटा गदबदा सा वरुण वैसे ही दूर से उँगलियाँ देख खिलखिलाने लगता था जैसे वो बचपन में हंसती थी वरुण अपनी नन्ही उँगलियों से उसे गुदगुदाने की कोशिस करता हर बार हार कर मायूस हो जाता उस मासूम ने कोशिश जारी रखी गुदगुदाने की खुश रखने वो न हंसती फिर भी हर बार खुश होने पर गुदगुदाता उसे। और हर वही बार कौतुहल उसकी आँखों में होता माँ तुम्हारे सेंसरी ऑर्गन काम क्यूँ नहीं करते भगवान् जी ने लोकल लगा दिया है क्या बरामदे में कोई चढ़ रहा था शायद वरुण जिम से वापस आ रहा था उसने अपने कमर के इर्द गिर्द उँगलियाँ घुमाई "तुम्हे गुदगुदी लग रही माँ देखो तुम हंस रही तुम्हारे सेंसरी ऑर्गन ठीक हो गए हैं" उसने फिर से सुना बार बार सुना वो वरुण को स्नेह से चूमकर शुक्रिया कहना चाह रही थी । बचपन में पढ़ी परीकथाओ में राजकुमारियां कैद हो जाती थी किसी ऊंचे किले में । सो जाती थी सोलह साला लम्बी नींद। जब उन्हें जगाने की तमाम कोशिशें बेकार जाती तो नजूमी कहता "जब कभी सफेद घोड़े पर सवार कोई राजकुमार आएगा उसे इस सोई हुई राजकुमारी से मोहब्बत हो जाएगी तभी टूटेगी यह सोलह साला नींद"

राक्षस कैद कर देता हैं राजकुमारी को संवेग शून्यता के ऊंचे प्रस्तर दुर्ग में सो जाती राजकुमारी की सारी इंद्रियां वह जिंदा लाश हो जाती । लोग हंसते लाश सी देह लिए सोई पड़ी इस राजकुमारी से किसे प्रेम होगा भला मगर एक रोज सचमुच आ जाता है एक राजकुमार उसे सोई हुई राजकुमारी से प्रेम हो जाता है । वह मुग्ध हो जाता है सोई देह वाली राजकुमारी पर । राजकुमारी की लम्बी नीद टूटती है चटक जाते हैं पत्थरों के किले राजकुमारी राजकुमार के साथ सफेद घोड़े पर सवार उड़ चलती है जागी हुई देह और मन से जागी हुई दुनिया की ओर ।

ताऊ जी, दैत्य ,सोलह साला नीदं ,गुदगुदी वरुण पत्थर का किला और श्वेत अश्व पर सवार राजकुमार सब गडमगड हो रहे थे । "डी कोड हो रही थी एक परी कथा" ।

-------------


मृदुला शुक्ल कवि, कथाकार और पेशे से शिक्षक हैं। उनका एक कविता संग्रह ‘उम्मीदों के पाँव भारी हैं’ प्रकाशित है और एक कहानी संग्रह ‘दातून’ शीघ्र प्रकाश्य है। सरकारी स्कूल के बच्चों के साथ वह 'कलम-कूची' नाम से अखबार निकालती हैं और उन्हें रचनात्मक लेखन का प्रशिक्षण देती हैं। कहानी और कविता के लिए कुछ पुरस्कार।


Friday, January 3, 2020

जैसे अब भली लग रही हैं संघर्षरतऔरतें, हमेशा अच्छी क्यों नहीं लगतीं आपको?






जो औरतें लड़कियां छात्राएं दादियां आज प्रोटेस्ट करती हुई अच्छी लग रही हैं सड़क पर आंदोलन करती हुई,प्राइम टाइम में बोलती हुई वो हमेशा से हक़ बात बोलती हुई क्यों अच्छी नहीं लगती,वो स्कूल कॉलेज युनिवर्सिटी की शिक्षा लेने और नौकरी ख़ुदमुख़्तारी के लिए सड़क़ पर चलती हुई अच्छी क्यों नहीं लगती इसलिए कि तब आपका मतलब सिद्ध नहीं होता? 











- महज़बीं

कल प्राइम टाइम में अस्सी साल और उससे ऊपर की भी उम्र की तीन शाहीनबाग़ की बुज़ुर्ग औरतों को जब बोलते देखा तो इतना प्यार आया उनपर कि ज़ी चाहा उनका मुँह चूम लूं। कितने ही लोग पुरे हिन्दुस्तान में उनकी हिम्मत की दाद दे रहे हैं।दो हफ्तों से ऊपर हुए दिल्ली की शाहीनबाग़ की औरतें NRC, CAA, NPR के विरोध में प्रोटेस्ट कर रही हैं, उन्होंने किसी भी प्रकार की हिंसा का प्रयोग नहीं किया बड़े शांतिपूर्ण ढंग से उनका प्रोटेस्ट चल रहा है, इतनी सर्दी में भी वो बैठी रहती हैं। रवीश कुमार प्राइम टाइम में जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की उन छात्रों को लाए थे बोलने के लिए जिन्हें पुलिस ने यूनिवर्सिटी में घुसकर लाठी से मारा था,उन लड़कियों ने पुलिस की बर्बरता के बाद भी हिम्मत से निडर होकर प्राइम टाइम में सबको सच बताया, ऐसे ही अब ये तीन शाहीनबाग़ की बुज़ुर्ग़ महिलाएं भी आईं और आकर अपनी बात रखी सबके समक्ष।



इमाम शासक के समर्थन में जबकि बुर्क़ानशीन औरतें हुकूमत के ख़िलाफ़ सड़क पर

पूरे हिन्दुस्तान में लोग जगह-जगह बिल को वापिस लेने के लिए प्रोटेस्ट कर रहे हैं, सभी हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई दलित और छात्र सर्दी में भी लगातार प्रोटेस्ट कर रहे हैं।  प्रोटेस्ट करने वाले लोगों और छात्रों में महिलाएं और लड़कियां बहुत बड़ी संख्या में हैं, यहां तक की जो बाहर कम जाती हैं बुर्ख़ा लगाकर निकलती हैं बाहर, वो महिलाएं भी प्रोटेस्ट करने जा रही हैं, दूध पीते बच्चों की माँएँ भी जा रही हैं, बनारस की चम्पक की माँ भी प्रोटेस्ट कर रही थी उस दूध पीती बच्ची की माँ इतने दिनों से पुलिस हिरासत में थी। मुसलमानों का जमीयतुल हिंद संगठन भी प्रोटेस्ट कर रहा है वो शिक्षित मौलानाओं पत्रकारों का एक संगठन है जो हमेशा मुसलमानों के साथ हुए ज़ुल्म के विरोध में आवाज़ उठाता है उनके इंसाफ़ के लिए लड़ता है।बाक़ी मौलाना लोग जो क़ौम को हिदायत करते रहते हैं नसीहत देते रहते हैं, लंबी चौड़ी तकरीर करते हैं, उनमें से आधे तो चुप हैं डर से या अपनी ग़रज़ से। निजामुद्दीन मर्क़ज़ की तब्लीग़ी जमात वालों ने पूरे हिन्दुस्तान में अभी तक कहीं कोई प्रोटेस्ट नहीं किया, वो अपनी ही तब्लीग़ की दुनिया में कोरमा बिरयानी खाने, तीन दिन, दस दिन, चालीस दिन, चार महीने के चिल्ले लगाने में मशरूफ़ हैं। नौजवान लड़कों का पढ़े लिखे  लड़कों का डॉक्टर इंजीनियर प्रोफेसर का भी इंमोशनली तकरीर ब्यान करके ब्रेनवॉश कर रखा है, उन्हें तब्लीग़ जमात के सिवा दूसरी किसी बातों से सरोकार ही नहीं, इन लोगों की नागरिकता क्या ये मर्क़ज़ की कमेटी सिद्ध करेगी जो सिर्फ़ जमात में जाना ही अपनी जिम्मेदारी समझते हैं ? दिल्ली की शाही जामा मस्जिद के इमाम भी बिल के प्रशासन के समर्थन में बोल रहे हैं, कहाँ गया जामामस्जिद के इमाम का ज़िहाद ? का मतलब ज़ालिम बादशाह (शासक, हकूमत) के सामने हक़ बात बोलना है, क्या दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम शासक की हां में हां मिलाकर उनके समर्थन में बोलकर जिहाद कर रहे हैं ? ज़िहाद ज़िहाद चिल्लाने वाले मौलानाओं को भी ज़िहाद का मतलब नहीं पता, और ये मौलाना अपने को समझते हैं सबसे अक़लमंद ज़हीन, मख़लूक़। कुछ मौलाना प्रोटेस्ट कर रहे हैं तो उन्हें ठीक से प्रोटेस्ट भी नहीं करना आता,चिल्लाते हैं, या नाराए तकबीर लगाते हैं या जिहाद चिल्लाते हैं।


नाराए तकबीर लगाने की या जिहाद चिल्लाने की ज़रूरत क्या है ?

यह समय धार्मिक प्रतीक बने हुए शब्दों को बोलने का नहीं है, सरकार तो चाहती ही यही है कि मौलाना लोग जोश में आकर जिहाद का नारा लगाएँ और किसी को ज़िहाद नाराए तकबीर का अर्थ पता नहीं है, पिछले बीस पच्चीस सालों में अमेरिका और भारत की मीडिया ने ज़िहाद नाराए तकबीर को आतंकवाद का मुस्लिम कट्टरपंथी का प्रतीक बना दिया है, यानी ज़िहाद और नाराए तकबीर का अर्थ है मारना काटना,जब्कि ये बिल्कुल भी अर्थ नहीं है।और ये कूढ़मग़ज़ मौलाना यही शब्द बार-बार अपनी तकरीर में इस्तेमाल करते हैं ज़िहाद नाराए तकबीर, इन्हें छोड़ देना चाहिए इन शब्दों को बोलना जिन्हें आतंकवाद और मारकाट का प्रतीक बना दिया गया है।सीधीसादी आमबोलचाल की भाषा हिन्दी उर्दू में अपनी बात कहनी चाहिए जो सबको समझ आती है,और जिससे दूसरे लोग भड़कते भी नहीं हैं, नाराए तकबीर ज़िहाद शब्द का अर्थ किसी को नहीं पता, सबको सुनते ही यही भाव आता है मन में कि अच्छा फलां जगह मुसलमान ज़िहाद नाराए तकबीर का नारा लगा रहे हैं हमें मारने आ रहे हैं, और यही डर दिखाकर सियासी पार्टी ऐंटी मुस्लिम वोट बटोरती हैं। मौलाना लोग समझते नहीं इस सियासत को और हर जगह प्रोटेस्ट में ज़िहाद नाराए तकबीर चिल्लाने लगते हैं इसका सीधा फायदा सियासी पार्टियों को ऐंटी मुस्लिम वोट लेने में चला जाता है।


तालीम पर कभी ध्यान नहीं दिया गया , क्यों ? 

जय श्रीराम शब्द को भी सियासी पार्टियों ने दशहत का प्रतीक बना दिया है जबकि राम करुणा और मर्यादा के प्रतीक हैं। कबीर के राम भी सीधा-सरल है। अपने राम का नाम लेना कोई गुनाह नहीं लेकिन, मॉबलिचिंग करनेवाले लोगों ने राम के नाम को डर और दहशत का प्रतीक बना दिया। अभी चाहिए कि हिन्दू-मुस्लिम लोग सिर्फ़ सादा ज़बान में प्रोटेस्ट करें ज़िहाद नाराए तकबीर जय श्रीराम न बोले,क्योंकि इसका फायदा सियासी लोग उठाते हैं एकदूसरे के दिलों में डर बैठाकर और जन आंदोलन कमज़ोर पड़ जाता है।

मौलानाओं ने तब्लीग़ी जमात वालों ने क़ौम को हमेशा कुंए का मेंढक बना रखा है, हमेशा से स्कूल कॉलेज यूनिवर्सिटी की तालीम का विरोध किया, रोज़ी रोटी के लिए कुछ हद तक मर्दों लड़कों के लिए तो ज़रूरी समझा भी मगर लड़कियों की स्कूल कॉलेज यूनिवर्सिटी की शिक्षा का विरोध ही किया, जिन्होंने इनकी बातें मानी घाटे में रहे, जहालत में ही रहे,फटेहाल ही रहे,जो पहले से ही कारोबारी या ज़मीनदार हैं उनको छोड़कर बाक़ी सब बग़ैर तालीम के फटेहाल ही हैं, वही ग़ुर्बत से निज़ात पा सके जो तालीम की तरफ़ बढ़े,जिन्होंने अपने बेटे-बेटी दोनों पढ़ाए बग़ैर भेदभाव के।

कुछ प्रगतिशील मर्दों को छोड़कर बाक़ी सभी दक़ियानूसी मध्यकालीन सोच के मर्दों ने हमेशा औरत को अपनी ज़रुरियात पूरी करने का सामान समझा,उन्हें घर में क़ैद रखना चाहा,नौकरी ख़ुदमुख़्तारी से दूर,तालीम से भी दूर,अभी शाहीनबाग़ वाली लड़कियां महिलाएं तो सबको अच्छी लग रही हैं,कॉलेज युनिवर्सिटी की भी,क्योंकि इनके और अपने हक़ के लिए लड़ रही हैं बोल रही हैं।

लड़ती हुई औरतें- लड़कियाँ शाहीनबाग़ की या कॉलेज-यूनिवर्सिटी की अच्छी तो लग रही हैं लेकिन ....

यही लड़कियां महिलाएं अगर अपनी शिक्षा अपने रोजगार अपनी ख़ुदमुख़्तारी अपने अस्तित्व अपने फैसले लेने के अधिकार,अपना हमसफ़र ख़ुद चुनने के अधिकार सम्पत्ति के अधिकार के लिए लड़ने बोलने लग जाएं तो सबको खटकने लग जाएंगी। भारत की आज़ादी के आंदोलनों में भी शिक्षित अशिक्षित ग़रीब अमीर सभी महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था,और उस वक़्त यही ज़रूरत भी थी कि हिन्दू ,मुसलमान, सिख ,ईसाई, मर्द, औरत सब एक होकर अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करें। मगर आज़ादी के बाद क्या हुआ? औरतों को आंदोलन में इस्तेमाल करके आज़ादी तो हासिल कर ली फिर आज़ादी के बाद औरतों को दुबारा से घर की चार दीवारों में क़ैद कर दिया, तालीम से दूर कर दिया, कुछ प्रगतिशील लोगों को छोड़कर बाक़ी सब ने औरतों के साथ विश्वासघात किया दग़ा की, ग़ैरबरबरी की। आज फिर जब सबको एकजुट होकर के विरोध करने की ज़रूरत पड़ी है तो महिलाओं का प्रोटेस्ट करना, बोलना सबको अच्छा लग रहा है। प्राइम टाइम में आई जामिया की लड़कियां और शाहीनबाग़ की दादियां सबको अच्छी लग रही हैं, उन मौलानाओं को भी जो लड़कियों के स्कूल- कॉलेज- यूनिवर्सिटी जाने को बेपर्दगी, बेहयाई समझते हैं।

सवाल यह है कि अगर कानून वापस हुआ, विरोध सफल हो गया तो क्या उसके बाद फिर ये महिलाएं, ये लड़कियां ऐसी ही समाज को स्वीकार होंगी अपने मुद्दों पर भी बोलती या वहीं चार दीवारों में अच्छी लगेंगी कम बोलती हुई?  महिलाएं मर्दों की इन चालाकियों को समझ नहीं रही,कुछ समझती हैं, मगर आज भी लाखों महिलाएं गाय हैं सीधी शरीफ़ जो मर्दों की ऐसी ख़ुदग़र्ज़ी से भरी यूज़ एन थ्रो वाली सियासत को नहीं समझतीं,बहुत सी तो पढ़ लिखकर भी नहीं समझ पाती,क्योंकि वो सिर्फ़ पढ़कर पैसा कमाने की मशीन बनती हैं, समझ नहीं खुलती सबकी पढ़कर भी,फिर अनपढ़ औरतें कैसे इतनी गहरी बातों को समझें,बहुत सी अनपढ़ औरतें या कम पढ़ी लिखी औरतें आज भी अपने फैसले ख़ुद नहीं करती,उनके घर के मर्द जिस तरह खुश हो सकते हैं वो अपने आप को वैसे ही ढाल कर रहती हैं, अपने हक़ को भी नहीं समझ पाती....पढ़ लिखकर समझ ख़ुलती है स्कूल जाकर कॉलेज युनिवर्सिटी जाकर,तीसरी आँख खुलती है, सही ग़लत की पहचान होती है, अपने अधिकार के लिए बोलना आता है, अभिव्यक्ति करनी आती है। इसीलिए लड़कियों को स्कूल कॉलेज यूनिवर्सिटी नहीं जाने दिया जाता कि वो देखने लगती हैं, उनकी तीसरी आँख खुल जाती है, वो भी सवाल करने लगती हैं भाई से पिता से पति से शासक से,वो भी सिस्टम को समझने लगती हैं, अपने वजूद को अपने हक़ूक़ को समझने लगती हैं,परिवार के सदस्य ज़ुल्म ज़ादती हक़तल्फ़ी करें तो अदालत का दरवाज़ा खटखटाने लगती हैं, शासक ज़ुल्म करे तो नागरिक की भूमिका में आकर जन आंदोलन में जाती हैं।

कितने शातिर हैं मर्द और धर्म के ठेकेदार जो औरतों को स्कूल -कॉलेज -युनिवर्सिटी नहीं जाने देते,उन्हें यह बात बर्दाश्त ही नहीं कि औरतें उनके सामने या उनके बगल में बराबर वकार रखकर खड़ी हों और सवाल पूछती हों। कब तक क़ैद रखोगे कब तक इल्म से महरूम रखोगे।देखो आज वही शय जिसे हमेशा कमज़ोर कमअक़ल समझा गया हुकूमत के सामने खड़ी होकर सवाल कर रही हैं सबके हक़ के लिए निडर होकर बोल रही हैं, शर्म आई होगी मौलानाओं को,या अब भी लड़कियों के स्कूल कॉलेज यूनिवर्सिटी जाने को इल्म हासिल करने को बेपर्दगी बद्दीनी बेहयाई करार देते रहेंगे।

हमेशा औरतों को अपने से कमतर समझा मर्द ज़ात ने,कभी अपने बराबर की मख़लूक़ नहीं समझा, जो इसलाम के ठेकेदार हैं उन्होंने भी हमेशा औरतों को दूसरे दर्ज़े की मख़लूक़ समझा,कभी अपने बराबर नहीं समझा,जबकि इस्लाम की बुनयाद इस बात पर है कि अल्ला की तमाम मख़लूक़ में सबसे अफ़ज़ल सबसे ख़ूबसूरत सबसे ज़हनी मख़लूक़ इंसान है, इंसान है यानी के मर्द औरत दोनों हैं सिर्फ़ मर्द नहीं, और सब इंसान बराबर का दर्ज़ा रखते हैं, कोई छोटा बड़ा नहीं है, जात बिरादरी क्षेत्र मर्द औरत किसी किस्म का भेदभाव ग़ैर बराबरी नहीं है,अमीर,ग़रीब, काले, गोरे, मर्द, औरत सब बराबर हैं।

सबको अपनी मर्ज़ी से अपने शरीक़ेहयात हमसफ़र को पसंद ना पसंद करने का हक़ है, सबको तालीम हासिल करने का हक़ है, मर्द औरत का जोड़ा  मीया-बीव की शक़्ल में अल्लाह ने इसलिए बनाया ताकि वो एकदूसरे के साथ हमराज़ बनकर रहें एकदूसरे के साथ साथी दोस्त बनकर रहे, न कि इसलिए की एक तो दूसरे पर हुकमरानी करे और दूसरा ग़ुलाम बनकर हमेशा उसका हुक्म बजा लाने में जी हुजूरी में उसकी माहतहती में रहे।

इसलाम की बुनियादी बातों को सिरतुन नबी को छोड़कर मर्दों ने इसलाम की बुनयादी बातों में अपनी पुरुषवादी पितृसत्तात्मक सोच को घुसेड़ दिया, मर्द औरत की ग़ैरबरबरी को डाल दिया,छोटी जात बड़ी जात बिरादरीवाद क्षेत्रवाद को शामिल कर लिया,और लादना शुरु कर दिया।

हुज़ूर की पहली बीवी जो उनसे पंद्रह साल बड़ी थी उम्र में, कौन करता है आज अपनी हमउम्र या उम्र में बड़ी लड़की से शादी ? सब अपनी उम्र से पाँच दस साल छोटी ही चाहते हैं, कहीं तो बीस पच्चीस साल छोटी भी। हूज़ूर की पहली बीवी बेवा (विधवा)थीं जब उन्होंने उनसे निकाह किया आज कौन करता है बेवा से शादी ? हूज़ूर की पहली बीवी एक कारोबारी महिला थीं,आज कौन अपनी बीवी को कारोबार करने देता है ख़ुदमुख़्तार बनने देता है ? हूज़ूर ने अपनी बेटी फ़ातिमा का निकाह उनकी पसंद-नापसंद पूछकर किया था,आज कौन अपनी बेटियों से शादी के वक़्त उसकी पसंद-नापसंद पूछता है ? लव मैरिज तो बहुत दूर की बात है, अगर कोई पसंद-नापसंद के बारे में पूछता भी है तो सिर्फ़ फॉरमैलिटी होती है उसमें, दबाव यही होता है कि उनके मन मुताबिक ज्वाब दे बेटी। शिक्षा बुनयादी ज़रुरियात में से एक ज़रूरत है कितने ही लोग अपनी बेटियों को आज भी शिक्षा से वंचित रख रहे हैं, कुछ स्कूल भेजते हैं फिर कॉलेज युनिवर्सिटी नहीं भेजते,प्रोफेशनल शिक्षा नहीं देते जिससे की महिलाओं को रोजगार मिल सके।समझदारी अच्छे बुरे सही ग़लत की पहचान जिन  कामों को करने से आती है ख़ुदमुख़्तारी जिससे आती है उस चीज़ से काम से तो दूर रखते हैं औरतों को।



वो हमेशा हक़ बात बोलती हुई अच्छी क्यों नहीं लगती आपको ?


आज वक़्त की  ज़रूरत है सबके एक होकर प्रोटेस्ट करने की,हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई मर्द औरत सबको एक साथ सड़क पर आकर जन आंदोलन करने की बिल का विरोध करने की....और करना भी चाहिए सबको एक साथ मिलकर विरोध। मैं पूछती हूँ ये एकता ये इत्तिहाद मुसीबत में ही क्यों याद आती है जब चारों तरफ़ के दरवाज़े बंद हो जाते हैं, तब कहाँ जाती है ये एकता ये इत्तिहाद जब मीडिया और प्रशासन समाज में नफरत का ज़हर घोलने के लिए झूठ दिखाती है और ग़लत इतिहास दिखाती है लोगों का माइंडवॉश करती है,तब भी तो अपनी प्रगतिशील सोच का इस्तेमाल करना चाहिए, सही शासक को चुनाव में मत देकर चुनना चाहिए, घटिया न्यूज़ चैनल को नहीं देखना चाहिए। और जो औरतें लड़कियां छात्राएं दादियां आज प्रोटेस्ट करती हुई अच्छी लग रही हैं सड़क पर आंदोलन करती हुई,प्राइम टाइम में बोलती हुई वो हमेशा से हक़ बात बोलती हुई क्यों अच्छी नहीं लगती,वो स्कूल कॉलेज युनिवर्सिटी की शिक्षा लेने और नौकरी ख़ुदमुख़्तारी के लिए सड़क़ पर चलती हुई अच्छी क्यों नहीं लगती ? इसलिए कि तब आपका मतलब सिद्ध नहीं होता? 



 महज़बीं दिल्ली विश्विद्यालय में रिसर्चर हैं और मुद्दों पर बेबाक, स्पष्ट राय रखती हैं।  
(शाहीन बाग़ की सभी तसवीरें सुजाता )

Monday, December 2, 2019

'तुम हो' यह सिद्ध करने के लिए तुम्हारा आधार कार्ड और पासपोर्ट काफ़ी है


चोखेरबाली पर दस साल पहले हमने हाइमेन यानी कौमार्य झिल्ली की मरम्मत करने वाली सर्जरी के अचानक चलन में आने पर वर्जिनिटी/कौमार्य की फ़ालतू और बकवास धारणा पर एक पोस्ट लिखी थी।इन सालों में जब हम सोच रहे थे कि ऐसे फ़ितूर समाज में कम हो गए होंगे, एक दिन अचानक उस गोरखधंधे का पता लगा जिसमें अब सर्जरी की भी ज़रूरत खत्म हो गई थी। महज़ कैप्स्यूल्स के इस्तेमाल से पहली रात को कौमार्य की गवाही देने का और बाकी के वैवाहिक जीवन की सुख-शांति सुनिश्चित कर लेने का सरल उपाय लड़कियों के पास मौजूद था। जबकि इसकी कोई गारण्टी कभी नहीं होती। यही नहीं, चिर-कौमार्य का एह्सास फिर से ज़िंदगी में जगाया जा सके इसके लिए भी बिना सर्जरी के लेज़र से योनि को कसने की तकनीक बाज़ार में आ चुकी। स्तनों और बाकी देह को कसने की तो तकनीक उप्लब्ध थी ही सहजता से। आख़िर कितना खुद को ऑल्टर करना होगा स्त्री को, मन से, तन से ...अपने पुरुष के प्रेम को पाने के लिए? जब पतियों द्वारा पहली रात के नकली खून का परीक्षण करवाया जाने लगेगा तब किस दिशा में भागेंगी लड़कियाँ ? तब बाज़ार एक और जाल बिछाएगा ! एक सच छिपाने के लिए हज़ार झूठ बोलने पड़ते हैं।अब समय है एक एक झूठ को अनडू करने का।
आज चोखेरबाली पर पढिए प्रतिमा सिन्हा की यह टिप्प्णी जिसमें व्यक्त निराशा और ग़ुस्सा एकदम स्वाभाविक है, जायज़ है। सोशल मीडिया पर विरोध के बावजूद ऐसे उत्पाद आज भी अमेज़ॉन पर मौजूद हैं और ज़ाहिर सी बात है बिक भी रेह होंगे। हमें लगातार लिखना और विरोध करते रहना होगा। - सुजाता

'तुम हो' यह सिद्ध करने के लिए तुम्हारा आधार कार्ड और पासपोर्ट काफ़ी है 
- प्रतिमा सिन्हा 

एक जानी-मानी ऑनलाइन शॉपिंग कंपनी ने अपनी लिस्ट में एक प्रोडक्ट ऐड किया है। वर्जिनिटी साबित करने वाला ब्लड यानी खून। 'i-virgin, blood for the first night' नाम से खुलेआम बिक रही ये कैप्स्यूल्स मँगवा कर कोई भी लड़की शादी के बाद अपने पति के सामने अपना कौमार्य सुरक्षित होने का दावा कर सकती है और वह भी प्रमाण के साथ यानी सफेद चादर पर लाल खून के धब्बे। 
चित्र इंटरनेट से साभार 


पहले के ज़माने में यह ज़रूरी रस्म हुआ करती थी यह तो सुना था। लड़की की वर्जिनिटी चेक करने का यह नायाब और ग़ज़ब तरीक़ा तथाकथित बड़े-बड़े, कुलीन लोगों के घरों में अपनाया जाता था। पति से पहली बार सेक्स करने के बाद अगर खून के धब्बे, सफ़ेद चादर पर ना पड़ें तो लड़की ज़िन्दगी भर अपने आप को चरित्रवान साबित करते रहने को मजबूर होती थी। उसे जवाब देने होते थे पति के सामने, घर वालों के सामने और कभी-कभी दुनिया वालों के सामने भी। शादी और पति के साथ संसर्ग का सारा आनन्द इसी भय में घुलता रहा कि पता नहीं अंदर हाइमन की झिल्ली फटी है या बची है। एक ऐसी परीक्षा में फेल होने का डर जिसकी तैयारी में अपना कोई हाथ ही नहीं। 

 लेकिन दुनिया की तरक्की हुई औरत से जुड़ी प्रथाएँ वहीं की वहीं रह गई, गर्त में।
  
मेडिकल साइंस में सुबूत के साथ यह साबित कर दिया कि कुंवारेपन में कौमार्य का पर्याय कही जाने वाली हाइमन झिल्ली सेक्स के अलावा भी कई दूसरी वजह से फट सकती है जैसे दौड़ने से, कूदने से, खेलने से, साइकिलिंग करने से और ऐसी किसी भी गतिविधि में बहुत ज़्यादा सक्रिय रहने से लेकिन यह सारे दावे एक तरफ़ और समाज का फ़तवा दूसरी तरफ़। सिद्ध तो यह भी हो गया कि हाइमेन एकदम फिज़ूल और बकवास चीज़ है। जिसके होने न होने का कोई अर्थ नहीं है।

तुम किसी को सुबूत देने के लिए पैदा नहीं हुई और ना ही कोई ऐसा पैदा हुआ है जो तुमसे तुम्हारे होने का सबूत मांग सके। 'तुम हो' यह सिद्ध करने के लिए तुम्हारा आधार कार्ड और पासपोर्ट काफ़ी है। 






बहुत ख़ुशनसीब होंगी वे औरतें, जो आत्मा तक अपमानित करने वाले इस अनुभव से नहीं गुज़रीं लेकिन ज़्यादा संख्या ऐसी औरतों की रही जिन्होंने यह अपमान ही नहीं वैवाहिक जीवन में यौन-सम्बंधों से जुड़े तमाम अपमानों को न सिर्फ़ झेला है बल्कि उसकी पूरी कीमत भी चुकाई है। ऐसे हालात में बाज़ार इसे सबसे बेहतर ढंग से समझता है कि सफ़ेद चादर पर खून के लाल धब्बों की कीमत क्या है ?

उस जानी-मानी ऑनलाइन शॉपिंग कंपनी ने भी फ़ायदे का यही धंधा शुरू कर दिया है। अभी तक उसने कितनी 'आई-वर्जिन' पिल्स बेची हैं इसकी जानकारी मेरे पास नहीं है। मगर इस ख़बर को पढ़कर लगता है कि अब लड़कियाँ सचमुच "तू डाल-डाल, मैं पात-पात" वाले मूड में आ गई हैं। प्यारे पतिदेव अगर पत्नी के प्यार और समर्पण को परे रख कर उससे कुंवारे होने का सबूत मांगेंगे तो पत्नी भी पहले से तैयारी करके रखेगी। अपने वर्जिन होने का सबूत पेश कर देगी। दम हो तो काट कर दिखाओ। 


अब खुलेआम ऑनलाइन जो चीज़ बिक रही है, जाहिर है उसकी जानकारी सबको है। मतलब मियां जी खुल्लम खुल्ला उल्लू बनने को तैयार रहेंगे। फिर किसका सबूत सच्चा था और किसका खरीदा हुआ इसका फ़ैसला करना भी मुश्किल होगा। सीधी सी बात है कौमार्य की इच्छा रखने वालों की अहम तुष्टि के रास्ते निकाल लिए गये हैं। कल को पति लोग उस खून की भी जाँच कराने लगेंगे कि तुम्हारा ही है या कैप्स्यूल का कमाल है ! यह धंधा कितना आगे जाएगा यह नहीं कहा जा सकता लेकिन बेवकूफ़ी भरे रिवाजों से दो-दो हाथ करने के मूड में आई लड़कियों से एक बात कही जानी बेहद ज़रूरी है।

 लड़कियो, तुम्हारे पागलपन की कोई सीमा है या नहीं ?
उन्होंने कहा - 'गोरी चाहिए।' तुमने फेयरनेस क्रीम का धंधा चमका दिया। उन्होंने कहा - 'पतली चाहिए।' तुमने चर्बी घटाने वाले विज्ञापनों के व्यूज़ बढ़ा दिए।  वो कहते हैं - 'वर्जिन चाहिए।' अब तुम खून की गोलियाँ खरीदने लगोगी ? और फिर ज़ोर-शोर से ऐलान करती फिरोगी कि तुम आज की आज़ाद नारी हो ? अपने फ़ैसले खुद करती हो ? अपना जीवन अपने हिसाब से जीती हो ?


जब तक तुम अपने लिए बनाए हुए ऐसे बेवकूफ़ाना सांचों के हिसाब से ढलने की कोशिश करती रहोगी, तुम्हारी आज़ादी का ऐलान न सिर्फ़ अधूरा है बल्कि पूरा का पूरा झूठ भी है। बात तो तब है कि तुम इन सांचों को तोड़ो और अपनी शर्तों पर आगे बढ़ो।

यह समझ सको कि तुम्हें किसी के सामने अपना कुछ भी सिद्ध करने की ज़रूरत नहीं। ना ही को कौमार्य, ना ही संसर्ग। यह जीवन तुम्हारा है। देह तुम्हारी है। तुम जो चाहो, करो। तुम किसी को सुबूत देने के लिए पैदा नहीं हुई और ना ही कोई ऐसा पैदा हुआ है जो तुमसे तुम्हारे होने का सबूत मांग सके। 
'तुम हो' यह सिद्ध करने के लिए तुम्हारा आधार कार्ड और पासपोर्ट काफ़ी है। इसके अलावा किसी और प्रॉडक्ट पर तुम्हें विश्वास नहीं करना है।

उम्मीद करती हूँ यह और इस जैसे अन्य प्रॉडक्ट बाज़ार का सबसे फ्लॉप प्रॉडक्ट साबित हो।



प्रतिमा सिन्हा 


 20 वर्षों से वाराणसी में अपने उत्कृष्ट वाणी-शिल्प, मंच संचालन व उद्घोषणा
     रंगमंच और लेखनी के माध्यम से स्त्री केन्द्रित विषयों को स्वर देने के लिए भी जानी जाती  हैं।
कहानियों, कविताओं, ग़ज़लों, नज़्मों और नाटकों का निरंतर लेखन. हिन्दी-उर्दू अख़बारों के साथ ही विभिन्न वेब पोर्टल और ब्लॉग्स पर लगातार प्रकाशन। 





Thursday, November 14, 2019

कवयित्री बतौर गृहिणी


अनुराधा अनन्या इन दिनों विदेशी कवयित्रियों के अनुवाद कर रही हैं। चोखेरबाली के लिए उन्होंने एलिज़ाबेथ आइबर्स की कुछ कविताएँ भेजी हैं।

 एलिज़ाबेथ की कविताएँ कई खंडों में प्रकाशित हुई हैं।इनकी कविताओं में अफ्रीकी और डच भाषा का जो मेल है उसमें वहाँ की संस्कृति की झलक दिखाई देती हैं। 1915 में जन्मी एलिज़ाबेथ 1986 में डच नागरिक भी बनीं। अफ्रीका के अलावा इन्होने नीदरलैंड में भी प्रवास किया। इनकी कविताओं में अफ्रीका और नीदरलैंड के आम जनमानस के जीवन की झल है। ये कविताएँ जीवन के इतना क़रीब और सहज हैं कि  वैश्विक स्तर पर पढ़ी गई और अलग-अलग भाषाओं में अनूदित हुई। स्त्री-जीवन के विविध अनुभवों के अलावा एक प्रवासी की नज़र से देखी गई दुनिया भी इनकी कविताओं में दर्ज है।बतौर कवयित्री एलिज़ाबेथ को खूब सराहा भी गया और कई पुरस्कार भी प्राप्त हुए। अफ्रीका में जन्मी एक महिला के लिए लिखना ही बड़ी बात होती है वहां बतौर कवयित्री इस तरह से दर्ज होना और भी बड़ी बात है- अनुवादक 


Elisabeth Eybers


कवयित्री बतौर गृहिणी
हमेशा एक झाड़ू एक दीवार के

सहारे खड़ी पाई जाती है
कभी खाना आये भी
तो समय पर नहीं आता

बिना तारीखों के वो दिन

जिनमें वो इधर-उधर घूमती रहती है
ख़ाली,ज़िद्दी
और थोड़ी गड़बड़ाई सी

इस्त्री होने वाले कपड़े उदासी से

कुर्सी पर लटके रहते हैं
ये मुद्राएं ना जाने कहां से आती है

ढेर बन पड़ी हुई पुरानी चिठ्ठीयां
जिनके जवाब दिए जाने हैं 

कागज़, दवाइयां 
गहरे दराज़ में ठूंसे हुए हैं

शुक्रिया,कि वह तुम्हारे विशाल हृदय का

हिस्सा है
तब भी अभी भी अपनी छोटी खोपड़ी की सीमाओं के लिए समर्पित.

ओ क़ायदे के दोपाये(दो पैर वाले)

ध्यान दो
उसे अकेला छोड़ दो
उसे पढ़ने दो




प्रवासी

मेरे पास हाथ पैरों के सिवा कुछ भी नहीं है,
बाकी जो कुछ भी था, वो पारगमन में खो गया था
घबराया हुआ दिल,बेचैनी
लेकिन फिर, उनसे होगा क्या?

 तोलने के लिए, कि क्या खोया है, क्या आसपास है
रोशनी और आवाजों को समझने के लिए
हालाँकि इन्हें मैंने ना देखा या ना सुना
लेकिन मेरे चेहरे पर अब भी होश है।

और मेरी छाती और पेट की जगह पर
मुझे लगता है कि इनकी बजाय कुछ और ही था
उस जगह पर ।
किसे पता था, कि ख़ालीपन इतना भारी है
कि बेपर्दा होने का अंजाम ऐसी जकड़न है?



तर्क के लिये आख़िरी कोशिश

ख़ालीपन- जो कि एक आदमी के भीतर तक भर जाता है
जो धीरे-धीरे शुरू हुआ और आखिरकार लबालब भर गया है
फिर तेजी से एक ज़ख्म की शक्ल ले लेता है
और अक्सर एक झंझट बन जाता है

इसे छोटी-मोटी परेशानियों के साथ जोड़ना
वास्तव में एक जायज़ तर्क नहीं है
इससे पहले आप दिन-ब-दिन इसमें डूबते जा रहे थे.
अब कभी कभी पूरी तरह से
लगभग नाकारा

यहां तक कि आख़िर में भी
आप फ़ितरतन इसे टालते ही रहते हैं

रात में

हां, मैं अभी तक यहीं हूँ और शायद मुझे यहां से कभी ना जाना पड़े
तुम सोचते हो 
जब गहरी रात में चौंककर तुम उठ जाते हो.

जो तुम्हारे पीछे छूट जाएगा
वो ग़ायब नही हो जाएगा तुम्हारी निगरानी के बिना
रख लो जो रख सकते हो और बाक़ी जो बच जाए उसका खुद का जीवन होगा।

कभी पहुंच के भीतर, पर क्षय से अछूता

सुनहरे रंगों में गिरफ्त
हाल के दिनों से बचा हुआ।

तुमने वक्त के कटघरे से चौंकती हुई एक निगाह डाली
वहाँ, जहां वो सब जो ग़ायब हो चुका है जो गायब नही होना चाहता था, तुम्हारा इंतजार कर रहा है ।
और तुम खुद अनन्त की ओर
खिंचे जा रहे हो
वक्त दर वक्त
जब तुम गहरी रात में चौंक कर जाग जाते हो।



विरासत

मेरे पिता और मेरी माँ की तरह ही
मुझमे भी ऐसी ही जारी है जैसी उनकी रही
मेरे लंबे अंग जो पिता से मिले हैं
मेरे उलझे मोटे बाल, जो मुझे मेरी माँ से मिले हैं

पिता शांत और संशयमुक्त मनन करते रहते थे
इस दौरान कुछ भी,
चाहे कितना भी सम्मानीय हो
नही मिटा सकता था मेरी माँ की भेदती सी मुस्कान को
उन दोनों ने आपसी असमानताओं के बीच भी समझौते किये
और उनकी असहमतियों की आदतों
की पूरी क़ीमत चुकानी पड़ी मुझे

आख़िर, अब मेरे अस्सी के दशक में
मुझमें उन्हें बर्दाश्त करने की कुव्वत है

हर आदमी नष्ट हो जाता है
और निंदा करने वाला भी कोई नहीं रहता

सिर्फ: वे शायद ही कभी आराम करते हैं
और हर शय को अपनी तरह बनाने के लिये बेचैन रहते हैं

मुझे अहसास हुआ है कि इस तरह एक दूसरे के बगल में रहना
 दिन-ब-दिन थकाऊ होता जाता है

अनुवाद-  अनुराधा अनन्या