Thursday, May 16, 2013

कहानी का यथार्थ और समाज का: शेखर जोशी की कहानी कोसी का घटवार के बहाने एक बहस - सीमा मौर्य



हिंदी कहानी के इतिहास में उसने कहा था के बाद शेखर जोशी विरचित कोसी का घटवार अपनी तरह की अलग और विशेष प्रेमकहानी है।

फौजी जवान गुंसाई और लछमा की कहानी, जहां सांसारिक अर्थ में प्रेम परास्त होता है। बड़े-बूढ़ों की जिद लछमा का विवाह कहीं और करवा देती है, क्योंकि गुंसाई अनाथ है और फौज में उसकी जान का भी भरोसा नहीं।1 कहानी बताती है कि लछमा का पति रामसिंह भी फौज में है पर उसके पीछे भरापूरा परिवार है।

यह मनोविज्ञान कि अकेले आदमी को ब्याह कर बेटी संकट में पड़ सकती है और उधर दूसरे आदमी पर संकट आया भी तो परिवार देखभाल के लिए है, खोखला निकलता है। रामसिंह नहीं रहता और क्योंकि मनोविज्ञान जटिल विषयवस्तु है, रामसिंह के जेठ-जिठानी वाले परिवार का भी एक मनोविज्ञान है, जो विधवा लछमा और बच्चे को खुद पर बोझ और ज़मीन-जायदाद पर अवांछित अधिकारी मानता है।

लछमा मायके लौट आती है पर वहां भी सभी कुछ नष्टप्राय है। उधर गुंसाई फौज पन्द्रह साल की सेवा समाप्त कर गांव लौट आया है और कुछ मन लगा रहे इसके लिए उसे गेंहू पीसने का घट/पनचक्की लगा ली है। यहां दोनों की पन्द्रह साल बाद दोबारा एक उदासीन-सी मुलाकात होती है।

लछमा ने कभी आंचलिक ग्रामदेवता गंगनाथज्यू की कसम लेकर कहा था कि गुंसाई जैसा कहेगा वैसा वह करेगी, पर उसने किया नहीं। ये दोनों ही पात्र एक जटिल मनोवैज्ञानिक सम्बन्ध और तनाव में जी रहे हैं, एक-दूसरे के प्रति भी और समाज के प्रति भी। एक ओर समाज की तथाकथित मर्यादा निभाने की मानसिक चुनौती है दूसरी ओर अपने गोपन प्रेम का बहुत पीड़ा देनेवाला अहसास। मर्यादा रह जाती है लेकिन क्या प्रेम मर जाता है ? इसे समझना बहुत कठिन है। प्रेम भी मरता नहीं, समाज तो बाहर है पर मन के कोने-अंतरे भी उसी प्रेम का घर हैं। गुंसाई उलाहना नहीं दे रहा पर उसे लगता है कि गंगनाथ की झूटी हो चुकी कसम से ही लछमा का अनिष्ट हुआ है, यह एक परम्परागत ग्रामीण मनोविज्ञान है, जिसमें देवताओं की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है - इसी के चलते वो कहानी के अंत में बच्चे के साथ जाती हुई लछमा को सलाह देता है -

‘‘कभी चार पैसे जुड़ जाएं तो गंगनाथ का जागर लगाकर भूल-चूक की माफी मांग लेना। पूत-परिवार वालों को देवी-देवता के कोप से बचा रहना चाहिए।’’ 2

गुंसाई ने लछमा के बच्चे को देखा है, वह खुद तो अकेला है पर लछमा पूत-परिवार वाली है, उसे इसी बात की चिंता है कि अब लछमा की झूटी पड़ गई कसम का कोप बच्चे पर न हो - यह गुंसाई के मनोजगत में लछमा के प्रति उसके प्रेम का ही विस्तार है।

प्रेम का सरल समीकरण तो यह कहता है कि अभी देर नहीं हुई है, एकाकी जीवन जी रहा गुंसाई और लछमा एक हो जाएं तो दोनों का जीवन संवर सकता है, पर सामाजिक बंधनों में जो मनोसंसार निर्मित होता है, वह जटिलता की ओर जाता है। प्रेम मनोविज्ञान की दृष्टि से वैसे भी बहुआयामी विषय है, जिसकी दिशा व्यक्ति-व्यक्ति में बदल जाती है। अब कहानीकार का मनोविज्ञान भी देखें कि उन्होंने अपने वामपंथी संस्कारों और प्रशिक्षण के बावजूद इस कहानी के परिवेश और यथार्थ की मौलिकता से समझौता नहीं किया है, उसे जस का तस रहने दिया है।


प्रेम की वर्जना बनी रही है। नायक-नायिका के उत्तरजीवन में प्रेम सुधार कर सकता है, उसकी उदासीनता और विवशता को तोड़ कर उसे जीवन्त बना सकता है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं घटता। इस कहानी में ‘‘कुछ शाश्वत समस्याओं को उठाते हुए आंचलिक मूल्य-मान्यताओं की सीमा का भी ध्यान रखा गया है, अन्यथा कोसी का घटवार में गहरे रोमानी स्पर्श के स्तर पर लछमा और गुंसाई घटवार का पुनर्मिलन इतना नीरस और उद्देश्यहीन न होता।’’3  यहां परम्परा से कोई विद्रोह सामने नहीं आता है, जीवन अपने ढर्रे पर चलता है। इसे क्या द्वन्द्व की कसौटी पर कहानी की असफलता माना जाएगा? नहीं, यह कहानी 
लेखक के उन दिनों की तस्‍वीर
जब उन्‍होंने कोसी का घटवार लिखी

विषयवस्तु से अपने व्यवहार से पाठकों में परम्परा और रूढि़यों के प्रति द्वन्द्व जगाती हुई नवीनता के स्वीकार का आग्रह प्रस्तुत करती है। द्वन्द्व कहानी में नहीं, पाठक के मन में चलता है - परम्परा से विद्रोह भी कहानी में नहीं, पाठक के मन में घटता है। कहानी में वर्णित प्रेम की असफलता द्वन्द्व की विशिष्टता के इस स्तर पर कहानी की सफलता में बदल जाती है।   

कहानी के अंत में टीस बनी रहती है कि लछमा तो स्त्री है, उसे लोक में व्याप्त आचार-व्यवहार और लोक-लाज से भय अधिक है लेकिन गुंसाई एक पुरुष है, उसे आगे बढ़कर लछमा को अपनाना चाहिए। प्रश्न उसी यथार्थगत मौलिकता का बच जाता है, जिसकी रक्षा प्रेमचंद ने कफन में बुधिया की दारूण मौत से की थी और शेखर जोशी की इस कहानी में उन्होंने उसकी रक्षा लछमा और गुसाई के प्रेम की मौत से की है।

यह हमारा सामाजिक यथार्थ है, जिसकी कीमत कभी एक स्त्री की मौत से चुकाई जाती है तो कभी उसके प्रेम की मौत से, पर यही यथार्थ  है, इसे कहानी में नहीं, समाज में बदलना होगा। कहानीकार तो बस संकेत कर सकता है कि यह यथार्थ है और गलत है, इसे ऐसा नहीं होना चाहिए, इसमें बदलाव की आवश्यकता है।
***

        1-कोसी का घटवार, वही, प्रतिमान प्रकाशन, 952-मालवीय नगर, इलाहाबाद, तृतीय संस्‍करण 1988 
           पृ0 62
        2-वही, पृ0 74

        3 -पांडेय, बालकृष्ण, मेरा पहाड: असहमति-अस्वीकार की कहानियां, पुस्तक समीक्षा, साहित्य सम्पर्क
          अंक -4, जुलाई 1992
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        सीमा मौर्य कुमाऊं विश्‍वविद्यालय, नैनीताल से नई कहानी पर शोध कर रही हैं। सम्‍पर्क : द्वारा 
        प्रो.नीरजा टंडन,हिंदी विभाग, डी.एस.बी.परिसर, नैनीताल-263 002 (उत्‍तराखंड) 

Sunday, April 14, 2013

क्या चाहते हो तुम चीखों का एक मुल्क ?'


मेरे अल्फ़ाज़ों में दामिनी की आख़िरी विदाई देश के नाम...
आपके नाम....
 डिम्पल चौधरी (पत्रकार्)

 मैंने अपनी रुख़सती की शर्त पर
अपने हिंन्दुस्तान को
शर्मसार होने से बचाने की कोशिश की है
लोखों बेटियोंमांओंबहनोंभाइयों
और करोड़ों अंजान कंधों पर सवार होगा मेरा शव

कोई रुदन, कोई हाहाकार ना करना
मेरी शवयात्रा में


मां........
बताओ ना मुझे याद करोगी ना
मैं..... मैं लड़ी मां.....
अपनी सांस के मर्ज होते आख़िरी छोर तक
मैं लड़ी थी मां....
मगर मेरे जिस्म को औजारों की नकेल ने
ज़मीर तक छलनी कर दिया था
मेरे ज़ख़्म मेरे ज़िंदा रहने की ख़्वाहिश को
पनाह नहीं दे पाए मां......

मगर मां.....
मैं मरी नहीं हूं ना ही ख़मोशी के आले को ओढ़ा है मैंने
बस मौत पर मुझे दया आ गई,
कब से दरवाज़े पर टकटकी लगाए
मेरे इंतज़ार में थी

मां....
मौत को चुना है मैंने
ताकि सोने की चिड़िया कहे जाने वाले
मेरे इस हिंन्दुस्तान के माथे पर
मेरी बदनसीब मौजूदगी का कलंक ना लगे....
इसीलिए मैंने मौत को चुना है मां...

आखिरी लम्हों मे 
मेरे कानों में आवाज़ आई थी कहीं से
कि पूरा देश मेरी ज़िदगी की दुआं कर रहा है,
कि मेरे नाम की मुहर के बिना
हर किसी के सीने में मेरा दर्द है आज
ये हर तरफ़ से आती हुईं आवाज़ें
ये जुलूस, ये हुज़ूम, ये चीख़,
ये शोर, ये तड़प....
सब मेरी ही तो हैं

अब मैं ...मैं कहां रही
मैं अब पूरा मुल्क़ बन गई हूं
ए मेरे देश
हज़ारों आवाज़ों का इंकलाब देके जा रही हूं
लोगों की इन गरजती इंसाफ़ की दहाड़ में
मैंने अपने लिए दर्द सुना है
ए मेरे देश मैं जा रही हूं
मगर इस दहाड़ को यूं ही बरक़रार रखना
ताकि कोई और बहन, कोई और बेटी
उन औजारों, उन अत्याचारों का रुदन ना सहे
जिसे सहा मैंने, जिसे जिया मैंने

जब उस रात बस की परछाई मैं
मुझे उजाड़ा गया था
उस रात सिर्फ़ मेरी ही रूह छलनी नहीं हुई थी
बल्कि हर लड़की उस रात दामिनी या अमानत बनी थी
उस रात मेरे साथ
देश की हर औरत एक मौत मरी थी.......
मरा था ये अतुल्य भारत,
मरी थी इंसानियत,
मरी थी इज़्ज़त,
मरा था मेरा आंगन,  मरी थी मेरी रूह
मैं तो बाबा के आंगन में फ़िर लौटना चाहती थी
एक आज़ाद चिड़िया की तरह उड़ना चाहती थी
मगर खूंख़ार बाज़ों के नुकीले पंजों ने
मुझे नोच डाला........


मगर अब ये शोर
मेरी ये मुल्क़ बन चुकी आवाजें
अब किसी और बुलबुल को
किसी और चिड़ियां को
कभी यूं मरने नहीं देगी....
मेरे देश
मेरी रुख़सती मे यह वादा दे दो
कि यहाँ अब कोई बेटी दामिनी न बनें 
वर्ना उसकी चीखें 
मुल्क बन जाएँगी 
क्या चाहते हो तुम 
चीखों का एक मुल्क ?'

अलविदा.....

‘’डिम्पल सिंह चौधरी’’

Monday, February 25, 2013

नीलोफ़र





वह
रोज़ मेरे ज़हन में
शबनम बनके झरा करती है, चुपचाप..
स्मृतियों की हरी घास पर
न जाने कब आकर चिपक जाती है
लिपट जाती है मुझसे
मुझे बचा लो...
नहीं कर पाती मैं कुछ.
क़तरा-क़तरा साफ शफ़्फ़ाक़
शबनम की बूंदों सी पारदर्शी वह
सचमुच लिपट जाती है मुझसे और
रोज़-रोज़ सूरज के साथ आने वाले घाम में
न जाने कब भाप बन के उड़ जाती है.
नीलोफ़र
जी हां यही नाम था उसका.
नील के रंग की तरह सुन्दर और स्पष्ट थी वह.
बड़ी साफ थी उसकी समझ
हां के लिए हां और न के लिए न.
हमारी तरह घालमेल नहीं करती थी वह
न तो विचारों में, न ही जीवन में........
अन्तरराष्ट्रीय राजनीति पर बहस करती थी वह
ईराक पर अमरीका के हमले को वहशियाना करार दिया था उसने
उस ज़माने में बुश सीनियर राष्ट्रपति हुआ करता था अमरीका का.
रंगों से कलाकृतियां उकेरती थी वह
जिस भी दीवार पर हाथ फेर देती, जगमगाने लगती...
ऐसी कलाकार थी वह
उसके हाथों का हुनर
बागीचे में फूल बन कर खिलता था.
जब वह चलती तो
क्यारी की गुलदाउदियां उसे आवाज़ लगातीं
नीलोफर.....नीलोफर.......नीलोफर...........
फिर कहां चूक हुयी...?
क्या हुआ सरे राह...?
क्यों पगला गयी नीलोफर......?
ख़लाओं में गुलदाउदियां
आज भी आवाज़ दे रही हैं
नीलोफर.....नीलोफर....नीलोफर........
पर कहां रही अब वो नीलोफर......
उसके कमरे की दीवारों में एक भी तस्वीर नहीं है आज
उसके बागीचे फूलों से भरे हुए नहीं हैं आज.....
कमरे की एकमात्र खिड़की से
अपनी बड़ी-बड़ी सूनी आंखों से वह दूर उफ़क में देखा करती है
मानों सुनना चाहती हो गुलदाउदियांे की आवाज़
नीलोफर......नीलोफर..............नीलोफर.................
क्या आप बता सकते हैं
क्यांे पागल हो गयी नीलोफर?
उसके लिए जो घर बसाया गया था
वह उसे रास नहीं आया क्या?
या फिर उसका हमसफर?....
पता नहीं.......क्या हुआ....
उसने कभी किसी से कुछ कहा नहीं..........
कुछ भी नहीं.
शायद यहीं गलती हो गयी हमसे....
हम उसका मौन नहीं पढ़ पाए शायद........
सबने समझा था कि आखिर है तो वह भी एक औरत
ढल जाएगी....खांचे में............
पर नहीं..........
उसने मौन को अपने विद्रोह की आवाज़ बना लिया
और घुट गयी...........
चीखी क्यों नहीं थी वह?
ज़ोर से चिल्लायी क्यों नहीं थी वह?....
प्रतिरोध क्यांे नहीं किया उसने?
शायद इसीलिए पागल हो गयी मेरी नीलोफर..........
क्यांेकि अपने हिस्से का चीखी नहीं वह...........
लड़ी नहीं वह......
इसीलिए खामोश हो गयी मेरी नीलोफर.
दजला-फ़रात, नील, ह्वांगहो, सिंधु
मिसीसिपी, वोल्गा से लेकर
गंगा तक
तुम्हें कहीं मिल जाए मेरी नीलोफर...
तो ज़ोर से झकझोरना उसे....
कहना उसे कि
चिल्लाओ.......इतनी ज़ोर से चिल्लाओ....
कि सारी नदियां मचल उट्ठे....
आकुल हो उठे समन्दर कि ये आवाज़ कहां से आयी....
कि ब्रह्माण्ड में हो जाए सुराख़
कि डोलने लगें सत्ताएं.....
और ये गुलदाउदियां झूम-झूम के देने लगें आवाज़
नीलोफर.........नीलोफर...........नीलोफर............
     रचनाकार - कृतिश्री