Monday, May 19, 2008

अपराध और स्त्रियाँ

स्त्रियों के महिमान्वयन का सवाल

राजकिशोर

पुरुष क्रूर और निर्दय होते हैं तथा स्त्रियां सहृदय और ममतामयी -- साहित्य और संस्कृति में परंपरागत मान्यता यही है। इस मान्यता को आज भी सार्वजनिक भाषणों में दुहराया जाता है। लेकिन ज्यादातर पुरुष इससे सहमत दिखाई नहीं देते। स्त्रियों को आज तक जिस तरह पद-दलित किया गया है और आज भी किया जा रहा है, उसे देखते हुए यह उम्मीद बेकार है कि स्त्रियों के गुणों और विशेषताओं को सामान्य जन द्वारा स्वीकार किया जाएगा। गुलामों में क्या गुण हो सकता है ! अगर कुछ गुण दिखाई देते हैं, तो इसी कारण कि उन्हें बंधन में रखा गया है। दिलचस्प यह है कि जहां साहित्य और संस्कृति में स्त्री जाति का महिमान्वयन किया गया है, वहीं लोक जीवन में ऐसी अनेक कहावतें प्रचलित हैं, जिनके अनुसार स्त्री बहुत ही धूर्त, बेवफा और मूर्ख प्राणी है। एक कहावत में कहा गया है कि स्त्रियों को नाक न हो, तो वे गू खाएं। दूसरी कहावत त्रिया चरित्र के बारे में : खसम मारके सत्ती होय।

आधुनिक भारत में स्त्रियों के प्रति यह विद्वेष और मजबूत हुआ है। इसका कारण यह है कि शिक्षा और अवसर पाने के बाद स्त्रियां बड़े पैमाने पर ऐसे रोजगारों में उतरी हैं जो पुरुषों के लिए आरक्षित माने जाते रहे हैं। इस तरह पुरुषों के लिए अवसर कुछ कम हुए हैं। यद्यपि दुनिया भर का अनुभव यही है कि स्त्रियों को पुरुषों की तुलना में कम महत्वपूर्ण काम दिए जाते हैं और उन्हें वेतन तथा मजदूरी भी कम मिलती है। फिर भी स्त्रियों का सार्वजनिक जीवन में उतरना मर्दों को नहीं भाता। सार्वजनिक जीवन में स्त्रियों के उतरने से पुरुष-स्त्री के बीच समानता के मूल्य बनते हैं और स्त्रियों में विभिन्न स्तरों पर आत्मनिर्भरता आती है। यह पुरुषों के लिए संकेत है कि सत्ता पर उनका एकाधिकार खत्म हो रहा है और स्त्रियां, जो अब तक उनके कब्जे में रही हंैै, आजाद हो रही हैं। यह बात गैर-प्रबुद्ध पुरुष मंडली को नागवार गुजरती है। मुख्यतः यही कारण है कि महिला आरक्षण विधेयक पुरुष-प्रधान भारतीय संसद में पारित नहीं हो पा रहा है।

हाल ही में जेपीनगर जिला मुख्यालय के पास बाबनखेरी गांव में एक लोमहर्षक कांड हुआ। एक महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिल कर अपने माता-पिता, दोनों भाइयों, भाभी, ममेरी बहन की दोस्त और एक नाबालिग भतीजे की हत्या कर दी। यह इस तरह का शायद पहला कांड है। कारण क्या था, इस बारे में निश्चयपूर्वक कुछ बताया नहीं जा सका है। कारण कितना भी प्रबल हो, पर एक ही रात में सात-सात परिजनों की हत्या एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है। इस करुण घटना पर टिप्पणी करते हुए एक सज्जन 'चोखेर बाली' नामक विख्यात ब्लॉग में 'औरत ऐसी भी होती है क्या' शीर्षक से लिखते हैं : 'मिनटों में इस नारी ने एक प्यार भरे घर को कब्रिस्तान बना डाला। नारी मां होती है, पर इस नारी ने तो एक डायन का रोल अदा किया। क्यों किया उसने यह सब? क्या कमी थी उसे? क्या चल रहा था उसके मन में ? क्या यह सब उसने अपने प्रेमी के लिए किया?'

ये बड़े सवाल हैं। इनका उत्तर विस्तृत जांच के बाद ही मिल सकता है। लेकिन इस तरह की घटनाएं आजकल काफी छपने लगी हैं कि पत्नी ने अपने प्रेमी के साथ मिल कर पति को जहर दे दिया या प्रेमी-प्रेमिका दोनों ने मिल कर पत्नी या पति की हत्या कर दी। ऐसी घटनाएं पता नहीं कब से हो रही हैं। इन्हीं की ओर संकेत करने के लिए 'किस्सा तोता मैना' जैसी दिलचस्प किताब लिखी गई थी, जिसमें तोता एक कहानी द्वारा साबित करता है कि औरतें बेवफा होती हैं, तो मैना दूसरी कहानी के माध्यम से साबित करती है कि नहीं, बेवफा तो मर्द होते हैं। सच्चाई यह है कि दोनों ही अर्धसत्य हैं। पहले पुरुष ज्यादा स्वैराचारी होते थे, तो आजादी और खुलापन बढ़ने से अब स्त्रियां भी स्वैराचारी होने लगी हैं और हिंसा को भी अपना रही हैं। इससे पुरुष मानसिकता के अनेक प्रतिनिधि यह कहने लगे हैं कि स्त्रियों का महिमान्वयन ठीक नहीं है, क्योंकि त्रिया चरित्र ही उनका वास्तविक गुण है। जब वे और ज्यादा आजाद होंगी, तो और कहर मचाएंगी।

पश्चिम में जहां स्त्रियां काफी हद तक आजाद हो चुकी हैं, ऐसे प्रमाण नहीं मिलते कि वे बड़े पैमान पर डायन हो चुकी हैं। उनमें से अनेक हिंसा कर रही हैं और परिवारों को बरबाद कर रही हैं, यह तथ्य है। लेकिन यह साबित होना बाकी है कि स्त्री का वास्तविक रूप यही है। सभी समाजों में स्त्रियां अधिक मानवीय दिखाई देती हैं। शायद प्रकृति ने उन्हें ऐसा बनाया ही है, क्योंकि इसके बिना वे संतति परंपरा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं कर पातीं। बेशक कुछ माताएं भी क्रूर साबित हुई हैं, लेकिन ये घटनाएं अपवाद ही हैं, नियम का रूप नहीं ले पाई हैं। फिर भी यह मानने में कोई हर्ज नहीं दिखाई देता कि हम वास्तविक स्त्री को नहीं जानते। अभी तक स्त्रियों को बनाया गया है। वे अपने स्वाभाविक रूप में प्रस्फुटित नहीं हुई हैं। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पुरुष भी वैसे बनाए गए हैं जिस रूप में वे उपलब्ध हैं। अर्थात एक ही संस्कृति एक खास तरह के पुरुष और एक खास तरह की स्त्रियों का निर्माण कर रही है। फिर भी इसी संस्कृति में गौतम बुद्ध, ईसा मसीह और गांधी जैसे पुरुष पैदा होते हैं और कैकेयी, तिष्यरक्षिता तथा फूलन जैसी स्त्रियां।

तथ्य यह भी है कि जब पुरुष कोई क्रूर घटना करता है, तो हम दांतों तले उंगली नहीं दबाते। लेकिन जब स्त्री ऐसा करती है, तो हम घोर आश्चर्य में पड़ जाते हैं। इसी से साबित होता है कि पुरुष की तुलना में स्त्रियों से अधिक मानवीय होने की अपेक्षा की जाती है। क्या इसी बात में स्त्री चरित्र के बेहतर होने की स्थापना निहित नहीं है? आखिर कोई तो वजह है कि अब तक कोई स्त्री हिटलर, मुसोलिनी, स्टालिन या माओ नहीं बनी। इसका यह उत्तर पर्याप्त नहीं है कि स्त्रियों को पर्याप्त राजनीतिक सत्ता नहीं मिली है। जबाब यह भी दिया जा सकता है कि स्त्रियों के हाथ में पहले सत्ता तो दीजिए, फिर देखिए क्या होता है। हो सकता है कि स्त्री-पुरुष के बारे में परंपरागत मान्यताएं ध्वस्त हो जाएं। हो सकता है, व्यवस्था में सुधार आए। जो भी हो, निवेदन है कि पुरुष की तरह स्त्री को भी वैसा बनने का हक दीजिए जैसा वह होना चाहती है। एक वर्ग आजाद हो या नहीं, इसका फैसला करनेवाला दूसरा वर्ग कैसे हो सकता है? 000

Sunday, May 18, 2008

अस्तित्व की जंग

मैं भी एक औरत हूँ शायद इसलिए ही इस विषय का चुनाव किया है, यानि मैं भी स्वार्थी हुई। इस स्वार्थ के लिए क्षमा चाहती हूँ........
चलिए इसकी शुरुआत करते हैं वेदों सें जहाँ नारी पूज्य थी। उसमें एक संस्कार अभीप्सित था। यहाँ ये बता देना आवश्यक है कि संस्कार वो है जो हमारे अंतरतम तक पैठा हुआ है। यह पैठ इतनी गहरी होती है जिसे बड़ी मशक्कत के बाद ही उखाड़ फेका जा सकता है। नारी ने आरंभ से ही अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष किया है, सच यही है।
भले ही वेदों में लिखा गया हो-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते
रमन्ते तत्र देवता।

लेकिन सच इससे हमेंशा से अलहदा रहा है। मैथिली शरण गुप्त की ये पंक्तियाँ नारी पर हमेशा से मौजूं रही हैं चाहे वो वैदिक कालीन सभ्यता हो चाहे हड़प्पा कालीन चाहे छायावादी युग रहा हो या फिर इक्कीसवीं शताब्दी।
अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी ।
आंचल में है दूध और आँखों में पानी ।।
एक दिन यूंही अपने घर की छत पर टहल रही थी... हवा तेज़ चल रही थी.... आँखें अनायास ही क्षितिज पर जा टिक रहीं थी। कभी मन बादल की बनती बिगड़ती रेखाओं पर जा टिकता तो कभी एक शायद फालतू समझी जाने वाली चीज़, जी हां क्योंकी स्त्री आज केवल एक चीज़ ही रह गयी है। लेकिन इसके लिए दोशी केवल समाज नहीं काफी हद तक वो ख़ुद है। इसकी अगर गहरी पड़ताल की जाय तो पूरी तरह से वो ख़ुद भी दोषी नहीं ,बल्की घूम-फिरकर बात वहीं संस्कारों पर आ टिकती है कि कहीं न कहीं इसके लिए उसके संस्कार ज़िम्मेदार हैं।
प्रेम,त्याग और भोग की वस्तु समझी जाने वाली नारी में कभी हम उसके प्रगतिवादी रूप की कल्पना नहीं करना चाहते। हमारे लिए उसके इस रूप की कल्पना उसे दुश्चरित्रता की कोटि में ला खड़ा करती है हालाकि कवि दिनकर ने ये बात समझी थी-
दृष्टि का जो पेय है रक्त का भोजन नहीं है ।
रूप की आराधना का मार्ग आलिंगन नहीं है।।

क्रान्ति की बयार कहीं भी बह सकती है, उसकी दिशा निर्धारित नहीं होती।
घर पर बैठकर आँसू बहाना और भाग्य को दोष देना केवल कायर ही कर सकता है, कर्मठ जूझते- लड़ते झंझावातों का सामना करते गन्तव्य तक पँहुच ही जाता है।भले ही इसमें उसे बहुत वक़्त लग जाए और वह लहू लुहान भी हो जाए ।


स्त्री को अबला नाम के चक्रव्यूह् से बाहर निकलने की ज़रूरत है।साथ ही स्त्री की तरक्की के उदाहरण दे कर सब कुछ बदल गया है कि दुहाई देने वालों को भी असलियत से मुँह नही मोडना चाहिये । एक अरब से अधिक की आबादी वाले इस देश में आज महिलाओं से जुड़े उदाहरण हम अपनी उंगलियों पर गिना सकते हैं। ये शर्मनाक नहीं त्रासदीपूर्ण है।

नारी केवल श्रद्धा नहीं है, अबला नहीं है, केवल दया की पात्र नहीं है बल्कि आज उसे ख़ुद अंधेरे गलियारों में टहल कर संभावनाएं तलाशनें की ज़रूरत है। उसके अस्तित्व की जंग अनादि काल से किस काल तक जारी रहने वाली है पता नही , लेकिन यह संघर्ष जारी रहना ज़रूरी है , मशाल का जलाए रखना ज़रूरी है , सवाल उठना ज़रूरी है ... ..............


स्मृति दुबे



स्मृति दुबे दिल्ली की एक सजग टी वी पत्रकार हैं ।पत्रकारिता के हालिया परिदृश्य को लेकर वे चिंतित दिखाई देती हैं लेकिन आत्मविश्वास से भरपूर हैं । स्मृति समाज व राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य को लेकर गम्भीर भी हैं । चोखेर बाली में यह उनकी पहली पोस्ट हैं ।उम्मीद है स्वप्नों और हौसलों से भरी यह युवा पत्रकार चिंतन और अनुभवों के बहुत से रंग रूप हमे दिखा पायेंगी ।

Saturday, May 17, 2008

" कर्म - योगिनी "

कर्म योगी बनो ,कहा हमेँ हरि मधुसूदन ने,
गीता का अमर सँदेश हुआ आम आज घर घर मेँ


क्या भारत या क्या विदेश ,
नारी बनी " कर्म - योगिनी "
आज वो नही थकती ,
अपनों के लिए , स्वयं के लिए ,
वह क्या कुछ आज , नही किया करती !


किँतु, आज भी प्रश्नोँ के चक्रव्युहोँ से नहीँ उभरी,


अभिमन्यु, बीँध गया शर से, हो गया अमर !


नारी, पीती रही कई घूँट, हाला के,


ना बन पाई "नीलक़ँठी" ना बन पाई अमर !


- लावण्या

Friday, May 16, 2008

अपराधों का लैंगिक वर्गीकरण

अनुराग अन्वेषी


सुरेश जी का 'दहल' जाना पढ़ा और दूसरों को 'दहलाने की उनकी कोशिश' भी
देखी। सुरेश जी कितने संवेदनशील हैं इस बात का पता इससे ही चल जाता है कि
उन्होंने इतनी भयंकर वारदात को महज 'घटना' माना है। उन्होंने लिखा है 'यह
नारी अशिक्षित नहीं है. उसने अंग्रेजी में एम् ऐ किया है. ' सुरेश जी,
शिक्षित होने का संबंध जो लोग डिग्रियों से तौलते हैं, मुझे उनके शिक्षित
होने पर संदेह होने लगता है। आपको ढेर सारे ऐसे लोगों के उदाहरण अपने
समाज में मिल जाएंगे, जिन्होंने स्कूल-कॉलेज का चेहरा तक नहीं देखा, पर
उनकी शालीनता और उनके संस्कार के सामने डिग्रीधारी भी बौने नजर आने लगते
हैं।
आपने लिखा 'उसके पिता ने अपनी इस एकलौती बेटी को बेटों जैसा प्यार दिया.
शिक्षा पूरी होने पर उसे एक स्कूल में अध्यापिका की जाब दिला दी.'
दो-तीन बातें इन दो वाक्यों पर। पहली बात तो यह कि उस पिता ने सिर्फ
प्यार दिया। यह आकलन आपका है क्या कि बेटों जैसा प्यार दिया? जो परिवार
अपनी बेटी को एमए तक की पढ़ाई करने का अवसर दे, वह दकियानूसी नहीं हो
सकता। दकियानूस दृष्टि यह है कि हम उसे कहें कि उसे बेटों जैसा प्यार
दिया। खतरनाक बात यह कि अध्यापक पिता ने अपनी बेटी को पढ़ा तो दिया पर
उसके भीतर समझ पैदा नहीं कर सका, संस्कार पैदा नहीं कर सका। और तो और
आपके मुताबिक 'शिक्षा पूरी होने पर उसे एक स्कूल में अध्यापिका की जाब
दिला दी।' गौर करें सुरेश जी, वह लड़की इतनी भी शिक्षित नहीं थी कि एक
छोटी-सी जॉब पा सके। आपके मुताबिक, उसके टीचर पिता ने उसे जॉब दिलाई थी।
एक दुखद बात और कि जो टीचर अपने घर के बच्चे को सही और गलत के अंतर को
समझ पाने की दृष्टि नहीं दे सका, वह समाज को क्या सिखलाएगा? और आखिर में
एक कुतर्क, अगर बाप ने बेटी को बेटों जैसा प्यार दिया, तो बेटी ने भी उस
प्यार का सम्मान करते हुए बेटों जैसा काम किया। बहरहाल, अपराध न बेटा
(पुरुष) करता है, न बेटी (स्त्री)। यह आपको भी समझना चाहिए।

आपने लिखा 'मैंने भी जब इस के बारे में सुना... '। पर आपने हमें जो
सुनाया, वह तो लाइव कमेंट्री की तरह है। लगा ऐसा कि हत्याएं हो रही हैं
और आप वहां खड़े होकर बारीक तरीके से वारदात के हर स्टेप को अपनी डायरी
में दर्ज कर रहे हों। दरअसल, आपने इस वारदात को अपनी ओर से रोचक बनाने की
अथक कोशिश की है। हां सुरेश जी, अपराध की प्रकृति ही ऐसी होती है कि वह
रोचक नहीं हो सकता, वह घृणित ही रहेगा। उसे रोचक अंदाज में पेश करने की
कोशिश उससे भी ज्यादा घृणित। ऐसी किसी वारदात को स्त्री-पुरुष से जोड़कर
देखने वाली दृष्टि इस समाज के लिए कितनी खतरनाक है, इस पर अगर आप विचार
कर सकें (मुझे संदेह है) तो करें। और फिर बताएं कि यह अपराध किसी स्त्री
ने किया या किसी पुरुष ने?

अनुराग अन्वेषी

Wednesday, May 14, 2008

न महिला ,न पुरुष....केवल इंसान

कल सुरेश जी की पोस्ट पढ़ने के बाद अपने आप को रोक नहीं सकी ये पोस्ट लिखने से!एक अपराध की घटना इसलिए यहाँ स्थान पाती है क्योकी इसमें महिला शामिल है!कार्यों, व्यवसायों के साथ अब हमने अपराध पर भी लिंग भेद करना शुरू कर दिया है! मुझे आश्चर्य होता है जब कई पढे लिखे लोग मुझसे कहते हैं की अच्छा है आप ईमानदार है, महिलाओं के लिए भ्रष्टाचार ठीक नहीं!पता नहीं कौन सी सोच है जो पुरुषों के लिए भ्रष्टाचार को जस्टिफाई करती है !हम क्यों ये नहीं सोच सकते की अमुक चीज़ इंसानों के लिए गलत है और अमुक चीज़ सही!महिला के सिगरेट, शराब पीने पर आश्चर्य क्यों!कोई पुरुष के लिए तो मैंने किसी को इन चीजों के लिए आश्चर्य करते नहीं देखा! महिला भी एक आम इंसान है...वो भी अच्छी ,बुरी, दोनों तरह की हो सकती है!

२ वर्ष पहले की बात है..ग्वालियर में पहली बार एक महिला को शराब का ठेका मिला!सभी मर्दों के बीच वही एक महिला थी जो उस कार्य को कर रही थी! अगले दिन एक पत्रकार मेरे पास आया और बोला कि इस विषय पर मुझे आपकी राय चाहिए...एक महिला होकर शराब का व्यवसाय कर रही है!आप क्या सोचती हैं? मैंने सहज भाव में उत्तर दिया कि इसमें सोचने जैसी क्या बात है, वो अपनी मर्जी का व्यवसाय कर रही है! उस पत्रकार को मुझ से इस उत्तर की उम्मीद नहीं थी! उसने हैरानी से पुनः प्रश्न किया" क्या आप इसे ठीक मानती हैं कि एक भारतीय महिला शराब का व्यवसाय करे? मैंने इस बार उससे प्रश्न किया "क्या आप शराब के व्यवसाय को गलत मानते हैं" वो बोला "बिलकुल नहीं, लेकिन एक महिला....? मैंने कहा यदि पुरुष के लिए शराब व्यवसाय सही है तो महिला के लिए भी किसी कोण से गलत नहीं है" खैर उसको मन माफिक जवाब नहीं मिला...और उसने मेरे इस बयान को अखबार में स्थान नहीं दिया!

लेकिन मेरे मन में कई प्रश्न कौंध गए! क्या उस पत्रकार की गलती है कि वह ऐसे सोचता है? क्यों महिलाओं को आश्चर्य से देखा जाता है जब वे तथाकथित पुरुषों वाले व्यवसाय में प्रवेश करती हैं? मैंने इन प्रश्नों के जवाब खोजने कि कोशिश की.. वास्तव में मुझे लगता है कि हम जाने अनजाने ही बचपन से ही नन्हें बच्चे ,बच्चियों के मन में बीज पैदा कर देते है कि उन्हें क्या करना है,क्या नहीं! एक छोटा सा उदाहरण लें.....किसी छोटे लड़के के जन्मदिन पर हम जाते हैं तो उसे कोई कार,कोई गेम या कोई बंदूक उपहार में देते हैं जबकि किसी छोटी बच्ची के जन्मदिन पर हम उसे कोई गुडिया ,सॉफ्ट टॉय, पेंटिंग बुक या किचन सेट उपहार में देते हैं! मैंने कभी नहीं देखा कि हम किसी लड़के को किचन सेट गिफ्ट करते हों! जब एक बच्चा पैदा होता है तो सिर्फ उसके बायोलोजिकल जेंडर स्त्री या पुरुष होते हैं....लेकिन धीरे धीरे उसके सोशल जेंडर भी चेंज हो जाते हैं!बचपन से ही उन्हें सिखाया जाता है कि आगे चलकर तुम्हारे रोल क्या होंगे!

हमारे सामजिक ढांचा ही ऐसा है! अभी पिछले हफ्ते मैंने एक टी.वी प्रोग्राम पर अभिनेत्री तनुजा का स्टेटमेंट देखा जिसमे उन्होने बताया कि उन्हें और उनके भाइयों को एक साथ खाना बनाना, कपडे धोना और बाहर साइकल चलाना सिखाया गया!मुझे अच्छा लगा...लेकिन आज भी कितने ऐसे परिवार हैं जो लड़कों से रसोई में उतना ही काम करवाते है जितना कि लड़कियों से! हांलाकि सोच बदल रही है लेकिन परिवर्तन लाने के लिए हर एक को अपने विचारों में परिवर्तन लाना होगा! ये काम भाषण देने से नहीं होगा हम खुद अमल करेंगे तब दुसरे खुद बा खुद समझेंगे!हर समाज की अपनी मान्यताएं हैं...जब मैं गोवा गयी तो मैंने देखा वहाँ वाइन शॉप पर लडकियां ही काम कर रही थीं और वहाँ पर यह उतना ही सामान्य था जितना हमारे यहाँ लड़कियों का ब्यूटी पार्लर में काम करना!

जेंडर इशू पर एक बार एक सज्जन ने कुतर्क करते हुए कहा कि कल को आप माओं को भी कहेंगी कि बच्चे पालना उनका काम नहीं है...मुझे उन्हें ये बात समझाने में काफी समय लगा कि मातृत्व एक प्राकृतिक गुण है जो माँ बनने के साथ ही जन्म लेता है!और ये भावना तो जानवरों में भी पायी जाती है जो जेंडर से बिलकुल परे हैं! खैर ख़ुशी कि बात यह रही कि वो सज्जन अंततः कुछ कुछ समझ गए! शायद धीरे धीरे समाज भी समझ जाए!

Tuesday, May 13, 2008

औरत ऐसी भी होती है क्या

मैं आपका ध्यान एक ऐसी घटना की और दिलाना चाहता हूँ जिस ने घटना शेत्र के लोगों को अन्दर तक दहला दिया है. मैंने भी जब इस के बारे में सुना तो अन्दर तक दहल गया. इस घटना का मुख्य पात्र एक नारी है जो आज समाज की आँख की किरकिरी बन गई है. यह नारी अशिक्षित नहीं है. उसने अंग्रेजी में एम् ऐ किया है. उसके पिता ने अपनी इस एकलौती बेटी को बेटों जैसा प्यार दिया. शिक्षा पूरी होने पर उसे एक स्कूल में अध्यापिका की जाब दिला दी. कोई भेद भाव नहीं. कोई बन्धन नहीं. उसके मुहं से 'बाबा' सुनते वह दौड़े आते. उस की हर फरमाइश पूरी करते. बेटी की आँख में एक आंसू भी उन्हें दुखी कर देता.

यह नारी थी - अथाह प्यार करने वाले माँ-बाप की बेटी, दो प्यार करने वाले भाइयों की बहन, एक प्यार करने वाली भाभी की ननद, एक प्यारे भतीजे की बुआ, एक ममेरी बहन की दीदी. एक भाई अपनी पत्नी और बेटे के साथ शहर में नौकरी करता. दूसरा भाई शहर में पढ़ता. एक दिन जब सब घर आए हुए थे इस नारी ने सारे परिवार की हत्या कर दी. यह कार्य उसने अपने प्रेमी की मदद से किया. सब को खाने में बेहोशी की दवा दे दी. जब सब बेहोश हो गए तब इस ने अपने प्रेमी को बुलाया और एक एक कर सबकी गर्दनें काट डाली. वह बाल पकड़ कर सर ऊपर उठाती और उस का प्रेमी कुल्हाड़ी से गर्दन काट देता. भतीजे को उस के प्रेमी ने गला धोंट कर मारा. इस काम को पूरा कर उस का प्रेमी कुल्हाड़ी लेकर वहाँ से भाग गया और वह आगे का नाटक करने की तैयारी करने लगी. इतने में उस का भतीजा रोने लगा. शायद गला घोंटने में कोई कमी रह गई थी. इस कमी को पूरा उसकी बुआ ने किया. वह उस बच्चे की गर्दन तब तक दबाती रही जब तक वह तड़प कर शांत नहीं हो गया.

मिनटों में इस नारी ने एक प्यार भरे घर को कब्रिस्तान बना डाला. कहते हैं नारी माँ होती है पर इस नारी ने तो एक डायन का रोल अदा किया. क्यों किया उस ने यह सब? क्या कमी थी उसे? क्या चल रहा था उस के मन में? क्या उस ने यह सब अपने प्रेमी के लिए किया? इन सवालों का जवाब खोज रही है पुलिस. लोग कह रहे हैं, भगवान् ऐसी बेटी किसी को न दे. कुछ उसे डायन कहते हैं और कुछ नारी जाति पर कलंक.

यह घटना घटी, उत्तर प्रदेश के जे पी नगर जिला मुख्यालय से १७ कि मी दूर बाबनखेरी गाँव में. शौकत मियां एक अध्यापक थे. गाँव के अमीर लोगो में थे. सब उन्हें एक नरम दिल शान्ति प्रिय इंसान के रूप में जानते थे. वह अपने बच्चों से बहुत प्यार करते थे. खास तौर पर अपनी बेटी शबनम से. पर उन्हें क्या पता था कि उनकी यह प्यारी बेटी ही उनकी कातिल बन जायेगी. उनके बाल पकड़ कर उन का सर ऊपर उठाएगी और कहेगी अपने प्रेमी से 'चल काट गर्दन'.

नारी माँ होती है. अन्याय के ख़िलाफ़ नारी दुर्गा भी बन जाती है. अन्याय के ख़िलाफ़ जंग करने पर यदि समाज उसे आँख की किरकिरी मानता है तो माने. मैं तो ऐसी नारी का स्वागत करूंगा. पर यह कैसा रूप हे नारी का. क्या इस आँख की किरकिरी को समाज को बर्दाश्त करना चाहिए? क्या इस को नारी समाज का समर्थन मिलना चाहिए? हो सकता है शबनम को अपने परिवार से कोई शिकायत हो. हो सकता है उसके पिता उस पर कोई दबाब डाल रहे हों जो उसे नागवार लग रहा हो. पर ऐसी बेरहम हत्या. क्या कोई भी कारण इसे सही ठहरा सकता है?


suresh gupta

यह लेख सुरेश गुप्ता जी ने चोखेर बाली के लिए भेजा है और ऐसी नारी के बारे में चोखेर बालियों के विचार जानने की इच्छा भी जताई है ।

Monday, May 12, 2008

Mothers' day celebrations

Yesterday we as members of Uttaranchal Mahila Association went to Premdham ,the home for aged people , to celebrate mothers'day . Athough everyday is important for mothers but this day children gave flowers, gift etc. to their mothers to make their day special and make them feel special. I was really overwhelmed to talk to the old ladies who were residing in the Pemdham as they were not ready to disclose the name of their children who left them there.
They were all happy and enjoyed the programme we presented and even showed their gratitude as we spent our time with them. After all a mother is a mother, always, thinking of her children, worried about her children !!!