Tuesday, December 30, 2008

रेड लाइट एरिया माने बगैर गाली दिए स्त्री के विरुद्ध हिंसा कर सकने की काबिलियत

प्रश्न : निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए ।

गद्यांश : cmpershad ( चन्द्र मौलेश्वर प्रसाद ) said
मालामाल चर्चा।
लगता है महिलाएं भी पुरुषों का मुकाबिला गाली-गलौच में भी करना चाहती हैं! करें, जरूर करें, कौन रोकता है। पुरुषों की तरह सिगरेट पियें [पश्चिम में तो पुरुषों से अधिक महिलाएं ही पीती हैं तो भारत में पीछे क्यों रहें], शराब पियें, आगे बढ़कर अपने लिए एक रेड लाईट एरिया[ चाहें तो रंग बदल लें] खोल लें .... तभी ना, यह कहा जा सकेगा कि स्त्री भी पुरुष से कम नहीं!!
यदि महिलाएं पुरुषों के गंदे आचरण को अपनाना चाहें तो पुरुष कौन होता है रोकने के लिए। मुझे प्रसन्नता है कि मेरे कटु शब्दों ने महिलाओं में विरोध के शब्द उठे और यही है सुजाताजी को उनकी स्वतंत्रता का उत्तर।

प्रसंग : पुरुष अपने वाहियातपने या पतितावस्था को सगर्व स्वीकार क्यों करता है?शर्मिन्दा क्यों नहीं होता?


व्याख्या :
"स्वतंत्र होकर गाली देना चाहती हो? तो आओ ,करो मेरा मुकाबला , मुझसे ज़्यादा पतित नही हो पाओगी ,देखो मै बिना गाली दिए भी भाषा का ऐसा प्रयोग करूंगा कि वह किसी भद्दी गाली से कम नही होगा, पतित होने की होड़ मे तुम मुझसे नही जीत सकती , इसलिए मान लो कि गालियाँ पितृसत्ता की सम्माननीय धरोहर है और तुम अपनी तमीज़,सभ्यता,शिष्टाचार वगैरह..वगैरह...जो अभी तुम्हें मेरे जैसे विद्वान समझा कर गए हैं उसे स्वीकार कर लो...हमारी नीयत पर सवाल उठाओगी या हमें आइना दिखाने की कोशिश करोगी तो तुम्हें सरे आम वेश्या कह डालेंगे , हमें चिंता नही कि आने वाले समय में बेटियाँ गालियों के पितृसत्तात्मक चरित्र को समझने लगेंगी और इसके प्रति सहज हो जाएंगी क्योंकि हमारी बेटियाँ , बहुएँ ,पत्नियाँ हमारा चलित्तर खूब समझती हैं और पंगा नही लेतीं, वे हमारे कब्ज़े मे हैं, और उन्हें कब्ज़े मे रखना भी हमें आता है,अब बताओ , क्या तुम गिर सकीं मेरे बराबर ? नहीं न !हमे पता था पतन मे हमारा मुकाबला नही है। अब भी मान लो और गाली चर्चा छोड़ दो , यह तुम्हारा इलाका नही,देखो हम बस एक बार तुम्हें गरिया दें तो तुम आहत हो जाओगी , हम ऐसी कोमलांगिनियों को आहत नही करना चाहते फिर भी तुम ज़िद ठाने थीं तो लो यह भेंट कोठे पर बैठ जाने की सलाह स्वरूप तुम्हारे लिए। "

विशेष :1. तर्क का नितांत अभाव , बहस की कतई गुंजाइश नही ।
2. जानकारी का अभाव
3.दीप्ति की पोस्ट से चोखेर बाली , घुघुती बासूती, नारी सभी ओर विरोध के ही तो स्वर उठ रहे हैं ,चिट्ठाचर्चा मे पहली बार नही हुआ।
4.वेश्यावृत्ति का भारत में उदय आधुनिक युग की घटना नही , मानव सभ्यता के आरम्भ से है। न ही यह पश्चिम का प्रभाव है। वेश्यावृत्ति तो एशिया महाद्वीप की खासियत है।पश्चिम में इसे छिपाया नही जाता। लेकिन भारत जैसे परिवारवाद, नैतिकतावादी समाज मे इसका स्वरूप पश्चिम से अधिक भयंकर है।यहाँ के पुरुष पारिवारिक मूल्यों को बहुत महत्व देते हैं लेकिन परिवार से उनका मतलब परिवार के स्थायित्व से है ,यानि तलाक न हों , न कि पत्नी के प्रति वफादार होने से।इसलिए यहाँ की यौन संहिता का आडम्बर झूठा है।

सन्दर्भ ग्रंथ :
लुईज़ ब्राउन की किताब "यौन दासियाँ: एशिया का सेक्स बाज़ार"
वाणी प्रकाशन , नई दिल्ली,2005

Monday, December 29, 2008

पुरुष अपने वाहियातपने या पतितावस्था को सगर्व स्वीकार क्यों करता है?शर्मिन्दा क्यों नहीं होता?

पिछली पोस्ट "क्या भाषा और व्यवहार की सारी तमीज़ का ठेका स्त्रियों ने लिया हुआ है?" पर डॉ अनुराग लिखते हैं --"मै तो ये सोचकर काँप गया हूँ जब औरते इस की अभ्यस्त हो जायेगी ..? एक आइना दिखाया है हम सब को .शुक्रिया"
वे पोस्ट की निहितार्थ समझ गए थे।यह गान्धीगिरी का रास्ता है कि जब बेटी पिता के मुख से "भैन.." सुने तो अगली बार उसी के सामने यह गाली दें ताकि अगली बार से वह अपने भाषा व्यवहार मे सचेत रहे।ऐसी कल्पना से आपको आभास होगा कि गाली देना कितना आहत करता है।यह वाचिक हिंसा है स्त्री के प्रति।अब मैने कोई मुहिम तो चलाई नही यह केवल मेरा ओबज़र्वेशन , और उसके आधार पर आने वाले समय की चेतावनी, और नाराज़गी थी।

लेकिन यह बात दूर तलक जाती है और बहुत से लोगों के लिए गाली विमर्श स्त्री सशक्तीकरण की बेहूदी तकनीक हो जाती है।उन्हें लगने लगता है कि स्त्रियाँ हर जगह पुरुष की बराबरी करके बराबरी हासिल करना चाहती हैं।
जब डॉ अमर ज्योति कहते हैं
Dr. Amar Jyoti said...
"फूहड़ यौनिक/लैंगिक गालियों पर लज्जित या नाराज़ होने के स्थान पर यदि स्त्री उनमें रस लेने लगती है तो यह उसका विकास कहलायेगा या अधःपतन ?
तो पोस्ट के पीछे की नाराज़गी को वे क्या नज़र अंदाज़ कर गए हैं ?
HEY PRABHU YEH TERA PATH said...क्या पुरुष प्रधान सस्कृति कि बराबरी के लिये इस तरह कि बॉतो को कोनसे तर्क से सही ठहरायॉ जा सकता है।
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी कहते हैं-
स्त्री सशक्तीकरण के जोश में पुरुषों से गन्दी आदतों की होड़ लगाना कहीं से भी नारी समाज को महिमा मण्डित नहीं करेगा। गाली तो त्याज्य वस्तु है। इसमें कैसी प्रतिद्वन्द्विता?
वहीं आलोचक भी कहते हैं कि स्त्री पुरुष की बराबरी क्यों करना चाहती है?
वहीं सारस्वत शेखर कहते हैं -बराबरी करनी है किसी सुसंस्कृत मुद्दे पर करनी चाहिए|
------------
कमेंट्स मे यह स्पष्ट दिखता है कि -गालियाँ पुरुष प्रधान संस्कृति की विशेषता है,यह गन्दी आदत है ,यह पुरुषों की गन्दी आदत है।
लेकिन इस गन्दगी पर शर्मिन्दगी इनमें से किसे कमेंट मे नही है बल्कि सवाल करने वाली एक स्त्री को उसकी ओछी ख्वाहिश के लिए शर्मिन्दा करने की नीयत ज़रूर है।इनमें से कोई नही कहता कि हाँ यह गलत है और अगर हम चाह्ते हैं कि हमारी बेटियाँ ऐसी भाषा न बोलें तो हमें इस गन्दी आदत को छोड़ना होगा। क्यों ? पतन पर इतना मोह क्यों ?

जब आप कहते हैं कि स्त्री भी पुरुष की तरह वाहियात गालियाँ देना चाहती है, एकाधिक पुरुषों से संसर्ग करना चाहती है , पतित होना चाहती है, होड़ करना चाहती है .....तो क्या आप यह स्वीकार कर रहे हैं कि पुरुष खुशी से पतित होना स्वीकार करता है?और वह पतित होना चाहता है ? कहीं इसलिए तो नही कि पतित होकर वह् ज़्यादा मनुष्य हो पाता है,ज़्यादा सहज,ज़्यादा स्वतंत्र ,ज़्यादा मानवीय ? क्या इसलिए आप सगर्व कहते हैं कि हम तो गिरे हुए हैं तुम क्यों गिरना चाहती हो? और यह भी कि इस पतन को कंट्रोल करना भी ज़रूरी है इसलिए इसे स्त्रियों के लिए प्रतिबन्धित किया जाए?इसका यही तरीक हो सकता है कि जो ज़्यादा आज़ाद है(संतनोत्पत्ति ,संतान पालन आदि से)वह और आज़ाद रहे....जो बन्धा है वह और बन्ध जाए!


जैसे स्वाभाविक इच्छा किसी पुरुष की हो सकती है -सिगरेट पीने ,शराब पीने , दोस्तों के साथ ट्रेकिंग पर जाने,अपने करियर मे श्रेष्ठतम मुकाम तक पहुँचने और उसके पीछे जुनून की हद तक पड़ने,या फ्लर्ट करने, या गाली देने, या लड़कियों को छेड़ने ,या गली के नुक्कड़ पर अपने समूह मे खड़े रहकर गपियाने ...............
ठीक इसी तरह ऐसे या इससे अलग बहुत सारी इच्छाएँ स्त्री की स्वाभाविक इच्छाएँ हैं जिन्हें करते आपने उन्हें अपने बन्द समाज मे नही देखा आज देख रहे हैं लेकिन स्वीकार नही कर पा रहे और स्त्री वैसा न करे कहते ही आप सिरे से यह नकारते हैं कि वह एक मनुष्य है,विचारवान है,वयस्क है,अस्मितावान है ....और वह जो जो चाहती है कानून और शिष्टाचार के दायरे मे रहकर वह सब करने की हकदार है भले ही वह आपको बुरा लगता है ।( यहाँ भी स्त्री के लिए शिष्ट और पुरुष के लिए शिष्ट की भेदक रेखाएँ खींची गयी हैं जो कि गलत है)



मान लीजिए आपके सामने लड़कियाँ ,स्त्रियों गालियाँ प्रयोग सहज हो कर कर रही हैं तो आप क्या केवल दुखी होकर ,क्या ज़माना आ गया है कहते हुए निकल जायेंगे ? या कान मूंद लेंगे?
मै चाह रही हूँ आप न कान बन्द करें , न दुखी हों , न दिल पर हाथ रखे ज़माने को कोसें ...
आप इसके कारणो को समझने का प्रयास करें और उन्हें दूर करने का प्रयास करें । मै चाहती हूँ कि आप लक्षणों का इलाज न करें । आप जड़ को खत्म करने का प्रयास करें । आपके कहे अनुसार जो घटिया विरासत पुरुषों के पास है उसे "घटिया" मानते हैं तो नष्ट भी कर दीजिए बजाए इसके कि उसकी तरफ न झाँकने से बेटियों,स्त्रियों ,लड़कियों को यह कह कर रोकते रहिए कि -यह तुम पर शोभा नही देता क्योंकि तुम लड़की हो।जड़ को खत्म करने के लिए गालियों को सबसे पहले अपने अभिव्यक्ति कोश मे से निकालना होगा। और शायद हम यह करने को तैयार नही हैं। क्यों?

माता-पिता कमरे मे बैठ कर वयस्कों का कार्यक्रम देख रहे हैं और बच्चे को लगातार कह रहे हैं -"तुम खेलो यह तुम्हारे लिए नही है!"
अगर आपको खुद पर नियंत्रण नही तो ,
बच्चा कब तक इस बात को सुनेगा कि यह तुम्हारे लिए नही है? जब तक वह समझदार नही होता,है न! फिर वह क्या देखना चाह्ता है ,करता है ,आपसे पूछेगा भी नही। सही है न!अब भी आप उसे यही कहेंगे कि मै तो ड्रिंक करता हूँ और जानता हूँ कि यह गलत बात है पर यह तुम्हारे लिए सही नही है तो क्या आपका 20 साल का बेटा मानेगा, मानेगा तो भी एक द्वन्द्व उसके मन मे चलता रहेगा, और आपकी इज़्ज़त कम होती रहेगी।

स्त्रियाँ जब तक पितृसत्ता के बस मे रहती है उसके लिए करणीय-अकरणीय के दायरे घर-समाज के पुरुष खींचते हैं।जब वह खुद सोचती समझती है और अपने दायरे खुद बनाती है तो इसे सराहने के बजाए बहुत आसानी से कह दिया जाता है कि वह होड़ करना चाहती है।

दर असल सब तभी तक खुश हैं जब तक स्त्री को घर-समाज-पितृसता "बनाती " है जैसा वह स्त्री को देखना चाहती है।
मेरे खयाल से इस बहस से सिर्फ इतना हासिल है कि हम यह अपनी बेटियों पर ही छोड़ दें कि वे अपने लिए क्या चुनें और चुनाव मे उनकी फ्रीडम को अपनी घरेलू,सामाजिक शिक्षा से प्रभावित करने की कोशिश न करें जो कि हम हमेशा करते आए हैं।इज़्ज़त और तमीज़ की दुहाई मे उनकी समझदारी और व्यक्तित्व को कुँठित न होने दें।आने वाले ज़माने की बेटियाँ अपने पिताओं की दोगली नीतियों की वे अच्छी खबर लेने वाली हैं यह जान लीजिए।अब वे आपकी ही खबर न लें इसके लिए आप उन्हें समझदार न बनने दें,जानकार न होने दें,बरगला कर रखें, तो यह बे ईमानी होगी, धोखा होगा।

Saturday, December 27, 2008

क्या भाषा और व्यवहार की सारी तमीज़ का ठेका स्त्रियों ,बेटियों ने लिया हुआ है?

दीप्ति ,माने लड़की, अपनी पोस्ट मे ऐसा शब्द कैसे इस्तेमाल कर सकती है? यह आपत्ति पितृसत्ता के किसी पैरोकार की ओर से आने वाली है मुझे भनक थी। अंशुमाली जी ने वहाँ कहा कि गालियों के प्रति भावनात्मक न बनें और उन्हें इंज्वाय करें।सही भी है , कि जब आप भाषा के इस भदेसपने पर गर्व करते हैं तो यह गर्व स्त्री के हिस्से भी आना चाहिए।और सभ्यता की नदी के उस किनारे रेत मे लिपटी दुर्गन्ध उठाती भदेस को अपने लिए चुनते हुए आप तैयार रहें कि आपकी पत्नी और आपकी बेटी भी अपनी अभिव्यक्तियों के लिए उसी रेत मे लिथड़ी हिन्दी का प्रयोग करे और आप उसे जेंडर ,तमीज़ , समाज आदि बहाने से सभ्य भाषा और व्यवहार का पाठ न पढाएँ। आफ्टर ऑल क्या भाषा और व्यवहार की सारी तमीज़ का ठेका स्त्रियों ,बेटियों ने लिया हुआ है?

तभी मैने वहाँ कमेंट में कहा था कि आप सभी के पाँवों तले ज़मीन खिसक जाएगी यदि स्त्रियों ने इन गालियों को इंज्वाय करना और इनके प्रति सहज होना सीख लिया।आप चाह्ते है कि गालियों का धाराप्रवाह प्रयोग वातावरण मे होता रहे और बेटियाँ सहज बनी रहें। यह सम्भव नही है। इसलिए यदि इनका प्रयोग बन्द नही करेंगे तो धीरे धीरे सहज होने के लिए वे भी प्रयोग शुरु कर देंगी और तब अहसास होगा कि गालियों के प्रति सहज होना किसे कहते हैं।अंग्रेज़ी मे ऐसे प्रयोग अब लड़कियाँ आम करने लगीं है।अंग्रेज़ी की गाली की खनक शायद कम सुनाई देती है।पर जब यह अपनी भाषा मे होगा तो सोचिए!
ब्लॉग लिखने से कम से कम उसे पढने वाले आप जैसे विचारवान लोग तो अपनी शब्दावली सुधर लेंगे और अपने बेटे ,दोस्तों आदि से भी कहेंगे।"साला" एक बेहद प्रचलित प्रयोग है जिसे आज मैं तक प्रयोग कर जाती हूँ क्योंकि वातावरण मे यह इतना घुला मिला है।सोचिए किसी बेहद क्रोध व उत्तेजना की स्थिति मे मै भैन ,यापा..आदि का भी प्रयोग कर सकती हूँ ..और यह इतना सहज हो जाए कि शायद मुझे पता भी न चले कि मेरे मुँह से ऐसा निकल गया है।फट गई,फाड़ दी, ले ली .. जैसे प्रयोग आज लड़कियों मे आम हैं....अपने मित्रों के बीच।शायद वे भी इंज्वाय करना सीख रही हैं।शायद उनकी अभिव्यक्ति भी श्लील-अश्लील के द्वन्द्व से मुक्त हो रही है।
मैं नही जानती कि बिन गाली जग सून होगा या नही पर बेटियों लड़कियों पत्नियों बहुओ को गाली देते सुनकर्
मुँह फाड़कर "हौ जी" करें यह आपके चरित्र का दोगलापन कहलाएगा।

Friday, December 26, 2008

मैं ऐंवे थोड़ी तेरे उत्ते मरदा नी ...



बहुत दिन से इस गाने ने परेशान किया हुआ था -

इक उच्चा लम्बा कद
नाले गोरी वी तू हद
उत्ते रूप तेरा चमचम करदा नी
...
मैं ऐंवे थोड़ी तेरे उत्ते मरदा नी ...

वैसे तो पॉप संगीत ने पंजाबी की काफी समझ लोगों में पैदा कर दी है तो भी कुछ शायद म्यूज़िक पर ही थिरकते होंगे इसलिए इन पंक्तियों का तर्जुमा कर ही देना चाहिए-
एक तो ऊँचा , लम्बा कद
उस पर से गोरी भी हद ,
और उस पर रूप तेरा चम चम करता है
मै ऐसे ही थोड़ी तेरे ऊपर मरता हूँ

आप कहेंगे कि इस गाने की लाइनें यहाँ हाइलाइट करने का मतलब क्या है ?अब चोखेर बालियाँ क्या नयनतारा बनने की होड़ करना चाहती हैं {जिसका आशय इस पोस्ट की दूसरी ही टिप्पणी में था ,भले ही पोस्ट को ठीक से समझे बिना दिया गया?}तो अब क्या चोखेर बाली पर ब्लीच , क्रीम , मेड ,फिगर की बातें हुआ करेंगी ?
ज़रा रुकिये !
जैसा कि पहले भी एक पोस्ट में कहा जा चुका कि यह मान लिया गया है कि “सुन्दरता किसी भी स्त्री का कर्तव्य है ” । सुन्दरता स्त्री के लिए ज़रूरी है ताकि कोई पुरुष उसे पसन्द कर सके । वर्ना यह कैसे होता है कि जो माता पिता बेटी को विवाह से पहले तक सजने सँवरने से मना करते हैं वही विवाह के लिए देखने आये लड़के के सामने उसे सजा-धजा कर पेश करते हैं।

जानती हूँ यह विचार भी प्रचलित है कि हर स्पीशिज़ मे सुन्दर दिखने की चाहत होती है फिर हम तो मनुष्य हैं। ठीक बात है। इसमे कोई दोराय नही हो सकती कि आप सुन्दर दिखना चाहें और उसके लिए कुछ प्रसाधनों और आभूषणो को धारण करें।
दिक्कत वहाँ पैदा होती है जब लड़कियाँ सुन्दर दिखने की चाहत इसलिए करने लगें कि वे किसी (या हर एक को)को पसन्द आएँ और वह उन्हें हासिल करना चाहे।यह एक प्रकार का वस्तुकरण है। लड़कियाँ इस पूरी व्यवस्था मे यह भूल जाती हैं कि उनका शरीर बाज़ार मे रखा कोई पण्य नही है जिसका उद्देश्य किसी और के आनन्द और मनोरंजन की सिद्धि करना है। यह शरीर उसके लिए भी इस दुनिया के तमाम सुखों और आनन्द को भोगने का माध्यम है यह वे भूल जाती हैं।दूसरी ओर लड़को मे भी यही धारणा बलवती होती है कि ये जो बने ठनी हमारे आगे घूमती दिख रही हैं इनके हँसने ,गाने, खेलने , उड़ने,मँडराने या सजने,सँवरने,विशेष पोशाक धारण करने का एक ही प्रयोजन है ....यह तो बस हमारे लिए है।ऊपर गाने मे भी हीरो सकारण बता रहा है कि मै यूँ ही तुम्हारे ऊपर नही मरता।तुम्हारे ऊपर मरने की वजह तुम्हारा मन,दिमाग,व्यक्तित्व नही है केवल रूप है!

एक ऑबजेक्ट मे तबदील होती लड़कियों और उपभोक्ता होते लड़कों की मानसिकता को बनाने मे हम सभी का कहाँ
कहाँ क्या योगदान है क्या हम कभी इस पर विचार करेंगे? कब कब माता-पिता ने चाहा कि लड़के वालों के आने से पहले लड़की फेशियल करा ले ,ब्लीच करा ले और सजी-धजी गुड़िया बन कर सामने आए ताकि कोई लड़का उसे पसन्द करे।

बॉलीवुड की संस्कृति जो सिखा रही है कि - आओ , मै ही सबसे सेक्सी हूँ ,मेरे साथ सेक्स करो ....के चलते कैसे इस पीढी की लड़कियों के एक बड़े हिस्से को वस्तु बनने से बचाया जा सकेगा ? नए उत्पादों की प्रदर्शनी मे सुन्दर बालाओं को साथ मे खड़ा रखने और इसमे गर्व महसूस करने से कैसे इन लड़कियों को रोका जा सकेगा ?
वे वाकई नही जानतीं कि वे एक ऐसी व्यवस्था के पंजे मे जकड़ी हैं जो उन्हें गुलाम बनाने के नित्य नए तरीके ईजाद कर रहा है। जब वे चूल्हे-चौखट तक सीमित थीं तब भी और अब जब वे देहरी के बाहर कामयाब होने निकलीं हैं तब भी धीमी धीमी ट्रेनिंग से वे गुलाम ,पण्य़ वस्तु ,एक मॉडल(जिसे दिमाग इस्तेमाल करने की इजाज़त नही , मधुर भंडारकर की "फैशन" में दिखाया गया कि मॉडल होना एक ऐसा प्रोफेशन है जिसमें आप केवल एक वस्तु हैं ,एक शरीर जिसे सोचने नही दिया जाता,और फिर जो धीरे धीरे सोचना बन्द कर देता है)एक उत्पाद में तब्दील की जा रही हैं। इस ब्रेन वॉश से अपनी लड़कियों को नही बचाया जा सका तो स्त्री-मुक्ति की हकीकत सदियों दूर हो जाएगी।

बार्बी और ज़ीरो फिगर मॉडलस को आदर्श मानने वाली लड़कियाँ अगर चिंतनशील हैं,विचारवान हैं ,अपनी अस्मिता के प्रति सचेत हैं,स्वयम को इनसान से वस्तु मे तबदील होने नही देना चाहतीं , तब शायद चिंता की बात नही ...पर क्या वाकई ऐसा है?मुझे नही लगता!

Friday, December 19, 2008

अब तोड़ने ही होंगे दुर्ग सब ,ढहाने ही होंगे मठ और गढ,करनी ही होगी शिखरों की यात्रा!


जमनालाल बजाज इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट ,मुम्बई से मैनेजमेंट डिग्री प्राप्त 46 वर्षीया चन्दा कोचड़ अब भारत के सबसे बड़े प्राइवेट बैंक ICICI की नयी सी. ई. ओ. होंगी। चन्दा आगामी वर्ष मई से बैंक के संरचनागत बदलावों की शुरुआत करेंगी।अब तक की सबसे पॉवरफुल व्यवसायी महिलाओं में चन्दा कोचड़ का नाम लिया जाता है।इससे पहले वे आई सी आई सी मे ही जॉइंट डायरेक्टर रह चुकी हैं।
उनकी सफलता व उपलब्धियों के कुछ प्रमाण --

Ranked 33th in the Fortune’s List of Most Powerful Women in Business, 2007
Ranked 37th in the Fortune’s List of Most Powerful Women in Business, 2006
Ranked 47th in the Fortune’s List of Most Powerful Women in Business, 2005
Awarded Business Woman of the Year 2005 by The Economic Times
Selected as Retail Banker of the Year 2004 (Asia-Pacific region) by The Asian Banker from amongst prominent retail bankers in the Asia Pacific region
Selected as ‘Rising Star Award’ for Global Awards 2006 by Retail Banker International

निश्चित रूप से कठिन परिश्रम और लगन से ही वे इस ओहदे तक पहुँची हैं। आर्ट्स मे बी ए करने के बाद उन्होंने एम बी ए की परीक्षा मे टॉप कर दिखाया और बतौर ट्रेनी ICICI जॉइन करने के बाद आगे ही बढती गयीं।

मै अभी सोच रही हूँ ,कि ऐसी खबरें हौसला बढाती हैं अवश्य ..लेकिन क्या उस समय हम यह भी सोच रहे होते हैं कि अपनी एक बेटी और एक बेटे को पालने पोसने के साथ साथ चन्दा कैसे यह सब कर पाती होगी?

गृहस्थ जीवन जीते हुए ,बिज़नेस वूमेन ऑफ थ यिअर अवार्ड लेने पर लाखों लोग चन्दा के लिए तालियाँ बजाते क्या केवल यही नही सोचते होंगे कि - देखो भई , घर ,बच्चे सम्भालते हुए भी इतनी सफल महिला है। बात काबिले तारीफ है।लेकिन वह कौन सा सपोर्ट सिस्टम है जिसकी वजह से चंदा किसी आम कामकाजी स्त्री की तरह ऑफिस खत्म होने से 5 मिनट पहले घर की ओर सर पर पैर रखकर नही दौड़ती ,कि देर हुई तो बच्चे को क्रेश से कौन लेगा? या क्लास खत्म कर नाक की सीध मे बच्चे के स्कूल उसे लेने नही पहुँच जाती कि देर हुई तो बच्चा बस स्टॉप पर अकेले खड़ा रहेगा? या कि देर रात आने पर उसे लोगों के चेहरे पहले रसोई की तरफ और फिर उसकी ओर उठते हुए नही दिखते ,और पति से यह कहने नही मिलता कि - बस का नही है तो छोड़ क्यों नही देतीं नौकरी ? अपना घर देखो ! पता है कल राहुल का एग्ज़ाम है?रितु का फ्लॉर डेकोरेशन कम्पीटीशन है ? माँ की तबीयत खराब है , बाबूजी की आँख का ऑपरेशन हुआ है और तुम्हें बिज़नेस से फुर्सत नही ?
बहुत सम्भव है कि यह सब चन्दा ने अनुभव भी किया होगा और विपरीत परिस्थितियों मे लड़ी भी होगी । यह भी सम्भव है कि वह सपोर्ट सिस्ट्म घर परिवार रहा हो , या आर्थिक सबलता रहा हो ।

मै जानना चाहती हूँ कि ऐसी सफल स्त्री ,गृहस्थ स्त्री ,व्यवसायी स्त्री ,कर्मठ स्त्री ....क्या आपकी नौकरी पेशा पत्नी,बहन,बेटी ...जैसी अभी है और जैसी आप उन्हें चाहते हैं कि वे रहें ....वैसी ही रहते हुए भी और हम सबके भी जैसे है वैसे ही रहते हुए भी .........वैसी स्त्री हो सकना सम्भव है ?? बाहर चुनौतियों के बढने के साथ क्या हम पत्नियों और बहनो बेटियों के लिए घर मे भी चुनौतियाँ बढा नही देते ? यदि हाँ ! तो चन्दा कोचड़ आपके -मेरे परिवार मे तो कैसे ही हो पाएगी भला!और अगर हुई तो निश्चित जानिए कि आपके बनाए ढांचो को ढहाए बिना नही हो सकेगी ! ढाँचे ढह जाने से आपका विद्वेष बढेगा और ईर्ष्या भी बढेगी और ऐसा समाज स्वस्थ समाज कैसे हो सकेगा जहाँ दोनो विपरीत
लिंगी सथियों के बीच ऐसा विद्वेष हो।
क्या मै इस निष्कर्ष पर पहुँच सकती हूँ कि सफलता की ऊंचाइयों पर पहुँचने के लिए एक स्त्री को समाज संरचनागत बहुत सी परम्पराएँ तोड़नी पड़ती हैं और दुर्ग ढहाने पडते हैं ? एक आम स्त्री के लिए यह संघर्ष तो बेहद दर्दनाक और कठिन होता है।
और क्या इसका मतलब यह है कि स्वयम को साबित करने और अपनी क्षमताओं से सर्वोत्तम प्राप्त करने मे पितृसत्ता अधिकांशत: स्त्री के खिलाफ ही खड़ी होती है ?
यदि ऐसा है तो निश्चित रूप से यह सफलता पुरुष की हासिल सफलता से कई गुना महत्वपूर्ण होती है । और यही कारण है कि ऐसी खबरें हमारे लिए सुर्खियाँ बन जाती है।

Tuesday, December 16, 2008

लड़की थी वह..

लड़की थी वह------

कड़ाकेदार सर्दी की वह रात थी. घर के सभी सदस्य रजाइयों में दुबके पड़े थे. दिन भर से बिजली का कट था जो पंजाब वासियों के लिए आम बात है. इन्वर्टर से पैदा हुई रौशनी में खाने पीने से निपट कर, टी.वी न देख पाने के कारण समय बिताने के लिए अन्ताक्षरी खेलते-खेलते सब सर्दी से ठिठुरते रजाइयों में घुस गए थे. दिसम्बर की छुट्टियों में ही हम दो तीन सप्ताह के लिए भारत जा पातें हैं. बेटे की छुट्टियां तभी होतीं हैं. दूर दराज़ के रिश्तेदारों को पापा घर पर ही मिलने के लिए बुला लेतें हैं. उन्हें लगता है कि हम इतने कम समय में कहाँ-कहाँ मिलने जायेंगे. मिले बिना वापिस भी नहीं आया जाएगा. हमारे जाने पर घर में खूब गहमागहमी और रौनक हो जाती है. बेटे को अमेरिका की शांत जीवन शैली उपरांत चहल-पहल बहुत भली लगती है. हर साल हम से पहले भारत जाने के लिए तैयार हो जाता है. दिन भर के कार्यों से थके मांदे रजाइयों की गर्माहट पाते ही सब सो गए. करीब आधी रात को कुत्तों के भौंकनें की आवाज़ें आनी शुरू हुई...आवाज़ें तेज़ एवं ऊंचीं होती गईं. नींद खुलनी स्वाभाविक थी. रजाइयों को कानों और सिर पर लपेटा गया ताकि आवाज़ें ना आयें पर भौंकना और ऊंचा एवं करीब होता महसूस हुआ जैसे हमारे घरों के सामने खड़े भौंक रहें हों.....
हमारे घरेलू नौकर-नौकरानी मीनू- मनु साथवाले कमरे में सो रहे थे. उनकी आवाज़ें उभरीं--
'' रवि पाल (पड़ौसी) के दादाजी बहुत बीमार हैं, लगता है यम उन्हें लेने आयें हैं और कुत्तों ने यम को देख लिया है ''
''नहीं, यम देख कुत्ता रोता है, ये रो नहीं रहे ''
''तो क्या लड़ रहें हैं''
''नहीं लड़ भी नहीं रहे ''
''ऐसा लगता है कि ये हमें बुला रहें हैं''
''मैं तो इनकी बिरादरी की नहीं तुम्हीं को बुला रहे होंगें''
बाबूजीकी आवाज़ उभरी---मीनू, मनु कभी तो चुप रहा करो. मेरा बेटा अर्धनिद्रा में ऐंठा--ओह! गाश आई डोंट लाइक दिस. तभी हमारे सामने वाले घर का छोटा बेटा दिलबाग लाठी खड़काता माँ बहन की विशुद्ध गालियाँ बकता अपने घर के मेनगेट का ताला खोलने की कोशिश करने लगा. जालंधर में चीमा नगर (हमारा एरिया)बड़ा संभ्रांत एवं सुरक्षित माना जाता है. हर लेन अंत में बंद होती है. बाहरी आवाजाई कम होती है. फिर भी रात को सभी अपने-अपने मुख्य द्वार पर ताला लगा कर सोते हैं.
उसके ताला खोलने और लाठी ठोकते बहार निकलने की आवाज़ आई. वह एम्वे का मुख्य अधिकारी था और पंजाबी की अपभ्रंश गालियाँ अंग्रेज़ी लहजे में निकल रहीं थीं. लगता था रात पार्टी में पी शराब का नशा अभी तक उतरा नहीं था. अक्सर पार्टियों में टुन होकर जब वह घर आता था तो ऐसी ही भाषा का प्रयोग करता था. उसे देख कुत्ते भौंकते हुए भागने लगे, वह लाठी ज़मीन बजाता लेन वालों पर ऊंची आवाज़ में चिल्लाता उनके पीछे-पीछे भागने लगा ''साले--घरां विच डके सुते पए ऐ, एह नई की मेरे नाल आ के हरामियां नूं दुड़ान-भैन दे टके. मेरे बेटे ने करवट ली--सिरहाना कानों पर रखा--माम, आई लव इंडिया. आई लाइक दिस लैंगुएज. मैं अपने युवा बेटे पर मुस्कुराये बिना ना रह सकी, वह हिन्दी-पंजाबी अच्छी तरह जानता है और सोए हुए भी वह मुझे छेड़ने से बाज़ नहीं आया. मैं उसे किसी भी भाषा के भद्दे शब्द सीखने नहीं देती और वह हमेशा मेरे पास चुन-चुन कर ऐसे-ऐसे शब्दों के अर्थ जानना चाहता है और मुझे कहना पड़ता है कि सभ्य व्यक्ति कभी इस तरह के शब्दों का प्रयोग नहीं करते.
दिलबाग हमारे घर के साथ लगने वाले खाली प्लाट तक ही गया था( जो इस लेन का कूड़ादान बना हुआ था और कुत्तों की आश्रयस्थली) कि उसकी गालियाँ अचानक बंद हो गईं और ऊँची आवाज़ में लोगों को पुकारने में बदल गईं --जिन्दर, पम्मी, जसबीर, कुलवंत, डाक्डर साहब(मेरे पापा)जल्दी आयें. उसका चिल्ला कर पुकारना था कि हम सब यंत्रवत बिस्तरों से कूद पड़े, किसी ने स्वेटर उठाया, किसी ने शाल. सब अपनी- अपनी चप्पलें घसीटते हुए बाहर की ओर भागे. मनु ने मुख्य द्वार का ताला खोल दिया था. सर्दी की परवाह किए बिना सब खाली प्लाट की ओर दौड़े. खाली प्लाट का दृश्य देखने वाला था. सब कुत्ते दूर चुपचाप खड़े थे. गंद के ढेर पर एक पोटली के ऊपर स्तन धरे और उसे टांगों से घेर कर एक कुतिया बैठी थी. उस प्लाट से थोड़ी दूर नगरपालिका का बल्ब जल रहा था. जिसकी मद्धिम भीनी-भीनी रौशनी में दिखा कि पोटली में एक नवजात शिशु लिपटा हुआ पड़ा था और कुतिया ने अपने स्तनों के सहारे उसे समेटा हुआ था जैसे उसे दूध पिला रही हो. पूरी लेन वाले स्तब्ध रह गए. दृश्य ने सब को स्पंदनहीन कर दिया था. तब समझ में आया कि कुत्ते भौंक नहीं रहे थे हमें बुला रहे थे.
''पुलिस बुलाओ '' एक बुज़ुर्ग की आवाज़ ने सब की तंद्रा तोड़ी. अचानक हमारे पीछे से एक सांवली पर आकर्षित युवती शिशु की ओर बढ़ी. कुतिया उसे देख परे हट गई. उसने बच्चे को उठा सीने से लगा लिया. बच्चा जीवत था शायद कुतिया ने अपने साथ सटा कर, अपने घेरे में ले उसे सर्दी से यख होने से बचा लिया था. पहचानने में देर ना लगी कि यह तो अनुपमा थी जिसने बगल वाला मकान ख़रीदा है और अविवाहिता है. सुनने में आया था की गरीब माँ-बाप शादी नहीं कर पाए और इसने अपने दम पर उच्च शिक्षा ग्रहण की और स्थानीय महिला कालेज में प्राध्यापिका के पद पर आसीन हुई. यह भी सुनने में आया था कि लेन वाले इसे संदेहात्मक दृष्टि से देखतें हैं. हर आने जाने वाले पर नज़र रखी जाती है. लेन की औरतें इसके चारित्रिक गुण दोषों को चाय की चुस्कियों के साथ बखान करतीं हैं. जिस पर पापा ने कहा था'' बेटी अंगुली उठाने और संदेह के लिए औरत आसान निशाना होती है. समाज बुज़दिल है और औरतें अपनी ही ज़ात की दुश्मन जो उसकी पीठ ठोकनें व शाबाशी देने की बजाय उसे ग़लत कहतीं हैं. औरत-- औरत का साथ दे दे तो स्त्रियों के भविष्य की रूप रेखा ना बदल जाए, अफसोस तो इसी बात का है कि औरत ही औरत के दर्द को नहीं समझती. पुरूष से क्या गिला? बेटा, इसने अपने सारे बहन-भाई पढ़ाये. माँ-बाप को सुरक्षा दी. लड़की अविवाहिता है गुनहगार नहीं.''
''डाक्टर साहब इसे देखें ठीक है ना'' ---उसकी मधुर पर उदास वाणी ने मेरी सोच के सागर की तरंगों को विराम दिया. अपने शाल में लपेट कर नवजात शिशु उसने पापा की ओर बढ़ाया-- पापा ने गठरी की तरह लिपटा बच्चा खोला, लड़की थी वह------
सुधा ओम ढींगरा( अमेरिका)

Saturday, December 13, 2008

उस स्त्री के बारे में तुम्हे कुछ नहीं कहना ?

करवट बदल कर सो गई
उस स्त्री के बारे में तुम्हे कुछ नहीं कहना!

जिसके बारे में तुमने कहा था
उसकी त्वचा का रंग सूर्य की पहली किरण से
मिलता है

उसके खू़न में
पूर्वजों के बनाये सबसे पुराने कुएँ का जल है

और जिसके भीतर
इस धरती के सबसे बड़े जंगल की
निर्जनता है

जिसकी आँखों में तुम्हें एक पुरानी इमारत का
अकेलापन दिखा था
और....जिसे तुम बाँटना चाहते थे
जो... एक लम्बे गलियारे वाले
सूने घर के दरवाजे पर खड़ी
तुम्हारी राह तकती थी!
--------




यह कविता मैं सन्ध्या गुप्ता के ब्लॉग से उठा लाई हूँ। कविता मे स्त्री विमर्श कैसे होता है सन्ध्या की कविताएँ इसका ताज़ा उदाहरण हैं।झारखंड की रहने वाली सन्ध्या गुप्ता के इस ब्लॉग पर मेरी दृष्टि आज ही गयी और पहली ही झलक मे अनंत सम्भावना भरी कविताओं की अनंत सम्भावनाएँ मुझे दिखाई दीं।उनकी कल की ही पोस्ट की हुई कविता दोराहे पर खड़ी लड़कियाँ मानों स्त्री विमर्श पर आधारित कईं लेखों का निचोड़ चन्द मामूली शब्दों मे बयां कर देती हैं।आप भी देखें---- http://guptasandhya.blogspot.com

Monday, December 8, 2008

इन्हें चांद चाहिए

राजकिशोर

अलोकप्रिय या अलोकप्रिय बना देनेवाली बात कहने से घबराना नहीं चाहिए, यह सिद्धांत 'हितोपदेश' से जरा आगे का है। प्रस्ताव यह है कि 'सत्य वही बोलो जो प्रिय भी हो' की नीति व्यक्तिगत मामलों के लिए तो ठीक है, पर सामाजिक मामलों में कटुतम सत्य बोलने की जरूरत हो तो संकोच नहीं करना चाहिए। इसी आधार पर स्त्रियों के यौन शोषण के एक तकलीफदेह पहलू की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। आशा है, मेरी नीयत पर शक नहीं किया जाएगा। लेकिन कोई शक करता भी है, तो मुझे परवाह नहीं है। यह लड़ाई सच की है और सच के मामले में निजी फायदा-नुकसान नहीं देखा जाता।

तो किस्सा यह है कि यौन शोषण के हर मामले में पुरुष ही सब तरह से दोषी नहीं होता। यह सच है कि पुरुष से भी हम वैसे ही संयम की उम्मीद करते है जैसे स्त्री से। किसी स्त्री की स्थिति का लाभ उठाना महापाप है। यह हर स्त्री जानती है कि वह जैसी भी है, पुरुष कामना का विषय है। भगवान ने उसे ऐसा ही बनाया है। यदि ऐसा नहीं होता, तो इस सृष्टि या जगत के जारी रहने में गंभीर बाधा आ जाती। यह स्त्री की शक्ति भी है। प्रेम या विवाह में स्त्री की इस शक्ति और पुरुष की कामना का सुंदर समागम होता है। स्त्री-पुरुष के साहचर्य में यह समागम केंद्रीय होना चाहिए। बाकी सब छल या माया है।

स्त्री पर भी इस छल या माया का आरोप लगाया गया है। अनेक मामलों में पाया गया है कि पुरुष ही स्त्री को प्रदूषित नहीं करता, स्त्री भी पुरुष को प्रदूषित करती है। यौन जीवन के सभी सर्वेक्षणों में यह तथ्य उजागर होता रहा है कि कई पुरुषों ने स्त्रीत्व का पहला स्वाद अपने से ज्यादा उम्र की भाभी, चाची या मामी से प्राप्त किया था। मैं यह नहीं कह सकता कि यह अनैतिक है। जो बहुत-से मामले नैतिक-अनैतिक के वर्गीकरण से परे हैं, उन्हीं में एक यह है। सभी मनुस्मति या भारतीय दंड संहिता को कंठस्थ करने के बाद जीवन के गुह्य पहलुओं का ज्ञान या अनुभव प्राप्त नहीं करते। संस्कृति के साथ-साथ प्रकृति के भी दबाव होते हैं। संत वही है जो इस दबाव से मुक्त हो गया है। बाकी सभी लोग कामना और कर्तव्य के बीच झूलते रहते हैं तथा पारी-पारी से आनंद का सुख और ग्लानि का दंश महसूस करते हैं।

इसीलिए दुनिया में सच है तो धोखा भी है। कोई गुरु अपनी शिष्या को, मैनेजर अपनी अधीनस्थ कर्मचारी को और नेता अपनी अनुयायी को धोखे में रख कर यौन सुख हासिल करता है, तो वह इसलिए अपराधी है कि उसने अपनी उच्चतर स्थिति का नाजायज फायदा उठाया है। किसी अत्यंत पवित्रतावादी समाज में ऐसे अपराधियों को गोली से उड़ा दिया जाएगा। कुछ मामलों में सच्चा प्रेम भी हो सकता है, जिसका अपना आनंद और अपनी समस्याएं हैं, पर अधिकतर मामलों में किस्सा शोषण का ही होता है। माओ जे दुंग की सीमाहीन बहुगामिता का खुला रहस्य यही है। भारत में जनतंत्र है, पर यहां भी ऐसे किस्से अनंत हैं। यहां तक कि साधु, योगी, तांत्रिक और मठाधीश भी संदेह के घेरे से बाहर नहीं निकल पाते।

लेकिन ऐसी स्त्रियों की उपस्थिति से कौन इनकार कर सकता है जो अपने स्त्रीत्व के आकर्षण का अवसरवादी लाभ उठाती हैं? वे जानती हैं कि पुरुष की नजर में वे काम्य हैं और इस काम्यता का लाभ उठाने की लालसा का दयनीय शिकार हो जाती हैं। किसी को एमए में र्फस्ट होना है, किसी को, अपात्र होने पर भी, लेक्चररशिप चाहिए, कोई चुनाव का टिकट पाने के लिए लालायित है तो किसी को, परिवार की आय कम होने के बावजूद, ऐयाशी और मौज-मस्ती का जीवन चाहिए। किसी को टीवी पर एंकर बनना है, कोई फिल्म में रोल पाने के लिए बेताब है, कोई अपनी कमजोर रचनाएं छपवाना चाहती हैं, किसी को जल्दी-जल्दी प्रमोशन चाहिए तो कोई लाइन तोड़ कर आगे बढ़ना चाहती है। कोई-कोई ऐसी भी होती है जो खुद पीएचडी का शोध प्रबंध नहीं लिख सकती और अपने प्रोफेसर-सुपरवाइजर से लिखवा कर अपने नाम के पहले डॉक्टर लिखना चाहती है। ज्यादा उदाहरण देना इसलिए ठीक नहीं है कि हमें समाज का बखिया उधेड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं है। पर यह जरूर याद दिलाना चाहते हैं कि जिस स्त्री शक्ति के परिणामस्वरूप ये सारी इच्छाएं आनन-फानन में पूरी की जा सकती हैं, उसी का राजनीतिक उपयोग करते हुए सामंती काल में सुंदर कान्याओं को विष का क्रमिक आहार देते हुए और उसकी मात्रा बढ़ाते हुए विषकन्या का करियर अपनाने के लिए बाध्य किया जाता था। आज भी जासूसी के काम में स्त्रियों को लगाया जाता है। जिस आकर्षण का दुरुपयोग वे राज्य के काम के लिए कर सकती हैं, उसका अनैतिक इस्तेमाल वे अपने अवैध स्वार्थों की पूर्ति के लिए क्यों नहीं कर सकतीं?

एक बात तो तय है। किसी भी स्त्री से उसकी सहमति के बगैर संबंध नहीं बनाया जा सकता। बहुत-सी ऐसी स्त्रियां भी यौन हेरेसमेंट का शिकार बनाए जाने की शिकायत करती हैं जिन्होंने यह हरेसमेंट काफी दिनों तक इस उम्मीद में सहन किया कि उनका काम हो जाएगा। जब काम नहीं बनता, तो वे शिकायत करने लगती हैं कि मेरा शोषण हुआ है या मुझे परेशान किया गया है। मुझे रत्ती भर भी संदेह नहीं कि ऐसे मामलों में भी पुरुष ही अपराधी है। लेकिन यह सोच कर कम दुख नहीं होता कि कि हमारी बेटियां-बहनें इस जाल में अपनी मर्जी से दाखिल ही क्यों होती हैं। 'हम प्यार में धोखा खा बैठे' -- यह एक स्थिति है। दूसरी स्थिति यह है कि यह धोखा जान-बूझ कर खाया गया, क्योंकि नजर कहीं और थी। यह एक ऐसा मायावी संबंध है, जिसमें दोनों शिकार होते हैं और दोनों ही शिकारी।

कुल मिला कर स्थिति बहुत ही पेचीदा है। पुरुष की ओर से पेच ज्यादा हैं, पर कभी-कभी स्त्री भी पेच पैदा करती है। यह सच है कि अपने स्त्रीत्व का शोषण करनेवाली स्त्रियों की संख्या एक प्रतिशत भी नहीं होगी, पर यह धारणा गलत नहीं है कि एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है। यहां मामला तालाब को गंदा बनाने की नहीं, उसकी छवि बिगाड़ने का है। इसलिए 'सब धान तेइस पसेरी' का सोच एकांगी है। फिर भी, स्त्रियों का दोष कम करके आंका जाना चाहिए, क्योंकि वे जन्म से ही अन्याय और भेदभाव का शिकार होती हैं तथा अनुचित तरीके से अवैध लाभ हासिल करने के लालच में पड़ जाती हैं। ये अगर चांद की कामना न करें, तो इनकी गरिमा को कौन ठेस पहुंचा सकता है?

Saturday, December 6, 2008

कहीं कोई संदिग्ध व्यक्ति या वस्तु दिखे तो टेरर हेल्पलाइन 1090 पर फोन करें

अगर कहीं कोई संदिग्ध वस्तु दिखे तो हम आम तौर पर पुलिस को 100 नंबर पर फोन करते हैं। लेकिन इससे भी प्रभावी जगह अपनी आशंका को पहुंचाना हो, ताकि आतंकवाद की किसी संभावित घटना के खिलाफ सटीक कार्रवाई हो सके तो ऑल इंडिया टेरर हेल्पलाइन नंबर पर फोन करना ज्यादा कारगर होगा।

ऑल इंडिया टोल फ्री टेरर हेल्पलाइन नंबर है- 1090। खास बात यह है कि देश में हर जगह यह नंबर कारगर है। इस पर मोबाइल से भी फोन किया जा सकता है। खास बात यह है कि इसमें फोन करने वाले की पहचान छुपाने की भी व्यवस्था है।

अगर कहीं भी, कभी भी आपको आतंकी गतिविधि का अंदेशा हो तो इस नंबर '1090' पर तत्काल फोन करें। स्थानीय पुलिस या टेरर स्क्वाड तक खबर पहुंच जाएगी। क्या पता एक फोन भर से कोई संभावित बुरी घटना टल जाए!

Thursday, December 4, 2008

विश्व ऐड्स दिवस - 1 december







आज मैंने उत्तरखंड राज्य ऐड्स नियंत्रण समिति और उमा द्वारा आयोजित वर्कशॉप में भाग लिया ...जन जागरण में महिलाओं की भूमिका पर , उनके अहम् रोल पर चर्चा की गई AIDS जैसे खतरनाक बीमारी की कैसे रोकथाम की जा सकती है .....Prevention is better than cure......Awareness के लिए युवा वर्ग और महिलाएं आगे आयें और समाज को एक मजबूत दिशा दें ....

Tuesday, December 2, 2008

अब डर कैसा


मुझे अब अपनी मां के पास रहते एक साल होने को है । ससुराल वालों ने मेरी कोई खबर नहीं ली । भाभी जिन्होंने अपने भाई के साथ मेरी शादी करवाई, वैसे तो मेरे जीवन में कोई रूचि नहीं लेती और मैं अपने तथाकथित पति के बारे में पूछूँ तो उनका एक ही जवाब मिलता । मैं चुपचाप अपने ससुराल चली जाउं, इसी में मेरी भलाई है ।

पिछ्ले एक साल से मां के आंचल का साया और स्नेह मिला तो बहुत सी ऎसी सच्चाइयों को मैं समझ सकी जो ससुराल में रहते मैं नहीं समझ पाई थी । शादी करते समय तो मेरे मन बस कुछ कच्चे और भोले सपने थे, जिनका जिंदगी की सच्चाई से कभी आमना-सामना ही नहीं हुआ था। बचपन से ही इकलौती, विकलांग, शारीरिक रूप से कमजोर और बिन बाप की औलाद होने के कारण मां अतिरिक्त वात्सल्य, शायद सदा मेरा सुरक्षा कवच बना रहा।

मेरी डोली ससुराल पहुँची तो साथ ही साथ भाभी भी । आखिर उनके सगे भाई की शादी हुई थी और रिश्ता भी उन्होंने ही करवाया । ससुराल में पहली रात मैं उन भाभी के साथ ही सोयी। एक महीना भाभी मायके में रही और मुझ पर अपना स्नेह बरसाते हुए रोज़ मेरे साथ ही सोती थी । उनका यह स्नेह अचानक चिढ़ में बदल जाता जब मैं अपनी माँ से बात करने के लिए कहती । वे कहती अब अपनी माँ को अकेले रहने की आदत डालने दे । माँ का फोन आता तो भी सब मेरे सामने ही बैठ जाते कि पता चले मैं अपनी माँ से क्या बातें कर रही हूँ । संकोचवश मैं सिर्फ हां हूं करती रहती । इसी तरह जब भी मैं सुमित के साथ अकेली होती तो भाभी कहीं न कहीं से टपक पड़ती । मुझे छेड़ने लगती। किसी न किसी बहाने से मुझे या सुमित को अपने साथ ले जाती । मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि भाभी आखिर चाहती क्या हैं । एेसा तो मैने अपनी किसी भी सहेली से न सुना था कि शादी के तुरंत बाद पति अपनी पत्नी के साथ रहनेसोने को इच्छुक ही न हो। दो एक दिन बाद मैने भाभी से डरते और शर्माते हुए पूछा, तो उन्होंने कहा कि सुमित बहुत थक सा जाता है । वह तुम्हारी मां की तरह कोई सरकारी बाबू तो है नहीं कि बैठे बैठे काम करते रहे । और फिर तुम्हारी रीढ़ की हड्डी टेढ़ी होने के कारण तुममें वैसा तीव्र आकर्षण भी तो नहीं है। तुम्हारे भैया ने तो शादी के बाद महीने दो महीने मुझे एक पल को भी अकेला न छोड़ा था । कोई उन्हें बुलाता तो भी पल दो पल में बहाना बना कर फिर मेरे पास लौट आते । लेकिन तू चिंता न कर मैंने सुमित को सब समझा दिया है । तुझे मेहनत कर ससुराल में सबका दिल जीतना होगा । सब ठीक हो जाएगा । मैं सोचने लगी यह सब भाभी क्या कह रही हैं एेसा कुछ शादी से पहले या रिश्ते से पहले तो इन्होंने नहीं कहा । और मेरी विकलांगता कोई छिपी हुई बात तो थी नहीं , सुमित को पहले ही सब पता था। अब इन बातों का क्या मतलब ।

पति की मात्र दो हजार पगार (जो पहले भाभी ने चार पांच हजार बताई थी ) में अपनी गृहस्थी चलाने का मैने फैसला कर लिया था । भाभी के समझाने पर, मां को बिना बताए ही मैं अपनी डिग्रियों के ओरिजिनल प्रमाण पत्र भी कानपुर ले गई । नौकरी भी शुरू कर दी । 800 में छोटे से स्कूल में घर के पास ही । लेकिन शायद मेरे भाग्य में कुछ और ही लिखा था ।
अब मां के घर रहते हुए भी मानसिक तौर पर मैं अपने को स्वस्थ महसूस नहीं कर पा रही हूं । ससुराल से लगातार धमकी भरे फोन आ रहे हैं कि शराफत से लौट आओ नहीं तो अच्छा न होगा । मेरे ही नहीं , मेरे जिन जान पहचान के जो फोन नं. ससुराल वालो के पास हैं , उन सब के घर भी यही फोन आ रहे हैं कि लड़की को किसी तरह समझा कर भेज दिया जाए तो ही अच्छा है ।

अनुरोध --
अनुराधा और सुजाता का धन्यवाद देना चाहँगी कि उनकी बात पढ़कर मैं भी अपनी कहानी के सच को कह पाई । कहानी अभी बहुत लम्बी है, अपनी मानसिक हालत और अन्य कारणों से मैं अपना और अपने शहर का सच्चा नाम नहीं बता सकती, आगे भी बता पाउंगी या नहीं यह मेरे भविष्य पर निर्भर करता है। लेकिन अपनी पूरी कहानी कहकर , अपने भविष्य के बारे में क्या निर्णय लूं ,आपकी राय चाहती हूं । मैं भी आत्मसम्मान के साथ जीवन बसर करना चाहती हूं । मेरी तरह भारतीय समाज की और भी कई पीडि़त बेटियां होंगी, जिन्हें शायद अपनी कहानी कहने का मौका भी नहीं मिला । इसलिए अपनी मित्र के माध्यम से आप तक पहँच रही हूं । यह कहना तो शायद अतिशयोक्ति होगा कि इस समय मेरी हालत भी बम्बई की दहशत में फँसे लोगों की तरह है । लेकिन स्थिति गंभीर है।

क्योंकि

मरना मुश्किल है

लेकिन उससे भी ज्यादा मुश्किल है

पल पल, घंटों तक, कई दिनों तक, महीनों तक

और शायद सालों तक जीवन और मौत के बीत झूलते रहना ।

गुलामी में जीना मुश्किल है

लेकिन उससे भी ज्यादा मुश्किल है
पल पल, घंटों तक, कई दिनों तक, महीनों तक
और शायद सालों तक, आजा़द कहलाते हुए भी निरंतर गुलामी करना।

उन्मुक्त गगन में क्षितिज पाना मुश्किल है

लेकिन उससे भी ज्यादा मुश्किल है

हर पल, घंटों तक, कई दिनों तक, महीनों तक

और शायद सालों तक आनंदमयी उड़ान की सफ़ल योजनाएं बनाना।

आज़ादी की जिम्मेदारी सफलतापूर्वक संभालना ।

Friday, November 28, 2008

आतंक के ४० घंटे

आतंक के ४० घंटे
पिछले ४० घंटों से देश की धडकनें तेज हैं, आम आदमी चिंताग्रस्त है । जो प्रत्यक्ष तौर पर मुम्बई में बचाव कार्यों से किसी भी रूप में जुडे हैं उनका तन मन आतंक से बहादुरी से जूझ रहे हैं, हम तक सूचनाएँ पहुँचा रहे हैं, हमारी हिम्मत पुरजोर बढ़ा रहे हैं। हम पिछले ४० घंटों से टी.वी. से चिपके परिस्थितियों के सकारात्मक दिशा में बढ़ने की बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं । रोजमर्रा के काम करते हुए भी हमारे मन प्राण उस घटना के तारों से जुडे़ हुए हैं । भीतर की सारी मानवीय भावनाआें को कुचल कर ये किशोर युवा आतंकवादी शायद तमाशे का मज़ा लेने में लगे हैं कि वे कितने बडे़ नियंता बन गए हैं । दुनिया के जनसंख्या के लिहाज़ से दूसरे बड़े देश, एक अरब की आबादी वाले देश की भावनाएँ आज उनकी एक एक गतिविधि से संचालित हो रही हैं ।यह पूरा संसार इन किशोर युवा आतंकियों को शायद मिट्टी या मृत्तिका स्वरूप लग रहा है जिसके वे एकमात्र नियंता हैं । नियंता बनने के भावना हर बालक में होती है, बचपन के खेलों का वह अभिन्न हिस्सा होती है, हम सबको याद ही होगा । बचपन के उन खेलों को सही मार्गदर्शन मिल जाए तो हम सुंदर संसार का निर्माण कर उसके नियंता होने की कामना करते हैं आैर यही बचपन यही कुंठित दमित हो जाए तो भावनाएँ हिंसक हो उठती हैं, मौका लगते ही कुंठित दमित बचपन आतंकी युवा बन समाज का नियंता बनने का हर संभव प्रयत्न करता । सुनहरे भविष्य के लिए हमें आज के बचपन का भरसक सही पालन पोषण करना होगा, उनकी भावना के पंछियों को खुले आकाश की उदारता से परिचय करवाना ही होगा ।दहशत की इस रात की जल्दी ही सुबह हो, देश के साहसी सपूत जो निस्वार्थ बलिदान दे रहें है, उनको मेरी अश्रुपूरित भावभीनी श्रद्धांजलि । हर कोई शक्तिभर प्रयास करे, सफलता अवश्य मिलेगी ।

Thursday, November 27, 2008

थर्रातें मुंबई की इन ललनाओं को सलाम

- श्रुति अग्रवाल

कल रात दस बजे से निगाहें टीवी पर टिकी थीं। इस बार आतंकवादियों ने देश की व्यावसायिक राजधानी मुंबई को, ताज होटल को नहीं बल्कि हमारे देश के मस्तक को निशाना बनाया । देश में लगातार आतंकी हमले हो रहे हैं राजनैतिक पार्टियाँ और खुद हम सभी नपुंसक बने हैं...दिल्ली के सीपी के बाद फिर एक बार देश के अर्थतंत्र को निशाना बनाया गया। दस बजे के बाद जैसे-जैसे घड़ी की सुई आगे बढ़ रही थी जज्ब़ा डूब रहा था। हर तरफ खून और लाशें दिखाई दें रहीं थी...घृणा और शर्मिंदगी के साथ।

अचानक नजर गई रिपोर्टिंग कर रही एक नई पत्रकार पर। उन्नीस-बीस साल की यह युवती हर तरफ बिखरे खून को देख घबराने की जगह सही खबर पहुँचाने में लगी थी...कभी पुलिस कर्मियों से ताज होटल के कुछ नजदीक जाने की अनुमति माँगते तो कभी लाइव करते हुए सही खबर जनता तक पहुँचाने की जद्दोजहद से दो-चार होती। चैनल बदले...एनडीटीवी हो या आजतक, जी न्यूज हो या सहारा या फिर आईबीएन सेवन हर तरफ कमोबेश यही स्थिति थी...लड़कियाँ, वरिष्ठ पत्रकार महिलाएँ सभी अपनी जगह मोर्चा संभाले देखी जा रही थीं...

और यह सिलसिला जो रात दस बजे शुरू हुआ वह पूरी रात बल्कि भोर के उजाले तक लगातर चलता रहा। कुछ पल के लिए ही सही लेकिन गर्व की एक अनुभूती हुई कि अब मैदान में एक नहीं कई बरखा दत्त हैं। जो अंधाधुंध चलती गोलियों, फिदायी हमलों के बीच अपनी जान की परवाह न करते हुए यहाँ वहाँ बिखरे खून और लाशों से विचलित होने की जगह अपना काम कर रहीं थीं।

आप ही सोचिए क्यों हमें अबला कहा जाएँ? हम लड़कियाँ तो चंड़ी का अवतार बन सकती हैं। मैंने खुद कई आदमियों को मरच्युरी में जाने से बचते देखा है... सड़ी-गली लाशें देखने के बाद उबकाई लेते देखा है। जबकि ये महिला पत्रकार हर विपरीत परिस्थिति में अपनी जिंदगी की परवाह करे बिना घटना कवर करती नजर आईं। उन रूढ़ियों को तोड़ती नजर आईं कि लड़कियाँ तो काकरोच, छिपकली से डर जाती हैं। जरा सी विपरीत परिस्थिति हुई नहीं कि गश खाकर गिर जाती हैं, आदि।

मेरी हर माँ से गुजारिश है कि वें हर मोर्चें पर पुरषों से कंधा मिलाते चलती ही नहीं बल्कि दो कदम आगे बढ़ा रहीं इन ललनाओं को देंखे। अपनी बच्चियों में भी इसी तरह का जोश और जज्ब़ा भरने की कोशिश करें। क्योंकि आतंकवाद और नफरत के बीच से देश और दुनिया को अब सृष्टी की सृजनकर्ताएँ ही बचा सकतीं हैं...



श्रुति अग्रवाल खुद पत्रकार हैं। फिलहाल इंदौर में वॉइस ऑफ इंडिया में मालवा-निमाड़ संभाल रही हैं। इससे पहले भास्कर, सहारा समय, नईदुनिया-वेबदुनिया और बीबीसी लंदन(फ्रीलांस) में काम कर चुकी हैं।

य़ह आक्रोश, विरोध और दुख का चित्र है। कल/आज की मुंबई की और पिछली तमाम ऐसी घटनाओं के खिलाफ। इस चित्र को अपने ब्लॉग पोस्ट मे भी डालें और साथ दें । इस एक दिन हम सब हिन्दी ब्लॉग पर अपना सम्मिलित आक्रोश व्यक्त करे । चित्र आभार

इसके आगे, अब डर कैसा कथांश की दूसरी किश्त पढ़ना जारी रखें। ...

अब डर कैसा

अब डर कैसा
अब जब शुभ काम होना तय हो ही गया है तो सबने कहा कि कोई पंगा न करो । मेरा तो बहुत मन था कि मैं अपने कौशल भैया को भी कानपुर सगाई के लिए बुलाउं । लेकिन सब उनसे पूछे बिना ही कह रहे हैं कि वे अपने कामधंधे में व्यस्त हैं । उन्हें शादी पर बुला लेना । अभी उनकी मां को ही साथ ले चलते हैं । न चाहते हुए भी मैंने कहा चलो ठीक है । सगाई हो ही गई और उसके साथ ही नई समस्या ख़डी हो गई कि शादी कहां होगी । कानपुर शादी करवानी बहुत मंहगी पड़ेगी, इसलिए लड़के वाले चाहते हैं कि सहारनपुर में ही शादी हो जाए, लेकिन फिर सारी जिम्मेदारियां जो लड़केवालों की होती हैं वे भी मां पर ही आ पड़ेंगी । अंतत: मां ने ही सारी जिम्मेदारी ओढ़ ली । हम लड़कीवाले जो ठहरे। और कई तरह की अडचनों को पार करते हुए, शादी भी हो ही गई । खूब खुशियां मनाई गई भाभी को बड़ी वाहवाही मिली कि एक विकलांग लड़की की शादी करवाकर उन्होंने बड़े पुन्य का काम किया है । भाभी बहुत खुश थीं ।मैं सहारनपुर के स्टेशन पर अपने नए नवेले दुल्हे और सास के साथ खड़ी थी । द्रेन आ गई और मैं मां से अलग होकर अपने नए परिवार के साथ अपने को बैठा हुआ देखती हूँ । मन में एक टीस सी उठती है । हालात का ऐसा जादू कि मैं अपने पर भी उसी का नियंत्रण सा महसूस कर रही थी । मां से जाकर चिपक जाना चाहती थी लेकिन पैर जैसे जम से गए थे । गाड़ी चल पड़ी और मां की डबडबाती आँखें मेरे सीने में कहीं गड़ सी गईं । मैं गुमसुम सी खिड़की के पास बैठ गई और मेरा दुल्हा और सास सामने बैठे कभी कनखियों से मुझे देखते और कभी आपस में कुछ धीमे धीमे बात कर लेते । मैं उदास तो थी लेकिन यह भी चाह रही थी कि किसी से बात करूं या कोई मुझसे ही बात कर ले । लेकिन नई दुल्हन का संकोच कैसे छोडती । पूरा सफर चुप रहकर ही काटना पड़ा । जाने कब आँख लग गई और जागी तो गाड़ी से उतरने की गहमागहमी में मैंने अपने को भी कानपुर स्टेशन के प्लेटफार्म पर खड़े पाया । आटो में अपना सारा साजो सामान रख मैं अपने नए परिवार के साथ अपने नए घर पहुँची । सुबह का मौसम ठंडक भरा था । नमी और ओस की ठंडक भरी हवा से मेरा समूचा शरीर कांपने सा लगा । लेकिन नए रिश्ते की गर्मी ने तन मन दोनों से मौसम की ठंडक के एहसास को गायब सा कर दिया । इस तरह मैं आई थी तुम्हारे घर नई नवेली दुल्हन बन कर ।इन सब बातों को बीते अभी दो ही साल हुए होंगे लेकिन, मुझे ऐसा लग रहा है मानो अरसा बीत गया । मुझे तो ऐसा लग रहा है ये मानो मेरा तीसरा जन्म है । पहला जन्म शादी से पहले, दूसरा शादी के बाद और तीसरा अब जब जिंदगी फिर एक बार रिश्तों को नए सिरे से समझने को मज़बूर है। मैने तो हर संभव कोशिश की । मां से छुप छुप कर बहुत से समझौते किए । लेकिन अपनी जिंदगी खोकर तो मैं यह रिश्ता नहीं निभा सकती थी । साल भर ससुराल में रहने और हर तरह से वहां की जिंदगी में ढलने की कोशिश करते करते मुझे पता ही नहीं चला कि कब बीमारी ने मुझे जकड़ लिया । मां ने जब सुना कि लगातार पंद्रह बीस दिन में बुखार चढ़ने की बात सुनी तो डाक्टर के पास ले गयी । पूरी जांच हुई ।खतरनाक हद तक ब्रोंकाइटिस और वजन मात्र २६ किलो डाक्टर भी देखकर हैरान कि आप जी कैसे रही हैं । मां ने ता ठान लिया कि अब चाहे कुछ हो जाए । मैं अपनी बेटी को दोबारा मरने के लिए ससुराल नहीं भेजने वाली । उन्हें अपनी उस भांजी की याद हो आई जो गर्भावस्था में अपनी मां, अपने भाई और पिता से सहायता मांग थक गई लेकिन सबने उसे ससुराल वालों की जिम्मेदारी समझ उसके हाल पर ही छोड़ दिया ।

Wednesday, November 26, 2008

सबसे खतरनाक होता है

'पाश'(अवतार सिंह संधु)

अर्चना की कविता त्रासद पढ़ने के बाद बेसाख्ता पाश की यह मशहूर कविता याद आ गई और मैं सबको फिर एक बार इसे पढ़वाने से खुद को रोक नहीं पा रही हूं। मुझे अंदाज़ा है कि त्रासदी कविता को यहां पर आए कुछ ही घंटे हुए हैं और उस पर सबसे खतरनाक... को चेप कर मैं उसके साथ न्याय नहीं कर रही। फिर भी...। उम्मीद है, सब इस जानदार कविता को पढ़ने के बाद आप मुझे इस हिमाकत के लिए माफ करेंगे।

मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती,
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती,
गद्दारी, लोभ का मिलना सबसे खतरनाक नहीं होता,
सोते हुये से पकडा जाना बुरा तो है,
सहमी सी चुप्पी में जकड जाना बुरा तो है,
पर सबसे खतरनाक नहीं होता,

सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शान्ति से भर जाना,
न होना तडप का सब कुछ सहन कर जाना,
घर से निकलना काम पर और काम से लौट कर घर आना,
सबसे खतरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना ।

सबसे खतरनाक होती है, कलाई पर चलती घडी, जो वर्षों से स्थिर है।
सबसे खतरनाक होती है वो आंखें जो सब कुछ देख कर भी पथराई सी है,
वो आंखें जो संसार को प्यार से निहारना भूल गयी है,
वो आंखें जो भौतिक संसार के कोहरे के धुंध में खो गयी हो,
जो भूल गयी हो दिखने वाली वस्तुओं के सामान्य
अर्थ और खो गयी हो व्यर्थ के खेल के वापसी में ।

सबसे खतरनाक होता है वो चांद, जो प्रत्येक हत्या के बाद उगता है सूने हुए आंगन में,
जो चुभता भी नहीं आंखों में, गर्म मिर्च के सामान
सबसे खतरनाक होता है वो गीत जो मातमी विलाप के साथ कानों में पडता है,
और दुहराता है बुरे आदमी की दस्तक, डरे हुए लोगों के दरवाजे पर ।

त्रासद

इतना त्रासद नहीं है
तमाम उम्र ढूढ़ते रहना
सपने के उस पुरूष को
जिसे तराशा था आपने तब
जब आपने सपने देखने की
शुरुआत की थी।

त्रासद यह भी नहीं
कि उम्र के एक मोड़ पर आकर
वह आपको दिखे तो जरूर
पर आपको देख न पाये।

त्रासद यह भी नहीं है
कि सपनों का वह पुरूष
दौपदी की चाहत की तरह
अलग-अलग पुरुषों में मिले।

त्रासद तो ये है
कि जिसे आपने कभी चाहा ही नहीं
उससे यह कहते हुए तमाम उम्र गुजारना
कि तुम ही तो थे मेरे सपनों में।

अर्चना की कविता ऊब और दूब से साभार

समाधान सतत जागृत रहने से ही संभव

समाधान सतत जागृत रहने से ही संभव
महिलाओं और बच्चों के लिए वयस्क समाज अक्सर संवेदनशील नहीं होता । उनकी इच्छाओं और सोच को परिवार की निर्णय लेने वाली इकाई किसी गिनती में ही नहीं लाते । इसी का परिणाम है चाहते न चाहते, जाने अनजाने उन पर अत्याचार । परिवार ही नहीं समाज की अन्य इकाइयों में भी हम देखते है चाहे स्कूल में बच्चे हों या फिर आफिस में काम करने वाली सामान्य स्तर की महिला कर्मी दोनों की ही बात नहीं सुनी जाती । हमेशा दूसरों द्वारा लिए गए निर्णय ही उन पर लादे जाते हैं । जो भी अधिकार की कुर्सी पर बैठा है वह अक्सर ही बिना हालात की गहराई को समझे अपनी सोच समझ और साथ ही अंहकार के चलते निर्णय लेता है । अधिकार की कुर्सियों पर जब तक जाति, लिंग, धर्म, धन या अन्य किसी भी अहंकार को लेकर मनुष्य बैठेगा, या जब तक मनुष्य बनकर मनुष्य नहीं बैठे और निर्णय लेगा तब तक अन्याय होता ही रहेगा ।

Saturday, November 22, 2008

उस भयानक हरकत को रोकना होगा, घंटी बजानी ही होगी


"मां भी शादी के बाद गृहस्थी का और पति का सुख नहीं देख पाई बस संतान सुख या कहो दुख मुझ विकलांग बच्ची के रूप में उन्होंने पाया । बड़ी मुशि्कल से जान बचाकर वह ससुराल से वापस सहारनपुर आ सकी । मैं जब गर्भ में थी तो उनके ससुर ने उन्हें इतना मारा कि उसका फल विकलांगता के रूप में मैं जीवन भर भोग रही हूं । मम्मी की भी रूह कांप जाती है जब कोई उन्हें वही सब याद दिलाकर मेरी शादी न करने की सलाह देता है।"

इसी ब्लॉग की पोस्ट अब डर कैसा की कुछ पंक्तियां मैंने यहां उतारी हैं। कहानी आगे किस दिशा में जाती है, यह तो आगे ही पता चलेगा, लेकिन कहानी को दिशा देने वाली इस घटना को मैं नजर-अंदाज नहीं कर पाई।

पिछले दिनों टीवी पर एक विज्ञापन देखा। एक आम निम्न-मध्यम वर्गीय मोहल्ले के मैदान में बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं। किसी के पैर में जूते नहीं हैं, तो कोई बड़े साइज की कंधे से ढलकती टी शर्ट संभालता फिर रहा है। पर सबमें जोश की कोई कमी नहीं। फिर ऐदान के तीन ओर फैले चॉल के एक कमरे से आदमी-औरत के झगड़े की आवाजें, चीखें आती है। आवाजों से समझ में आता है कि पुरुष शराब पी कर आया है और पत्न को मार रहा है। इन आवाजों से बैट्समैन बल्ले पर पकड़ ठोड़ देता है और गेंदबाज भी लड़खड़ा जाता है।

फिर दर्शक देखते हैं कि बच्चों की पूरी टीम खेल छोड़कर उस दरवाजे पर पहुंची हैं और घंटी बजा रही है। आदमी दरवाजे को आधा खोल कर झांकता है तो बच्चे गेंद का इशारा करते हैं। वह घर (कमरे) में जाता है और बाहर निकलता है। जाहिर हैं, उसे गेंद घर के अंदर नहीं मिली क्योंकि वह तो एक लड़के के हाथ में ही है जो उसे दादा टाइप अंदाज में उछाल रहा है।

फिर संदेश आता है- घरेलू हिंसा को रोको, घंटी बजाओ। पिछले कुछ समय में इतना प्रभावशाली विज्ञापन और स्लोगन, किसी सामाजिक बुराई को रोकने का इतना सरल लेकिन प्रभावशाली, तत्काल असर पैदा करने वाला खालिस देसी उपाय देखने में नहीं आया था।

महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा पर 2002 में हुए एक अध्ययन के मुताबक 45 फीसदी भारतीय पत्नियां अपने पतियों द्वारा मार-थप्पड़ से लेकर लात-घूंसों और किसी ठोस चीज से वार तक सहती हैं। गर्भावस्था के दौरान हिंसा झेलने में भारतीय पत्नियां दुनिया में अव्वल हैं। अध्ययन के मुताबिक हिंसा की रिपोर्ट दर्ज कराने वाली महिलाओं में से 50 फीसदी गर्भवती थीं। उन औरतों को कोई और सुरक्षित रास्ता नहीं दिखता, इसीलिए उनमें से 74.8 फीसदी आत्महत्या तक की कोशिशें करतीं हैं। अक्टूबर 2005 के संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 15 से 49 उम्र की 70 फीसदी शादीशुदा औरतें यानी हर तीन में से दो, घरेलू हिंसा सहती है। हालांकि मिस्र में यह संख्या 94, जांबिया में 91 फीसदी है। इसमें पिटाई, बलात्कार और असहज यौन-व्यवहार शामिल हैं।

घरेलू हिंसा से महिलाओं को बचाने के लिए अक्टूबर 2006 से भारत में डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट लागू है। फिर भी ऐसी घटनाओं में कोई कमी नहीं आ रही है। और दिलचस्प यह है कि औरत के खिलाफ शरीर की ताकत का इस्तेमाल दुनिया भर में हर देश, जाति, वर्ग, धर्म में समान रूप से होता आया है, थोड़े-बहुत फर्क के साथ। औरतों के खिलाफ हिंसा में पति-पत्नी के बीच झगड़े-फसाद के अलावा बालिका गर्भ का समापन, दहेज के लिए प्रताड़ना या हत्या, मानसिक और शारीरिक पीड़ा देना, वेश्यावृत्ति के लिए खरीद-बिक्री और लोगों के सामने अपमान भी शामिल हैं। घरेलू हिंसा का अर्थ सिर्फ मार-पीट, झगड़ा या बहस नहीं है। यह दरअसल ताकत का गलत इस्तेमाल है। धमकियां देकर, डर दिखा कर, और शारीरिक हिंसा के जरिए किसी को पीड़ा, यंत्रणा देना और उस पर नियंत्रण करने की कोशिश करना। इसकी पहली शिकार आम तौर पर महिलाएं होती हैं।

घरेलू हिंसा के बारे में अपने लोगों को कम उम्र से ही जागरूक बनाने और इसके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश होनी चाहिए। समाज भी औरतों के खिलाफ अत्याचार को परिवार का आंतरिक मसला मानकर नजरअंदाज न करे। औरतों को पता होना चाहिए कि अगर परिवार में ऐसी कोई घटना हो तो सहायता मांगने की जरूरत है न कि घटना को छुपाने की, क्योंकि यह गंभीर मामला है, परिवार की बेइज्जती से ज्यादा परिवार के भीतर औरत की बेइज्जती, असुरक्षा, उत्पीड़न का मसला है। हिंसा की शुरुआत हो, इससे पहले ही लोगों को बताया जाए कि यह गलत है, गैर-कानूनी है। इसे रोकने के लिए हम सब कोशिश कर सकते हैं। अगर हम अपने सामाजिक सरोकारों के प्रति सजग हैं, अपने घर-परिवार और पास-पड़ोस में घरेलू हिंसा को रोकना चाहते हैं तो एक घंटी तो बजा ही सकते हैं।

Wednesday, November 19, 2008

अब डर कैसा

बहुत लोग मना कर रहे हैं, कि ये शादी निभ नहीं पाएगी । अकेले ही मैं अच्छा जीवन जी पाउंगी ! घर गृहस्थी संभालना मेरे बस की बात नहीं । लेकिन मुझे लगता है कि कुछ तो एसी सलाह इसलिए दे रहे हैं कि मुझसे जलते हैं, कुछ शायद सचमुच भी मेरे लिए चिंतित हैं। कुछ एसे भी हैं जो मां के कारण मुझे भी शादी करने से मना कर रहे हैं । मां भी शादी के बाद गृहस्थी का और पति का सुख नहीं देख पाई बस संतान सुख या कहो दुख मुझ विकलांग बच्ची के रूप में उन्होंने पाया । बड़ी मुशि्कल से जान बचाकर वह ससुराल से वापस सहारनपुर आ सकी । मैं जब गर्भ में थी तो उनके ससुर ने उन्हें इतना मारा कि उसका फल विकलांगता के रूप में मैं जीवन भर भोग रही हूं । मम्मी की भी रूह कांप जाती है जब कोई उन्हें वही सब याद दिलाकर मेरी शादी न करने की सलाह देता है

मां इस बात से बहुत दुखी रहती हैं कि मैंने बचपनसे ही कभी ठीकठाक जीवन को न देखा न समझा । वो चाहती हैं कम से कम अब तो मैं जीवन को सामान्य सहज रूप में जी सकूं , जब एक मौका मिला है तो उसे छोड़ा क्यों जाए । क्या पता भगवान ने ही कुछ बेहतर जिंदगी मेरे लिए सोची हो, जीवन का नया रूप मुझे दिखाना हो । मां जब ससुराल से बचती बचाती मामा के घर पहुंची तो नानी के घर भी मेरे साथ मामा मामी या नानी के बर्ताव से मां खुश नहीं थी। मां भी इन सब बातों से कभी खीझती, कभी मुझे ही पीटने लगती, तो कभी ज्यादा ही दुलार बरसाने लगती । मैने भी जिंदगी से कभी ज्यादा उम्मीद ही नहीं की । सदा यही सोचा कि जिंदगी ऐसी ही होती है । लेकिन यह तो हमेशा लगता रहा कि मैं बाकियों से कुछ अलग हूं । मुझे बहुत कुछ नहीं करना चाहिए । पापा या डैडी के नाम पर मेरे पास बताने के लिए कुछ नहीं है । पर अब मम्मी कहती हैं कि सब कुछ ठीक हो जाएगा । इतनी मेहनत और जद्दोज़हद से मां ने अपनी शादी से पहले वाली सरकारी नौकरी पुन: हासिल की, छोटा सा ही, लेकिन अपना घर बना ही लिया, जहां मुझे और मां को कोई फालतू की बातें या ताने नहीं सुना सकता और पिछले सात आठ साल से हम दोनों मां बेटी सुकूल की जिंदगी जी रहे हैं । हालांकि मम्मी की बडी बहन और उनके बेटों ने हर दुख तकलीफ में हमें सहारा दिया । लेकिन अब हम अपने सहारे भरा पूरा जीवन जी ही रहें हैं । दीनहीन समझ कर तो कोई मेरा रिश्ता नहीं ही लाया होगा ।भाभी भी तो मुझे काफी प्यार करती हैं । जब से वो ब्याह कर कानपुर से सहारनपुर आईं हैं मैं ही तो उन्हें सब जगह ले जाती हूं । और किसी से वो कह भी नहीं पाती और भैया के पास ज्यादा समय होता नहीं । सहारनपुर के सारे बा़जा़र मैंने ही उन्हें दिखाये । एन.टी.टी भी हम दोनों ने साथ साथ ही की । भाभी से ज्यादा तो वो मेरी सहेली जैसी ही हैं । उन्होंने जरूर मेरे लिए अच्छा ही सोचा होगा। तो मां भाभी को मना नहीं कर पाई । सगाई की तारीख तय हो गई, सितम्बर में और शादी दिसम्बर में होगी ।सगाई में मेरे मुंहबोले भाई को बुलाने के लिए भाभी मना कर रही है । समझ नहीं आ रहा क्यों ?

झाड़ू-पोंछे से लेखिका बनने का सफ़र

नाम बहुत आम सा "बेबी हालदार" दुबली-पतली, सांवला रंग और इच्छायें शायद अनेकों लेकिन वक्त बेवक्त ये अहसास हो जाता आखिर गरीब आदमी की औकात ही क्या होती है और ऊपर से औरत कई लोग कहते हैं किस्मत थी और कई की, वो तो उसकी लगन और मेहनत ही थी की उस मुकाम तक आ पहुँची जहाँ शायद वो अपने सजीले सपनों में ही पहुँच सकती थी आज जहाँ है वहाँ उसे देख कई लोग हैरान हैं, कई परेशान और कई बेहद खुश वो एक प्रेरणा का स्रोत है और आदर्श भी उसके बच्चे आज गर्व से कहते हैं "माई मदर इस ए राईटर" ये तो सच ही है कोई चमत्कार नहीं जब इंसान कुछ करने की ठान ही लेता है तो कोई कैसे उसे रोक सकता है फिर वो कहावत भी तो सटीक है जब कोई कुछ दिल से करना चाहता है तो कुदरत भी खुद उसके लिये कई ऐसे रस्ते बुनती है जो उसके लिये मददगार सबित होते हैं खैर आईये मिलते है बेबी हालदार से मैं उनसे मिली नहीं लेकिन उनको पङा जरूर है फिर ख्याल आया आप सब भी तो जरूर मिलना चाहेगें और मिलकर जरूर खुश होंगे जैसे मैं हुई थी सो अपनी खुशी आप सभी से बांट रही हूँ
-----------------------------------
दूसरों के घरों में झाड़ू-पोंछा लगाने वाली एक नौकरानी का लेखक बन जाना किसी फ़िल्म की तरह कपोल-कल्पित कहानी लगती है. लेकिन यह चमत्कार सचमुच हुआ है और बेबी हालदार अब बाक़ायदा एक लेखिका हैं.

उनकी पहली किताब “आलो आंधारि” पिछले साल हिंदी में प्रकाशित हुई और अब तक उसके दो संस्करण छप चुके हैं। हाल ही में इसका बांग्ला संस्करण प्रकाशित हुआ है और इसका विमोचन सुपरिचित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने किया है.

“आलो आंधारि” छपने के बाद तो अड़ोस-पड़ोस में काम करने वाली दूसरी नौकरानियों को भी लगने लगा है कि ये उनकी ही कहानी है।बेबी हालदार अपने को “काजेर मेये” (काम करने वाली) कहती हैं.

29 साल पहले जम्मू-काश्मीर के किसी ऐसी जगह में उनका जन्म हुआ, जहां उनके पिता सेना में थे. अभाव और दुख की पीड़ा झेलती बेबी अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि अपनी किताब “आलो आंधारि” को मानती हैं.

पिछले दिनों वे छत्तीसगढ़ के बिलासपुर पहुँचीं तो आलोक प्रकाश पुतुल ने उनसे लंबी बात की।
बेबी हालदार की आत्मकथा सुनिए उन्हीं की ज़ुबानी -

पिता सेना में थे, लेकिन घर से उनका सरोकार कम ही था। सेना की नौकरी से रिटायर होने के बाद पिता बिना किसी को कुछ बताए, कई-कई दिनों के लिए कहीं चले जाते। लौटते तो हर रोज़ घर में कलह होता।

एक दिन पिता कहीं गए और उसके कुछ दिन बाद मां मन में दुख और गोद में मेरे छोटे भाई को लेकर यह कह कर चली गई कि बाज़ार जा रही हैं. इसके बाद मां घर नहीं लौटीं.
इधर पिता ने एक के बाद एक तीन शादियां कीं. इस दौरान मैं कभी अपनी नई मां के साथ रहती, कभी अपनी बड़ी बहन के ससुराल में और कभी अपनी बुआ के घर.मां की अनुपस्थिति ने मन में पहाड़ जैसा दुख भर दिया था.यहां-वहां रहने और पिता की लापरवाही के कारण पढ़ने-लिखने से तो जैसे कोई रिश्ता ही नहीं बचा था.

शादी और दुख
सातवीं तक की पढ़ाई करते-करते 13 वर्ष की उम्र में मेरी शादी, मुझसे लगभग दुगनी उम्र के एक युवक से कर दी गई.फिर तो जैसे अंतहीन दुखों का सिलसिला-सा शुरु हो गया.पति द्वारा अकारण मार-पीट लगभग हर रोज़ की बात थी. पति की प्रताड़ना और पैसों की तंगी के बीच ज़िल्लत भरे दिन सरकते रहे.एक-एक कर तीन बच्चे हुए.उसी क्रम में दो जून की रोटी की मशक़्कत के बीच पति का अत्याचार बढ़ता गया. अंततः एक दिन अपने बच्चों को लेकर घर से निकल गई. दुर्गापुर...फ़रीदाबाद...गुड़गांव. एक घर से दूसरे घर, नौकरानी के बतौर लंबे समय तक काम किया. नौकरानी के बजाय बंधुआ मज़दूर कहना ज़्यादा बेहतर होगा. सुबह से देर रात तक की हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी ख़ुशियों की कोई रोशनी कहीं नज़र नहीं आ रही थी.

प्रेमचंद के परिवार का सहारा
ऐसे ही किसी दिन मेरे एक जान-पहचान वाले ने मुझे गुड़गाँव में एक नए घर में काम दिलवाया. यहां मैंने पाया कि इस घर का हर शख़्स मेरे साथ इस तरह व्यवहार करता था, जैसे मैं इस घर की एक सदस्य हूँ.

बांग्ला में लिखी किताब पहले हिंदी में छपी
घर के बुजुर्ग मुखिया, जिन्हें सब की तरह मैं भी तातुश कहती थी, (यह मुझे बाद में पता चला कि इसका अर्थ पिता है) अक्सर मुझसे मेरे घर-परिवार के बारे में पूछते रहते. उनकी कोशिश रहती कि हर तरह से मेरी मदद करें.कुछ माह बाद अतिक्रमण हटाने के दौरान मेरे किराए के घर को भी ढहा दिया गया और अंततः तातुश ने मुझे अपने बच्चों के साथ अपने घर में रहने की जगह दी. इसके बाद दूसरे घरों में काम करने का सिलसिला भी ख़त्म हो गया. तातुश के घर में सैकड़ों-हज़ारों किताबें थीं. बाद में पता चला कि तातुश प्रोफ़ेसर के साथ-साथ बड़े कथाकार हैं. उनकी कहानियां और लेख इधर-उधर छपते रहते हैं. उनका नाम प्रबोध कुमार है. और यह भी कि तातुश हिंदी के सबसे बड़े उपन्यासकार प्रेमचंद के नाती हैं.

अक्सर किताबों की साफ़-सफ़ाई के दौरान मैं उन्हें उलटते-पलटते पढ़ने की कोशिश करती। ख़ास तौर पर बंगला की किताबों को देखती तो मुझे अपने बचपन के दिन याद आ जाते।

तातुश ने एक दिन मुझे ऐसा करते देखा तो उन्होंने एक किताब देकर मुझे उसका नाम पढ़ने को कहा। मैंने सोचा, पढ़ तो ठीक ही लूंगी लेकिन ग़लती हो गयी तो? फिर तातुश ने टोका तो मैंने झट से किताब का नाम पढ़ दिया-“आमार मेये बेला, तसलीमा नसरीन!” तातुश ने किताब देते हुए कहा कि जब भी फुर्सत मिले, इस किताब को पढ़ जाना।

फिर एक दिन कॉपी-पेन देते हुए तातुश ने अपने जीवन के बारे में लिखने को कहा. मेरे लिए इतने दिनों बाद कुछ लिखने के लिए कलम पकड़ना किसी परीक्षा से कम न था.

लिखने का सिलसिला
मैंने हर रोज़ काम ख़त्म करने के बाद देर रात गए तक अपने बारे में लिखना शुरु किया. आपबीती लिखना दुखों का सामना फिर करने की तरह था.पन्नों पर अपने बारे में लिखना ऐसा लगता था, जैसे फिर से उन्हीं दुखों से सामना हो रहा हो. तातुश उन पन्नों को पढ़ते, उन्हें सुधारते और उनकी ज़ेराक्स करवाते. लिखने का यह काम महीनों चलता रहा.

एक
दिन मेरे नाम एक पैकेट आया, जिसमें कुछ पत्रिकाएं थीं। अंदर देखा तो देखती रह गयी. अपने बच्चों को दिखाया और उन्हें पढ़ने को कहा. मेरी बेटी ने पढ़ा - बेबी हालदार! मेरे बच्चे चौंक गए-“मां, किताब में तुम्हारा नाम.” तातुश के कहानीकार दोस्त अशोक सेकसरिया और रमेश गोस्वामी ने कहा-ये तो एन फ्रैंक की डायरी से भी अच्छी रचना है. मैं अपनी कहानी लिखती गई॥लिखती गई.

फिर एक दिन एक प्रकाशक आए. वो मेरी किताब छापना चाहते थे. तातुश ने मेरी बंगला में लिखी आत्मकथा का पूरा अनुवाद हिंदी में कर दिया था. इस तरह मेरी पहली किताब छपी- “आलो आंधारि.” कोलकाता के रोशनाई प्रकाशन ने इस किताब को प्रकाशित किया है. कुछ ही समय में किताब का दूसरा संस्करण निकला... फिर इसका बांगला संस्करण.

इधर मैंने हाल ही में अपनी दूसरी किताब पूरी की है। अब मेरी बेटी बड़े गर्व के साथ मेरा परिचय देती है- माइ मदर इज़ अ राइटर इस किताब में “आलो आंधारि” के छपने के बाद मेरे जैसी नौकरानी के प्रति समाज के व्यवहार में आए बदलाव को केंद्र में रखा गया है। ज़ाहिर है, कल तक जो लोग मेरी तरफ़ देखते भी नहीं थे, वो अब मुझसे बात करने को लालायित रहते हैं।

हर रोज़ कई चिट्ठियां आती हैं। अंधेरे और उजाले की मेरी इस कहानी का कोई नाट्य रुपांतरण करना चाहता है, कोई किसी और भाषा में अनुवाद। कोई इसका काव्य रुपांतरण करना चाहता है तो कोई इस पर फ़िल्म बनाना चाहता है। पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में इस पर चर्चा हो रही है।

लेकिन मैं कोई लेखिका नहीं हूं, मैं तो अब भी एक काजेर मेये (काम करने वाली) ही हूं। मैं तो अब भी यह समझ नहीं पाती कि मेरी अपनी कहानी लोगों को क्यों इतनी पसंद आई। तातुश को पूछती हूं तो वो टाल जाते हैं।हां, कल तक मेरे बच्चे अपनी मां का परिचय देने में शरमाते थे।
मैं गुड़गाँव में ही रहती हूँ. अब मेरी बेटी बड़े गर्व के साथ मेरा परिचय देती है- माइ मदर इज़ अ राइटर.
----------------------------
मुझे उम्मीद है आप सब भी "बेबी हालदार" से मिलकर खुश हुये होगें

(इन्टरव्यू : बी।बी।सी। हिन्दी के सौजन्य से)

Friday, November 14, 2008

ज़ोर का झटका धीरे से लगे




Women work all the time .

Men put up signs whenever they work !

_____________________________________________________________________________________
what do men and women have in common ?

they both distrust men !

_____________________________________________________________________________________


scientists have just discovered something that can do the work of five men ...
....a woman !!
____________________________________________________________________________________

whats a mans idea of helping with the house work ?
-lifting his legs so you can clean the floor !
____________________________________________________________________________________

how many men does it take to change a toilet paper roll ?
Nobody knows ,it has never happened !
_____________________________________________________________________________________

How many men does it take to dirty up 12 pots while cooking a meal?

one .
____________________________________________________________________________________

Few women admit their age
Few men act theirs !!
_____________________________________________________________________________________
What would get your man to puT down the toilet seat ?

A sex change operation !!
_____________________________________________________________________________________

A woman without a man ......


:

:

is like a fish without a bicycle.
__________________________________________________________________________________

If a woman can cook ,
so can a man ,
:
:
Because a woman doesnt cook with her womb !!
------------------------------------------------------------------------------------

सन्दर्भ :
laughing matters
Kamla Bhasin and Bindiya Thapar
published by :
JAGORI
jagori@jagori.org

Thursday, November 13, 2008

रंग-भेद और महिलाओं की अलग जगह के खिलाफ गार्डिमर का अपने देश में स्वागत!

नादिन गॉर्डिमर दक्षिण अफ्रीका की श्वेत साहित्यकार हैं जिन्होंने अपने साहित्य और सामाजिक क्षेत्र में काम के जरिए रंगभेद की मुखालफत की है। आश्चर्य नहीं कि उनके 14 में से ज्यादातर उपन्यास कम या ज्यादा समय के लिए गुलाम द. अफ्रीका में प्रतिबंधित रहे, कोई 10 साल तो कोई 12 साल तक।

खास खबर यह है कि नोबेल पुरस्कार पाने वाली यह साहित्यकार और राजनीतिक कार्यकर्ता दो दिन के भारत दौरे पर हैं। आज दिल्ली और कल मुंबई में वे रहेंगी। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, भारत सरकार की नोबेल विजेता व्याख्यान श्रृंखला की दूसरी कड़ी के रूप में वे भारत आई हैं।

20 नवंबर 1923 को जन्मी गॉर्डिमर को औपचारिक शिक्षा नहीं के बराबर मिली। जोहानेसबर्ग की स्थानीय लाइब्रेरी ही उनकी शिक्षण संस्था थी। इसीलिए वे कहती हैं कि अगर उनकी चमड़ी का रंग काला होता तो वे साहित्यकार नहीं बन पातीं, क्योंकि उस लाइब्रेरी में अश्वेतों के आने की मनाही थी।

गॉर्डिमर के उपन्यासों के चरित्र आम जीवन से उठाए गए हैं। प्रेम और राजनीति में गुथे उनके पात्र चित्रण या कथन से नहीं, अपने फैसलों से अपना परिचय तय करते हैं। उनके चरित्रों के नाम भी अपने समय की एक पूरी कहानी कह जाते हैं।

गॉर्डिमर ने 1998 में ब्रिटेन के ऑरेंज ब्रॉडबैंड साहित्य पुरस्कार के लिए शार्टलिस्ट होने से भी मना कर दिया क्योंकि यह पुरस्कार सिर्फ महिलाओं के लिए है। और गॉर्डिमर का मानना है कि महिलाओं को अलग खंड में , अलग स्तर पर रखने से उनकी बेहतरी नहीं हो सकती। इसके लिए उन्हें पुरुषों के साथ बराबरी की प्रतियोगिता का मौका मिलना चाहिए। एक बाग नहीं, एक खेत नहीं हम सारी दुनिया मांगेंगे!

आइए अपने देश में स्वागत करें इस विलक्षण, जुझारू, अगले हफ्ते 85 की होने जा रही नोबेल विजेता साहित्यकार, एड्स कार्यकर्ता (खास बात ये है कि इस एकमात्र मोर्चे पर वे दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति मबेकी की विरोधी हैं), राजनीतिक विचारक नादिन गॉर्डिमर का।

साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार स्वीकार करते वक्त उनके दिल को छू लेने वाले, एकदम बेबाक-सच्चे शब्दों को पढ़ना हो तो यहां क्लिक करें

Monday, November 10, 2008

ये चोखेर बाली क्या चीज है यह नहीं जानता

2008/11/9 Rajeev Nandan Dwivedi
मैडम नमस्कार,
आप इतना अच्छा लिखती हैं, पर ये चोखेर बाली क्या चीज है यह नहीं जानता. यदि इस पर थोड़ा सा प्रकाश डालें तो...
प्रगतिशील विचारों वाली हैं आप, फ़िर ये आंखों की किरकिरी वाली बात नहीं समझ में आई.
अरे आगे आइये और सबकी सहायता कीजिये. सभी गिरे हुओं को ऊपर उठाइये. ये दूसरों को चुभने जैसा ब्लॉग का नाम क्यों चुना !
आपकी सोच तो समाज के पुनर्निर्माण में अत्यन्त ही सही और सहायक है फ़िर ये आंखों को कष्ट देने वाला नाम नहीं जंचता.
वैसे आपका ब्लॉग है आप जो चाहे करें पर मेरा मानना है की यह एक नए जागरण और उत्थान का द्योतक है अतः नाम भी कुछ ऐसा ही होना चाहिए था.
बिना मांगे सलाह दे रहा हूँ अतः माफ़ी चाहूंगा पर आपका लंबे समय से पाठक हूँ. अतः पराया नहीं हूँ मैं आपके लिए. अपना समझ कर सलाह दी है पर डर रहा हूँ की कहीं आप इसे अपना विरोध न समझ बैठें. :)
मैंने इतिहास पढ़ा है, शायद कुछ ज्यादा ही गहराई से.
आप का लेखन मुझे ' सम्राट अकबर ' की याद दिलाता है.
जिस प्रकार से उसने अपने काल में विरोधों का सामना कर के हिंदू-मुस्लिम भेद-भाव को दूर करने की कोशिश की थी उसी तरह आप भी स्त्री-पुरूष भेद को घटाने के साथ ही सही सोच को भी दृढ़ता से रख रही हैं. धन्यवाद.
आपके उत्तम लेखन के लिए आप को हार्दिक शुभकामनाएं,
आपका
ई-गुरु राजीव
Blogs Pundit
___________________

chokher bali to rajeev

राजीव जी,

आपका पत्र पाकर अच्छा लगा ।आप चोखेर बाली को निरंतर पढते हैं यह भी हमें उत्साहित करता है ।"सम्राट अकबर" से तुलना ज़्यादा बड़ी बात हो गयी है। अपना समझ सलाह देने का शुक्रिया ! किसी भी अन्य सामुदायिक या व्यक्ति ब्लॉग को इतनी सलाहें नहीं मिलतीं जितनी आज तक चोखेर बाली को मिली हैं । इसे सौभाग्य कहूँ या चोखेर बाली नाम की सार्थकता ! आपने कहा -आप सलाह देते डर रहे हैं । पर डरते डरते भी सलाह देने का लोभ सम्वरण नही कर पा रहे हैं ।कुछ पोस्ट्स आप पुन: पढें और राय दें कि यदि चोखेर बाली का नाम चोखेर बाली की जगह
प्रगतिशील नारी, नयनतारा , गृहशोभा ,सरिता या अनामिका या कुछ भी और होता लेकिन कंटेंट यही रहता तो भी क्या लोगों का रेस्पॉंस यही नही होता?
http://sandoftheeye.blogspot.com/2008/08/blog-post_25.html
http://sandoftheeye.blogspot.com/2008/07/blog-post_17.html
http://sandoftheeye.blogspot.com/2008/07/blog-post_09.html

अब यह भी कि यदि चोखेर बाली का नाम यही रहता और कंटेंट कुछ ऐसा होता
1.पति को रिझाने के 10 टिप्स
2.मुन्ने की सही मालिश के 5 तरीके
3.गर्मियों मे दिन का मेक अप कैसे करें
4.नारी अपने रिश्तों का निर्वाह कैसे करे
5.बॉस को कैसे संतुष करें
6,ऑफिस जाने के परिधान कैसे हों
7.दीवाली की साज-सज्जा ,सफाई कैसे करें
8.होली के पकवान
9स्वेअटर विशेषांक
10. महिलाएँ करियर कैसे चुनें
11.मेहन्दी रंग लाएगी - मेहन्दी के 25 डिज़ाइन
वगैरह ...........

तो आपका रेस्पॉंस क्या होता ? उपरोक्त बातें पितृसत्ता को चुनौती नहीं देतीं ,है न! और तब शायद तब चोखेर बाली सहज स्वीकार्य भी होता और स्तुत्य भी ,अपनी बहन- बेटी को इसे बांचने की सलाहें दी जातीं ।
खैर ,
चोखेर बाली नाम से आपकी आपत्ति हमारे लिए नई बात नही है,पहले दिन से इसे सुनते आ रहे हैं और चोखेर बाली की शुरुआत में जो सवाल चोखेर बाली के एजेंडा और वैचारिक आधार व प्रयोजन को लेकर उठे थे वे अब लगभग सभी को स्पष्ट हो चुके होंगे ऐसा मुझे प्रतीत होता है।
स्त्री का समाज मे जो स्थान और स्थिति है ,बहुत विचित्र है कि उसमे केवल सामाजिक-पारिवारिक अपेक्षाओं और वर्जनाओं के लिए स्थान है,अस्मिता और स्वतंत्र पहचान के लिए नहीं ...लीक से अलग हट कर चल सकने की तो बिलकुल नही । स्त्री को हमेशा बान्धने ,संजोने की भूमिकाएँ मिली और बिना एक आज़ाद चेतन इंसान हुए उन्हें निभाते चले जाने की सीख भी बचपन से ट्रेनिंग की तरह मिली। "न" शब्द स्त्री के शब्दकोश मे कभी डाला ही नही गया ।
इस लिए जब भी स्त्री ने "न" कहने का साहस किया , लीक से हटने की कोशिश की,स्वयम को एक स्वतंत्र -चिंतनशील प्राणी के रूप मे पहचानने और स्थापित करने का प्रयास किया समाज के पितृसत्ता-पोषकों ,चरित्र के ठेकेदारों ,धर्म के रखवालों {इनमे पुरुष और साथ ही पितृसतात्मक मानसिकता और संरचना मे ढली स्त्रियाँ भी हैं} को यह नागवार गुज़रा और बहकी स्त्रियों को तरह तरह से राह पर लाने और दण्डित किये जाने के लिए तरह तरह के उपाय किये जाने लगे ।वे स्त्रियाँ समाज की आँखों को खटकने लगीं ,उन्हें जल्द खत्म करने ,दबाने का प्रयास होने लगा वर्ना अपनी बहू बेटियों के बिगड़ने का डर था ।अपनी बहू बेटी का चिंतंशील होना माने अपने पैरों कुल्हाड़ी मारना । वे जवाब देतीं , आपके अन्याय व्यभिचार के खिलाफ आवाज़ बुलन्द करतीं ,अपनी इच्छा से शादी करतीं या ना करतीं ,आपकी सेवा न करतीं , पति को परमेश्वर न मानतीं ,परिवार व्यवस्था ढह जाती ,....और बहुत से भय ।इसलिए पूजा चौहान जब अर्द्ध्नग्नावस्था मे सड़कों पर उतर आयी अन्याय के खिलाफ तो शरीफ बहू बेटियाँ अन्दर कर दी गयीं और सड़कों पर पूजा के आजू बाजू केवल और केवल सभ्रांत मर्द ही दिखाई दे रहे थे।
तो यह जो आँख की किरकिरी हैं यह वो बदमज़ा औरतें है जो सड़ी गली व्यवस्था का पोषण करने के खिलाफ मानस तैयार करना चाहती है ,जो पितृसत्ता के सामने पितृसत्ता के खिलाफ लिखती है और यहाँ वहाँ कमेंट में .उपहास से ".......वालियाँ "कहीं जाती हैं। यह जो बदलाव की बात है यह आतंक की तरह छाई है ।आपने कमेंट्स मे लिखा देखा होगा सभ्य जनों से ----मार्कस्वाद को परिवार से दूर रखो ....परिवार को बचाओ ....घर से बाहर कदम निकालने वाली महिला का घर अस्त व्यस्त हो जाता है .....नौकरी करने वाली स्त्री नौकरानी है न किसी की माँ न किसी की पत्नी.. ।
सो चोखेर बाली ही वह नाम हो सकता था जो स्त्री मुद्दों से जुड़े हमारे -आपके -सबके विचारों को एक साथ वहन करने की क्षमता रखता है॥


सादर ,
सुजाता




और हाँ , केवल नाम ही चुभने जैसा होता तो कोई समस्या नही थी , दर असल बड़ी बात यह है कि चोखेर बाली का कथ्य भी चुभता हुआ ही है। क्या कीजियेगा , जब बात कड़वी है तो कड़वी लगेगी , उसे चासनी मे भिगो कर कैसे दे भला !
आपकी शुभकामनाएँ साथ हैं तो भविष्य के लिए आश्वस्त होने का एक कारण मिल सकता है !

सादर ,
सुजाता

Saturday, November 8, 2008

अब डर कैसा

2008

अब डर कैसा (कथांश)
मैं आई तुम्हारे घर, नई नवेली दुल्हन बनकर । कितने सारे सपने लेकर ! मैं विकलांग थी, शरीर से । सोचा भी नहीं था कि कभी शादी होगी । लेकिन मेरा स्वस्थ मन कहता रहता था, मेरी भी शादी होगी, मेरे भी सपनों का राजकुमार आएगा । और एक दिन यह सच भी हो गया, मेरे लिए भी न_नुकर करते करते एक रिश्ता आ ही गया । पहले भी कई लोग रिश्ते लेकर तो आए थे, लेकिन उनका मकसद रिश्ता जोड़ने से ज्यादा सहानुभूति दिखाना ही अधिक होता था और यह मां को बातों बातों में समझ आ ही जाता था । लेकिन इस बार बात कुछ अलग थी, रिश्ता बहुत ही नज़दीक की भाभी लाई थी, वो भी अपने भाई का । मां भी हैरान थीं । लेकिन बात टाल न सकीं । उनके मन में भी आशा की किरण जाग ही उठी । मैं भी अपनी बेटी को डोली बिठाउंगी, वह भी और लड़कियों की तरह ससुराल जाएगी । चलो मेरे जाने के बाद उसका ख्याल रखने वाला उसका अपना पति होगा । उसका भी अपना भरापूरा संसार होगा । वह भी मां बनेगी और भी जाने क्या क्या ।.......मैं भी भरपूर सोचने लगी । सपने बुनने लगी । भाभी यूं ही हवा में बात तो नहीं कर सकती , कुछ तो जरूर सोचा ही होगा तभी तो ये बात मां से सीधे सीधे कही है । पहले भी उनके भाई का एक बार उनके भाई का रिश्ता सुना था हो गया था, फिर पता नहीं चल पाया था कि कैसे वह टूट गया । इन्होंने तोड़ा या लड़की वालों की तरफ से तोड़ा गया । लेकिन उस बात को भी साल भर तो हो ही गया है, बहुत ढूंढ रहे थे कोई लड़की मिल ही नहीं रही । देखने में तो इनका भई सुमित सुन्दर नहीं तो ठीक ही है । उससे भी बुरी शक्ल वाले लड़कों की शादियां होते देखी हैं पर उसे पता नहीं लड़की क्यों नहीं मिली ? मुझसे एकाध बार भाभी के घर पर ही मिला भी, सब ठीक ही लगता है, हां बस कमाई कम है , लेकिन क्या कम कमाने वालों की शादी नहीं होती, अभी हमारे यहां तो एसी नौबत नहीं । शादी भी खूब हो जाती है और रिश्तेदार आगे गृहस्थी को भी लेदेकर चलवा ही देते हैं अपने ही मोहल्ले में कितने घर हैं जहां आदमी ज्यादा कमाते हो । ज्यादा तो औरतें ही कुछ न कुछ कर पति की इज्जत बचाने और गृहस्थी के खर्चे पूरे करने में जी तोड़ लगी रहती हैं । मैं भी कर ही लूंगी किसी तरह गुजारा । मां ने तो वैसे भी मुझे सब कुछ सिखाया ही है । सिलाई मुझे आती है, ब्यूटिशियन का काम मुझे आता है, खाना भी मैं अच्छा बना ही लेती हूं, प्राइमरी टीचर का कोर्स और नौकरी भी मैंने की ही हुई है । बस कुछ न कुछ तो हो ही जाएगा । बस बात बन जाए ।

Thursday, November 6, 2008

एक खबर का फॉलोअप

एक दिलचस्प खबर का फॉलोअप देखना और भी दिलचस्प है।

खबर ये है कि दिल्ली में विपक्ष के नेता जयकृष्ण शर्मा ने चंद दिनों पहले मेयर आरती मेहरा की जैकेट पर टिप्पणी की और फिर किसी और मुद्दे पर उन्हें 'औरत के नाम पर धब्बा' बताया।

इस पर आरती मेहरा ने कई जगहों, मंचों पर इस मुद्दे को उठाया है। राष्ट्रीय महिला आयोग को भी इसकी शिकायत भेजी। जवाब में उनसे 48 घंटे के अंदर जवाब मांगा गया है।

इतना सब होने के बाद जयकृष्ण शर्मा जी ने इस गैर-इरादतन गलती के लिए आरती जी से सार्वजनिक रूप से माफी मांगी है और कहा है कि वे उनकी बहन हैं।

लेकिन आरती जी ने तत्काल जवाब दिया कि वे 'ऐसे व्यक्ति की बहन नहीं बनना चाहतीं जिसने शराफत की हदें पार कर ली हों।'

अब शर्माजी को कल, शुक्रवार 7 नवंबर को दोपहर तीन बजे राष्ट्रीय महिला आयोग के समक्ष पेश होना है।

Wednesday, November 5, 2008

तेज़ाब का आतंक

आज सुबह
घर से निकलते झुकी थीं मेरी गर्दन और
सचेत निगाहें उठ जाती थीं रह रह कर
टोह लेने
आस पास
सड़्क पर चलते
मेरे छोटे भाई, हम उम्र साथी , पिता की उम्र के पुरुष
आज सभी मेरे
सन्देह के घेरे मे थे
सुरक्षित ,गंतव्य तक पहुँचना
था
कनखियों से ही
मुझ सी बहुत सी
सहमी लड़कियाँ दीख रही थीं
कल रात की

खबर सुनने के बाद
कि तेज़ाबी आदमी दिल्ली की सड़
कों पर निकल आया है
वह फेंकता है एसिड
लड़कियों पर ही

मुझे भय था
ज़्यादा
कि पगलाए चैनल की खबर
-"घर से अकेली निकली लड़कियों पर करता है हमला"
बहुत सी लड़कियों के
पिताओं का छीन लेगी चैन
भाई जाने नही देंगे
ट्य़ूशन भी पढने,
पहले भी करते ही थे मना
जिसके लिए
माओ बहनों बेटियों के चेहरे बिगड़ जाने की चिंता
और रोष
गहरा गया था

और खुद को बचाने की कोशिश मे
ज़िन्दगी बची नही रह जाएगी उन
लड़कियों के पास ।







http://nationalnewsofindia.blogspot.com/2008/11/another-acid-attack-in-delhi-one.html

------

Tuesday, November 4, 2008

"हम गुनहगार औरतें"

मेरी पसन्दीदा पाकिस्तानी कवयित्री किश्वर नाहिद की कविता



ये हम गुनहगार औरतें हैं
जो मानती नहीं रौब चोगाधारियों की
शान का

जो बेचती नहीं अपने जिस्म
जो झुकाती नहीं अपने सिर
जो जोड़ती नहीं अपने हाथ।

ये हम गुनहगार औरतें हैं
जबकि हमारे जिस्मों की फसल बेचने वाले
करते हैं आनंद
हो जाते हैं लब्ध-प्रतिष्ठ
बन जाते हैं राजकुमार इस दुनिया के।

ये हम गुनहगार औरतें हैं
जो निकलती हैं सत्य का झंडा उठाए
राजमार्गों पर झूठों के अवरोधों के खिलाफ
जिन्हें मिलती हैं अत्याचार की कहानियाँ हरेक दहलीज पर
ढेर की ढेर
जो देखती हैं कि सत्य बोलने वाली ज़बानें
दी गयीं हैं काट

ये हम गुनहगार औरतें हैं
अब,चाहे रात भी करे पीछा
ये आंखें बुझेंगी नहीं
क्योंकि जो दीवार ढाह दी गयी है

मत करो ज़िद दोबारा खड़ा करने की उसे ।




ये हम गुनहगार औरतें हैं
जो मानती नहीं रौब चोगाधारियों की
शान का
जो बेचती नहीं अपने जिस्म
जो झुकाती नहीं अपने सिर
जो जोड़ती नहीं अपने हाथ।

अनुवाद : माइकेल मोजेज़
पुस्तक: कहती है औरतें - सम्पादन -अनामिका
साहित्य उपक्रम
इतिहास बोध प्रकाशन ,इलाहाबाद

Monday, November 3, 2008

"गुलाबी गैंग"


पिछले दिनों दिवाली मनाने घर गये हुये थे अम्मा की सहेलियों के साथ गप्पों का सिलसिला आगे बडा और बातों बातों मे मालूम हुआ की बांदा जिले में "गुलाबी गैंग" महशूर है गुलाबी गैंग मैंने आश्चार्य से पूछा, ये क्या बला है भला? मालूम हुआ गुलाबी गैंग औरतों का गैंग है जो औरतों के लिये काम करता है और जिसकी लीडर हैं श्रीमती समंपत पाल देवी गुलाबी गैंग इसलिये है क्यों की गैंग में शामिल औरते गुलाबी साङी पहनती हैं, वे गाँव-गाँव जाकर औरतों से बात करती हैं, उन्हें आत्मनिर्भर बनने पर जोर देती हैं, औरतों को कैसे अपनी सुरक्षा करनी चाहिये इस बात की जानकारी देती हैं और ये भी पूछती है कि उन्हें किसी भी प्रकार की तकलीफ तो नहीं या कोई उनका शोषण तो नहीं कर रहा संमपत पाल देवी जी ने कुछ समय सरकारी नौकरी की लेकिन उनको तो कुछ और ही करना था सो वो नौकरी छोङ अपना एक दल बना लिया और देखते ही देखते कांरवा बन गया आज करीब १५०-२०० औरते उनके साथ मिलकर काम कर रही है समाज के लिये और औरतों के लिये "गुलाबी गैंग" भारत के छोटे -छोटे कस्बों तक ही सिमित नहीं हैं वो अपनी पहचान विदेशों मे भी बना चुका है है ना कमाल, यकीन ना हो तो खुद ही पङ लिजिये
क्या हम लोग मिलकर कुछ ऐसा कर सकते हैं???

Saturday, November 1, 2008

अपनी ज़मीन खुद तय करो!

सिमोन बोआ की बात एकदम सरल है, फिर भी गूढ़ - पुरुषों के बनाये ढाँचे के हिसाब से अपना मूल्याँकन मत करो। अलग हटो, दूर जाओ, अपने माप दंड खुद बनाओ, अपनी ज़मीन खुद तय करो।


स्त्री के लिए एक नया क्षेत्र
पोस्ट पर कुछ ज्यादा लंबी टिप्पणी यहां पोस्ट के रूप में दे रही हूं।

यह सही कहा है कि

"अगर स्त्री ऐस्ट्रोनोट बन सकती है, डाक्टर बन सकती है, माँ बन सकती है तब पण्डिता भी अवश्य बन सकती है -
कोई भी जन्म से सब सीख कर पैदा नहीँ होता -
शिक्षा ही व्यक्ति को सबल बनाती है"

एक पेशे के तौर पर यह सब सीखना और करना ठीक है। दुनिया में हज़ारों-लाखों पेशे हैं, उनमें से एक यह भी, जिसे स्त्रियां भी अब अपनाने लगी हैं और समाज खुल रहा है, इसे स्वीकृति देने में। बहुत अच्छा है।

हाल के समय में समाज में एक ऐसी ही, मिलती-जुलती घटनाएं हुईं हैं, जिनका जिक्र जरूरी है। इस साल के शुरू में हरिद्वार में शंकराचार्य की तर्ज पर एक महिला के लिए पार्वत्याचार्य का पद बनाया गया जिसकी तारीफ कम हुई, धार्मिक अखाड़ों में विरोध खूब हुआ, 'सत्ता' और 'ताकत' के बंटवारे के मुद्दे पर।

इसी तरह कुछ समय पहले आंध्र प्रदेश के अनंतपुर शहर के एक मंदिर में प्रवेश का हक पाने के लिए 6-8 दलितों का एक दल जबर्दस्ती मंदिर में घुसा। इस पर मंदिर में तो हुआ ही, शहर भर में भी काफी हंगामा हुआ। देश के कई हिस्सों में बहस छिड़ गई कि दलितों को मंदिर प्रवेश का हक होना चाहिए या नहीं, और इस हक को पाने के लिए जबर्दस्ती प्रवेश का यह तरीका उचित है या अनुचित।

"पुरूष प्रतिपादीत व्यवस्था" में "धार्मिक अनुष्ठान आज भी पुरूष प्रधान" "ही रहे है जिसका विरोध रोमन केथोलिक चर्च भी नही कर पाया है!" ऐसे में स्त्री को पण्डित की तरह धार्मिक अनुष्ठान, विधि विधान करवाने के लिए प्रशिक्षण, शंकराचार्य की तर्ज पर एक महिला के लिए पार्वत्याचार्य का पद बनाए जाने और दलितों के मंदिर प्रवेश की घटनाएं मुझे एक तरह की लगती हैं।

आज के समय में दलित के पास यह सामाजिक और आर्थिक ताकत है कि वह आगे आकर कहे कि उसे मंदिर जैसे ढकोसले में पड़ कर सदियों पीछे नहीं जाना है बल्कि जाति व्यवस्था के स्टीरियोटाइप को तोड़ कर इससे आगे बढ़ना है। खोखली हो रही मंदिर व्यवस्था का बहिष्कार कर, और दिशाओं में अपनी ऊर्जा लगानी है ताकि तरक्की करके जमाने के साथ चल सके, बल्कि उससे आगे निकल सके।

इसी तर्ज पर महिलाएं सदियों पुरानी और असामयिक साबित होती शंकराचार्य परंपरा को नए सिरे से अपना कर सदियों पीछे क्यों चली जाएं? इसे आगे बढ़ने और बराबरी पाने का जरिया क्यों मानें? उसे पाना क्यों चाहें और मिल जाए तो उसे अपनी जीत क्यों माने और पाकर खुश क्यों हों? उसे हक मानने की बजाए क्यों न उसका बहिष्कार करे? क्यों न वे साफ कहें कि जिस व्यवस्था में हम सदियों तक लगातार गैर-बराबरी झेलती रहीं, अपने लिए जगह खोजने की बेकार कोशिश करती रह गई, उसकी जीर्णावस्था में हम क्यों उसे महत्व दें? लेकिन सोचने की बात यह है कि जब अभी तक उसके बिना हमारा गुजारा चल गया तो अब जबकि हमारे पास और विकल्प हैं अपनाने के लिए, साधन हैं कुछ बेहतर लक्ष्य पाने के लिए। फिर क्यों इस मृतप्राय, बेकार बासी व्यवस्था को अपनाने की जुगत में खुद सदियों पिछड़े हो जाएं?

और अगर कोई कहे कि परंपरा को बचाए रखने....(इत्यादि), तो इसका जिम्मा अब इसकी मृतप्राय हालत में औरतों पर क्यों? जब पुरुष इस पेशे में मलाई काट रहे थे तब औरतों को इसे सुनने से भी वंचित रखा गया,("दलित और स्त्री वेद सुनें तो उनके कानों में पिघला सीसा डाल दिया जाए"- मनु स्मृति) और अब जबकि इस पेशे की हालत मरणासन्न है तो सेवा-सुश्रुषा महिला के जिम्मे, वह भी सदियों पुरानी झूठे महिमामंडन की तरकीब से!!

और अगर यह सिर्फ व्यवसाय है तो एक बड़ा तथ्य यह है कि आज कोई भी पुजारी सिर्फ कर्मकांड करवा कर अपना और परिवार का पेट नहीं पाल सकता। इसके लिए उसे कोई और रोजगार करना ही होगा। यह सिर्फ साइड बिज़नेस या रिटायर होने के बाद का काम होगा। या फिर उसका एक मठ हो जिसमें सारे राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक शोषण के दांव-पेंच चलते हों। क्या ये प्रशिक्षित पुरेहित महिलाएं भी आर्थिक स्वावलंबन के लिए कुछ और करती हैं/ करेंगी? और अगर यह सिर्फ व्यवसाय है तो फिर "ऋतुकाल" में "स्वेच्छा से कई पण्डिता अपने यजमान का मान रखते हुए या स्वयम्` के निर्णय से प्रेरीत होकर इस अवधि मेँ धार्मिक कार्य नहीँ करतीँ - " जैसे स्पष्टीकरण की क्या जरूरत है?

लब्बोलुबाब ये कि विशुद्ध पेशे के तौर पर (एक आम हिंदुस्तानी के लिए पुरोहिताई एक पेशा बिल्कुल नहीं है, बल्कि भावनाओं से जुड़ा एक पवित्र भगवत् कार्य है, खास तौर पर औरतों के लिए) पुरोहिताई को अपनाना आज कतई फायदे का सौदा नहीं है। क्यों न अपने टैलेंट से, काबिलियत से कोई, रॉकेट साइंस न सही, आज की दुनिया का काम-काज सीखा जाए जो वाकई एक पेशे का संतोष दे सके!?

और अगर यह सिर्फ व्यवसाय नहीं है, तो फिर मरते हाथी का बोझ हम अपनी पीठ पर क्यों ढोएँ, जिसकी सवारी का हमें कभी हक नहीं दिया गया?

क्या सोच रहे हैं आप?

Friday, October 31, 2008

स्त्री के लिए एक नया क्षेत्र

९८० से भारत के महाराष्ट्र प्राँत के हिन्दुत्व के पुराने गढ सरीखे एक शहर पुणे मेँ स्त्री के लिये अभीतक जो स्थान रिक्त रहा करता था उसे भरने के उपाय स्वरुप एक नई तरह की पाठशाला खोली गई !


आप सोचेँगेँ ऐसा क्या सीखाया जाता होगा यहाँ जो पहले स्त्रियाँ सीख ना पाई होँ ? तो जी ये है स्त्री को पण्डित की तरह धार्मिक अनुष्ठान, विधि विधान करवाने के लिये दिया जानेवाला प्रशिक्षण !

ताज्जुब की बात है के, ईसाई धर्म भी इन्ही मुद्दों से जूझ रहा है - जबके पश्चिम और पूर्व के सामाजिक धार्मिक मसलों में बहुत सारी भिन्नता है फ़िर भी स्त्री कहाँ और क्या काम कर सकती है , इस मामले में , आज भी , एक तरह से , काफी अवरोध हैं जिन्हें स्त्री ने २१ वीं सदी तक आते आते, हीम्मत से सामना करते हुए, अपने लिए नए क्षेत्र खोले और कई नए कामों में अपने लिए जगह बनाई है जिस में ख़ास तौर से टीचर , नर्स , मोडल , सिने तारिका, घर का काम, सरकारी दफ्तर, बैंक, जैसे क्षेत्र स्त्री के लिए सफल क्षेत्र साबित हुए हैं -

धार्मिक अनुष्ठान आज भी पुरूष प्रधान , पुरूष प्रतिपादीत व्यवस्था ही रही है जिसका विरोध रोमन केथोलिक चर्च भी नही कर पाया है !



पुणे से कई नवीन तथा रुढिवादी परँपराओँ को तोडने की पहल पहले भी हुई है -जैसे "विधवा पुनर विवाह " जैसे मामलोँ मेँ पहल करना - इसी तरह, आज स्त्री क्यूँ ना धार्मिक यज्ञ, पूजा ना करेँ ? क्योँ पुरूष पण्डित ही ऐसे अनुष्ठान करेँ ?

सोच को बदलने की प्रक्रिया आरँभ हो चुकी है आज तक , स्त्री सिर्फ़ भक्त हो सकीं मीरा बन कर अमर हुई पर , धार्मिक अगवा ना बन सकीं --

पर आज बदलाव शुरू हो गया है -



३० वर्षीया प्रीति अग्रवाल ने अपने घर पर सरस्वती पूजा करने के लिये सुनीता जोषी नामक स्त्री पण्डिताईन को नियुक्त किया और सादर घर पर बुलवाया -


" शँकर सेवा समीति " नामक कार्यालय की स्थापना , श्रीमान शँकर राव थत्ते ने की है

शहर मेँ लग्न सेवा से जुडा हुआ उध्यान कार्यालय भी उन्हीँका व्यवसाय है -" ज्ञान प्रबोधिनी " तथा शँकर सेवा समीति जहाँ पर माह का प्रशिक्षण दिया जाता है जिससे स्त्री भी शादी , यज्ञोपवीत जैसे पुरातन संस्कारों की रीति सम्पन्न करवा पायेँ और पॅडित की जगह ले सकेँ इसकी सुविधा शुरु की गई है -



ज्ञान प्रबोधिनी के शिक्षक है श्रीमान विश्वनाथ गुजर जिनका कहना है कि स्त्री भी मोक्ष की उतनी ही हक्दार है जितना की पुरुष और भारतीय शास्त्रोँ मेँ कहीँ भी ऐसा नहीँ लिखा है कि स्त्री पुरुष के समकक्ष नहीँ है - दोनोँ एक समान हैँ -



पुरी के शँकराचार्य ने स्त्री के वेदाअधिकार की आलोचना की थी फिर भी पुणे के इस सँस्थान मेँ स्त्रीयोँ के उत्साह मेँ कोई कमी ना पायी है -


५२ वर्षीया वासँती खाडीलकर जी का कहना है कि " पुरातन शास्त्रोँ मेँ विदुषी नारीयोँ ने भी योगदान किया जैसे, गार्गी, मैत्रेयी,सौलभा,रोमशा, लोपामुद्रा घोषा ये ब्र्हदारण्यक उपनिषदमेँ भी लिखा है और जो शिक्षित हैँ वे अपनी कन्याओँ को विदुषी और शिक्षित हुआ देखना चाहते हैँ। "



पहले से महीने तक का प्रशिक्षण हुआ करता था जो अब १२ माह तक का हुआ है और ज्ञान प्रबोधिनी मेँ १२ क्लास मेँ ३० से ३५ स्त्रियाँ पँडितकर्म की शिक्षा ग्रहण कर रहीँ हैँ -



सँध्या कुलकर्णी जी अपने आपको "पुरोहित " कहतीँ हैँ और गत १० साल से पूजा अनुष्ठान करवा रहीँ हैँ वे सँस्कृत भाषा मेँ पी। एच। डी।किये हुए हैँ


गृह - प्रवेश, यज्नोपवित यज्ञोपवित्`, उपनयन , सँस्कार विवाह विधि ये सारे ही अब स्त्री पुरोहित करवा रहीँ हैं



माधुरी करवडे पिछले सालोँ से धार्मिक कार्योँ को सम्पन्न करवा रहीँ हैँ






- लावण्या