Friday, February 29, 2008

अविनाश और यशवंत में फर्क ही क्या है ?

मोहल्ला का अचानक इस तरह का स्टैंड लेना बहुत अजीब लग रहा है । एक सज्जन ने मनीषा के नाम का सहारा लेकर अपनी भडास निकाली । तभी दूसरा पुरुष सज्जन वहाँ रक्षक बन कर आ पहुँचा । सताने वाला और बचाने वाला दोनो पुरुष हैं । माई-बाप फिर स्त्रियाँ क्या हैं । ढोर ढंगर ? जब भडास् की शुरुआत हुई थी वहाँ कमेंट न करने के लिये एक ब्लॉगवीर ने ही कहा था और आज भी ब्लॉग पुरुष यदा कदा कहते हैं कि लडकियाँ उनसे दूर ही रहें । एक वार करता है एक बचने की सलाह देता है । एक फिकरा कसता है और एक बचाता है ।
अब सार्वजनिक रूप से तुमसे पूछ्ने की ज़रूरत महसूस हो रही है कि "अविनाश , क्या तुमने मनीषा और अपनी चैट को सार्वजनिक करने से पहले मनीषा से पूछा था ?" जवाब तो साफ है -"नही " । । तुम्हारे ही यहाँ मनीषा का कमेन्ट है देखो --
मनीषा पांडेय said...
अविनाश, तुम्‍हें हमारे बीच चैट पर हुई बातचीत को इस तरह से सार्वजनिक करने का अधिकार तुम्‍हें किसने दिया। यह बहुत गलत और गैर-लोकतांत्रिक तरीका है। अगर भड़ासी गतिविधि तुम्‍हें गलत और अनैतिक ल्रगती है, तो उसका खिलाफ ठोस तरीके से जो हो सके, वो करो। न करना चाहो तो न करो। लेकिन हमारे बीच हुई एक बातचीत, जो कल मैंने बहुत क्रोध और क्षोभ की स्थिति में की थी, उसका इस तरह से इस्‍तेमाल करके तुम एक तरह से मुझे ही अपमानित कर रहे हो। हमारी पुरानी जान-पहचान और कुछ समान वैचारिक पक्षधरता के चलते मैंने अपना गुस्‍सा तुम्‍हारे साथ चैट पर जाहिर किया। अविनाश, यशवंत और उसकी भडा़सी टीम के प्रति मेरे मन में जितना गुस्‍सा है, इस बात से उससे कहीं ज्‍यादा है। इसे तुरंत यहां से हटाओ।
February 29, 2008 12:34 PM

12.34 दोपहर से तुमने इस चैट के अंश को अब तक यहाँ से नही हटाया । क्यो ? जबकि तुमसे मनीषा खुद कह रही है जिसकी लडाई तुम लडने चले हो ।
यश्वंत ने भी मनीषा को अपमानित किया और उसकी चैट को बिना अनुमति सार्वजनिक करके और बार बार मनीषा के उस चैट को हटाने का आग्रह न मानकर तुमने भी यही किया । तो क्या तुममे और यशवंत में कोई फर्क है ? अविनाश किसी मुगालते मे न रहना कि तुम एक दुखी बेचारी स्त्री के लिये आवाज़ उठा रहे हो । साफ दिख रहा है कि तुम अपने किसी मकसद को साधने के लिये मनीषा को मोहरा बना रहे हो । यह बात सख्त काबिले ऐतराज़ है । बिना इजाज़त चैट को सार्वजनिक करने से साफ झलक रहा है कि यह मोहल्ला का पुराना तरीका है कि विवाद को कैसे भुनाया जाये । जितेन्द्र चौधरी ने भी अपनी टिप्पणी में इसी का उल्लेख किया है --मुझे तो लगता है जो तरीका मोहल्ला ने (विवाद खड़ा करके) अपनाया था उसी परम्परा को निभाते हुए, भड़ास ने भी अपनी हिट्स बढाने की कोशिश की। अच्छा है, भस्मासुर पैदा करो और अब उनसे बचते फिरो, अनंतकाल से यही होता आया है। आगे भी होता रहेगा। बाकी कुछ हो ना हो, इससे मोहल्ले/अविनाश का दोगलापन तो साबित हो ही गया।

इसी से बचने के चक्कर में हमने चोखेर बाली पर पतनशीलता और भडास विवाद का उल्लेख भी बन्द कर दिया था।
ये वैचारिक मतभेद हैं अविनाश इसलिये यहाँ तल्ख हूँ । कल किसी ब्लॉग संगत मे मिलोगे तो हँसकर बात करूंगी । ठीक है न ! ऐसा तुम्हीं से तो सीखा है । तुम भी यशवंत के साथ ऐसा ही करना ।अभी उसे बैन करवाओ और जब कही वह मिले तो बतिया लेना दो घडी ।

एक बात और ,

मनीषा का मुद्दा लेकर यदि तुम भडास को बैन करवाना चाहते हो तो माफ करना । अगर हमे लडाई ही लडनी है तो चोखेर बालियाँ खुद तय कर लेंगी कि उनका स्टैंड क्या हो ! और तरीका क्या हो । आप शायद भूल गये हैं कि असल मुद्दा इसी बात से शुरु हुआ था जब यशवंत ने भी कुछ गाइडलाइंस अपनी पोस्ट में चोखेर बालियों को देने की कोशिश की थी । हाँ अगर मोहल्ला या कोई और उसमें साथ देता है तो अच्छा है ।
अब कोई और सॉलिड मुद्दा बचा हो तो प्लीज़ अपनी मुहिम उसे बता कर जारी रखो । क्योंकि मुझे नही लगता कि मनीषा को किसी से लडने के लिये तुम्हारे भुज सम्बल की ज़रूरत है । मित्रवत की गयी बात का गलत फायदा न उठाओ । मनीषा ने तुमसे कुछ करने को कहा ज़रूर । पर क्या ऐसा ही करने को कहा ? मुझे नही लगता । तुमसे चैट पर बात करते अब हम सब को सावधान रहना होगा ; न जाने कब क्या बात तुम आउट ऑफ कॉंटेक्स्ट कोट कर दो !


किसी का का साथ मिले तो ठीक पॉलिटिक्स नही चाहिये प्लीज़ !!

हां, मेरा नं. यही है

भड़ास पर हिज हाइनेस हिंजड़ा मनीषा के गुरु रूपेश श्रीवास्‍तव ने मेरा मोबाइल नं. सार्वजनिक किया है और यशवंत सिंह ने उसका पुरजोर समर्थन भी किया है। जानकारी के लिए बता दूं कि वह मेरा ही नं. है और बिल्‍कुल सही है।

आदिकाल से मर्दों को लगता आया है कि किसी स्‍त्री के आत्‍म-सम्‍मान को कुचलने या उसकी अस्मिता को ठेस पहुंचाने का ये सबसे शानदार तरीका है कि उसके शील पर ऊंगली उठाओ, सार्वजनिक रूप से उसका मान-मर्दन करो, ज्ञान और बुद्धि में उसका मुकाबला न कर सको तो अपने मर्द होने का फायदा उठाओ और उसके स्‍त्री होने का। किसी स्‍त्री को इमबैरेस फील करवाने का इससे बेहतर तरीका और क्‍या हो सकता है कि आप भरे चौराहे उसका दुपट्टा खींचे, उसके मुंह पर तेजाब फेंके, उसका बलात्‍कार करवाएं, उस पर अश्‍लील टिप्‍पणियां करें।

संजीत त्रिपाठी और मसिजीवी ने आगे बढ़कर मेरे मो. नं. को इस तरह सार्वजनिक किए जाने का विरोध किया है। मैं उनकी शुक्रगुजार हूं। लेकिन दोस्‍तों, मैं इस तरह के मानसिक संत्रास और स्‍त्री होने का एहसास कराए जाने वाले मर्दवादी तरीकों से बहुत ऊपर उठ चुकी हूं। अगर उन्‍हें यह लगता है कि मेरा नं. सार्वजनिक करने और चार छिछोरे लोगों का फोन आने से मैं डर जाऊंगी, दुखी हो जाऊंगी, घर में मुंह छिपाकर रोऊंगी, तो वे गलती पर हैं। ऐसे लोगों से निपटना मुझे खूब आता है, इसलिए कीड़े-मकोडों से बजबजाती इस दुनिया में सिर उठाकर जी रही हूं।

भडास भी अंतत: मर्दवादी ही है

आज मोहल्ला की मुहिम देखकर मनीषा से बात हुई । अब तक इस सब को अनदेखा करने की राय बनी थी पर अब यह सम्भव नही । यह रोज़ रोज़ परोसा जा रहा है । सुबह इरफान जी की पोस्ट मे दिये लिंक से वहाँ पहुँची । पतनशीलता पर जब चोखेर बाली में मनीषा ने लिखा था तो उम्मीद नही थी कि बात "पतन' से बहकर "प्रगति" शब्द में उलझकर कहाँ किन किन नालियों में बह जायेगी ।एक पोस्ट इस पर लिखी जाने कब तक रखी रही सिर्फ इसलिये कि पतन शब्द का कुछ ज़्यादा ही इस्तेमाल और मखौल उडा दिया गया । सो व्यर्थ की ,गैर -रचनात्मक बात करने से अच्छा था कि विध्वंसात्मक बहसों को अनदेखा किया जाये । यूँ भी इस तरह की बहस में स्वविध्वंसात्मकता होती है। मनीषा ने लगातार स्पष्टीकरण दिये । स्वपनदर्शी ने भी कहा । प्रत्यक्षा ने अपने ढंग़ से कहा । ।टिप्पणियाँ भी स्पष्ट करती रहीं । पतन शीलता की इच्छा जताना सिर्फ एक लक्षण है । उसकी जड तक पहुँचने की बजाय सब ऊल जुलूल प्रसंगों की ओर बढ गये । सब पतित होने की इच्छा जताने लगे । शायद यहीं हम साबित करते हैं कि वयवस्था सारी की सारी मर्दवादी है । ये सपष्टीकरण मनीषा ने सिर्फ यशवंत को ही नही दिये उन सब को भी दिये जो "पतन" शब्द से आतंकित थे । यशवंत ने जो लिखा , वे उनके विचार थे उनसे असहमति थी और वो असहमति ज़ोरदार तरीके से दर्ज की गयी । लेकिन उस व्यक्ति से जिससे असहमति हो उसे हटा दिया जाये तो बेहद अलोकतांत्रिक नही हो जायेंगे ! अपनी डफली , अपना राग । हम बजायेँ हम ही सुनें । जैसे कि आजकल भडास खुद ही हो रहा है । खुद को अभिव्यक्त करने की आज़ादी लोकतंत्र ने आपको दी है लेकिन उसी लोकतंत्र ने मनीषा से उसके सम्मान की आज़ादी छीन ली है क्या ? दिक्कत तब शुरु हुई जब यशवंत जी के भडास पर मनीषा के नाम का दुरुपयोग होना शुरु हुआ । इस पर हमारी राय बनी थी कि इसे अनदेखा किया जाये । यह "भडास' नही है जो आती ही जा रही है और चित्त को निर्मल करने की बजाये अंतहीन वमन करने लगी है । मनीषा के स्पष्टीकरण के बाद वे चोखेर बाली पर नही लिख रहे थे ।लगा कि शायद उन्हें अहसास हो गया कि चोखेर बालियाँ क्या नही हैं । लगा कि शायद यशवंत और बाकी सब भी समझ गये होंगे कि किसी को उसके विरोध का तरीका और भाषा क्या हो यह नही सिखाया जाना चाहिये । लेकिन भडास जारी रहा । अब भी जारी है । हिज हाइनेस की ड्रामटिक एंट्री ने उन्हें सन्देह के घेरे मे ला दिया है । हमें इससे सख्त ऐतराज़ है । हिज हाइनेस वाली सभी पोस्ट भडास हटाए और इस वमन को बन्द करे । हम भडास के इन स्त्री-विरोधी तरीकों का विरोध करते हैक्योंकि भडास भी अंतत: मर्दवादी ही है । अंतत: एक पुरुष होने की पोज़ीशन {?}का फायदा उठाया जा रहा है । जैसे सार्वजनिक का मतलब है केवल पुरुषॉ के लिये वैसे ही शायद भडास का मतलब है केवल पुरुषॉ के लिये ।

Thursday, February 28, 2008

भारत की कन्या

कौन यह किशोरी?

चुलबुली सी, लवँग लता सी,
कौन यह किशोरी ?

मुखड़े पे हास,रस की बरसात,

भाव भरी, माधुरी !

हास् परिहास, रँग और रास,
कचनार की कली सी,
कौन यह किशोरी?
अल्हडता,बिखराती आस पास,
कोहरे से ढँक गई रात,
सूर्य की किरण बन,
बिखराती मधुर हास!
कौन यह किशोरी?
भोली सी बाला है,

मानों उजाला है,
षोडशी है या रँभा है ?
कौन जाने ऐसी ये बात!
हो तेरा भावी उज्ज्वलतम,
न होँ कटँक कोई पग,
बाधा न रोके डग,
खुलेँ होँ अँतरिक्ष द्वार!
हे भारत की कन्या,
तुम,प्रगति के पथ बढो,
नित, उन्नति करो,
फैलाओ,अँतर की आस!
होँ स्वप्न साकार, मिलेँ,
दीव्य उपहार, बारँबार!
है, शुभकामना, अपार,
विस्तृत होँ सारे,अधिकार!
यही आशा का हो सँचार !~

~लावण्या~~

Wednesday, February 27, 2008

आओ अपनी बेटियों को "औरत" और बेटों को "मर्द" बनाऎं

मेरी बेटी दिल्ली के बहुत प्रतिष्ठित स्कूल में पढती है ! उम्र सिर्फ पांच साल है पर आसपास के माहौल की समझ अपनी उम्र से ज्यादा है ! वह अपनी टीचरों को बहुत पसंद करती है पर उनकी कई बातों को बहुत अजीब मानते हुए उनका कारण वह हमसे जानना चाहती है ! उसकी क्लास मॆं शोर मचाने वाले लडकों के लिए सजा लडकियों को दी जाने वाली सजा से अलग क्यों है यह बात बॆटी को समझ नहीं आती ! लडकों को शरारत करने पर कहा जाता है " चुप बैठ जाओ वरना आपके फोरहेड पर बिंदी लगा देंगे !" अगर लडका फिर भी शरारत नहीं बंद करता तो कहा जाता है कि अब तो आपकी एक पोनीटॆल भी बनानी पडेगी ! बेटी का यह प्रसंग सुनकर मुझे अपने बचपन के दिन याद आ गए जब रोने वाले लडके को चुप कराने के लिए टीचर कहती थीं कि शर्म नहीं आती लडकियों की तरह रोते हुए !

तब और आज की बात में पूरी एक जेनरेशन का गैप है पर हमारे समाज की रक्तवाहिनियों में बहते हुए इस लिंग भेद की भावना में कोई फर्क कहां आया है ? आज हम अपनी बेटियों को शायद अपने बेटों के बराबर खुराक ही देते हैं उन्हें लडकों जैसे (?) कपडे भी पहनाने में शान महसूस करते हैं , उसकी शिक्षा पर जमकर खर्च करते हैं पर उसके माहौल में एक गैरबराबरी का अंडरकरंट जरूर बहते जाने देते हैं !

मेरी बेटी की क्लास के सारे मासूम लडके अब तक यह समझ चुके होंगे कि लडकी होना कितने अपमान की बात है ,यह भी कि अपनी जेंडर आइडेंटिटी उनके लिए सबसे अहम है , यह भी धीरे धीरे समझ जाऎगे कि औरत होना किसी सज़ा से कम नहीं है और वे खुशकिस्मत हैं कि वे नहीं है ! मेरी बेटी यह समझ चुकी है कि टीचर की इन बातों से ब्वाय्ज़ बहुत डर जाते हैं पर गर्ल्स को लडका बनाने की बातों से नहीं डरा सकते हैं क्योंकि वो तो पहले से ब्वाय्ज़ जैसे कपडे पहनती हैं ! मैं डरती हूं कि वक्त उसे यह भी समझा देगा कि समाज में उनकी बराबरी केवल सतही है ,दिखावा है ,वंचना है ! इन सतही चीजों से लडकियों की आजादी और उनकी जेंडर आइडेंटिटी का सम्मान होना नही शुरू होने वाला !जेंडर सेंस्टीविटी अभी भी सिर्फ विमर्शों का ही हिस्सा है ! अभी तो उसे समाज के सबसे अधिक बदलाव के थपेडे सह सकने वाले तबके तक ने नहीं अपनाया है ! मेरी बेटी की अंग्रेजी स्कूलों में पढी शिक्षिकाओं को उनके समाज ने अपने स्त्रीत्व पर गर्व होना और उसके प्रति सेंसिटिविटी की उम्मीद रखना तक नहीं सीखने दिया ? हम बेटी को बेटी होने पर शर्मिंदा होना सिखाते चले आए हैं जहां वे स्त्री होने के अपमान के लिए दिल से तैयार कराई जाती हैं और सतही बदलावों के भ्रम में पाली जाती हैं !हमारी इन मानसिक संरचनाओं को हमारी शिक्षा भी बदल नहीं सकी बल्कि उसके ढांचे इसको और मजबूती से सिखाने वाले गढ भर हैं !

हम अपनी बेटियों को सजीली लंबी टांगों वाली गुडिया लाकर देते रहेंगे और वह उनसे घर घर खेलती रहेंगी और बेटों को नित नई गाडियां हम दिलाते रहेंगे ! बराबरी ही तो है ! लडकों के से कपडे और ब्वाय्ज़ - कट बाल ! देखो कितनी बराबरी है ! दोनों एक ही स्कूल में जाते हैं !जी दोनों बराबर हैं ......

नहीं ,तब भी नहीं .......कल नहीं तो परसों मेरी बेटी जान जाएगी कि उसके तथाकथित बराबरी वाले माहौल ने कैसे उसे भरमाए रखा और कैसे उसके भविष्य को रपटीला बना दिया ! वह हमसे पूछ बैठेगी तो हम क्या जवाब देंगे ? क्या अपनी पिछली पीढी को कोसने लगें गे और मुंह चुराकर , अपने बुढापे की दुहाई देकर , अपनी मुसीबतें खुद सुलटा लो की नेक सलाह देंगे ?

उन्माद

विकास नारायण राय की एक कविता

एक लडकी को मैने देखा
उन्माद से भारी विक्षिप्तावस्था में
वह ताबडतोड
हर किसी को ललकारे जा रही थी ।

हर लडकी के जीवन में
कभी न कभी
पागलपन का ऐसा दौरा ज़रूरी हो जाता है
वर्ना वह अपनी बात
कभी कह ही नही पाएगी ।



"लडकियों का इनकलाब ज़िन्दाबाद"
साहित्य उपक्रम
छठा संसकरण 2008

Tuesday, February 26, 2008

रिपुदमन की डायरी : भाग 2


हाँ !! तो उस दौरान खूब चिट्ठीबाज़ी हुई; प्रधानाचार्य, प्रबंधकों, अनुशासकों, संचालकों, निर्देशकों के बीच। और फिर बात बढ़ते-बढ़ते जा पहुंची शिक्षा मंत्री तक। अब पूछिये… अंत में विजय किसको मिली ? बेशक… नाना जी को ही! यह था उन खर्रों का प्रभाव! ऐसा वे कहते थे।

फिर क्या था… प्रसन्नचित्त .. अपनी बेटी का हाथ पकड़, जेब में ’परमीशन लेटर’ रख, नाना जी फिर से जा पहुंचे प्रधानाचार्य के दरवाज़े पर ’ठक-ठक’ करने। पर कोई जीवन चैन से जीने दे तो ना। इस बार प्रधानाचार्य ने एक नई शर्त रखी। उसने कहा कि चूंकि स्कूल लड़कों का है सो माँ को शर्ट-पैंट में ही स्कूल आना होगा। नाना जी तुरन्त राज़ी हो गये पर औपचारिकता दिखाते हुये माँ से पूछा; “क्यों बेटा, तू शर्ट-पैंट पहन लेगी ना ?”। माँ ने मुस्कुरा कर हाँ का इशारा करते हुये सिर हिला दिया। माँ मुस्कुरा ही नहीं रहीं थीं बल्कि उनके मन में मोटे-मोटे लड्डू भी फूट रहे थे! .. क्यों ? … क्योंकि शर्ट-पैंट पहनने को मिलेगी। उस समय चलन कुछ ऐसा था कि छोटी बच्चियों के लिये भी पहनावे के तौर पर साड़ी ही सही समझी जाती थी। सोचिये, ४-५ की बच्ची अपनी माँ की साड़ी पहनकर कैसी लगती होगी। माँ को साड़ी कभी नहीं भाती थी और भाती भी क्यों; इतना सारा ताम-झाम समेटकर फिरना कितना मुश्किल होता होगा; जितना अपना वज़न नहीं उतना साड़ी का!

स्कूल जाना शुरू हुआ। मस्ती के दिन शुरू हुये, नये दोस्त बने। देश तब नया-नया आज़ाद हुआ था। सरकार की तरफ़ से शिक्षा के क्षेत्र में उदार नीतियाँ थीं; पढ़ाई को बढ़ावा देने के लिये, सभी को प्रोत्साहित करने के लिये। आजकल की तरह प्राथमिक शिक्षा के लिये कोई उम्र निर्धारित नहीं थी। यानी किसी भी उम्र का व्यक्ति, दूसरी, तीसरी या चौथी कक्षा में पढ़ सकता था। इस कारण एक ही कक्षा में, छात्रों के बीच उम्र में कुछ वर्षों से लेकर दस-बीस यहाँ तक कि चालीस साल तक का भी अंतर हुआ करता था।स्कूल में माँ का जो सबसे पहला दोस्त बना वो था पास के जंगल का एक भील। ’भील’ मध्य-प्रदेश की एक आदिवासी जाति है। उस भील का नाम याद नहीं। कभी याद आया तो बताऊँगा। वह भील एक अच्छा खासा अधेड़ उम्र का आदमी था जिसके तीन बड़े बड़े बच्चे थे। मेरी माँ उसके सबसे छोटे बच्चे से भी बहुत छोटी थीं। इसी कारण वो माँ को बहुत लाड़ करता। स्कूल में कोई भी लड़का माँ से पंगा लेने की हिम्मत नहीं करता था। कभी कोई लड़का अगर शरारत करता तो भील अपनी गर्दन घुमाकर, गोल-गोल आखें निकालकर उसे बस घूर देता…। बस इतने में ही शरारत करने वाले की छुट्टी! मास्टर जी को उसकी यह अदा बहुत पसंद थी। शायद इसी कारण उन्होनें उसे कक्षा नं। तीन-ए का 'मॉनीटर’ भी बनाया था।

डिस्पेन्सरी के साथ ही डॉक्टर सहाब का क्वार्टर हुआ करता था। भील हर सुबह डिस्पेन्सरी आ जाता। डॉक्टर साहब से ’जै राम जी की’ की, अपनी छोटी सी सहपाठिन को कंधे पर बिठाया और जी चल दिये स्कूल को। यह रोज़ का नियम था उसका। सो ऐसे माँ को ’डोर-टू-डोर’ वाली ’पिकअप-एन्ड-ड्रोप’ सुविधा भी उपलब्ध हुई। दोनों मज़े से बातें करते हुये स्कूल जाते। इस ख़याल से कि रास्ते में कहीं बच्चे को भूख न लग जाये; भील अपनी जेब में बेर भरे रहता और जब तब कुछ बेर निकाल कर माँ के छोटे-छोटे हाथों में रख दिया करता; वाह! ……

दोनो की दोस्ती बहुत गहरी थी। इसलिये ही शायद इतने सालों के बाद भी माँ को ये सब बातें याद है। और जब भी वे ये किस्सा सुनाती हैं, आप सहज ही उनकी आँखों में चमक देख सकते हैं; कभी-कभी मुस्कुराहट के साथ आखें गीली भी हो जाती हैं।

भे अकसर घर के काम भी कर दिया करता था। जैसे…कभी जंगल से लकड़ी ले आये, कभी दूध ले आये या कभी पूजा के लिये फूल ला दिये। एक संध्या नाना जी ने नानी को अपने पास बुलवा भेजा। उन दिनो नानी गर्भवती थीं। छोटे मामा ’गोपाल’ आने वाले थे। दूध की बहुत समस्या हुआ करती थी। मतलब दूर-दूर तक कोई पालतू जानवर ही नहीं। कहीं कोई राहगीर दिख गया, गाय-भैंस ले जाता हुआ, तो उसको रास्ते में रोक, निवेदन कर लिया… कि भाई ज़रा एक लोटा दूध तो निकाल दो! (कैसा लगता है ना ऐसी बातें सुनकर… आज कल क्या ऐसा होता है? ) इधर नानी गर्भवती और उधर घर में एक छोटा बच्चा, सो नाना जी ने एक दिन चिन्तित हो कर भील से कहा। “भाई ..सुनो .. बहुत समस्या है… कहीं से एक गाय का ’इन्तज़ाम’ तो करो”। भील .. “जी बाबूजी” कहकर चला गया। अगले दिन देखा तो सुबह-सुबह वो अपने साथ एक नील-गाय को रस्सी से बाँधे चला आ रहा था नाना जी कुछ झल्लाये पर फिर मुस्कुरा दिए।

नाना जी अगले तीन साल तक ’बाघ’ में ही कार्यरत रहे और माँ, मामा जी भी अगले तीन साल तक उस नील-गाय का ही दूध पीते रहे।

Monday, February 25, 2008

कौन है सुनीता चौधरी ?

मैने आज तक नही देखा उसे । पर सुना है कि वह पूरे दिल्ली महानगर में इकलौती महिला है जो यह काम करती है । मर्दों की दुनिया में पूरे आत्मविश्वास के साथ । लेकिन समाज असम्वेदनशील है ,बार बार इसका सबूत पेश करता है । फिर चाहे वह पुलिस के भेस में ही क्यो न हो । ।ऑटोड्राइवर - सुनीता चौधरी । पिछले तीन साल से ऑटो चला रही है अपना संसार चलाने के लिए ।


राष्ट्र पति [महिला] के निवास के बाहर सरे आम दिन दहाडे कानून के रक्षक ने सुनीता को ऑटो से बाहर घसीटा और गाल पर ,कान के नीचे दो तमाचे ज़ोर से दे मारे । दर्द के मारे सुनीता का सर घूम गया ।कसूर सिर्फ यह था कि उसने पिछले दो-तीन घण्टों में मुगल गार्डन देखने आयीं तीन सवारियों को उठाया -पहुँचाया था । बेशक वह मर्दाने वेश मे थी पर चोटी बनाने वाली महिला को दिन की तेज़ रौशनी में भी क्या पुलिस वाला नही देख पाया ? एक हिम्मती स्त्री को यह हमारे समाज का तोहफा था । खैर , ऑटॉ वाला यदि पुरुष भी होता तो भी पुलिसिये द्वारा उसे इस तरह घसीट कर तमाचा लगाना सही न होता । पर बात है वर्दी से मिली उस ताकत के खुमार की जिसमें उसे नही दिखाई दिया कि वह क्या कर रहा है ,क्यो कर रहा है ।
वह कोई बडा काम नही कर रही थी । बहुत साधारण काम है । औटो चलाना । पर अगर यह विशेष लगता है तो हमें ज़रूर सोचने पर विवश होना चाहिये कि एक ऐसा साधारण काम करना जो कोई भी पुरुष करता है क्यो एक स्त्री के लिये नयी और अजूबा बात हो जाती है । 5-10 महिलाएँ भी गिनाने को नही हैं जो दिल्ली मे ऑटो चलाती हों । रिक्शा चलाती हों ।बस कनडक्टर हों ।
वे बडी तादाद में घरों में बर्तन मांजती ,कपडॆ धोती मिल जायेंगी । वे कपडे सीलती मिल जायेंगी ।वे आया का काम करती मिल जायेंगी ।खाना बनाती मिल जायेंगी । वेश्यावृत्ति करती मिलेंगी ।
लैंगिक आधार पर श्रम के विभाजन के इतने ही सख्त खाँचे हैं हमारे समाज के ।और इन्हें तोडने वाली स्त्री के प्रति बेहद अस्म्वेदनशीलता ।
महिला का आई ए एस होना , बडी पोस्ट पर अफसर होना , राष्ट्रपति होना , राष्ट्र संघ की सचिव होना उसकी मुक्ति का उत्सव है पूर्ण मुक्ति नही है । पूर्ण मुक्ति तब है जब छोटे से छोटे स्तर पर भी स्त्री को काम करने के लिये अपने जेंडर के बारे में न सोचना पडे ।पूर्ण मुक्ति तब है जब उसका ऑटो चलाना या बस कनडक्टरी करना खबर बन कर सामने न आये । बल्कि एक सामान्य बात हो ।
चित्र और खबर यहाँ से ...

Saturday, February 23, 2008

मेरी डायरी [ रिपुदमन ] ; भाग - १

परिचय मेरा कुछ नहीं है एक आम व्यक्ति हूँ आम जीवन जी रहा हूँ । फिर भी दुनिया के लिये औपचारिक परिचय यह है --संगणक विज्ञान और अभियंत्रिकी में स्नातक। साहित्य का अनौपचारिक अध्यन। मासिक पत्रिकाओं में गीत प्रकाशित। साहित्य पढ़ना और चर्चा करना पसंद है। गायन और चित्रकला में भी रुचि। फिलहाल तकनीकी सलाह्कार एंव प्रबंधक के तौर पर संयुक्त राज्य अमरीका में कार्यरत।
मेरी डायरी
रिपुदमन पचौरी

बचपन में, माँ अपने छुटपन की बहुत सी कहानियां, बहुत से संस्मरण सुनाया करती थीं। सभी एक से बढ़कर एक रोचक, मनोरंजक, संवेदनशील और सम्मोहित कर देने वाले होते थे। बातें बहुत सी थीं, मुझे जो कुछ याद हैं वही अक्सर लोगों को सुनाया करता हूँ।



माँ का जीवन बहुत नाटकीय सा रहा। यह बातें सन १९४४ और १९६० के बीच की हैं। माँ का जन्म सन १९४४ में हुआ। नाना जी एक सरकारी डॉक्टर थे। वे मध्यप्रदेश सरकार के एक सरकारी अस्पताल में काम किया करते थे। उस समय देश में डॉक्टरों की जितनी कमी थी, समाज में उनका आदर भी उतना ही अधिक था। आज भी होता है, पर उस समय की बात ही कुछ अलग थी। अधिकतर लोग कम पढ़े-लिखे हुआ करते थे, ऐसे में किसी का डॉक्टर होना अपने आप में एक बहुत बड़ी बात थी। नाना जी का तबादला राज्य के भिन्न-भिन्न गाँवों और कस्बों में निरंतर होता रहता था। वे कभी भी एक स्थान पर २-३ साल से अधिक नहीं रुके। उनका स्थाई निवास ग्वालियर में था। घर के अन्य बच्चों की पढ़ाई लिखाई को ध्यान में रखते हुये, घर के बाकी बच्चों को, एक जगह से दूसरी जगह न लेजाकर ग्वालियर में ही रहकर उनका पालन पोषण करना सही समझा गया; सो नानी जी के साथ घर के अन्य बच्चे ग्वालियर में रहा करते थे। नाना जी जहाँ भी रहे, माँ सदा उन ही के साथ रहीं।


ऐसे ही एक बार नाना जी का तबादला हुआ ’बाघ’ में। ’बाघ’ जनपद मध्य-प्रदेश में एक छोटी सी जगह है। छोटी होने के बावजूद भी यह जगह अपने बीहड़ों और वहां के डाकुओं के कारण विख्यात ( या यूँ कहें कुख्यात ) है। माँ का जन्म सन १९४४ के मई मास की भरी गर्मियों, में इसी बाघ जनपद में हुआ। अपनी माँ के बिना, बचपन से ही हमेशा पिता के साथ रहने के कारण वे जिम्मेवार, निर्भीक, साहसी और आत्मविश्वास से भरी एक संवेशनशील व्यक्तित्व वाली बालिका के रूप में पनपीं।



अपनी पढ़ाई के अलावा अपने पिता के लिये एक वयस्क महिला की तरह ही रोज़मर्रा के काम करना, खेल कूद, और इलाज करवाने आए मरीज़ो से बातें मारना॥ बस यही कुछ काम उनकी दिनचर्या में शामिल थे।



’बाघ’ जिले में विद्यालय के नाम पर बस एक ही विद्यालय था, वो भी केवल लड़कों के लिये। लड़कियों के पढ़ने के लिये कोई व्यवस्था नहीं थी। माँ की उमर जब ४-५ साल ही हुई तो स्कूल में दाखिले के बारे में सोचा गया। सो, एक दिन डॉक्टर साहब अपनी बच्ची की उंगली पकड़कर जा पहुंचे पंजीकरण करवाने। स्कूल के प्रधानाचार्य ने तुरंत ही डॉक्टर साहब को बाहर का रास्ता दिखा दिया; यह कहकर कि स्कूल केवल लड़कों के लिये ही है…सो आपकी बेटी को यहां दाखिला नहीं मिल सकता। फिर क्या था; (प्रदेश में लड़कियों के लिये शिक्षा उपलब्ध नहीं हो तो क्या उनकी बेटी बिना पढ़ी रह जायेगी ! क्या यह बच्ची का दोष है या स्वयं उनका ?) नाना जी तो आग-बबूला हो गये। और फिर!! सिलसिला शुरु हुआ ’खर्रे’ लिखने का। ’खर्रे’ यानी ये-लम्बे-लम्बे पत्र, याचिकायें, निवेदन-पत्र। माँ बताती हैं कि वे छोटा पत्र तो कभी लिखते ही नहीं थे। जब भी लिखा… खर्रा ही लिखा… यानी… किसी दैनिक अख़बार के पन्ने की तरह जो अगर शुरु हुआ तो बस कम से कम दस पेज के बाद ही रुकने का नाम लेता।




शेष आगे .........

Friday, February 22, 2008

चोखेर बाली का एजेंडा क्या है?

हमारी पाँच साल की गुड़िया कागज़ पर कार बना रही थी। बनाकर पापा पास जाकर दिखाया। मैं दूर से देख रही थी। कार में लाइन से चार पहिये थे,दो खिड़कियाँ,एक ड्राइवर। पति ने बड़े प्यार से पास बुला कर पूछा...., “क्या इस कार में आठ पहिये हैं?”
गुड़िया बोली , “नही...चार ही हैं.....वन,टू,त्री,फोर....”

पति ने खिलौने वाली एक कार ली...साइड़ से दिखाया और पूछा..... “कितने पहिये दिखते हैं बेटा....?”
“टू पापा....”
“चार पहिये वाली गाड़ी में दो ही पहिये साइड़ से दिखते हैं ” ,वे समझाते हुए बोले।
थोड़ा घुमा कर पूछा...., “अब बताओ”
“त्री”
कार उलटा पकड़ पर पूछा.... “अब?”
“फोर....
आई अन्डरस्टुड पापा । ”

दृष्टिकोण एक अहम बात है। बात अलग ऐंगल से अलग दिखती है। गलत कोई नहीं होता ....पर अक्सर सब के पास अधूरा सच होता है।

चोखेर बाली....

पता नहीं इसका एजेंडा क्या है।

पर जहाँ तक मैं समझती हूँ यह विभिन्न् दृष्टिकोण से एक सच देखने का प्रयास है ताकि इस सच में जो बदलाव लाना चाहते हैं ला सकें।

जाहिर है अलग अलग जगह से यह सच अलग ही दिखेगा। जिंदगी और इसके अनुभव सभी के लिये अलग हैं।
किन्तु हर आवाज़ के पीछे समान दृष्टिकोण रखने वाले कई लोग मूक होकर खड़े हैं। एक आवाज़ पता नहीं कितने लोगों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है। इसीलिये हड़बड़ाहट में सही आवाज़ और सही दिशा चुनने में जल्दबाजी सही नहीं है।

पतनशीलता को लेकर पिछले दिनों इतनी बहस हुई। शब्दों के हेरफेर को अगर नज़रअंदाज़ करें तो सभी एक ही बात चाहते हैं। स्त्री की स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार। जिसने जितनी मेहनत से यह हासिल किया ....वो उतने ही प्रभावशाली तरीके से अपनी बात कह गया।

बचपन में वादविवाद प्रतियोगिता होती थी। जो ज्यादा स्मार्ट होता था वो हमेशा मुश्किल पक्ष ले लेता। फिर शब्दों की ताकत से अपनी बात साबित करता।

शब्दों में यह ताकत हमेशा रही है। कोई भी वकील इस बात से इंकार नहीं कर सकता। सही को गलत...और गलत को सही साबित करना ..शब्दों के जरिये.....कोई मुश्किल काम नहीं है....। कभी तो इन्हे लेकर इतना उलझाया जा सकता है कि पता ही नहीं चलता कि बात सच में क्या थी।

पर यह मंच शब्द की ताकत के लिये नहीं है। बात की प्रासंगिकता के लिये है। ऐसी बात जो कि कोई ऐसे सच को बतला सके जिसकी रौशनी में हम स्वयं को, अपने रवैये को ....अपने समाज को बेहतरी के लिये बदल सके। हर बार बात की प्रासंगिकता तोल कर बोलना कठिन है। कई बार जिज्ञासा, आतुरता हमें व्यर्थ बातों पर ध्यान बाँटने पर विवश करती है। पर मंच तो तभी सफल हो सकता है जब बात को बात से काटें या जोड़े...संयत रह कर....तभी सार्थक बहस हो सकती है।

चोखेर बाली स्त्री को पुरुष बनाने की लड़ाई नहीं है।

स्त्री पुरुष नहीं है। होना भी नहीं चाहिये। पुरुष भी स्त्री नहीं हो सकता।

कई बातें लाइन से कही जा सकती है... पर सिर्फ एक ही कहूँगी....

एक पुरुष अपने बच्चे के जन्म के बाद जब काम पर लौटता है...तो मिठाई के डिब्बे के साथ। एक औरत जब लौटती है तो ऐसी अवस्था में कि शिशु के ख्याल भर से दूध में भीग जाती है........

संवेदना , कोमलता, ममता.....यह कोई थोपी हुई धारणायें नहीं है....स्त्री के संयोजन से तत्त्वत: जुड़ी हुई हैं। अदायें नज़ाकत स्त्री ही क्यों......यह एक ऐसा कुदरती सवाल है जो शायद नाचते हुए मोर से भी पूछा जाना चाहिये...... । हॉरमोन्स के असीम उतार चड़ाव से बनते बिगड़ते व्यक्तित्व से जुड़ी कुछ बुनियादी स्वभाव है....जो अपने आप में एक सच है।

चोखेर बाली उन सच को कहने का मंच नही है। इसीलिये शायद पतन के उदाहरण, प्रेम के प्रसंग के अनुभव कहने का भी नहीं है।
और सच तो यह है कि इसमें कुछ रहस्यपूर्ण है भी नहीं। पुरुष का सोलह बरस का प्यार, कॉलेज और गली में की गई छेड़छाड़....वैश्यालय, शादी, बुढ़ापे का इश्क....इन सभी में एक स्त्री भी साथ है। किसी पुरुषों के ब्लॉग में ज्यादा उपयुक्त बहस हो कि पुरुष को ऐसी बातों की स्वीकारोक्ति से इतना परहेज क्यूँ है।

बहरहाल ....अच्छी बात है कि कुछ लोग आगे आये। बात करना चाहते हैं। कुछ सार्थक हासिल करना चाहते हैं। नज़रिया बदलना चाहते हैं।

एजेंडा कभी डिक्लेर नहीं किया....शायद अब होना चाहिये।

काफिला बना है....मंजिल कुछ कुछ पता है.....रास्ता ढूँढना है.....

कुछ जायके का अंदाज़ा है....धीमी आँच पर कुछ बात पकानी है.....बीच में बात चलाते रहना है....कहीं कुछ जल बिगड़ ना जाये....
और बात बन जाये.....

सवाल कई हैं जिनपर ध्यान जाना चाहिये.....

• स्त्री के जन्म से पहले उसकी हत्या
-क्यों,इसके लिये क्या कर सकते हैं, क्या बदल सकते हैं
• बेटी और बेटे के बीच में पक्षेपात
क्यों,कैसे बदलें
• स्त्री के रूढ़िबद्ध व्यक्तित्व की छवि
क्यों विकसित हुई,कैसे बाहर निकालें इस छवि से
• समाज में क्या बदलाव लायें की एक माँ बच्चे के शिशुकाल में भी समाज को अर्थपूर्ण योगदान दे सकें
• प्रतिभाशाली लड़कियों के रास्तों में से बाधायें घटाने में समाज में क्या बदलें
• सरकार की कौन सी नीतियों पर पुनर्विचार करें कि माता पिता को लड़की से भी वही सुरक्षा का अहसास हो।
• पश्चिम सभ्यता को देख समझ परख कर किस तरह ध्यान रखें की जिन परेशानियों ने उन्हे आ घेरा है....हमें नहीं घेरे।


समान अवसर, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, उनमुक्त विचार......

इतना बेटी को देनें में जो अड़चनें हैं...उन्हे दूर करना होगा।

शायद कुछ पीछे जाकर अंतरावलोकन भी करना चाहिये कि समाज में ऐसी स्थिति का विकास किस अवस्था में हुआ । कारण जानने पर उपाय आसान होगा।

काफी हद तक यही लक्ष्य लेकर अभी तक चोखेर बाली चली है। पर अब शायद इसे एक स्वरूप की जरूरत है जहाँ इसके मकसद तक जाने के लिये कोई रेखाचित्र हो।

यह मंच भी उतना ही सक्षम और समर्थ हो सकता है जितना की इसको इस्तेमाल करने वालों के साथ खड़े रहने का सामर्थ्य......

बात कहने के लिये...ज़ोर से कहने की कभी जरूरत नहीं पड़ती.....

बात काटने के लिये भी नहीं....

गर बात में ही दम हो तो खुद अपने पैरों पर खड़ी हो जाती है.....

मंच नया है....आकर्षक है...आसपास ध्यान खिंचने की सँभावना बहुत है...

मंच के निपात का भी कुछ लोग बेसब्र हो इंतज़ार कर रहे हों.....

ऐसे में .....चोखेर बाली अपनी तमाम संभ्रान्ति को साथ रख....आगे कोई मकसद पाने में सक्षम हो ऐसा आशावाद मैं रखना चाहती हूँ।

दान

कुछ बातें ,कुछ शब्द बहस से परे ज़माने से हमारे -आपके परिवारों मे बोले सुने और दोहराये जाते है…मगर कहीं न कहीं मन मे अटकते और न जानें क्यों खटकते भी रहते है………


हमारे घर में नियम है जब सब लोग मिल बैठ्ते हैं तो किसी एक सदस्य को टार्गेट करके खूब हैरान किया जाता है । मस्ती मज़ाक़ चलता रहता है। उस दिन बारी मेरी थी । बातों बातों मे मेरे पापा बोल बैठे तुम्हारा कन्यादान करके मुझे बहुत पुण्य मिला दूसरी तरफ़ से मेरे बेटर हाफ़ चिढाते हुए बोले हाँ पापा वो दान मुझे मिला और मै भी उतने ही पुण्य का भागी हुआ सब खिलखिलाकर हस दिये,मै भी हस पड़ी । मगर उस एक पल मेरी नज़र माँ से टकरा गयी……हम दोनो की ही आँखो मे नमी थी । बात हंसी की थी ,हंसी मे ही उड़ा दी गयी । ऐसा नही कि पापा मेरे घर से जाने के बाद छिप छिप कर रोते नही, उदास नही होते । इस दान के बाद उन्हे कितना कष्ट हुआ मुझसे बेहतर कोई नहीं जानता मगर ना जानें क्यों मन घूम-फिर कर वही अटक गया कि जिसे दान मिला वो पुण्य का भागी,जिसने दान किया वो भीपरन्तु क्या कभी बेटी का दान हो सकता है ??/

Thursday, February 21, 2008

पतनशील स्‍वीकारोक्ति क्‍या कोई भड़ासी भोंपू है


हिंदी में बहसें कैसे होती हैं। जाना होता है, भदोही, पहुंच जाते हैं भटिंडा। किसी ने एक बहस शुरू की और हिंदी में कोई बात कही। तो कोई और, जिसे टूटी-फूटी फ्रेंच आती हो, (ठीक से हिंदी भी नहीं आती) बीच में कूदकर फ्रेंच में उसका जवाब देने लगता है। फिर कोई और टपक पड़ता है और बंगाली में कुछ-कुछ विचार फेंकता चलता है। फिर कोई किनारे से गुजरता है, और कहता है कि फारसी में मनीषा ने जो बात शुरू की है, उसका हिब्रू में जवाब बहुत शानदार बन पड़ा है।

पतनशील स्‍वीकारोक्ति पढ़कर किसी भड़ासी को लगता है कि उनके भड़ासी बैंड में एक और भोंपू शामिल हुआ, तो किसी को तुरत-फुरत में ये सफाई देने की जरूरत होती है, कि वो तो मुक्‍त ही पैदा हुई हैं, उनके घर की रसोई स्‍त्री-पुरुष समानता का प्रतीक है और वो पतित या पतनशील कतई नहीं हैं। जैसाकि पहले भी कहा गया कि कुछ लपुझन्‍नों की लार भी टपकने लगती है कि वाह, चलो अब कभी परंपरा, तो कभी प्रगतिशीलता के नाम पर लड़कियों को पटाने की जरूरत नहीं। ये पतिताएं तो खुद ही आकर गोदी में बैठने को तैयार हैं।

यह पतनशील स्‍वीकारोक्ति क्‍या कोई भड़ासी भोंपू है। कौन कह रहा है कि लड़कियां अपने दिल की भड़ास निकाल रही हैं। यह मुल्‍क, यह समाज तो स्त्रियों के प्रति अपने विचारों में आज भी मध्‍य युग के अंधेरों से थोड़ा ही बाहर आ पाया है और वो बदलते बाजार और अर्थव्‍यवस्‍था की बदौलत। नहीं, तो अपने दिलों में झांककर देख लीजिए। हमारे प्रगतिशील साथी बलात्‍कार पर अदम गोंडवी की एक बेहद दर्दनाक कविता पढ़ रहे हों तो लगता है कि उनका मुंह नोंच लो। 'बैंडिट क्‍वीन' जैसी फिल्‍म के सबसे तकलीफदेह हिस्‍सों पर हॉल में बैठे लोग सीटियां बजाते मन-ही-मन उस आनंद की कल्‍पना में मस्‍त हो रहे होते हैं, बगल में बैठा कोई शूरवीर आपको देखकर बाईं आंख भी दबा देता है।

कैसा है यह मुल्‍क। इस इतने पिछड़े और संकीर्ण समाज में बिना सिर-पैर के सिर्फ भड़ासी भोंपू बजाने का परिणाम जानते हैं आप। आपको जरूरत नहीं, जानने की। अर्जुन की तरह चिडि़या की आंख दिख रही है। पतनशीलता के बहाने अपनी थाली में परोसी जाने वाली रसमलाई।

मैं यह बात आज इस तरह कह पा रही हूं, क्‍योंकि मैंने कुछ सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक सहूलियतें हासिल कर ली हैं। लेकिन सुल्‍तानपुर के रामरतन चौबे की ब्‍याहता और प्राइमरी स्‍कूल टीचर की 16 साल की बेटी से मैं इस भड़ासी बैंड के कोरस में शामिल होने को नहीं कह सकती। उनसे कुछ कहूंगी भी तो यही कि खूब-खूब पढ़ो, अपने मन और बुद्धि का विस्‍तार करो, इस काबिल बनो कि अपने लिए चार कपड़े, किताबें और सिर पर छत के लिए किसी मर्द की मोहताज न होओ। छत पर बिना दुपट्टा जाने को न मिले - न सही, पैर फैलाकर बैठने को न मिले - न सही, तेज चलने से कोई रोके तो कोई बात नहीं। किताब तो पढ़ने को मिलती है न। किताब पढ़ो, और उन किताबों के रास्‍ते वहां तक पहुंचो, जब तुम्‍हारे दुपट्टा उतार देने पर भी कोई मुंह नहीं खोलगा, क्‍योंकि तुम्‍हारे व्‍यक्तित्‍व और बुद्धि की ऊंचाइयां उनके मुंह को चाक किए रहेंगी।

यशवंत जी, आपके सारे सुझाव एक गरीब, दुखी देश की दुखी लड़कियों के रसालत में पड़े जीवन को और भी रसातल में लेकर जाते हैं। मेरी पतनशील स्‍वीकारोक्तियों का सिर्फ और सिर्फ एक प्रतीकात्‍मक महत्‍व है। उसे उम्‍दा, उत्‍तम, अति उत्‍तम स्‍त्री विमर्श का ताज मत पहनाइए। ऐसे सुझाव देने से पहले ये तो सोचिए कि आप किस देश, किस समाज के हिस्‍से हैं। मुझ जैसी कुछ लड़कियां, जिन्‍होंने कुछ सहूलियतें पाई हैं, जब वो नारीवाद का झंडा हरहराती हैं, तो क्‍या उनका मकसद लड़कर सिर्फ अपनी आजादी का स्‍पेस हासिल कर लेना और वहां अपनी विजय-पताका गाड़ देना है। मैं तो आजाद हूं, देखो, ये मेरी आजाद टेरिटरी और ये रहा मेरा झंडा।

आपको लगता है कि स्‍त्री-मुक्ति इस समाज के बीच में उगा कोई टापू है, या नारियल का पेड़, जिस पर चढ़कर लड़कियां मुक्‍त हो जाएंगी और वहां से भोंपू बजाकर आपको मुंह बिराएंगी कि देखो, मुक्ति के इस पेड़ को देखो, जिसकी चोटी पर हम विराजे हैं, तो हमें आपकी अक्‍ल पर तरस आता है। तिनका-तिनका आजादी पाई किसी भी स्‍त्री का अगर स्‍त्री की वास्‍तविक मुक्ति के प्रति थोड़ा भी सरोकार है, तो ऐसा कोई बाजा बजाने के बजाय वो पढ़ेगी, और खूब-खूब पढ़ेगी, अपनी आजादी को पोज करने के बजाय बड़े फलक पर चीजों को समझने की कोशिश करेगी, वह वास्‍तवकि अर्थों में बौद्धिक और भावनात्‍मक रूप से एक मुक्ति और आत्‍मनिर्भरता हासिल करेगी।

ये सब कैसे होगा, इस पर और भी बहुत कुछ गुनना-बुनना होगा। लेकिन फिलहाल भडा़सी बैंड की सदस्‍यता से हम इनकार करते हैं। आप अपने कोरस में मस्‍त रहें।

Wednesday, February 20, 2008

सिर्फ और सिर्फ पतन, कोई मूल्य वूल्य की शर्त न थोपो

यशवंत सिंह
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मनीषा ने जो लिखा, मैं पतित होना चाहती हूं, दरअसल ये एक जोरदार शुरुआत भर है। उन्होंने साहस बंधाया है। खुल जाओ। डरो नहीं। सहमो नहीं। जिन सुखों के साथ जी रही हो और जिनके खोने का ग़म है दरअसल वो कोई सुख नहीं और ये कोई गम नहीं। आप मुश्किलें झेलो पर मस्ती के साथ, मनमर्जी के साथ। इसके बाद वाली पोस्ट में पतनशीलता को एक मूल्य बनाकर और इसे प्रगतिशीलता के साथ जोड़ने की कोशिश की गई है। यह गलत है।

दरअसल, ऐसी ऐतिहासिक गल्तियां करने वाले लोग बाद में हाशिए पर पाए जाते हैं। कैसी प्रगतिशीलता, क्यों प्रगतिशीलता? क्या महिलाओं ने ठेका ले रखा है कि वो एक बड़े मूल्य, उदात्त मूल्य, गंभीर बदलाव को लाने का। इनके लिए पतित होने का क्या मतलब? ये जो शर्तें लगा दी हैं, इससे तो डर जाएगी लड़की। कहा गया है ना...जीना हो गर शर्तों पे तो जीना हमसे ना होगा.....। तो पतित होना दरअसल अपने आप में एक क्रांति है। अपने आप में एक प्रगतिशीलता है। अब प्रगतिशीलता के नाम पर इसमें मूल्य न घुसेड़ो। कि लड़ाई निजी स्पेस की न रह जाए, रिएक्शन भर न रह जाए, चीप किस्म की चीजें हासिल करने तक न रह जाए, रात में घूमने तक न रह जाए, बेडरूम को कंट्रोल करने तक न रह जाए....वगैरह वगैरह....। मेरे खयाल से, जैसा कि मैंने मनीषा के ब्लाग पर लिखे अपने लंबे कमेंट में कहा भी है कि इन स्त्रियों को अभी खुलने दो, इन्हें चीप होने दो, इन्हें रिएक्ट करने दो, इन्हें साहस बटोरने दो.....। अगर अभी से इफ बट किंतु परंतु होने लगा तो गये काम से।

मेरे कुछ सुझाव हैं, जिस पर अगर आप अमल कर सकती हैं तो ये महान काम होगा.......

1- हर महिला ब्लागर अपने पतन का एलान करे और पतन के लक्षणों की शिनाख्त कराए, जैसा मनीषा ने साहस के साथ लिखा। अरे भइया, लड़कियों को क्यों नहीं टांग फैला के बैठना चाहिए। लड़कियों को क्यों नहीं पुरुषों की तरह ब्लंट, लंठ होना चाहिए....। ये जो सो काल्ड साफ्टनेस, कमनीयता, हूर परी वाली कामनाएं हैं ये सब स्त्री को देवी बनाकर रखने के लिए हैं ताकि उसे एक आम मानव माना ही न जाए। तो आम अपने को एक आम सामान्य बनाओ, खुलो, लिखो, जैसा कि हम भड़ासी लिखते कहते करते हैं।

2- सबने अपने जीवन में प्रेम करते हैं, कई बार प्रेम का इजाहर नहीं हो पाता। कई बार इजहार तो हो जाता है पर साथ नहीं जी पाते....ढेरों शेड्स हैं। लेकिन कोई लड़की अपनी प्रेम कहानी बताने से डरती है क्योंकि उसे अपने पति, प्रेमी के नाराज हो जाने का डर रहता है। अमां यार, नाराज होने दो इन्हें.....। ये जायेंगे साले तो कई और आयेंगे। साथ वो रहेगा जो सब जानने के बाद भी सहज रहेगा। तो जीते जी अपनी प्रेमकहानियों को शब्द दो। भले नाम वाम बदल दो।

3- कुछ गंदे कामों, पतित कृत्य का उल्लेख करो। ये क्या हो सकता है, इसे आप देखो।

4- महिलाओं लड़कियों का एक ई मेल डाटाबेस बनाइए और उन्हें रोजाना इस बात के लिए प्रमोट करिए कि वो खुलें। चोखेरबाली पर जो चल रहा है, उसे मेल के रूप में उन्हें भेजा जाए।

5- छात्राओं को विशेष तौर पर इस ब्लाग से जोड़ा जाए क्योंकि नई पीढ़ी हमेशा क्रांतिकारी होती है और उसे अपने अनुरूप ढालने में ज्यादा मुश्किल नहीं होतीं। उन्हें चोखेरबाली में लिखने का पूरा मौका दिया जाए।

6- एक ऐसा ब्लाग बनाएं जो अनाम हों, वहां हर लड़की अनाम हो और जो चाहे वो लिखे, उसे सीधे पोस्ट करने की छूट हो, भड़ास की तरह, ताकि आप लोग गंभीरता व मूल्यों के आवरण में जिन चीजों को कहने में हिचक रही हैं, जिस युद्ध को टाल रही हैं, इस समाज के खिलाफ जिस एक अंतिम धक्के को लगाने से डर रही हैं, वो सब शुरू हो जाए।

जय चोखेरबालियां
यशवंत

एक कमरा अपना ........

प्रत्यक्षा की पोस्ट के बाद मनीषा ने कल अपनी बात को और स्पष्ट किया । दोनो पूरक सी लगीं ।बहुत सी और भी बातें है जिन्हे कहना बाकी है । पर अभी ज़रूरी है कि प्रत्यक्षा की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी जो इसी पोस्ट पर आयी उसे यहाँ रखूँ --

मनीषा, पतन का उतना ही मूल्य है जितना प्रगति का। दो छोर के हद हैं। और पतनशीलता को प्रगतिशीलता के बराबरी पर लाने का काम हम न करें क्योंकि तब बहुत कुछ हमारी दशा सत्तर के दशक के ब्रा बर्नर्स सी हो जायेगी। सिर्फ प्रतीक के नाम पर कुछ सनसनीखेज खिलवाड़ भर।

माया आंजेलू ने सत्तर के दशक में ‘आइ नो..’ लिखी थी। किताब बेहद चर्चित हुई थी पर साथ ही साथ कई डेवियंट बिहेवियर को प्रोमोट करने के लिये दुशचर्चित भी हुई थी । इसी आसपास रैडिकल फेमिनिस्टस ने एक सिम्बॉलिक ब्रा बर्निंग का भी आयोजन किया था। वहाँ भी मज़े की बात ये हुई कि मिस अमेरिका पैजेंट में, ’औरत एक शरीर है’, का विरोध करने के लिये एक भेड़ को ताज पहनाया गया , अपने ऊँची एड़ी वाले जूते ,कॉस्मेटिक्स और ब्रा को आज़ादी कूड़ेदान में डाला गया । सार्वजनिक ब्रा बर्निंग जैसा कुछ नहीं हुआ था पर जनचेतना में फेमिनिस्म का दूसरा लहर जो साठ सत्तर के दशक में शुरु हुआ था, का इससे ज़्यादा विज़िबल प्रतीक और कोई नहीं ।

जर्मेन ग्रीयर ने सत्तर में ‘फीमेल यूनक’ और फिर दसेक साल बाद ‘सेक्स एंड डेस्टिनी’ लिखा तब जितने उनके समर्थक थे उतने ही डिट्रैक्टर्स थे । बेटी फ्रीदान ने ‘द फेमिनिन मिस्टीक’ में औरत को अपनी पूर्णता अपने पति और बच्चों से परे पाने की घोषणा की थी। सामाजिक संरचना बदल डालने की। ये सब तरीके थे , पहले कदम थे अपने आप को पहचानने के।

फेमिनिस्म के इतने कदमताल में मुझे सिमोन बोवुआ की एक बात बहुत सही लगती है ,कि औरतें सदियों से अपनेआप को अब्नॉर्मल समझती रहीं, मेरी वॉल्स्टोनक्राफ्ट के अनुसार तो औरतों को पुरुषों सरीखा बनने की आकांक्षा रखनी चाहिये। तो पुरुष अगर नॉर्मल हैं तो हम स्वाभाविक रूप से अबनॉर्मल। सिमोन का कहना था कि जब तक इस बेसिक प्रेमाईस से हम अलग नहीं होंगे हम एक कदम आगे नहीं बढ़ सकते ।

शायद सिमोन बोवुआ की यही बात मैं कहना चाह रही थी। अपने को पुरुषों के बनाये ढाँचे के हिसाब से मत मूल्याँकन करो। अलग हटो , दूर जाओ , अपने माप दंड खुद बनाओ , अपनी ज़मीन खुद तय करो।

साँस लेने भर से तुम बुरी औरत कैसे बन जाती हो। इसलिये कि किसी पुरुष ने कहा ? तुमने खुद को क्या कहा ? यही कि साँस लेने से मैं जीवित रहती हूँ । अच्छा या बुरा ये मैं तय करूँगी। पतनशीलता का सैटायर भी अगर इस्तेमाल होता है तो कहीं किसी पुरुष दोहरी मानसिकता का भार अब भी हम ढो रहे हैं। जब माया आंजेलू ने बैड वोमन इस्तेमाल किया वो चालीस साल पहले की बात है। अब नये बिम्ब का इस्तेमाल हम करें , अपने बनाये बिम्बों का।

और जब हर औरत अपना स्पेस तय करेगी कोई न कोई पैराडाईम शिफ्ट तो अपने आप होगा। ये स्पेस पाने की पहली शुरुआत ‘ऐसा’ सोचना है। सोचो , फिर करो। अगर मैं ये सोचती हूँ , मैं ये चाहती हूँ , नहीं कहोगी तो करोगी कैसे ? कोई दूसरा तुम्हें कुछ देने नहीं आयेगा। इसे संयत तरीके से लेना पड़ता है , स्वाभाविक बनाना पड़ता है। लम्बी लड़ाई है और हर कोई अपने तरीके से करता है । तुम अपने तरीके से कर रही हो , मैं अपने तरीके से और कोई कमज़ोर औरत जो थकहार कर आत्महत्या कर लेती है , वो भी अपने तरीके से कोई विरोध तो दर्ज़ कर ही रही होती है। कहीं न कहीं कोई उससे सबक ले रहा होता है। बस सिर्फ एक बात बेहद ज़रूरी है एक जगह पर खड़े रहकर मार्चपास्ट न करते रहें। कुछ कदम आगे भी बढते चलें।

अच्छा हो अगर मेरी पिछली पोस्ट भी यहाँ शुरु में डाल दी जाय । फिर सुजाता का कहा .. वाकई पूरक हो जायेगा ।

बातचीत ऐसे ही चलती रहे । आनंद आया और उम्मीद है कुछ और सार्थक बातें भी जुड़ती रहेंगी ।
प्रत्यक्षा की पोस्ट का लिंक ऊपर दिया है । सन्दर्भ के लिए उसे ज़रूर देखें ।वहीं से दो टिप्पणियाँ यहाँ चिपका रही हूँ

विखंडन said...
तो आओ चलो सब " अपनी मर्जी" से जिए ओर लिखे चाहे वो स्त्री हो या पुरुष कोई किसी कि नही सुनेगा । पर क्या वाक्य ही खालिस "अपनी मर्जी" जैसी कोई चीज हो सकती है क्या । क्या वाक्य ही व्यक्ति " अपनी मर्जी" से जी सकता है।

अनूप भार्गव said...
सब से पहले तो सार्थक लेखन के लिये बधाई ।
अक्सर मैं गद्य में लिखने से कतराता हूँ लेकिन इस बार कुछ कहने की इच्छा हो रही है ।
अलग अलग कुछ बिखरे बिखरे से विचार हैं , ज़रूरी नहीं कि कुल मिला कर कुछ अर्थ निकले ही :

-तुम्हारी लगभग हर बात में अगर ’चाहती’ की जगह ’चाहता’ लगा दिया जाये तो कोई अन्तर नहीं पड़ेगा ।
-अपने ढंग से अपनी ज़िन्दगी को जीने की चाह किसी को भी हो सकती है ।
-हाँ अगर यह चाह किसी स्त्री की है तो रास्ता कुछ ज़्यादा कठिन हो जाता है ।
-इस कठिन रास्ते को उसे खुद ही तय करना है । यदि पूर्वाग्रह रास्ते में आते हैं तो उसे निजी स्तर पर ’वन परसन ऐट ऐ टाइम’ निपटना होगा । कोई सरल रास्ता नहीं है ।
-सरल रास्ता है तो सही लेकिन वह ’पहले गुज़रे हुए रास्तों से ही हो कर जाता है" । किसी भी तरह के परिवर्तन की गुंजाइश नहीं छोड़ता ।
-लडाई सिर्फ़ अपने लिये लड़ी जा सकती है या फ़िर पूरे समाज को बदलने के लिये ।
-इन दोनों में से कौन सी लड़ाई लड़नी है , इस का फ़ैसला भी स्वयं ही करना होगा ।
-फ़ैसला चाहे कुछ भी हो, होना सिर्फ़ अपने लिये चाहिये किसी बात को सिद्ध करने के लिये नहीं और ना ही किसी की अपेक्षाओं पर खरे उतरने के लिये ।

अभी बस इतना ही .....

Tuesday, February 19, 2008

‘पतनशीलता’ क्‍या कोई मूल्‍य है

प्रत्‍यक्षा जी, पतनशीलता क्‍या कोई मूल्‍य है। पतन मूल्‍य कैसे हो सकता है। अच्‍छे और बुरे की, सत्‍य और असत्‍य की, उदात्‍त और पतित की सारी परिभाषाएं हर देश, काल और विचारधारा में कमोबेश समान होंगी। जो बात वस्‍तुत: पतित है, स्‍त्री मुक्ति के विमर्श में वह उन्‍नत कैसे हो जाएगी। नहीं होगी। ऐसा सोचना समझदारी की बुनियादी जमीन से ही विचलन है।

माया एंजिलो अपनी ऑटोबायोग्राफिकल राइटिंग, 'आई नो, व्‍हाय द केज्‍ड बर्ड सिंग्‍स' में ऐसी ही बैड वुमेन होने की बात कहती हैं। रंग के आधार पर बंटे समाज में वह काली है, अमीर और गरीब के खांचों में बंटे समाज में वह गरीब है और औरत और मर्द के शक्ति समीकरणों में बंटे समाज में वह एक औरत है। वह गरीब, काली और औरत, तीनों एक साथ है, जिसके नियमों को मानने के बजाय वो एक बुरी औरत होना चाहती है। 'ए रुम ऑफ वंस ओन' में वर्जीनिया वुल्‍फ ने भी एक मुक्‍त और बुरी औरत के बारे में लिखा है।

सिमोन, माया एंजिलो, वर्जीनिया सबके यहां ये बुरी औरत एक सटायर है, एक व्‍यंग्‍य। मुझे सांस लेने के लिए बुरी औरत बनना पड़ेगा तो ठीक है, बुरी ही सही, लेकिन सांस तो मैं लूंगी। लेकिन ये बुरी औरतें बुरे होने से शुरुआत करके न सिर्फ स्‍त्री समुदाय, बल्कि पूरी मनुष्‍यता को उदात्‍त करने की दिशा में जाती हैं। वो विचार, जीवन, कर्म सबमें एक वास्‍तविक मनुष्‍य की मुक्ति का लक्ष्‍य हासिल करती हैं। कर्म, रचनात्‍मकता और आत्‍म-सम्‍मान से भरा जीवन जीती हैं। उनकी पतनशीलता इस दुनिया के प्रति एक व्‍यक्तिवादी रिएक्‍शन और सिर्फ अपने लिए स्‍पेस पा लेने भर की लड़ाई नहीं है।


यह पतनशीलता का सटायर एक चीप किस्‍म की निजी आजादी में बदल जाएगा, अगर उसके साथ विचार, कर्म और रचनात्‍मकता का व्‍यापक फलक न हो। वह स्‍त्री मुक्ति के साथ समूची मानवता और मनुष्‍य मात्र की मुक्ति के स्‍वप्‍नों से जुड़ा न हो। अपने अंतिम अर्थों में वह एक बेहतर मनुष्‍य समाज के निर्माण के स्‍वप्‍न और कर्मों से संचालित न हो। यह अपनी कुछ खास वर्गीय और सामाजिक सुविधाओं का लाभ उठाते हुए दारू-सिगरेट पी लेने, रात में घूम लेने, एक सुविधा और सेटिंग से मिली नौकरी को अपनी आजाद जीवन की उपलब्धि की माला समझकर गले में टांगकर मस्‍त होने की बात नहीं है। ऐसा तो बहुत सारी औरतें कर लेती हैं, लेकिन वह मुक्‍त तो नहीं होतीं। वह पतित भी नहीं होतीं, क्‍योंकि जिस वर्गीय परिवेश से वो आती हैं, वहां वह पतनशील मूल्‍य नहीं है। दारू पीना मेरे घर में पतित मूल्‍य है, लेकिन सुष्मिता सेन के घर में तो नहीं होगा। रात 12 बजे दफ्तर से घर लौटना मेरे घर में पतनशील मूल्‍य नहीं है, लेकिन बेगूसराय के सरकारी स्‍कूल मास्‍टर चौबे जी के लिए बहुत बड़ा पतनशील मूल्‍य है। हंडिया, बस्‍तर, लखनऊ, मुंबई और पेरिस के समाजों में स्‍त्री के लिए पतनशील मूल्‍य अलग-अलग हैं। एक जगह जो पतित है, वह दूसरी जगह बड़ी सामान्‍य बात है।

‘पतनशील’ - इस शब्‍द की प्रतीकात्‍मकता को समझना और अपने विचारों को बड़े फलक पर देखना बहुत जरूरी है। और मुक्ति भी तो ऐसी कि ‘मैं ये होना चाहती हूं’ जैसी नहीं होती। मैं कोई चीज सिर्फ इसलिए नहीं कर सकती, क्‍योंकि मैं ये करना चाहती हूं। कोई स्‍त्री भी उतनी ही मुक्‍त होती है, जितना मुक्‍त वह समाज हो, जिसमें वह रहती है। मेरी मुक्ति का स्‍पेस उतना ही है, जितना मेरे जीवन का भौतिक, वर्गीय परिवेश मुझे प्रदान करता है। यह मुक्ति, अपने मन-मुताबिक जीने की इच्‍छा मेरे जींस की जेब में रखा लॉलीपॉप नहीं है, कि जब जी में आया, उठाया और खाया।

बेशक, यह बड़े सवाल हैं, बड़ा स्‍वप्‍न, बड़े विचार और बहुत बड़ा संघर्ष। इसे समझने के लिए बड़ी नजर, बड़ी समझ, बड़े विवेक और बड़े श्रम की जरूरत होगी।

एक और कायर

इस कविता में भी मैं एक आत्महत्या के विषय में लिख रही हूँ । मैं आत्महत्या को बिल्कुल भी सही नहीं मानती । यह गलत है । हर हाल में गलत है । एक जीवन को समाप्त करना, चाहे वह अपना ही क्यों न हो, विशेषकर, तब जब यह जीवन सम्भावनाओं से भरा हुआ हो, सर्वथा गलत है । किन्तु मैं उन परिस्थितियों के बारे में लिखना चाहती हूँ जो किसी को ऐसा कदम उठाने की तरफ बढ़ने में सहायता करते हैं । थोड़ा सा सहारा, थोड़ा सा सकारात्मक रवैया शायद उन्हें ऐसा करने से रोक दे । तब भी कुछ लोग बिना किसी को अपना दुख बताए शायद जीवन समाप्त कर लें, तब शायद कोई भी उनकी सहायता न कर सके । किन्तु अधिकतर मामलों में लोग मरना नहीं चाहते । वे मृत्यु को तभी चुनते हैं जब उन्हें सारे रास्ते बंद नजर आते हैं । जब वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनों से सहायता माँग चुके होते हैं और जब उन्हें विश्वास हो जाता है कि कोई उनकी सहायता नहीं करेगा विशेषकर उनके अपने ।
यहाँ पर मैं एक विवाहिता नवयौवना की पीड़ा के विषय में लिख रही हूँ । उसे अपने पति या ससुराल से क्या शिकायत थी लिखना कोई आवश्यक नहीं है । आप स्वयं ही कयास लगा सकते हैं । जो अधिक महत्वपूर्ण है वह है उसके अपनों का उसके प्रति संवेदना रहित व्यवहार !वह केवल थोड़ा सा सहारा चाहती थी ..........
एक और कायर

मैंने चाहा था हँसकर जीना
जीवन मेरा हो गया दुश्वार
बहती जलधारा सी मैं थी
मैं बन गई बांध बंधी धार
जितना मैंने उड़ना चाहा
पंख मेरे थे उसने कतरे
माँ से भी मैं बोली थी
अब ऐसे ना जी पाऊँगी
आ माँ, मुझे ले जा ले आकर
जीवन मेरा बना अंगार
कहती थी वह बिटिया मेरी
कैसे भी निभा तू लेना
अब ना वापिस तुझे ला पाऊँगी
मेरी भी तू सोच कुछ
कैसे समाज में मुख दिखलाऊँगी ।


सारे रास्ते जब बंद हो गए
जीवन से थी मैंने पाई हार
सुलगा कर इक माचिस को मैंने
करना चाहा जीवन उद्धार
मरने पर तो सब जलते हैं
पर मैं बन गई जीती मशाल ।


आज मुझे कायर तुम कहते हो
कहाँ गई थीं कल ये सब बात
मैंने भी था जीवन जीना चाहा
पर ना जीने देते थे हालात
ओ बड़ी बातें करने वालो
क्या तुम दे पाते मेरा साथ
तुम जलती माचिस को छू लो
फिर देना मुझे उपदेश
ओ मुझे कायर कहने वालो
क्या जानो तुम दर्द मेरा
कैसे होता है मन इतना पीड़ित
कि जीवन ज्योति बुझा हम पाते
तुमने तो दुनिया देखी है
क्यों न मुझे तुम लौटा थे लाते ।


इतना ही तो मैंने चाहा था
कुछ ऐसा हो जाए कि मैं
कर पाऊँ नवजीवन की शुरुआत
कुछ दिन मुझे सबल बनाते
अपने घर में मुझे ठहराते
मेरे घावों पर मरहम लगाते
फिर कोई नई राह निकलती
अपनी मंजिल खुद पा लेती ।

सुलग रही जब आत्मा चिता सी मेरी
क्यों तुम ना थे तब आग बुझाते
देखो मैं हवन कुंड बन गई
जीवित हूँ पर भूत बन गई
पोर पोर में होती पीड़ा
बाल मेरे हैं झुलसाए
अब तो मेरे अपने भी
मुझसे हैं आँख चुराएँ ।


कुछ घंटों या दिन की ये पीड़ा
जीवन पर्यन्त सुलगने से बेहतर
मन आत्मा की पीड़ा के बदले
जलने की पीड़ा को गले लगाया
नारकीय जीवन से मुक्ति दिलाए
वह मृत्यु ही अब मुझे है भाए ।

जीने की हुई खत्म लालसा
मरने की थी बेला आई
जीने के इस अद्भुत खेल में
हार सदा से मैं पाती आई
अब तुम जाओ रपट लिखाओ
मेरे मरने का केस बनाओ
जीते जी ना साथ दे सके
अब मरने पर रस्म निभाओ ।
घुघूती बासूती



चोखेर बाली आगंतुक कथा वाया स्टेट काउंटर

कल प्रत्यक्षा ने लिखा था कि आपकी नींद हराम क्यों ? दूसरों के सेट पर डाह क्यों ? आज हम भी कहने वाले हैं यही । नीलिमा जी ने कल पहुँचाए आंकडो का विश्लेषण छापा है । उसे जस का तस छाप रही हूँ ।

चोखेर बाली आगंतुक कथा वाया स्टेट काउंटर

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सराय से मिले पैसे से हम बौद्धि‍क रूप से गुलाम तो खैर हो ही रहे थे :) पर साथ ही साथ एक काम और कर रहे थे (आप चाहें तो मान लें कि ये काम गौण था) यह था शोध करना। इस दौरान आंकड़ों में मतलब आवाजाही वगैरह के, झांकने के काम में कुछ कुछ समझ बनी थी। शायद इसलिए ही सुजाता ने जो चोखेरबाली देखती हैं मुझे आदेश (छोटों के आग्रह भी आदेश होते हैं और बड़ों के आदेश भी सलाह भर:)) दिया कि चोखेरबाली के स्‍टेटकाउंटर आंकड़े देखूं, ये क्‍या कहते हैं...मैंने उस एक्‍सेल फाइल को देखा और कुछ कुछ हैरानी हुई। इससे पहले एग्रीगेटरों के आंकड़ों को देखा था और उन पर पोस्‍ट लिखीं थीं। अपने खुद के ब्‍लॉगों के आंकड़ें देखते हैं और उनपर कोई पोस्‍ट नहीं लिखते :)। पर चोखेरबाली के आंकड़ों में कुछ अलग बात है-





आप कह सकते हैं कि इसमें अलग क्‍या है, आखिर चोखेरबाली एक नया ब्‍लॉग है सिर्फ दस दिन पुराना उस लिहाज से 220 की औसत से पेजलोड कम नहीं है। पर हमारा इशारा उस ओर नहीं है हम कहना चाहते हैं कि पेजलोड और यूनीक विजीटर के बीच का अंतराल देखें।औसत पेजलोड हैं 219 और यूनीक विजीटर औसत 76. इतना अधिक अंतराल सामान्‍यत: एग्रीगेटरों में तो देखा जाता है- मसलन नारद की विवादकालीन आवाजाही में यूनीक विजीटर व पेजलोड के बीच इतना अधिक अंतर था किंतु किसी ब्‍लॉग के लिए ये कुछ सामान्‍य नहीं है।

आसान भाषा में इसका क्या मतलब है ? हमारी अनंतिम सी व्‍याख्‍या इस प्रकार है-

1. सबसे पहली बात तो यह कि सामुदायिक ब्लॉगों और निजी ब्‍लॉगों के ट्रेफिक पैटर्न में अंतर है- अगर मोहल्‍ला और भड़ास या हिन्‍दयुग्‍म के आंकड़ों से तुलना करें तो और बेहतर तस्‍वीर मिले पर प्रथम दृष्‍टया तो लगता है कि सामुदायिक ब्‍लॉग लोग अलग अपेक्षाओं से पढ़ते हैं। पोस्‍ट संख्‍या का अधिक होना भी एक भूमिका अदा करता है।
लेकिन मूल बात जो चोखेरबाली में दिखाई दे रही है वह यह है कि ये वाकई चोखेरबाली है, खटकने वाला ब्‍लॉग...कुछ लोग बार बार वापस आकर देख रहे हैं...हम्‍म क्‍या हुआ...क्‍या हुआ। बाकी जबरदस्‍त इग्नोर मार रहे हैं।
2. क्‍यों झांक रहे हैं बार बार...? मुझे लगता है टिप्‍पणियॉं।। जी संभवत पहली बार ब्‍लॉग में पोस्‍ट से ज्‍यादा आकर्षण टिप्‍पणियों का है, इतना कि टिप्‍पणियॉं ट्रेफिक ला रही हैं।इस ब्‍लॉग पर 'अच्‍छा है' लिखने वाले आमतौर पर नदारद है ( चिट्ठे 'अच्‍छा है' के खिलाफ तो बाकायदा झंडा लिए है, कुछ अच्‍छा नहीं है, हम पतनशीला हैं, बोलो क्‍या कल्‍लोगे) और टिप्‍पणियॉं लंबी हैं विमर्शात्‍मक हैं तल्ख भी हैं।
3. एक अन्‍य अपुष्‍ट बात ये है कि एग्रीगेटरों के स्थान पर चिट्ठासंसार में अब ध्रुवीकरण सामुदायिक ब्‍लॉगों के इर्द गिर्द होने वाला है- इस विषय पर अगली किसी पोस्‍ट में लिखूंगी।
4. जो बात आंकड़ों से नहीं दिख रही वह यह कि इस चिट्ठे को लेकर ही ऐसी विचित्र प्रतिक्रिया क्‍यों है? पर इस बात को समझने के लिए आंकड़ों को नहीं समाज को देखने की जरूरत है। चिट्ठों में स्त्रियों से 'भाभीजी', 'माताजी' खानपान, हे हे हे टाईप लेखन की उम्‍मीद रही है। चोखेरबाली चुभने के लिए आया है और चुभ रहा है।


डिस्‍क्‍लेमर : कमलजी व आलोकजी शेयरटिप्‍स देते हुए लिख देते हैं कि इस कंपनी में लेखक का निवेश हो सकता है...हम भी कहे देते हैं कि यूँ हमने आंकड़ों का ही विश्‍लेषण किया है पर चोखेरबाली के हम भी सदस्‍य हैं।

Monday, February 18, 2008

हाथ लगा के तो देख ..!

दिलीप भाई ने यह लेख भेजा है अभी कुछेक घँटे पहले खास चोखेर बाली के लिए । इसे जस का तस प्रकाशित कर रही हूँ ।

आर. अनुराधा

जनसत्ता में आज (यानी 18 फरवरी , 2008 को ) मेरा ये लेख दुनिया मेंरे आगे कॉलम में छपा है। कहानी एक बहादुर महिला की है जो इस समय देश की चर्चित फोटोग्राफर होने की वजह से जानी जाती हैं। ये उनकी निजी कहानी है। ब्लॉग जगत के लिए वो लेख यहां पेश है।

यह एक आम हिंदुस्तानी औरत की उससे भी आम कहानी है। फर्क सिर्फ यह है कि इस औरत ने अपनी कहानी का सूत्र आखिरकार अपने हाथ में लेने की हिम्मत जुटाई और समाज के हाथों में सब कुछ न छोड़ कर जिंदगी को अपने मुताबिक आगे बढ़ाया। तमाम रुकावटों के बावजूद अपने आत्म-सम्मान और आत्मविश्वास को जिंदा रखा और उनके सहारे उन ऊंचाइयों ( समुद्रतल से 18000 फीट) तक पहुंची जहां पुरुष भी आम तौर पर जाने की हिम्मत नहीं कर पाते।

उसका बचपन एक निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार में पिछड़े से इलाके में लड़की होने की तमाम कठिनीइयों और बंदिशों के बीच बीता। पढ़ने की ललक तो थी पर वैसे बेहतरीन नतीजे लाने के साधन नहीं, शायद साहस भी नहीं। इसी बीच एक दिन बड़ा भाई उसकी सगाई कर आया। उसे पता चला तो उसने मना कर दिया कि शादी नहीं, वह तो कानून की पढ़ाई करेगी। इस बात पर उसे फुटबॉल बनाकर दनादन पीटा गया, बांध कर एक कोने में पटक दिया गया और खाना-पीना बंद कर दिया गया। और फिर तय दिन लाल साड़ी में बंधी, सिंदूर-आलता और गहनों से सजी उस पोटली को गाजे-बाजे के साथ एक ऐसे इंसान के हवाले कर दिया गया जिसके लिए बीबी का मतलब था- उसकी शारीरिक, पारिवारिक और सामाजिक जरूरतों को पूरा करने वाली एक गुलाम।

यहां उसे मिली और भी ज्यादा मार-पिटाई, गाली-गलौच दूध उफन जाने जैसी छोटी बात पर भी। कोई 10 साल तक यह सब उसकी दिनचर्या में शामिल रहा। बचाव और राहत के लिए उसने माता-पिता की तरफ देखा तो उन्होंने नेक सलाह देकर अपना कर्तव्य पूरा किया- "क्यों हंगामे करती हो। चुपचाप सब सह जाओ। शादी हो गई है, अब निभाना ही पड़ेगा।"

फिर एक दिन एक छोटी सी घटना ने अनजाने ही उसके साहस और आत्मसम्मान को सोते से जगा दिया। घर की बालकनी से उसका फेंका हुआ कूड़ा नीचे से गुजर रहे व्यक्ति पर गिरा तो वह गुस्से में आग-बबूला होकर ऊपर घर तक आ पहुंचा। लाख माफी मांगने पर भी वही अभद्र भाषा और बालकनी से उठाकर सीधा नीचे फेंक देने की, जान से मार देने की धमकी! इस पर भी पति ने उसका बचाव नहीं किया। उसने खुद ही, जाने कहां खो गई हिम्मत का सिरा पकड़ा और कड़क आवाज में धमकी का जवाब दिया- ' हाथ लगा के तो देख!' इस पर वह पड़ोसी बुड़बुड़ाता हुआ भाग निकला। इधर, जिसे वह बरसों से अपना सुरक्षा कवच समझे बैठी थी, वह उसी की ओर मुंह किया हथियार साबित हुआ। जिससे सांत्वना के दो शब्दों की उम्मीद कर रही थी, वह खुद फिर गाली-गलौच और मार-पीट पर उतर आया। उस लड़की के भरोसे का तार-तार हो चुका पर्दा आखिरकार पूरी तरह जमीन पर आ गिरा।

यह उसकी सहनशीलता की हद थी। उसे समझ में आ गया कि अपनी ताकत उसे खुद बनना पड़ेगा। और वह घर छोड़ कर निकल पड़ी अपने लिए बेहतर जगह की तलाश में। एक स्वयंसेवी संस्था ने मदद की। छोटे-मोटे रोजगार भी किए। फिर एक अच्छा व्यक्ति और कुछ अच्छी किताबें मिलीं जिनसे पुरुष जाति के प्रति उसका भरोसा बना। फर एक दिन उस व्यक्ति से भेंट में मिले एक कैमरे ने उसके जीवन की दिशा ही बदल दी। यह उसके मन के भावों को बाहर लाने का जरिया बना तो बाहर की दुनिया को देखने-जानने का जरिया भी। कैमरे के रूप में उसे एक साथी मिला जो 20 साल से उसके साथ है, आस-पास है और उसकी दुनिया के केंद्र में है।

आज उम्र के चालीसवें दशक में छह साल बिता चुकी इस लड़की को सब महिला फोटो पत्रकार सर्वेश के नाम से जानते हैं जिसका कैमरा जीवन के विरोधाभासों को उभार कर सामने लाने से चूकता नहीं, बच्चों और औरतों की जिंदगियों के उन गुम हुए पलों को शब्द देता है जो एक मुद्रा में अपनी पूरी कहानी कह जाते हैं। रोशनी और अंधेरे का संतुलन सर्वेश का कैमरा न परख और पकड़ पाए, यह नहीं हो सकता। कैमरे के लिए दृष्यों की और अपने लिए जानने की उस पुरानी और अब तक जीवंत भूख को मिटाने के लिए सर्वेश अकेले-दुकेले कई बार हिमालय की कठिन ऊंचाइयों को फतह कर चुकी है, करगिल युद्ध की अपनी तसवीरों के लिए भारत सरकार से पुरस्कार पा चुकी है, अपने चित्रो की एकल प्रदर्शनियां कर चुकी है और आखिरकार सफल फ्रीलांस फोटोग्राफर के तौर पर खुद को स्थापित कर चुकी है।

आर अनुराधा भारतीय सूचना सेवा की अफसर हैं। अभी प्रकाशन विभाग में संपादक हैं और उनकी किताब इंद्रधनुष के पीछे पीछे - एक कैंसर विजेता की डायरी हिंदी में कभी कभी आने वाले बेस्टसेलर्स में से है। उस किताब पर एक फिल्म जामिया में बनी है। नाम है भोर।

हम लड़कियां पतित होना चाहती हैं


एक पतनशील स्‍वीकारोक्ति
(सुजाता ने नोटपैड पर पतनशीलता पर कुछ विचार व्‍यक्‍त किए। मैं सच कहने से खुद को रोक नहीं पा रही हूं।)

अपने घर की बड़ी-बूढियों और पड़ोसिनों, मिश्रा आंटी, तिवारी आंटी और चौबे आंटी से अच्‍छी लड़की होने के लक्षणों और गुणों पर काफी भाषण सुना है। और-तो-और, हॉस्‍टल में भी लड़कियाँ अक्‍सर मुझमें एक अच्‍छी लड़की के गुणों का अभाव पाकर उंगली रखती रहती थीं।

अच्‍छी लड़की न होने के बहुत सारे कारण हो सकते थे।

दादी के पैमाने ज्‍यादा संकुचित थे, मां के उनसे थोड़ा उदार और हॉस्‍टल के सहेलियों के थोड़ा और उदार। लेकिन पतित सभी की नजरों में रही हूं। जैसेकि शीशे के सामने चार बार खड़ी हो गई, या कोई रोमांटिक गाना गुनगुनाया, थोड़ा ज्‍यादा नैन मटका लिए, चलते समय पैरों से ज्‍यादा तेज आवाज आई, भाइयों के सामने बिना दुपट्टा हंसी-ठट्ठा किया तो दादी को मेरे अच्‍छी लड़की न होने पर भविष्‍य में ससुराल में होने वाली समस्‍याओं की चिंता सताए जाती थी।

मां इतनी तल्‍ख तो नहीं थीं। उनके हिसाब से घर में चाहे जितना दांत दिखाओ, सड़क या गली से गुजरते हुए चेहरा एक्‍सप्रेशनलेस होना चाहिए। सामने वाले शुक्‍ला जी का लड़का छत पर खड़ा हो तो छत पर मत जाओ, घर में भले बिना दुपट्टा रहो पर छत पर बिना दुपट्टा अदाएं दिखाना पतित होने के लक्षण हैं। अड़ोसी-पड़ोसी लड़कों से ज्‍यादा लडि़याओ मत। पूरा दिन घर से बाहर रहकर घूमने को जी चाहे तो लक्षण चिंताजनक है। रात में घर न लौटकर दोस्‍त के घर रुक जाने या इलाहाबाद यूनिविर्सिटी के गर्ल्‍स हॉस्‍टल में किसी सहेली के कमरे में रात बिताने को जी चाहे तो मां की नींद हराम होने के दिन आ गए हैं, ऐसा समझ लेना चाहिए। जबकि पापा अपने कॉलेज के दिनों के किस्‍से इस उम्र में भी मजे लेकर सुनाते रहे थे कि कैसे घर में उनके पांव नहीं टिकते थे, कि साइकिल उठाए वो कभी भी दस दिनों के लिए घर से अचानक गायब हो सकते थे और इलाहाबाद से सौ किलोमीटर दूर तक किसी गांव में जिंदगी को एक्‍स्‍प्‍लोर करते 10-15 दिन बिता सकते थे।

हॉस्‍टल की लड़कियां ज्‍यादा खुली थीं। वहां मैं कह सकती थी कि 20 पार हूं, लड़कों से बात करने को जी चाहता है। आमिर खान बड़ा हैंडसम है, मुझे उससे प्‍यार जैसा कुछ हो गया है। इन बातों को लड़कियां पतित नहीं समझतीं। उनके भी दिलों का वही हाल था, इतना तो मुंह खोलने की आजादी भी थी। लेकिन वहां भी पतन के कुछ लक्षण प्रकट हुए। जैसेकि ये तू बैठती कैसे है, पैर फैलाकर आदमियों की तरह। मनीषा, बिहेव लाइक ए डीसेंट गर्ल। ये पेट के बल क्‍यूं सोती है, लड़कियों के सोने में भी एक अदा होनी चाहिए।

हॉस्‍टल में मेरी रूममेट और दूसरी लड़कियां दिन-रात मुझमें कुछ स्त्रियोचित गुणों के अभाव को लेकर बिफरती रहतीं और जेनुइनली चिंताग्रस्‍त होकर सिखाती रहतीं कि अगर मुझे एक अच्‍छी लड़की, फिर एक अच्‍छी प्रेमिका, अच्‍छी पत्‍नी और अच्‍छी मां होना है, तो उसके लिए अपने भीतर कौन-कौन से गुण विकसित करने की जरूरत है।

जो मिला, सबने अपने तरीके से अच्‍छी लड़की के गुणों के बारे में समझाया-सिखाया। और मैं जो हमेशा से अपने असली रूप में एक पतित लड़की रही हूं, उन गुणों को आत्‍मसात करने के लिए कुछ हाथ-पैर मारती रही, क्‍योंकि आखिरकार मुझे भी तो इसी दुनिया में रहना है और अंतत: मैं खुद को इग्‍नोर्ड और आइसोलेटेड नहीं फील करना चाहती।

इसलिए कहीं-न-कहीं अपने मन की बात, अपनी असली इच्‍छाएं कहने में डरती हूं, क्‍योंकि मुझे पता है कि वो इच्‍छाएं बड़ी पतनशील इच्‍छाएं हैं, और सारी प्रगतिशीलता और भाषणबाजी के बावजूद मुझे भी एक अच्‍छी लड़की के सर्टिफिकेट की बड़ी जरूरत है। हो सकता है, अपनी पतनशील इच्‍छाओं की स्‍वीकारोक्ति के बाद कोई लड़का, जो मुझसे प्रेम और शादी की कुछ योजनाएं बना रहा हो, अचानक अपने निर्णय से पीछे हट जाए। 'मैं तो कुछ और ही समझ रहा था, ये तो बड़ी पतनशील निकली।'

कोई मेरे दिल की पूछे तो मैं पतित होना चाहती हूं, भले पैरलली अच्‍छी लड़की होने के नाम से भावुक होकर आंसू चुहाती रहूं।

वैसे पतनशील होना ज्‍यादा आसान है और अच्‍छी लड़की बनने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। हो सकता है, मेरे जैसी और ढेरों लड़कियां हों, जो अपनी पतनशीलता को छिपाती फिरती हैं, अच्‍छी लड़की के सर्टिफिकेट की चिंता में। डर रही हूं, कि खुद ही ओखल में सिर दे दिया है, लेकिन अब दे दिया तो दे दिया। चार और साथिनें आगे बढ़कर अपनी पतनशील इच्‍छाएं व्‍यक्‍त करेंगी, तो दिल को कुछ सुकून मिलेगा। लगेगा, मैं ही नहीं हूं साइको, और भी हैं मेरे साथ।

Sunday, February 17, 2008

क्‍या सवाल इतने एकतरफा हैं


निमिषा के बहाने कुछ और सवाल
निमिषा के मसले की अन्‍य बारीकियाँ, उसके बचपन, घर और परवरिश का महीन यथार्थ मैं नहीं जानती। सिर्फ एक दुखद अनुभूति है, निमिषा और ऐसी ढेरों निमिषाओं के लिए।

लेकिन इसे पढ़ने और अपने आसपास देखे कुछ अनुभवों, कुछ पढ़ी हुई किताबों के मद्देनजर कुछ उड़ते से ख्‍याल आ रहे हैं। बातें अगर ठीक-ठीक फॉर्मूलेट न भी कर पाऊं, तो भी मैं कुछ ये कहना चाहती हूं :

इजाडोरा डंकन और चार्ली चैप्लिन की आत्‍मकथा पढ़ते हुए जो बात सबसे ज्‍यादा अपील करती है, वो है उनकी मांओं का चरित्र। भावनाओं से भरी एक कलाकार स्‍त्री का मन, एक दुखद शादी, शराबी पति, आय का कोई तयशुदा स्रोत नहीं और दो बच्‍चों का बोझ। लेकिन इजाडोरा और चार्ली ने अवसाद के दौरों के बीच डूबती मांओं की ऐसी तस्‍वीर भी पेश की है, जहां वो अपने बच्‍चों के लिए पियानो बजाती हैं, उन्‍हें कविताएं और गीत सुनाती हैं, बच्‍चों के साथ नाचती हैं, खुश होती हैं, और उमंगों, सपनों और श्रम से भरी एक दुनिया का रास्‍ता खोलती हैं, अपने नन्‍हों के लिए।

ये एक सोचने वाली बात है। प्रेम और विवाह से जुड़ी उम्‍मीदों का टूट जाना तो एक बात है, लेकिन एक पिछड़े, गरीब मुल्‍क में जीवन, कला, श्रम और सपनों में मनुष्‍य का और खासकर स्‍त्री जाति का इतना क्षीण विश्‍वास भी सोचने वाले सवाल हैं। मैं ऐसी कई स्त्रियों को जानती हूं, एक दुखद शादी और प्रेम का अंत जिनकी आत्‍महत्‍या में, या अवसाद और पागलपन में हुआ। इसका एक बड़ा कारण धन और शक्ति संबंधों के प्रति इस मुल्‍क के लोगों का नजरिया भी है। उनका दुख सिर्फ प्रेम न मिल पाने का दुख नहीं था। अगर वह उच्‍च वर्गों से ताल्‍लुक रखती थीं, तो उनका दुख बिना कुछ श्रम किए आसानी से मिली एक सामाजिक पहचान और सुख-सुविधा के छिन जाने का भी था। अब अगर घर से निकलना और काम करना पड़े, तो वो उसके साथ सहज नहीं थीं। वह एकाएक छिन गई उन सुविधाओं को खोने का दुख भी नहीं झेल पा रही थीं।

कविता, संगीत, ज्ञान और कला से उनका कभी वैसा रागात्‍मक जुड़ाव नहीं रहा। भौतिक जीवन का स्‍तर ही उनके सुख और आनंद का पैरामीटर था, और दुखद शादी से वह पैरामीटर एकाएक ध्‍वस्‍त हो गया था।

मैं उन्‍हें दोष नहीं दे रही, सिर्फ चीजों को समझने की कोशिश कर रही हूं। मेरे आसपास की दुनिया में स्‍त्री-पुरुष का, पति-पत्‍नी का संबंध प्रेम और भावना से जुड़ा, बना रिश्‍ता न होकर सामाजिक पहचान, सुरक्षा और ठोस भौतिक अस्तित्‍व से जुड़ा मसला होता है। ऐसे में ये टूटते-बिखरते रिश्‍ते, आत्‍महत्‍या की ओर जातीं औरतें और भी ढेरों सवाल खड़े करती हैं। यह सिर्फ स्‍त्री के मन और देह से कमजोर होने की बात नहीं है। एक गरीब, चोटिल और अभावग्रस्‍त समाज और उस समाज में मनुष्‍यों का जीवन, शायद इन सबके बारे में ठीक से नहीं सोचा तो हम अपनी समस्‍याओं के बारे में भी ठीक-ठीक नहीं सोच पाएंगे, उनके हल खोज लेना तो बहुत दूर की बात है।

Saturday, February 16, 2008

मेरी रॉय कौन ?

तीसेक साल पहले .. टूटी शादी ..अंतरजातीय विवाह था ..ओह टूटना ही था .. दो बच्चे छोटे .. बेसहारा औरत ..कहाँ किधर .. कौन रखवैया ? .. पैसे कहाँ से.. भाई के आसरे ? या अपना अधिकार ?.. पैतृक निवास तो ठीक .. रहना भी ठीक पर हमारे आसरे ही हो ..ये अधिकार भाव तो मत ही लाओ , डराओ मत ..दे तो रहे हैं , रह तो रही हो ... चुप गुम्मी याचना कृतज्ञता ..कैसे कब बदल गई .. कितना आक्रोश ..अरे नज़रें तो देखो .. इतनी हिम्मत ? लड़ो हमारे खिलाफ ..हम भी देखते हैं ..चुपचाप रहा नहीं गया तो भुगतो अब ?
बहुत भुगत लिया अब नहीं .. गुस्साई बाघिन ..अपने इलाके की लड़ाई लड़ेंगे हम ..अपना हक ..अपनी ज़मीन .. अपना पैसा ..मेरा अधिकार मेरा मेरा...


कितनी औरतों की ऐसी ही लड़ाई । इसमें नया क्या ? अजूबा क्या ? अजूबा ये कि कोई एक औरत बिफर पड़ती है तब नयी राह दिखती है .. नये राह बनाने वाले न भी बनें उसपर कम से कम चलने वाले तो बनें .. पीछे आने वाले हुजूम के लिये रास्ते का झाड़ झँखाड़ साफ करें । आईये इतना तो करें ....




मेरी रॉय , बहुत लोग इस नाम को नहीं जानते । कौन हैं मेरी रॉय ? किस लिये हम इनको जानें । मेरी ने एक लम्बी लड़ाई लड़ी है उन ईसाई औरतों को समान सम्पत्ति अधिकार दिलवाने के लिये जो पितृसत्तात्मक समाज के सामाजिक सरंचना में मूक वंचित बनी रही है ।मेरी रॉय उन , कैथोलिक चर्च पदानुक्रम के लिये मजमा खड़ी करने वाली नौटंकीबाज हैं या अपने समाज के पुरुषों की नज़र में अपनी पत्नियों को बरगलाने फुसलाने वाली , भीड़ को उकसाने वाली महज एक विद्रोहिणी औरत मात्र ?

1986 में सुप्रीम कोर्ट ने इसाई औरतों को पिता की समपत्ति में समान अधिकार दिया । उसके पहले वो त्रवंकोर कोचीन क्रिसचियन सक्सेशन ऐक्ट 1916 के प्रावधान से नियंत्रित होती थीं जिसके अंतर्गत एक पुत्री को पुत्र के अंश का चौथाई या पाँच हज़ार रुपये , जो भी कम हो की भागीदारी होती थी अगर पिता निर्वसीयत मृत्यो को प्राप्त हुआ हो। पत्नी को सिर्फ भरण पोषण की हिस्सेदारी थी । सुप्रीम कोर्ट का निर्णय उस केस के परिणामस्वरूप था जिसे मेरी रॉय ने अपने भाई इसाक जॉर्ज के खिलाफ सम्पत्ति अधिकारों के लिये दर्ज़ किया था ।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने ईसाईयों को सक्सेशन ऐक्ट 1921 के अधिक उदार नीति के छतरी के नीचे ला खड़ा किया ।इस निर्णय ने न सिर्फ औरतों को सम्पत्ति में समान अधिकार दिया बल्कि इसे बीते हुये अवधि से (रीट्रोस्पेक्टिव ईफेक्ट) से भी लागू किया । इस पूर्वव्यापी अवधि ने ऐसा भूचाल ईसाई समाज में पैदा किया कि इसका असर हर घर में महसूस होने के आसार दिखाई देने लगे । जितनी सम्पत्ति और भूमि के अधिकार जो पुत्रों को निर्वसीयत मिले थे सब कानूनन खारिज हुये । जितनी औरतों को सम्पत्ति से अन्यायपूर्ण तरीके से बेदखल रखा गया था उनके लिये ये त्वरित न्याय था । ये उम्मीद किया जा रहा था कि इस कानून के बाद सम्पत्ति अधिकार की माँग रखती औरतों का हुज़ूम उमड़ आयेगा ।

पर ऐसा कुछ नहीं हुआ । चर्च का आशीर्वाद इस लड़ाई को तो नहीं था , पुरुषों का समर्थन भी नहीं और यहाँ तक की मेरी रॉय की लड़ाई जिन वंचित स्त्रियों के हक की लड़ाई थी , उनका भी समर्थन क्रमश: पारिवारिक और सामाजिक दबावों में आ कर घटता गया । सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद वाले दशक में जिन औरतों की बाढ़ से चर्च और समाज भयाक्रांत हो रहा था , उस भय को बेमानी बेमतलब और हास्यास्पद साबित करते हुये सिर्फ दो दर्ज़न केसेस दर्ज़ हुये । समाज ने अपनी घेरेबंदी मज़बूत कर ली थी। औरतें इस कानून के बाद भी उसी अधीनस्थ स्थान पर खड़ी थीं जो सदियों से उनके लिये तय किया हुआ था ।

मेरी रॉय की लड़ाई अब भी ज़ारी थी । अपने गाँव कोट्टायम में उन्हें सामने के दरवाज़े से अंदर आने का अधिकार नहीं था । ये अधिकार सिर्फ पुरुषों का था । बावज़ूद इस लिंग विभेद के लड़ाई जारी है ।

इस मसले में सबसे दुखद बात ये रही कि औरतें अब भी इस कानून का लाभ उठाने से खुद को कई अन्य दबावों के कारण वंचित रखती रही हैं । मेरी रॉय के योगदान को स्वीकार तो करती हैं मौन समर्थन भी देती हैं । लेकिन जब तक औरतें खुद अपने अधिकार के लिये , जो कानूनन उनका है, आगे नहीं आयेंगी ,दूसरा कोई उन्हें कुछ देगा नहीं । शायद सबसे ज़रूरी है अपने मन को स्वतंत्र करना , एक मानसिक ज़मीन अपने अधिकारों के लिये तैयार करना ।


Friday, February 15, 2008

कहीं हम बेटियों को गुलाम मानसिकता की जंजीरों में तो नहीं बाँध रहे

(निमिषा, वरदान और अनन्या को समर्पित)


निमिषा अवस्थी। मुझे याद है। उस दिन भाई ने बात छेड़ी तो फिर स्कूल के दिनों में लौट गई थी। स्कूल में मैं टेबलटैनिस चैम्पियन थी। बहुत कम बच्चे थे । और लड़कियों को इसमें खास रुचि नहीं थी। हमेशा बहुत आराम से फाइनल्स तक पहुँच जाती थी। इस बार भी पहुँच चुकी थी।

नवीं कक्षा से बारहवीं कक्षा तक के बच्चों के बीच प्रतियोगिता थी। मैं बारहवीं में थी। फाइनल्स में एक नई लड़की थी। लंबी, गोरी ,छोटे बाल....गाल मे कुछ मुँहासे.....नाक कुछ अलग सी थी। आकर्षक व्यक्तित्व था। और बहुत आत्मविश्वास के साथ खड़ी थी।

मैने उसे आंकने की कोशिश की थी। दसवीं में मेरे हाइस्ट स्कोर के रेकार्ड को ब्रेक करेगी ऐसा सब मानते थे। मन में कुछ ईर्श्या और कुछ प्रतिस्पर्धात्मक भाव था। पर वह शांत थी। देखकर लगता था कि अपने जीत को लेकर बिल्कुल आश्वस्त थी।

खेल शुरु हुआ। और खत्म भी। मैं हार गई थी। मेरे लिये बड़ी बात थी। उसके लिये सहज सी। स्पोर्ट्समेन की तरह हाथ मिला," यू प्लेय्ड वेल दीदी ",बोलकर वह जा चुकी थी।

बाद में जैसा सबने सोचा था दसवीं में मुझसे ज्यादा अंक मिले। और फिर उसने इंजीनियरिंग की। मम्मी के बॉस की लड़की थी सो मम्मी से अक्सर सुनने को मिलता था। अंकल आंटी हमेशा गर्व से निमिषा के बारे में बताते थे। निमिषा थी भी शांत, संयत और प्रतिभाशाली।

एक छोटी सी कॉलोनी थी। दुनिया की बड़ी बड़ी चिंताओं से दूर। सब प्रांत के लोग थे। सब जात के लोग थे। सभी एक ही स्कूल में जाते थे। सभी के लिये पढ़ाई निशुल्क थी।
दहेज, स्त्री के अधिकार, दंगे फसाद....यह सब हम अखबार में पढ़ते थे। जिंदगी सीमित दायरों में बहुत जाने पहचाने अंदाज़ मे आगे चलती थी वहाँ।

निमिषा पढ़ाई कर के कहाँ गई, किससे क्यूँ शादी की, क्या करना चाहती थी, क्या नहीं कर सकी ...मुझे नहीं मालूम।

जब भाई ने याद दिलाया उसकी शक्ल आँखों के सामने आ गई।

बुरी खबर थी। अपने दो बच्चों के साथ निमिषा ने आत्महत्या कर ली थी।

मैं स्तब्ध थी। उसे मानसिक तौर पर इतना कमज़ोर देख पाने में असमर्थ थी।

एक महीने पहले निमिषा ने शिकागो (अमेरिका) में पुलिस में रपट दर्ज कराई थी
इल्जाम थे-
• मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न
• पति का ज्वाइन्ट एकाउन्ट ड्रेन करना
• लगातार बेटे को बताना की वह पागल है
• फोन, इमेल सब पर निगरानी रखना
• आत्महत्या के लिये उकसाना

निमिषा के पति ने भी रिपोर्ट दर्ज कराई थी
• निमिषा मानसिक रूप से बीमार है और गलत इल्जाम लगा रही है।

निमिषा अपने बच्चों को अपने पति से दूर रखना चाहती थी। पर उसकी इस दर्खास्त पर कोई कार्यवाही नहीं की गई थी।

कहते हैं.....

दुर्घटना के दिन निमिषा ग्यास स्टेशन गई। पेट्रोल खरीदा। बच्चों के लिये खिलौने खरीदे। अपने घर पहुँच दूसरी मंजिल के बेडरूम में पहले बच्चों पर फिर खुद पर पेट्रोल ड़ाला। फिर आग लगा दी। रास्ते से जाते किसी ने पुलिस को बुलाया। गंभीर हालत में सभी को अस्पताल पहुँचाया। कोई भी बच नहीं सका।

अंकल को विश्वास नहीं हुआ। मुझे नहीं हो रहा था। भाई विचलित था। लोग हैरान थे। एक माँ ऐसा कैसे कर सकती है। पड़ोसी ऐसी किसी भी सँभावना के बारे में कल्पना नहीं कर सकते थे।

क्या वजह थी
• निमिषा पीड़ित थी
• बेबस थी
• बीमार थी
• अकेली थी

मैं समझ नहीं पा रही। वह लड़की जिसमें इतना आत्मविश्वास मुझे दिखा था वह इतनी कमज़ोर कैसे हो गई? रिश्ता अगर इस कदर बिगड़ चुका था तो उसे तोड़ा क्यूँ नहीं? कौन सी बेडियों में बँधी थी जो स्वयं को आज़ाद नहीं कर सकी? पढ़ी लिखी, प्रतिभाशाली , आर्थिक रूप से आज़ाद लड़की इतनी बेबस क्यूँ?

चूड़ियाँ, पायल, मंगलसूत्र ....सब पहनाते पहनाते कहीं हम बेटियों को गुलाम मानसिकता की जंजीरों में तो नहीं बाँध रहे? हर तरह का अवसर देने के बाद उसे किसी सोच में कहीं कैद तो नही कर रहे? सहनशील, शांत और औरत बनाने की कोशिश में उसकी स्वयं के लिये लड़ने की इच्छा शक्ति को तो क्षीण तो नहीं कर रहे?!!

यह सवाल अहम है। और इनसे हमें आज जूझना होगा। जीन्स या साड़ी, रसोई से दूर या गोल रोटियाँ बेलती हुई....अधिक पढ़ी लिखी या कम...आर्थिक रूप से स्वतंत्र या निर्भर.....

स्त्री को अपनी सोच को आज़ाद करना होगा। खुद के खुद होने पर गर्व करना होगा। गलत को सहना और बढ़ावा देना बंद करना होगा। विचारों को स्वतंत्र करना होगा।

ऑफिस जाती, कार चलाती आत्मनिर्भर औरत आज़ाद है ...कोई जरूरी नहीं है....

घर में बैठ,साड़ी पहनी ,खाना बनाती अपने बच्चों की परवरिश करती औरत परतंत्र हो यह भी जरूरी नहीं है....
.
प्रतीक मात्र हैं...जिनसे कुछ सिद्ध नहीं होता....

जब तक निमिषा अवस्थी निमिषा तिवारी बनने पर बेबस बनती रहे....कुछ बदला नहीं है....


बदलाव के लिये जरूरी है हमारा योगदान। हर लड़की की परवरिश उसे व्यक्ति बनाने के लिये हो। ऐसा व्यक्ति जिसके व्यक्तित्व से आत्मविश्वास झलकता हो ....जो जिन्दगी के चुनौतियों से मात्र स्त्री होने की वजह से हार ना मान ले।

यही जगह है जहाँ बदलाव जरूरी है...।



(फोटो- cbs2chicago.com से साभार)

Thursday, February 14, 2008

देबाशीष की साफगोई बहुतों के दोगले पन से कई गुना भली है ....

देबाशीष बहुत सन्यत और संतुलित लिखते हैं । चैट पर भी बातचीत हुई है ,कई बार । उन्हें भी चोखेर बाली का सदस्य होने का निमंत्रण भेजा था ।
जवाब में उनका जो पत्र आया , उसे देख कर स्तब्ध थी । इतनी साफगोई ! गोया अब तक जो बाकी पुरुष कह नही पाए [पोलिटीकली इनकरेक्ट होने से चुप रहना बेहतर होता है न! ] उसका जवाब भी मिल गया हो।
जैसा का तैसा उस पत्र को छाप रही हूँ ,देबाशीष से पूछ कर ।


प्रिय सुजाता,

आमंत्रण के लिये शुक्रिया! चोखेर बाली (क्या ये कहीं कहीं वाली नहीं लिखा है?) बेहद अच्छा प्रयास है। मुझे अविनाश का बेटियों का ब्लॉग भी भला लगा, मन मसोस कर रह गया काश मेरी भी एक बेटी होती।

पर मैं शायद चोखेर बाली के दल में मिसफिट रहुंगा, क्योंकि मैं भी अफसोसनाक रूप से दकियानूसी और मॉडर्निटी का होपलेस हाईब्रिड हूं , सबूत के तौर पर मुझे बिना कोसे http://nuktachini.debashish.com/127 या http://nuktachini.debashish.com/60 देखें। मेरी बीवी नौकरीपेशा है पर सच्ची बात यह है कि मुझे यह फूटी आँखों पसंद नहीं। इसके बावजूद मैं उसको तालाबंद या बुर्कानशीं नहीं देख सकता। होम मेकर औरतें कामकाजी ओरतों से हज़ार गुना अच्छी होती हैं यह घुट्टी मैंने पी रखी है और उम्र के ऐसे पड़ाव में हूं जहाँ ऐब की ये विकृत पूँछ सीधी न हो सकेगी।

और इन सबसे बड़ी बात यह कि मैं दरअसल लिख ही कितना रहा हूँ, आपको नियमित लेखकों की तलाश जारी रखनी चाहिये। मेरा इस प्रयास को "बाहर से समर्थन" हमेशा रहेगा।

आभार और शुभकामनायें,

देबाशीष

शायद यह स्वीकार कर लेने के बाद ही पुरुष पत्नी , बहन , बेटी ,और चोखेर बाली को समझने और सराहने केलिए तैयार होगा अकुंठ भाव से ।

Wednesday, February 13, 2008

मन की बात

इस मंच ने बहुत कुछ ऐसा कहने और सुनने का अवसर दिया ,जिसके बारे मे सामान्यत: या तो घुटन होती है या फ़िर चुप्पी । मानसि्क रुग्णता की आड़ मे स्त्रियों-बच्चियों व लड़कियों को दे्खकर कुछ महानुभाव सरेआम सडकों,गलियों ,झाड़ियों की ओट मे अभद्र्ता करते दिखायी पड़ते हैं,नतीजा …या तो लड़कियाँ रास्ता बदल देती हैं,सहमकर छिप जाती हैं या फिर ऐसी अपमानजनक स्थिति का स्वयं को जिम्मेदार मान बैठ्ती हैं और कुंठित होती हैं । महानगरीय सभ्यता मे शायद लोग इस तरह की हरकतों को नज़रअंदाज़ भी कर देते हैं मगर परेशानी होती है छोटे शहर और कस्बे की लड़कियों को जिनमे शायद उतनी हिम्मत नही होती कि वे उस व्यक्ति की तरफ़ नज़र भी उठा सके जो आये दिन उनका मानसिक शोषण करता है । कोफ़्त सबसे अधिक तब होती है जब बेटियों के पिता को भी न जाने किस भय के कारण इन सड़क चलते दुराचारियों से नज़र बचाते देखती हूं ।

बार-बार मु्ठ्ठी भिंच जाती थी,नज़र बचा कर चुपचाप साइकिल चलाते बेटे को घसीट कर घर ले आती थी । एक दिन निश्चित कर लिया, पतिदेव को बताया ,चप्पल उठायी उन महाशय को झाड़ियों से बहार निका्लकर सारी शर्म भूल कर उन्हे तब तक मारा जब तक ्मेरे हाथ से खून व मन से पिछ्ली सारी कुंठा बह नही गयी । पतिदेव मुस्कुरा रहे थे ,बोले चलो कुछ गंदगी तो कम हुई । मात्र कोई लेख या कहानी कहनी है इस उद्देश्य से मैने ये आपबीती लिखने का ्साहस नही किया बल्कि इसलिये कि यदि हमसब मे से कोई भी इस तरह की परिस्थितियों से नज़र चुराता है तो कम से कम अपनी बेटी व पत्नी को इतना सहयोग दीजिये कि वो राह चलते इन दुष्कर्मियों से स्वयं को निजात दिला सके ।

डॉ श्वेता के सुसाइड नोट का समाजशास्त्र...

नोएडा में आईकेयर अस्पताल की डॉ. श्वेता आत्महत्या कर लेती है । अखबार उसका सुसाइड नोट छाप रहे हैं ।
एक शादी , एक बलात्कार , एक अनहोनी पर जीवन खत्म नही होता ।
लेकिन हम "वी द पीपल ऑव इंडिया.." ,समाज की हैसियत से कुछ लोगों के सामने कोई रास्ता ,इसके अलावा नही छोडना चाहते ? भारतीय समाज में में स्त्री के सम्बन्ध में यह बहुत आम बात है । क्या हमने गौर किया है कि ऐसा क्यो है ?
अपने सुसाइड नोट की शुरुआत में वह लिखती है -
'सुभाष..मैं अपनी जिंदगी खत्म करने जा रही हूं, इसलिए नहीं कि मेरा तुम्हारे प्रति प्यार कम हो गया है। लेकिन मुझे यह आभास हो गया है कि हमारे जैसे लोगों के लिए जीवन एक जंग है और मैं इससे लड़ते-लड़ते अब पूरी तरह से टूट चुकी हूं। अगर इसके लिए कोई जिम्मेवार है तो वह हमारा समाज व इसमें रहने वाले लोग हैं'


आत्महत्या कमज़ोर मन वाले करते हैं । जो लड नही सकते ,जूझ नही सकते । जो हारे होते हैं । वह हार चुकी थी ,कमज़ोर भी थी । पर उसे कमज़ोर बनाने वाले खुद उसके माता पिता थे । उसने अपनी मर्ज़ी से शादी की थी । पर ससुराल और रिश्तेदारों के बीच वह निरंतर मानसिक रूप से आहत थी । वह माँ- बाप और समाज को साबित नही कर सकी कि वह अपनी मर्ज़ी से शादी करके खुश रह सकती है ।वह कमज़ोर थी क्योंकि माता -पिता ने कभी यह विश्वास उसमें पैदा नही किया कि बेशक वह उनकी नज़रों में गलत है पर फिर भी वह उन्हे प्यारी है , उन्हे उसकी उतनी ही फिक्र अब भी है । उन्होने उसकी ज़िन्दगी को एक चुनौती बना दिया , जिसमें हारना मौत के बराबर हो गया ।

वह अपने नोट में लिखती है---
मैं उन्हें बताना चाहती थी कि उनकी मर्जी के बगैर भी शादी कर मैं सफल जीवन जी सकती हूं, लेकिन मुझे नहीं पता था कि उन्होंने बचपन से ही मुझे बेहद कमजोर कर दिया। जमाने से लड़ते-लड़ते मेरी सारी ताकत खत्म हो चुकी है। उनके चलते मैं मानसिक रूप से बीमार हो चुकी हूं। लिहाजा मेरे इस कदम के लिए मेरे मां-बाप व खुद मैं दोषी हूं।



एमील दुर्खाइम जब बात करते हैं आत्महत्या की[समाजशास्त्र के पिता कहे जाते है दुर्खाइम ,उन्हीं की पुस्तक है "सुसाइड"] तो उसे एक व्यक्ति का आवेशपूर्ण निर्णय न बताकर एक सामाजिक फिनॉमेना बताते हैं । सही भी है । जिस परिवेश में व्यक्ति रहता है वे उत्तरदायी होते हैं उन मूड डिसऑर्डर के जिसमे कोई अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेता है ।स्त्री की आत्महत्या के समाजशास्त्र को समझने में डॉ. श्वेता का यह सुसाइड नोट बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है ।
क्या हम अपने समाज में लडकियों को बेहद असुरक्षित [भावनात्मक , शारीरिक ],आर्थिक ] वतावरण नहीं दे रहे जहाँ वे कभी अपना दर्द खुल कर नही कह पाती । वह कभी लौट नही पाती । क्यों?
हद तो यह है कि समाज ऐसी आत्महत्या को तो स्वीकार लेता है । रो -बिसूर लेता है । भूल जाता है । लेकिन वह सम्बन्ध- विच्छेद को बराबर तानाकशी का शिकार बनाता है । जीना दूभर कर देता है । बलात्कार हो या घर से अगवा की गयी या भागी हुई लडकी का वेश्यावृत्ति मे जबरन ढकेल दिया जाना या अपनी मर्ज़ी से की शादी का असफल होना , दोनो सूरतों में कानूनी मदद लेने से बेहतर आत्महत्या का रास्ता ही क्यो रह जाता है ?
एक शादी , एक बलात्कार , एक अनहोनी पर जीवन खत्म नही होता । क्या हम अपनी बेटियों को यह शिक्षा कभी नहीं देंगे ?

Tuesday, February 12, 2008

कटु सत्य

1) नन्ही सी कली
खिली है अभी अभी
बिखरेगी रंग
ज़िंदगी के कॅन्वस पर
और फिर जीवन
के नग्न रहस्य
पहचान कर
अंगारो पर
चलने की कला
सीख जायेगी !!
********************

2) कई घंटे
प्रसव पीड़ा सहने के बाद
बेटे को जन्म दे के
माँ ने
सुख की साँस ली
कही बेटी हो जाती तो
ज़िंदगी भर ना जाने
कितनी बार सहनी पड़ती
प्रसव पीड़ा के साथ
तानो की पीड़ा !!

Monday, February 11, 2008

क्या आप अपनी बहन को अपनी दुकान , मकान ज़मीन में बराबर हकदार मानते हैं ?

विवाह विस्थापन जैसा होता है , और सर्वप्रथम लडकी ससुराल में शरणार्थी की हैसियत से पहुँचती है । ऐसे में सम्पत्ति पर उसका अधिकार उसे आत्मविश्वास दे सकता है । कानून बहुत हैं लेकिन लोचे भी हैं । जिन्हें नीलिमा की पोस्ट में समझाया गया है । इस पोस्ट पर आयी टिप्पणियाँ दो बातें साबित करती हैं - पहला, कि यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है [टिप्पणियों का दीर्घ आकार देखिये] दूसरा , अभी भी हम में से इस प्रश्न से जी चुराते हैं । भाई-बहन के रिश्ते तभी बने रहेंगे जब बहन सम्पत्ति में अपना कानूनी हक न मांगे ।माँगे बिना दिया नही जायेगा ।क्यो टूटते हैं रिश्ते जब बहन अपना हक मांगती है। रचना की बात शायद सही है कि कानून के साथ साथ मानसिकता बदलनी होगी -

किसी भी समस्या का समाधान , समस्या मे ही होता है । कानून क्या कहता हैं ये बहुत बाद की बात हैं , सबसे पहले आप को ये पता होना चाहीये की आप चाहती क्या है ? अगर आप समाज मे पुरुष का संरक्षण पाकर अपने को सुरक्षित समझती है तो आप को किसी भी चीज़ मे बराबरी का दावा नहीं करना चाहीये ? कानून से जायदाद का हक मिल जाना एक बात हैं पर मानसिक रूप से आप को समान अधिकार मिलना दूसरी बात है । अपने हक के प्रति जो जागरूक है वह पहले अपने को मानसिक रूप से स्वतंत्र करे जो इतना आसान नहीं हैं । पिता ही नहीं माता को भी पहले दिन से अपनी पुत्री और पुत्र को अपनी दो आंखो की तरह देखना होगा । समाज की नींव घर से होती है , हम अपने घर को सुधार ले समाज अपने आप सुधर जाएगा । व्यक्तिगत रूप से मै मानती हूँ की माता पिता कि जायदाद पर किसी का भी "अधिकार " नहीं होना चाहिये । जिनकी चीज़ हैं वह जिसको देना चाहे दे । हमे इस सब मै कानून का साथ नहीं लेना चाहीये , हमे ये सोचना चाहीये की माता पिता अपनी पुत्री के साथ क्यो अपने को सुरक्षित नहीं समझते । एक पुत्री चाहे विवाहित हो या अविवाहित उसे भी अपनी आय का हिस्सा अपने माता पिता को देना चाहीये

स्वप्नदर्शी के अनुसार यह परवरिश का अंतर है और लडकियों को भी कुछ कीमत चुकानी होगी अधिकार पाने के लिए-

दहेज के नाम पर भी जो मिल्ता है, उसमे कितनी स्त्रियोन को उस सम्म्पति को अपने अनुसार खर्च करने की आज़ादी होती है? और कितनो के काम दहेज का पैसा गाडे वक़्त मे काम आता है?

लड्की की शादी को जो रोना है, उसमे सारा का सारा खर्च बारतियोन की आव्भगत, सम्बन्धियो को लेन देन, और शोबाज़ी मे जाता है. क्या पिता लडकी से पूछ्ता है कि उसे वो पैसा किस रूप मै चाहिये?
फिर बडे दिखावे वाली शादियो के लिये लड्किया भी उतनी ही उतावली रहती है, कुछ दोष उनका भी है.
बहुत कम लड्किया मेहनत से पढायी करती है, और शादी उनके जीवन को एक स्थायी आर्थिक-सामाजिक सुरक्शा देती है. पढायी के अलावा भी, क्योन नही लड्किया, अपने पैसे के सही मेनेज्मेंट के प्रति सतर्क रहती है.
पता नही पढी-लिखी लड्किया कभी अपने पिता से इस बारे मे सवाल करती भी है या नही?
आज़ादी कोई भीख की तरह नही मिलती, उसकी भी कीमत होती है.


जबकि श्रीमान विखण्डन के अनुसार पहला सवाल हमारी [पुरुषॉ]की तरफ पहले उठता है -
अभी यहाँ नया हूँ , देख रहा हूँ , सामने यह ब्लॉग आया और मुद्दा बडा वजिब लगा क्योंकि यह सवाल हमारे सामने कई बार उठता है और हम किनारा करने में भलाई समझते हैं ।
सम्पत्ति के विभाजन का सवाल ही क्यों उठता है,बेटियों को ही घर छोड कर क्यों जाना होता है विवाह के बाद ? किस कानून में लिखा है? पर अगर लिखा है तो पडताल ज़रूरी है ।
अगर बेटा घर छोडता है किसी कारण तो उसका तो जायदाद के ऊपर हक रहता है । लेकिन लडकीअगर एक बार घर छोडती है तो बाप का घर हर मायने में उसके लिये पराया हो जाता है , सम्पति तो बहुत दूर की बात है ।
दहेज और तीज त्योहार पर लडकी को जो दिया जाता है उसके नाम पर बाकी सब जगह से उसका नाम माइनस हो जाता है । दहेज भी ससुराल की सम्पत्ति हो जाता है और पति के घर की सम्पत्ति पर उसका नाम कागज़ में ही रहता है ।
कुछ आदिवासी समाजों में शादी के बाद लडका घर छोडता है और लडकी के घर आता है, और सम्पत्ति का बंटवारा लडकियों के बीच होता है । लेकिन विसंगति देखिये हम उन्हें पिछडा कहते हैं । भला क्यों ? पिछडा कौन है ? क्या हम अपने मकान , दुकान ,ज़मीन में से अपनी बहन को हिस्सा देने को तैयार हैं ? अगर नही तो पहले अपने ऊपर प्रश्नचिह्न लगाना होगा !!


जबकि तरुण कहते हैं कि कानूनों को समय के हिसब से संशोधित करना होगा और सबसे पहले ऐसे सवालों पर बात कर सकने की मानसिकत तैयार करनी होगी -

कानून ऐसा है समस्या इस बात पर नही है, समस्या ये है कि ऐसे कानून बदले नही जाते। यही नही देश में ऐसे कितने ही कानून होंगे जिनका आज के परिवेश में या तो कोई मूल्य ही होगा या कभी इन्हें Implement करने की कोई पहले ही नही हुई होगी।और कामकाजी लड़कियों को भी चाहिये कि वो अपनी आय का कुछ हिस्सा घर के लिये भी दे इससे Parents को भी इस बात का ऐहसास होगा।

लड़कियों और महिलाओं को भी चाहिये कि वो अपनी सोच को बदलें, जब तक वो सास-बहू के मैलोड्रामा से नही उठती कुछ नही हो सकता अगर आप को लगता है इन मैलोड्रामा का इस बात से क्या संबंध, तो है और बहुत बड़ा है क्यों कि इन्हें पाठ्य पुस्तक की तरह देखने वाले इसकी चर्चा से ही नही उबर पाते तो वो इस तरह के बदलाव का हिस्सा कैसे बनेंगे।

Sunday, February 10, 2008

चाह

हाथ बढ़ाकर तुमने
जब भी छुआ
कुछ आँख नम हुई है

जो झाड़कर
पीछा छुड़ाया
रूह कुछ शुष्क हुई है

ख्याल में भरकर
ऊपर चगाया
ख्वाब सी यह चगी है

जीवन के पहिये
में जब भी भरा है
जिन्दगी तब तब चली है

पुरुष के साथ
जब पूरक हुई
तब प्रचुर उर्वर हुई है

ठोस धरा सी
मूल सँभाले
जंगल उठा कर खड़ी है

अवस्था से इसके
पहचान ना आंको
अवस्था बदलती रही है

संयोजन इसका
कुछ तो अलग है
जो अलग लग रही है

उनमुक्त हवा सी
लहरों सी चंचल
मिट्टी सी तटस्थ बनी है

थोपो ना इसपर
पहचान यूँ ही
निर्जीव यह नहीं है

रंग महक और
रूप में अपने
सपने में यह उग रही है

धूप ना रोको
ज़मीं ना खींचो

बस.....
अवसर ही
माँग रही है

Saturday, February 9, 2008

हे भगवान ! हमें इन अविवाहित औरतों -बेटियों की फौज से बचाओ

हे भगवान ! हमें इन अविवाहित औरतों -बेटियों की फौज से बचाओ

( हिंदू कोड बिल पर बहस के दौरान संसद में बोलते हुए कांग्रेसी विधायक एम.ए. आयंगर ,संसदीय बहस , 7 फरवरी 1951 )
अरविंद जैन कानून की दृष्टि में महिलाओं की स्थिति पर सशक्त लेखन के लिए जाने जाते हैं ! उनके द्वारा लिखा गया लेख-" उत्तराधिकार बनाम पुत्राधिकार'" हमारे बेटी प्रेमी समाज और कानून की छिपी साजिशों को परत दर परत उधाडता है और अपनी बेटियों के प्रति हमारी कूटनीति का पर्दाफाश करता है ! हमारी बेटियां हमारे घरों में महफूज़ हैं, हम उन्हें बेटों के बराबर पढा लिखा रहे हैं और उसके लिए बेहतर वर और घर की गुंजाइशों को पुख्ता करके चल रहे हैं ! पर क्या इससे हमारी बेटियों की स्थिति बदली है ? क्या कानून उनके गाढे समय में उन्हें उनके हक समाज और परिवार की गिरफ्त से छुडवाकर दिलवा सकता है ? क्या उत्तराधिकारी के रूप मॆं हमारी बेटियों को मायके और ससुराल में उनका जायज़ हक मिल सकता है ?

सवाल बहुत हैं पर जवाब बहुत दिल दहलाने वाले हैं ! बेटा बेटी एक समान का नारा बुलंद करने वाला समाज अपनी जायदाद को अपने पुत्रों को सौंपने पर आमादा है ! अंतराष्ट्रीय श्रम संगठन ( संयुक्त राष्ट्र संघ ) की एक रिपोर्ट के अनुसार ,पुरुषों के बराबर आर्थिक और राजनीतिक सत्ता पाने में औरतों को अभी हजार वर्ष लगेंगे क्योंकि दुनिया की 98 % पूंजी पर पुरुषों का कब्ज़ा है !


दुनिया की बात को छोड भी दें तो भारतीय संदर्भों में स्त्री की खासकर अविवाहित बेटियों की स्थिति बदहाल है ! अरविंद जैन अपने उपरोक्त लेख में कानून की शर्तों की पेचीदगियों को डिकोड करते हैं तो साफ हो जाता है कि अपनी बेटियों के वजूद को हम एक सीमा तक ही सह सकते हैं और उसके बाद वे हमें असहनीय हो जाती है ! स्त्री की कानून की नजरों में स्थिति विवाहिता के तौर पर ही है परंतु अविवाहिताओं ,तलाकशुदाओं और विधवा बॆटियों के लिए मायके और ससुराल में हजार कानूनी लफ्डे और पेच हैं ! अरविंद जैन द्वारा बताई गई इन कानूनी विसंगतियों में से कुछ उदाहरण देखिए--

· कानून विवाह संस्था को बहुत जरूरी मानता है पुत्र के जन्म को जरूरी मानता है , संपत्ति के बंटवारे में कम बहनों वाले भाइयों को ज्यादा फायदा मिलता है !

· यदि बिना वसीयत किए किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाए तो स्त्री- पुरुष उहेराधिकारियों में बराबर बंटवारा होगा पर कृषि भूमि में स्त्री को हिस्सा नहीं मिलेगा !

· ! विधवा बेटी पिता के घर पर रह तो सकती है पर (सताई जाने के हालातों में ) जायदाद बंटवा नहीं सकती (अगर पुरुष न चाहे तो )! निस्संतान स्त्री की संपत्ति का एकमात्र उत्तराधिकारी है उसका पति , और अगर वह एकमात्र पति ही उसका हत्यारा भी हो तो ? कानून उसे अयोग्य घोषित कर देगा तो भी उस स्त्री की संपत्ति रहेगी उसके ससुराल में और पति के कानूनी वारिसों को मिलेगी !


बकौल अरविंद जैन "
जब तक या पहचान का सपना साकार होना उत्तराधिकार के कानूनों के माध्यम से तमाम उत्पादन के साधन और विवाह संस्था ( और वेश्यावृत्ति व्यवसाय ) के आधार पर उत्पत्ति के साधनों ( यानि स्त्री देह ,योनि और कोख )पर पुरुष का वर्चस्व बना रहेगा तब तक स्त्री की मुक्ति ,समानता ,न्याय , समानता, गरिमा संभव नहीं है !"

यानि समाज परिवार और कानून -सब मिलकर बेटियों को भरमा रहे हैं ! हम बेटियों की फौज से डरने वाले समाज के हिस्से मात्र हैं ! जहां छ्द्म जालों में फंसी स्त्री अपनी उस आजादी के लिए लड रही है जिसमें समाज की गर संरचना उसके खिलाफ ही है ! पिता पति और पुत्र ही उसके कानूनी सामाजिक हकों को पाने के एकमात्र आसरे हैं ,जिनके बिना उसका कोई भी वजूद नहीं है ! जी , हम बेटों की चाह में जीने वाले पुरुषवादी समाज की बात कर रहे हैं जहां बेटियों की उपस्थिति बदली है ,स्थिति नहीं और अफसोस यह है कि कानून भी हमारी बेटियों के साथ नहीं !!

Friday, February 8, 2008

तुम्हारे होने पर....

तुम्हारे आने की सूचना
मुझे डाक्टर ने यूं दी -
माफ करना
फिर से लड़की हुई है
लेबर रूम से निकलकर तुम्हारी माँ ने
जब मुझसे नजरें मिलाई
तो उसकी आँखों में तैर रहा था
घना अपराधबोध
जितनी जगह सूचना दी मैने फोन पर
तुम्हारे आगमन की
उतनी जगह से ‘सौरी‘ जैसा
जबाब मिला मुझे
और जब नर्स ने सौंपी तुम्हारी नवोदित देह
मेरे हाथों में
तब मैने पूछा ..तुम्हारा सगुन !
(जानता था मैं कि सगुन लिये बगैर
नहीं सौंपती नर्सें
बच्चों को उनके माता पिता के हाथ
तब भी यही हुआ था
जब तुम्हारी दीदी पैदा हुई थी
तीन बरस पहले इसी अस्पताल में )
और जानती हो क्या कहा नर्स ने !
उसने कहा दोहरे बोझ से दबने वाले से
क्या सगुन लेना
निभा लो रस्म जितने से बन पड़े
आज पता चला मुझे
कि तुम ना आओ इसके लिये
तुम्हारे अपनों ने ही रखे थे
अनेकों व्रत उपवास
अभी तो तुम आयी ही हो दुनिया में
नहीं समझ पाओगी इन बातों के अर्थ
पर सालों बाद
जब पढ़ोगी तुम इस कविता को
तो हँसोगी शायद
कि उत्तर आधुनिकता के ठीक पहले तक
अपने यहां की महिला डाक्टर
माफी माँगा करती थी बेटियाँ होने पर
और मेरे जैसे बाप
हारे हुए सिपाही समझे जाते थे
तुम्हारे होने पर…..



[नैनीताल समाचार छ्पी में श्री मुकेश नौटियाल की एक कविता. श्री मुकेश नौटियाल की दूसरी बेटी का जन्म हुआ था. ]

कुछ गलत हो गया तो ?

वे कहते थे -
बोला न करो
कुछ गलत बोल गयीं तो..
लेने के देने पडेंगे ....

वे कहते थे -
चला न करो
अपनी मर्ज़ी से
कहीं गलत चल पडीं तो...
लेने के देने पडेंगे ..

वे कहते थे -
जवाब तलब न करो
कुछ गलत सुन लिया तो ...
लेने के देने पडेंगे ....

एक दिन
मैने कहा -
नही जलाती चूल्हा
नमक गलत पड गया तो...
हल्दी ज़्यादा हो गयी तो...
चावल कच्चे रह गये तो...

मैने कहा-
आज नही धोते कपडे
मैले रह गये तो ....
नही साफ करूंगी घर
गन्दा रह गया तो .....
लेने के देने पडेंगे .....


मणिमाला

Thursday, February 7, 2008

स्वप्नदर्शी और शास्त्री फिलिप जी के बहाने कुछ अहम बातें

स्वप्नदर्शी जी ने रचना जी की सुबह की पोस्ट पर पूछा है -ज़रा चोखेर बाली का मतलब समझाइए । उनके और सबके लिए ।चोखेर बाली का मतलब है -"आँख की किरकिरी" या आँखों को खटकने वाली । रविन्द्रनाथ टैगोर के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित फिल्म 'चोखेर बाली'में बिनोदिनी [जिसकी भूमिका ऐश्वर्य राय ने निभाई थी] नाम की स्त्री पात्र है जो शादी के एक साल में ही विधवा हो जाती है पति के सामीप्य का सुख भोगे बिना । जीवन की छोटी छोटी खुशियों और सुखों से महरूम कर दी गयी बिनोदिनी समाज की आँखों मे खटकने वाली किरकिरी बन जाती है । अपनी सहेली के पति को अपनी विद्वता से आकर्षित कर वह स्त्री की यौन ज़रूरतों की और चाहतों की पहली अभिव्यक्ति है बन जाती है । आज भी समाज जहाँ ,जिस रूप में उपस्थित है - स्त्री किसी न किसी रूप में उसकी आँखों को निरंतर खटकती है जब वह अपनी ख्वाहिशों को अभिव्यक्त करती है ; जब जब वह अपनी ज़िन्दगी अपने मुताबिक जीना चाह्ती है , जब जब वह लीक से हटती है । जब तक धूल पाँवों के नीचे है स्तुत्य है , जब उडने लगे , आँधी बन जाए ,आँख में गिर जाए तो बेचैन करती है । उसे आँख से निकाल बाहर् करना चाहता है आदमी ।
दूसरी बात शास्त्री जी के बहाने बाकि पुरुष ब्लॉगरों से । वे कल रचना की पोस्ट देखते हुए यहाँ आये । अच्छा लगा । आते रहें ।उनकी टिप्पणी है -
Shastri said...
यह चिट्ठा आज ही मेरी नजर में आया. यहां हमारे चिट्ठालोक के स्त्रीरत्न कई बातें कहने की कोशिश कर रही हैं. नियमित रूप से पढूंगा. देखते हैं कि कुल मिला कर आप लोग क्या कहना चाहते हैं.

शुभकामनाये !!
यह 'आप लोग 'कुछ सकारात्मक टोन नही देता । मै सोचने पर विवश हुई कि कहीं इस ब्लॉग से ही यह ध्वनि तो नही जाती कि यहाँ खूंटा हमने गाडा है । यहाँ "us" और "them" वाला भाव नही है । कुछ बातें और समस्याएँ हैं जिन्हें पुरुष कभी एड्रेस नही करना चाहते । बस प्रोवोक करना है सम्वाद स्थापित करने के लिए ।बात हमारी ज़रूर है पर कहिये आप भी ।क्योंकि आप लोगो के बिना भी तो संसार पूरा नही बनता । मंशा साथ की ही है। इस विषय पर कई बार अपने ब्लॉग पर लिखा है --"स्त्री की लडाई ,दर असल , पुरुष से नही पितृसत्ता से है जिसका समान रूप से शिकार पुरुष भी है ;इसलिए स्त्री की मुक्ति या लडाई पुरुष की भी मुक्ति और लडाई है ।लेकिन अफसोस यह है कि इस् मुद्दे पर स्त्री व पुरुष एक दूसरे को प्रतिद्वन्द्वी मानते हैं और सारी ऊर्जा अवास्तविक शत्रु से जूझने में निबट जाती है ।मायने यूँ समझिए कि, जब एक स्त्री अपनी पारम्परिक भूमिकाओं से निकल कर मनचीता करना चाहती है तो उसका रास्ता रोकने वालों में पितृसत्ता के चौकीदार पुरुष ही बाधा नही बनते बल्कि इसी व्यवस्था में रची-पगी स्त्रियाँ भी उतनी ही बाधक बनती हैं ।"

साथ साथ इस मुद्दे पर सोचें । बात सिर्फ यह है कि पुरुष का जिन समस्याओं से सीधा सरोकार नही पडता और जो उसका नुकसान नही करते उन्हें वह अनदेखा कर जाता है । इसलिए जैसा कि बेजी की स्त्री मुद्दों को निबटाने की शिकायत पर प्रमोद जी ने कहा था कि
"और यहां बात के खत्‍म होने जैसी कोई बात नहीं है, लोग थोड़ा इधर-उधर ठंडा, सुस्‍ता रहे हैं.. यह आपलोगों की दुनिया (और उस दुनिया के अंदर का भी भारी आंतरिक कन्‍फ़्यूज़न) है तो आपका ज़्यादा फर्ज़ बनता है कि इस मसले की आंच और आग जिलाये रखें.. "

हमारा ज़्यादा फर्ज़ बनता है । ज़ाहिर है । बस इसलिए एक शुरुआत है । ताकि बहसें जारी रहें , विमर्श होते रहें , मुद्दे निबटाए न जाएँ ।प्रत्यक्षा वहाँ लिखती हैं--" इस विषय पर लगातार डायलॉग चलते रहना चाहिये । अगर किसी को एक बार भी सोचने और इंट्रोस्पेक्शन पर मजबूर कर पाये ..इतनी सार्थकता ला पाये तो सही ।बावज़ूद इसके किसी के पारिवारिक जीवन में कैसा और क्यों हस्तक्षेप ।
बेजी , बहस कोई खत्म नहीं हुई और शायद ओवर्टली और पब्लिकली न भी दिखे , लोगों के जीवन में हर दिन किसी न किसी रूप में ऐसे मुद्दे सर उठाते हैं । ज़रूरत है उसे कुछ मायनों में संतुलित तरीके से सामने लाते रहने की । कुछ कुछ रिले रेस जैसा ..पासिंग द बैटन । और ऐसी कवायदों को हल्के तौर पर महिला मुक्ति संगठन के नाम से ब्रैंड करके उसकी अहमियत खत्म करने की कोशिश अगर स्त्रियाँ ही करें तो उनके पुरुषों से आप कैसी और कितनी उम्मीद रखती हैं ? ये मुद्दे व्यक्तिगत मुद्दे नहीं "
अगर अब तक स्त्री ने व्यक्तिगत अनुभवों को प्रकट किया होता तो समाज शायद उसे बेहतर तरीके से समझ सकता था । उसने मुँह खोला नही । किसी ने समझा नही । बोलेंगे तो सुने समझे जाएंगे । आप अपने अनुभव कहिये । स्वागत है ।
कल सुबह रचना की पोस्ट पर श्रीमान 'मेराचिट्ठा'ने यहाँ लिखने की मंशा ज़ाहिर की थी ,सो उन्हें मेल भेज दिया गया है ।
चोखेर बाली ब्लॉग जगत के आँख की किरकिरी तो नही है न ! तो सम्वेदनशीलता और साथ दीजिये न कि यह कि "हम तो दूर बैठ तमाशा देखेंगे । देखें आप लोगों के विचारों से क्या तस्वीर बनती है ? पता तो चले आप लोग चाह्ती क्या हैं ?"

Wednesday, February 6, 2008

कह लूं ज़रा दर्द आधी धरती का

दुनिया आधी है अधूरी है ! पूरी क्यों नहीं है का सवाल भी मेरा है और पूरी कैसे हो की सारी छटपटाहट भी मेरी है ! क्या आधी दुनिया में सिर्फ पानी है और बाकी की आधी दुनिया बनी है चट्टानों की बेलौस ताकत से, कैक्टसों शानदार अनगढता से ? आधी दुनिया बाकी की आधी दुनिया एस क्या पाने को छटपटा रही है ? वो हाट लगा के बैठे हैं मेरी छटपटाहट का ! यहां मेरा दर्द भी बिकेगा और मेरे दर्द की कहानी भी ! क्या करुं ? मुझे नहीं होना चट्टान नही होना है कैक्टस ! तो क्या होना है मुझे ? मुझे सोच लेना होगा वरना वह सोच लेगा कि मैं क्या होना चाहती हूं ! देखो न वह मेरे दर्द से मतवाला हुआ जा रहा है ! वो कहता है कि वो जानता है मेरे मन को ...उसकी एक एक परत को उधाड लेना चाहता है वह ताकि वह रच सके कोई गीत ! मैं उसकी कहानी की नायिका हूं ! वही नायिका जिसे वह दर्द भी देता है और दवा भी देता है खुद ही ! वह मदमाता है कि वह कंटीला कैक्टस है और वह कहता है कि हे प्रिय तुम फूल हो फूल ही रहो ! वह मेरे पुष्पत्व का अकेला रखवाला और वह मेरे पुष्पत्व का अकेला माली और रखवाला ! उसकी चट्टानता और उसकी महानता से दुनिया के सहमे हुए जलस्रोत खुद को अंजुली का पानी समझ रहे हैं ! वह मेरा दर्द मेरे अनगढ शब्दों में मुझसे नहीं सुन पाता पर मेरे दर्द पर लिखे गीतों किस्सों में खूब मन रमा पाता है ! मैं सिलसिलेवार नहीं , मैं कथाकार नहीं ! कैद है मेरी हंसी , मेरा दर्द , मेरा सपना तुम्हारी तिजोरी में ! तुम रचते हो ,पिरोते हो करीने से मेरे इस कैदी स्व को और सुनाते हो मुझी को ! कहते हो हे प्रिये ! पीडा का सृजन, सृजन की पीडा सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए ....मैं खामोश हूं अभी ....वहां ठीक उस चट्टान की तली से बह रहा है पानी .....!

कुछ नहीं समझती ये नादान लड़की

पति अपना धौंस जीवन भर चलाता रहा । पत्नी से तू तड़ाक । कभी सीधे मुँह बात नहीं की । पत्नी के लाये लाखों के दहेज़ पर न सिर्फ ऐश किया , इस बात से भी कहीं पत्नी से दब गया हो ऐसा कभी सपने में भी नहीं हुआ । पत्नी ने कभी गलती से भी कह दिया कि मेरे पिता ने ये दिया वो दिया तो ऐसी मलामात हुई कि याद करना भी छोड़ दिया पिता ने क्या दिया ।

पत्नी जबकि अच्छी नौकरी में थी । कॉलेज में लेक्चरर की नौकरी लगी थी तब पिता ने कहा था अब शादी में सुभीता होगा । पैसे कमाने वाली लड़कियों की डिमांड मैरेज मार्केट में ज़्यादा है । देखने दिखाने का प्रकरण चलता रहा । कुछ बराबरी की नौकरी वाले , कुछ नीची नौकरी वाले .. सब आते “देखते” , उलजलूल प्रश्न पूछते .. कितनी सैलरी है ? घर और गाड़ी के लिये लोन मिलता है ? यहाँ तक कि अब तक की नौकरी से कितना बैंक बैलेंस इकट्ठा किया ? लड़की सर झुका कर जवाब देती , अंदर खून के घूँट पीती । ऐसे चिरबिल्ले दो कौड़ी के लड़कों को कॉलेज के ज़माने में कितनी खरी खोटी सुनाई थी , कितना हेय दृष्टि से देखा करती थी । आज उन जैसों के सामने मुँह सीये बैठी है । पिता अपना ज़माना भूल गये हैं (सुना है दादी के मुँह से कितनी कन्यायों को दबा रंग , ऊँचे दाँत ,नाटे कद के लिये छाँटा था ), निरीह नज़रों से याचना करते हैं , बेटा कुछ उलटा सीधा मत बोलना । उम्र निकलती है तुम्हारी । कैसे ब्याह हो जाये । लड़के वालों से बढ़ा चढ़ा कर उसकी आमदनी गिनाते हैं , चारा फेंक रहे हों जैसे । लड़की को लगता है उसके अस्तित्व को नकार दिया गया हो , उस अस्तित्व को जिसे बड़े हौसले और विद्रोह से खड़ा किया था , हर दिन की छोटी लड़ाई .. पढ़ते वक्त मुझसे चाय बनाने को मत कहो माँ , जितना मैं पढ़ती हूँ उतना ही भैया भी तो फिर उसे दूध बादाम और मुझे ? मुझे ताकत की ज़रूरत नहीं ? मैं भी बाहर कोचिंग करूँगी , मुझपर भी पैसे खर्च करो । पिता कहते , पैसे तुम्हारी शादी के लिये भी तो जमा करना है । फिर मैं नौकरी करूँगी शादी नहीं , अब तो कोचिंग के पैसे दो । पिता सर हिलाते , कुछ नहीं समझती ये नादान लड़की ।

लड़की ज़्यादा समझती थी । कमसिन नाज़ुक लड़की का मोटा तोंदियल पति , उससे पैसे कम कमाता , उसके रोज़के खर्च के लिये उसके ही पैसे मिन्नत चिरौरी पर देता , दस सवाल किसलिये , क्यों ,पिछले हफ्ते ही तो इतना दिया था फिर ? , टाँग पर टाँग चढ़ाकर हुक्म चलाता , तबियत खराब पर ऊँगली से छूता कोंचता ..चाय बना दे , ठीक से छू लेने पर बुखार का अंदाज़ा जो हो जायेगा फिर स्नेह नहीं सामाजिकता में लेटे रह , कहना होगा , पालतू पशु से बदतर हाल । और माँ बाप नाते रिश्ते आड़ोस पडोस ..सब कहते ..लाली का पति खूब अच्छा है । कोई बुरी आदत नहीं । महीने में एक साड़ी ला देता है , दो महीने में मायके घुमा देता है , तीन में सिनेमा दिखाता है । और क्या चाहिये एक स्त्री को ।

लाली को नहीं पता कि अपने जट्ट ज़ाहिल पति से उसकी उम्मीदें किस आसमान को छूती हैं । कैसी मानसिक चाहरदीवारी के अंदर की बेचैन छटपटाहट है । सुबह से उठकर रसोई घर कॉलेज रसोई का ट्रेडमील उसे कहाँ ले जा रहा है । उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता एक मिथ्या है । उसका बैंक बैलेंस कितना है ? उसके इंवेस्टमेंट कहाँ और किन जगह हैं , उसके अकाउंट का और पी एफ का नॉमिनी कौन है , वो अपने कमाये पैसे कहाँ और कितना खर्च करेगी ..इन सब पर उसका अख्तियार कुछ नहीं है । उसकी लड़ाई लड़ाई नहीं । इस लड़ाई का कोई अक्नॉलेजमेंट तक नहीं ।