Wednesday, February 13, 2008

डॉ श्वेता के सुसाइड नोट का समाजशास्त्र...

नोएडा में आईकेयर अस्पताल की डॉ. श्वेता आत्महत्या कर लेती है । अखबार उसका सुसाइड नोट छाप रहे हैं ।
एक शादी , एक बलात्कार , एक अनहोनी पर जीवन खत्म नही होता ।
लेकिन हम "वी द पीपल ऑव इंडिया.." ,समाज की हैसियत से कुछ लोगों के सामने कोई रास्ता ,इसके अलावा नही छोडना चाहते ? भारतीय समाज में में स्त्री के सम्बन्ध में यह बहुत आम बात है । क्या हमने गौर किया है कि ऐसा क्यो है ?
अपने सुसाइड नोट की शुरुआत में वह लिखती है -

'सुभाष..मैं अपनी जिंदगी खत्म करने जा रही हूं, इसलिए नहीं कि मेरा तुम्हारे प्रति प्यार कम हो गया है। लेकिन मुझे यह आभास हो गया है कि हमारे जैसे लोगों के लिए जीवन एक जंग है और मैं इससे लड़ते-लड़ते अब पूरी तरह से टूट चुकी हूं। अगर इसके लिए कोई जिम्मेवार है तो वह हमारा समाज व इसमें रहने वाले लोग हैं'


आत्महत्या कमज़ोर मन वाले करते हैं । जो लड नही सकते ,जूझ नही सकते । जो हारे होते हैं । वह हार चुकी थी ,कमज़ोर भी थी । पर उसे कमज़ोर बनाने वाले खुद उसके माता पिता थे । उसने अपनी मर्ज़ी से शादी की थी । पर ससुराल और रिश्तेदारों के बीच वह निरंतर मानसिक रूप से आहत थी । वह माँ- बाप और समाज को साबित नही कर सकी कि वह अपनी मर्ज़ी से शादी करके खुश रह सकती है ।वह कमज़ोर थी क्योंकि माता -पिता ने कभी यह विश्वास उसमें पैदा नही किया कि बेशक वह उनकी नज़रों में गलत है पर फिर भी वह उन्हे प्यारी है , उन्हे उसकी उतनी ही फिक्र अब भी है । उन्होने उसकी ज़िन्दगी को एक चुनौती बना दिया , जिसमें हारना मौत के बराबर हो गया ।

वह अपने नोट में लिखती है---
मैं उन्हें बताना चाहती थी कि उनकी मर्जी के बगैर भी शादी कर मैं सफल जीवन जी सकती हूं, लेकिन मुझे नहीं पता था कि उन्होंने बचपन से ही मुझे बेहद कमजोर कर दिया। जमाने से लड़ते-लड़ते मेरी सारी ताकत खत्म हो चुकी है। उनके चलते मैं मानसिक रूप से बीमार हो चुकी हूं। लिहाजा मेरे इस कदम के लिए मेरे मां-बाप व खुद मैं दोषी हूं।



एमील दुर्खाइम जब बात करते हैं आत्महत्या की[समाजशास्त्र के पिता कहे जाते है दुर्खाइम ,उन्हीं की पुस्तक है "सुसाइड"] तो उसे एक व्यक्ति का आवेशपूर्ण निर्णय न बताकर एक सामाजिक फिनॉमेना बताते हैं । सही भी है । जिस परिवेश में व्यक्ति रहता है वे उत्तरदायी होते हैं उन मूड डिसऑर्डर के जिसमे कोई अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेता है ।स्त्री की आत्महत्या के समाजशास्त्र को समझने में डॉ. श्वेता का यह सुसाइड नोट बेहद महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है ।
क्या हम अपने समाज में लडकियों को बेहद असुरक्षित [भावनात्मक , शारीरिक ],आर्थिक ] वतावरण नहीं दे रहे जहाँ वे कभी अपना दर्द खुल कर नही कह पाती । वह कभी लौट नही पाती । क्यों?
हद तो यह है कि समाज ऐसी आत्महत्या को तो स्वीकार लेता है । रो -बिसूर लेता है । भूल जाता है । लेकिन वह सम्बन्ध- विच्छेद को बराबर तानाकशी का शिकार बनाता है । जीना दूभर कर देता है । बलात्कार हो या घर से अगवा की गयी या भागी हुई लडकी का वेश्यावृत्ति मे जबरन ढकेल दिया जाना या अपनी मर्ज़ी से की शादी का असफल होना , दोनो सूरतों में कानूनी मदद लेने से बेहतर आत्महत्या का रास्ता ही क्यो रह जाता है ?
एक शादी , एक बलात्कार , एक अनहोनी पर जीवन खत्म नही होता । क्या हम अपनी बेटियों को यह शिक्षा कभी नहीं देंगे ?

16 comments:

Tarun said...

मैं तो यही सोच रहा हूँ कि जब ये हाल एक पढ़ी लिखी महिला का है तो बाकियों का क्या होगा। मुझे तो यही लगता है कि लाड़ प्यार से ज्यादा जरूरी है बच्चों को हिम्मती बनाना और ये दोनों के लिये लागू होता है चाहे वो बेटी हो या बेटा।
लेकिन अब कोई कुछ भी कह ले इंडिया में महिलाओं के साथ प्रोब्लम कुछ ज्यादा ही है।

Pratyaksha said...

बढ़िय़ा ! इस मुद्दे पर कई और पक्ष उठाये और रेखांकित किये जा सकते हैं ...गंभीर विमर्श की ज़रूरत है ।

रचना said...

बलात्कार के बाद क्या ?? की जगह प्रश्न होना चाहिये बलात्कार क्या ?? जब तक नारी शील का टोकरा अपने सर पर रख कर घूमती रहेगी , संरक्षण खोजती रहेगी ऐसा ही होता रहेगा । बलात्कार औरत के मन का , अस्तित्व का , बोलो का , भावानाओ का या फिर उसके शरीर कही न कही होता ही है रोज हर पल फिर शरीर को इतनी importance क्यों ?? पांच तत्व हैं एक दिन पांच तत्व मे विलीन हो जायेगे । सबसे पहले नारी को अपने शरीर को ख़ुद भूलना होगा , भूलना होगा की वह सुंदर हैं , हसीन है और उसके शरीर उसकी उपलब्धि है जिसके सहारे वह पुरूष को पा सकती है । पुरूष को पाने की कामना मे अपने अस्तित्व को खोना भी बलात्कार है जिसे बहुत सी नारियाँ रोज अपने ऊपर करती हैं । जिस दिन इस शरीर के मोह से नारी अपने को निकाल लेगी बलात्कार केवल एक जबरन सम्भोग बन जाएगा जिसका मेडिकल treatment जरुरी होगा trauma treatment नहीं .

Beji said...

इस समाजशास्त्र को समझने की कोशिश में एक कहानी लिखी थी-
जिन्दगी का इम्तिहान

मनीषा पांडेय said...

अच्‍छी शुरुआत है सुजाता, इस पर और भी बात होनी चाहिए। हमारे आसपास ऐसी ढेरों कहानियां बिखरी पड़ी हैं, वह सब यहां दर्ज हों।

सुजाता said...

बेजी जी ,
यह आपकी कहाने का अंतिम अंश है --

ढुपट्टा लिया, गाँठ बाँधी, स्टूल से चढ़ पंखे पर टाँगा...फिर गरदन पर गाँठ उतारी...

एक सेकंड के लिये रुकी थी...क्या यह सही है...फिर जैसे घबराकर की खुद की आवाज़ निर्णय बदल ना दे स्टूल को एक लात मारी.....

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डॉ श्वेता के नोट में भी ऐसा ही लिखा है -
अगर मैंने लिखना बंद नहीं किया, तो शायद मेरा मरने का इरादा टल सकता है, लेकिन मेरे लिए अब सबसे जरूरी काम यही है।

काकेश said...

क्या मेरी परुली का हश्र भी यही होगा...

Neelima said...
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Neelima said...

क्या श्वेताओं को बार बार खुद को मारना पडेगा ? क्या समाज से उसकी जंग की वे अकेली साक्षी रह जाऎंगी ? सब चुप क्यों हैं ? क्या डॉ.श्वेता का मृत्यु -पत्र समाज की असंवेदनशीलता को दिखाने भर की भी कुव्वत नहीं रखता ? सवाल बहुत हैं पर जवाब कहां हैं ?
मै विचलित हूं !!

February 13, 2008 11:56 AM

चंद्रभूषण said...

डॉ.श्वेता के संदर्भ में नहीं, एक आम बात के तौर पर कह रहा हूं- स्त्री के शोषण, दमन, जोर-जबर्दस्ती का शिकार बने रहने की कहानियां किसी स्त्री को खुदमुख्तार बनाने में कोई मदद नहीं करतीं। अक्सर ये उसे और डरा देती हैं और कभी-कभी तो वह इन स्थितियों को आइडियलाइज भी करने लगती है। कुछ कसरत अब इन चीजों को सिर के बल खड़ा कर देने के लिए भी की जानी चाहिए। खुद से बड़े फैसले लेना, उनपर अमल के रास्ते में आने वाली परेशानियों को नियतिप्रदत्त दंड की तरह लेने के बजाय प्रयोग के प्रेक्षणों की तरह ग्रहण करना- कुछ इस तरह की पोस्टें शायद स्त्रीवादी चेतना के लिए कहीं ज्यादा काम की हों।

Anonymous said...

यह ठीक है कि घर-समज से लड़ते-लड़ते श्वेता ने यह क़दम उठाया, जो सभी को झक्झोर गया पर इससे कई बात सामने आतीं है -
१ अगर उसका पति उसके साथ पूर्ण रुपेण होता तो वह शायद इतनी निराश न होती।
२-अनपढ़ या कम पढ़ीलिखी लड़की यह क़दम उठाती तो और बात थी। वह अपनी शिक्षा को अपने जीवन में प्रयोग न कर पायी और अपना मन मजबूत न किया।(श्वेता विज्ञान पढ़ीथी, डॉक्टर को इलाज के साथ-साथ मनोविज्ञान भी पढ़ाया जाता है। वह अपना मन मजबूत न बना पायी )
३ यह केवल स्त्री की नहीं हर युवा की समस्या है।
- premlata

neelima sukhija arora said...

इस तरह की घटनाएं हमारे ही समाज की देन हैं। जहां औरतों के लिए उनके खाके तय हैं वो उससे बाहर कुछ नहीं कर सकती और अगर वो करने की कोशिश भी करती हैं तो उनके लिए सब बहुत मुश्किल हो जाता है।

swapandarshi said...

प्रेम-विवाह, अंतरजातीय विवाह, औरतो की आर्थिक भागीदारी सब कुछ बढी है पिछ्ले कई दशको मे. नही बदला है तो समाज और परिवार का स्वरूप, जहा उन्हे एक व्यक्ति की तरह सम्मान मिले.
स्त्री ही नही पुरुष के लिये भी वर्तमान समाज मे जो जैसा है, उसे उस तरह स्वीकार करने वाला नही है. हर चीज़ के खांचे है, और इन्ही खांचो के भीतर समाये हुये व्यक्ति की कराह हमे बार-बार सुनायी देती है.

स्त्री के लिये ये त्रसादी कुछ और भी है, क्योंकि उसे अपनो से ही बहुत ज्यादा लडाई करनी पडती है. स्त्री -पुरुष एक दूसरे का साथ चुनते है, एक अच्छे जीवन के लिये, पर शादी के बाद जीवन की शर्त पुरुष के घर के हर सदस्य की गुलामी हो जाती है. शादी के बाद स्त्री जब ससुराल जाती है, तो एक विस्थापित वजूद के साथ जाती है, उसका किसी पर अधिकार नही, पर हर एक की उससे कभी न खत्म होने वाली मांगे शुरु हो जाती है. यहा बात दहेज की नही, स्त्री की मेहनत, उसके समय, और अगर कमाती है तो उसके धन पर साझे परिवार का हर व्यक्ति नियंत्रण करना चाहता है.

आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिलाओ को दोहरी चक्की मे पिसना पडता है. अगर परिवार का स्वरूप, परिवार के नियम, और घर के काम मे साझेदारी न हो, तो आर्थिक स्वतंत्र्ता भी अभिशाप बन जाती है.

संस्कारी हिन्दुस्तानी लडकिया, हर दम हर एक को खुश करने की नाकाम कोशिश मे खुद खत्म हो जाती है. और कुछ हद तक सुपर् वोमेन बनने के चक्कर मे इंसान भी नही रह पाती. बस बन जाती है, दो काम काजी हाथ, एक शरीर. और जरा सा लफडा किया तो पति सर पर, दाम्पत्य का संकट, और बच्चे है तो उनका भविश्य़. शायद इसी सब के बीच औरत की जिन्दगी गुजर जाती है.
इसके अपवाद भी है, कई बार जहा लडकी का परिवार ज्यादा अच्छी हालात मे है, वो भी नव दम्पति का जीना हराम करने, उन पर अपने मुल्य थोपने, मे पीछे नही रहते.
इसीलिये ये जरूरी है कि स्त्री अपना सम्मान करना सीखे, क्योंकि अगर उसने ऐसा नही किया तो कोई उसका समान नही करेगा. लोग नाराज़ होंगे, आपको यदा कदा कोई प्यार भरा गिफ्ट-शिट नही देंगे. चार लोगो के बीच बठ्कर आपके ग़ुन नही गायेंगे. पर इस सब्के बाद भी कोई आपके व्यक्तितव को रोनदने, आपके आत्म-विश्वास को तोडने का साहस नही करेगा.

इसीलिये आज़ादी की भी कीमत होती है, पर वो गुलामी की सुविधा से बहुत अच्छी है.

इस मायने मे प्रेम विवाह और आम विवाह मे कोइ अंतर नही है.

Anonymous said...

Samaj ki aisi ki taisi. Use banaya kisne. Vo aap aur hum se hi milkar banta hai. Samaj badlne ka matlab aapko aur humko..sabko badlana hoga. Par baat ye hai ki sala koi badlna hi nahi chahta. Jaisa chal raha hai use gandhi ke 3 bandaron ki tarah dekhte hai sab. Agar hai himmat to badal ke dikhaon. Mai un bujurgon ki baat nahin kar raha jo kehte hain ke beta ab is umr mein kaise badle (Achha bahana hai, sala). Magar ye yuva kya kar rahe hain. Kyon nahin badlate, sale khud ko aur bhavishya ke samaj ko. Aur kyon nahin tokte un tana dene valon ko.
Sab bakwas ke bahane hain. Asal mein khud ko badalna hoga aur sach ke saath khada hone ki himmat dikhani hogi, chahe uski keemat kuch bhi kyon na ho (Maa, baap parivar bhi).

धीरज चौरसिया said...

ये हमारे समाज की सबसे बडी सच्चाई है क्योकी अभी भी हम पित्रि सत्तात्मक समाज को ही जी रहे है और ईन सबके जिम्मेवार हम सभी है जो हम अपनी बेटियो को ईस समाज से लड्ने लायक नही बनाते| हम अपनी जिम्मेवारी से मुह नही फेर सकते.....

dilip uttam said...

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