Sunday, March 30, 2008

इनसान बनने से पहले औरत का अफसाना कैसे बन गया !!

सपना चमड़िया
"ज़िन्दगी का अनुवाद "
तीसरा भाग

मेरे घराने की एक महिला के बारे में बताऊँ-उन्हें रात से डर लगता है ।रात होते ही उन्हें बेहद घबराहट होने लगती है। वे कहती हैं -"मुझे अपने कमरे में जाने से डर लगता है,ऐसा लगता है किसी काली ,अन्धेरी गुफा में घुसती जा रही हूँ और मन ही मन सोचती हूँ कि अज की रात बच जाऊँ। पर नहीं जब से यह बेगार का पट्टा गले में पड़ा है-रात-दिन क भेद मिट गया है । सुबह पाँच बजे जब मुर्गे,गधा,कुत्ता,बैल,गाय,पखेरू उठते हैं तभी मैं भी उठ जाती हूँ और फिर दिन भर कभी इस पैर कभी उस पैर पर नाचती हूँ ।कभी मालिक का, कभी उस के बच्चों का ,कभी उसके रिश्तेदारों का हुक्म बजती दौड़ती फिरती हूँ । एक ही दिन में कई बोलियाँ बोलती हूँ बदल -बदल कर और सच मानिए एक ही दिन में कई जून भुगतती हूँ।जल्दी सुबह उठती हूँ मुर्गे की तरह , काम में मुझे गधा या बैल समझो,खाने में कुत्ता,सीधेपन में गाय और रात होते होते मुझे एक खूबसूरत परी में तब्दील हो जाना पड़ता है जो मालिक का हर सही गलत हुक्म बजा लाने का हुनर जानती हो। "
मैं जब भी अपने बारे में कुछ कहने लगती हूँ मेरे घराने की कोई न कोई औरत मेरे सामने आ कर खड़ी हो जाती है। पहले मुझसे झिझकती है ,दस-पन्द्रह मिनट तक अपने मालिक के बारे में बेहद प्रशन्सा से भरे हुए शब्द उच्चारती है। अपने आप को दुनिया की सबसे सुखी औरत साबित करने की पुरज़ोर कोशिश करती है। इसी बीच मैं धीरे से उसका हाथ पकड़ लेती हूँ और जब मेरे हाथों का कड़ापन,रूखापन यह बता देता है कि मैं भी उसी की तरह न्यूनतम मज़दूरी भी न पाने वाली बेगारों की परम्परा में आती हूँ तो अचानक वोह अपना नकाब उतार फेंकती है और मुझसे कहती है-मेरी कहानी लिखोगी ?
मुझे सोचना होगा,जानना होगा और लिखना होगा कि इनसान बनने से पहले औरत का अफसाना कैसे बन गया !!

मुझे मालूम है कि मैं जो कुछ लिख रही हूँ उसमें कोई तरीका ,कोई सिलसिला नहीहै । बस यूँ ही कुछ इधर से उठाया कुछ उधर से , जैसा जो याद आता गया बस वही कागज़ पर उतार दिया ।दर असल वक़्त मेरे साथ नही चलता , मुझे भाग भाग कर वक़्त को पकड़्ना पड़्ता है औत तब भी पूरा वक़्त कभी मुझे मिला नही बल्कि एक नज़र भर भी मैने उसे नही देखा ।मेरे कई परिचितों ने शिकायत की कि मैं जब भी फोन उठाती हूँ-ऐसा लगता है कि कहीँ से भाग कर आ रही हूँ, आवाज़ हमेशा हाँफती हुई होती है ।शायद वे हैरान होते हैं कि तीन कमरों में ऐसा क्या है जो मैं पकड़ना चाह्ती हूँ ,क्यों मैं हाँ रही हूँ । मैं जानती हूँ मुझे किस चीज़ की तलाश है, यह कौन सी यात्रा है जिसे वर्षॉ से सदियों से चलते रहने के बावजूद वह मुकम्मल नही हो पायी है।घट के भीतर भी -घट के बाहर भी यह यात्रा भी सिलसिलेवार नही है-इसमें कोई तरीका नही है,इसलिए मेरे लिखने मे कोई तरीका नही है ।मेरे पास जो है वो पूरा नही है इसलिए जो कुछ मैं लिख रही हूँ वह आपको रुक कर टुकड़ों को जोड़ कर पढना पड़ेगा।जब मुझे ही कुछ पूरा नही मिला तो आपको पढने के लिए एक पूरी सुविधाजनक कथा कैसे दे सकती हूँ !


पहला अंश
दूसरा अंश

Saturday, March 29, 2008

द वूमन्स वर्क इज़ नेवर डन

व्यक्तिगत रूप से मैं ट्रेसी चैपमैन का बहुत बड़ा प्रशंसक हूं। पिछले बीस-तीस सालों में विश्व के संगीत-संसार में उभरी सबसे मीठी और सजग आवाज़ों में एक आवाज़ है ट्रेसी की। प्रेम को पूरी ईमानदारी से निभाने वाली स्त्री को मिलने वाले छलावे और दर्द को ट्रेसी अपने ज़्यादातर गीतों का विषय बनाती हैं। आम तौर पर बाकी गानों में इस थीम पर बहुत हायहाय करने का रिवाज़ है। ट्रेसी चैपमैन के यहां प्रेम में हार पाई औरत कोई दयनीय नायिका नहीं होती; वह उतनी ही संवेदनशील बनी रहती है और तार्किकता की सान पर बीते समय को परखती है और पहले से अधिक मजबूत बन कर बाहर आती है।




आज जो गीत मैं इस ब्लॉग पर अपनी पहली पोस्ट के तौर पर लगा रहा हूं, उस के लिए इस से बेहतर प्लेटफ़ॉर्म और कहां मिलेगा। (यह बार दीगर है कि इस गीत को कुछ माह पहले कबाड़ख़ाने पर लगाया जा चुका है। लेकिन तब तक इस तरह का कोई और कम्यूनिटी ब्लॉग नहीं था।) मुझे आशा है मैं शीघ्र ही ट्रेसी के नए अल्बम 'टैलिंग स्टोरीज़' से जल्द ही आपको कुछ और संगीत सुना सकूंगा।

गीत के बोल देखिए:

Early in the morning she rises
The woman's work is never done
And it's not because she doesn't try
She's fighting a battle with no one on her side

She rises up in the morning
And she works 'til way past dusk
The woman better slow down
Or she's gonna come down hard

Early in the morning she rises
The woman's work is never done

मुझे बेगार की परम्परा बदलनी होगी

सपना चमड़िया

अब तो इस काम में मैं इतनी निपुण हो गयी हूँ और ऐसी आदत पड़ गयी है मुझे इस काम की कि अगर आप नीन्द में भी उठा कर मुझसे पूछे कि-भिंडी को कैसे छोंकना है तो मैं तुरंत जवाब दूंगी कि"मेथी दाने से" मुझे इसके लिए कुछ सोचना नही पड़ेगा। मैं कितनी ही दुख तकलीफ में क्यों न रहूँ मेरे हाथ अनायास काम करते रहते हैं और मेरे दुखों का असर मेरे बेगार पर कभी नही पड़ता ।बल्कि सच यह भी है कि मुझे अपने काम से प्यार हो गया है-सुनकर बहुत सदमा लगा न ! आपने सोचा होगा कि मैं इस बेगार से सिर्फ नफरत ही करती हूँ और यही यहाँ पर बताना चाहती हूँ। लेकिन मैं जो प्यार की बात कर रही हूँ यह और भी हैरत की और खतरनाक बात है। मैं जब इस घर में नयी नयी आयी तो इस बेगार से मेर आत्मीय सम्बन्ध स्थापित नही हो पाया था-मेरे हाथ से अक्सर बर्तन छूट जाते,कभी झाड़ू फिसल जाता और कभी-कभी तो मैं ही गिर पड़ती।सामने होती मालिकों की एक पूरी जमात जो मेरे बाज़ार जाने पर या किसी रिश्तेदार के यहाँ जाने पर मेरे खिलाफ पंचायत बिठाती और निर्णय सुनाती, फतवे जारी करती। जब मैं वापस लौटती तो मुझे हमेशा घर का माहौल कुछ घुटा ,कुछ कसा ,कुछ बदरंग -सा लगता और मालिकों के मुँह कुछ सूजे हुए दिखते ।
पर सबसे ज़्यादा हैरत की बात है कि इस पूरी बेगार-परम्परा को मैंने जल्द ही आत्मसात कर लिया-ठीक वैसे ही जैसे चिड़िया का बच्चा उड़ना सीख जाता है,साँप का बच्चा काटना ,फूल खिलना ,गरमी के बाद बारिश का आना ।ठीक ऐसे ही औरत की बच्ची ने बेगारों के रजिस्टर में अपना नाम लिखवा लिया। इस रजिस्टर के बारे में तो आप जानते ही होंगे न ,जिसमें अंगूठा लगवाया जाता है 500 की रकम पर पर मिलते हैं सिर्फ 50 रुपए ।
मुझे शर्म आती है यह सोचकर कि मैं खुद भी कितनी उतावली थी इस बेगार की परम्परा में आने के लिए।नए कपड़े ,नए गहने खरीदना,नए घर की कल्पना में डूबे रहना,फिजूल की हँसी-ठिठोली । दुनिया के और रंग मुझ पर खिलते-खुलते उससे पहले ही गहरे लाल रंग नें मुझे ढांक -छिपा लिया।मेरे घराने की कोई सुखी-सम्पना महिला बहुत बेज़ार और दुखी होकर कभी-कभी अपने इमिदियेट मालिक का नाम लेकर कहती है -कि हे प्रभु ,मुझे अगले जनम में न तो इस घर की बहू बनाना न ही इस आदमी की पत्नी ।और मैं सोचती हूँ कि-इस घर या उस घर, यह आदमी या वह आदमी-बहू बनना,पत्नी बनना या बिना सम्पूर्ण तैयारी के माँ भी बनना कोई बड़े सौभाग्य की बात नही है ।आज अपने वक़्त में,अपनी कलम से मैं जो लिखूंगी -सच लिखूंगी। मैने कई बार इन मालिकों के साम्राज्य में रहते हुए सोचा कि कहीं मैं अपना मालिक बदल लूँ.....मैंने खुली आँखों से कल्पना की और अंतत: ईमान से कहती हूँ मैने अपने आप को वहीं पाया-वही घुटी हुई रसोई,वही बिस्तर ,वही बेगार,वही दिन-रात ।मुझे लगने लगा कि मालिक बदलने से कुछ नही होगा,मुझे बेगार की परम्परा बदलनी होगी


"ज़िन्दगी का अनुवाद" -दूसरा अंश

Friday, March 28, 2008

मेरी कलम चोरी हो गयी ........


सपना चमड़िया

मेरे घराने की उन नैतिक , पवित्र ,सुन्दर ,सुघड़ औरतों को बस पंख मिल जाएँ................इस कामना के साथ.....


अक्सर मेरी कलम चोरी हो जाती है और हैरत की बात है कि चोरी घर में ही होती है । बहुत बार मैं नयी कलम ले कर आती हूँ लेकिन फिर वही हादसा होता है ।कलम की चोरी ।अगर कभी मिल भी जाती है तो बिल्कुल खाली ,उसके लिखने की क्षमता बिल्कुल खत्म।ठूँठ सी खाली कलम कभी मुझे देखती है और मैं उसे । जी करता है किसी और की कलम चुरा लूँ,लेकिन दूसरे की कलम से अपनी बात कैसे कहूँगी । मुझे तो मेरी कलम चाहिये ,मुकम्मल ।
फिर सोचती हूँ कलम की सलमती हासिल कर भी लूँ तो मेरे पास अपना मुकम्मल वक़्त कहाँ है। कुछ लिखने के लिए कलम मिल भी जाए तो भी वक़्त तो चुराना पड़ेगा-कभी यहाँ से ,कभी वहाँ से और चुराया वक़्त मेरे मुकम्मल वक़्त के आड़े आयेगा । मैं लिखना कुछ चाहूँगी वक़्त कुछ और लिखवायेगा। मुश्किल है मिलना, पूरा वक़्त और सलामत कलम ।
बड़ी हैरत की बात है न कि मेरा वक़्त और मेरी कलम दोनो चोरी हो गये ।यहीं ,इसी जगह,इस तीन कमरों के घर में ,आप लाख चाहें तो भी इसे ढूँढ नही पायेंगे ।लेकिन ऐसे हैरतंगेज़ कारनामे मेरे साथ होते रहते हैं ठीक उसी तरह जैसे बराबरी के झाँसे में आकर औरतें घर से बाहर निकलती हैं और कई तरह के बलात्कार का बोझ लिये घर लौट आती हैं। घर में तो बलात्कार पुरानी आदत बन चुकी होती है ।अगर आप मेरा जीवन उठा कर देखें, हालाँकि वह भी कोई सही -सलामत चीज़ नही है,इसलिए उसे भी इधर-उधर कईं जगहों से उठाकर जोड़-जाड़कर देखना पड़ेगा ,तो ऐसे हैरतनाक वाकयों से भरा पड़ा है मेरा जीवन ।
और वक़्त बिल्कुल नही है मेरे पास । पेशे से मैं एक बेगार औरत हूँ ।25 साल तक मुझे बाकायदा सिलसिलेवार ट्रेनिंग दी गयी बेगारी की और फिर एक बड़े से समारोह में मुझे मेरे मालिक को सौंप दिया गया।दस-बारह साल से निरंतर ,बिना रुके,बिना थके एक ही तरह के काम में मसरूफ हूँ और धीर-धीरे उसी एक काम में निपुणता हासिल करती जा रही हूँ । दर असल जिस घराने से मैं ताल्लुक रखती हूँ उसमें सदियों से यही काम होता आ रहा है। मेरे घराने को आपको थोडा समझना होगा ।मेरी दादी- नानी और माँ तो इसमें आती ही हैं लेकिन मेरी सास का भी घराना यही है ।हाँ ,मेरे मालिक का घराना अलग है ।वही । जिसमें मेरे पिता और ससुर एक साथ आते हैं ।उनके घराने में ज़बर्दस्त एकता है -मसला कोई भी हो सब एक स्वर में बात कहते हैं और भाषा भी एक -सी है। बल्कि गड़बड़ी इधर से ही होती है ,मेरे घराने से , बार-बार यही लोग पाला बदल लेते हैं और हर मुद्दे पर "उनके" साथ हाँ जी हाँ जी करते नज़र आते हैं ।मैने कई बार इन्हे लामबन्द करने की कोशिश की पर अब तक नाकाम! वरना अगर हम मिलकर अपनी बात कहते तो कम से कम हमारी न्यूनतम मज़दूरी तो तय हो जाती !
हाँ ,तो बात हो रही थी मेरे वक़्त की जो कि मेरे पास नही है क्योंकि पेशे से मैं बेगार हूँ । एक बेगार के पास अपना कोई वक़्त नही होता । मालिक को इख्तियार है कि वो जब चाहे मुझे काम में झोंक दे ।

"ज़िन्दगी का अनुवाद "से पहला अंश ।



सपना जी दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन करती हैं । प्रबुद्ध लेखिका हैं ,कवयित्री हैं ।इसके अलावा भी उनका एक परिचय है जिसे बताना ज़रूरी नही क्योंकि उसका अनुमान लगा लिया गया होगा ।महत्वपूर्ण यह है कि उनकी स्त्रीवादी सोच किताबी न होकर जीवन के साथ -साथ परिपक्व हुई है और अपने आस-पास जो भी कुछ उन्होने देखा समझा उसे विचार में बान्धने की कोशिश की है । जब भी उन्हें विषय अवसर देता है, वे अपनी कक्षाओं में स्त्री-विमर्श के लिये सहजता से जगह बना लेती हैं ।
डॉ.सपना चमड़िया की डायरी के अंश हम सिलसिलेवार प्रकाशित करेंगे ।यह डायरी उन आपबीती और जगबीती अनुभवों के अधार पर लिखी गयी है जिन्हें विचार की आंच में पकाया गया है । इसमें निजी कुछ नही है ,सब सांझा है ,हम सबका भोगा हुआ । बस उसे शब्द मिल गये हैं ।जब मैने आरम्भ के 3-4 पृष्ठ पढे तो लगा मेरी-सी बातें सपना जी की कलम से लिखी गयी हैं ।अपने लिए मुझे भी वक़्त चुराना पड़्ता है ,पर अपने मुकम्मल वक़्त की ख्वाहिश बरकरार है ,आखिर चोरी में छुपा ग्लानि भाव भी तो लेखन के आड़े आता है । आभा भी कुछ ऐसा ही कहती हैं -कि मेरा घर ज़रूरी है या ब्लॉग का "अपना घर"................घरबारी रहते हुए स्त्री के लिए "लिखना "{या पढना या गृहस्थी के अलावा कोई काम ,नौकरी भी आजकल गृहस्थी के लिए ही है }इतना दुश्कर क्यों है ?

Tuesday, March 25, 2008

दो घटनाएँ

कल रात अचानक दो घटनाएं के बारे में जानकारी मिली जो अब तक दिमाग को झकझोर रही हैं। यमुनानगर में एक युवती को शादी के सिर्फ नौ दिन बाद मौत के घाट उतार दिया गया। वो भी इतनी बेदर्दी से , कि उसकी लाश रेलवे ट्रेक पर कई टुकड़ों में मिली। शादी के बाद आमतौर पर दुलहनों द्वारा पहने जाने वाले चटख रंगों की ही तरह इस नई बियाही ने भी सुर्ख रंग का जोड़ा पहना हुआ था, जो उसकी मौत के बाद खून के रंग के साथ मिलकर थोड़ा ज्यादा सुर्ख हो गया था। उसके हाथों पैरों की मेहंदी पर लगा खून उसके साथ जो हुआ होगा उस कहानी को बयां कर रहा था।
बताया जा रहा है कि इस दुलहन से उसके ससुराल वाले दहेज की मांग कर रहे थे। उनकी मोटरसाइकिल और सोने की मांग पूरी नहीं हो पाई थी, इसलिए प्रताड़ना का दौर शादी के बाद से ही शुरू हो गया था।
दूसरी घटना यमुनानगर से कई सौ किलोमीटर दूर की है, बलिया में एक युवती को उसके ससुराल वालों ने रातभर पीटा। पीटने पर भी उनका गुस्सा शांत नहीं हुआ तो उन लोगों ने सुबह मुंहअधेरे पहली मंजिल से नीचे फेंक दिया। उसकी भी गलती यही थी कि उसके मां-बाप उसके ससुराल वालों की आशा के अनुरूप दहेज नहीं दे पाए थे।
पहली मंजिल से गिरने के कारण उस लड़की के हाथ-पैर टूट गए। उसके सिर पर गहरी चोट थी और कई हड्डियां टूट चुकी थीं। पूरा शरीर पट्टियों में लिपटा था। बताया जाता था कि ये युवती तो गर्भवती भी थी। उसके ससुर खुद डाक्टर हैं जो सास के नाम पर अस्पताल चलाते हैं लेकिन साधारण घर की बेटी की सुन्दरता तो उन्हें भा गई लेकिन बेटे का दाम सही नहीं मिलने का गुस्सा ज्वालामुखी के रूप में उस लड़की पर फूटा। जो उसकी जान का ही दुश्मन बन बैठा।
दोनों घटनाएं बहुत दूर की हैं और उनमें आपस में कोई जुड़ाव भी नहीं है लेकिन दोनों में एक समानता है- ससुराल में प्रताड़ना। ये सोच कर ही दिल दहल जाता है कि उनके ससुराल वालों ने उसे किस कदर पीटा होगा। दोनों युवतियों को हालत की जिम्मेदार सिर्फ एक ही चीज है दहेज। दहेज और दहेज के लिए प्रताड़ना जिसका शिकार केवल महिलाएं ही होती हैं। अच्छे सम्पन्न घरों में बहुएं बनकर गई ये युवतियां उनकी पैसे की भूख शांत नहीं कर पाईं और उनमें से एक तो अपनी जान से हाथ धो बैठी। दूसरी अस्पताल में अभी मौत से लड़ाई लड़ रही है।

Sunday, March 23, 2008

हमें बताया गया ............




हिमांशी खरे

हमें बताया गया
कि स्त्री प्रेम की देवी होती है.
पर जब हमने
प्रेम किया तो
हमें नाक कटाऊ कहा गया
हमें बताया गया
कि स्त्री में भीषण कामाग्नि होती है
पर हमने देखा
कि स्त्री ही
हमेशा बलात्कार की शिकार होती है.
हमें बताया गया
कि स्त्री नरक में ले जाती है
पर हमने देखा कि
नरक में जाने की इच्छा रखने वालों की तादाद
हद से ज्यादा है.
इतनी ज्यादा
कि नरक में जगह कम पड़ जाए.
हमारी देह-
विमर्श का सदाबहार विषय है.
हम प्रेम करें
तो कामुक कहलाती हैं
और यदि
अपनी इच्छाओं का दमन करती रहें
तो हम आदर्श होती हैं
हमारी ज़रूरतें
बस भरपेट रोटी
और तन भर कपडा मानी जाती है
इससे ज्यादा की मांग करना
हमारी खुदगर्जी होती है
" औरत को क्या चाहिए-
पेट की संतुष्टि
और पेट के नीचे की संतुष्टि "
ये फतवा जारी करने वाले ने
हमारे शोषण
और
हमारे साथ होने वाले बलात्कार का
अधिकार-पत्र जारी कर दिया है.

*****
हिमांशी जी की यह कविता यहाँ भेजने के लिए अनूप भार्गव जी का धन्यवाद ।
* * * * * * * * * * *

Friday, March 21, 2008

आस पर, विश्वास पर दुनिया टिकी है।

कई साल पहले एक फ़िल्म देखी थी, फ़िज़ा। देखने के बाद एक बात बहुत देर तक मन को कुरेदती रही। एक विधवा माँ, जो सालों और बहुत कोशिशों बाद अपने खोए बेटे को वापस पाती है, बेटे को आतंकवादियों के हाथों एक बार फ़िर खो देने के बाद निराश हो कर आत्महत्या कर लेती है। वह एक बार भी नहीं सोचती कि उसके जाने के बाद उसकी युवा अविवाहित बेटी पर क्या बीतेगी। क्या उसका बेटा ही उसके जीने की वजह था? बेटी की खुशियों का कोई मूल्य नहीं था उसकी नज़र में?
रेनू की कहानी पढती हूँ तो फ़िर वह सवाल मन में उठता है। पति और बडे बेटे के तिरस्कारपूर्ण रवैये के कारण माँ को क्या अपनी किशोर वय की निर्दोष बेटियों को भी भूल जाना चाहिये था? अपने कठिन जीवन से पलायन करके अपने बाकी बच्चों को अपने वात्स्ल्य से, अपने सहारे से वंचित कर देना, क्या यह स्वार्थपूर्ण आ़चरण नहीं था?
या गहरी चोट खाई हुई स्त्री के जीवन में एक कमज़ोर क्षण होता है जिसमें वह अपनी तकलीफ़ के आगे कुछ सोच ही नहीं पाती।
कहीं ऐसा तो नहीं कि जो हिम्मत परिस्थितियों से लडने के लिए स्त्री में युवावस्था में होती है, वह मध्य वय तक आते आते चुक जाती है और उसे अपनी लडाई ’गिव अप’ कर देना ज़्यादा आसान लगता है।
पता नहीं.. अपने को किसी और के स्थान पर रख कर सोचना आसान नहीं होता। फ़िर भी सोचती हूँ कि किसी भी स्थिति में अपने जीवन को इतना सस्ता नहीं करना चाहिए कि किसी और की गलती की वजह से उसे खत्म कर दिया जाए। अपने जीने की कोई नई वजह ढूढना इतना भी मुश्किल नहीं होता। अपनी एक कविता की कुछ पंक्तियाँ लिख रही हूँ-

आस पर, विश्वास पर दुनिया टिकी है।
अनजान निर्जन पथ अंधेरी रात है,
एक भी आकाश में तारा नहीं,
दूर तक बस तिमिर का ही साथ है,
मुझको पता है पर, कि उस ओझल क्षितिज पर,
स्वर्ण सी एक ज्योति की रेखा खिंची है
आश पर, विश्वास पर दुनिया टिकी है।

क्लांत आँखें और बोझिल पाँव हैं,
थका-थका तन, बुझा हुआ मन,
दूर बहुत लगता, अपना घर-गाँव है,
पर कह रहा जैसे कोई कि उस छोर पर,
राह मेरी देखती मंज़िल खडी है
आस पर, विश्वास पर दुनिया टिकी है।

Thursday, March 20, 2008

रेनू की कहानी

रेनू की कहानी{पहला भाग }
भाग-2
रेनू की कहानियाँ पत्रिकाओं में छपने लगीं और पसन्द भी की जाने लगीं। उसे पाठकों के सराहना भरे पत्र मिलने लगे। संपादक उससे नई कहानियों के लिये आग्रह करने लगे। रेनू की रचनात्मकता को एक ठोस रूप मिलने लगा थ। पर रेनू की इस रुचि ने उसके लिये बहुत बड़ा संकट खडा़ कर दिया। उसके पति सुरेन्द्र उसकी बुद्धिजीवी रुचि को, उसकी सफलता को सहन नहीं कर सके। वह चाहते थे कि रेनू लिखना बन्द कर दे, पर रेनू इस अन्यायपूर्ण आदेश को मानने के लिये तैयार नहीं हुई। पति के अहंकार को ठेस पहुँची तो वह बदला लेने पर उतर आये। उन्होंने रेनू को घर का खर्च देना बन्द कर दिया। रेनू के घर में अनाज गाँव की खेती-बारी से आ जाता था। बाकी ज़रूरतों के लिये रेनू ट्यूशन करने लगी। कुछ पारिश्रमिक रचनाओं का भी मिल जाता था। बच्चों की पढ़ाई, कपड़े और रोज़ के खर्च, सबका इन्तज़ाम अब उसे ही करना था।
सुरेन्द्र रेनू को इस तरह नहीं झु्का पाये तो और भी गिरी हुई हरकतों पर उतर आये। उसे बात- बात पर मारने-पीटने लगे। यही नहीं, उसके चरित्र पर कई तरह के लांछन भी लगाने लगे। उन्होंने रेनू का घर से बाहर निकलना, लोगों से मिलना-जुलना बन्द कर दिया। रेनू की ज़िन्दगी दिन पर दिन घुटन भरी होती जा रही थी। बेचारी रेनू...घर की सबसे छोटी बेटी, सबकी दुलारी और अब इस तरह की प्रताड़ना भरी ज़िन्दगी बिता रही थी।
भैया रेनू की यह हालत देख कर बहुत दुखी थे। अपने हिसाब से उन्होंने बहुत देख-भाल कर रेनू की अच्छी शादी की थी लेकिन आज वही शादी रेनू को तबाह कर रही थी। इस बीच सुरेन्द्र के परिवार के मुखिया, उनके चाचाजी का असमय देहान्त हो गया था इसलिये उन पर किसी का कोई अंकुश भी नही रहा था। हम लोग निरुपाय रेनू की दुर्दशा देख रहे थे। रेनू कई बार इतनी परेशान हो जाती कि उसके मन में अपने को खत्म करने का विचार आता, पर बच्चों का मोह उसे जीवन से बांधे हुए था। सुरेन्द्र ने तो पहले ही सारी पारिवारिक ज़िम्मेदारियों से हाथ खींच रखा था।
उसकी इसी मनस्थिति में भैया रेनू को तीनों छोटे बच्चों के साथ अपने पास सरयूबाग ले आये। मैं उससे मिलने गयी तो उसकी सब व्यथा कथा सुनी। समझ में नहीं आया कि कोई इन्सान अपने ही बीवी-बच्चों के प्रति इतना क्रूर कैसे हो सकता है। मुझे लगा कि सुरेन्द्र मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं हैं। पर रेनू सोचती थी कि यह सिर्फ़ उनका मेल ईगो ’ है जो उसे त्रस्त देख कर सन्तुष्ट होता है।
रेनू ने तय किया कि अब वह मायके ही रहेगी। पढ़ी- लिखी है, अपना और अपने बच्चों का भरण पोषण करने की सामर्थ्य उसमें है। वह एक कोचिंग इंस्टिट्यूट खोलेगी और उससे अपनी जीविका चलायेगी। भैया उसकी योजना से सहमत थे, पर उनकी राय थी कि बच्चों की ज़िम्मेदारी सुरेन्द्र को ही सँभालनी चाहिये, आखिर वे बच्चे सुरेन्द्र के भी तो थे।
भैया ने सबसे छोटे मंटू को रेनू के पास छोड़ा और दोनों बेटियों को सुरेन्द्र के पास पहुँचा आए। बड़ा बेटा पिंटू वहाँ पहले से था ही। सुरेन्द्र ने भैया से कहा कि वह अपने बच्चों को सँभाल लेंगे।
पर एक सप्ताह के बाद ही सुरेन्द्र बच्चों सहित सरयूबाग में दिखाई दिये। कहना आसान होता है, पर बच्चों की ज़िम्मेदारी बड़े धैर्य और जीवट वाले ही उठा सकते हैं। सुरेन्द्र अकेले बच्चों को नहीं सँभाल सके। उन्होंने अयोध्या आकर बहुत आग्रह और मान-मनुहार से रेनू को मनाया। बच्चों का मोह आखिर रेनू को वापस उसके पति के घर खींच ले गया। कुछ दिन सब कुछ ठीक चला, पर आखिर किसी का स्वभाव कैसे बदल सकता है? सुरेन्द्र ने फ़िर रेनू को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। फ़र्क बस इतना था कि यह प्रताड़ना अब शब्दों तक सीमित थी। वह रेनू पर हाथ नहीं उठाते थे। रेनू ने इस अपमान को अपनी नियति मान लिया।
समय बीतता गया। बच्चे बड़े हो चले थे। पढ़ने में अच्छे थे। इस माहौल में भी पढ़ाई में अच्छे परिणाम लाते रहे। पिंटू भारतीय सेना में अफ़सर बन गया। रिप्पल बी ए में पढ़ने लगी थी और रोज़ी बारहवीं में थी। पिंटू की शादी उसकी पसन्द की लड़की से तय हो गई। रेनू ने सब रिश्तेदारों को बुलाया और बड़े शौक से बेटे की शादी की। जिस दिन पिंटू की बारात गई, घर में रात को खूब नाच-गाना हुआ। हमेशा की तरह रेनू गाने-बजाने में सबसे आगे रही, उसकी आवाज़ सबसे बुलंद थी। उसे खुश देख कर हमें बहुत अच्छा लगा। लगा कि उसकी वर्षों की तपस्या सफल हो गई है। सुरेन्द्र बाबू का व्यवहार भी रेनू के प्रति ठीक लगा। हमें लगा जैसे बहुत दिन बाद उसकी गृहस्थी की गाडी़ पटरी पर आई है।
अगले दिन रेनू हम लोगों को नैमिषारण्य घुमाने ले गई जहाँ एक मंदिर था। हम वहाँ बस से और फ़िर एक विचित्र ठेलेनुमा सवारी- खड़खड़िया-पर बैठ कर गए। हमने मंदिर में दर्शन किये और साथ के सरोवर में स्नान किया। हम लोगों को इस यात्रा में बहुत आनंद आया। रेनू का उत्साह तो देखते ही बनता था। उसके घर का पहला समारोह था और वह उसमें और अपने अतिथियों की देख-भाल में कोई कमी नहीं रहने देना चाहती थी। यह यात्रा हमारे लिये अविस्मरणीय थी। जितना आनंद घूमने में आया था, उतना ही परिवार के लोगों के साथ समय बिताने में। तब नहीं मालूम था कि हम रेनू के साथ यह आखिरी खुशी के दिन बिता रहे हैं।
पिंटू की शादी को बमुश्किल ढ़ाई महीने गुज़रे होंगे। एक दिन खबर मिली कि पिंटू के साथ कुछ कहा-सुनी के बाद रेनू घर छोड़ कर चली गई है। न वह सरयूबाग पहुँची, न किसी बहन के यहाँ, न और किसी रिश्तेदार के यहाँ। सब सोच रहे थे कि नाराज़ हो कर गई है, गुस्सा शांत होगा तो लौट आयेगी। कितने दिन अपनी बेटियों और दस साल के छोटे बेटे को छोड़ कर रह पायेगी? उसकी ममता उसे वापस खींच लायेगी। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। हम समझ नहीं पा रहे थे कि जिस रेनू ने बच्चों की खातिर जीवन के सभी झंझावातों को धैर्य से झेल लिया था, वह अब कैसे विचलित हो गयी? पर शायद ऐसा ही हुआ। रेनू ने बच्चों की खातिर सब दुख सह लिये थे, यह सोच कर कि पति न सही, बच्चे उसके संघर्ष को, उसकी ज़िन्दगी से हुई जद्दोजहद को समझते हैं। जिस बेटे की आँखों के सामने उसने यह लड़ाई लडी़ थी, उसकी उपेक्षा ने शायद उसका दिल तोड़ दिया और वह सब माया मोह के बन्धनों को पीछे छोड़ कर आगे कहीं निकल गई, सबसे दूर।
छः महीने बाद सुरेन्द्र की गहरी बीमारी की खबर मिली तो हम उनसे मिलने सीतापुर गये। रेनू के बिना घर कितना सूना लग रहा था, कितना विषादग्रस्त। विश्वास करना मुश्किल था कि हमने इसी घर में कुछ महीने पहले इतनी खुशी के पल देखे थे। सुरेन्द्र हमें देख कर रोने लगे, “ रेनू एक बार आ जाती तो मैं उससे अपने गुनाहों की माफ़ी माँग लेता।”
उदास रिप्पल ने मुझसे कहा, “मम्मी ने इस घर में बहुत दुख देखे। वह जहाँ भी होंगी, इससे तो ज्यादा सुख से होंगी।”
सुरेन्द्र के दिल की आवाज़ रेनू तक नहीं पहुँची। कुछ दिन बाद पश्चात्ताप का बोझ अपनी आत्मा पर लिये हुए वह परलोक सिधार गए।
रेनू को गए बारह साल बीत गए हैं। कभी- कभी लगता है कि वह अब इस दुनिया में ही नहीं है। होती, तो क्या इतने सालों में कभी उसे अपने बच्चों की, अपने भाई बहनों की याद नहीं आती? क्या इतना कुछ लिख डालने वाली रेनू एक चिट्ठी भी
नहीं लिख पाती? पर उम्मीद की एक हल्की सी रेखा है जो अबतक कायम है। शायद हमारी छोटी सी बहन कभी वापस आ जाए....
-शकुन्तला दूबे {मां का जन्म सन १९३३ में अयोध्या के एक गाँव में हुआ था। अपने परिवार द्वारा चलाये जा रहे
स्कूल में पाँचवीं तक पढाई हुई फ़िर ’सयानी’ हो जाने के कारण घर बैठा दिया गया। दृढ
इच्छा शक्ति के चलते घरेलू काम काज को निबटाने के साथ-साथ दसवीं की परीक्षा प्राइवेट
पास कर ली, फ़िर शादी हो गई। चार बच्चों को पाल पोस कर एक बार फ़िर किताबें पकडीं
और इस बार एम ए (समाज शास्त्र) तक पढ गईं। एक निहायत कंज़र्वेटिव माहौल में पले बढे
और ब्याहे जाने के बावज़ूद हर विषय पर स्वतन्त्र विचार रखती हैं, राजनीति पर भी।
लिखने पढने का शौक बचपन से रहा है। बहुत सी कविताएं कहानियां लिखीं, कुछ स्थानीय
पत्रिकाओं- अखबार में छ्पीं भी, पर ज्यादातर उनका लेखन स्वांतः सुखाय ही रहा। पिछ्ले
चार-पाँच साल से घुटनों के दर्द की वजह से ज़्यादा चल फ़िर नहीं सकतीं तो अपनी
रचनात्मकता को जाडे में स्वेटर बुन कर और गर्मी में लिख कर संतुष्ट करती हैं। इन सालों में
अपने शुरू के पैंतीस साल के जीवन की कहानी एक आत्म कथा के रूप में लिख चुकी हैं। रेनू मौसी
की कहानी उस का ही एक भाग है।---Vandana Pandey}

Wednesday, March 19, 2008

रेनू की कहानी


वन्दना पांडेय ने अपनी 75 वर्षीय माताजी -शकुंतला दुबे का एक संस्मरण चोखेर बाली में भेजा है । वन्दना से परिचित तो नही हूँ लेकिन स्त्री के अनुभवों की कम से कम कोई एक कडी उन्हें परिचय की सीमाओं और ज़रूरतों से परे कर देती है । एक अनुभव संसार ऐसा है जहाँ कोई स्त्री एक दूसरे से अपरिचित नही है , फिर चाहे बीच में आयु के अंतराल हों या शिक्षा के या सामाजिक प्रतिष्ठा के ।
शकुंतला जी के शब्दों में उनकी बहन रेनु की इस स्मृति को दो भागों में प्रस्तुत कर रहे हैं --
रेनु की कहानी { पहला भाग }

माँ अपनी ढलती उम्र में जन्मी सन्तान रेनू के भविष्य को लेकर काफ़ी चिन्तित रहा करती थीं। कौन इसे पढ़ाएगा, इसकी शादी करेगा? चाचा, यानी मेरे पिता, जिन्हें हम सारे बच्चे चाचा कहा करते थे, इस बात को लेकर अधिक चिन्ता नहीं करते थे।
“इतनी चिन्ता मत करो बच्ची के लिये। भगवान सबके लिये इन्तज़ाम करता है। मैं नहीं रहूँगा तो इसके भाई इसकी ज़िम्मेदारी उठाएंगे। पिता न हो तो बड़ा भाई ही पिता समान होता है,” वह कहते थे।
जिस बात का माँ को डर था वही हुआ। रेनू जब तेरह बरस की थी, हमारे पिता का देहान्त हो गया। रेनू बहुत दुखी थी और अपने भविष्य को लेकर चिन्तित भी। भैया ने उसे बुला कर कहा, “तुम्हें चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है। चाचा चले गये, उनकी कमी हमेशा रहेगी पर मैं अब भी तुम्हारे साथ हूँ। तुम्हारी सारी ज़िम्मेदारी अब मुझ पर है। किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो सीधे मुझसे कहना। तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई में कोई बाधा नहीं आयेगी।”
चाचा का कहना भी सच हुआ था। भैया ने रेनू के पिता का स्थान ले लिया था। एक बार माँ ने किसी बात पर रेनू को एक तमाचा लगा दिया। रेनू रोती हुई भैया के पास पहुँची। भैया ने उसे चुप कराया। शाम को माँ से बोले, “अगर कोई रेनू को मारता है तो वह मार रेनू को नहीं मुझे लगती है।”
माँ ने फ़िर रेनू को कभी नहीं मारा।
रेनू कुशाग्रबुद्धि थी। उसने अयोध्या की तुलसी कन्या पाठशाला से अच्छे अंकों से हाईस्कूल पास कर लिया और फ़ैज़ाबाद के एक कालेज में इंटर में प्रवेश ले लिया। उस समय तक हमारे परिवार में लड़कियों की शिक्षा को लेकर चेतना आ गई थी और उन्हें पढ़ने के लिये पास के शहर में भेजा जाने लगा था। भैया अब रेनू के लिये अच्छे घर-वर की तलाश में जुट गये थे। थी तो वह सिर्फ़ सत्रह साल की, पर भैया के लिये उसकी शादी एक बहुत बडी़ ज़िम्मेदारी थी। भैया ने हम सबकी सहमति लेकर संपन्न घर के एक सुन्दर, सुसंस्कृत वकील लड़के, सुरेन्द्र से उसकी शादी तय कर दी। सुरेन्द्र उस समय लखनऊ में आगे की पढ़ाई कर रहे थे।
रेनू की शादी सरयूबाग से धूम-धाम से सम्पन्न हुई। सुरेन्द्र विधवा माँ की इकलौती संतान थे। उनका परिवार एक सम्मिलित परिवार था। घर के मुखिया उनके चाचा थे जो गोरखपुर विश्वविद्यालय में कानून विभाग में डी़न के पद पर थे। उन्होंने फ़ैसला किया कि रेनू दो साल उनके यहाँ रह कर बी ए की पढ़ाई करेगी। मैं खुश थी कि रेनू अब मेरे ही शहर में आ गई थी। अक्सर वह छुट्टी के दिन मेरे घर आ जाती।
रेनू की ससुराल में पहले तो सब कुछ ठीक रहा, पर धीरे- धीरे सम्बन्धों में कड़वाहट घुलने लगी। कभी-कभी वह अपनी उलझनें मुझसे कहा करती थी। खैर, उसकी बी ए की पढ़ाई समाप्त हुई और वह अपने पति के पास लखनऊ चली गई। एम ए की परीक्षा उसने प्राइवेट विद्यार्थी के रूप में उत्तीर्ण की। इस बीच उसकी गोद में उसका पहला बेटा पिन्टू आ गया था। फ़िर उसकी दो बेटियाँ रिप्पल और रोज़ी आईं और आखिर में सबसे छोटा बेटा मन्टू। वह घर की ज़िम्मेदारियों मे पूरी तरह रम गयी थी। सुरेन्द्र सीतापुर में वकालत करने लगे थे।
रेनू की साहित्य मे बचपन से रुचि थी। जब वह इंटर में थी, तबसे कहानियाँ लिखती थी। कालेज की पत्रिका में उसकी कहानियाँ छ्पा करती थीं। यह शौक उसकी शादी के बाद भी बरकरार रहा। अब उसकी रचनाओं में ज्यादा परिपक्वता आ गई थी और वह उपन्यासों के कथानक भी ढूँढ़ने लगी थी। एक बार मैंने उससे पूछा कि वह नये- नये कथानक कैसे ढूँढ़ लेती है तो वह बोली,
“दीदी, कहानियाँ तो अपने आस-पास ही बिखरी हैं। हर ज़िन्दगी एक कहानी है, हर परिवार एक उपन्यास। शब्दों के कलेवर में मैं उन्हें ही मूर्त कर देती हूँ। हर रचना का आधार तो जीवन ही है। इस कैनवास के बिना तस्वीर थोड़े ही बनाई जा सकती है?”

शेष अगली पोस्ट में ......

Monday, March 17, 2008

आइए हाथ उठाएँ हम भी

-आर. अनुराधा

खबर विश्लेषण की पीठ पर खबर विश्लेषण! मेरा कोई दोष नहीं। अखबारों ने इसे खूब छापा। हम तो सिर्फ ज़िक्र कर रहे हैं। अब अखबार कौनसी खबर क्यों और कैसे छापते हैं, यह चर्चा किसी और दिन। खबर संक्षेप में यह कि दिल्ली में दो बहनें शनिवार को सुबह अपने काम पर जाने के लिए निकलीं तो गली के तीन लड़कों ने उनके साथ शर्मनाक बर्ताव किया, लोगों के बीच उनके कपड़े तक फाड़ डाले। ये लड़के रोज़ उनमें से एक लड़की को छेड़ते, परेशान करते थे। लेकिन उस घटना के रोज़ उनमें से एक, जो कराटे जानती थी, ने विरोध जताया जिससे बिफरे लड़कों ने उन पर हमला ही बोल दिया।

खबर पढ़ने के बाद मेरे जेहन में जो बात सबसे पहले दर्ज हुई वो ये कि उस दिन कराटे जानने वाली लड़की ने रोज़ रोज़ सताए जाने का विरोध (पहली बार?) किया। नतीजतन लड़के जो अब तक अपने आनंद के लिए उन्हें रास्ते में आते-जाते सताया करते थे, नाराज हो गए। लड़की, तेरी ये मजाल कि हमारे आनंद में खलल डाले! ये ले आगे के लिए सबक। लेकिन इन लड़कियों ने ऐसा कोई सबक सीखने की बजाए उन लड़कों को ही उनके इंसान होने के सबक याद दिलाने की कोशिश की। नतीजे में उनके कपड़े फाड़ डाले गए, बेइज्जत किया गया।

लेकिन लड़कियों, विश्वास करो, इस हाल में भी जीत तुम्हारी हुई है क्योंकि तुमने विरोध किया है। तुम दोनों अपनी लड़ाई लड़ती रहीं और पच्चीसों लोग तमाशा देखा किए। उस अभद्र व्यवहार, कमजोर पर अत्याचार को देखकर एक भी व्यक्ति आगे नहीं आया- इसका भी खयाल न करना। क्योंकि उन तमाशबीनों का जमीर उन्हें कभी-न-कभी इस बात के लिए जरूर कुरेदेगा भले ही इसके लिए उन्हें अपनी मां-बहन-बीवी के साथ यह होने तक इंतजार करना पड़े।

तुम शायद डर रही होवोगी कि वो तीनों गिरफ्तार होने के बावजूद जल्द ही छूट जाएंगे और फिर शायद और भी बुरे तरीके से बदला लेने की कोशिश करेंगे। यह डर तो हमें भी है क्योंकि इसे हटाने का उपाय भी तो आसान और छोटा नहीं है न! मौजूदा व्यवस्था हमें इतना भरोसा कहां देती है कि बीसियों चश्मदीद गवाहों के सामने दिन-दहाड़े हुए इस अनाचार में शामिल जाने-पहचाने, हमारे अपने लोकल अपराधियों को जल्द और पूरी सज़ा मिल पाएगी ताकि समाज में उन जैसे लोग फिर ऐसा कुछ करने से डरें और पीड़ितों को पूरा न्याय मिले।

इसके बावजूद तुम्हें विश्वास रखना होगा अपने पर, अपने जैसों पर। और इस विश्वास को अपने तक सीमित रखने की बजाए, मैं तो कहती हूं, अब वक्त आ गया है, इसे बढ़ाने का, जोड़ने का, जुड़ने का। व्यक्ति के खिलाफ व्यक्ति अपनी लड़ाई चाहे लड़ और जीत पाए, संगठित हुए बिना व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई नहीं जीती जा सकती। इसके अल्पकालिक नतीजे भले ही मिल जाएं, पर इसके जारी रहने और दीर्घकालिक परिणाम पाने के लिए ज्यादा-से ज्यादा लोगों को जुड़ना पड़ेगा।

हम सब पढ़ लिख गई है। पढ़ती भी रहती हैं- पढ़ाई के अलावा अखबार-किताबें भी। टीवी-सिनेमा देखती हैं और बहुत कुछ जानती भी हैं, सिर्फ ज्ञान से नहीं हुनर, अभ्यास से भी। विषय की जानकारी होना एक बात है, उसके बारे में सचेत और जागरुक होना इसके आगे की बात। तो क्यों न अपने ज्ञान को जागरुकता के स्तर पर ले आएँ, आपस में बांटें और पा ले अपने लिए वह सब जो हमारा हक है, जो हमेशा मारा गया है, जो हमें मिला भी तो दया या अहसान की तरह। जो हमें उम्मीदें सजाने का कारण दे, सपने पूरे करने का रास्ता दे और दे एक भरपूर जिंदगी देने का मौका।

आइए हाथ उठाएँ हम भी/
हम जिन्हें हर्फ़े दुआ याद नहीं/
हम जिन्हें सोज़े मोहब्बत के सिवा/
कोई बुत कोई ख़ुदा याद नहीं

Friday, March 14, 2008

गिव अ मैन अ फ्री हैंड एंड ही विल ........


रोज़ सुबह हम-आप उठते हैं ,चाय के चुस्की के साथ जुर्म का एक पुराना संसार नये रोगन में सामने प्रस्तुत होता है ।एक च.च..च..! क्या होगा इस देश का और कुछ देर मौन मुद्रा में शोक मना कर हम उठ खडे होते हैं । और क्या कर सकते हैं ? क्या वाकई कुछ कर सकते हैं ? या कर सकते हैं ? बहुत् से सवाल खडे हो जाते हैं मुँह बाए , आप किस किस को तवज्जो देंगे !
देखिये ,पहले मुम्बई में सामूहिक छेडछाड के बाद गोआ में विदेशी किशोरी स्कारलेट {Scarlett Keeling}का बलात्कार और हत्या । विदेशी हो या देसी कोई फर्क नही पड्ता । मादा होनी चाहिये । वर्ना क्यों जोहानिस्बर्ग में एक 25 साल की महिला को मिनी स्कर्ट पहने देख टैक्सी ड्राइवरों ने छेडछाड का निशाना बनाया ।
ऐसा नही कि इस बीच स्त्री के खिलाफ कहीं हिंसा नही घटी । कुछ दर्ज हुईं , बहुत सी छूट गयीं , बहुत सी छिपा दी गयीं । बार -बार यह बर्बर सलूक सामूहिक अवचेतन में बसी कुंठाएँ सामने लाता है । व्यापक प्रश्न उठता है कि स्त्री भोगी जाने वाली चीज़ है , एक चॉकलेट जिसे खाया जा सके, खाओ जहाँ और जैसे भी मिले -क्या कभी पुरुष-अवचेतन से बाहर होगी ?
क्या सभ्य से सभ्य पुरुष भी, अवसर और एकांत मिल जाए तो महिला साथी ,मित्र से सामीप्य नही चाहता ? शायद मौका पडने पर बहुत कम पुरुष अपने शील {?}की रक्षा के बारे में सोचते होंगे {?}रुकते होंगे तो दिल पर पत्थर रख कर ।
कहीं एक कहावत पढी थी -
"give a man a free hand and he'll run it all over you "

यह सही है कि सब पुरुष हिंसक नही होते , लेकिन ज़्यादातर होते हैं कर्मों मे न सही अपनी मानसिकता में ।अपनी स्त्री कुलीग के लिए पुरुष अपने सहज वार्तालाप में जो कुछ डिस्कस करते हैं वे आप सब बेहतर जानते हैं ।
स्त्री के सामने पडते ही उसे "ऐज़ चैलेंज" लेने की मानसिकता से पुरुष को छुटकारा नही चाहिये ?

Thursday, March 13, 2008

क्या आज का भी सच नहीं है ये कहानियां?

-आर. अनुराधा

नाना-नानी जब भी साथ घर से निकलते - हाट-बाजार, नाते- रिश्तेदार या अस्पताल। नाना आगे चलते जाते बिना एक बार भी पीछे देखे। नानी जैसे एक डोर में बंधी चलती जातीं उनके पीछे-पीछे। नाटी नानी चाहे सुनसान सड़क पर हों या भीड़ के बीच, सब कुछ परे हटाती, ठेलती जैसे बढ़ती जातीं उस भूरी 'चांद' का पीछा करते हुए। यह उनकी जिम्मेदारी होती कि तांगे में जुते घोड़े की तरह नजर जमाए रखें और 50 फीट आगे चल रहे तेज चाल नाना का अनुसरण करती जाएं। दाहिने-बाएं दुनिया होती है नानी को नहीं मालूम था। उन्हें मालूम थी तो बस वह बार-बार भीड़ में गुम होती-फिर मिलती चांद जो पूरे रास्ते एकमात्र लक्ष्य होती और एकमात्र सहारा भी। 40 साल से ज्यादा उस घर में रहीं वो लेकिन पास के बाजार से घर आने के रास्ता उन्हें कभी पता नहीं चला।

एक बार बाजार के किसी मोड़ पर नाना मुड़ गए और भीड़ में गुम हो गए। नानी सीधी सड़क चलती गईं। जब कुछ देर बाद लगा कि गायब हुई चांद तो दोबारा दिख ही नहीं रही है तो वे बौखला गईं, डर गईं। सूखे मुंह हर किसी से कहती रहीं- "मुझे घर जाना है। मुझे अपने घर जाना है। कोई पहुंचा दो।" उन्हें घर जाना नहीं आता था। कोई आधा घंटा वो उस गहरे समुद्र में फेफड़ा-भर सांस को छटपटाई होंगी। इधर नाना घर पहुंचे और मां को बोले- " देखो, तुम्हारी मां बाजार में ही कहीं रह गई। उसे इतना भी शऊर नहीं कि मेरे पीछे-पीछे आती रहे। जाओ उसे ढूंढ लाओ। " नाना की बताई जगह से काफी दूर, बाजार के परले सिरे पर बदहवास नानी को हैरान-परेशान मां ने पाया। एक-दूसरे को देखते ही दोनों कस कर गले मिलीं और फूट-फूट कर रो पड़ीं।

घर आने पर नानी को सांत्वना की जगह फिर एक झिड़की मिली मूर्ख, अज्ञानी होने की। उसके बाद से नानी ने बाजार जाना बंद कर दिया। घरेलू सामान, साड़ियां नाना खुद ला देते। और धीरे-धीरे नानी ने सामान मंगवाना भी छोड़ दिया। और लोग कहते हैं वो पागल हो गईं।

मां बड़ी हुईं और उनकी भी शादी हुई। शादी तक तो किसी को समझ में नहीं आया पर शादी के बाद मां भी सबको पागल लगतीं। एकदम नासमझ थीं वो दुनियादारी को लेकर। अपने पैर की मोच निसंकोच दादाजी को दिखातीं और उनसे आयुर्वेदिक तेल-मालिश करवातीं। देवरों से खूव खातिर करवातीं। दादी को लगता जरूर कोई जादू-टोना जानती है तभी ऐसे उजड्ड लड़के भी अपनी भाभी की हर बात झट मान लेते हैं। साइकिल पर उनके पीछे बैठ कर मेला देख आतीं। और फिर एक दिन पता चला उन्होंने साइकिल चलानी भी सीख ली है। दादी बहुत झल्लाईं। लाज-शर्म सब बेच खाई है क्या? दुनिया के सामने हमारी नाक कटा रही है। घर बैठ कर चुपचाप चूल्हा-चौका नहीं होता तुझसे? लेकिन ये नहीं हुआ उनसे, मतलब चुपचाप नहीं हुआ। घर पहुंचने वाली हिंदी अंगरेजी-हिंदी सब तरह की पत्रिकाएं पढ़तीं, यहां कर कि दादाजी की आयुर्वेद की किताबें भी।

बीस-इक्कीस की उम्र में वो अपने पति और सास-ससुर के साथ तिरुपति घूमने गईं। बस में पहाड़ी रास्ते पर लंबा सफर। उनके पेट में दर्द उठा जो बढ़ता ही गया। किसी ने ध्यान नहीं दिया, कोई उनके लिए नहीं रुका और उन्हें भी धर्मशाला में अकेले नहीं रुकने दिया गया। मंदिर के गेट से लंबी पैदल यात्रा, सब तरफ 'गोविंदा-गोविंदा ' का शोर , भीड़-भाड़, गर्मी, पसीने के बीच गर्भगृह के पास तक आते-आते मां को अचानक समझ में आया कि वह मां बनने वाली हैं। वो धम्म से वहीं किनारे बैठ गईं। दर्द असहनीय हो गया, शरीर सफेद और ठंडा पड़ने लगा, साड़ी भीगने लगी। दादी को समझ में आया तो वो दादाजी के कान में फुसफुसाईं। अब तो कोई वहां बैठने नहीं दे सकता था- अपना खून बहाती, तिरुपति बालाजी के मंदिर को अपवित्र करती उस महिला को। और उस हालत में बैठी मां दर्द की तड़प में दोहरी सी होकर लेट गईं। किसी ने कहा- पागल हुई है क्या?

तमाशा बन गया। उस हालत में कोई मदद करता, डॉक्टर बुलाता। इसके बजाए कहा गया - पवित्र मंदिर से निकलो फौरन, सफाई भी करनी पड़ेगी। उन्होंने उठने से साफ मना कर दिया। लेकिन पिताजी और एक अन्य पुरुष ने उन्हें बाजुओं के सहारे उठाया और जबर्दस्ती बाहर ले गए। कुछ देर सुस्ताने के बाद उठ कर चलना ही था। और मां के साथ जो हुआ वह भले ही उनके साथ पहली बार हुआ लेकिन थी तो आम बात ही।

मंदिर के मुख्य दरवाजे के बाहर रास्ते में मां को एक डॉक्टर के नाम का बोर्ड दिखा और वह सीधे अंदर चली गईं। दादी लाख कहती रहीं कि यह तो पुरुष डॉक्टर है, इसं कैसे दिखाएगी, और यह भी कि सफर में इतने पैसे खर्च करने की क्या जरूरत है। दो दिन बाद घर पहुंच ही जाएंगे, तब वहां दाई को दिखवा लेंगे। लेकिन मां ने किसी की नहां सुनी। वह डॉक्टर सहृदय निकला। उसने एक लेडी डॉक्टर को बुलवाया और बिना ज्यादा फीस लिए पूरा जरूरी इलाज किया।

घर वापसी पर कुछ दिन शांति से बीते। फिर एक दिन दादी को मां के पैरों की अंगुलियों से चांदी के बिछुए गायब मिले। ये तो शादीशुदा होने की निशानी हैं। ऐसे कैसे कोई इन्हें निकाल कर रख सकती है। लेकिन बड़ा सदमा तो सबको तब लगा जब मां ने इसका कारण बताया। वो अपने बिछुए सुनार को बेच आई थीं और मिले पैसे तिरुपति के उसी डॉक्टर के नाम मनीऑर्डर से भेज दिए। चिट्ठी में लिखा कि रुपए भेज रही हूं ताकि उन जैसी तकलीफ की मारी, पैसे से लाचार औरतों का इलाज जारी रखने में डॉक्टर को मदद मिले।

इसके बाद तो जिसने यह किस्सा सुना, एक ही बात कही- "पागल है ये "।

Tuesday, March 11, 2008

कन्या शिक्षण से जुडी कुछ बातेँ



लावण्य़ा शाह
स्वतँत्र भारत मे कन्या शिक्षण की दिशा मे काफी प्रगति हुई है परँतु अभी कई क्षेत्रोँ मे विकास होना शेष है।कन्या शिक्षा को प्रोत्साहन देने से लेकर, कन्याओँ का स्कूलोँ मेँ और कोलेजोँ मेँ दाखिला होने से लेकर, स्कूल व पाठ्यक्रम से जुडे रहने मेँ सहायता और स्थिरता भी प्रमुख मुद्दोँ मेँ से कुछ हैँ .

समाज के उन तबक्कोँ मेँ कि, जहाँ कन्या शिक्षा के प्रति उदासीनता व बाधाएँ आडे आतीँ हैँ उनके प्रति भी सरकार प्रयाप्त मात्रा मेँ , ध्यान देते हुए, व्यवस्थाओँ को सुद्रढ करने का परिश्रम सुनियोजित तरीके से करने मेँ सँलग्न है.

भारतीय गणतँत्र स्त्री शिक्षा, तथा, स्त्री नागरिकोँ के हक्कोँ के प्रति जागरुक भी है. कई सारे व्यवधानोँ तथा सामाजिक परिस्थितियाँ जहाँ पुरुष प्रधान समाज के अपने दबाव हैँ उनके बावजूद, बदलाव , व्यवस्था तथा प्रयास जारी हैँ जिन्हेँ कानूनी धाराओँ के तहत भी सँबल प्राप्त है.

कई प्रणालियाँ, नवीन कार्यक्रम, अवधारणाओँ को कार्यान्वित किया गया है.

जिनका लक्ष्य, कन्या शिक्षा की परिवर्तित स्थितीयोँ मेँ सुधार किया जाना रहा है.

सर्व शिक्षा अभियान एक ऐसा ही कार्यक्रम है।

जिसका प्रमुख अँग है --the Universalisation of Elementary Education (UEE)

सर्व शिक्षा अभियान SSA जिसे २००१ से शुरु किया गया है -यह एक बहु- महत्त्वाकाँक्षी., कन्या वर्ग के बहुआयामी विकास को केन्द्र मेँ रखकर , कन्याओँ के स्कूल जाने से, कन्या छात्राओँ को उच्च गुणवत्ता की शिक्षा हासिल हो पाये, वैसे प्रयास से लेकर , स्त्री के पुरुषोँ से बराबरी के व्यवहार को सच करने के प्रयास हैँ -

जिसके तहत कुछ इस प्रकार के मुद्दोँ के निर्णय, पारित किये गये हैँ

१) कक्षा ८ तक कन्या छात्राओँ को मुफ्त पाठ्यक्रम की पुस्तकोँ का वितरण

२)कन्या छात्राओँ के लिये अलग शौचालयोँ की वयवस्था
३) जो कन्याएँ स्कूल नहीँ जातीँ उनके लिये, शिबिरोँ का आयोजन
४) ५०% महिला शिक्षिकाओँ का चयन व आराक्षण
५) शिशुवस्था मेँ कन्याओँ की देखभाल के लिये स्कूलोँ के समीप शिक्षा देने का प्रबँधन व ठोस प्रयास
६) महिला शिक्षिकाओँ को विशेष ट्रेँनीँग
७) कन्या शिक्षा के प्रमुख सवालो व निराकरण को बयान करती खास निर्देशिकाओँ का ,वितरण
८) समाज के हर स्तर को कन्या शिक्षा के प्रति जोडना तथा इस का प्रचार करने की पहल
९) हर प्राँत, हर तहसील हर गाँव मेँ कन्या छात्रओँ के दाखिले तथा स्कूल मेँ पूरी शिक्षा मिले ऐसे जुडे प्रवधानोँ के लिये खास धन की व्यवस्था

इन सारे मुद्दोँ के अलावा माता , पिता समाज व कन्या छात्राओँ के सहकार तथा रस लेकर , भाग लेने के लिये ठोस प्रयास भी जारी हैँ जिसके बाद कन्या छात्राओँ की प्रगति पर भी निगरानी रखी जाती है कि जससे प्रयासोँ की सफलता का सही सही अँदाज लगाया जा सके.

ये कुछ प्रयास हैँ जिनकी आशिँक सफलता का भारत सरकार ,उत्साह से, आशाएँ सँजोये , रास्ता देख रही है -

-हमारी शुभ कामना है कि ये सारे सराहनीय प्रयास, सफल होँ --

-- लावण्या

लगी रहो मुन्नी बहन

हम भी हैं जोश में

आभा

सात मार्च के अमर उजाला में छपे सुजाता नेवतिया के आलेख में अपना नाम देख कर अच्छा लगा। पूरा लेख पढ़ने के बाद लगा बेजी, घुघूती, नीलिमा सब बिल्कुल सही कह रही हैं...वहीं प्रत्यक्षा और मनीषा से असहति भी नहीं जताई जा सकती......क्योंकि उनकी बातों में कहीं न कहीं दम भी है...

फिलहाल यही कहना चाहूँगी कि लगी रहो सब 'मुन्नी बहन' बात खुद ब खुद निकल कर आएगी। और जब बात लिकनेगी तो दूर तक जाएगी......गई भी है सुजाता के इस आलेख से....चोखेर बालियों की धमक वे भी सुनेंगे जो अपने कान में रुई डाल कर पड़े हैं....यानि वे भी सुनेंगे जिन्हें अपनी घरेलू दिन चर्या के अलावा दुनिया जहान से कोई लेना-देना नहीं है... एक बार फिर कहूँगी लगी रहो मुन्नी बहन...बातें बहुत हैं फिर कहूँगी....आज मेरी बहुत पुरानी लेकिन एक छोटी कविता पढ़े-
औरत एक पंछी
एक औरत
पंछी की तरह उड़ना चाहती है
वह भूल गई है
कि वह एक औरत है
वह पाना चाहती है
वह सब कुछ
जो खो गया था कहीं
या छूट गया था किसी डाल पर
किसी घोसले में
वह उड़ती है बार-बार
गिरती है बार-बार
वह औरत है
वह ढीठ है...
वह निर्लज्ज है
बेहया है वह...कि
मार धिक्कार और फटकार के बाद भी
उड़ती है बार-बार
गिरती है बार-बार
पंख कट रहे हैं...
दम घुट रहा है
पर
उड़ने का सपना कभी नहीं छूट रहा है...
एक औरत
पंछी की तरह उड़ना चाहती है
वह भूल गई है
कि वह एक औरत है।
५ अप्रैल 2003

अपनाघर ,आभा,उडान,औरत ,पंछी

Sunday, March 9, 2008

चोखेरबालियॉं अमरउजाला में

7 मार्च को अमर उजाला के स्‍त्री परिशिष्‍ट 'रूपायन' में हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत में स्त्रियों की भागीदारी को लेकर एक लेख प्रकाशित हुआ है। लेख सुजाता ने लिखा है कई अन्‍य (स्‍त्री) ब्लागर्स को श्रेय देता है। लेख छापने में संपादन किया गया है इसलिए इन छवियों के नीचे पूरे लेख को अविकल दिया जा रहा है।







हिन्दी ब्लॉगिंग में स्त्रियाँ और स्त्रियों की ब्लॉगिंग

कहा जाता है कि ब्लॉगर बस ब्लॉगर है उसका कोई जेंडर नही होता । पर अब तक की ब्लॉगिंग के बारे में बनी समझ के हिसाब से यह लगने लगा है कि स्त्रियों के लिये ब्लॉगिंग वाकई खास है और इसे देखने समझने के लिये एक वैकल्पिक सौन्दर्यशास्त्र की दरकार है । एक पूर्वाग्रह ग्रस्त मानसिक खाँचे में इसे देखना सही मूल्यांकन नही हो पाएगा । हिन्दी के अब तक 2200 से 2500 के लगभग चिट्ठे जिनमे सक्रिय चिट्ठे 750-800 हैं ।और इनमें स्त्रियो के चिट्ठे जो अभी एक सैकडा भी पार नही कर पाए , लेकिन अपनी एक सशक्त उपस्थिति लगातार दर्ज करा रहे हैं । ब्लॉगवाणी से प्राप्त आँकडों के मुताबिक महिलाओं के चिट्ठों की संख्या 80 से 90 के बीच है । इनमें सक्रिय महिला ब्लॉगर केवल 30-32 के लगभग हैं उनमें भी गद्य लिखने वाली ब्लॉगर्स लगभग 15 से 20 ही हैं ,बाकी केवल काव्य लिखती हैं ।
। इनमें कुछ प्रमुख ब्लॉगर्स हैं – बेजी , नीलिमा ,घुघुती बासुती,मनीषा पांडेय ,प्रत्यक्षा,पारुल , नीलिमा सुखीजा अरोडा ,ममता ,अनुराधा श्रीवास्तव ,लावण्या शाह , अनिता कुमार ,आभा ,मीनाक्षी , निशामधुलिका ,स्वप्नदर्शी ,रचना ,रंजना ,सीता खान । शोभा महेन्द्रू ,पूनम पांडेय और रश्मि भी यदा कदा लिखती हैं ।जैसे दुनिया के अन्य किसी क्षेत्र में स्त्री की उपस्थिति है लगभग वही यहाँ भी है । फिर भी हिन्दी ब्लॉगिंग स्त्री के लिये खास है और ब्लॉगिंग मे स्त्री की उपस्थिति खास है । हाँलाकि यह स्थिति तब है जबकि पिछ्ले एक साल में स्त्री ब्लॉगर्स की संख्या मे तेज़ी से इज़ाफा हुआ है पर महत्वपूर्ण यह है कि जो नियमित रूप से सक्रिय हैं वे क्या लिख रही है।
स्त्री के लिये ब्लॉगिंग के मायने कुछ इसलिये भी अलग हो जाते हैं कि ऐसा अकेला माध्यम है जो एक आम स्त्री को आत्माभिव्यक्ति के अवसर देती है बिना किन्हीं भौतिक दिक्कतों के और ऐसे समाज में जहाँ उसके लिये खुद को अभिव्यक्त करने के अवसर और तरीके बहुत सीमित हों । ऐसे में ब्लॉग्स्फियर पर स्त्रियाँ विविध विषयी लेखन कर रही हैं। कविताएँ रच रही हैं । विमर्श कर रही हैं । बाज़ार को देख रही हैं उसकी नब्ज़ पकद रही हैं ।संसार रच रही हैं । संसार को समझ रही हैं । बोल रही हैं । सम्वाद कर रही हैं शास्त्रीय संगीत में स्नातकोत्तर पारुल अपने ब्लॉग “पारुल चान्द पुखराज का ” में गज़लें और नगमों के पॉडकास्ट देती हैं ।प्रत्यक्षा अपने ब्लॉग में जीवन की सच्चाइयों से जुडी अनुभूतियों को कहानी कविता और गद्य में रचनात्मक अभिव्यक्ति देती हैं ।नीलिमा चौहान अपने ब्लॉग “लिंकित मन” में ब्लॉग पर किये गये शोध सम्बन्धित लेखन करती हैं और अपने अन्य ब्लॉग “आँख की किरकिरी’ में स्त्री व समाज के अन्य उपेक्षितों से जुडे भावनात्मक वैचारिक लेख लिखती हैं । घुघुती बासूती और बेजी भी अपने अनुभवों ,भावनाओं और विभिन्न विषय़ों पर अपना दृष्टिकोण व्यक्त करती हैं ।नीलिमा सुखीजा अरोडा मीडिया से जुडी हैं और मीडिया व स्त्री से जुडे सवालों को उठाती है । लावण्या शाह दुनिया घूमते घामते खींची गयी तस्वीरे और एकत्र की गयी जानकारियाँ देती है ।आभा स्वांत:सुखाय लिखती हैं ।

स्त्री जब ब्लॉगिंग करती है तो पुरुष मानस में शायद पहला सवाल यह आता है कि “फिर खान कौन बनाता है ?” खाना बनाना एक कर्म है जो बच्चे पालना , घर समेटना , नौकरी भी करना ,जैसे कई कर्मॉ को समेतता है । ब्लॉगिंग के लिये स्त्री को इन्ही सब सामाजिक पारिवारिक और व्यावसायिक दायित्वों के बीच से समय निकालना होता है । इसलिये ब्लॉग जगत में भी ऐसे प्रकरण यदा-कदा उठते रहे हैं । इसलिये अनुराधा श्रीवास्तव अपनी एक टिप्पणी मे लिखती हैं -
“कल्पना करिये की कोई गृहिणी कह रही है कि उसे ब्लाग पढने या पोस्ट करने जाना है तो सब उसे पागल समझेंगें।“
आभा की दिक्कत यही है कि उसे लेखन से प्यार है लेकिन “बेटा एक दिन वह स्कूल से लौटा और मैं अपनी पोस्ट को खतम करने में लगी थी...मैंने उससे दो मिनट रुकने को कहा...बेटे ने कहा हमारा ...घर बर्बाद हो गया है” ऐसे मे उसके सामने सवाल आता है कि उसका अपना घर ज़्यादा ज़रूरी है कि ब्लॉग ।
प्रत्यक्षा इस मानसिकता के प्रति अपना विरोध दर्ज करती हैं और स्त्री के प्रति रखी जाने वाली दोगली सोच का उद्घाटन करती हैं-
“आखिर कौन नहीं चाहता कि पत्नी कामकाजी या होममेकर , आपको घरेलू जंजालों से मुक्त रखे ताकि आप नेरूदा फेलूदा पढ़ते रहें ? आपकी इच्छायें ? और स्त्री की इच्छायें ? मैं ये चाहती हूँ ..तक भी कहने न दें ? आप कहेंगे मैं उदार हूँ , मैंने पत्नी को समान
अधिकार दिया है । इस “दिया” शब्द से कभी परेशानी होती है ? नहीं होती क्योंकि आप आत्ममुग्धता में नहाये हैं कि मैं कितना प्रोग्रेसिव हूँ .. न सिर्फ बोलता हूँ , करता भी हूँ “।
स्त्री के ब्लॉगिंग करने या पाब्लो नेरुदा को पढने के पीछे उसके अस्मितावान होने के अहसास का बोध है । गृहलक्ष्मी , गृहशोभा ,विमेंस इरा ,सरिता पढने में ऐसे खतरे कम हो जाते हैं ।घुघुती बासुती लिखती हैं - नोटपैड बहना ,क्यों डराती हो इतना ? चलो मिल बनाए गुझिया,जिसे देख सीखे अपनी गुड़िया,चलो लगाएँ उसे भी रसोई मेंक्या धरा है उसकी पढ़ाई में ?पढ़ना ही है तो कितना है पढ़ने को-पढ़ो ‘गृ ये सिखाती हैं तरीके पति को रिझाने के, बैंगन का नये तरीके का भर्ता बनाने केमुन्ने को मालिश कर सुलाने के, ( मुन्नी को नहीं )तरीके है पार्टी में मेकअप लगाने के, बच्चों को बहलाने के,रूठे पति को मनाने के,हशोभा’, ‘गृहलक्ष्मी’, ‘मेरी सहेली’ ,
तो हमें अपने नोटपैड पर लिखने का मन होता है कि-ब्लॉगिंग और पाब्लो नेरुदा पढने में कोई फर्क नही है .... “शॉपिंग के लिए जाती औरतें ,करवाचौथ का व्रत करती औरतें , सोलह सोमवार का उपास करती औरतें , होली पर गुझियाँ बनाती औरतें , पडोसिन से गपियाती औरतें -- अजीब नही लगतीं । बहुत सामान्य से चित्र हैं । लेकिन व्रत ,रसोई,और शॉपिंग छोड कर ब्लॉगिंग करती या पाब्लो नेरुदा पढती औरतें सामान्य बात नही । यह समाजिक अपेक्षा के प्रतिकूल आचरण है। आपात स्थिति है यह । ब्लॉगिंग और नेरुदा पति ही नही बच्चों के लिए भी रक़ीब हैं । यह डरने की बात है । अनहोनी होने वाली है । सुविधाओं की वाट लगने वाली है’
मनीषा पांडेय का ब्लॉग “बेदखल की डायरी” अपने नाम में ही स्त्री की सीमांतीय स्थिति का द्योतक है। बडी होती लडकियाँ लेबल में वे लडकियों के पालन-पोषण में ही छिपे उसकी कमज़ोरी के बीज ढूंढती हैं तो वहीं अच्छी लडकी के लेबल के तले लडकियों की घुटन को अभिव्यक्त करती हैं ।वे लिखती हैं –“ जो मिला, सबने अपने तरीके से अच्‍छी लड़की के गुणों के बारे में समझाया-सिखाया। और मैं हमेशा उन गुणों को आत्‍मसात करने के लिए कुछ हाथ-पैर मारती रही, क्‍योंकि कहीं-न-कहीं अपने मन की बात, अपनी असली इच्‍छाएं कहने में डरती हूं, क्‍योंकि मुझे पता है कि वो इच्‍छाएं बड़ी पतनशील इच्‍छाएं हैं, और सारी प्रगतिशीलता और भाषणबाजी के बावजूद मुझे भी एक अच्‍छी लड़की के सर्टिफिकेट की बड़ी जरूरत है। हो सकता है, अपनी पतनशील इच्‍छाओं की स्‍वीकारोक्ति के बाद कोई लड़का, जो मुझसे प्रेम और शादी की कुछ योजनाएं बना रहा हो, अचानक अपने निर्णय से पीछे हट जाए। “
कैसी स्त्री आज़ाद है या प्रगतिशील है ? यह प्रश्न वास्तव में कितना निरर्थक है इसे बताते हुए बेजी कहती हैं कि -ऑफिस जाती, कार चलाती आत्मनिर्भर औरत आज़ाद है ...कोई जरूरी नहीं है....घर में बैठ,साड़ी पहनी ,खाना बनाती अपने बच्चों की परवरिश करती औरत परतंत्र हो यह भी जरूरी नहीं है.....प्रतीक मात्र हैं...जिनसे कुछ सिद्ध नहीं होता..है ।स्त्रियों में इस बात की चिंता दिखाई देती है कि स्त्री को अभी स्वयम को ही स्त्रियोचित से मुक्ति पानी है । नीलिमा चौहान लिखती हैं- “स्त्री का परंपरागत संसार बडा विचित्र भी है और क्रूर भी है -यहां उसकी सुविधा ,अहसासों , सोच के लिए बहुत कम स्पेस है !गहने कपडे और यहां तक कि वह पांव में क्या पहनेगी में वह अपनी सुविधा को कोई अहमियत देने की बात कभी सोच भी नहीं पाई ! अपने आसपास की लडकियों महिलाओं के पहनावे की तरफ देखते हैं तो उनकी जिंदगी की विडंबना साफ दिखाई देती है ! परंपरागत महौल परंपरागत महौल में पली बढी यह स्त्री अपने दर्शन में स्पष्ट होती है --कि उसका जीवन सिर्फ पर सेवा और सबकी आंखों को भली लगने के लिए हुआ है ! छोटी बच्चियां घर- घर , रसोई -रसोई ,पारलर-पारलर खेलकर इसी सूत्र को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लेने की ट्रेनिंग ले रही होती हैं .......ठीक उसी समय जब उसकी उम्र के लडके गन या पिस्तौल से मर्दानगी के पाठ पढ रहे होते हैंपर अपने संधर्ष में अपने ही साथ नहीं हैं ये पैरों की हील ,ये पल्लू ,ये लटकन , ये नजाकत ! कहां से आ जाएगी बराबरी”

ब्लॉगिंग में स्त्रियों के लिये एक बडी सुविधा अनाम रह कर लिखने की है । ऐसे समाज में जहाँ अपनी इच्छाओं की अभिव्यक्ति स्त्री के चरित्र पर उंगली उठाने वालों को उकसाती हैं ,ब्लॉगिंग उसे इस बात की सहूलिय देती है कि वह अनाम होकर अपने विचारों और अनुभवों को अभिव्यक्त कर सके ।स्वप्नदर्शी अपना ब्लॉग इसी छ्द्मनाम से ही लिखती हैं ।दरअसल ब्लॉग जहत का ढांचा भी हमारी संरचना का एक हिस्सा भर ही है ! इसलिए यहां स्त्री विमर्श और संघर्ष के मुद्दों का उठना-गिरना -गिरा दिया जाना -हाइजैक कर दिया जाना -कुतर्की, वेल्‍ली और छुट्टी महिलाओं का जमावडा करार दे दिया जाना ---जैसी अनेक बातों का होना बहुत सहज सी प्रतिक्रिया माना जाना चाहिए !इस लिहाज़ से “चोखेर बाली ” जैसे सामुदायिक ब्लॉग का आना और उसे नज़रअन्दाज़ किये जाने की कोशिश को देख कर हमारे सामने ब्लॉग जगत का स्त्री के प्रति असंवेदनशील नजरिया डीकोड हुए बिना नहीं नहीं रहता !”चोखेर बाली” {आँख की किरकिरी sandoftheeye.blogspot.com }स्त्रियों का ऐसा मंच है जहाँ वे खुद से जुडे मुद्दों और सवालों को कुछ आपबीती कुछ जगबीती के अन्दाज़ में कहती है । आज भी समाज जहाँ ,जिस रूप में उपस्थित है - स्त्री किसी न किसी रूप में उसकी आँखों को निरंतर खटकती है जब वह अपनी ख्वाहिशों को अभिव्यक्त करती है ; जब जब वह अपनी ज़िन्दगी अपने मुताबिक जीना चाह्ती है , जब जब वह लीक से हटती है । जब तक धूल पाँवों के नीचे है स्तुत्य है , जब उडने लगे , आँधी बन जाए ,आँख में गिर जाए तो बेचैन करती है । उसे आँख से निकाल बाहर् करना चाहता है आदमी । कुछ पुरुष सहयोग और कुछ समर्थ में तो कुछ इस अन्दाज़ से यहाँ आते हैं कि “देखें ये स्त्रियाँ कुल मिला कर क्या चाहती हैं ’अभी शुरुआत भर है । अभी मंज़िलें ढूंढनी बाकी हैं । बातों सवालों विवादों के रास्ते सम्वाद तक भी पहुँचना है और खास बात है कि ब्लॉग पर स्त्रियो को अपनी मध्यमवर्गीय चिंताओं से ऊपर उठकर आम औरत की आवाज़ को भी सुनना और कहना है ।
- मुख्य महिला चिट्ठाकारों के चिट्ठों के वेब पते
- Beji-viewpoint.blogspot.com
- bakalamkhud.blogspot.com
- pratyaksha.blogspot.com
- linkitmann.blogspot.com
- ghughutibasuti.blogspot.com
- parulchaandpukhraajkaa.blogspot.com
- vadsamvad.blogspot.com
- bedakhlidiary.blogspot.com
- swapandarshi.blogspot.com
- neelima-mujhekuchkehnahai.blogspot.com
- auratnama.blogspot.com
- lavanyashah.com
- mamtatv.blogspot.com
- nishamadhulika.com

Saturday, March 8, 2008

कस्तूरी क्या करे महिला दिवस पर...?

मै आज हुमक -हुमक उठती थी
महिला दिवस पर, सुबह सुबह देखे अखबार
महिला दिवस कैसे मनाया जा रहा है
दिल्ली हाट मे, फ़िक्की मे ,नेशनल स्टेडियम मे ,
राष्ट्र सन्घ मे , तय कर लिया
मै तो जाउन्गी दिल्ली हाट
क्योकि प्रीति ज़िन्टा आएगी वहा आज
पर कस्तूरी आज
उदास सी लग रही है,
सूजा हुआ चेहरा है उसका
पूछा - "कस्तूरी ! तुझे क्या हुआ है?
आज नारी सम्मान उत्सव पर
तू हताश क्यो है?"
वह नही बोली कुछ भी ,
एक फीकी मुस्कान थी बस ;
जानती हूँ
कल उसकी बस्ती मे
उसने फ़ाँसी पर लटकती देखी थी
पडोसन की लाश और
बिलखते बच्चे उसके आसपास ।
वह आज खिन्न है,
चुपचाप धो रही है कपडे,
मान्ज रही है बर्तन
और बुहार रही है आंगन मेरा

उसे छुट्टी चाहिये थी

अस्पताल जाने के लिए अपनी
जली हुई ननद को देखने
मैने कर दिया था मना
क्योन्कि आज मुझे महिला दिवस पर
अटेन्ड करने थे कई कार्यक्रम
जाना था
कई उत्सवो में ,
काम कौन करता ?
कस्तूरी क्या करेगी छुट्टी लेकर कि
वह कुछ जानती ही नही ।

इतना ही जानती है
कि उसे निपटाने है अभी
मुझ सी महिलाओ के कई घर और!


international womens day

Friday, March 7, 2008

८ मार्च को महिला दिवस

कलाकृति : कविवर श्री रवीँद्रनाथ टैगोर



महिलाओं का फिल्मोत्सव होगा भारत की राजधानी देहली में , ८ मार्च को महिला दिवस के अवसर पर इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ वूमन इन रेडियो एंड टेलीविजन (आईएडल्ब्यूआरटी) और इंडिया इंटरनेशनल सेंटर एशिया प्रोजेक्ट संयुक्त रूप से ७ और ८ मार्च को नई दिल्ली में एशियन वूमंस फिल्म महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस फिल्म महोत्सव में पाँच देशों की २० से अधिक फिल्में प्रदर्शित की जाएगी। इन फिल्मों में बताया जाएगा कि महिला फिल्मकार राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय शैक्षिक और आर्थिक मुद्दों से कैसे जूझती है।


क्या आप ऐसे किसी "स्त्री " पात्र से प्रभावित हुए हैं ? किसी पुस्तक में , दर्शाई हुई ऐसी नारी पात्र जो आप को बरसों तक याद रही हो / या प्रेरणा स्त्रोत रही हो ?


तो अवश्य बतलायें।


क्या किसी चलचित्र में , आपने ऐसा नारी पात्र देखा है जो, आपके जहन से कभी मिट न पाया हो ? जी हां , ज़रा याद करिये, ओर बताइये ऐसा क्यों हुआ ? उस नारी पात्र का कौन सी पहलू आपके मन को भीतर तक छू गया ?


मुझे जिस पात्र की याद आ रही है वह , है : फ़िल्म : " भाभी की चूड़ियाँ " में स्व.मीना कुमारी जी द्वारा अभीनित एक " माँ " समान भाभी का किरदार ! इस फ़िल्म के सभी गीत मेरे पिता , स्व। पं । नरेन्द्र शर्मा द्वारा लिखे गए हैं जिसका भूपाली राग पर आधारित गीत , मीना जी सवेरे सवेरे, अपने घर आंगन को बुहारते समय गातीं हैं


" ज्योति कलश छलके " , उदित होते सूर्य को जल देते हुए, उसे मैं, कभी नहीं भूल पाती ! मंगलमय है संदेसा जो द्रश्य उपस्थित करता है।


इस महोत्सव में भारत सहित आस्ट्रेलिया, जापान, पाकिस्तान और अमेरिका की लघु फिल्मों के अलावा अन्य फीचर फिल्में भी दिखाई जाएंगी।


ये रिपोर्ट देखी तब याद आया के " महिला दिवस " सं . २००१ भी आशाओं के साथ मनाया गया था जब आज पीछे मुड कर देखती हूँ तो, ७ साल बीत गए हैं। देखियेगा लिंक : http://www.boloji.com/women/wd5.htm


-- लावण्या





Thursday, March 6, 2008

महिलाओं के लिए बजट की माया

पिछले दिनों आए राजस्थान बजट और केन्द्रीय बजट दोनों में एक समानता रही कि महिलाओं के लिए बहुत कुछ था। जैसे गरीब परिवार और एससीएसटी यदि महिला के नाम बैंक में खाता खोलेंगे तो उन्हें सरकार की तरफ से 1500 रुपए दिए जाएंगे। इसी तर्ज पर पढ़ाई में अच्छी लड़कियों के लिए भी काफी कुछ है। सबसे महत्वपूर्ण था पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं का 50 फीसदी आरक्षण। वसुंधरा राजे का तर्क था कि जब महिलाएं आधी आबादी हैं तो आरक्षण 33 फीसदी क्यों, 50 फीसदी क्यों नहीं। बात भी सही है जब महिलाएं मिलकर आधी आबादी बनाती हैं तो आरक्षण केवल 33 ही क्यों।
उधर, केन्द्र ने भी कोई कमी नहीं छोड़ी, आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर 1 लाख 80 हजार कर दी। तरह-तरह की योजनाओं में महिलाओं के लिए हजारों करोड़ रुपए दिए जाने की घोषणा कर दी।
ये हैं वो बड़ी-बड़ी घोषणाएं जो कानों को सुनने में बहुत भली लगती है लेकिन इससे कितना अंतर पड़ेगा, सोचें जरा। ऐसा नहीं है कि पहली बार ही ऐसी कोई घोषणा हुई हो, हर दो-चार साल में वोटों के लिए महिलाओं के लिए ऐसी घोषणाएं हो ही जाती हैं पर उससे एक्चुअली अंतर कितना पड़ा है, ये तो सब जानते हैं ही। राजस्थान उन शुरुआती राज्यों में से था जिसने पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण सुनिश्चित किया था, लेकिन आज दसियों साल गुजर जाने के बाद भी हालत जस के तस हैं। बस जिन गांवों में महिलाओं के लिए सीट रिजर्व हो गई । वहां पति की जगह पत्नी जीती, बेटे की जगह मां, पर असल राज-काज तो पुरुषों के हाथ में ही रहा। और वहां इनका नया नाम हो गया एसपी यानी सरपंच पति। महिलाएं घूंघट की आड़ में वहां बैठी जरूर रहतीं पर इन पंचायतों और ग्रामसभाओं का पूरा काम उनके पति या पुरुष रिश्तेदार ही देखते। कुछेक जगह महिलाओं ने फैसले खुद लेने शुरू किए , वहां हाल और ज्यादा खराब हुए। कइयों की पिटाई हुई, घर में बंद कर दिया गया, जो भी सितम ढ़हाए जो सकते थे वो जुल्म किए गए कि कहीं ये स्वतंत्र ना हो जाए , अपने अधिकारों को ना समझें और अपने हकों के लिए आवाज ना उठाएं।
पिछले दिनों तो गंगानगर और आसपास के इलाकों में एक नया ट्रेंड देखा गया जहां पर पूर्व सरपंच महिला को किसी ना किसी केस में फंसा दिया गया, ( सरपंच काल के दौरान लिए गए निर्णयों के आधार पर) वो जेल में बंद है। ऐसे 3-4 केस सामने आए और मजेदार बात ये थी कि इन महिलाओं के ये तक पता नहीं था कि वो कौनसे गलत निर्णय उन्होंने लिए थे। या घोटाले किए थे क्योंकि काम काज का तो उन्हें पता ही नहीं था और उनके नाम पर उनके पुरुष रिश्तेदार मलाई खाते रहे। जब गलत काम सामने आए तो जेल भेजा गया इन बेचारी महिलाओं को।
महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण अच्छी बात है लेकिन उससे पहले ये क्यों नहीं तय किया गया कि जो 33 फीसदी आरक्षण पहले से मिल रहा है उसमें यह सुनिश्चित किया जाए कि प्रेक्टिकली महिलाओं को इसका लाभ मिले जो कि नहीं मिल रहा है। वे ही शासन करें क्योंकि वे इन संस्थाओं में चुनी गई हैं। अगर इक्का-दुक्का उदाहरणों को छोड़ दिया जाए तो वे बस नाम की ही पंच-सरपंच होती हैं , हकीकत तो कुछ और ही है।
चुनावी वर्ष की इन सब घोषणाओं में एक और बात खास रही वो थी कि सब योजनाएं ग्रामीण महिलाओं के लिए हैं क्योंकि वो बड़ा वोट बैंक है। शहरी क्षेत्र की महिलाओं खासकर कामकाज महिलाओं के लिए टैक्स रिलेक्सशेन के अलावा कुछ नहीं मिला है वो भी इसलिए क्योंकि पुरुषों की टैक्स रिबेट बढ़ाई जानी थी तो महिलाओं की रिबेट को तो बढ़ाना मजबूरी ही थी। कहीं कामकाजी महिलाओं के बच्चों के लिए क्रैश जैसी सुविधाओं की सुनिश्चितता तय नहीं की गई। उनके बच्चों के लिए कोई फैसिलिटी नहीं।
ग्रामीण इलाकों की महिलाओं के लिए भी ऐसा कोई कंकरीट फैसला नहीं लिया गया जिससे कि एक्चुअली उनकी स्थिति में सुधार हो।

Tuesday, March 4, 2008

Nari

नारी
कोई अबला नही
सबल है ताक़तवर है

जीवन दायीनी शक्ति है जीवन का संबल है
हर पीडा को सहकर जन्मती नया अंकुर है
मुसकिल है राहे
अंजान सी डगर है
आत्मविश्वास की डोर से चलती जीवन भर है
अभी धूप है
कल सुनहरी छांव होगी
आँखों में सपनो का सुहाना मंजर है
महिला दिवस ही केवल -
नारी के नाम नही
हर दिन अपना दिन है , मन ही मुक्ति डगर है

नीलिमा गर्ग

Sunday, March 2, 2008

अगर

रूडयार्ड किपलिंग की कविता "इफ" फिर पढ़ने का मन हुआ....

IF


If you can keep your head when all about you
Are losing theirs and blaming it on you,
If you can trust yourself when all men doubt you
But make allowance for their doubting too,
If you can wait and not be tired by waiting,
Or being lied about, don't deal in lies,
Or being hated, don't give way to hating,
And yet don't look too good, nor talk too wise:
If you can dream--and not make dreams your master,
If you can think--and not make thoughts your aim;
If you can meet with Triumph and Disaster
And treat those two impostors just the same;
If you can bear to hear the truth you've spoken
Twisted by knaves to make a trap for fools,
Or watch the things you gave your life to, broken,
And stoop and build 'em up with worn-out tools:

If you can make one heap of all your winnings
And risk it all on one turn of pitch-and-toss,
And lose, and start again at your beginnings
And never breath a word about your loss;
If you can force your heart and nerve and sinew
To serve your turn long after they are gone,
And so hold on when there is nothing in you
Except the Will which says to them: "Hold on!"

If you can talk with crowds and keep your virtue,
Or walk with kings--nor lose the common touch,
If neither foes nor loving friends can hurt you;
If all men count with you, but none too much,
If you can fill the unforgiving minute
With sixty seconds' worth of distance run,
Yours is the Earth and everything that's in it,
And--which is more--you'll be a Man, my son!


--Rudyard Kipling

let me add....
And---you"ll be a woman, my daughter!

अगर इस तरह से जी सको....तो तुम एक व्यक्ति बन सकोगे....एक शालीन व्यक्तित्व के साथ.....

Saturday, March 1, 2008

स्त्री के लिये जगह

अनामिका जी की एक कविता है । बात सही लगी कविता अच्छी लगी सो यहाँ ठेल दे रही हूँ । वमन के बाद पेट में मरोड नही उठने चाहिये {चित्त शांत होना चाहिये }और रास्ते पर आगे बढना चाहिये । है न! सो अनामिका की यह कविता "बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध ले ..." के अन्दाज़ में ।या कबाडखाना की तरह "जैसे उडि जहाज को पंछी फिर जहाज पे आवै ..' चोखेर बालियों के अपने बडे मुद्दे हैं बात करने को ।

"अपनी जगह से गिरकर
कहीं के नही रहते
केश औरतें और नाखून "--
अनवय करते थे किसी श्लोक क ऐसे
हमारे संस्कृत के टीचर ।
और मारे डर के जम जाती थीं
हम लडकियाँ
अपनी जगह पर !

जगह ? जगह क्या होती है?
यह वैसे जान लिया था हमने
अपनी पहली कक्षा में ही !
याद था हमें एक एक क्षण
आरम्भिक पाठों का ---
"राम! पाठशाला जा !
राधा,खाना पका !
राम,आ बताशा खा !
राधा ,झाडू लगा !
भैया अब सोयेगा ,
जाकर बिस्तर बिछा !
अहा, नया घर है !
राम ,देख यह तेरा कमरा है !
'और मेरा ?'
'ओ पगली ,
लडकियाँ हवा धूप मिट्टी होती हैं
उनका कोई घर नही होता ! "

जिनका कोई घर नही होता --
उनकी होती है भला कौन सी जगह ?
कौन सी जगह ऐसी होती है
जो छूट जाने पर
औरत हो जाती है

कटे हुए नाखूनों,
कंघी में फंसकर बाहर आये केशों -सी एकदम से बुहार दी जाने वाली ?

घर छूटे ,दर छूटे ,छूट गये लोग बाग
कुछ प्रश्न पीछे पडे थे ,वे भी छूटे !
छूटती गयी जगहें !
परम्परा से छूट कर बस यह लगता है -
किसी बडे क्लासिक से
पासकोर्स बी ए के प्रश्नपत्र पर छिटकी
छूटी सी पंक्ति हूँ -
चाहती नही लेकिन
कोई करने बैठे
मेरी व्याख्या सप्रसंग !
सारे सन्दर्भों के पार
मुश्किल से उडकर पहुँची हूँ ,
ऐसे ही समझी -पढी जाऊँ
जैसे तुकाराम का कोई
अधूरा अभंग !