Saturday, March 1, 2008

स्त्री के लिये जगह

अनामिका जी की एक कविता है । बात सही लगी कविता अच्छी लगी सो यहाँ ठेल दे रही हूँ । वमन के बाद पेट में मरोड नही उठने चाहिये {चित्त शांत होना चाहिये }और रास्ते पर आगे बढना चाहिये । है न! सो अनामिका की यह कविता "बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध ले ..." के अन्दाज़ में ।या कबाडखाना की तरह "जैसे उडि जहाज को पंछी फिर जहाज पे आवै ..' चोखेर बालियों के अपने बडे मुद्दे हैं बात करने को ।

"अपनी जगह से गिरकर
कहीं के नही रहते
केश औरतें और नाखून "--
अनवय करते थे किसी श्लोक क ऐसे
हमारे संस्कृत के टीचर ।
और मारे डर के जम जाती थीं
हम लडकियाँ
अपनी जगह पर !

जगह ? जगह क्या होती है?
यह वैसे जान लिया था हमने
अपनी पहली कक्षा में ही !
याद था हमें एक एक क्षण
आरम्भिक पाठों का ---
"राम! पाठशाला जा !
राधा,खाना पका !
राम,आ बताशा खा !
राधा ,झाडू लगा !
भैया अब सोयेगा ,
जाकर बिस्तर बिछा !
अहा, नया घर है !
राम ,देख यह तेरा कमरा है !
'और मेरा ?'
'ओ पगली ,
लडकियाँ हवा धूप मिट्टी होती हैं
उनका कोई घर नही होता ! "

जिनका कोई घर नही होता --
उनकी होती है भला कौन सी जगह ?
कौन सी जगह ऐसी होती है
जो छूट जाने पर
औरत हो जाती है

कटे हुए नाखूनों,
कंघी में फंसकर बाहर आये केशों -सी एकदम से बुहार दी जाने वाली ?

घर छूटे ,दर छूटे ,छूट गये लोग बाग
कुछ प्रश्न पीछे पडे थे ,वे भी छूटे !
छूटती गयी जगहें !
परम्परा से छूट कर बस यह लगता है -
किसी बडे क्लासिक से
पासकोर्स बी ए के प्रश्नपत्र पर छिटकी
छूटी सी पंक्ति हूँ -
चाहती नही लेकिन
कोई करने बैठे
मेरी व्याख्या सप्रसंग !
सारे सन्दर्भों के पार
मुश्किल से उडकर पहुँची हूँ ,
ऐसे ही समझी -पढी जाऊँ
जैसे तुकाराम का कोई
अधूरा अभंग !

12 comments:

arvind mishra said...

Very touching and well expressed !

Lavanyam - Antarman said...

"तुकाराम का कोई अधूरा अभंग !"

"तुक्या म्हणे माझा विट्ठल्ला साँपड्ल्या "
तुकाराम जी गाते हैँ अभँग मेँ कि,
"अब तो श्री हरि मुझे मिल जायेँ "
"अब तो श्री हरि मुझे मिल जायेँ " एक स्त्री के बचपन से स्त्रीत्व तक की लम्बी सँघर्ष यात्रा का बखूबी वर्णन किया है कवियत्री ने --

Parul said...

vaah...aabhaar sujataa...kavitaa mun bhaayii

सिद्धार्थ जोशी said...

स्त्रियों को अब हवा धूप और पानी से बाहर अपनी जगह बनाने के लिए खुद ही प्रयास करना होगा। बहुत सी औरतों ने किया है और आगे भी जो संघर्ष करेगा वह विजयी होगा। पृथ्‍वी के प्रत्‍येक प्राणी पर यह बात लागू होती है। पुरुषों को भी इसी तरह की बेनामी का सामना करना पडता है अगर वे सक्षम नहीं हो पाते हैं। कोई जमींदार की गुलामी करता है तो कोई बणिए की। संघर्ष कर अपने वजूद को साबित करने की समस्‍या स्‍त्री और पुरुषों में बराबर है।

रिपुदमन पचौरी said...

कविता: अपने मन के भाव उजागर करने में सक्षम मैं।

ajay kumar jha said...

sujata jee,
kavita mein naari man kaa dard aur jeevan samet diya aapne, yadi kabhi fursat ho to www.jholtanma.blogspot.com par kyon paidaa hotee hain betiyaan padhein. dhanyavaad.

Mired Mirage said...

बहुत सही व सुन्दर !
घुघूती बासूती

Priyankar said...

कवयित्री अनामिका का नाम थोड़ा अलग से बोल्ड में दे दें तो उचित होगा .

neelima sukhija arora said...

हां , बचपन से यहीं तो पढ़ते आए हैं , राम मेला जा, मोहन खाना खा पर राधा पानी भर, मुन्नी झाड़ू लगा। क्यों कभी ऐसा नहीं कहा गया कि राधा पढ़-लिख, बड़ी लेखिका बन या अपने पैरों पर खड़ी हो। यही है हमारे समाज की मानसिकता। शुक्रिया सुजाता, लड़कियों को उनकी असलियत याद दिलाने के लिए

pearl neelima said...

राह कठिन है नामुमकिन नही......संघर्ष तो करना ही होगा अपनी जगह बनाने के लिए......

DR.ANURAG ARYA said...

भाई ये अंदाज वाकई पसंद आया ..कविता का

dilip uttam said...

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