Tuesday, March 25, 2008

दो घटनाएँ

कल रात अचानक दो घटनाएं के बारे में जानकारी मिली जो अब तक दिमाग को झकझोर रही हैं। यमुनानगर में एक युवती को शादी के सिर्फ नौ दिन बाद मौत के घाट उतार दिया गया। वो भी इतनी बेदर्दी से , कि उसकी लाश रेलवे ट्रेक पर कई टुकड़ों में मिली। शादी के बाद आमतौर पर दुलहनों द्वारा पहने जाने वाले चटख रंगों की ही तरह इस नई बियाही ने भी सुर्ख रंग का जोड़ा पहना हुआ था, जो उसकी मौत के बाद खून के रंग के साथ मिलकर थोड़ा ज्यादा सुर्ख हो गया था। उसके हाथों पैरों की मेहंदी पर लगा खून उसके साथ जो हुआ होगा उस कहानी को बयां कर रहा था।
बताया जा रहा है कि इस दुलहन से उसके ससुराल वाले दहेज की मांग कर रहे थे। उनकी मोटरसाइकिल और सोने की मांग पूरी नहीं हो पाई थी, इसलिए प्रताड़ना का दौर शादी के बाद से ही शुरू हो गया था।
दूसरी घटना यमुनानगर से कई सौ किलोमीटर दूर की है, बलिया में एक युवती को उसके ससुराल वालों ने रातभर पीटा। पीटने पर भी उनका गुस्सा शांत नहीं हुआ तो उन लोगों ने सुबह मुंहअधेरे पहली मंजिल से नीचे फेंक दिया। उसकी भी गलती यही थी कि उसके मां-बाप उसके ससुराल वालों की आशा के अनुरूप दहेज नहीं दे पाए थे।
पहली मंजिल से गिरने के कारण उस लड़की के हाथ-पैर टूट गए। उसके सिर पर गहरी चोट थी और कई हड्डियां टूट चुकी थीं। पूरा शरीर पट्टियों में लिपटा था। बताया जाता था कि ये युवती तो गर्भवती भी थी। उसके ससुर खुद डाक्टर हैं जो सास के नाम पर अस्पताल चलाते हैं लेकिन साधारण घर की बेटी की सुन्दरता तो उन्हें भा गई लेकिन बेटे का दाम सही नहीं मिलने का गुस्सा ज्वालामुखी के रूप में उस लड़की पर फूटा। जो उसकी जान का ही दुश्मन बन बैठा।
दोनों घटनाएं बहुत दूर की हैं और उनमें आपस में कोई जुड़ाव भी नहीं है लेकिन दोनों में एक समानता है- ससुराल में प्रताड़ना। ये सोच कर ही दिल दहल जाता है कि उनके ससुराल वालों ने उसे किस कदर पीटा होगा। दोनों युवतियों को हालत की जिम्मेदार सिर्फ एक ही चीज है दहेज। दहेज और दहेज के लिए प्रताड़ना जिसका शिकार केवल महिलाएं ही होती हैं। अच्छे सम्पन्न घरों में बहुएं बनकर गई ये युवतियां उनकी पैसे की भूख शांत नहीं कर पाईं और उनमें से एक तो अपनी जान से हाथ धो बैठी। दूसरी अस्पताल में अभी मौत से लड़ाई लड़ रही है।

6 comments:

सुजाता said...

नीलिमा जी ऐसे में मुझे पूजा चौहान का ध्यान आ जाता है , चार कक्षा पढी वह लडकी ,उसके हाथ का बल्लम , अर्द्धनग्नावस्था , रौद्र मुख मुद्रा एक कन्धे पर पर्स ,एक हाथ में पकडी चूडियाँ .........
सारे प्रतीक समाज की खोखली मान्यताओं को धता बताते हुए ।
इसी साहस की ज़रूरत है । क्या माता पिता देंगे यह रीढ अपनी बेटियों को कि वे दूसरों के चरणो मे गिरने की बजाय सीधी खडी रह सकें ।

राजीव जैन Rajeev Jain said...

बुरी खबरें

सुजाताजी
वैसे उन्‍हीं पूजा चौहान ने आजकल अपने उसी पति को बचाने के लिए कलेक्‍टर को ज्ञापन दिया है। उनका कहना है कि मीडिया ने उनके पति की बदनामी की है। अगर उनसे ठीक से व्‍यवहार नहीं किया तो वे दुबारा अद़र्धनग्‍न प्रदर्शन्‍ करेंगी।

सुजाता said...

राजीव जी,
अजीब सी खबरे हैं , सत्य कभी एकपक्षीय नही होता । इसलिये सत्यता को प्रमाणित करने पर नही जाना चाह्ती ।
जिन प्रतीको और प्रतिरोध को दर्शाया इस प्रकरण ने बस उन्ही की बात करना ज़रूरी है ।
प्रतिरोध का यह तरीका अनुकरणीय है , ऐसा नही कह रही । प्रतिरोध का तरीका सबका अपना होता है । उसमे सही गलत क्या ।
मीडिया ने भी तो खुद को सन्देह के दायरे मे ला दिया है .........क्या कहा जाए....

pooja said...

क्या वाकई समाज बदल रहा है? क्या सोच और मानसिकता में यदा-कदा दिख जाने वाले बदलाव महज मरीचिका हैं? दिल को बहलाने का ख्याल भर?

कुन्नू सिंह said...

दुसरी जिंदगी जीयें- ये सच मे बहुत अच्छा है और ईस्मे आप वो सब कर सकते है जो आप अपनी लाईफ मे नही कर सके है और अपना घर,जमीन, बसा और खरीद सकतें है। आपके रजीस्टर कर्ते ही आपके नाम का एक अवतार पैदा हो जाता है। ये सच मे बहुत मजेदार है। एक बार देखें जरुर की ये कहां और किस साईट पर रजीस्टर करना है। और कैसे चलता है। ये रहा लींक ---->> http://kunnublog.blogspot.com/2008/03/blog-post_26.html

आर. अनुराधा said...

आखिर प्रतिरोध की कोशिश वहीं होगी जहां विरोध की जरूरत महसूस की जा रही है। अपने लिए आवाज उठाने और उस आवाज़ के सुने जाने के बीच अब भी बहुत फासला है, लेकिन कोशिशें फिर भी हो रही हैं। ये अलग बात है कि जब तक औरत पुरुष के नहीं, अपने चश्मे से दुनिया को देखना नहीं सीखेगी, उसकी बनाई जंजीरों को गहने समझ कर पहनती रहेगी, ऐसी घटनाएं होती रहेंगी और औरतें खुद औरतों के खिलाफ इन पुरुषों का हथियार बनती रहेंगी।