Sunday, March 30, 2008

इनसान बनने से पहले औरत का अफसाना कैसे बन गया !!

सपना चमड़िया
"ज़िन्दगी का अनुवाद "
तीसरा भाग

मेरे घराने की एक महिला के बारे में बताऊँ-उन्हें रात से डर लगता है ।रात होते ही उन्हें बेहद घबराहट होने लगती है। वे कहती हैं -"मुझे अपने कमरे में जाने से डर लगता है,ऐसा लगता है किसी काली ,अन्धेरी गुफा में घुसती जा रही हूँ और मन ही मन सोचती हूँ कि अज की रात बच जाऊँ। पर नहीं जब से यह बेगार का पट्टा गले में पड़ा है-रात-दिन क भेद मिट गया है । सुबह पाँच बजे जब मुर्गे,गधा,कुत्ता,बैल,गाय,पखेरू उठते हैं तभी मैं भी उठ जाती हूँ और फिर दिन भर कभी इस पैर कभी उस पैर पर नाचती हूँ ।कभी मालिक का, कभी उस के बच्चों का ,कभी उसके रिश्तेदारों का हुक्म बजती दौड़ती फिरती हूँ । एक ही दिन में कई बोलियाँ बोलती हूँ बदल -बदल कर और सच मानिए एक ही दिन में कई जून भुगतती हूँ।जल्दी सुबह उठती हूँ मुर्गे की तरह , काम में मुझे गधा या बैल समझो,खाने में कुत्ता,सीधेपन में गाय और रात होते होते मुझे एक खूबसूरत परी में तब्दील हो जाना पड़ता है जो मालिक का हर सही गलत हुक्म बजा लाने का हुनर जानती हो। "
मैं जब भी अपने बारे में कुछ कहने लगती हूँ मेरे घराने की कोई न कोई औरत मेरे सामने आ कर खड़ी हो जाती है। पहले मुझसे झिझकती है ,दस-पन्द्रह मिनट तक अपने मालिक के बारे में बेहद प्रशन्सा से भरे हुए शब्द उच्चारती है। अपने आप को दुनिया की सबसे सुखी औरत साबित करने की पुरज़ोर कोशिश करती है। इसी बीच मैं धीरे से उसका हाथ पकड़ लेती हूँ और जब मेरे हाथों का कड़ापन,रूखापन यह बता देता है कि मैं भी उसी की तरह न्यूनतम मज़दूरी भी न पाने वाली बेगारों की परम्परा में आती हूँ तो अचानक वोह अपना नकाब उतार फेंकती है और मुझसे कहती है-मेरी कहानी लिखोगी ?
मुझे सोचना होगा,जानना होगा और लिखना होगा कि इनसान बनने से पहले औरत का अफसाना कैसे बन गया !!

मुझे मालूम है कि मैं जो कुछ लिख रही हूँ उसमें कोई तरीका ,कोई सिलसिला नहीहै । बस यूँ ही कुछ इधर से उठाया कुछ उधर से , जैसा जो याद आता गया बस वही कागज़ पर उतार दिया ।दर असल वक़्त मेरे साथ नही चलता , मुझे भाग भाग कर वक़्त को पकड़्ना पड़्ता है औत तब भी पूरा वक़्त कभी मुझे मिला नही बल्कि एक नज़र भर भी मैने उसे नही देखा ।मेरे कई परिचितों ने शिकायत की कि मैं जब भी फोन उठाती हूँ-ऐसा लगता है कि कहीँ से भाग कर आ रही हूँ, आवाज़ हमेशा हाँफती हुई होती है ।शायद वे हैरान होते हैं कि तीन कमरों में ऐसा क्या है जो मैं पकड़ना चाह्ती हूँ ,क्यों मैं हाँ रही हूँ । मैं जानती हूँ मुझे किस चीज़ की तलाश है, यह कौन सी यात्रा है जिसे वर्षॉ से सदियों से चलते रहने के बावजूद वह मुकम्मल नही हो पायी है।घट के भीतर भी -घट के बाहर भी यह यात्रा भी सिलसिलेवार नही है-इसमें कोई तरीका नही है,इसलिए मेरे लिखने मे कोई तरीका नही है ।मेरे पास जो है वो पूरा नही है इसलिए जो कुछ मैं लिख रही हूँ वह आपको रुक कर टुकड़ों को जोड़ कर पढना पड़ेगा।जब मुझे ही कुछ पूरा नही मिला तो आपको पढने के लिए एक पूरी सुविधाजनक कथा कैसे दे सकती हूँ !


पहला अंश
दूसरा अंश

8 comments:

Anonymous said...

आप की तीनो पोस्ट पढी और उस घुटन को शब्दों मे कलमबध देखा जिस आपने नित्य प्रतिदिन अपने जीवन मे महसूस किया । आप के लेखन की तारीफ़ मे आये सब कमेंट्स भी पढे जिन से ये पता लगा की आप की घुटन को सब समझ रहे हैं ? आप के अन्तिम पैराग्राफ को पुनेह लिख रहीं हूँ और कुछ जानना भी चाहती हूँ

"मेरे पास जो है वो पूरा नही है इसलिए जो कुछ मैं लिख रही हूँ वह आपको रुक कर टुकड़ों को जोड़ कर पढना पड़ेगा।जब मुझे ही कुछ पूरा नही मिला तो आपको पढने के लिए एक पूरी सुविधाजनक कथा कैसे दे सकती हूँ !"
आप कहती है आप को कुछ पूरा नहीं मिला , मेरा प्रश्न है पूरे की परिभाषा क्या हैं ?
नहीं मिला ? क्या नहीं मिला ? इश्वर ने आप को माता पिता दिये , माता पिता ने आप को सक्षम बनाया , विवाह किया , सामाजिक रूप से आप सुरक्षित हैं और आर्थिक रूप से आप स्वतंत्र भी है । और" मिलने" की परिभाषा मे क्या आता है ?? सब कुछ इतने सुविधा जनक तरीके से मिला हैं आप को फिर भी आप को समाज को एक सुविधा जनक कथा नहीं दे सकी ?? क्यों ??और " मिलने " मे जो भी आता है उसे आप को "मिलना " क्यों चाहीये ? क्या उसे अर्जित नहीं करना चाहिये था आप को ?
आपके घराने की अन्य सद्स्याओ से भी , और आप से भी मै जानना चाहती हूँ की वो इस घुटन से निकालने के लिये क्या करती है ? क्या लेख लिख लिख कर आप " चेतना " जागृत कर रही हैं ? क्या आप को लगता है एसे लेखो को पढ़ कर " औरतो का अफसाना " इंसान की कहानी बन सकेगा ?
औरत इंसान ही हैं बशर्ते की वो ये भूल जाये की वो औरत हैं ? भूल जाये की धूप मे उसकी चमडी काली हो जायेगी । याद रखे की पिता केवल उसका जनक हैं उसको दान करने का अधिकारी नहीं , पति उसका जीवन साथी हैं संरक्षक नहीं , पुत्र उसकी संतान है बुदापे की आस नहीं । जब तक आप के घराने की सदस्यों को ये याद रहेगा की वह औरत के आगे कुछ नहीं हैं उनके पास ऐसी एक नहीं लाखो कहानिया होगी जहां उन्हे महसूस होगा की वो बेगार की मजदूर हैं । आजाद देश मे अगर आप ख़ुद बंधुआ मजदूर की तरह रहेगे और उम्मीद करेगे की आप अपनी " सुविधा से " "कलम" से "शब्दों " के ताने बाने बुनते रहें और कोई आप को इस "बेगारी " से "स्वंत्रता " दे जाये तों आप के घराने के सदस्य बहुत ज्यादा की उम्मीद कर रहे हैं ।
"चोखेर बाली" वह हैं जो सांचे को तोड़ कर जिन्दगी को जीती हैं । "चोखेर बाली" वह कभी नहीं हो सकती जो एक सांचे मे बंधी रह कर घुटती है और अपनी घुटन से समाज के पर्यावरण को दूषित करती है ।

pritima vats said...

सुजाता जी आपने सपना चमड़िया की इतनी अच्छी लेखनी हम तक पहुंचाई। बहुत अच्छा लगा।

रिपुदमन पचौरी said...

:)
यह लेख भी पढ़ लिया आपका।
मेरी प्रतिक्रिया .. कुछ नहीं।

उपर रचना ने जो लिखा उसपर आपका जवाब भी पढ़ना चाहूँगा।

सुजाता said...

रचना जी ,
सपना जी स्वयम कम्प्यूटर नही जानतीं न उन्होने कभी इंटरनेट का प्रयोग किया है उन्हें आपके सवाल पहुँचा रही हूँ वे जो कहना चाहेंगी यहाँ लिख दूंगी।
अपनी तरफ से यहाँ कहना चाहूंगी कि यह डायरी की शुरुआत है और आत्ममंथन की भी ,इसमें क्या बाहर आने वाला है आप नहीं जानतीं। इसलिए अभी से कोई जजमेंट देना और वह भी किसी की डायरी पर उचित नही है।

Anonymous said...

sujata
इसलिए अभी से कोई जजमेंट देना और वह भी किसी की डायरी पर उचित नही है।
i was not aware that this post is not open for comments
you can delete my previous comment
soprry to have bothered you and sapna with my querries
and also note
that on the blog posts where you dont want to have comments mention it please it will save both readers and authors time . there is such a facillity availabe on google itself , i am sure you know it already
absolutely sorry to have commented

सुजाता said...

रचना जी,
मेरा कथन केवल आपके इस जजमेंट को लेकर कहा गया है कि --
"चोखेर बाली" वह हैं जो सांचे को तोड़ कर जिन्दगी को जीती हैं । "चोखेर बाली" वह कभी नहीं हो सकती जो एक सांचे मे बंधी रह कर घुटती है और अपनी घुटन से समाज के पर्यावरण को दूषित करती है ।
******
आपके अन्य किसी कथन के लिए यह नही कहा गया है ।
एक महिला जो साफ साफ सबके सामने अपने पति,ससुर,पिता को मालिकों की जमात में खड़ा कर रही है और स्त्रियों की बेगार की परमपरा को उद्घाटित कर रही है उसमें पर्याप्त साहस है । ऐसा कह सकना ही साँचों को तोड़ना है । कितनी स्त्रियाँ यह भी कहने का साहस करेंगी कि उनके ससुराल और उनके पति उन्हें प्रताडित करते हैं ।कितनी स्त्रियों में साहस है अपनी डायरी लिखने का ।इसलिए सपना चोखेर बाली न होकर रो-धो कर अपनी घुटन से समाज के पर्यावरण को प्रदूषित कर रही है ऐसा कहना अनुचित है और जल्दबाज़ी भी ।

आपको हर बात का जल्द बुरा नही मानना चाहिये । आप समझदार हैं ,साहसी हैं और असली चोखेर बाली हैं ।आपको आगे पढना चाहिये और अपने मूल्यवान कमेंट भी देने चाहिये । केवल किसी के मर्म पर चोट करने से बचना चहिये । हर स्त्री जो खुद को अभिव्यक्त करना चाहती है वह चोखेर बाली है क्योंकि समाज चाहता है कि औरत चुप रहे ।

खुल के बोल said...

आज सपना जी की डायरी के तीनों भाग पढे।समझ नही आता कि क्या कहा जाए ...
एक बात तो साफ नज़र आ रही है कि कैसे एक जीता जागता व्यक्ति रोबॉट में तब्दील होता है ...सपना जी ने लिखा था-
"बेगार-परम्परा को मैंने जल्द ही आत्मसात कर लिया-ठीक वैसे ही जैसे चिड़िया का बच्चा उड़ना सीख जाता है,साँप का बच्चा काटना ,फूल खिलना ,गरमी के बाद बारिश का आना "
ऐसा होने के बावजूद भी अपनी स्थिति की आलोचना कर पाना और अपनी पहचान के लिए सचेत होना ,एक डायरी लिखना अपने आप में बहुत बड़ा साहस है ।
मुझे तो लगता है कि हम सब ब्लॉगरों को इस चीज़ के प्रति सेंसिटिव होना चाहिये कि हमारे घरों में भी कहीं इसी तरह किसी व्यक्ति का रोबॉटीकरण तो नही हो रहा ? अगर हम अपने जीवन में किसी एक व्यक्ति का भी ऐसा मशीनीकरण रोक पाये तो मुझे लगता है ऐसे डॉक्यूमेंटस सामने लाने का "चोखेर बाली" का मकसद सफल हो जाएगा ।
@ सुजाता जी ,
आपकी बात से भी सहमत हूँ !

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

May the Wishes of SAPNA b fulfilled .
May SAPNA , take wings & fly in an open sky --
May Each & every SAPNA ...
turn into REALITY .

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