Wednesday, April 30, 2008

औरत

एक सुंदर सी कविता पढ़ी हैं आपके साथ बाँटना चाहती हूँ

आज फिर आईने ने दोहराया
तेरी आँखो में ये नमी सी क्यों है
तू औरत है
तो क्या हुया
आख़िर राहे हक में कमी सी क्यों है

Ode to a woman

सुनो ,
तुम जानती हो
मेरा अस्तित्व
तुम से शुरू हो कर
तुम पर खत्म होता है
फ़िर बता सकोगी
मुझे मेरा विस्तार
अनन्त सा क्यों लगता है ?
>
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{अनूप भार्गव }

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Tuesday, April 29, 2008

सोचें, बार बार सोचें...

जब महिला दिवस आता है तो मेरी व्यस्तता थोडी बढ़ जाती है! कई संस्थाएं जो इस दिन कार्यक्रम आयोजित करती हैं, चाहती हैं कि मैं वहाँ जाकर कुछ बोलूँ! मैं जाती भी हूँ! एक बार मानव अधिकार आयोग कि किसी ब्रांच ने भी एक कार्यक्रम आयोजित किया और मुझे आमंत्रित किया! मैं पहुंची तब तक कार्यक्रम शुरू हो चुका था!हॉल महिलाओं से खचाखच भरा हुआ था और वक्तागण बोलना प्रारंभ कर चुके थे! मैं भी रुचिपूर्वक सभी के विचार सुनने लगी!श्रोताओं में सभी सुशिक्षित महिलायें थीं! सभी वक्ताओं ने लगभग एक जैसी कही कहीं जिनमे महिलाओं को दोयम दर्जे का समझा जाना, उन्हें उचित महत्त्व न मिलना, उनके हकों से वंचित रखा जाना इत्यादी विचार शामिल थे! और मज़े की बात यह थी कि लगभग ७०% वक्ताओं ने अपना भाषण "यत्र नारी पूज्यन्ते,तत्र रमन्ते देवता" या " अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी" से शुरू किया! खैर सभी ने अच्छा बोला और सभी ने काफी सराहा!

अंत में मेरा भी नंबर आया..मैं सबसे पहले श्रोता महिलाओं से पूछा कि कौन सी चीज़ है जो उन्हें दोयम दर्जे का महसूस करवाती है!यह दोतरफा संवाद था! अधिकांश महिलाओं ने बताया कि ये घर से ही शुरू हो जाता है! घर के फैसलों में उनकी राय नहीं ली जाती..बच्चे भी बड़े हो जाते हैं तो सलाह लेना बंद कर देते हैं!ठीक...मैंने उनके सामने पांच प्रश्न रखे ,जो इस प्रकार थे-
१- दुनिया में कितने महाद्वीप हैं?
२-भारत के विदेश मंत्री कौन हैं?
३-भारत का राष्ट्रीय खेल कौन सा है?
४-नक्सलवाद कहाँ से प्रारंभ हुआ?
५-झारखंड किस स्टेट से अलग होकर बना है?

ये सभी बहुत सामान्य प्रश्न थे लेकिन शायद दो या तीन महिलायें ही एक दो प्रश्नों के सही जवाब दे सकीं...बाकी खामोश रहीं! साफ था कि ज्यादातर घरेलु महिलायें अखबार भी नहीं पढ़ती हैं..अगर पढ़ती भी हैं तो मधुरिमा या अन्य महिलाओं से संबंधित पेज! मैंने उन्हें सिर्फ इतना बताया कि जरूरी नहीं कि नौकरी करने से ही महत्त्व मिले....महत्त्व पाने और फैसलों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ज्ञान होना बहुत ज़रूरी है! मैं भी कोई बहुत ज्ञानी नहीं हूँ...न ही रोज़ मनोरमा इयर बुक पढ़ती हूँ! लेकिन जो हाथ में आ जाए ,सब कुछ रूचि से पढ़ती हूँ! मेरा कहना सिर्फ इतना था कि पढ़ने कि आदत डालें और अपने बच्चों को भी पढ़ने के प्रति रूचि जगाये!

मैंने देखा है कि न केवल महिलायें बल्कि पुरुषों में भी ये प्रवत्ति होती है कि ज्यादातर चीजों को बिना सोचे समझे मानते चले आते हैं! बचपन से सुनती चली आ रही थी कि रात को नाखून नहीं काटते हैं, बिल्ली रास्ता काटे तो रुक जाना चाहिए! हमेशा इन बातों को लेकर सवाल किया लेकिन बड़े लोगों से यही जवाब पाया कि ज्यादा प्रश्न मत करो...जो होता है चुपचाप मान लो!खैर बड़ी हुई तो इन सवालों के जवाब भी मिल गए! यही सवाल उस सभा में महिलाओं से किये तो उन्हें भी जवाब नहीं मालूम थे!लेकिन सब मानती चली आ रही थीं! जब मैंने उन्हें बताया कि रात को नाखून तब नहीं काटे जाते थे जब गाँव में बिजली नहीं थी...रात को कम उजाले में नाखून काटने से चोट लगने के डर के कारण यह कहा जाता था!लेकिन आज भी जब रात में भी भरपूर उजाला रहता है..हम यही बात मानते चले आ रहे हैं!दूसरा बिल्ली रास्ता काटने वाली बात...जब पक्की सड़कें नहीं थीं तब कच्ची सड़क के दोनों और आबादी न होकर जंगल थे! और यदि बिल्ली दौड़कर निकली है तो शायद कोई जानवर उसके पीछे होगा, इसलिए थोडी देर रूककर फिर आगे बढ़ते थे! ये बात भी आज के दौर में लागू नहीं होती! जाहिर है...पहली बार महिलाओं सहित वक्ताओं को इन बातों के जवाब मिले थे!

जो लोग सोचते हैं...बार बार सोचते हैं उनकी सभी शंकाओं का समाधान होता है! लेकिन दिक्कत ये है कि हम सोचना ही नहीं चाहते! मैं श्रीमती किरण बेदी और श्रीमती सुधा मूर्ति से बड़ी प्रभावित हूँ,इनकी कुछ किताबें मैंने पढीं! दोनों में जो बात कॉमन है वो ये कि दोनों ही अपने आस पास कि घटनाओं को अपने नज़रिये से सोचती हैं! कई जगहों पर में किरण बेदी जी के विचारों से सहमत नहीं होती लेकिन ये सिर्फ नज़रिये का फर्क है...अच्छी बात ये है वे छोटी छोटी सी बातों के बारे में सोचती हैं और गहराई से उनका विश्लेषण करती हैं! नजरिया भी सोचने समझने से ही विकसित होता है! इसलिए जहाँ तक हो सके हम सभी क्या स्त्री,क्या पुरुष सभी को ज्ञान अर्जित करने में पीछे नहीं रहना चाहिए! शायद यही है जो हमें महत्त्व दिलायेगा!

Monday, April 28, 2008

एक चोखेर बाली का ब्लॉग , जो अब नही लिखा जाता


एक ब्लॉग जो अब नही लिखा जाता ,लेकिन अगर लिखा जा रहा होता तो अपने आप में एक दस्तावेज़ से कम नही होता । सोचती हूँ कि इतिहास लेखन के पारम्परिक ढर्रे से अलग हटते ही जब हम अगल बगल झाँकने लगते हैं तो इतिहास का एक समानांतर ,वैकल्पिक इतिहास खड़ा होता दिखाई देता है जिसे शायद इतिहास लेखन की कोई भी प्रक्रिया आराम से नज़रन्दाज़ करके आगे चलती रह सकती है । इस मायने मे किरण बेदी का ब्लॉग शुरु होना और 5 पोस्ट के बाद बन्द हो जाना हमें उस वैकल्पिक समनांतर इतिहास से वंचित कर देता है जिसे हम उनकी इस डायरी मे देख पाते । किरण बेदी का ब्लॉग "CRANE BEDI " का लिखा जाना क्यो कर बन्द हो गया , अन्दाज़ा नही है पर इसे देखते ही जो उम्मीदें बन्धी थीं वे टूट कर बिखर गयीं।
ब्लॉग पर आने वाली बातें अनुभव और विचार के रचे पगे वे अंश होते जो शायद ही कहीं और हमारे सामने आ पाते। यह ब्लॉगिंग की ही खासियत है कि वह लेखन के मूल्यवान अंश दर्ज कर लेती है जिन्हें आप कहीं और नही पा सकते ।


घरेलू हिंसा से पीड़ित रश्मि की किताब का ज़िक्र करते हुए वे लिखती हैं
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Let me explain how? Under the new law all these acts of domestic violence are specific offences, namely: physical or mental abuse for any reason; addiction, extramarital relationships, unlawful demands, harassment, threat, insult, ridicule, name calling, deprivation of economic or financial resources, alienation of assets etc.
Anyone can complain for the aggrieved woman. The Magistrate can call concerned members of the household to be heard. He can counsel, direct or punish as the case may be. It is a civil, summary proceeding. Violation of orders can call for imprisonment of one year, fine or both.

पर साथ ही वे चेताती हैं -

It is for women who genuinely need help. At no stage should this be used falsely by them. Magistrates and Protection officers are for justice and not pro-women and anti-men.. They are there to prevent distress.

एक महिला आई पी एस , पुरुषों के बीच एक साहसी दबन्ग महिला ,सिस्टम से मिली पॉवर का इस्तेमाल जिसने सिस्टम की खामियों को दूर करने के लिए किया और सत्तावानों की आँखो में खटकती रही ,दो बेटियों की माँ ,57 वर्षीया उस चोखेर बाली के पास क्या कुछ था हमें बताने के लिए !!
उम्मीद करती हूँ कि यह ब्लॉग फिर से गुलज़ार हो |

Sunday, April 27, 2008

पंचायत और उससे आगे

ग्राम माता से भारत माता तक
राजकिशोर


किरन बेदी अच्छा बोलती हैं, यह मैंने सुना था, देखा नहीं था। ज्यादा लोगों का यह मानना है कि उनके साथ अन्याय हुआ। कुछ लोगों का कहना है कि वे अपनी महत्वाकांक्षा का शिकार हो गईं। लेकिन सच यह भी है कि महत्वाकांक्षा उन्हीं में पनपती है जो जीवन को किसी बड़े संकल्प का पर्याय मानते हैं और सिर्फ पद, पैसा और सफलता से संतुष्ट नहीं होते। सरकारी नौकरशाही में ऐसे लोगों की कदर कहां। सरकार गधे की चाल से चलती है और व्यवस्था को बदलने की बेचैनी से अभिप्रेरित ऐसे लोग हमेशा घोड़े पर सवार होते हैं। दुख की बात यह है कि वास्तविक जीवन में घोड़ा भले ही गधे को पछाड़ देता हो, सरकारी तंत्र में अकसर गधे ज्यादा बलवान साबित होते हैं। वे अपने बीच किसी घोड़े को देख कर डर जाते हैं और उसे लंगड़ा करने के लिए षड्यंत्र पर षड्यंत्र करते रहते हैं। कौन नहीं जानता कि वे अकसर सफल भी हो जाते हैं और घोड़े को अस्तबल में भेज दिया जाता है।

महिला पंचों और सरपंचों के एक सम्मेलन में किरन बेदी को बोलते हुए सुना और मैं तुरंत उन पर लट्टू हो गया। मैं ही नहीं, वहां उपस्थित सभी स्त्री-पुरुष लट्टू हो गए। उस सत्र में किरन बेदी को समापन भाषण देना था। लेकिन उन्होंने कोई औपचारिक भाषण बिलकुल नहीं दिया। शायद वे समझ गईं कि गांवों से आई हुई इन लोगों को शहरी भाषण पिलाना मूर्खता है। इसके बजाय उन्होंने पंचों-सरपंचों से संवाद करना शुरू कर दिया। उस सम्मेलन में उपस्थित अधिकांश स्त्रियां मां थीं, लेकिन शायद पहली बार उन्होंने इतनी संजीदगी से मां होने का मतलब सुना होगा।

किरन बेदी ने कहा कि मां होना काफी नहीं हैं, मां बनो। अपने बेटे-बेटियों को खूब पढ़ाओ-लिखाओ। तभी वे आगे बढ़ेंगे और एक दिन तुम्हारी तरह पंच-सरपंच बनेंगे। इसके बाद किरन बेदी ने मां के अर्थ का विस्तार करना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि तुम्हें सिर्फ अपने बच्चों की मां नहीं बनना है, पूरे गांव की मां बनना है। मां जन्म देती है, इसलिए बच्चे के प्रति उसकी ममता सबसे ज्यादा होती है। इसलिए जब वह सरपंच बनती है, तो उससे उम्मीद की जाती है कि उसमें पूरे गांव के प्रति वही ममता होगी जो अपने बच्चों के प्रति है। अर्थात वह ग्राम माता बन जाएगी। पुरुष जब ग्राम पिता बनता है, तो वह सेवा करने के बदले अपना रुतबा बढ़ाने में लग जाता है। वह जैसे अपने बच्चों पर हुक्म चलाता है, उसी तरह गांववालों पर हुक्म चलाने की कोशिश करता है। इसलिए पिता से उतनी अपेक्षा नहीं की जा सकती जितनी माता से।

किरन बेदी की बातें और आह्वान सुन कर स्त्रियां भी जोश में आ गई थीं और बीच-बीच में अपने संकल्पों की घोषणा भी करती जाती थीं। मैं आनंद से चमत्कृत तब हो गया जब किरन बेदी ने कहा कि आप लोगों को सिर्फ ग्राम माता बन कर संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए, बल्कि भारत माता बन कर दिखाना चाहिए। उनकी यह बात सोलहों आना जायज है। पंचायती राज के समर्थक गांव के बारे में ज्यादा सोचते हैं, देश के बारे में कम सोचते हैं। उनका कहना होता है कि गांव समृद्ध होंगे, तभी देश समृद्ध होगा। इस तरह पंचायतवाद ग्रामवाद में बदल जाता है। निर्वाचित पंच-सरपंच भी ऐसा ही सोचते हैं। उनकी दृष्टि अपने गांव से आगे नहीं जाती। वे इस सिक्के का यह दूसरा पहलू भूल जाते हैं कि जब तक राष्ट्रीय स्तर पर उचित नीतियां नहीं बनेंगी, ठीक से कामकाज नहीं होगा, तब तक गांवों की हालत में कोई बड़ा सुधार नहीं हो सकता।

उदाहरण के लिए, पिछले कई वर्षों से कई राज्यों में किसान आत्महत्या कर रहे हैं। हर गांव में निर्वाचित ग्राम पंचायत है, लेकिन कोई भी पंचायत इस शोकपूर्ण घटना को रोक नहीं पाती। यह असमर्थता इसलिए है कि राष्ट्रीय अर्थनीति पर गांवों का कोई प्रभाव नहीं है। हमारे पास ग्राम माताएं हैं, भारतं माताए नहीं हैं। इसका उलटा भी सही है। भारतीय स्तर पर योजना बनानेवाले और देश की हुकूमत चलानेवाले भारी संख्या में मौजूद हैं, पर वे गांवों की वास्तविक स्थितियों और जरूरतों से अनजान हैं। इस तरह, गांव और देश के बीच जो पुल बनने चाहिए, वे अभी महज हमारे स्वप्नों में हैं। ये पुल कब बनेंगे?

जाहिर है, ये पुल ऊपर से तो नहीं बन सकते। राष्ट्रीय सरकार ज्यादा से ज्यादा यह सोच सकती है कि गांववालों के लिए साल भर में कम से कम सौ दिनों के लिए रोजगार सुनिश्तित कर दो और अपे इस लघु सोच पर अभिमान कर सकती है। किसी गांवाले से पूछ कर देखिए। क्या वह कभी स्वीकार कर सकता है कि गांव में सिर्फ सौ दिनों की रोजगार गारंटी की जरूरत है -- इसी से ही गांव की दरिद्रता खत्म हो जाएगी ? तिनकों से चिड़ियों के घोसले बनाए जा सकते हैं, आदमियों के घर नहीं बनाए जा सकते। यह तो तभी हो सकता है जब ग्राम माताएं भारत माता बन कर दिखाएं। गांवों के पुरुष राष्ट्रीय नीतियों पर गंभीरता से विचार करें और उनमें बदलाव लाने की मांग करें।
गांव, शहर और देश के बीच एक जीवंत कड़ी है, इसे महसूस किए बिना संपूर्ण भारतीय नहीं बना जा सकता। जो सिर्फ अपनी और अपने गांव या शहर की सोचता है, वह अपूर्ण भारतीय है। जब उसे संपूर्ण भारतीय होने का चस्का लगेगा, तो वह खुशी (या, गम) से पागल हो जाएगा। जरूरत तो हमें विश्व मानवों की भी है, लेकिन जब तक राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार नहीं होता, विश्व मानव बनने की इच्छा हास्यास्पद परिणाम भी ला सकती हैं। भारत के महानगरों में ऐसे तथाकथित विश्व मानव बहुत दिखाई पड़ते हैं, जिन्हें अपने देश की स्थितियां विचलित नहीं करतीं। फिर भी चूंकि समय भूमंडलीकरण का है, इसलिए विश्व स्तर पर होनेवाली चहल-पहल से हम आंख मूंद नहीं सकते। आज भारत की स्थिति ऐसी है कि वह विश्व नीतियों को प्रभावित नहीं कर सकता। पर वह इतना कमजोर भी नहीं है कि अपने को इन नीतियों के हानिकर प्रभावों से बचा नहीं सके। इसलिए पंचायतवाद को भारतवाद और अंततः विश्ववाद से जोड़ने की जरूरत है। तभी वह वर्तमान संस्कृति का एक हिस्सा बन कर रह जाने के बजाय एक नई और बेहतर संस्कृति का वाहक बन सकता है।

Friday, April 25, 2008

आज़ादी व्यक्तिगत से ज़्यादा एक सामाजिक क्वेस्ट है

मैं खुश हूँ ,मेरा भरा पूरा परिवार है ,मैने आज़ादी हासिल की है; पर मै व्यग्र हूँ ,मैं चिंतित हूँ, क्योंकि जब तक मेरा दफ्तर ,मेरी गलियाँ ,मेरा समाज आज़ाद नही है मेरी आज़ादी का कोई मतलब नही है । स्वप्नदर्शी का आलेख बहुत हद तक सपना की डायरी की में व्यक्त बेचैनी के करणों की ओर जाता है ,सपना के सवाल उसके अकेले के नही है, उसकी बेचैनी उसके अकेले की नही है ;वह सवाल उठाती है अपनी बहुत सी बहनों की ओर से समाज के आगे और हम लाजवाब से खड़े रह जाते है।
स्वप्नदर्शी जी के सुझाव पर इस आलेख की महत्वपूर्ण विचारणीय बातें यहाँ प्रस्तुत हैं -
आज़ादी पसन्द लोगों को समाजिक लडाई/प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहिये -


मेरी समझ मे स्वतंत्र होना, गुलाम होना,ये एक व्यक्ति तय नही करता, वरन ये किसी एक समाज के परिपेक्ष्य मे ही व्यक्ति के सन्दर्भ मे कहा जा सकता है। निजी स्तर पर एक सीमित दायरे मे, थोडी व्यक्तिगत आज़ादी हासिल कर लेना, किसी को आज़ाद नही करता। क्योंकि इस व्यक्तिगत आज़ादी की घोषणा, और महत्त्व ही दिखाता है कि आज़ादी इस समाज मे एक अपवाद है।

अपने घर और आफिस से बाहर अगर आप सडक पर निकलती है, और असुरक्षा का भय अगर 24 घंटे मे से एक घंटे भी आपके सर पर है, तो आप सडक पर चलने के लिये आज़ाद नही है।
आप सामाजिक रूप से आज़ाद नही है।अगर आप महिला या किसी जाति विशेष की है, और किसी मन्दिर, मस्जिद मे आपको जाने की मनाही है, तो आप धार्मिक रूप से आज़ाद नही है।

अगर आप गर्भवती महिला है, या सिर्फ महिला है, और आपको इस आधार पर नौकरी नही दी जाति, प्रमोशन नही मिलता, तो समान अवसर पाने के लिये आप आज़ाद नही है।

एक लडकी को अगर पिता की सम्पति मे समान अधिकार नही है, पत्नी अगर अपना सब कुछ दाव पर लगा कर भी, जनम भर घर का काम करती है, पर घर की/पति की सम्म्पति पर अगर उसका अधिकार नही है, तो यहा एक बडा तबका, आर्थिक आज़ादी से बेद्खल है।

ये कतिपय उदाहरण है, जिनसे ये समझा जा सकता है, कि आज़ादी एक व्यक्तिगत क़ुएस्ट से बहुद ज्यादा एक समाजिक क़ुएस्ट है। व्यक्तिगत आज़ादी की अपनी सीमा है, और ये व्यक्ति के साथ ही खतम हो जाती है। इससे समाज के बडे हिस्से को कोई फायदा नही मिलता। इसीलिये सही मायनो मे आज़ादी पसन्द लोगों को एक बडी सामाजिक लडाई/प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहिये। अकसर महिला आज़ादी का प्रश्न एक व्यक्तिगत सवाल मे तब्दील होता हुआ दिखता है। जैसे अगर महिला ने ठान ली तो मुक्त हो जायेगी। जैसे की स्वतंत्रता का समाज से, क़ानून से, सभ्यता से कोई लेना देना ही न हो।
एक बंद कमरे मे बैठा व्यक्ति स्वतंत्र है, अपनी मर्जी से खाने, पहनने, और अपना आचरण करने के लिए ? पर एक सामाजिक स्पेस मे ये स्वतंत्रता व्यक्ति नही समाज तय करता है, धर्म से, क़ानून से, रिवाज़ से, संसाधन मे साझेदारी से।

ये सोचने की बात है की बंद कमरे मे कोई इंसान समाज से कितना स्वतंत्र है? अपनी सुविधा के साधन जो इस कमरे मे है, वों समाज से ही आते है। चोरी का डर भी समाज से ही आता है। और विनिमय शक्ति भी एक सामाजिक शक्ति है। बंद कमरे वाला इंसान भी कितना सामाजिक है ?, इस मायने मे स्त्री की समस्या भी क्या केवल स्त्री की ही है? क्या सिर्फ़ इसका निपटारा व्यक्तिगत स्तर पर हो सकता है? क्या स्त्री की समाज मे दुर्दशा का प्रभाव पुरुष पर नही पड़ता? क्या पुरुष पूरी तरह आजाद है। घर चलाने का जुआ उसके सर भी तो है। एक ख़ास तरह से चाहते न चाहते उसे भी अपने जेंडर के रोल मे फिट बैठना है।

अगर स्त्री आजाद होती तो क्या पुरुष भी कुछ हद तक और ज्यादा आजाद नही होता?
ये एक बड़े फलक के सवाल है, और एक बड़ी ज़मीन, और बड़ा आसमान माँगते है.

स्वप्नदर्शी की पोस्ट के बाद भी यहाँ दुबारा पोस्ट देने का मकसद ही यही था कि मुख्य विचार सामने आये , न कि व्यक्तियों पर बात घूमती रहे और यह पोस्ट किसी को जवाबी कार्यवाही न लगे । बहुत सम्भावना थी कि यह महसूस किया जाता कि यह लेख किसी की पोस्ट के विचार के खंडन के लिए लिखा गया । लेकिन रचना की टिप्पणियों के बाद यह लिंक दिया जा रहा है जिसने स्वपनदर्शी जी को यह पोस्ट लिखने को प्रेरित किया ।

Thursday, April 24, 2008

दो समाचार : आप इन्हें कैसे देखेंगे ?



( ) (WBJEE)परिक्षा के पर्चे, पश्चिम बंगाल के हुगली प्रांत ke कोनागर कसबे की रहनेवाली श्रीमती ीना पात्र ( उम्र ३० साल ) के पति , मानस पात्र ने , जब् चुराए उस की मीना ने सी आई डी = CID को ख़बर कर दी और अपने ही पति को पकड़वाने में क़ानून की मदद की है .देखिए ये ख़बर : आप इसे किस तरह देखेंगे ? क्या मीना का कदम उचित था ? या उसे ये नही करना चाहिए ?



http://www.merinews.com/catFull.jsp?articleID=133007&catID=2&category=इंडिया



( ) दुसरे समाचार झालानिया ग्राम के बारे मे हैं जहां लड़कियाँ सुरक्षित हैं और जिस पढ़कर , भविष्य के प्रति आशा मजबूत होती है --



http://www.merinews.com/catFull.jsp?articleID=133011&catID=2&category=India

Raah

उत्ताल तरंगों को देखकर
नही मिलती
सागर की गहराई की थाह
शांत नजरों को देखकर
नही मिलती
नारी मन की राह

टुकडों में जीती जिन्दगी
पत्नी ,प्रेमिका ,मां ,
अपना अक्स निहारती
कितनी है तनहा

सूरज से धुप चुराकर
सबकी राहें रोशन करती
अपने उदास अंधेरों को
मन की तहों में रखती

सरल सहज रूप को देखकर
नही मिलती
नारी मन की राह

असामान्यता क्यों ?

असामान्यता क्यों ?

विस्मृतियों के गर्भ से
यादों की अंजुरी भर लाई हूँ ........
कुछ यादें इसमें टिकीं हैं
कुछ इससे रिस रहीं हैं .........

ढलते सूरज की लौ सी
तपिश अभी भी बाकी है
इन यादों में ...........

तपती दुपहरी सा तुम बने रहे
बदली बन बौछारें मैं देती रहीं..........

सूरज सा तुम जलते रहे
चाँदनी बन ठंडक मैं देती रही............ .

जीवन संग्राम में
तुम मुझे धकेलते रहे
झाँसी की रानी सी मैं
ढाल तुम्हारी बनती रही............ ..

राम बने तुम
अग्नि परीक्षा लेते रहे
भावनाओं के जंगल में
बनवास मैं काटती रहे............ ..

देवी बना मुझे
पुरुषत्व तुम दिखाते रहे............ ...

सत्ती हो, सतीत्व की रक्षा
मैं करती रही............ .....

स्त्री- पुरूष दोनों से
सृष्टि की संरचना है
फिर यह असामान्यता क्यों ?

डाॅ.सुधा ओम ढींगरा

Wednesday, April 23, 2008

कार्य स्थल पर घटता महत्त्व

आज सुजाता जी से बात हुई...कार्य स्थल पर स्त्रियों के कम महत्त्व के बारे में चर्चा हुई! मुद्दा महत्वपूर्ण है और बात गंभीर! जहाँ तक प्रश्न है कि महिलाओं को कमतर आँका जाता है, मैं अन्य विभागों के बारे में उतने विश्वास से नहीं कह सकती !हाँ...पुलिस विभाग में जो देखा है और उसके जो कारण मैं महसूस करती हूँ वो आपके सामने रखना चाहती हूँ!

जैसा कि पूरी दुनिया ने देखा कि श्रीमती किरण बेदी को इस्तीफा देना पड़ा!यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि इस कदर काबिल अधिकारी को उसकी योग्यता के अनुरूप जगह नहीं मिलती!इसके २ कारण मुझे समझ आते हैं! पहला - बहुतहद तक ये बात सच है कि आज भी पुरुष एक महिला को खुद से आगे बढ़ता नहीं देखना चाहता है!शायद कहीं उसका अहम् चोट खाता है! दूसरा- आजकल सभी महत्वपूर्ण पोस्टिंग्स राजनैतिक हो गयी हैं! बिना जुगाड़ या बिना संपर्कों के अच्छी और महत्वपूर्ण पदस्थापना मिलना एक सपने जैसा हो गया है! राजनैतिक हस्तक्षेप इस कदर हावी है कि यदि आपने नेताओं कि मंशानुसार काम नहीं किया तो ट्रांसफर होना तय ही समझिए! और नेताओं को भी महिला अधिकारी के होने से असुविधा ही ज्यादा होती है!इसलिए ईमानदार,कर्तव्यनिष्ठ होने के बाद भी उन्हें वो स्थान हासिल नहीं होता! और जहाँ चयन सिर्फ प्रतिभा के आधार पर होता है जैसे कि निजी सेक्टर में....वहाँ इंदिरा नुई भी काम करती हैं!

ये तो हुआ एक पहलू, अब एक दुसरे पहलू की ओर आप सभी का ध्यान आकर्षित करना चाहती हूँ! पूरी तरह पुरुषों या सिस्टम को दोष देना भी न्यायसंगत नहीं है! एक अनुभव बांटना चाहती हूँ!तीन वर्ष पहले मसूरी में पूरे देश की महिला अधिकारियों का एक सेमिनार हुआ! कॉन्स्टेबल से लेकर डी.जी. रैंक की महिलायें उसमे मौजूद थीं! अपने प्रदेश की ओर से मुझे भी जाने का मौका मिला! उत्तरांचल की डी.जी. श्रीमती कंचन चौधरी भट्टाचार्य ने वह सेमिनार आयोजित किया था!तीन दिन तक विभिन्न मुद्दों पर चर्चा चलती रही! जब सभी प्रदेशों की अधिकारियों से समस्याएं पूछी गयीं तो सभी ने सबसे पहले जो समस्या बताई वो काबिले गौर है...आज भी थानों में महिलाओं के लिए अलग से टॉयलेट्स की व्यवस्था नहीं है जो कि मूलभूत आवश्यकता है!यदि लगातार घंटों काम करना हो तो सभी को बहुत समस्या होती है!अधिकारी स्तर पर सुविधाएं है लेकिन निचले स्तर पर सुविधाओं का अभाव है इसलिए भी महिलाओं कि कार्य प्रभावित होता है!

शायद मैं विषय से भटक रही हूँ...लेकिन उस सेमिनार का एक मुख्य मुद्दा था इसलिए लिखने से अपने आप को रोक नहीं पायी! खैर वापस विषय पर आती हूँ! दूसरा मुख्य मुद्दा जो वहाँ उठा वह ये था कि महिला होने के नाते वे क्या सुविधाएं चाहती हैं...उसका जो जवाब था वह अपने आप में इस बात का उत्तर है कि महिलाओं को महत्त्व क्यों नहीं मिलता! ज्यादातर अधिकारियों का कहना था कि उन्हें रात की duty से मुक्ति दी जाए, यदि उन्हें किसी कार्य से बाहर भेजा जाता है तो एक और महिला उनके साथ भेजी जाए!इसके अलावा उन्हें हलके कार्य ही दिए जाएं! मेरे लिए ये सब सुनना अप्रत्याशित था क्योकि मेरा मानना है कि यदि पुरुषों के बराबर वेतन आप पा रहे हैं तो मजबूती के साथ हर काम के लिए तैयार रहना चाहिए!खुद अपने आप को कमज़ोर दिखाकर दूसरों से कैसे उम्मीद की जा सकती है कि आपको कमज़ोर न समझे!कोई मजबूरी हो तो बात अलग है!एक व्यवहारिक बात है कि यदि जहाँ एक आदमी को भेजने से काम चल सकता है वहाँ कोई भी दो महिलाओं को भेजना पसंद नहीं करेगा! यदि किरण बेदी ने ये सुविधाएँ मांगी होतीं तो शायद आज उन्हें कोई जानता भी नहीं !

कुल मिलाकर जो बात मुझे समझ में आई वह ये कि राजनैतिक मुद्दे पर ज्यादा कुछ नहीं किया जा सकता लेकिन जो काम किया जा सकता है वो ये कि स्वयम को कमज़ोर सिद्ध न करें , आत्मविश्वास से आगे बढ़ें और हाँ बेहद ज़रूरी बात खुद को हमेशा अप डेट रखें !महत्त्व अपने आप मिलेगा! आप सभी के विचारों का व अनुभवों का इंतज़ार रहेगा ताकि और अधिक सार गर्भित बिंदु निकल कर सामने आयें!

Tuesday, April 22, 2008

स्त्रियों के नए हेडमास्टर

स्त्रियां क्या पहनें, क्या न पहनें

राजकिशोर


कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश सीरिएक जोसेफ ने स्त्रियों के आदर्श लिबास पर एक परंपरागत टिप्पणी दे कर अपनी उंगलियां जला ली हैं। अवसर था जुडिशियल इम्पायर नाम की मासिक पत्रिका का लोकार्पण समारोह। इस अवसर पर उच्चतम न्यायालय की एक पत्रिका का भी विमोचन होना था, जिसका संबंध भारतीय विवाह अधिनियम, 1955 से है। बढ़ते हुए अपराधों के कारणों पर विचार करते हुए जज साहब अचानक स्त्रियों की पोशाक की चर्चा करने लगे। उन्होंने कहा कि स्त्रियों के विरुद्ध अपराध इसलिए बढ़ रहे हैं क्योंकि वे उत्तेजक कपड़े पहनने लगी हैं। उन्होंने इसका जो उदाहरण दिया, वह कम दिलचस्प नहीं है। जज साहब ने बताया, 'आजकल स्त्रियां मंदिरों और चर्चों में भी ऐसे कपड़े पहन कर आती हैं कि ईश्वर की ओर से हमारा ध्यान उचट जाता है और हम अपने सामने उपस्थित व्यक्ति का ध्यान करने लगते हैं।' आगे उन्होंने फरमाया, स्त्रियां बसों में जिस तरह के उत्तेजक कपड़े पहनती हैं, उससे बसों में यात्रा कर रहे पुरुषों के सामने असमंजस की स्थिति आ जाती है। उन्होंने स्त्रियों को जन हित में शालीन कपड़े पहनने की सलाह दी।

कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश की मानसिकता को हम समझ सकते हैं। वे सीधे-सादे आदमी होंगे और जटिल समस्याओं पर सीधे-सादे ढंग से बोल रहे होंगे। इसके पहले भी अनेक जज तथा समाज सेवी यह विचार प्रगट कर चुके हैं कि उत्तेजक कपड़े पहननेवाली स्त्रियां बलात्कार के लिए आमंत्रण देती हैं। यानी स्त्रियों पर बढ़ते अपराधों के लिए पुरुष नहीं, स्त्रियां खुद जिम्मेदार हैं। बहुत-से लोगों को यह बात सही भी लगती है। लेकिन तनिक-सा विचार करते ही संभ्रम परदा फट जाता है और सत्य सामने आ जाता है। इस सिलसिले में विचारणीय बात यह है कि ज्यादातर बलात्कार किन स्त्रियों के साथ होता है। उन स्त्रियों के साथ नहीं जो उच्च या मध्य वर्ग से आती हैं और ऐसी पोशाक पहनती हैं जो उनके शरीर सौंदर्य को कामुक ढंग से उद्धाटित करने में मदद करती हैं। ये स्त्रियां सामाजिक रूप से पूर्णत: सुरक्षित होती हैं और लोग भले ही पीठ पीछे उनकी रुचियों या इरादों पर टिप्पणी करें, लेकिन उनकी उपस्थिति में अपना मुंह सिला रखते हैं। सचाई यह है कि अकसर बलात्कार का शिकार होती हैं वे औरतें जो दीन-हीन वर्ग से आती हैं। कहते हैं, गरीब की जोरू सबकी भौजाई होती है। इसी तर्ज पर कहा जा सकता है कि गरीब की बेटी पर पड़नेवाली सारी निगाहें लगभग एक जैसी होती हैं। बलात्कारी सौन्दर्य का उपासक नहीं होता। न आकस्मिक उत्तेजना का शिकार। वह एक ऐसा छिपा हुआ भेड़िया है जो सबसे कमजोर शिकार पर वार करता है।

दूसरी बात यह है कि स्त्रियां क्या पहनें और क्या नहीं, इसका फैसला करनेवाला पुरुष कौन होता है? क्या पुरुष स्त्रियों से अनुमति ले कर अपनी पोशाक तय करते हैं? ऐसा लगता है कि पुरुष किसी न किसी रूप में स्त्रियों के जीवन पर नियंत्रण बनाए रखना चाहते हैं। जब वे निजी जीवन में पराजित हो जाते हैं, तो सार्वजनिक मंचों से स्त्रियों पर हमला बोल देते हैं। लेकिन मामला उतना सीधा नहीं है जितना सतही तौर पर दिखाई पड़ता है। अगर हम यह मानते हैं कि स्त्रियों की भड़कीली पोशाक देख कर पुरुषों के मन में कामुकता का संचार होने लगता है, तब तो अमीर लोगों को मंहगी गाड़ियों में चलते देख कर गरीब राहगीरों के मन में ईर्ष्या का ज्वार उठना चाहिए और इन्हें अमीरों पर हमला कर देना चाहिए। इसी तरह, बैंकों में जमा लाखों-करोड़ों रुपयों को भी जन हिंसा का कारण बन जाना चाहिए। या रेल यात्रियों को हवाई अड्डों पर नजर पड़ते ही कुपित हो जाना चाहिए। मिठाई की दुकानों में प्रदर्शित मिठाइयों को देख कर भी हमारे मुंह में पानी आ जाता है, लेकिन हम इन दुकानों से मिठाई उठा कर खाने तो नहीं लगते। कानून कहिए या सभ्यता, कुछ है जो ऐसे सभी मौकों पर हमें रोकता है और हम आत्मनियंत्रण का परिचय देते हैं। फिर स्त्रियों के मामले में ही हम फिसलने का अधिकार क्यों अपने पास रखना चाहते हैं? क्या इसलिए कि स्त्रियां हमारी निगाह में भोग का सामान हैं और उनका भोग करना पुरुष वर्ग का नैसर्गिक अधिकार है? जैसे ही हम स्त्रियों को मनुष्य के रूप में देखना शुरू करेंगे, उनके मानव अधिकारों का सम्मान करना शुरू कर देंगे, जिसमें यह भी शामिल है कि वे क्या पहनें और क्या न पहनें, यह तय करने का अधिकार उन्हें ही है, किसी और को नहीं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि आधुनिक पूंजीवाद के दबाव से, जिसमें विज्ञापन तथा मास मीडिया उद्योग अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए लगातार स्त्री देह का शोषण करता रहता है, हमारे इर्द -गिर्द कामुकता का आक्रामक वातावरण तैयार करने का सुनियोजित अभियान जारी है। यह पश्चिमी सभ्यता का एक ऐसा मधुर आक्रमण है जिसके कड़वे जहर को अब पहचाना जाने लगा है। कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश अगर यह कहते कि कामुकता की यह संस्कृति हमारे जीवन को एकायामी बना रही है और इस विनाशकारी संस्कृति में स्त्रियों को अपनी सही भूमिका पहचाननी चाहिए, तो वे शायद एक भला और जरूरी काम कर रहे होते। लेकिन एक सभ्यतागत समस्या पर विचार करने के स्थान पर उन्होंने अपनी निगाह सिर्फ स्त्रियों की पोशाक पर केंद्रित की, जिससे उन्हें सार्वजनिक आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है। सवाल यह नहीं है कि कोई स्त्री क्या पहनती है, सवाल यह है कि नई संस्कृति में पोशाक से किस तरह का काम लिया जा रहा है, फिल्मों में और टीवी पर दर्शकों को लुभाने के लिए स्त्रियों को किस तरह पेश किया जा रहा है।

जाहिर है, फिल्मों और टीवी की नायिकाओं के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि अभिनय करते समय वे वही पहनती हैं जो वे चाहती हैं। इतनी आजादी उन्हें कहां। वे निर्देशक के हुक्म की गुलाम होती हैं और यह वही तय करता है कि उसकी अभिनेत्रियों को कब और कहां अपने को कितना छिपाना है और कितना दिखाना है। यह सौंदर्य के प्रदर्शन का मामला नहीं है। सौन्दर्य की अनुभूति हमें अनिवार्य रूप से कामुक नहीं बनाती। वह हमारे सौन्दर्य बोध को तृप्त करती है और उसका परिष्कार भी करती है। सिनेमा और टीवी अभिनेत्रियों की इस पेशागत मजबूरी को न समझ कर जब अन्य स्त्रियां उनकी नासमझ नकल करने लगती हैं, तो इससे यही पता चलता है कि व्यावसायिकता का दबाव कितना गंभीर है। पहले गृहस्त्र स्त्री और पतुरिया की पोशाक अलग-अलग होती थी। अब दोनों में भेद मिटता जा रहा है। नहीं, सर, नहीं, हम कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश की बात को दूसरे तरीके से दुहरा नहीं रहे हैं। हम इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि धीरे-धीरे यह तय करना कठिन होता जा रहा है कि कौन-सी रुचि हमारी अपनी है और कौन-सी रुचि हम पर लादी जा रही है। बहरहाल, स्थिति जो भी हो, कानून के द्वारा या फतवे जारी कर हम स्त्रियों के विकल्पों को सीमित नहीं कर सकते। हां, इस विमर्श में स्त्रियों को जरूर आमंत्रित कर सकते हैं कि कहीं वे अनजानत: किसी भयानक सांस्कृतिक षड्यंत्र का शिकार तो नहीं हो रही हैं।

Monday, April 21, 2008

प्रेम वासना और खुलापन : इसे यहाँ डालने का मतलब क्या है ?

हाँ मैने भी यही सोचा था शुरुआत में इसे यहाँ डालने का मतलब क्या है ?जैसा कि अनिता जी ने कहा । उन्हीं के कमेंट से वहाँ रुक गयी । गौर करती रही काफी देर तक कि आभा का मतलब और् मकसद समझ पाऊँ । एक स्त्री और एक चैट मित्र{पुरुष }।दोनों की बातें ।जिन पंक्तियों को हाइलाएट किया है उन्हे बार बार पढा ।प्रेम और हिंसा का तर्क जो स्त्री मित्र दे रही है वह समझने की कोशिश करती रही । चैट पर जब आप पुरुष मित्र से बात करती हैं तो बहुत बार इसे निमंत्रण मान लिया जाता है ।चैट करती स्त्री की यही जिज्ञासा है कि ऐसा उसकी बातचीत मे क्या है ,जिसे बन्द समाज मे खुलापन कहा जाता है और हमेशा पुरुष द्वारा एक ललक के रूप में लिया जाता है ।"खुलापन "माने क्या ?यदि आज़ादी है तो क्या इसे अवेलेबल होना क्यों समझा जाता है और झट से प्रेम निमंत्रण दे दिया जाता है । और आज़ादी नही है तो क्या है ?
आप भी देखिये और गौर कीजिये ।

प्रेम,वासना और खुलापन - एक बातचीत

haan mitr : zara sa vayast hoon : phir baat karte hain
हां मित्र मन नहीं लग रहा था आपकी कोई खबर नहीं थी बस यह बता देतीं आप ठीक है आप काम करें मित्र
aur agar mai kahi vayast hoon mitr to iska matlab naraz hona hi kyu lagate hain aap , mai naraz nhi hoti , malum hai naa aapko
अरे मित्र मालूम है धीर धीरे, हां चलिए यह हंसी आपकी बहुत प्‍यारी लगती है, मै भी खुश हूं टिकट ले लिया घर का , आपका सिरदर्द कुछ दिन को टलेगा हा हा हा
ohh mai bhi toh jaa rahi hoon
कब मित्र
aise me aapka bhi talega sirdard
मेरा तो जी का दर्द है मित्र
malum nhi par haan 15 dino ke liye toh jaa hi rahi hoon chhutti
ओह मेरा भी करीब इतने का ही , जा कब रही हैं आप, मैसेज तेा करती रहेंगी आप
dekhti hoon agle hafte ki chhutti maangi hai, haan karti rahungi
हां आपकी खबर नही मिलती जिस दिन , मन ही नहीं लगता लगता है आप नाराज तो नहीं हा हा हा

ओह प्‍यारी बच्‍ची नाराज मत होना कभी है ना
nahi nahi, aapne koi kahani nhi likhi
नहीं नई तो नहीं लिखी वैसे कल कुछ पढवाउंगा
ohh thik hai ,
kya mai thik se baat nhi kar paati?
हां आप करती हैं एकदम ठीक से करती हैं, क्‍या बात करती हैं आप
soch rahi hoon ki subah aapne kya kaha ki mai aise baat karti hoon ki prem me hone kaa log bharam paal lete
soch rahi hoon mai aisa kya karti hoon bhala
हां वह तो है इस पर बातें हो सकती हैं और क्‍यों ना इस पर विस्तार से कभी बातें करें, सवाल जवाब में , तब शायद हम समझ सकें
lekin mai toh aisi koi bhi chhichhori baat nhi karti mitr
ओह छिछोरी बात इसमें कहां से आ गई, आप नहीं समझीं
toh phir
वह मैं सोच कर लिखूंगा , इसमें कोई गलत बात नहीं है आपकी ओर से आप समय से थोडा आगे हैं मित्र ohh lekin samay se aage hona kya bura hai mitr
एक मानसिक प्‍यास है जो जब भाषा में हम व्‍यक्‍त करते हैं तो उसे लेकर लोग गलतफहमी पाल लेते हैं
nahi mai toh bata kar aage aati hoon ki mai prem ke liye uplabdh nhi hoon
नहीं , लोग इसका उल्‍टा समझते हैं मित्र , मैंने जितने लोगों का भी डायलाग देखा आपसे उनमें यह बात दिखी मुझे
kya
उनकी वह ललक
वे वहीं से शुरू करते हैं
par maine kab nimantran diya , wo hi bechain lage mujhe , aur mai toh pareshaan hi rahi
हमारा समाज ही ऐसा है , वहां खुलापन नहीं है
bina meri pareshaani jaane wo prem kaa dawa karte rah
jinse maine kabhi baat nhi ki wo bhi
हां इस पर आप आगे से थोडा ध्‍यान दे सकती हैं
toh mai kya khuli hui hoon
ओह ऐसा भी है , हां और इसमे बुरा क्‍या है
ohh toh aapko ye lagta hai ki mai khuli hoon , dekhiye mujhe mera jawaab mil gaya
मतलब
mai samjh gai
ओह , मुझे भी बताइए
ohh ..doc toh aap hain mai nhi , mai toh apne tark se hi baat samjh sakti hoon
वाह, आप भी ना , खुले होने को आप गलत मानती हैं क्‍या
haan
मतलब
haan mai maanti hoon ki khulaa wayawahaar thik nhi , isme matlab kya batau
यहां खुला का मतलब आप क्‍या ले रही हैं
mai aisa hi sochti hoon
ठीक है
khule ka matlab wahi le rahi hoon jo aap bata rahe hain , aur kuchh nhi
यह बात नहीं हुई , बातें खोलकर कहना गलत कहां से हैं
haan galat hai..tab tak ke liye jab tak aap khud ek takat nhi hai , aur tab tak ke liye jab tak aap ek aurat hain, mai khulepan ke khilaaf hoon
आप अब अपने ही खिलाफ होती जा रही हैं , इस तरह औरत होने का मानी थोडे होता है
agar mera wayawahaar khula hai toh mai iske khilaaf hoon
लडना तेा पडेगा ही ना
kis chiz se
अपनी आजादी के लिए, आप गलत ले रही हैं मेरे खुलेपन का अर्थ
aap mere roke nhi ruk paaye toh mai dimaag ko kaise rokungi
हा हा हा , आप भी ना एकदम लडकर मानेंगी
nahi mai gambhir hoon
हां तो इस पर बाते करें
meri sachaai kabhi nhi kahti ki aap bina mujhe jaane prem karen,aur ye ki mai prem kar paaun toh hi prem ka dawa karen ....maine aapko kaha tha naa mitr ki mai prem ke khatre janti hoon aur azaadi ke bhi
प्रेम तेा निजी अनुभव होता है मित्र
nhi
क्‍या नहीं
prem hinsha ke atirikat kuchh nhi
आप वासना को प्रेम कह रही हैं
prem wo hinsa hai jo hame sikhati hai ki ham prem karte hain isliye samne wala bhi hame prem kare
हिंसा तो वहां है ही नही
wasna aur prem ko mai nhi mila rahi , mai prem ki hi baat kar rahi hoon
सामने वाला करे इसमें यह तो नहीं आता
prem kabhi bhi zimedaari nhi lata , bus loot khasot karta
नहीं आप रोमानी प्रेम की बात कर रही हैं , ओह क्‍या बात‍ कर रही हैं आप, इसमे लूट खसोट कहां से आ गयी यार
haan mai usi prem ki baat kar rahi hoon jaha log dawa karte hain , ye loot hi toh hai ki bina jaane ki samne wale ko kya pida ho sakti hai,log chhalang lagate hi chale jaate hain , chaliye gambhir vishaye hai
नहीं मित्र वह प्रेम नहीं है बिना जाने तो प्रेम किया ही नहीं जा सकता है
aap kabhi meri jagah hokar dekh paaye toh achha , aapne ravindranaath ki kavita toh pdhi hogi naa
हां प्रेम में भी एक तरह की रूढता है इस पर सविता सिंह ने अपनी कविता में पहली बार लिखा था
unki bhi yehi baat hai...mai bhi aisa hi sochti hoon aur jab maine pdha toh mai bhauchaki rah gayi
क्‍या टैगोर ने गलत लिखा है
sochne lagi ye baat jo mai soch rhi hoon kabhi bina pdhe ,kisi aur ne bhi likha hai..bahut pahle , kuchh galat nhi likha
हां वही तो , वे कविताएं मुझे बहुत प्‍यारी हैं
par aap unhe bada maan kar thik kah rahe hain,aur mai kuchh nhi toh mujhe galat sabit kar rahe hain
आप कुछ नहीं , ये आपको कब कहा मैंने
ohh aap ki bhi buddhi kabhi kabhi aam logo sa prashn karti hai
यह क्‍या का क्‍या बना देती हैं आप , ये सिर नोचते जोकर, हटाइए इन चिन्‍हों को , देखकर चिढ होती है , छि
ye wahi hi jo aapki kisi kisi baat par mujhe hota hai
हा हा हा
पहले आप लड ही लीजिए , आप यार परेशान कर देती हैं
aur kyaa aap nhi karte

Posted by abha at 2:52 AM

आप गर्भवती तो नहीं हैं ? प्रमाण लाइये !

।सिर्फ यह एक खबर मन को द्रवित कर गयी । मैं नतमस्तक होना चाहती हूँ ऐसे समाज के आगे ।यह एक ऐसी खबर थी जिसे अनिल रघुराज जी ने अपने चिट्ठे पर सजाया था बड़े चाव से । मेरा हृदय कितना प्रसन्न हुआ ,बता नही सकती । इसे पढ डालें फिर बताती हूँ कि यहाँ का सच क्या है ?एक समाज के बतौर हम कितने पीछे हैं और कितनी घटिया सोच है।
हम सब स्त्रियाँ इस दौर से गुज़रती है और सभी पुरुष अपने घरों मे अपनी पत्नियों- बहनों को इस दौर में देखते हैं ,यह किसी अन्य लोक की बात नही किसी खास वर्ग या सम्प्रदाय की बात नही ;प्रजनन हम सभी के जीवन का एक दौर रहा है या होगा ।इसलिए किसी का इस मुद्दे से कोई सम्बन्ध न हो या रुचि न हो तो उसे सामान्य मानव मानने मे मुझे परहेज़ होगा ।



अनिल रघुराज -
"जिस देश में 36 साल तक तानाशाही रही हो, जहां लोकतंत्र अभी 30 साल का हुआ हो, वहां के मंत्रिमंडल में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं का होना चौकानेवाली बात है। लेकिन इससे भी ज्यादा चौंकानेवाली बात ये है कि वहां की रक्षामंत्री एक महिला है। यह उस स्पेन की बात है जहां एक दशक पहले तक सेना के दरवाज़े महिलाओं के लिए एकदम बंद थे। आज सुबह मैंने अखबारों में स्पेन की रक्षामंत्री Carme Chacon की तस्वीरें देखीं जिसमें वे सैनिकों का निरीक्षण कर रही हैं तो मैं वाकई आश्चर्य-मिश्रित कुतूहल से भर गया।इन तस्वीरों में आप देख सकते हैं कि Carme Chacon गर्भवती हैं। मैंने पूरी खबर पढ़ी तो पता चला कि Carme Chacon की उम्र महज 37 साल है और वो सात महीने के गर्भ से हैं।

एक महिला का रक्षामंत्री बनना और फिर गर्भवती मंत्री का सैनिक परेड का निरीक्षण करना दिखाता है कि दुनिया में महिलाओं के अधिकारों की स्थिति बदल रही है। स्पेन में इस समय प्रधानमंत्री जोस लुइ रोड्रिग्ज ज़ापातेरो के 17 सदस्यीय मंत्रिमंडल में से नौ महिलाएं हैं। ज़ापातेरो ने एक अलग समानता मंत्रालय भी बना रखा है जिसकी जिम्मेदारी उन्होंने 31 साल की Bibiana Aido को सौंपी है।

ऐसा नहीं है कि स्पेन बहुत खुला हुआ समाज है। वहां की सोच भी बाकी दुनिया की तरह पुरुष-प्रधान है। लेकिन ज़ापातेरो की अगुआई में वहां की स्पैनिश सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी (PSOE) की सरकार महिला-पुरुष बराबरी के नए-नए प्रयोग रही है। स्पेन की सेना में शामिल 1.30 लाख सैनिकों में 15 फीसदी महिलाएं हैं। Carme Chacon ने इसी सोमवार, 14 अप्रैल को औपचारिक रूप से रक्षामंत्री का पद संभाला है।

घुघुती जी ने वहाँ लिखा -" जब कोई स्त्री बच्चे को जन्म देती है तो वह समाज को आगे बढ़ाती है । यदि इस स्थिति में उसे महत्व दिया जाता है तो आप समाज को महत्व देते हैं ।"

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अब मेरा और बहुतों का जाना हुआ भोगा हुआ सच जो यहाँ हमारे सामने है ।
आप सभी से मेडिकली फिट होने का प्रमाण तो मांगा जाता होगा नौकरी जॉइन करने से पहले । लेकिन स्त्रियों से पूछा जाता है कि आप फैमिली वे मे तो नहीं हैं ? नौकरियों में अधिकांश जगह नवविवाहिताओं से नियुक्ति से पहले पूछा जाता हैं -आपकी एल.एम.पी .{आखरी मासिक की तिथि }क्या है यह किसी डॉक्टर से लिखवा के दीजिये ।मेरे साथ की ही एक लड़की ,3 महीने की गर्भवती को सरकारी स्कूल में लिखित परीक्षा के आधार पर नौकरी मिली लेकिन मेडिकली फिट नही करार दिया गया क्योंकि चिकित्सकीय परीक्षण मे ज़रूरी एक्स-रे शुरुआती तीन महीनो मे नही किये जाते ।और उसे कहा गया कि बच्चा हो जाने के बाद वह फिर से उस परीक्षण से गुज़रे और फिर मेडिकली फिट घोषित होने पर वह नौकरी जॉइन करे ।

अधिकांशत: गर्भवतियों को नौकरी जॉइन कराने से प्रिंसीपल मना कर सकते हैं {यदि चार महीने मुफ्त की तनख्वाह देने से बचाई जा सकती हो तो क्या हर्ज़ है }। नौकरी से बर्खास्तगी या नौकरी छोड़ने की भी यह एक बड़ी वजह बन जाता है । इस समय में साथियों का बर्ताव कई बार तंग करने वाला हो जाता है ।

दिल्ली का एक बहुत ही प्रतिष्ठित स्कूल अपनी किसी अध्यापिका को इसलिए रिज़ाइन करने को मजबूर करता है कि वह गर्भवती हो गयी बावजूद स्कूल द्वारा नियुक्ति के समय अनऑफिशियली यह कहने पर कि आप शुरुआती एक साल में गर्भाधान नही करेंगी । इस शोषण मे स्त्रियाँ भी पीछे नहीं हैं जो खुद उस संस्थान के उच्चतम पदों पर आसीन हैं । उक्त स्कूल की प्रिंसीपल सहित ओनर भी महिला ही है ,और बाकी सभी उच्च पदों पर भी महिलाएँ ही हैं । सत्ता पाने के बाद वे अपने ही समुदाय के विरुद्ध खड़ी हुई दिखाई देती हैं ठीक वैसे ही जैसे कोई आदिवासी मंत्री बनने के बाद अपने ही समुदाय को भूल जाता है ।

और इस तरह गर्भावस्था एक करियर ओरियेंटेड लड़की के लिए अभिशाप बन जाती है क्योंकि गर्भवती को साक्षात्कार मे बड़ी हिकारत से देखा जाता है -कुछ इस नज़र से जैसे फालतू का काम कर रही है और मुफ्त की तनख्वाह लेने चली आयी ।
मैटर्निटी लीव के पैसे बचाना और अपनी गर्भवती कार्यकर्ता के प्रति यह व्यवहार हमारे समाज के लिए शर्म की बात है ।मैं आज भी ये घटनाएँ सोचती हूँ तो मन वितृष्णा से भर उठता है । किसी महिला से उसकी आखिरी मासिक तिथि पूछा जाना अपमान जनक है ,यह उसकी निहायत पर्सनल बात है ।लेकिन जानकारी के अभाव में बहुत सी महिलाएँ इस का विरोध नही कर पातीं । एक अच्छी जगह से मिलती हुई नौकरी को लात मार देना आर्थिक स्थिति के लिए भी उन्हें सही नही जान पड़ता ।

स्त्री ने नौकरी की शुरुआत घर के खर्चों को अच्छे से मनैज करने से की थी जिसमे स्वचेतना और करियर की चेतना बाद मे आ जुड़ी । लेकिन कामकाजी और आधुनिक के लिए हमारे समाज में उलझने सिर्फ बढती गयीं । पारम्परिक भूमिकाओं मे जहाँ कुछ बदलाव हुए वहीं समाज का एक बड़ा हिस्सा अब भी वहीं खड़ा था और खड़ा है जहाँ हमें अब से 100 साल पहले दिखाई देता था ।कामकाजी महिलाओं के लिए सब कुछ कभी से भी आसान नही रहा ।वह दोनों ओर से घर और दफ्तर - दोहरी मार झेलती है । और गर्भावस्था के दौरान कोई स्त्री कभी कभी कितनी लाचार हो सकती है ,यह शायद महिला मित्र अच्छे से जान पायेंगी ।

क्या वाकई समाज की नज़रों मे गर्भवती स्त्री खटकती है ?क्या गर्भावस्था कुछ साधारण नौकरियों के लिए भी अनफिट होने की अवस्था है ? क्या पढी लिखी करियर ओरियेंटेड महिलाएँ जो सिर्फ दो या एक ही बच्चा पैदा करने का फैसला लेती हैं उन्हें भी चार महीने की मैटर्निटी लीव की सैलरी देने में संस्थानों को परेशानी है ?जो कि ताउम्र उस संस्थान की सेवा करने वाली है क्या वह इस दौर में न्यूनतम मानवीय सम्मान की भी हकदार नही ?

Saturday, April 19, 2008

सदियों से भूखी औरत



सदियों से भूखी औरत

करती है सोलह श्रृंगार

पानी भरी थाली में देखती है

चन्द्रमा की परछाईं

छलनी में से झांकती है पति का चेहारा

करती है कामना दीर्घा आयु की


सदियों से भूखी औरत

मन ही मन बनाती है रेत के घरौंदे

पति का करती है इंतज़ार

बिछाती है पलकें

ऊबड़ खाबड़ पगडन्डी पर

हर वक्त गाती है गुणगान पति का

बच्चों में देखती है उसका अक्स


सदियों से भूखी औरत

अंत तक नही जान पाती

उस तेन्दुए की प्रवृति जो

करता रहा है शिकार'

उन निरीह बकरियों का

आती रहीं हैं जो उसकी गिरफ्त में

कहीं भी, किसी भी समय ।


--अश्वघोष

वागर्थ से साभार
०७ अलकनंदा एन्क्लेव
जनरल महादेव सिंह मार्ग
देहरादून २४८००१ (उत्तराखँड)












Friday, April 18, 2008

एक सवाल ....

पल्लवी त्रिवेदी भोपाल मध्यप्रदेश में डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस हैं ।यह आज उनकी पहली पोस्ट है ।आशा है कि स्त्री समस्याओं से जुड़े बहुत सारे कानूनी पक्षो का रहस्योद्घाटन उनके द्वारा हो पायेगा व मसलों के कानूनी दाँव पेंच भी हम समझ सकेंगे ।पाठक पल्लवी जी से अपने प्रश्न व शंकाएँ बेहिचक रख सकते हैं ।

8 साल में इस पुलिस की नौकरी में कई खट्टे मीठे अनुभव हुए! कुछ ने इंसानियत का सबक सिखाया तो कुछ ने जेहन को झकझोर कर रख दिया!आज एक ऐसा ही अनुभव आप लोगों के साथ बाँट रही हूँ जिसने जो सवाल जेहन में छोडा ,आज तक जवाब तलाश रही हूँ....शायद आप लोग जवाब दे सकें....

घटना उन दिनों की है जब मैं ग्वालियर में पदस्थ थी! रोज़ की ही तरह मैं अपने ऑफिस मैं बैठी हुई थी तभी एक आदमी दरवाजे पर आया और अन्दर आने की अनुमति मांगने लगा, अनुमति पाते ही वह अन्दर आया और मैं कुछ पूछती या वह कुछ कह पाता ,इसके पहले ही उसने जार जार रोना शुरू कर दिया! मैंने उसे पानी पिलाया,तसल्ली दी! थोडी देर बाद वह सहज हुआ और उसने बताया कि वह भी छत्तीस गढ़ में पुलिस का ही एक जवान है! एक वर्ष पूर्व उसने अपनी बहन कि शादी ग्वालियर में की थी और तीन दिन पहले उसकी बहन को ससुराल वालों ने जलाकर मार दिया और बिना मायके वालों को खबर दिए लाश की अंत्येष्टि कर दी! इतना कहकर उसकी आँखों से फिर आंसू बहने लगे,मैं भी उसकी वेदना से द्रवित थी! उसने मुझसे चाहा की उसकी बहन को पूरा न्याय मिले और दोषियों को उनके किये की सजा मिले! मैं भी यही चाहती थी,मैंने उसे वापस भेजा और जी जान से मामले की तहकीकात में लग गयी! चूंकि मेरी सोच भी यही थी कि मामले की विवेचना इतनी मजबूत हो कि कातिलों को अदालत से कोई भी रहम न मिल सके! लेकिन मेरे सामने एक बड़ी दिक्कत यह थी कि उसकी बहन की अंत्येष्टि पहले ही की जा चुकी थी इसलिए मृत शरीर को देखने का मौका मुझे नहीं मिल पाया था और न ही शरीर का पोस्ट मार्टम हो पाया था इसलिए मैं अन्य सबूत जुटाने में लग गयी! इस बीच वह लगातार मेरे ऑफिस आता रहा और जल्दी कार्यवाही की मांग करता रहा! चूंकि मैं उसकी मानसिक हालत से अच्छी तरह वाकिफ थी इसलिए हर बार उसे आश्वासन देती रही! इस पूरे मामले की तहकीकात में कुछ दिन लगना लाज़मी थे किन्तु उसे संतोष नहीं हुआ और इस बीच उसने मेरे खिलाफ शिकायत करना शुरू कर दीं की मैं मामले में रूचि नहीं ले रही हूँ! मैं शांतिपूर्वक अपने काम में लगी रही! अगले दस दिन में मैंने सभी कातिलों को गिरफ्तार कर न्यायालय पेश कर दिया व मामले में चालान भी पेश कर दिया! मैंने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी!

खैर, मामले का ट्रायल कोर्ट में शुरू हुआ !करीब साल भर बाद मामले में फैसला आया जिसमे सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया था! मुझे हैरत भी हुई और गहरा धक्का भी लगा!मुझसे कहाँ चूक हुई, यह जानने के लिए मैंने पता लगवाया की क्यों इन्हें बरी किया गया?

जो जवाब मिला उसने मुझे हिला के रख दिया! लड़की के मायके वालों ने ससुराल वालों से दो लाख रुपये लेकर राजीनामा कर लिया था व सब के सब अदालत में अपने बयान से मुकर गए, जिनमे वह भाई भी शामिल था जो दिन रात मेरे सामने रो रोकर न्याय की गुहार लगता था!

जेहन में सवाल यह है कि क्या सचमुच पैसे की हैसियत आज रिश्तों से ऊपर हो चुकी है? क्या एक भाई के आंसुओं को भी शक की नज़र से देखा जाना चाहिए? मैं आज तक जवाब नहीं ढूंढ पायी!

Thursday, April 17, 2008

गुड़िया भीतर गुड़िया

उर्फ एक स्त्री के बनने की कथा
राजकिशोर

सिमोन द बोउआ का यह कथन दुनिया भर में उद्धृत किया जाता है कि स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। अर्थात आज हम जिस स्त्री को जानते हैं, वह जैविक से अधिक सांस्कृतिक इकाई है। क्या सिमोन भी इसी तरह बनाई गई स्त्री थीं? या, उन्होंने खुद को वैसा बनाया था, जिस रूप में हमने उन्हें पायां? मैत्रेयी पुष्पा भी एक ऐसी ही स्त्री हैं, जिन्हें समाज ने जितना बनाया, उससे अधिक उन्होंने अपने आपको बनाया। गुड़िया भीतर गुड़िया इसी बनने की रोमांचक कथा है। अगर यह किताब अंग्रेजी में छपी होती, तो अब तक इसे ऐतिहासिक महत्व की कृति घोषित कर दिया गया होता। हिन्दी की आंख जरा देर से खुलती है। जब आंख खुलेगी, तो यह तय है कि इस 'भितरघाती' लेखिका को शाबाशी कम और पत्थर ज्यादा मिलेंगे। खासकर लेखिकाएं और ज्यादा तिलमिलाएंगी। लेकिन जो नहीं है, उसका गम क्या, जैसे समझ। मैत्रेयी पुष्पा के निंदकों को उनकी रचनाओं में जिस चीज की तलाश रहती है, वह लेखक की आत्मकथा के इस दूसरे खंड में (पहले खंड का नाम था, कस्तूरी कुंडल बसे) भरपूर मिलेगी। क्या यह मैत्रेयी की ढीठाई है कि उन्होंने अपनी इस महत्वाकांक्षी कृति में खुद को कुछ ज्यादा ही उड़ेल दिया है ? या हमारी एक और स्टार लेखिका अनामिका के शब्दों में, मैत्रेयी पुष्पा सचमुच वह दरवाजा बन चुकी हैं. जिसे जितना अधिक पीटा जाता है, वह उतना ही ज्यादा खुलता जाता है? सच शायद इन दोनों से अलग है। मैत्रेयी ने अपने पहले महत्वपूर्ण उपन्यास इदन्नम में जहां से प्रस्थान किया था, चाक और अल्मा कबूतरी से होते हुए उन्हें यहीं पहुंचना था। गुड़िया भीतर गुड़िया बताता है कि वे बचपन से ही इसी दिशा में चलती आ रही हैं। रचनात्मकता वही है, सिर्फ विधा बदली है। अपने उन अनुभवों और विश्वासों को, जो उनके शरीर और आत्मा पर खुदती आई हैं, उन्होंने अपनी कृतियों में उन्हें अभिव्यक्ति भर दी है। अगर कोई कला-सिद्ध लेखक होता या होती, तो यह साहसनामा और अधिक सुगढ़ता लिए हुए होता। लेकिन जो अनगढ़ता या खुरदुरापन मैत्रेयी पुष्पा के लेखन की पहचान बन चुका है, उसका भी अपना स्वाद, औचित्य और सार्थकता है। मुहावरे में कहा जाए, तो मैत्रेयी पुष्पा हिन्दी साहित्य में धूल का फूल हैं।यह सिर्फ मुहावरेदारी नहीं है, क्योंकि धूल-मिट्टी से ही मैत्रेयी पुष्पा का अनुभव संसार बना है और उसी के बल पर उन्होंने ऐसी सचाइयां खोली हैं जिनसे हिन्दी का पाखंडी परिवेश बाप-बाप चिल्ला रहा है और जिनके कारण वे हजारों पाठिकाओं-पाठकों की महबूब लेखक बन गई हैं। इसी धूल-मिट्टी से मैत्रेयी पुष्पा ने जिन कसौटियों का विकास किया है, वे हमारे देश की नगरीय सभ्यता को मुंह चिढ़ाती हैं और जितने उद्वेग के साथ, उतनी ही सिधाई से स्त्री मुक्ति की सात्विक घोषणा करती जाती हैं। गुड़िया भीतर गुड़िया सभ्यता में निहित असभ्यताओं का एक ऐसा दर्दनाक दस्तावेज है, जिसके पन्ने 'सदाचार' के खून से लाल हैं, लेकिन जिसकी लाली (मैत्रेयी को उनका गांव इसी नाम से पुकारता है) एक नए सूर्योदय की अरुणिमा की ओर इशारा करती है। यह हमारा बड़प्पन होगा अगर हम इन उद्घाटनों के तर्क को समझने और उनके आधार पर संबंधों की नई नैतिकता के विकास में सहयात्री होने का प्रयास करें। स्त्री का इतिहास पुरुष के इतिहास से अधिक जटिल और घुमावदार होता है। गुड़िया भीतर गुड़िया में मैत्रेयी पुष्पा ने अपने कैशोर्य, वैवाहिक जीवन और लेखक बनने की कथा लिखी है। सपूत की तरह प्रेमियों के पांव भी पालने में ही दिखाई देने लगते हैं। मैत्रेयी ने बचपन में ही प्रेम किया -- उसका उल्लास जाना, दुख झेला, उसकी बेवफाई का दंश सहा और जब पढ़ने के लिए गुरुकुल गईं, तो तथाकथित ब्रह्मचर्य के अंत:पुरों के किस्से देखे-सुने। वे लिखती हैं, 'शुरुआत में मैं साहित्य की दुनिया में पुरुषों से इतना ही झिझकती (डरती) थी, जितनी कि 1960 में किशोरावस्था में कदम खने के बाद सहशिक्षा और पुरुष शिक्षकों के चलते डी.बी. इंटर कॉलेज, मोंठ (झांसी) में डरा करती थी। वहां मैंने यह तजुर्बा किया कि साथ पढ़नेवाले लड़कों से कई-कई गुना खतरनाक शिक्षक और प्रिंसिपल थे। मैंने मुठभेंड़ें भी कीं, लेकिन हर समय की मुठबेड़ ? स्कूल में कब तक रह पाती? अत: मैं ऐसे मौकों से बचती, जहां मर्द के साथ एक कमसिन लड़की अकेली पड़ जाए। ऐसा करते-करते यह बात मेरी आदत में शुमार हो गई।' (पृष्ठ 312-13) लेकिन अनुराग से अनुराग बना रहा (पति के सहकर्मी डॉ. सिद्धार्थ का प्रसंग), जिसके चलते विवाह के बाद ताने सहने का सिलसिला शुरू हुआ। मन करें तो इस हिम्मत पर दाद दें कि यह 'बेशरम' लेखिका आज भी उस दोस्ताने को बिना किसी झिझक या अपराध भाव के याद करती है। गांव की इस किशोरी को विवाह के बाद दिल्ली के एम्स अस्पताल के क्वार्टरों में रहने की जगह मिली, क्योंकि पति डॉक्टर थे। यहां प्रियतम की ओर से उन्हें मॉडर्न बनाने की तंज-भरी कोशिश की गई, जिसने लेखिका के जीवन में पहला उलझाव पैदा किया। वे पीएचडी करना चाहती थीं, पर हर नाजायज तरीके से इसे रोक दिया गया। बाद में इस डॉक्टरी परिवेश से शालीनता और नैतिकता की जो अधजली लाशें निकलीं, उनकी चिरांयध से त्रस्त अपनी उस समय की मानसिकता के बारे में मैत्रेयी पुष्पा बताती हैं, 'शायद इसलिए ही मेरे आसपास ड्राइंगरूमों में, बरामदों में और सामने वाले लॉन में मुश्किल हालातों की ऐसी बेकसी पैदा हुई है कि मुझे इस माहौल से नफरत होने लगी है। तुमसे भला-बुरा कह कर मैं इस नतीजे पर पहुंची हूं कि इस कैम्पस का कोई न कोई घर बलात्कार का सुरक्षित कोना छिपाए हुआ है। अस्पताल के एकेडेमिक विभाग भी औरतों के लिए बिस्तर तैयार किए हुए हैं और हमारे पुरुषों को ऐसी बातें पचाने की आदत पड़ गई है।' (73) इसी खर माहौल में लेखिका की मुलाकात इल्माना नाम की प्रखर स्त्री से हुई - उन मुखौटों की कड़ी में इक कोई चेहरा तो था --, जिसने उसे झकझोर दिया -- 'मैंने इल्माना के दायरों में बंधने की बात पूरे मन से स्वीकार कर ली कि उनके विचारों को पूरी तरह ग्रहण करूंगी, जो असलियत में मेरे ही विचार हैं। मैं धीरे-धीरे उन विचारों के विकास और जिंदगी के बदलाव की ओर बढ़ सकूंगी।' (76) तभी पति शाप देता है : 'ठीक है, चलो तुम उसी के कहने पर। एक दिन भग जाना किसी बदमाश के साथ।' (75) आगे के पन्ने बताते हैं कि यह एक नाराज बल्लेबाज का ओपेनिंग शॉट था। इसके कुछ ही दिनों बाद हमें डॉक्टर साहब की महानता का सबूत मिलता है। जब मैत्रेयी ने एक के बाद एक तीन लड़कियों को जन्म दिया, तो उनकी वही गति हुई जो आम तौर पर ऐसी स्त्रियों की होती है। गांव जाने पर उन्हें पता चला कि डॉक्टर साहब की वंश परंपरा को बचाने के लिए उनकी दूसरी शादी की सामूहिक तैयारी चल रही है। पहला विरोध लेखिका की मां की ओर से आया और निर्णायक प्रतिवाद डॉक्टर साहब की ओर से --'यार, तुम्हारा गांव है यह? मूर्खों का झुंड।' (103) यह एकमात्र मौका था, जब मैत्रेयी को उनके प्यारे गांव ने हक्का-बक्का कर दिया। इसके बाद अवसाद तेजी से हहराता हुआ आया उस रेतीले ढूह पर, जहां मैत्रेयी अवसन्न खड़ी थीं। अगर हताशा के उस माहौल में उनकी बेटियों, नम्रता और मोहिता, ने उनका हाथ पकड़ कर उन्हें न उठाया होता और लिखने की सबल प्रेरणा न दी होती, तो शायद हम एक अनोखी लेखिका से वंचित हो जाते। आगे चकराहटें और थीं, लेकिन हिन्दी के पुरुष, खासकर प्रौढ़, संपादकों की यौन तृष्णाओं से जो परिचित हैं, उनके लिए ये किस्से नए नहीं हैं कि किस संपादक या सह-संपादक ने उन्हें किस-किस तरह नचाया। हर किसी को उनमें दिलचस्पी थी -- पहाड़ी संपादकों को भी और गैरपहाड़ियों को भी --, पर माइनस उनकी कहानियों के। गलाजत के इन्हीं कुलियों में से एक ने मैत्रेयी पुष्पा की पहली कहानी छापी और साहित्य जगत का वीसा दिया। लेकिन अपेक्षित प्रतिदान के अभाव में उन्होंने जल्द ही अपना 'रेशमी अंगवस्त्र' खींच लिया और उदीयमान लेखिका की महत्वाकांक्षाएं मुंह के बल गिर पड़ीं। इस विकट घड़ी में एक सज्जन संपादक ने उनकी कहानियां लगातार छाप कर उन्हें उनकी रचनाशीलता के प्रति आश्वस्त किया। फिर क्या था -- सामने विस्तृत मैदान था और बेतहाशा दौड़ते हुए दो छोटे-छोटे मुलायम पैर। अतीत ने लेखिका को जितना रुलाया था, भविष्य उतना ही उदार निकला, हालांकि यहां भी चक्रवातों की कमी नहीं थी। इसके बाद दो मुख्य प्रसंग ये हैं कि 'हंस' के संपादक राजेंद्र यादव ने प्रारंभिक उपेक्षा के बाद कैसे मैत्रेयी पुष्पा के लेखन के विकसित करने में सहयोग दिया और कैसे कदम-कदम पर डॉक्टर साहब इस आगंतुक की और उससे मैत्रेयी के बढ़ते हुए सामीप्य की धज्जियां उड़ाते रहे। मेरा खयाल है कि हिन्दी के जिज्ञासु पाठक-पाठिकाएं इन प्रसंगों को ज्यादा रस ले कर पढ़ेंगे। खुर्दबीन लगा कर यह खोजने की कोशिश तो की ही जाएगी कि मैत्रेयी कहां-कहां फिसली हैं और राजेंद्र यादव ने कहां-कहां दबाने की कोशिश की है। ऐसे सभी जासूसों को 'और अंत में निराशा' हाथ लगना निश्चित है। कौन अपराधी अपनी आत्मस्वीकृतियां बिखेरता फिरता हैे। मैत्रेयी पर यह आरोप लगना ही लगना है कि राजेंद्र यादव प्रसंग में उन्होंने जितना बताया है, उससे अधिक छिपाया है। प्रश्न यह है कि दो व्यक्तियों के, खासकर जब वे स्त्री-पुरुष हों, संबंधों की छानबीन की ही क्यों जाए। ये न तो जोधा-अकबर हैं और न ही नेहरू-एडविना। इस छानबीन से न तो यह सिद्ध किया जा सकता है कि राजेंद्र यादव बुरे संपादक हैं और न ही यह कि मैत्रेयी पुष्पा कमजोर लेखिका हैं। बेशक राजेंद्र यादव ने मैत्रेयी का भरपूर मार्गदर्शन किया, लेकिन यह तो हर संपादक का फर्ज है कि वह नई प्रतिभाओं को खोजे और उन पर सान चढ़ाए। 'हंस' के संपादक ने और भी कई प्रतिभाओं को उभारने की कोशिश की है, पर कोई कितना भी बड़ा संपादक हो, वह टट्टू को घोड़ा नहीं बना सकता। दूसरी तरफ मैत्रेयी पुष्पा ने एक ही रचना के दस-दस ड्राफ्ट लिखे, तब जा कर उनमें चमक आई। राजेंद्र यादव ने मैत्रेयी से अपने संबंध को सखा-सखी भाव की संज्ञा दी है --'रही बात मेरे और तुम्हारे संबंध की, बहुत सोचा अपने रिश्ते को क्या नाम दूं? क्या हम आपस में ऐसे ही नहीं, जैसे कृष्ण और द्रौपदी रहे होंगे ? बहुत आत्मीयता, बहुत भरोसा और सेक्स का लेशमात्र भी xɽþÓ…' (341) राजेंद्र यादव ने अपनी जैसी धज बना रखी है, उसके मद्दे-नजर यह लग सकता है कि शैतान बाइबल के उद्धरण दे रहा है। लेकिन हमें क्या हक है-- और गरज भी -- कि हम किसी की नीयत पर शक करें? इसकी शिकायत अगर किसी को होनी चाहिए थी, तो वे स्वयं मैत्रेयी है। पर उन्होंने भी अपने रिश्ते को कुछ इसी तरह परिभाषित किया है। बंद कमरे में डॉक्टर साहब किसी चोट खाई हुई पत्नी की तरह पूछते हैं -- 'कसम खाती हो, उनसे तुम्हारा यही रिश्ता है?' मैत्रेयी का मरदाना जवाब गोली की जरह दनदनाता है -- 'गंगाजली उठाऊं और कोई विश्वास भी करे, ऐसी मुझे दरकार नहीं।' (302)मेरी चिंताएं दो हैं। लेखिका ने अपने पति का जो चरित्र-चित्रण किया है, क्या वह जरूरी था? इस पूरी कहानी में मैत्रेयी गुड़िया या गुड़िया के भीतर गुड़िया की तरह प्रस्तुत नहीं होतीं, पर डॉक्टर साहब खासे जल्लाद नजर आते हैं, अगरचे वे मैत्रेयी की भावनाओं का सम्मान करते हुए जगह-जगह झुकते भी हैं। अंत में तो लगता है कि उनका हृदय परिवर्तन हो गया है। पति के साथ घटित अंतरंग प्रसंगों को लिखने का एक ही औचित्य हो सकता है कि उससे कुछ बड़े मूल्य उभरें। गुड़िया भीतर गुड़िया में ऐसा होता है। फिर भी मेरा कशमकश ज्यों का त्यों है। चिंता का दूसरा विषय लेखिका का यह जीवन दर्शन है --'जिंदगी जो थी तन और मन से घिरी हुई। मेरे लिए उसको दो भागों में बांट कर देखना कठिन था। जब शरीर और मन को काट कर देखने की बात होती, मैं बहुत उदास और खिन्न हो जाती।' (320) इसके पहले वे अपने कहानी संग्रह 'गोमा हंसती है' (1998) की भूमिका में यह घोषणा कर चुकी हैं -- 'हमारा मन जो कहता है, पांव जहां ले चलते हैं, इंद्रियां जिस सुख की आकांक्षा करती हैं, मनुष्य होने के नाते वे हमारे कुविचार-कुचेष्टाएं नहीं, जन्मसिद्ध अधिकार हैं।'(10) यह सीधे-सीधे विवाह संस्था को विदा करने की मांग है। मैं इस मांग से पूरी तरह सहमत हूं, पर इसके लिए बहुत सारे पहलुओं पर विचार करना होगा। इनमें सबसे अहम पहलू है, निजी संपत्ति का भविष्य। गुड़िया भीतर गुड़िया का सारभूत निष्कर्ष भी यही है -- स्त्री पुरुष समाज की निजी संपत्ति है। लेखिका ने अगर तन-मन-कर्म से इस रूढ़ि का प्रतिवाद करने का जोखिम नहीं उठाया होता, तो यह सर्वथा पठनीय पुस्तक लिखी ही न जाती। 000

कागज के टुकड़े पर लिखी एक बेनाम आत्मकथा


स्कॉटलैंड के डुंडी इलाके के एक छोटे से अस्पताल में एक बूढ़ी औरत की मौत हो गई। उसका कोई नाते-रिश्तेदार पास नहीं था। नर्सों ने जब उसके छोटे से झोले को खंगाला तो उन्हें एक कागज के टुकड़े पर लिखी यह कविता मिली। दिल को छू लेने वाली इन पंक्तियों की कई प्रतियां बनाकर अस्पताल में बांटी गई। बाद में नॉर्थ आयरलैंड एसोसिएशन ऑफ मेंटल हेल्थ की पत्रिका के क्रिसमस अंक में ये छपी। इस बुढ़िया ने समय की रेत पर निशान गहरे छोड़े हैं। इस गुमनाम महिला की वही कविता अब दुनियाभर में इंटरनेट के जरिए पढ़ी और सराही जा रही है।


An Old Lady's Poem



What do you see, nurses,
what do you see?
What are you thinking
when you're looking at me?

A crabby old woman,
not very wise,
Uncertain of habit,
with faraway eyes?

Who dribbles her food
and makes no reply
When you say in a loud voice,
"I do wish you'd try!"

Who seems not to notice
the things that you do,
And forever is losing a
stocking or shoe...

Who, resisting or not,
lets you do as you will,
With bathing and
feeding, the long day to fill...

Is that what you're thinking?
Is that what you see?
Then open your eyes, nurse:
you're not looking at me.

I'll tell you who I am
as I sit here so still,
As I do at your bidding,
as I eat at your will.

I'm a small child of ten...
with a father and mother,
Brothers and sisters,
who love one another.

A young girl of sixteen,
with wings on her feet,
Dreaming that soon now
a lover she'll meet.

A bride soon at twenty...
my heart gives a leap,
Remembering the vows
that I promised to keep.

At twenty-five now,
I have young of my own,
Who need me to guide,
and a secure happy home.

A woman of thirty,
my young now grown fast,
Bound to each other with
ties that should last.

At forty, my young sons
have grown and are gone,
But my husband's beside me
to see I don't mourn.

At fifty once more,
babies play round my knee,
Again we know children,
my loved one and me.

Dark days are upon me,
my husband is dead;
I look at the future,
I shudder with dread.

For my young are all rearing
young of their own,
And I think of the years
and the love that I've known.

I'm now an old woman...
and nature is cruel;
'Tis jest to make old age
look like a fool.

The body, it crumbles,
grace and vigor depart,
There is now a stone
where I once had a heart.

But inside this old carcass
a young girl still dwells,
And now and again
my battered heart swells.

I remember the joys,
I remember the pain,
And I'm loving and living
life over again.

I think of the years...
all too few, gone too fast,
And accept the stark fact
that nothing can last.

So open your eyes,
nurses, open and see,
Not a crabby old woman;
look closer...see ME!!

Wednesday, April 16, 2008

quid pro quo

एक पुरुष सहकर्मी द्वारा एक दिन मिली टिप्पणी -"मैडम आज तो आप गज़ब ढा रही हैं ,पर आपका कुर्ता कुछ ज़्यादा ही छोटा है ,है न ! ठीक है पर थोड़ा लम्बा होता तो ....अच्छा रहता " एक बारगी समझ नही आया कि क्या कहूँ ....मुस्करा कर निकल गयी ।2 मिनट बाद पलटी यह सोच कर कि थप्पड़ क्यो न जड़ दूँ मुँह पर ।लेकिन देर हो गयी थी ,वह जा चुका था ।लिखित कम्प्लेंट की । ऑफिस में हल्ला हो गया । वह अन्य पुरुष साथियों से मिलकर दबाव बनाने लगा ।घर पर फोन आने लगे । पीछे न हटने पर अखबार में मित्रता कॉलम मे नम्बर प्रकाशित करवा दिया गया और फिर क्या था ....फोन पर फोन !ऑफिस में महिला कर्मचारी मिल गयीं ।लेकिन कब तक ।उन्हें भी धमकाया गया । ऑफिस के मर्दों द्वारा नही ,घर के मर्दों द्वारा -"खबरदार !जो इस पचड़े मे तुम पड़ीं !समाज-सुधार नहीं करना !अपना घर देखो । कल को तुम्हारे साथ कुछ हो गया तो कौन निबटेगा ? वो भी पागल है !चुपचाप चली जाती !छोटी सी बात पर कम्प्लेंट करने की क्या ज़रूरत थी । नौकरी करो चुपचाप ।घर थोड़े ही बसाना है वहाँ ।" और वे सब अपना घर देखने लगीं । क्या करतीं ? इतनी सी बात पर तलाक ले लेतीं ?बच्चे उनका क्या होता ? उसे न्याय मिल जाता पर हमारा घर तो खराब हो जाता !- अब वह अकेली थी !महिला मित्र समझाती रहीं । केस वापिस ले लो । अब चरित्र पर वार करेंगे वे लोग । ये ऐसी ही है। खुद ही उलझती है मर्दों से ।जीना मुश्किल हो जायेगा । ये तो खाली हैं ,इनके घर तो बीवियाँ सम्भाल रही हैं ।कोई टेंशन तो है नही । अपनी बीवियों को घर की बच्चों की ज़िम्मेदारियाँ थमा कर यहाँ पॉलिटिक्स करते हैं ,करियर बनाते हैं,बदनाम करते हैं ,नाम कमाते हैं ,परेशान करते हैं !तुम ये सब कर सकोगी ? बच्चों पर क्या असर होगा ?रोज़-रोज़ घर में तमाशा देखेंगे !झगड़े देखोगी या घर वालों को खाना खिलाओगी ? सब अस्त व्यस्त हो जायेगा । बेकार के काम में अपनी एनर्जी न लगाओ ! अब भी वक़्त है !
लेकिन ..

एफ आई आर दर्ज करवा दी गयी ।

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काल्पनिक कहानी नही है यह । एक करीबी मित्र की है ।
अनाहिता मोसानी की भी यही कहानी है । और न जाने कितनों की की है जो चुप रह जाती हैं या छोड़ जाती हैं क्योंकि इन मोर्चों पर लडाई हमेह्सा अकेली होती है और अंजाम तक आते आते भारी कीमत वसूल लेती है ।आज स्वप्न्दर्शी जी ने उन्मुक्त जी की यह पोस्ट देखने को कहा तो तुरंत दिमाग मे सारा अतीत कौन्ध गया ।उस केस का आज भी कुछ नही हुआ । वह आज भी बड़े मज़े से ऑफिस में घूमता है ।और वह आज भी वहीं काम करती है,बिन्दास! लेकिन आज भी वह जब तब मौके की तलाश मे होता है ,अपमान का बदला लेने के लिए ।
विशाखा के केस में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय एक ऐतिहासिक निर्णय था ।जिसके बारे मे बहुत कुछ उन्मुक्त जी ने बताया ।इसके लिए उनका आभार । इस उम्मीद के साथ कि वे आगे भी इसे जारी रखेंगे हम केवल कुछ महत्वपूर्ण बातें रेखांकित करना चाहते हैं ।सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद भी आज इस तरह की बातें छुपाई जाती हैं जिसमें ज़्यादातर सामाजिक मर्यादा और परिवार वालों का दबाव ही काम करता है ।आखिर इस सेक्शुअल हरास मेंट मे क्या क्या बातें आती हैं ..सुप्रीम कोर्ट के अनुसार -:
1- Physical contact and advances
2- A demand or request for sexual favor,
3- Sexually colored remarks
4- Showing pornography
5- Any other unwelcome physical, verbal or non- verbal conduct of sexual nature. इसमें पाँचवा बिन्दु अत्यंत महत्वपूर्ण है । ऊपर उद्धृत केस में यही कारण था जिसे हम “चलता है यार ! या जाने दो !” की श्रेणी मे रखते हैं । और ज़्यादातर इसे ही अनदेखा किया जाता है ।
इसके अलावा है quid pro quo { this for that } यानी इसके बदले में वो ,यानी सेक्सुअल फेवर्स के बदले में प्रमोशन अन्यथा बर्खास्तगी ।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार हर ऑफिस ,संस्थान में शिकायत कमेटी में 50% महिलाओं के होने से इस तरह की शिकायतों पर कारगर तरीके से कदम उठाया जा सकेगा इसलिए आज अधिकांश संस्थानों ,कॉर्पोरेट दफतरों ,सरकारी महकमों मे इस तरह की शिकायत समितियाँ गठित की गयी हैं ।

कुछ रेयर केसिज़ को छोड़ दिया जाए महिलाएँ सच में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकार होती हैं और इस या उस कारण से वे चुप रहती हैं या सबसे बेहतर लगता है नौकरी छोड़ देना । लेकिन जब नौकरी करते रहना मजबूरी हो तो चुप रहना ही समाधान लगता है । ऊपर के उदाहरण में आपने देखा कि उसके साथ कोई खड़ा नही होता जो महिला ऐसी शिकायत करती है और बहुत से उदाहरणो मे स्वयम पति भी पीछे हटने की सलाह देता है ।
किसी महिला सथी के लिए अपमान जनक कार्य स्थितियाँ बनाना ,गन्दे चुटकुले सुनाना ,लगातार घूरना या सर से पाँव तक घूरना ,शारीरिक आकृति –पहनावे –अपियरेंस पर टिप्पणी करना ऐसी अनेक उदाहरण हैं जिन्हें लिस्ट करने बैठे तो बहुत लम्बी सूची बन जायेगी ।
यौन उतपीड़न पुरुष या स्त्री दोनो का हो सकता है ।लेकिन स्त्री द्वारा यौन उत्पीड़न जहाँ रेयर है वहीं केवल उस स्थिति में होता है जब स्त्री पुरुष से ज़्यादा बड़े ओहदे पर हो ,कमांडिंग पोज़ीशन मे हो ।जबकि भारतीय परिस्थितियों में न तो ज़्यादातर स्त्रियाँ ऊंचे ओहदो पर है न ही कमांडिंग पोज़्र्र्शन में और पुरुष द्वारा स्त्री सहकर्मी और सबॉर्डिनेट का यौन उत्पीड़न कहीं अधिक है , व्यापक है और उसका प्रभाव भी उत्पीड़ित स्त्री पर उत्पीड़ित पुरुष से कहीं अधिक पड़ता है । {मैं कल्पना करना चाहती हूँ कि किसी स्त्री द्वारा अपने पुरुष सहकर्मी को यह बोला गया होता –“आप तो आज गज़ब ढा रहे हैं ”इसका क्या वही असर होता जो एक स्त्री कर्मी पर हुआ ? }
ऐसे में मुझे उन्मुक्त जी के यहाँ यौन उत्पीड़न पर आयी पोस्ट की कुछ टिप्पणियाँ उद्धृत करना ज़रूरी लग रहा है क्योंकि वे मुझे लगातार हैरान कर रही हैं ।


ललित said...
कटु सत्य है कि आजकल इस कानून का दुरुपयोग करके कई महिलाओं कर्मचारियों द्वारा अपने सहकर्मियों/अधिकारियों पर झूठे आरोप के मामले लगाकर उनका जीवन बर्बाद कर दिया जा रहा है। अब तो महिलाएँ ही पुरुषों से छेड़छाड़ से लेकर.... तक अनेक प्रकार के अत्याचार कर रही हैं।
5:59 PM
बोधिसत्व said...
मेरा मानना है कि बिना आंशिक सहमति के छेड़छाड़ की कोशिश को कर ही नहीं सकता। वो सहमति भले ही दबाव से बनी हो।
आप की प्रस्तुति अच्छी है।
11:28 PM
BLAST TIMES said...
मेरी राय में छेड़छाड़ के बारे में महिला की मूकदर्षिता या छेड्ख़ानी के लिये पुरूष को प्रेरित करने का व्यवहार,पहनावा या बातचीत का लहजा अधिक जिम्मेदार है। आपका लेख हकीकत बयां कर रहा है।

swapandarshi said...
apakaa bahut dhanyavaad is post ke liye.
@bodhi (I do not know from where this enlightenment came to you?). and other who
share similar opinion!!!
The sexual haraasment at workplace has deep roots in male psyche, in the social structure which is aggressive against women and sometimes that is the only way to put down a women competitor, when she is outstanding in her profession or work.
We are still a savage society which puts blame on the victim and provides sympathy to the culprit, and even deny the recognition of the problems. More so because the crime against women are so wide spread. and now the violence against women is a collective efforts, in all fronts?
3:11 PM


स्त्री द्वारा यौन उत्पीड़न कितनी आबादी का सच है ?छेड़खानी के लिए पुरुष को प्रेरित करने का मायना क्या है ? आंशिक सहमति क्या है ?कौन सा बातचीत का लहज़ा जो पढे-लिखे समझ दार पुरुष को एक नालायकी करने को मजबूर करता है ?दोषारोपण की प्रवृत्ति से क्या वे बच जायेंगे जो किसी भी स्त्री द्वारा प्रलोभन दिये जाने पर या मित्रवत व्यवहार करने पर इसे फ्लर्टिंग का निमंत्रण मान लेते हैं । हाथ मिलाया ,मुस्कराई --ओह she is available ...!! और अपनी नैतिकता भूल कर मज़े लेने लगो ...और बाद मे अनैतिक कपड़ो और व्यवहार को दोषी ठहराओ ।
क्या इस गली -सड़ी बातों से कोई भी हल होने वाला है ?अभी तक तो हम इसी बात पर हैरान हैं कि स्त्री के लेखन में एक पुरुष में क्यों कुछ सेंसुअस पाने की कुत्सित चाह है,भारत भारद्वाज का लेख उदाहरण है
quid pro qou के मायने "जैसे को तैसा भी हैं " ; क्या उत्पीड़ित स्त्री यह कर पायेगी ?

Sunday, April 13, 2008

एक शादी ऐसी भी

मेरी पोस्ट -शादी या तमाशा- पर जो टिप्प्णियाँ आईं, उनमें उठाए गए मुद्दों को लेकर यह पोस्ट लिख रही हूँ।
२७ जून २००५... आज नेहा की शादी का दिन है। सुबह ड्राइंगरूम का सब फ़र्नीचर किनारे लगा कर कुछ चादरें बिछा दी गईं। नेहा के पिता एक फूल वाले को बुला लाए किसने गेंदे के फूलों की झालरें दीवारों पर सजा दीं। नेहा ने एक हरे रंग की साड़ी और कुछ हल्के गहने पहने। बस, हो गई शादी की तैयारी पूरी।
दस बजे राम कृष्ण मिशन के पंडितजी पूजा का सामान लेकर आ गए और वेदी सजाने में व्यस्त हो गए। ग्यारह बजे बारात आ गई-बारात, यानी दूल्हा विक्रम और उसके माता पिता श्री और श्रीमती अग्रवाल, जिन्हें विक्रम स्वयं कार चला कर ले आया था। बारात का स्वागत किया केवल नेहा के माता-पिता, उसके भाई- भाभी और साल भर की नन्ही भतीजी ने। हल्के जलपान के बाद सब लोग वेदी के चारों ओर बैठ गए और शादी का कार्यक्रम शुरू हो गया। एक बजे शादी समाप्त हुई। शादी में दोनों परिवारों को छोड़ कर कोई शामिल नही हुआ, एक फोटोग्राफ़र तक नहीं। शादी के दौरान तस्वीरें घर के सदस्यों ने अपने कैमरे से खींची। सबके भोजन के बाद नेहा का सूटकेस विक्रम की गाड़ी में रख दिया गया और दुल्हन विदा हो गई। शादी इसी तरह हो, ऐसा प्रबल आग्रह नेहा और विक्रम का था जिसे उनके माता-पिता ने माना। शादी में कोई लेन देन नहीं हुआ।
नेहा मेरी बेटी है। मैंने यह विवरण इसलिए लिखा ताकि यह बता सकूं कि मेरे विचार सिर्फ़ कागज़ी नहीं हैं जैसा कुछ लोग समझ रहे हैं। मेरी अपनी बेटी की शादी निहायत सादगी से हुई है। इसलिए स्वप्नदर्शी की टिप्पणी मुझे बहुत भली लगी। स्वप्नदर्शी के अनुसार उनके घर के दोनों विवाह इस तरह से हो सके क्योंकि वर वधू दोनों ऐसा चाहते थे। ऐसा ही मेरे घर में भी हुआ। नेहा और विक्रम बहुत से लोगों( करीबी रिश्तेदार, नाना-नानी, ताऊ, मामा, बुआ, मौसी, चचेरे-ममेरे भाई बहन आदि) की नाराज़गी के बाद भी यदि अपनी बात पर दृढ नहीं बने रहते, तो उनकी शादी इस तरह से नहीं हो पाती। यह सब उदाहरण सुनील दीपक की राय को सही सिद्ध करते हैं । बदलाव लाने के लिए युवा वर्ग की सोच में बदलाव आना ज़रूरी है।
गगन शेखर सवाल उठा रहे हैं कि मैंने अपनी भतीजी के जीवन को सुधारने के लिये उसके जन्म से लेकर अबतक क्यों कुछ नहीं किया। गगन जी, जन्म से लेकर सत्रह वर्ष तक उसके पालन पोषण में भाई ने कोई कमी नहीं उठा रखी थी। समस्या उसके बाद शुरू हुई। बच्ची का भला चाहने वाले घर के जो भी सदस्य थे, उनकी राय के बावज़ूद वह बेटी को अपने छोटे शहर के बाहर किसी छात्रावास में रह कर कोई व्यावसायिक कोर्स कराने के लिए तैयार नहीं हुए। लिहाज़ा लड़की बिना किसी विशेष लक्ष्य के पढ़ती चली गई और कोई ढंग का रोज़गार पाने में सफ़ल नहीं हुई। उसके विवाह के समय जब भाई दहेज की भारी मांग के चलते योग्य वर नहीं जुटा पा रहे थे, तब हमलोगों ने उन्हें बिरादरी के बाहर के योग्य वर सुझाए जो दहेज मुक्त विवाह करना चाहते थे, पर वह उन पर विचार करने के लिए भी नहीं माने। माना वह बच्ची घर की है, घर के सब सदस्यों को पर उसके जीवन को संवारने का दायित्व है, पर उसके भविष्य को लेकर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार तो उसके माता पिता का ही है। नहीं होता, तो क्या मेरे पति और मैं अपने-अपने परिवारों के कडे़ विरोध के बाद भी नेहा की शादी इतने संक्षेप में कर सकते थे?
रचना इस विवाह में मेरे शामिल होने को गलत मान रही हैं। समस्या इतनी सीधी सादी नहीं है। जो भाई मेरे जीवन के हर सुख दुख में अपनी हर परेशानी को अलग रख कर मेरे साथ खड़े रहे हैं, उनसे इस बात पर मैं अलग तो नहीं हो सकती। एक दूसरे से घोर असहमति के बावज़ूद एक परिवार के रूप में हम एक दूसरे से जुडे हैं। वह न मेरी बेटी के अंतर्जातीय विवाह से तनिक भी सहमत थे, न उसके विवाह के अति संक्षिप्त तरीके से, फ़िर भी वह विवाह के पश्चात मेरी बेटी दामाद से मिलने आए और उन्होंने नव वर-वधू को हृदय से आशीर्वाद दिया। अब यह करने की बारी मेरी है। हाँ, दिनेश राय द्विवेदी और चंद्र भूषण जी के सुझाव के अनुसार समाज की इन कुरीतियों को दूर करने के लिये कोई समूह बने तो उसका भाग ज़रूर होना चाहूंगी। मैं अकेले विरोध करके ’अकेला चना भाड़ नहीं फोड सकता-’ इस कहावत को ही सिद्ध करूंगी।
स्वप्नदर्शी का यह कहना भी ठीक है कि ऐसे मामलों में केवल वर पक्ष को दोष देना उचित नहीं है, कई बार लड़की का पिता बेतहाशा खर्च करके अपनी सामाजिक साख बनाने का प्रयास करता है। ऐसे खर्च करके वह यह भी मान बैठता है के उसने बेटी के प्रति अपनी सब ज़िम्मेदारी पूरी कर दी और अब उसे बेटी को उत्तराधिकार में कुछ देने की ज़रूरत नहीं। साख अपनी बढ़ाई, बेटी के नाम कुछ किया नहीं और मान लिया कि बेटी को उसका हिस्सा मिल गया, अब जो कुछ पास है, बेटों का ही उसपर हक है। अजीब बात लगती है न? पर ऐसा सोचने वाले न जाने कितने माता पिता हमारे आस-पास ही हैं।
यायावर जी की समस्या क्या है, समझ में नही आया। उन्हें ब्लाग पर अपनी बात लिखने वाले लोगों से इस कदर शिकायत क्यों है, जबकि हमारा देश एक गणतंत्र है जहाँ हर किसी को अपनी बात कहने का पूरा हक है। उन्हें यह भी लगता है के ब्लागर सिर्फ़ महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातें कर रहे हैं, कोई कुछ ठोस करना नहीं चाहता। यायावर जी, विचार-विमर्श करना किसी भी कदम उठाने की पहली सीढ़ी है। यह आशा करना कि हर ब्लागर झटपट सोशल एक्टिविस्ट बन जाए, अव्यवहारिक है। ब्लाग के ज़रिए लोग अपनी तरह सोचने वाले लोगों के संपर्क में आते हैं और मिल जुल कर कुछ करने की सोच तो सकते हैं। महिला ब्लागरों के बारे में उनकी राय सबसे दिलचस्प है। उनका खयाल है कि ब्लाग लेखन अमीर महिलाओं के लिये किट्टी पार्टी के बाद का अगला टाइम पास है। जानना चाहूंगी कि इस निर्णय पर वह कैसे पहुँचे कि सब ब्लागर लेखिकाएं अमीर हैं। एक ओर वह उन्हें निहायत अमीर घोषित करते हैं, और दूसरी ओर उन पर इल्ज़ाम लगाते हैं कि वह ब्लागिंग करने का उनका एकमात्र उद्देश्य इसके ज़रिए कमाई करना है। यह विरोधाभास समझ में नहीं आया। खैर...
सभी पाठकों का आभार..

Saturday, April 12, 2008

और इस बहाने बेटी को जायदाद से बेदखल किया जाता है....

शादी या तमाशा पर स्वप्नदर्शी जी का कमेंट एक सबसे ज़रूरी बात जो इस पोस्ट में छिपी थी उसे उठा रहा है .....बाकी सब ने यहाँ वहाँ की हर बात कह दी ,किट्टी पार्टी वाली औरतों की धिक्कार से लेकर न जाने क्या क्या ......क्या गहराई मे छिपी इस बात की ओर ध्यान गया किसी का ....कंटेंट विश्लेषण की बजाय हम सब को व्यक्ति विश्लेषण की आदत जो है .।

पढिये इसे ...यह वाकई विचारणीय है .....

खैर आज से नही, जब से होश सम्भाला है, मेने किसी ऐसी शादी मे शिरकत नही की, जो धूम-धाम वाली, दहेज वाली हो.
मेरा हमेशा से आग्रह रहा है कि शादी दो तीन धंटे मे दिन के समय हो जानी चाहिये और बहुत मामूली खर्च के साथ, पर फिर भी तनावमुक्त और मज़े के लिये जगह होनी चाहिये.

अपनी शादी मे मुझे और मेरे पति को इस ढंग़ से करने के लिये, अपने परिवार जनो को एक साल तक समझाना पडा.

अन्तत: हमारी एक रविवार को, दोपहर 12-3 के बीच शादी हुयी, और सिर्फ 12 दोस्त, और एक जज के सामने. दोस्तो पर कुछ न कुछ खाना बना कर लाने का भार था. और हिन्दुस्तानी थीम की पौशाक पहनने का.

पिछ्ले साल भाई की शादी के लिये पिताजी ने हलवाई, पंडाल आदि का इंतेज़ाम किया था, पर मेरे भाई ने सब कैंसिल करवा दिया. सो घर मे जितने यार-दोस्त, नाते-रिश्तेदार आये सब ने मिलकर 100 लोगों का खाना बनाया, और इतना अच्छा कि शायद ही किसी बारात मे मिले.
उसके साथ्, रात भर गाना-बजाना चलता रहा, और 5-70 साल वाले सभी लोगों ने धमाल किया.

कम से कम दस बार हाथ जोड्कर भाभी के पिता को समझाना पडा कि वो कुछ न दे, हमारे घर मे रखने की जगह नही है. पर किसी किस्म की कमी भी नही है.

ये सभी चीज़े हो सकती है,

सिर्फ वर-पक्ष पर दोष ठीक नही है, वधू के पिता को भी अपनी समाजिक साख बनाने की बहुत उतावला पन होता है.

दूसरा पक्ष ये भी है, कि दिखावे की शादी करने के बाद, बेटी का बाप, अपने अपराधो का सामाजिक प्रायश्चित करता है. उन पापो का, जो उसने अपनी बेटी के पालान मे दोगलेपन का किया. और इस बहाने अपनी जायदाद के बडे हिस्से से बेटी को बेदखल करता है.

Friday, April 11, 2008

शादी या तमाशा

आज सुबह माँ से बात हुई तो पता चला कि मेरी एक भतीजी की शादी तय हो गई है और दस दिन बाद उसकी गोद भराई की रस्म है। लड़का एक बहु राष्ट्रीय कंपनी में अफ़सर है। मेरे भाई एक डिग्री कालेज में रीडर हैं और मेरी भतीजी एम एस सी पास है। विवाह अगले नवंबर में होगा।
यहाँ तक तो खुशी की बात थी । पर इसके आगे की बात सुन कर मैं सोच में पड़ गई। गोद भराई की रस्म में दूसरे शहर से पच्चीस लोग आ रहे हैं, जिनके ठहरने, खाने-पीने, स्वागत सत्कार और विदाई के उपहार का ’डीसेंट’ इंतज़ाम करना है। यह भी आग्रह है कि लड़के को तनिष्क की ही हीरे की अंगूठी पहनाई जाए ("यदि आप इंतज़ाम न कर सकें तो हमें बता दें, हम साथ ले आएंगे, आप सिर्फ़ बिल चुका दीजिएगा")। गोद भराई की वेन्यू स्टैंडर्ड की होनी चाहिये नहीं तो उनके रिश्तेदार क्या कहेंगे? उनके घर के पहले लड़के की शादी है इसलिए पूरा परिवार लड़की से मिलना चाहता है, कोई नवंबर तक रुकने को तैयार नहीं, सो सबको लाना पड़ रहा है- यह सब जता दिया गया है।
मैं भाई के माथे पर पड़ती चिंता की रेखाओं की कल्पना कर रही हूँ। अध्यापक आदमी, वेतन ही कितना मिलता है। किसान पिता कुछ छोड कर नहीं गए थे सो मकान का इंतज़ाम, दो ब़च्चों की शिक्षा सब इसी नौकरी के भरोसे किया। खींच तान कर बेटी की शादी के लिए कुछ पैसे जोड़े थे, उसमें से आधे तो गोद भराई के समारोह में खर्च हो जाएंगे। शादी में क्या होगा? उस समय और चीज़ों के साथ कार की माँग भी है। बुढा़पे के लिए जो प्राविडेंट फ़ंड जोड़ा था, उसमें से निकालेंगे, काफ़ी कुछ उधार भी लेना पडे़गा। लड़की सत्ताइस साल की हो गई है, वह किसी भी कीमत पर हाथ आए रिश्ते को जाने नहीं दे सकते।
मुझे विवाह के विशाल आयोजन की रोज़ रोज़ बढ़ती इस प्रथा पर ही कोफ़्त होती है। पहले सिर्फ़ विवाह बड़ा समारोह होता था। सगाई और संगीत नितांत घरेलू मामले होते थे जिनमें गिने चुने मेहमानों को घर में ही बना चाय नाश्ता करा दिया जाता था। अब यह दोनों भी बडे़ समारोह बन गए हैं जिनके लिए हाल बुक करना होता है, सजावट होती है, डी जे बुलाया जाता है,केटरिंग कराई जाती है। पहले सोने के गहने काफ़ी होते थे, अब हीरों के सेट के बिना दहेज पूरा नहीं माना जाता। रोज़ रोज़ हमें बताया जो जा रहा है कि Diamonds are a girl's best friends. जीते जागते लोग नहीं, हीरे आपके सच्चे दोस्त हैं। शादी के नाम पर एक पूरी इंड्स्ट्री चालू हो गई है। पत्रिकाएं विवाह विशेषांक छापती हैं जिसमें पैसे खर्च करने के एक हज़ार तरीके सुझाए जाते हैं। जिनके पास पैसा है, वह शादी में बेतहाशा खर्च करना एक स्टेटस सिंबल समझते हैं। जिनके पास नहीं है, वह उनकी नकल में बूते से ज़्यादा खर्च करते हैं, चाहे इसके लिए उन्हें घर गिरवी रख कर कर्ज़ ही क्यों न लेना पडे़। शादी एक संस्कार न रह कर एक तमाशा बन कर रह गई है।
मुझे आज के युवा वर्ग पर आश्चर्य होता है, अफ़सोस भी। अच्छी शिक्षा व नौकरी होने के बावज़ूद लड़के को इस बेमतलब के खर्चे में कोई बुराई नहीं नज़र आ रही है। उसके बाप का पैसा थोड़े ही खर्च हो रहा है? यहाँ तो जिसके बाप का पैसा खर्च हो रहा है, उसे भी कोई परेशानी नहीं है। लड़की हज़ारों का लहँगा खरीद कर लाई है मौके के लिए। ब्यूटी पार्लर का पैकेज बुक किया है। वेन्यू की सजावट के लिए खर्चीला डेकोरेटर उसने पसंद किया है। उसकी गोद भराई क्या रोज़ रोज़ होगी? पिताजी का पैसा जाए तो जाए। आखिर बेटी पैदा करने की गलती की है, अब पैसा खर्च करने से क्यों घबरा रहे हैं?
मुझे खीझ होती है आज की शिक्षा प्रणाली पर जो लोगों को सही-गलत में अंतर करना नहीं सिखा पाती। जो नहीं सिखा पाई मेरे पी एच डी भाई को कि किसी की अनुचित माँग के आगे झुकना गलत है, कि उन्हें यह सारे पैसे खर्च करने ही थे तो अपनी बेटी की ऐसी शिक्षा दिलाने में खर्च करने चाहिए थे जो उसे स्वावलंबी बनाती, एक बोझ नहीं जिसे वह अपने कंधे से उतार कर किसी और के कंधे पर डाल रहे हैं। जो नहीं सिखा पाई मेरी एम ए, बी एड भाभी को कि अगर उनकी बिरादरी के लड़के बिना दहेज लिए उनकी सुंदर, शिक्षित बेटी से शादी करने के लिए तैयार नहीं हैं, तो वह उनकी बेटी के लायक नहीं हैं और उन्हें अपनी जात बिरादरी की ज़िद छोड़ कर ऐसे लड़के की तलाश करनी चाहिए थी जिसकी दॄष्टि में लड़की के गुणों का मूल्य होता। जो नहीं समझा पाई मेरी भतीजी को कि अगर शादी की टीम टाम और आडंबर की कीमत पिता को कर्ज़ में डुबाना है तो यह कीमत बहुत ज़्यादा है और चुकाने योग्य नहीं है। जो नहीं सिखा पाई उस लड़के को कि स्वाभिमान किस गुण का नाम है और यह कि दहेज में हीरे की अँगूठी और कार माँगने की बजाय उसे अपनी कमाई पर विश्वास होना चाहिए। नहीं सिखा पाई उसके माता पिता को कि बाहरी दिखावे के लिए आग्रह करके और दहेज माँग करके वह अपनी हैसियत एक याचक की बना ले रहे हैं।
इस विवाह में शामिल होना मेरे लिए ज़रूरी होगा, पर मुझे नहीं लगता कि इस नाटक के किसी भी पात्र की मैं कभी इज़्ज़त कर पाऊँगी।

Thursday, April 10, 2008

स्त्री-पुरुष समानता की दिशा में

रानी को चाहिए आधा राज-पाट


राजा-रानी का मुहावरा सुनने में बहुत मधुर लगता है। यह आभास भी होता है कि दोनों की हैसियत एक बराबर है। लेकिन इससे बड़ा भ्रम कुछ और नहीं हो सकता। राजा रानी का पति नहीं है, बल्कि रानी राजा की पत्नी है। राज्य का स्वामी राजा है, रानी का उसमें कोई हिस्सा नहीं है। रानी के आने के पहले भी राजा राजा था, लेकिन राजा से परिणय के पहले रानी रानी नहीं थी। यानी राजा रानी के रुतबे में कुछ वृद्धि करता है, पर रानी राजा के रुतबे में कोई वृद्धि नहीं करती। वह राजा के गले में पड़ी हुई माला की तरह है, जिसे राजा जब चाहे गले से निकाल कर फेंक सकता है। दिनकर की एक बहुत खूबसूरत कविता में कहा गया है --
राजा वसंत, वर्षा ऋतुओं की रानी/
लेकिन, दोनों की कितनी भिन्न कहानी/
राजा के मुंह में हंसी, कंठ में माला/
रानी का अंतर विकल, दृगों में पानी।

और यह कोई नई बात नहीं है। दिनकर आगे कहते हैं --

लेखनी लिखे, मन में जो निहित व्यथा है/
रानी की सब दिन गीली रही कथा है/
त्रेता के राजा क्षमा करें यदि बोलूं/
राजा-रानी की युग से यही प्रथा है।

यही बात प्रत्येक युगल -- जो राजा-रानी का ही एक रूप है -- पर लागू होती है। विवाहित स्त्री ज्यादा से ज्यादा स्त्रीधन की अधिकारिणी है। यह वह धन है जो स्त्री को विवाह के समय उपहार में मिलता है। उपहार देनेवाले उसके माता-पिता तथा अन्य संबंधी हो सकते हैं, मित्र और परिचित हो सकते हैं तथा ससुराल पक्ष के लोग भी हो सकते हैं। आम तौर पर यह स्त्रीधन भी ससुराल की सामूहिक संपत्ति का हिस्सा बन जाता है और उस पर विवाहित स्त्री अपना कोई दावा नहीं कर सकती। इस तरह स्त्री को सर्वहारा बना कर छोड़ दिया जाता है। लेकिन विवाद के समय वह चाहे तो स्त्रीधन अर्थात अपनी निजी संपत्ति को वापस मांग सकती है। व्यवहार में जो भी होता हो, कानूनी स्थिति यही है।

आजकल हमारे देश में विवाद का एक नया विषय खड़ा हो गया है। नया कानून यह है कि पिता की संपत्ति में बेटियों का भी हक है। अभी तक माना जाता था कि विवाह के समय दान-दहेज के रूप में बेटी को जो दिया जाता है, वह एक तरह से पिता की संपत्ति में उसका हिस्सा ही है। विवाह के बाद उसके प्रति उसके मायकेवालों की कोई आर्थिक जिम्मेदारी नहीं रह जाती। दहेज-मृत्यु की घटनाओं को देखते हुए यह बात अत्यंत हास्यास्पद प्रतीत होती है। आज हजारों विवाहित महिलाएं जीवित होतीं, अगर उनके माता-पिता ने उनकी ससुराल के धनपशुओं की मांग स्वीकार कर ली होती। लेकिन कानून में परिवर्तन ने स्त्रियों की वैधानिक स्थिति थोड़ी मजबूत कर दी है। अब पिता की संपत्ति में उनका हक उनके भाइयों के बराबर हो गया है।

बहरहाल, बहुत कम परिवार ऐसे हैं जहां बेटियों के इस हक का सम्मान होता है। इसका एक कारण तो परंपरा है, जिसमें बेटी के कोई कानूनी अधिकार नहीं होते थे। उसे पराया धन माना जाता रहा है (अब भी माना जाता है), जिसका उचित स्थान उसकी ससुराल में है। मायके में वह आती-जाती रह सकती है, पर वहां की किसी चीज में वह हस्तक्षेप नहीं कर सकती। जो उसका घर ही नहीं है, उस पर उसका क्या हक। लेकिन समानता का कानूनी अधिकार मिल जाने के बाद भी उसकी बुनियादी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। अगर वह अपना हिस्सा मांगती है, तो मायके के सारे लोग, उसके भाई, विधवा मां आदि, उसके खिलाफ हो जाते हैं और उसे धन पिशाचिनी मानने लगते हैं। इस डर से ऐसे दावे अकसर नहीं किए जाते। परंपरा कानून पर भारी पड़ती है। लेकिन कभी-कभी ऐसे दावे होते भी हैं और तब मामला अदालत में पहुंच जाता है।

पिता की संपत्ति में हिस्सा इस तथ्य की याद दिलाता है कि वह संपत्ति माता-पिता की नहीं है, सिर्फ पिता की है। पिता के मरने के बाद ही मां को उसका एक हिस्सा मिल पाता है -- उसकी संतानों के साथ, लेकिन पिता के जीते जी उसकी संपत्ति में मां का कोई हिस्सा नहीं होता। वह सर्वहारा का जीवन जीती है। यही नियति उसकी बेटियों की होती हैं। जब वे एक नए परिवार में शामिल होती हैं, तो उस नए परिवार में चाहे जितनी संपत्ति हो, उनकी अपनी हैसियत अपनी मां जैसी हो जाती है -- धन और संपत्ति से विहीन। इसका सबसे दुखद परिणाम तब सामने आता है, जब तलाक की नौबत आती है। तलाक के बाद उसे अपनी पति की संपत्ति का कोई हिस्सा नहीं मिलता। उसे अगर कुछ मिलता है, तो सिर्फ गुजारा भत्ता या तलाक भत्ता (एलिमनी)। आजकल, कम से कम पश्चिम में, विवाह के वक्त ही अकसर यह तय कर लिया जाता है कि तलाक की स्थिति में एलिमनी की रकम क्या होगी। मुस्लिम विवाह में इसे मेहर कहते हैं। तलाक देने के बाद शौहर को मेहर की रकम देनी पड़ती है। पूर्व-निर्धारित एलिमनी और मेहर में एक पेच यह है कि विवाह के बाद शौहर की आमदनी कई गुना बढ़ जाए, तब भी इस रकम में कोई वृद्धि नहीं होती। औरत की जो कीमत एक बार तय हो गई, वह हो गई। पति चाहे जितना मालदार हो जाए, पत्नी का मेहर-मूल्य नहीं बदलता। दूसरी बात यह है कि जिस शख्स में मेहर चुकाने की जबरदस्त क्षमता हो, वह शादी पर शादी कर सकता है। कहते हैं, मुसलमान पुरुषों को चार शादियां तक करने की छूट है। लेकिन यह सीमा एक समय में चार तक लागू होती है। एक को तलाक दे कर दूसरी शादी करने की स्वतंत्रता का उपयोग करते हुए मुस्लिम पुरुष चाहे तो अपने जीवन काल में एक के बाद एक कर सैकड़ों शादियां कर सकता है। एक-विवाह की परंपरा ईसाइयत की देन कही जाती है। लेकिन अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस आदि में हर पुरुष और हर स्त्री औसतन तीन विवाह करते हैं। मरलिन मुनरो ने शायद पंद्रह या सोलह विवाह किए थे। इस कायदे को क्रमिक बहु-विवाह माना जाता है, जिससे एक-विवाह की प्रथा भी बनी रहती है और बहु-विवाह की स्वतंत्रता भी।

जाहिर है, पति-पत्नी के बीच यह आर्थिक व्यवस्था स्त्री की हैसियत को कमजोर करती है। पूंजीवादी व्यवस्था में आपकी हैसियत उतनी ही है आपकी जेब में जितने पैसे हैं। इस संदर्भ में याद किया जा सकता है कि स्त्रियों की परंपरागत पोशाक में जेब ही नहीं होती थी। जब पास में पैसे ही नहीं हैं, तो जेब की क्या जरूरत है। यह स्त्री के स्वाभिमान और अपने निर्णय खुद लेने की उसकी क्षमता पर जबरदस्त प्रहार है। सर्वहारा स्त्री का सामना संपत्तिशाली पति से पड़ता है और वह उसकी चापलूसी करने के लिए बाध्य हो जाती है, जिसे उसके प्रेम के नाम से जाना जाता है। स्त्री को आर्थिक रूप से स्वतंत्र करते देखिए, फिर उसके प्रेम की परीक्षा कीजिए। तब हो सकता है, बहुत-से पुरुषों को निराश होना पड़े। अभी तक उन्होंने ऐसी स्त्री का ही प्रेम जाना है जो उनके सुनहले या रुपहले पिंजड़े में कैद है। इस कैद में अपने को सुखी रखने के लिए स्त्री को पता नहीं कितने छल-छंद सीखने पड़ते हैं, जिसे त्रिया चरित्र के नाम से जाना जाता है।

इसका एक ही समाधान है कि विवाहित पुरुष की संपत्ति और आय में उसकी पत्नी का हिस्सा बराबर का माना जाए। इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। बल्कि यह हर दृष्टि से स्वाभाविक और तार्किक है। लोकतंत्र के युग में रानी की हैसियत राजा के बराबर होनी ही चाहिए। तभी राजा-रानी के बीच प्रेम स्वाभाविक रूप से स्थायी हो सकता है। मजबूरी में दिया जानेवाला प्रेम प्रेम नहीं, चापलूसी है। इस चापलूसी के कारण रानी को मांग होने पर अपना शरीर भी समर्पित करना पड़ता है, इससे बड़ी व्यथा और क्या हो सकती है। पुरुषों को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़े, तब उन्हें पता चलेगा कि प्रेमहीन समर्पण कितनी अश्लील चीज है -- यह आदमी का स्वाभिमान नष्ट करती है और उसे गुलाम बनाती चीज है। अगर हम अपनी सभ्यता को सभ्य बनाना चाहते हैं, तो इस आर्थिक असमानता को नष्ट कर देना जरूरी है। तब तलाक के बाद अपने भरण-पोषण के लिए स्त्री अपने पुरुष की मुखापेक्षी नहीं रह जाएगी। पति और पत्नी की आर्थिक हैसियत एक जैसी होगी। इस व्यवस्था के तहत वैवाहिक जीवन में भी स्त्री पुरुष से हीन नहीं रहेगी। दोनों बराबरी का आनंद उठाएंगे और एक दूसरे को सताने के बारे में नहीं सोचेगा।

इस परिकल्पित व्यवस्था के पीछे एक मजबूत आर्थिक तर्क भी है। जब लड़की अपने मां-बाप के साए में रहती है, तो वह एक आर्थिक इकाई का सदस्य होती है। अगर मां-बाप पुरुषवादी नहीं हुए, तो उसे भी उतना ही प्रेम और सम्मान मिलता है जितना उसके भाइयों को। विवाह के बाद इस आर्थिक इकाई से उसका संबंध टूट जाता है और वह दूसरी आर्थिक इकाई का सदस्य हो जाती है। यह तार्किक नहीं है कि उसे दो-दो आर्थिक इकाइयों का लाभ मिले। इसलिए यदि यह व्यवस्था बनाई जाए कि उसे अपने पिता की संपत्ति में हिस्सा न मिले, बल्कि नई आर्थिक इकाई में उसे बराबर का हिस्सेदार बनाया जाए, तो यह शायद ज्यादा उचित और व्यावहारिक होगा। मैं यह दावा नहीं करता कि यह व्यवस्था ही उत्तम है। पिता की संपत्ति में बेटी का हिस्सा रखते हुए भी ऐसी व्यवस्था बनाई जा सके जिसमें विवाह के बाद नए परिवार में उसके साथ समानता का बरताव किया जाए, तो इससे बेहतर क्या हो सकता है। लेकिन वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में सोचते समय हमें यह खयाल भी रखना चाहिए कि जिस आर्थिक इकाई को वह छोड़ आई है, वहां बहुएं आएंगी और उन्हें नई आर्थिक इकाई में समान हिस्सा मिलेगा। इसलिए एक परिवार पर दुहरा बोझ नहीं डाला जा सकता। एक दूसरी व्यवस्था यह हो सकती है कि विवाह के बाद वर-वधू को उनका हिस्सा दे कर एक स्वतंत्र आर्थिक इकाई बनाने को कहा जाए। लेकिन मैं इसके पक्ष में वोट नहीं दूंगा, क्योंकि यह संयुक्त परिवार की अवधारणा के विरुद्ध है, जो एकल परिवार से हमेशा और लाख गुना बेहतर है।

जो लोग समानता और स्वतंत्रता के समर्थक हैं (और आजकल कौन नहीं है?), उन्हें इस प्रश्न का जवाब देना होगा कि अगर परिवार के भीतर ही अ-समानता और अ-स्वतंत्रता बनी रहती है, तो सामाजिक ढांचे में समानता और स्वतंत्रता कहां से आ सकती है? व्यक्ति को समाज की इकाई माना जाता है, लेकिन मुझे अब इसमें संदेह होने लगा है। जैसे आजकल शब्द को नहीं, वाक्य को भाषा की इकाई माना जाता है, वैसे ही तर्क कहता है कि व्यक्ति को नहीं, परिवार को समाज की इकाई माना जाए। बहुत-से पुरुष और स्त्रियां अकेले रहते हैं, लेकिन यह स्वाभाविक नहीं, अस्वाभाविक स्थिति है। ऐसे व्यक्तियों के असामाजिक हो जाने की संभावना बढ़ जाती है। ज्यादातर व्यक्ति परिवार में पैदा होते हैं और परिवार में ही जीवन व्यतीत करते हैं। इसलिए व्यक्ति का कोई अर्थशास्त्र नहीं हो सकता। अर्थशास्त्र होगा, तो पूरे परिवार का होगा। वही मूलभूत आर्थिक इकाई है। जो लोकतंत्र को मानता है, वह इससे इनकार कैसे कर सकता है कि इस इकाई के सभी सदस्यों का हक बराबर हो? यहां तक कि बच्चों का भी। 000
राजकिशोर