Tuesday, April 1, 2008

वो अनकही यादें !

िससे कहती ? कौन सुने ?

उमडतीँ रहतीं , जो मन् में ,

" नीर भरी बदली सी " ,

बिरहन की , वो अनकही यादें !

भोगी जो हर उर्मिला ने

पाषाण वत अहिल्या ने ~

शकुंतला ने , जो वन में ,

हर माँ ने , प्रसव पीड़ा में !

वो अनकही यादें !


कैसे अश्रू को को समझाए ?

कैसे मन् के भावों को दिखलाये ?

ऐसा वाणी में सामर्थ्य कहाँ ?

जो, रंगों को बोल कर दर्शाए ?

आह ! ये , अनकही यादें !


रह जातीं  हैं  अनकही ही

लाख समझाने पर भी ,

कितनी ही भीष्म प्रतिज्ञा सी ,

धरती के गर्भ में दबी दबी

भावि के अंकुर सी , "अनकही यादें "-

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--लावण्या शाह -

फेब २८ , २००६

3 comments:

mamta said...

बहुत सुंदर भाव और शब्द ।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

ममता जी,आपको, कविता पसँद आयी ..धन्य्वाद !
एक स्त्री , ही,
मेरे भावोँ को सही सही समझ सकी .

KAMLABHANDARI said...

aapki kavita man ko chuti hai ,ek stri ki peedaa ek stri hi behatar samaj sakti hai . me bhi ek blog likhne ki kosish kar rahi hu please jarure dekhe.

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