Thursday, April 17, 2008

गुड़िया भीतर गुड़िया

उर्फ एक स्त्री के बनने की कथा
राजकिशोर

सिमोन द बोउआ का यह कथन दुनिया भर में उद्धृत किया जाता है कि स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। अर्थात आज हम जिस स्त्री को जानते हैं, वह जैविक से अधिक सांस्कृतिक इकाई है। क्या सिमोन भी इसी तरह बनाई गई स्त्री थीं? या, उन्होंने खुद को वैसा बनाया था, जिस रूप में हमने उन्हें पायां? मैत्रेयी पुष्पा भी एक ऐसी ही स्त्री हैं, जिन्हें समाज ने जितना बनाया, उससे अधिक उन्होंने अपने आपको बनाया। गुड़िया भीतर गुड़िया इसी बनने की रोमांचक कथा है। अगर यह किताब अंग्रेजी में छपी होती, तो अब तक इसे ऐतिहासिक महत्व की कृति घोषित कर दिया गया होता। हिन्दी की आंख जरा देर से खुलती है। जब आंख खुलेगी, तो यह तय है कि इस 'भितरघाती' लेखिका को शाबाशी कम और पत्थर ज्यादा मिलेंगे। खासकर लेखिकाएं और ज्यादा तिलमिलाएंगी। लेकिन जो नहीं है, उसका गम क्या, जैसे समझ। मैत्रेयी पुष्पा के निंदकों को उनकी रचनाओं में जिस चीज की तलाश रहती है, वह लेखक की आत्मकथा के इस दूसरे खंड में (पहले खंड का नाम था, कस्तूरी कुंडल बसे) भरपूर मिलेगी। क्या यह मैत्रेयी की ढीठाई है कि उन्होंने अपनी इस महत्वाकांक्षी कृति में खुद को कुछ ज्यादा ही उड़ेल दिया है ? या हमारी एक और स्टार लेखिका अनामिका के शब्दों में, मैत्रेयी पुष्पा सचमुच वह दरवाजा बन चुकी हैं. जिसे जितना अधिक पीटा जाता है, वह उतना ही ज्यादा खुलता जाता है? सच शायद इन दोनों से अलग है। मैत्रेयी ने अपने पहले महत्वपूर्ण उपन्यास इदन्नम में जहां से प्रस्थान किया था, चाक और अल्मा कबूतरी से होते हुए उन्हें यहीं पहुंचना था। गुड़िया भीतर गुड़िया बताता है कि वे बचपन से ही इसी दिशा में चलती आ रही हैं। रचनात्मकता वही है, सिर्फ विधा बदली है। अपने उन अनुभवों और विश्वासों को, जो उनके शरीर और आत्मा पर खुदती आई हैं, उन्होंने अपनी कृतियों में उन्हें अभिव्यक्ति भर दी है। अगर कोई कला-सिद्ध लेखक होता या होती, तो यह साहसनामा और अधिक सुगढ़ता लिए हुए होता। लेकिन जो अनगढ़ता या खुरदुरापन मैत्रेयी पुष्पा के लेखन की पहचान बन चुका है, उसका भी अपना स्वाद, औचित्य और सार्थकता है। मुहावरे में कहा जाए, तो मैत्रेयी पुष्पा हिन्दी साहित्य में धूल का फूल हैं।यह सिर्फ मुहावरेदारी नहीं है, क्योंकि धूल-मिट्टी से ही मैत्रेयी पुष्पा का अनुभव संसार बना है और उसी के बल पर उन्होंने ऐसी सचाइयां खोली हैं जिनसे हिन्दी का पाखंडी परिवेश बाप-बाप चिल्ला रहा है और जिनके कारण वे हजारों पाठिकाओं-पाठकों की महबूब लेखक बन गई हैं। इसी धूल-मिट्टी से मैत्रेयी पुष्पा ने जिन कसौटियों का विकास किया है, वे हमारे देश की नगरीय सभ्यता को मुंह चिढ़ाती हैं और जितने उद्वेग के साथ, उतनी ही सिधाई से स्त्री मुक्ति की सात्विक घोषणा करती जाती हैं। गुड़िया भीतर गुड़िया सभ्यता में निहित असभ्यताओं का एक ऐसा दर्दनाक दस्तावेज है, जिसके पन्ने 'सदाचार' के खून से लाल हैं, लेकिन जिसकी लाली (मैत्रेयी को उनका गांव इसी नाम से पुकारता है) एक नए सूर्योदय की अरुणिमा की ओर इशारा करती है। यह हमारा बड़प्पन होगा अगर हम इन उद्घाटनों के तर्क को समझने और उनके आधार पर संबंधों की नई नैतिकता के विकास में सहयात्री होने का प्रयास करें। स्त्री का इतिहास पुरुष के इतिहास से अधिक जटिल और घुमावदार होता है। गुड़िया भीतर गुड़िया में मैत्रेयी पुष्पा ने अपने कैशोर्य, वैवाहिक जीवन और लेखक बनने की कथा लिखी है। सपूत की तरह प्रेमियों के पांव भी पालने में ही दिखाई देने लगते हैं। मैत्रेयी ने बचपन में ही प्रेम किया -- उसका उल्लास जाना, दुख झेला, उसकी बेवफाई का दंश सहा और जब पढ़ने के लिए गुरुकुल गईं, तो तथाकथित ब्रह्मचर्य के अंत:पुरों के किस्से देखे-सुने। वे लिखती हैं, 'शुरुआत में मैं साहित्य की दुनिया में पुरुषों से इतना ही झिझकती (डरती) थी, जितनी कि 1960 में किशोरावस्था में कदम खने के बाद सहशिक्षा और पुरुष शिक्षकों के चलते डी.बी. इंटर कॉलेज, मोंठ (झांसी) में डरा करती थी। वहां मैंने यह तजुर्बा किया कि साथ पढ़नेवाले लड़कों से कई-कई गुना खतरनाक शिक्षक और प्रिंसिपल थे। मैंने मुठभेंड़ें भी कीं, लेकिन हर समय की मुठबेड़ ? स्कूल में कब तक रह पाती? अत: मैं ऐसे मौकों से बचती, जहां मर्द के साथ एक कमसिन लड़की अकेली पड़ जाए। ऐसा करते-करते यह बात मेरी आदत में शुमार हो गई।' (पृष्ठ 312-13) लेकिन अनुराग से अनुराग बना रहा (पति के सहकर्मी डॉ. सिद्धार्थ का प्रसंग), जिसके चलते विवाह के बाद ताने सहने का सिलसिला शुरू हुआ। मन करें तो इस हिम्मत पर दाद दें कि यह 'बेशरम' लेखिका आज भी उस दोस्ताने को बिना किसी झिझक या अपराध भाव के याद करती है। गांव की इस किशोरी को विवाह के बाद दिल्ली के एम्स अस्पताल के क्वार्टरों में रहने की जगह मिली, क्योंकि पति डॉक्टर थे। यहां प्रियतम की ओर से उन्हें मॉडर्न बनाने की तंज-भरी कोशिश की गई, जिसने लेखिका के जीवन में पहला उलझाव पैदा किया। वे पीएचडी करना चाहती थीं, पर हर नाजायज तरीके से इसे रोक दिया गया। बाद में इस डॉक्टरी परिवेश से शालीनता और नैतिकता की जो अधजली लाशें निकलीं, उनकी चिरांयध से त्रस्त अपनी उस समय की मानसिकता के बारे में मैत्रेयी पुष्पा बताती हैं, 'शायद इसलिए ही मेरे आसपास ड्राइंगरूमों में, बरामदों में और सामने वाले लॉन में मुश्किल हालातों की ऐसी बेकसी पैदा हुई है कि मुझे इस माहौल से नफरत होने लगी है। तुमसे भला-बुरा कह कर मैं इस नतीजे पर पहुंची हूं कि इस कैम्पस का कोई न कोई घर बलात्कार का सुरक्षित कोना छिपाए हुआ है। अस्पताल के एकेडेमिक विभाग भी औरतों के लिए बिस्तर तैयार किए हुए हैं और हमारे पुरुषों को ऐसी बातें पचाने की आदत पड़ गई है।' (73) इसी खर माहौल में लेखिका की मुलाकात इल्माना नाम की प्रखर स्त्री से हुई - उन मुखौटों की कड़ी में इक कोई चेहरा तो था --, जिसने उसे झकझोर दिया -- 'मैंने इल्माना के दायरों में बंधने की बात पूरे मन से स्वीकार कर ली कि उनके विचारों को पूरी तरह ग्रहण करूंगी, जो असलियत में मेरे ही विचार हैं। मैं धीरे-धीरे उन विचारों के विकास और जिंदगी के बदलाव की ओर बढ़ सकूंगी।' (76) तभी पति शाप देता है : 'ठीक है, चलो तुम उसी के कहने पर। एक दिन भग जाना किसी बदमाश के साथ।' (75) आगे के पन्ने बताते हैं कि यह एक नाराज बल्लेबाज का ओपेनिंग शॉट था। इसके कुछ ही दिनों बाद हमें डॉक्टर साहब की महानता का सबूत मिलता है। जब मैत्रेयी ने एक के बाद एक तीन लड़कियों को जन्म दिया, तो उनकी वही गति हुई जो आम तौर पर ऐसी स्त्रियों की होती है। गांव जाने पर उन्हें पता चला कि डॉक्टर साहब की वंश परंपरा को बचाने के लिए उनकी दूसरी शादी की सामूहिक तैयारी चल रही है। पहला विरोध लेखिका की मां की ओर से आया और निर्णायक प्रतिवाद डॉक्टर साहब की ओर से --'यार, तुम्हारा गांव है यह? मूर्खों का झुंड।' (103) यह एकमात्र मौका था, जब मैत्रेयी को उनके प्यारे गांव ने हक्का-बक्का कर दिया। इसके बाद अवसाद तेजी से हहराता हुआ आया उस रेतीले ढूह पर, जहां मैत्रेयी अवसन्न खड़ी थीं। अगर हताशा के उस माहौल में उनकी बेटियों, नम्रता और मोहिता, ने उनका हाथ पकड़ कर उन्हें न उठाया होता और लिखने की सबल प्रेरणा न दी होती, तो शायद हम एक अनोखी लेखिका से वंचित हो जाते। आगे चकराहटें और थीं, लेकिन हिन्दी के पुरुष, खासकर प्रौढ़, संपादकों की यौन तृष्णाओं से जो परिचित हैं, उनके लिए ये किस्से नए नहीं हैं कि किस संपादक या सह-संपादक ने उन्हें किस-किस तरह नचाया। हर किसी को उनमें दिलचस्पी थी -- पहाड़ी संपादकों को भी और गैरपहाड़ियों को भी --, पर माइनस उनकी कहानियों के। गलाजत के इन्हीं कुलियों में से एक ने मैत्रेयी पुष्पा की पहली कहानी छापी और साहित्य जगत का वीसा दिया। लेकिन अपेक्षित प्रतिदान के अभाव में उन्होंने जल्द ही अपना 'रेशमी अंगवस्त्र' खींच लिया और उदीयमान लेखिका की महत्वाकांक्षाएं मुंह के बल गिर पड़ीं। इस विकट घड़ी में एक सज्जन संपादक ने उनकी कहानियां लगातार छाप कर उन्हें उनकी रचनाशीलता के प्रति आश्वस्त किया। फिर क्या था -- सामने विस्तृत मैदान था और बेतहाशा दौड़ते हुए दो छोटे-छोटे मुलायम पैर। अतीत ने लेखिका को जितना रुलाया था, भविष्य उतना ही उदार निकला, हालांकि यहां भी चक्रवातों की कमी नहीं थी। इसके बाद दो मुख्य प्रसंग ये हैं कि 'हंस' के संपादक राजेंद्र यादव ने प्रारंभिक उपेक्षा के बाद कैसे मैत्रेयी पुष्पा के लेखन के विकसित करने में सहयोग दिया और कैसे कदम-कदम पर डॉक्टर साहब इस आगंतुक की और उससे मैत्रेयी के बढ़ते हुए सामीप्य की धज्जियां उड़ाते रहे। मेरा खयाल है कि हिन्दी के जिज्ञासु पाठक-पाठिकाएं इन प्रसंगों को ज्यादा रस ले कर पढ़ेंगे। खुर्दबीन लगा कर यह खोजने की कोशिश तो की ही जाएगी कि मैत्रेयी कहां-कहां फिसली हैं और राजेंद्र यादव ने कहां-कहां दबाने की कोशिश की है। ऐसे सभी जासूसों को 'और अंत में निराशा' हाथ लगना निश्चित है। कौन अपराधी अपनी आत्मस्वीकृतियां बिखेरता फिरता हैे। मैत्रेयी पर यह आरोप लगना ही लगना है कि राजेंद्र यादव प्रसंग में उन्होंने जितना बताया है, उससे अधिक छिपाया है। प्रश्न यह है कि दो व्यक्तियों के, खासकर जब वे स्त्री-पुरुष हों, संबंधों की छानबीन की ही क्यों जाए। ये न तो जोधा-अकबर हैं और न ही नेहरू-एडविना। इस छानबीन से न तो यह सिद्ध किया जा सकता है कि राजेंद्र यादव बुरे संपादक हैं और न ही यह कि मैत्रेयी पुष्पा कमजोर लेखिका हैं। बेशक राजेंद्र यादव ने मैत्रेयी का भरपूर मार्गदर्शन किया, लेकिन यह तो हर संपादक का फर्ज है कि वह नई प्रतिभाओं को खोजे और उन पर सान चढ़ाए। 'हंस' के संपादक ने और भी कई प्रतिभाओं को उभारने की कोशिश की है, पर कोई कितना भी बड़ा संपादक हो, वह टट्टू को घोड़ा नहीं बना सकता। दूसरी तरफ मैत्रेयी पुष्पा ने एक ही रचना के दस-दस ड्राफ्ट लिखे, तब जा कर उनमें चमक आई। राजेंद्र यादव ने मैत्रेयी से अपने संबंध को सखा-सखी भाव की संज्ञा दी है --'रही बात मेरे और तुम्हारे संबंध की, बहुत सोचा अपने रिश्ते को क्या नाम दूं? क्या हम आपस में ऐसे ही नहीं, जैसे कृष्ण और द्रौपदी रहे होंगे ? बहुत आत्मीयता, बहुत भरोसा और सेक्स का लेशमात्र भी xɽþÓ…' (341) राजेंद्र यादव ने अपनी जैसी धज बना रखी है, उसके मद्दे-नजर यह लग सकता है कि शैतान बाइबल के उद्धरण दे रहा है। लेकिन हमें क्या हक है-- और गरज भी -- कि हम किसी की नीयत पर शक करें? इसकी शिकायत अगर किसी को होनी चाहिए थी, तो वे स्वयं मैत्रेयी है। पर उन्होंने भी अपने रिश्ते को कुछ इसी तरह परिभाषित किया है। बंद कमरे में डॉक्टर साहब किसी चोट खाई हुई पत्नी की तरह पूछते हैं -- 'कसम खाती हो, उनसे तुम्हारा यही रिश्ता है?' मैत्रेयी का मरदाना जवाब गोली की जरह दनदनाता है -- 'गंगाजली उठाऊं और कोई विश्वास भी करे, ऐसी मुझे दरकार नहीं।' (302)मेरी चिंताएं दो हैं। लेखिका ने अपने पति का जो चरित्र-चित्रण किया है, क्या वह जरूरी था? इस पूरी कहानी में मैत्रेयी गुड़िया या गुड़िया के भीतर गुड़िया की तरह प्रस्तुत नहीं होतीं, पर डॉक्टर साहब खासे जल्लाद नजर आते हैं, अगरचे वे मैत्रेयी की भावनाओं का सम्मान करते हुए जगह-जगह झुकते भी हैं। अंत में तो लगता है कि उनका हृदय परिवर्तन हो गया है। पति के साथ घटित अंतरंग प्रसंगों को लिखने का एक ही औचित्य हो सकता है कि उससे कुछ बड़े मूल्य उभरें। गुड़िया भीतर गुड़िया में ऐसा होता है। फिर भी मेरा कशमकश ज्यों का त्यों है। चिंता का दूसरा विषय लेखिका का यह जीवन दर्शन है --'जिंदगी जो थी तन और मन से घिरी हुई। मेरे लिए उसको दो भागों में बांट कर देखना कठिन था। जब शरीर और मन को काट कर देखने की बात होती, मैं बहुत उदास और खिन्न हो जाती।' (320) इसके पहले वे अपने कहानी संग्रह 'गोमा हंसती है' (1998) की भूमिका में यह घोषणा कर चुकी हैं -- 'हमारा मन जो कहता है, पांव जहां ले चलते हैं, इंद्रियां जिस सुख की आकांक्षा करती हैं, मनुष्य होने के नाते वे हमारे कुविचार-कुचेष्टाएं नहीं, जन्मसिद्ध अधिकार हैं।'(10) यह सीधे-सीधे विवाह संस्था को विदा करने की मांग है। मैं इस मांग से पूरी तरह सहमत हूं, पर इसके लिए बहुत सारे पहलुओं पर विचार करना होगा। इनमें सबसे अहम पहलू है, निजी संपत्ति का भविष्य। गुड़िया भीतर गुड़िया का सारभूत निष्कर्ष भी यही है -- स्त्री पुरुष समाज की निजी संपत्ति है। लेखिका ने अगर तन-मन-कर्म से इस रूढ़ि का प्रतिवाद करने का जोखिम नहीं उठाया होता, तो यह सर्वथा पठनीय पुस्तक लिखी ही न जाती। 000

7 comments:

Suresh Gupta said...

स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है. और पुरूष, वह पैदा होते हैं या उन्हें भी बनाना पड़ता है?

Neelima said...

आपने सही कहा राजकिशोर जी हिंदी की आंख ज़रा देर से ही खुलती है ! गुडिया भीतर गुडिया पर सुधी समीक्षक की समीक्षा का प्रसंग शर्मनाक है ! निश्चय ही "स्त्री पुरुष की निजी संपत्ति नहीं है' और न ही उसकी रचना मर्दवादी समीक्षकों की निजी संपत्ति है !

Vandana Pandey said...

इदन्नमम कुछ साल पहले पढी थी और पढ़ कर मैत्रेयी पुष्पा से बहुत प्रभावित हुई थी। उनकी आत्मकथा के इस पोस्ट में दिए गए कुछ अंश स्तब्ध कर देने वाले हैं। पढ़ कर अमॄता प्रीतम की आत्मकथा ’रसीदी टिकट’ की याद आ गई जो ऐसी ही बेलागी से लिखी गई थी।
पुस्तक के अच्छे विष्लेषण के लिये साधुवाद।

सुनीता शानू said...

मैने मैत्रेयी जी को पढ़ा है,बात भी कई बार की है,मगर सचमुच समझा आज पहली बार है... बहुत बल मिला इसे पढ़ कर अगर इंसान चाहे तो क्या नही कर सकता...

दीपा पाठक said...

समीक्षा ने किताब के प्रति दिलचस्पी जगा दी है मौका मिलते ही पढने की कोशिश की जाएगी। क्योंकि किताब पढी नहीं है लिहाजा अभी उसके बारे में कुछ टिप्पणी भी नहीं की जा सकती। लेकिन एक पंक्ति कि 'हमारा मन जो कहता है, पांव जहां ले चलते हैं, इंद्रियां जिस सुख की आकांक्षा करती हैं, मनुष्य होने के नाते वे हमारे कुविचार-कुचेष्टाएं नहीं, जन्मसिद्ध अधिकार हैं' ने मुझे अपनी राय देने के लिए कुछ उकसा सा दिया।

क्या ऐसा नहीं लगता कि यह कुछ ज्यादा की मांग है ? क्योंकि अगर यह स्त्री के लिए सही है तो मनुष्य होने के नाते यह पुरूषों के लिए भी सही माना जाएगा। इस लिहाज से तो उनके पति की दूसरी शादी की इच्छा को भी जन्मसिद्ध अधिकार मानते हुए सही ठहराया जा सकता है।

मैं स्त्री स्वतंत्रता की प्रबल पक्षधरों में से हूं लेकिन मेरा मानना है कि इस मुद्दे पर संतुलित नजरिए के साथ विवेचना होनी चाहिए।

होता यह है कि ९५ फीसदी महिलाएं अपने मूलभूत अधिकारों तक के लिए तरसती रहती हैं जबकि बुद्धिजीवियों की बहस नैतिकता से शुरू हो कर न जाने कहां से कहां पहुंच जाती है और मूल मुद्दा यानी व्यवहारिक जमीन पर औरत की आजादी का मसला वहीं का वहीं रह जाता है।

Anonymous said...

बकवास है गुङिया भीतर गुङिया आत्मकथा, नकली और गढी हुई। मैत्रेयी का मुखौटा नोचना होगा। यह सखि भाव की बात करती है यादव जैसे वुमेनाइजर के साथ? मंच पर से प्रेमी की बात करती यह बदसूरत मगर रंगीली बुढिया। इसे प्रेम सेक्स में स्त्री मुक्ती नजर आती है। गांव की मेहनतकश औरतों को गलत तरह से पेश करती है।
चालाक लोमडी की नकली और गढी हुई आत्मकथा, यह पढने लायक नहीं है।

अभी आउटलुक साप्ताहिक में होली पर गीता श्री ने आजकल के हिन्दी साहित्य का मुखौटा उतार दिया। वहां स्त्री विमर्श के नाम पे यही हो रहा है। महुआ मांझी साहित्य की मल्लिका शेरावत बन गई है। राजेन्द्र यादव की सखि मैत्रेयी पुष्पा गाय नहीं लोमडी है। ये साहित्य का परिदृश्य इतना खराब कर चुकी हैं कि कोई भली लेखिका यहां नाम नहीं पा सकती। संपादक, प्रकाशक लेखिकाओं को सेक्स ऑबजेक्ट समझते हैं। राजकमल से छपने वाली हर लेखिका की यही विडंबना है। यह सच एक नंगा सच है। जिसे कोई ब्लॉग ही उघाङ सकता है। रागिनी गुप्त

Unknown said...

मुझे पता न था कि प्रसिद्ध लेखिका मैत्रेई पुष्पा ने डी बी इंटर कॉलेज मोठ ( जिला झांसी ) में पढ़ाई की थी । मै ने भी उसी कोलेज में पढ़ाई की थी , लेकिन उन से दस साल बाद ।