Saturday, April 19, 2008

सदियों से भूखी औरत



सदियों से भूखी औरत

करती है सोलह श्रृंगार

पानी भरी थाली में देखती है

चन्द्रमा की परछाईं

छलनी में से झांकती है पति का चेहारा

करती है कामना दीर्घा आयु की


सदियों से भूखी औरत

मन ही मन बनाती है रेत के घरौंदे

पति का करती है इंतज़ार

बिछाती है पलकें

ऊबड़ खाबड़ पगडन्डी पर

हर वक्त गाती है गुणगान पति का

बच्चों में देखती है उसका अक्स


सदियों से भूखी औरत

अंत तक नही जान पाती

उस तेन्दुए की प्रवृति जो

करता रहा है शिकार'

उन निरीह बकरियों का

आती रहीं हैं जो उसकी गिरफ्त में

कहीं भी, किसी भी समय ।


--अश्वघोष

वागर्थ से साभार
०७ अलकनंदा एन्क्लेव
जनरल महादेव सिंह मार्ग
देहरादून २४८००१ (उत्तराखँड)












8 comments:

Suresh Gupta said...

सदियों से भूखी औरत,
किस बात की भूख है उसे,
क्या वह यह जान पाई?

rakhshanda said...

deep thinking....

जो सोचते रहने पर मजबूर कर देती है...

आर. अनुराधा said...

Hope, hunger turns her towards finding ways and means to become self-dependent to fight hunger-pangs, Instead of looking towards others for her own needs, she becomes strong enough to stand on her own.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

मधुमती फिल्म का गीत भी यही भाव असमँजस सहित दुहराता है , " मैँ नैया फिर भी मैँ प्यासी, भेद ये गहरा बात जरा - सी "
ये भाव नारी ही क्यूँ हर इन्साँ के जहन से जुडा हुआ है , रुह की प्यास हमेशा अतृप्त रही है ..
जो शायद सूफी सँतोँ या योगीयोँ के निर्वाण पर ही समाप्त हुई है

Anonymous said...

Dear Sujata ji,

Aapka blog bahut hi acha laga

Asha hai aap ke blog je jariye kayi achi vaktavya padne ko milta rahega

Regards,

Ami Bhushan Jha

subhash Bhadauria said...

मौसम ने परिन्दों को ये बात बता दी है,
उस झील पे खतरा है उस झील पे मत जाना.

अपने को कई बार रोकने के बावजूद खतरे वाली झील पे आने को विवश हूँ बहुत ही जानदार कविता है आइना दिखा रही है.
एक कविता बहुत पहले मैंने कहीं पढ़ी थी ज़रा गौर फ़र्मायें
आज की सीता ने
अपने राम को
घर से बाहर निकाल दिया है
और राम अब सूर्पणखा की तलाश में निकल गया है.
मंटो की कहानी कहीं पढ़ी है शिकारी औरतें.
सिक्के के दोनों पहलू होते हैं.
हिन्दी की सशक्त रचनाकार मनुभंडारी ने सच ही कहा है औरत की नज़र यूँ ही पैनी होती है.
पैनी नज़र से वो जान लेती है किसे कितना डोज़ देना है उसे पता है वह अपना काम निकाल लेती है.
ये खेल यत्र तत्र सर्वत्र देखे जा सकते हैं.कभी उन पर भी तब्सिरा करें.आमीन.

KAMLABHANDARI said...

aurat chhahe kitne bhi dino bhuki kyu na rah le mardjaat ko koi fark nahi padne wala.wah to yahi sochta hai ki aurat apne dhram ka palan kar rahi hai .isliye ye khud aurat ko hi tay karna hoga ki ye sab wah kewal samajik reeti - riwajo ki wajha se karne ko majbor hai ya wah khud esha chhati hai.

neelima garg said...

If she is hungry that is her own choice . Why can,t she do something to fulfil her need....

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