Monday, April 21, 2008

प्रेम वासना और खुलापन : इसे यहाँ डालने का मतलब क्या है ?

हाँ मैने भी यही सोचा था शुरुआत में इसे यहाँ डालने का मतलब क्या है ?जैसा कि अनिता जी ने कहा । उन्हीं के कमेंट से वहाँ रुक गयी । गौर करती रही काफी देर तक कि आभा का मतलब और् मकसद समझ पाऊँ । एक स्त्री और एक चैट मित्र{पुरुष }।दोनों की बातें ।जिन पंक्तियों को हाइलाएट किया है उन्हे बार बार पढा ।प्रेम और हिंसा का तर्क जो स्त्री मित्र दे रही है वह समझने की कोशिश करती रही । चैट पर जब आप पुरुष मित्र से बात करती हैं तो बहुत बार इसे निमंत्रण मान लिया जाता है ।चैट करती स्त्री की यही जिज्ञासा है कि ऐसा उसकी बातचीत मे क्या है ,जिसे बन्द समाज मे खुलापन कहा जाता है और हमेशा पुरुष द्वारा एक ललक के रूप में लिया जाता है ।"खुलापन "माने क्या ?यदि आज़ादी है तो क्या इसे अवेलेबल होना क्यों समझा जाता है और झट से प्रेम निमंत्रण दे दिया जाता है । और आज़ादी नही है तो क्या है ?
आप भी देखिये और गौर कीजिये ।

प्रेम,वासना और खुलापन - एक बातचीत

haan mitr : zara sa vayast hoon : phir baat karte hain
हां मित्र मन नहीं लग रहा था आपकी कोई खबर नहीं थी बस यह बता देतीं आप ठीक है आप काम करें मित्र
aur agar mai kahi vayast hoon mitr to iska matlab naraz hona hi kyu lagate hain aap , mai naraz nhi hoti , malum hai naa aapko
अरे मित्र मालूम है धीर धीरे, हां चलिए यह हंसी आपकी बहुत प्‍यारी लगती है, मै भी खुश हूं टिकट ले लिया घर का , आपका सिरदर्द कुछ दिन को टलेगा हा हा हा
ohh mai bhi toh jaa rahi hoon
कब मित्र
aise me aapka bhi talega sirdard
मेरा तो जी का दर्द है मित्र
malum nhi par haan 15 dino ke liye toh jaa hi rahi hoon chhutti
ओह मेरा भी करीब इतने का ही , जा कब रही हैं आप, मैसेज तेा करती रहेंगी आप
dekhti hoon agle hafte ki chhutti maangi hai, haan karti rahungi
हां आपकी खबर नही मिलती जिस दिन , मन ही नहीं लगता लगता है आप नाराज तो नहीं हा हा हा

ओह प्‍यारी बच्‍ची नाराज मत होना कभी है ना
nahi nahi, aapne koi kahani nhi likhi
नहीं नई तो नहीं लिखी वैसे कल कुछ पढवाउंगा
ohh thik hai ,
kya mai thik se baat nhi kar paati?
हां आप करती हैं एकदम ठीक से करती हैं, क्‍या बात करती हैं आप
soch rahi hoon ki subah aapne kya kaha ki mai aise baat karti hoon ki prem me hone kaa log bharam paal lete
soch rahi hoon mai aisa kya karti hoon bhala
हां वह तो है इस पर बातें हो सकती हैं और क्‍यों ना इस पर विस्तार से कभी बातें करें, सवाल जवाब में , तब शायद हम समझ सकें
lekin mai toh aisi koi bhi chhichhori baat nhi karti mitr
ओह छिछोरी बात इसमें कहां से आ गई, आप नहीं समझीं
toh phir
वह मैं सोच कर लिखूंगा , इसमें कोई गलत बात नहीं है आपकी ओर से आप समय से थोडा आगे हैं मित्र ohh lekin samay se aage hona kya bura hai mitr
एक मानसिक प्‍यास है जो जब भाषा में हम व्‍यक्‍त करते हैं तो उसे लेकर लोग गलतफहमी पाल लेते हैं
nahi mai toh bata kar aage aati hoon ki mai prem ke liye uplabdh nhi hoon
नहीं , लोग इसका उल्‍टा समझते हैं मित्र , मैंने जितने लोगों का भी डायलाग देखा आपसे उनमें यह बात दिखी मुझे
kya
उनकी वह ललक
वे वहीं से शुरू करते हैं
par maine kab nimantran diya , wo hi bechain lage mujhe , aur mai toh pareshaan hi rahi
हमारा समाज ही ऐसा है , वहां खुलापन नहीं है
bina meri pareshaani jaane wo prem kaa dawa karte rah
jinse maine kabhi baat nhi ki wo bhi
हां इस पर आप आगे से थोडा ध्‍यान दे सकती हैं
toh mai kya khuli hui hoon
ओह ऐसा भी है , हां और इसमे बुरा क्‍या है
ohh toh aapko ye lagta hai ki mai khuli hoon , dekhiye mujhe mera jawaab mil gaya
मतलब
mai samjh gai
ओह , मुझे भी बताइए
ohh ..doc toh aap hain mai nhi , mai toh apne tark se hi baat samjh sakti hoon
वाह, आप भी ना , खुले होने को आप गलत मानती हैं क्‍या
haan
मतलब
haan mai maanti hoon ki khulaa wayawahaar thik nhi , isme matlab kya batau
यहां खुला का मतलब आप क्‍या ले रही हैं
mai aisa hi sochti hoon
ठीक है
khule ka matlab wahi le rahi hoon jo aap bata rahe hain , aur kuchh nhi
यह बात नहीं हुई , बातें खोलकर कहना गलत कहां से हैं
haan galat hai..tab tak ke liye jab tak aap khud ek takat nhi hai , aur tab tak ke liye jab tak aap ek aurat hain, mai khulepan ke khilaaf hoon
आप अब अपने ही खिलाफ होती जा रही हैं , इस तरह औरत होने का मानी थोडे होता है
agar mera wayawahaar khula hai toh mai iske khilaaf hoon
लडना तेा पडेगा ही ना
kis chiz se
अपनी आजादी के लिए, आप गलत ले रही हैं मेरे खुलेपन का अर्थ
aap mere roke nhi ruk paaye toh mai dimaag ko kaise rokungi
हा हा हा , आप भी ना एकदम लडकर मानेंगी
nahi mai gambhir hoon
हां तो इस पर बाते करें
meri sachaai kabhi nhi kahti ki aap bina mujhe jaane prem karen,aur ye ki mai prem kar paaun toh hi prem ka dawa karen ....maine aapko kaha tha naa mitr ki mai prem ke khatre janti hoon aur azaadi ke bhi
प्रेम तेा निजी अनुभव होता है मित्र
nhi
क्‍या नहीं
prem hinsha ke atirikat kuchh nhi
आप वासना को प्रेम कह रही हैं
prem wo hinsa hai jo hame sikhati hai ki ham prem karte hain isliye samne wala bhi hame prem kare
हिंसा तो वहां है ही नही
wasna aur prem ko mai nhi mila rahi , mai prem ki hi baat kar rahi hoon
सामने वाला करे इसमें यह तो नहीं आता
prem kabhi bhi zimedaari nhi lata , bus loot khasot karta
नहीं आप रोमानी प्रेम की बात कर रही हैं , ओह क्‍या बात‍ कर रही हैं आप, इसमे लूट खसोट कहां से आ गयी यार
haan mai usi prem ki baat kar rahi hoon jaha log dawa karte hain , ye loot hi toh hai ki bina jaane ki samne wale ko kya pida ho sakti hai,log chhalang lagate hi chale jaate hain , chaliye gambhir vishaye hai
नहीं मित्र वह प्रेम नहीं है बिना जाने तो प्रेम किया ही नहीं जा सकता है
aap kabhi meri jagah hokar dekh paaye toh achha , aapne ravindranaath ki kavita toh pdhi hogi naa
हां प्रेम में भी एक तरह की रूढता है इस पर सविता सिंह ने अपनी कविता में पहली बार लिखा था
unki bhi yehi baat hai...mai bhi aisa hi sochti hoon aur jab maine pdha toh mai bhauchaki rah gayi
क्‍या टैगोर ने गलत लिखा है
sochne lagi ye baat jo mai soch rhi hoon kabhi bina pdhe ,kisi aur ne bhi likha hai..bahut pahle , kuchh galat nhi likha
हां वही तो , वे कविताएं मुझे बहुत प्‍यारी हैं
par aap unhe bada maan kar thik kah rahe hain,aur mai kuchh nhi toh mujhe galat sabit kar rahe hain
आप कुछ नहीं , ये आपको कब कहा मैंने
ohh aap ki bhi buddhi kabhi kabhi aam logo sa prashn karti hai
यह क्‍या का क्‍या बना देती हैं आप , ये सिर नोचते जोकर, हटाइए इन चिन्‍हों को , देखकर चिढ होती है , छि
ye wahi hi jo aapki kisi kisi baat par mujhe hota hai
हा हा हा
पहले आप लड ही लीजिए , आप यार परेशान कर देती हैं
aur kyaa aap nhi karte

Posted by abha at 2:52 AM

12 comments:

Neeraj Rohilla said...

???????????????????????????????????????????????????????

कुछ भी खास नहीं चमका, अंग्रेजी में लिखी हिन्दी पढने में वैसे भी तकालीफ़ होती है ।

शायद किसी पुरानी पोस्ट के आगे का भाग होगा, मुझे ठीक से कांटेक्स्ट समझ नहीं आया ।

लेकिन आये हैं तो साधुवाद देते चलें :-) (समीर एट. आल. २००४-२००८)

सुजाता said...

@ Neeraj ,
पढने मे थोड़ी तकलीफ तो मुझे भी हुई पर यह प्रश्न कि आखिर मकसद क्या है इसे लिखने का , इसी प्रश्न ने पढवा दिया ।
यह एक चैट का हिस्स है जिसे आभा ने अपने ब्लॉग पर प्रकाशित किया था और जिसपर [प्रतिक्रियाएँ नहीं आ रही थीं। यदि पढ सके6 तो हाइलाइट किये हुए अंश पढिये ।
साधुवाद के लिए धन्यवाद !

राजकिशोर said...

मामला खुलेपन का है, इसलिए मैं भी खुल कर ही कहूं। सामान्यतः, रिपीट सामान्यतः, हर पुरुष स्त्री के आखेट में निकला हुआ एक विकल प्राणी होता है। जितनी मिल जाएं, जैसी मिल जाएं। इसलिए उसकी बातचीत हमेशा दुअर्थी होती है। कुछ स्त्रियां भी यह खेल खेलती हैं, पर संकट का क्षण आते ही वे भाग निकलती हैं। इसीलिए अनेकों का मानना है कि स्त्री-पुरुष के बीच सच्ची मैत्री हो ही नहीं सकती। यौनिकता का सर्प परदे के पीछे फुफकारता रहता है। लेकिन इससे बहुत ज्यादा घबराने की बात नहीं हैं। स्त्रियां बाहर निकली हैं, तो उन्हें अपने आसपास संयम का वातावरण बनाने की ओर विशेष ध्यान देना ही होगा। ऐसा बड़े पैमाने पर होने से पुरुष भी सभ्य होने का आत्मसंघर्ष करेंगे। वैसे, छोटे-छोटे मजाकों पर, तब भी जब वे वे पूर्णतः निरामिष न हों, गरम हो जाना ठीक नहीं है। स्त्री-पुरुष के समीप आने पर या एक ही वातावरण का अंग होने पर यदि रस के कुछ छींटें न बिखरें - वल्गरिटी की दीवार के इस ओर,तो ईश्वर की सारी योजना ही ध्वस्त हो जाएगी।

Neeraj Rohilla said...

@सुजाता
अब कुछ समझ में आया । ऐसा ही कुछ मैं पहले भी अनुभव कर चुका हूँ मित्र लोगों से बातचीत और इंटरनेट चैटिंग के सन्दर्भ में ।

चैट पर बहुत से लोग ऐसी स्वतंत्रता ले लेते हैं जैसी अगर आमने सामने की चर्चा में ली जाये तो शिष्टाचार का उल्लंघन होती है ।

अव्वल तो हर दूसरी पंक्ति में मित्र और यार का प्रयोग, फ़िर ईस्माईली और फ़िर अन्य Props । आमतौर पर ये एक स्टैप की तरह प्रयोग किये जाते हैं और लोगों का इरादातन ऐसी हरकतें कर आपके कम्फ़र्टेबल पर्सनल स्पेस की हदें तलाशना होता है । आखिर थोडा सा अपसेट होने पर झट से माफ़ी और मैं तो मजाक कर रहा था का बहाना तो है ही ।

इसके अलावा वैचारिक बातचीत के क्षद्म छलावे के बीच में अपनी कुंठाओं को व्यक्त करने के उदाहरण भी मैने खूब देखे हैं ।

कह नहीं सकता कि महिला के कहे हुये हाइलाईटेड व्क्तव्यों से इत्तेफ़ाक रखता हूँ । प्रेम का अनुभव नहीं है और लोग कहते हैं ये व्यक्तिगत होता है, तो इतना सम्मान तो हर प्रेम सम्बन्धी विचार को मिलना ही चाहिये ।

राजकिशोर said...

मैंने अपनी टिप्पणी में जहां यौनिकता शब्द का प्रयोग किया है, वहां कामुकता शब्द होना चाहिए। अ-सावधानी के लिए खेद है।
राजकिशोर

नीलिमा सुखीजा अरोड़ा said...

@राजकिशोर जी,
सुना तो मैंने भी बहुतों से है कि स्त्री-पुरुष में सच्ची मित्रता नहीं हो सकती या यूं कहें कि ये प्रकृति का कोई सहस्यमयी खेल हो सकता है। लेकिन हमेशा कामुकता का सर्प परदे के पीछे फुंफकारता रहता है मैं इस बात से सहमत नहीं हूं। कई बार सखा और सखी का भाव इतना प्रगाढ होता है कि वहां कामुकता और यौनिकता के लिए स्थान नहीं होता। मैं ये नहीं कहना चाह रही हूं कि स्त्री पुरुष के बीच पति पत्नी के सिवा वैसा रिश्ता नहीं हो सकता. लेकिन कई बार कुछ परिचय ऐसे भी होते हैं कि जो रिश्तों के दायरों से बाहर होते हैं।

गौरव सोलंकी said...

आभा जी ने इसे अपने ब्लॉग पर क्यों डाला, यह मैं तमाम टिप्पणियाँ पढ़ के भी नहीं समझ पाया। यह सामान्य सी बातचीत है, जिसमें न कोई आखेट खेल रहा है और न ही कोई शिकार के लिए उपलब्ध है। राजकिशोर जी जिस विकल प्राणी की बात कर रहे हैं, वह हर पुरुष है, इससे भी मैं सहमत नहीं। यह विकलता, जिसे आप प्राकृतिक भी कह सकते हैं, पुरुषों में भी उतने ही फीसदी है और महिलाओं में भी।
हाँ, आभा जी प्रेम पर जो भी कह रही हैं, उससे मैं जरा भी सहमत नहीं। सिर्फ़ अपने अनुभव के आधार पर प्रेम को हिंसा बताना कहाँ तक जायज़ है?

Unknown said...

भाइयो और बहनो,
मैंने हमेशा नहीं कहा, सामान्यतः कहा। अब मैं कहता हूं, अकसर। पुराने संस्कार धीरे-धीरे ही जाएंगे।
आगे मैंने जो लिखा है, कृपया उसे भी पढ़ें।
सखा-सखी क्यों नहीं होते? खूब होते हैं। पर ऐसी भी पिरेमिकाएं होती हैं जो सुरक्षा के लिए प्रेमी को राखी भी बांधती रहती हैं। ऐसे पुरुष भी, जो भेड़िया होने के बावजूद खरगोश की खाल पहने घूमते हैं।
जब तक निर्दोष सिद्ध न हो जाए तब तक पुरुष को दोषी मान कर चला जाए, यह रवैया ठीक नहीं। मान कर तो हरएक को निर्दोष ही चलना चाहिए। लेकिन यह कभी भूलना नहीं चाहिए कि हमारा चरित्र हमेशा परीक्षा से गुजरता से होता है। कामुकता के क्षेत्र में भी वैसे ही, जैसे जीवन के अन्य क्षेत्रों में। इसका समाधान हर शख्श अपने तरीके से निकालता है। समग्रता में शायद यही नीति ठीक है कि hope for the best and prepare for the worst.

Unknown said...

इंटरनेट पर चैटिंग करना एक फैशन जैसा हो गया है. हमारे एक मित्र हैं, बड़े गर्व से बताते हैं अपने चैट मित्रों के बारे में. लेकिन वह सारे चैट मित्र केवल सेक्स पर ही चैट करते हैं. एक समय था जब में भी नेट पर चैटिंग में काफी समय नष्ट करता था. जैसी बातें नेट चैट में की जाती हैं उस से मुझे हमेशा यही लगता था कि यह लड़कियां नही हैं और कोई पुरूष नारी का रूप लेकर अपनी दिमागी सेक्स भूख मिटाने कि कोशिश कर रहा है. चैट पर प्रेम का एक ही रूप होता है और वह है वासना. अधिकांश पुरूष नेट पर सेक्स की तलाश में जाते हैं. उनकी कही हर बात का केवल यह ही मतलब होता है. वह यह सोचते हैं कि अगर यह स्त्री नेट पर आई है तो इस का मतलब है की वह सेक्स के लिए उपलब्द्ध है. क्योंकि उनका नेट चैट का उद्देश्य ग़लत है तब उन की हर बात ग़लत होगी, और वह नारी चैट मित्र की हर बात को ग़लत रूप में ही देखेंगे. अगर कोई स्त्री इस सबसे बचना चाहती है तब एक ही उपाय है, नेट चैट बंद.

बोधिसत्व said...

ऊपर से नीचे तक सब ........ है...

Anonymous said...

see i don't want to comment on this chapter because what i think is that all upon the mind of a human being.you can say it is a game of a human mind that how he is going to set his mind in terms of sex.if you are believe in god then they are also beleive in love and sex,if you are believe in devil, then they are also.But the diffrence is the way how they are doing and what is there AIM(motto).

SO,its all you how you are going to see your opposite sex inn what manner

tor potky chody said...

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अनुप्रिया के रेखांकन

स्त्री को सिर्फ बाहर ही नहीं अपने भीतर भी लड़ना पड़ता है- अनुप्रिया के रेखांकन

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