Tuesday, May 27, 2008

शर्मिन्दगी के पल

दो दिन हुए ब्लॉग जगत के माहौल में एक अजीब सी गन्ध उड़ रही है । शुरुआत हुई एक टिप्पणी से जिसकी सच्चाई और विश्वसनीयता तमाम ब्लॉगरों द्वारा सन्दिग्ध मानी गयी । लेकिन पत्रकारों के ब्लॉग जगत में होने से इतना तो उपकार हुआ है कि कुछ खबरें हमें फर्स्ट हैण्ड् मिल जाती है । यह भी मिली । पुष्टि हुई कि यश्वंत नामक एक ब्लॉगर ने नौकरी के लिए दिल्ली आयी एक लड़की का बलात्कार करने की कोशिश की ।
यह निहायत शर्मनाक है । और दुखद है कि ब्लॉग जगत में स्त्री विमर्श करते हुए जब हम सब लगातार स्त्री की गरिमा, सम्मान,और बराबरी के लिए आवाज़ उठाते रहे हैं तब भी ऐसी असम्वेदनशीलता पुरुष मानस मे मौजूद है । बहुत सी अभद्रताएँ जो अब तक भाषाई रूप में सामने आती रहीं वे इस प्रकरण में शारीरिक अब्यूज़ तक पहुँच गयीं ।और बहुत प्रतिबद्धताओं के बावजूद भी पुरुष अपने संसकारों के चलते स्त्री के विरुद्ध खड़े पाए गये ।

कोई हैरानी नही कि आस-पास हमारा पुरुष समाज स्त्री के प्रति ऐसी हेय दृष्टि रखता है । यह वो समाज है जहाँ आरुषि हत्याकांड तक में पुलिस स्त्री के चरित्रहीनता के प्रमाण ढूंढ लाती है ।14 साल की बच्ची और पिता जैसे नौकर को आपत्तिजनक हालत मे पिता द्वारा देखा जाना कारण बताया जाता है कत्ल का । पिता के भी कथित नाजायज़ सम्बध हैं ।
स्करलेट कीलिंग का बलात्कार और उसके बाद उसकी हत्या झकझोरने वाली है बावजूद इसके कि यह ऐसी रोज़ाना होने वाली घटनाओं में से ही एक है । लेकिन क्या वाकई समाज इन हादसों से दहलता है ?
बलात्कार के साएँ में ही हमारा समाज लड़की को बड़ा करता है और हमेशा यह डर उसके भीतर पैठा रहता है कि जाने कब ऐसी किसी स्थिति से उसका सामना हो जाए ।
इस शर्मिन्दगी के इस पल में हम यशवंत नामक व्यक्ति और प्रवृत्ति की निन्दा करते हैं । पत्रकार जल्द ही सारा मामला साफ करेंगे ऐसी उम्मीद है ।

मेरा प्यार अभी जारी है.....

कहाँ हो मेरे अगले प्यार

आभा

कठपिंगल तुम न ठीक से मुझे जानते हो न मेरे सारे प्यार को
मैं बताती हूँ...तुम्हें अपने बारे में..... विस्तार से
मेरे पति के मित्र और सहपाठी अनिल सिंह मेरे पहले दूसरे तीसरे नहीं
एक हजार सातवें प्यार थे,
एक हजार आठवें थे कवि बोधिसत्व जिनकी बाहों में मैं समा गई
शायद यह सब तुम नहीं जानते...
इसीलिए तुम मुझे धमका रहे हो
स्त्री जान कर डरा रहे हो।
पर तुम नहीं जानते कि
मेरा प्यार अभी भी जारी है
मुझे लगता है अगली तुम्हारी बारी है
अपना चेहरा दिखाओ
अपना पता बताओ
अपना फोन या मोबाइल नंबर बताओ
अब तुम्हारे पास आने की तैयारी है
तुम्हारी हो जाने की बेकरारी है
मुझे ई-मेल करके मत धमकाओ
अब मेरे हो जाओ....
अगर मनुष्य हो
अगर पुरुषार्थी हो तो
सामने आओ....
और मेरे सभी आशिकों का पता मुझसे पाओ...
तुम्हारे इंतजार में बैठी हूँ....।
आओ और मेरी बेइज्जत कर जाओ...
मुझे सामने से गाली दे जाओ...।
क्योंकि इस देश में यही होता है....।
तुम्हारी गालियों के इंतजार में ......

आभा....

Sunday, May 25, 2008

राह से भटकते युवा कदम..

पहली घटना- आज से सात साल पहले मैं प्रोबेशनर थी और अपना तीन महीने का थानेदारी वाला पीरियड कर रही थी! दीवाली के दिन बड़े जोर शोर से जुआ खेलने वालों को पकड़ने निकली और पांच लड़कों को जुआ खेलते पकड़कर थाने लायी! सभी अच्छे घरों के थे और उनकी उम्र लगभग १६-१७ साल की रही होगी! सभी पकडे जाने के बाद डरे हुए थे और बार बार मुझसे मिन्नत कर रहे थे की मैं उन्हें इस बार छोड़ दूं..आगे से वे ऐसा नहीं करेंगे!पर मैंने उन्हें नहीं छोडा और मुकदमा बना दिया...छोटा अपराध था तो थाने पर ही जमानत पर छूट गए...अगले दिन पता चला उनमे से एक लड़के ने आत्महत्या कर ली! कारण मालूम हुआ की उसके माता -पिता ने बहुत डांटा और उसने शर्मिंदगी के कारण ये कदम उठाया!मुझे पता चला तो मैं स्तब्ध रह गयी...खुद को भी दोषी मान रही थी की अगर एक बार मैं उन्हें छोड़ देती तो शायद एक युवा लड़के की जान नहीं जाती!

दूसरी घटना- चार साल पहले एक १४ साल का लड़का थाने लाया गया! उसने अपने दोस्तों के साथ मिलकर मोटर साइकल चोरी की थी! उसके पिता एयर फोर्स में नौकरी करते थे और अक्सर बाहर ही रहते थे!जब उन्हें पता चला की उनके बेटे ने ऐसा किया है तो सदमे में आ गए!जब वे थाने पर आये तो उनके आंसू नहीं रुक रहे थे!बेटा भी अपनी गलती महसूस कर रहा था...माँ- बाप के सामने बुरी तरह रोते हुए माफ़ी मांग रहा था! एक तरफ अपराध था और दूसरी तरफ बच्चे का सारा कैरियर था! हम लोग भी चाहते थे की एक अवसर उसे सुधरने का दिया जाए वरना अगर एक बार जेल चला गया तो जिंदगी खराब हो जायेगी! इस वक्त पर मोटरसाइकल मालिक ने बहुत दरिया दिली दिखाई! उसने बच्चे को माफ़ करते हुए उसे एक मौका दिए जाने की गुजारिश की!आखिर लड़के को छोड़ दिया और उसने भी आगे पढाई करने का वादा किया!

तीसरी घटना- एक महीने पहले ट्रेन में ज़हरखुरानी करने वालों का एक गैंग पकडा ...उसमे भी लगभग १० लड़के ,जिनमे एक लड़की भी शामिल थी! ६ लड़के तो पक्के अपराधी थे लेकिन बाकी के ४ अच्छे घरों के पढ़ने वाले बच्चे थे जो महज जेब खर्च के लिए इन लड़कों की सोहबत में आकर ये काम कर रहे थे!खैर वो कई घटनाएं कर चुके थे इसलिए उन्हें जेल भेज दिया गया!

चौथी घटना- ताजा तरीन आरुशी केस हमारे सामने है जहाँ उसके कदम भटके और अंजाम हम सभी ने देखा!

इन सभी घटनाओं में जो बात कॉमन है वो ये की सभी अच्छे घरों के बच्चे थे और सभी के माता पिता उनकी गतिविधियों से अनजान!
आज एक ब्लॉग पर पढा की आरुशी हत्याकांड को देखते हुए अब वह वक्त आ गया है की नारियों को घर की और रुख कर लेना चाहिए! किसी दुसरे ब्लॉग पर इस पोस्ट का खंडन किया गया!एक और बहस शुरू...

समस्या इतनी गंभीर है कि बहस यह नहीं है कि बच्चों को देखने का काम किसका है! निस्संदेह माता पिता दोनों का ही है ! यदि माँ घरेलू महिला है तो स्वाभाविक रूप से वह ज्यादा वक्त दे सकती है.. और यदि दोनों ही कामकाजी हैं तो ज्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है!क्योकी पैरेंट्स की एब्सेंस में बच्चे ज्यादा छूट पा जाते हैं और यदि किशोर होते बच्चों पर उस वक्त ध्यान नहीं दिया गया तो जिम्मेदार भी पैरेंट्स ही होंगे! क्योंकि इस उम्र में बच्चे आसानी से बहक जाते हैं! कई बार माता या पिता में से किसी को अपने काम के चलते लम्बे समय तक घर से बाहर रहना पड़ता है तो जिम्मेदारी और बढ़ जाती है! जैसा कि आर्मी ,पुलिस या अन्य इसी प्रकार की नौकरियों में होता है!

आजकल भौतिक सुख सुविधाओं की होड़ , मूवीज और टेलीविज़न पर दिखाए जाने वाले प्रोग्राम्स ने बच्चों को समय से पहले परिपक्व कर दिया है! स्वस्थ मनोरंजन का घोर अभाव है!संयुक्त परिवारों में शायद थोडा बहुत कंट्रोल अभी भी है लेकिन जहाँ कोई उसकी गतिविधियों को देखने वाला नहीं है वहाँ दिक्कत ज्यादा है

दरअसल मुझे लगता है कि अभिभावकों को ये मालूम होना चाहिए कि उनका बच्चा किन लोगों के साथ उठ बैठ रहा है...जेब खर्च से ज्यादा तो उसके खर्चे नहीं है..और यदि बराबर ध्यान दिया जाए तो उसके रहन सहन के तरीकों में बदलाव आते ही सतर्क होने की ज़रूरत है! यदि बच्चा होस्टल में है तो अध्यापकों से निरंतर सम्पर्क बनाए रखने कि बेहद ज़रूरत है! लड़कियों के मामले में भी बेहद चौकस रहने की ज़रूरत है क्योंकि कम उम्र की लडकियां अक्सर बहक जाती हैं और घर तक से भाग जाती हैं! बड़े होते बच्चों से मित्रता का बर्ताव करने से वे काफी हद तक अपनी बातें शेयर करने लगते हैं लेकिन इसके अलावा भी अगर गलत संगत में बच्चा पड़ जाए तो कठोर कदम भी उठाना उतना ही ज़रूरी है..ताकि बच्चे के साथ पूरे परिवार और समाज का भी नुकसान न हो!

इस बहस में न पड़कर कि ये जिम्मेदारी माँ की है या पिता की...संयुक्त रूप से जिम्मेदारी का निर्वहन करना ही एकमात्र हल है!

Saturday, May 24, 2008

हक़ीक़त

मेरी पिछली पोस्ट में जो मैंनें लिखा वो तकरीबन 25-30 लाइनों का लिखा था और महज़ इतने से शब्दों में हकीकत को बयां करना नाकाफ़ी है। मैं ब्लॉग को अंतरतम में उमड़ रहे विचारों को व्यक्त करने का एक सार्थक माध्यम मानती हूँ जिस पर सबकी राय जानना चाहे वो सराहनीय हो अथवा नहीं स्वीकार्य है। मैं ब्लॉगों की लड़ाई में अपना अंदाज़े बयां लेकिन अपने मन्तव्य को रखना भारतीय संविधान के तहत दिये गये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अन्तर्गत मानती हूँ।

कॉलेज में जब हमें माइक पकड़कर पी टू सी की प्रैक्टिस कराई जाती थी तो लगता था कि देश की व्यवस्था में हम कुछ न कुछ बदलाव ज़रूर लाएंगे आख़िर ऐसा सोचें भी क्यों न पत्रकार होता भी तो है देश का चतुर्थ स्तम्भ। लेकिन मैदान-ए-जंग की हकीकत कुछ और ही होती है, जहां टैलेन्ट के एवज़ में हर चीज़ स्वीकार्य है। जैसे सुन्दर शक्ल, अच्छी काया और अगर आप लड़के हैं तो ठीक-ठाक उच्चारण क्षमता से काम सचल जाएगा क्योकि माना जाता है कि लड़कों में लड़कियों की अपेक्षा ज़्यादा दिमाग जो होता है । बाज़ार का एक फण्डा होता है (बाज़ार शब्द का अभिप्राय पत्रकारिता है) - जो दिखता है वो बिकता है। लेकिन जनाब आज काम इन चीज़ो से भी नहीं चलता है क्योंकि अब केवल मोहनी सूरत नहीं बल्की एक सॉलिड एप्रोच यानी गॉडफादर होगा तो ही काम आगे बढेगा।

हम जिन्हें स्थापित पत्रकार मान चुके हैं चाहे वो रवीश हों, देबांग हों (ये फेहरिस्त ज़रा लम्बी है) अगर आप अपने टैलेन्ट का बखान उनके सामने करेंगे तो या तो आजकल का सबसे अच्छा तरीका वो आपको अपना मेल आईडी दे देंगे -अपना रिज़्यूम मेल कर दीजिए देख लेंगे।.........फिर महीनों बाद जब कोई जवाब नहीं मिलता तो अंतत: आप ख़ुद जवाब की चाह में उनका नंबर घुमा देंगे।उधर से सीधा-सपाट उत्तर मिलेगा- अभी अगले देढ- दो साल तक कोई जगह नहीं है।अगर कोई अप्रोच हो तो..................

दूसरी जगह भी बाकायदा आप रिटन एक्ज़ाम देकर आते हैं और कई महीनों बाद जब आपको ये विस्मृत क्षण स्मरण हो आता है तो आपकी उंगलियां अनायास ही मोबाइल के नंबरों पर पड़ने लगती हैं और उत्तर कुछ यूं मिलता है- लिखा तो अच्छा है लेकिन किसी का अप्रोच लग जाए तो बात बन निकलेगी।

इन परिस्थितियों में आपकी स्थिति काटो तो खून नहीं वाली हो जाती है, जहॉ टैलेन्ट पर अप्रोच भारी पड़ता है। और पत्रकारिता का पूर्णिमा का चांद अमावस के चांद में तब्दील होना शुरू कर देता है।पत्रकारिता झूठी लगने लगती है, मन से एक आवाज़ आती है- तेरी ज़ुबान है एक झूठी जम्हूरियत की तरह

तू इक ज़लील सी गाली से बेहतरीन नहीं ।।

लेकिन अगर आज हर युवा स्त्री जो बिना किसी गॉडफादर के टी.वी.पत्रकारिता में अपनी जगह बनाना चाहती है इस लड़ाई का यही अंत मानेंगी तो कैसे काम चलोगा। माना कि इन पथरीली राहों पर चलना आसान नहीं पर अब ख़ुद को अहं ब्रह्मास्मि मानकर आगे कदम बढाना ही होगा। ये अंत नहीं आगाज़ है क्रान्ति का।

Friday, May 23, 2008

टी.वी पत्रकारिता का सच

पत्रकारिता कभी एक क्रान्तिकारी गली हुआ करती थी लेकिन आज ये एक बदनाम गली हो गई है ख़ास तौर पर लड़कियों के लिए क्योंकि लड़के तो अकसर बदनाम ही हुआ करते हैं। पहले बड़े से बड़ा मंत्री पत्रकार से डरता था कि कहीं उसकी कलई न खुल जाय लेकिन आज पत्रकारिता और ख़ास तौर पर टेलीविज़न पत्रकारिता ख़ुद ही कटघरे में खड़ी हो गयी है।
मैं इलाहाबाद के ब्राह्मण परिवार से हूँ जहाँ लड़कियों का टेलीविज़न पत्रकारिता में आना बहुत अच्छा नहीं माना जाता लेकिन फिर भी अगर बच्चे ज़िद पर अड़े हों तो मॉ-बाप को उनकी ज़िद के आगे झुकना ही पड़ता है।मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
परीक्षा की तैयारी की और भोपाल से जर्नलिज़्म की पढाई।आस-पड़ोस वालों के लिए टेलीविज़न पत्रकारिता का मतलब केवल माइक पकड़कर टीवी पर आना ही था।
उन्हें लगने लगा कि लड़की अब सीधे आज-तक या स्टार न्यूज़ में ही दिखेगी।
लेकिन उन्हें ये नहीं पता कि इसमें पर्दे के पीछे भी बहुत सारे काम होते हैं जो उतने ही महत्तवपूर्ण होते हैं जितने कि पर्दे के सामने के।
लेकिन सच्चाई भी यही है कि आज एक टीवी में दाख़िल होने के लिए एक लड़की को लगभग उतना ही संघर्ष करना पड़ता है जितना बिना किसी गॉडफादर के एक लड़की को बॉलीवुड में एंट्री के लिए करना पड़ता है।ये फील्ड भी आज उतना ही ग्लैमराईज़ हो चुका है जितना बॉलीवुड।हर कदम पर यहॉ भूखे गिद्घ शिकार की ताक में बैठे रहते हैं। कब कोई शिकार आए और वो उसे एक सांस में निगल जांय।
मेरे गुरूजी ने मुझे समझाते हुए एक बार कहा था- ये जगह काजल की कोठरी है जिसमें से तुम्हे बेदाग निकलना है।
अगर आपकी सुकुमारी का मन सौम्य है तो ध्यान दें क्योंकि पत्रकारिता सौम्यता की दुश्मन है।अगर उसके कानों ने कभी अपशब्द नहीं सुने तो चैनल में हर रोज़ उसे दूसरों के मुँह से गालियॉ सुनने की आदत हो जाएगी क्योंकी ये टेलेविज़न का एक तहज़ीबी हिस्सा है।
टेलीविज़न पत्रकारिता का सच वाकेयी कड़वा है लेकिन अगर आप इस काजल की कोठरी से साफ-सुथरे बाहर आ जाय तो ख़ुद को ख़ुशनसीब समझिएगा.....
सच तो कड़वा ही होता है लेकिन फिर भी अगर आपमें माद्दा हो और हौसले बुलन्द हों तो कूद पड़िये इस महायुद्ध में।

Wednesday, May 21, 2008

स्त्री विमर्श मे मक्कारी

अभी कुछ दिन पहले एक नया ज़ालिम ब्लॉग “नारी की कहानी” शुरु हुआ , यह ठीक था । सोचा कि चलो कोई शुरुआत करने वाला तो हुआ ।शायद पुरुष की बात पुरुष ज़्यादा अच्छे से सुनेंगे । पर दुखद यह है कि अंतत: सुनील की सोच भी उसी घिसी-पिटी लकीर पर चल निकली । यह ब्लॉग {अपने उदघोष के मुताबिक }“स्त्री की समानता ” की बात नही करता बल्कि स्त्री विमर्श के उमड़ते परिडृश्य मे एक डरे हुए पुरुष की ओर से सफाई पेश करता है । “चोर की दाढी मे तिनका” वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए ।स्त्री विमर्शकार जितना भी चिल्लाएँ चीखें कि लड़ाई पितृसत्ता से है पुरुष से नही ,और पुरुष तब निशाना बनते हैं जब वे पितृसत्ता को प्रिसर्व करने के पुनीत कर्तव्य मे लग जाते हैं ,लेकिन उसका कोई असर नही होता सिवाय इसके कि या तो हमारे विपरीत लिंगी साथी चुप्पी का सुरक्षित जामा पहन लेते हैं या पॉलिटीकल करेक्ट्नेस के चक्कर में हाँ –हाँ करते हैं या तलवारे तमंचे निकालकर उंगलियों पर गिनाए जा सकने वाले स्त्री अपराधों की फेहरिस्त का कवच तैयार कर लेते हैं ।

ऐसे में जो पुरुष सच्चे मन से स्त्री की साथी के रूप में कल्पना करते हैं और परिवर्तन मे सहयोग देना चाहते हैं वे भी हतशा का शिकार होते हैं ।
हाल की अपनी पोस्ट मे सुनील ने जो कहा वह मेरे लिए एक बड़ा सत्योद्घाटन है कि स्त्री के सुहाग चिह्नों का अपने पुरुष से कोई लेना देना नही बल्कि यह सुन्दरता का स्त्री का अधिकार है जिसका कोई भी स्त्री चाहे तो बहिष्कार कर सकती है –


“चूंकि महिला को सुन्दर का अधिकार हैं अतः उसे इन सब चीजों को धारण करने का भी अधिकार है.. हमने तो यहाँ तक पढ़ा है कि पाषंड युग में महिलाएं हड्डियों से बने आभूषण पहनती थी.. अतः आभूषण इत्यादी महिला के सौन्दर्य को निखारने के लिए हैं ना कि किसी और वजह के लिए..”

आपका पढा कहाँ तक सही है {और कहीं पर भी पढा हुआ अमल करने और अंतिम सत्य मान लेना चाहिये ऐसा किसने कहा } लेकिन शायद यह कहना ज़्यादा सही होगा कि “सुन्दरता किसी भी स्त्री का कर्तव्य है ” । सुन्दरता स्त्री के लिए ज़रूरी है ताकि कोई पुरुष उसे पसन्द कर सके । वर्ना यह कैसे होता है कि जो माता पिता बेटी को विवाह से पहले तक सजने सँवरने से मना करते हैं वही विवाह के लिए देखने आये लड़के के सामने उसे सजा-धजा कर पेश करते हैं । कुरूप स्त्री के विवाह मे सौ समस्याएँ आ सकती हैं पर पुरुष के लिए यह कभी कोई समस्या नही रही । पितृसत्ता ने हमेशा स्त्री का अस्तित्व “पुरुष के लिए “ माना और उसके सौन्दर्य का उपासक पुरुष को माना जिसके लिए स्त्री के उत्तेजक रूप और कामिनी रूप की धारणाओं ने ज़ोर पकड़ा ।
अमेरिका मे 60 के दशक मे ब्रा – बर्नर्स का प्रतीकात्मक आन्दोलन इसी सुन्दरता के मूल मुद्दे को लेकर था जिसके दौरान एक ब्यूटी पेजेंट में रेडिकल नारीवादियों ने सरे आम अपनी ब्रा कूड़ेदान में डाली और सौन्दर्य के उपकरणॉं का बहिष्कार किया ।सच मे कोई अंतर्वस्त्र नही जलाए गये थे । यह प्रतीकात्मक विरोध था पुरुष की अपेक्षाओं का । “तुम्हे ऐसा होना चाहिये , वैसा होना चाहिये , ऐसा दिखना चाहिये , वैसा नही दिखना चाहिये , स्तन गठे हुए होने चाहिये ,कमर पतली होनी चाहिये ....” क्यों ? बॉयकट बालों को रखना भी इसी विरोध का एक अंग था । वे साफ कहती थीं – तुम चाहते हो हम सुन्दर बन बन कर तुम्हें लुभाएँ ...यह हरगिज़ नही होगा ।

आज भी फिल्मों के हॉट सीन देखकर और हॉट अभिनेत्रियों को देखने की तड़प पुरुष के अन्दर है ....यह सुन्दर दिखने का अधिकार अपने लिये है तब तक माना जा सकता है जब इसका उद्देश्य हो तो इसे अधिकार कैसे माना जाए ...यह तो सेक्सी दिखने का कर्तव्य है ताकि पुरुष दर्शक आकर्षित हो और पैसा आये ।

यह और बात है कि सिन्धु और हड़प्पा सभ्यताओं में पुरुष भी गहने पहना करते थे और सुन्दर दिखना चाहते थे ।सोने के गहने , कुन्दन के गहने , रत्न जड़ित गहने , अन्गूठियाँ इन सभी का शौक राजाओं महाराजाओं को भी था । लेकिन कुछ गहने खास तौर से स्त्री के विवहित होने की निशानी थे जिन्हें धारण करने की विवशता पुरुष के साथ नही थी । । धीरे-धीरे सुहाग चिह्नों मंगल सूत्र , मांग मे सिन्दूर , हाथ मे भरी भरी चूड़ियाँ , बिछुए आदि एक विवाहित स्त्री के लिए अनिवार्य से हो गये । ये उसे बन्धन न लगें इसी लिए यह मानसिकता तैयार की गयी कि गहने किसी स्त्री के सौन्दर्य को निखारते हैं और सुन्दर स्त्री की साख होती है ।
मुझे याद है कि नयी नयी शादी के हफ्ते भर बाद ही जब मुझे बिना चूड़ियों और बिछुए के देखा गया तो घर भर ने टोका था ।धीरे धीरे सबको आदत हो गयी । मांग मे सिन्दूर भरने से हाथ मे चूड़िय़ाँ पहनने से , पांव मे बिछुए पहनने से यदि मेरी सुन्दरता का कोई लेना देना है तो मै शादी से पहले भी करना चाहूंगी .....बाद मे ही क्यों ?
मेरी एक सहेली को सादगी पर इसलिए लताड़ पड़ती थी कि – यह मेरे बेटे के लिये कोई सुहाग चिह्न धारण नही करती , कुलटा है , मेरे बेटे की लम्बी आयु से इसका कोई लेना देना नही ।
स्फेद वस्त्र पहनना अपराध है विवाहित स्त्री के लिए । अब भी नवविवाहिता एक आध साल बाद बेशक सफेद और अन्य किसी रंग का क़ॉम्बिनेशन पहन ले , पर पूरा सफेद कपड़ा धारण नही कर सकती । ऊंचे घराने इससे अलग ही रखिये जहाँ डिज़ाइनर शादियों का रिवाज़ और शोशेबाज़ियाँ चलती हैं ।

आज बाज़ारवाद के चलते फिर से पुरुष के सौन्दर्य की अवधारणा का जन्म हुआ है । बाज़ार अब न सिर्फ स्त्री के शरीर को भुनाने लगा है बल्कि पुरुष के शरीर को भी बेचने के तरीके ईजाद कर लिये हैं ।
लड़का भी गोरा होना चाहता है , सिक्स पैक ऐब्स चाहता है ,कूल लुक्स चाहता है ,कूल शेड्स चाहता है तो लड़कियाँ भी हॉट और परफेक्ट फिगर वाली होना चाहती हैं । इसमे एक मात्र बुराई बाज़ार है , लड़की या लड़का नही ।


इसलिए यह कहना कि “दुर्भाग्य से महिला सशक्तिकरण की बात करने वाले पुरुषों पर हर तरह के हमले करते हैं..और भूल जाते हैं कि पुरुष शत्रु नहीं मित्र हैं” ..

मुझे जल्दबाज़ी और नासमझी मे दिया गया बयान प्रतीत होता है। यह हाल हमारे अधिकांश मित्रों का है । जैसे ही कोई स्त्री समानता व समस्या पर बात होने लगे उनके गले मे कोई हड्डी फंस जाती है । वे तुरत फुरत स्त्री के दुश्चरित्र होने का कोई प्रमाण ले आते हैं या यह साबित करना चाहते हैं कि स्त्री स्वयम इस अवस्था के लिये दोषी है ।
जिसे सदियॉं तक शिक्षा से दूर रखा गया , जिसे हमेशा गुलामी की ट्रेनिंग दी गयी , जिसे हमेशा दीवारों मे कैद रखा गया , जिसे हमेशा दूसरों की आँखों मे अपना अक्स देखना सिखाया गया ,जो आज भी हाथ भर का घूंघट करती है वह अपनी अवस्था के लिए स्वयम दोषी है । यह तो वैसे ही हुआ कि किसी के हाथ काट कर कहो खुद लेकर पानी पी लो, हमने क्या हाथ बान्धे हैं तुम्हारे ?
ऐसा पुरुष मित्र कैसे हो सकता है जो सम्वेदनशील होने की बजाय अपनी सफाई देने को उद्यत हो । दुर्भाग्य से कुछ पुरुष साथी समस्त स्त्री विमर्श के चलते अपना भविष्य अन्धेरे मे देखते हैं । और दिन रात यही चिंता करते है कि यदि दुनिया भर की औरत सच मे आज़ाद और बराबर हो गयी तो क्या कहर मचायेगी ।वे व्यभिचारिणी हो जायेंगी । वे लिव इन रिलेशन मे रहने लगेंगी । वे सिज़ेरियन बच्चा पैदा करने लगेंगी । वे अल्फा वूमेन हो जायेंगी
हमारी तो सारी व्यवस्था एक मात्र स्त्री पर ही टिकी है ...वह हिली तो सब कुछ ढह जायेगा । उसे बलिदान देना ही होगा ताकि परिवार टिके रहें , ताकि समाज टिका रहे , ताकि संतति {जिसपर उसका कोई हक नही } की उत्पत्ति होती रहे , ताकि मनोरंजन के स्रोत बने रहें ।

मुझे हैरानी है कि ऐसा समाज जो इतनी विषमताओं से भरा हुआ है उसमें परिवर्तन में अपनी ओर से ईमानदार भागीदारी किए बिना कोई उसके टिके रहने की कामना भी क्यूँ और कैसे कर कर सकता है । यदि स्त्री के स्वतंत्र होने से अराजकता आती है तो आ जाने दीजिये न । किसे बचाना है ?डर किसका है ? अब तक जो बहुपत्नीवाद , रखैल उपपत्नीवाद , वेश्यागमन जैसे व्यभिचार पुरुष ने किए एक दो स्त्रियों के वैसा करने से क्यों घबराहट होती है ।
दलित की खून चूसने वाले ब्राह्मण समाज को अब यदि दलितों के आरक्षण सता रहे है ,डरा रहे हैं तो क्यों ? अब तक जो ब्रह्मानन्द आपने लूटा वे भी पा रहे हैं तो तकलीफ क्यों ?
जब आप चिंतित होने के सिवा कुछ नही कर सकते तो ढह ही जाने दीजिये ऐसी व्यवस्था को जो हाशिये के लोगों को जीने का , सांस लेने का हक नही देती । फैलने दीजिये अव्यवस्था । अव्यवस्था मे से ही शायद नये समाज और नयी व्यवस्था के बीज पैदा होंगे ।जिस घर में नवीनीकरण सम्भव नही उसकी इमारत ढहा दीजिये ।

इतिहास और विज्ञान गवाह हैं कि नष्ट होने के बाद हमेशा पुनर्निर्माण हुआ है । सृष्टि हमेशा विकास की ओर चली है ।सभ्यताएँ नष्ट हुई हैं तो फिर बसी भी हैं ।

Tuesday, May 20, 2008

मृगमरीचिका

जब से पत्रकारिता की इस मायावी दुनिया में कदम रखा है एक स्त्री होने के नाते बहुत सारे अच्छे बुरे और बेतुके अनुभव हुए हैं लेकिन एक बात जो नर्विवाद रूप से सामने आयी है वो ये पत्रकारिता अब महज़ बिज़नेस बनकर रह गया है जहां ईमान की बातें करना अपना मखौल उड़वाना है , जिसके तहत कई बार मैनें भी अपना मज़ाक उड़वाया है। ये एक मृगमरीचिका बन गया है। दूर से देखने में सबकुछ सच सा भ्रम पैदै करता है लेकिन जब हम सच से बावस्ता होते हैं तो उस मृगमरीचिका की स्वर्णमयी जलराशि, रूखे बेजान चुभने वाले बालू में तब्दील हो जाती है।
एक ख़बर जो सच से कोसों दूर होती हुई भी सच है। क्योकि आज के ख़बरिया चैनल वही दिखाते हैं जो सच है।
पढा था दुष्यन्त कुमार को-
कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता ।
एक पत्थर तो तबीयत से उछालों यारों ।।
आप अपनी तबीयत से पत्थर उछाल-उछाल कर थक जाएंगे लेकिन सूराख है कि होने का नाम ही नहीं लेगा और ऐसे न जाने कितने करोड़ो पत्थरों को उछालने के बाद अंतत इस खोखली व्यावसायिकता का हिस्सा बनने पर मजबूर हो जाएंगे। इस भीड़ का मुसाफिर बनना शायद एक स्त्री पत्रकार के लिए ज़्यादा सहज हो जाता है। लेकिन ये सहजता कब तक स्वीकार्य होगी। प्रश्न जटिल है लेकिन सोचने योग्य..........

प्रतिष्ठा बचाने के लिए मारी जा रही चोखेरबालियाँ

सुनीता गर्भवती थी। उसे उसके पिता, भाइयों, रिश्तेदारों और गाँववालों ने अभूतपूर्व एकता का परिचय देते हुए बेरहमी से मार डाला। इसके बाद क्या कुछ और कहना बाकी है? क्या यह बताने से अपराध की बर्बरता में कुछ कमी होगी कि उसने उस पति को छोड़ दिया था, जिससे उसके घरवालों ने उसकी शादी की थी और अपने दस साल पुराने प्रेमी जसबीर के साथ रह रही थी ?
करनाल के बालाह गाँव में जसबीर को भी उसके साथ मारा गया और फिर लाश को घर के सामने पेड़ पर लटका दिया गया। सुनीता के पिता ने शान से पुलिस के सामने जाकर समर्पण किया जैसे भगतसिंह ने संसद में बम फोड़ने के बाद किया था। हत्याएं बहुत होती हैं, लेकिन बड़ी बात है कि पूरे गाँव को इस कृत्य पर गर्व है।
पिछले कुछ सालों मे एक शब्द बहुत तेजी से चला है- 'ऑनर किलिंग' यानी 'प्रतिष्ठा' बचाने के लिए हत्या। और यह जो तथाकथित प्रतिष्ठा है, यह सब स्त्रियों से ही है। पुरुष कितना भी पतित हो, ऐसे किसी परिवार या समाज की इज्जत पर रत्ती भर भी फ़र्क नहीं पड़ता, लेकिन लड़की अरेंज मैरिज करने से मना कर दे, या किसी से प्रेम करने लगे या भाग जाए तो फिर उसे मारना ही इन लोगों के पास एक विकल्प रह जाता है। फिर बार बार ऐसा कुछ किया जाता है, जिससे बाकी लड़कियों के मन में भय बैठे। मीडिया पेड़ पर लटकी हुई लाशों को बार बार टी वी पर दिखाता है जिससे बसथली, शेखपुरा, उचाना, शम्सीपुर या मेरठ, ग्वालियर, बीकानेर या दिल्ली, मुम्बई, बैंगलूर में भी किसी कच्चे-पक्के घर या ऊँची इमारत में टी वी देख रही लड़कियाँ ऐसा सोचते हुए भी काँप जाती हैं। बालाह के सरपंच कहते हैं कि ऐसा किया भी इसी उद्देश्य से गया है कि लड़कियाँ ऐसी हरकत करती हुई डरें।
माने आप बताएंगे कि उन्हें करना क्या है, दुपट्टा कहाँ तक होना चाहिए, चलते हुए पैर किस तरह पड़ने चाहिए, अख़बार का कौनसा पन्ना उन्हें नहीं पढ़ना चाहिए, कितने बजे तक अच्छी लड़कियों को सो जाना चाहिए, पढ़ाई करनी है तो कौन कौन से विषय उनके लिए अच्छे रहेंगे (अक्सर सिर्फ़ होमसाइंस), कौनसी नौकरी उनके लिए ठीक है (मैंने पढ़े लिखे समझदार बुद्धिजीवी लोगों को भी बहुत जोर देकर यह कहते हुए सुना है कि लड़कियाँ नौकरी करें तो टीचर ही बनना चाहिए, बाकी काम उनके लिए ठीक नहीं है), चरित्रहीन न लगें इसके लिए किस उम्र तक उन्हें शादी कर लेनी चाहिए........
और यदि एक भी बात वे नहीं मानती तो आपका परिवार बदनाम हो जाता है और फिर आपको वही करना पड़ता है, जो राम ने सीता के साथ किया था...आग में फूंक डालना।
ऐसा भी नहीं है कि यह मानसिकता गाँवों में ही है। लड़की बग़ावत कर रही है तो यही समाधान बालाह से लेकर बम्बई तक सबको सूझता है। ज्यादातर मामलों में लड़की के साथ उसके प्रेमी को भी मार दिया जाता है मगर यही क्यों कहता है कि यह कृत्य हमेशा लड़की के परिवार वाले ही करते हैं?
इसका सबसे आश्चर्यजनक और दुखद पहलू यह है कि परिवार की महिलाएँ भी पुरुषों को पूरा समर्थन दे रही होती हैं। एक उम्र तक आते आते शायद वे भी इसी तालिबानी सोच का अंग बन जाती हैं या यह कहा जा सकता है कि वे इतनी असंवेदनशील हो चुकी होती हैं कि औरत होकर भी औरत का दर्द नहीं समझ पाती। यह सबसे चिंताजनक तथ्य है क्योंकि ऐसा होने पर हत्यारों को लाइसेंस मिल जाता है कि वे सही हैं।
बालह वाली घटना के चार दिन बाद ग्वालियर में एक सेवानिवृत्त सैनिक ने अपनी बीस साल की बेटी वन्दना को इसलिए मार डाला था कि वह एक मराठी युवक से शादी करना चाहती थी। उससे पहले आठ अप्रैल को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गढ़िया गाँव में एक किशोरी ममता इसलिए मार दी गई क्योंकि उसके पिता ने उसके कमरे में उसकी क्लास के एक लड़के को देख लिया था।
वन्दना की माँ कहती है कि उसके पति ने सही किया। ममता की दादी कहती है कि उसे यही सजा मिलनी चाहिए थी।
सुरेश गुप्ता जी ने अपनी एक पोस्ट में एक केस बताकर कहा था कि क्या वह नारी का रूप है, जिसने अपने परिवार वालों को बेरहमी से मार दिया। उनसे आग्रह है कि ये तथ्य देखें-
हरियाणा के डीजीपी के अनुसार हरियाणा में होने वाली महिलाओं की हत्याओं में से दस फीसदी ऑनर किलिंग्स होती हैं।
2007 में आई पी एस एस द्वारा करवाए गए एक सर्वेक्षण में 655 ऑनर किलिंग्स दर्ज़ हुई थी, जिसमें से 25% अकेले मुज़फ्फरनगर जिले में थी और 32% पंजाब और दिल्ली में। हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और पश्चिमी उत्तरप्रदेश में यह हत्याएं सबसे ज्यादा हैं। ये सब जाटबहुल इलाके हैं और ऐसे ज्यादातर मामले भी जाट समुदाय के ही हैं। बहुत से मामलों में तो पंचायतें यह फैसला सुनाती हैं।
ये चोखेरबाली हैं, जिन्हें अपने पिताओं, भाइयों, माँओं से ही सबसे ज्यादा खतरा है...और उनकी गलती सिर्फ़ यही है कि वे आज़ाद होकर अपने फैसले अपने आप लेना चाहती हैं।

गौरव सोलंकी

Monday, May 19, 2008

अपराध और स्त्रियाँ

स्त्रियों के महिमान्वयन का सवाल

राजकिशोर

पुरुष क्रूर और निर्दय होते हैं तथा स्त्रियां सहृदय और ममतामयी -- साहित्य और संस्कृति में परंपरागत मान्यता यही है। इस मान्यता को आज भी सार्वजनिक भाषणों में दुहराया जाता है। लेकिन ज्यादातर पुरुष इससे सहमत दिखाई नहीं देते। स्त्रियों को आज तक जिस तरह पद-दलित किया गया है और आज भी किया जा रहा है, उसे देखते हुए यह उम्मीद बेकार है कि स्त्रियों के गुणों और विशेषताओं को सामान्य जन द्वारा स्वीकार किया जाएगा। गुलामों में क्या गुण हो सकता है ! अगर कुछ गुण दिखाई देते हैं, तो इसी कारण कि उन्हें बंधन में रखा गया है। दिलचस्प यह है कि जहां साहित्य और संस्कृति में स्त्री जाति का महिमान्वयन किया गया है, वहीं लोक जीवन में ऐसी अनेक कहावतें प्रचलित हैं, जिनके अनुसार स्त्री बहुत ही धूर्त, बेवफा और मूर्ख प्राणी है। एक कहावत में कहा गया है कि स्त्रियों को नाक न हो, तो वे गू खाएं। दूसरी कहावत त्रिया चरित्र के बारे में : खसम मारके सत्ती होय।

आधुनिक भारत में स्त्रियों के प्रति यह विद्वेष और मजबूत हुआ है। इसका कारण यह है कि शिक्षा और अवसर पाने के बाद स्त्रियां बड़े पैमाने पर ऐसे रोजगारों में उतरी हैं जो पुरुषों के लिए आरक्षित माने जाते रहे हैं। इस तरह पुरुषों के लिए अवसर कुछ कम हुए हैं। यद्यपि दुनिया भर का अनुभव यही है कि स्त्रियों को पुरुषों की तुलना में कम महत्वपूर्ण काम दिए जाते हैं और उन्हें वेतन तथा मजदूरी भी कम मिलती है। फिर भी स्त्रियों का सार्वजनिक जीवन में उतरना मर्दों को नहीं भाता। सार्वजनिक जीवन में स्त्रियों के उतरने से पुरुष-स्त्री के बीच समानता के मूल्य बनते हैं और स्त्रियों में विभिन्न स्तरों पर आत्मनिर्भरता आती है। यह पुरुषों के लिए संकेत है कि सत्ता पर उनका एकाधिकार खत्म हो रहा है और स्त्रियां, जो अब तक उनके कब्जे में रही हंैै, आजाद हो रही हैं। यह बात गैर-प्रबुद्ध पुरुष मंडली को नागवार गुजरती है। मुख्यतः यही कारण है कि महिला आरक्षण विधेयक पुरुष-प्रधान भारतीय संसद में पारित नहीं हो पा रहा है।

हाल ही में जेपीनगर जिला मुख्यालय के पास बाबनखेरी गांव में एक लोमहर्षक कांड हुआ। एक महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिल कर अपने माता-पिता, दोनों भाइयों, भाभी, ममेरी बहन की दोस्त और एक नाबालिग भतीजे की हत्या कर दी। यह इस तरह का शायद पहला कांड है। कारण क्या था, इस बारे में निश्चयपूर्वक कुछ बताया नहीं जा सका है। कारण कितना भी प्रबल हो, पर एक ही रात में सात-सात परिजनों की हत्या एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है। इस करुण घटना पर टिप्पणी करते हुए एक सज्जन 'चोखेर बाली' नामक विख्यात ब्लॉग में 'औरत ऐसी भी होती है क्या' शीर्षक से लिखते हैं : 'मिनटों में इस नारी ने एक प्यार भरे घर को कब्रिस्तान बना डाला। नारी मां होती है, पर इस नारी ने तो एक डायन का रोल अदा किया। क्यों किया उसने यह सब? क्या कमी थी उसे? क्या चल रहा था उसके मन में ? क्या यह सब उसने अपने प्रेमी के लिए किया?'

ये बड़े सवाल हैं। इनका उत्तर विस्तृत जांच के बाद ही मिल सकता है। लेकिन इस तरह की घटनाएं आजकल काफी छपने लगी हैं कि पत्नी ने अपने प्रेमी के साथ मिल कर पति को जहर दे दिया या प्रेमी-प्रेमिका दोनों ने मिल कर पत्नी या पति की हत्या कर दी। ऐसी घटनाएं पता नहीं कब से हो रही हैं। इन्हीं की ओर संकेत करने के लिए 'किस्सा तोता मैना' जैसी दिलचस्प किताब लिखी गई थी, जिसमें तोता एक कहानी द्वारा साबित करता है कि औरतें बेवफा होती हैं, तो मैना दूसरी कहानी के माध्यम से साबित करती है कि नहीं, बेवफा तो मर्द होते हैं। सच्चाई यह है कि दोनों ही अर्धसत्य हैं। पहले पुरुष ज्यादा स्वैराचारी होते थे, तो आजादी और खुलापन बढ़ने से अब स्त्रियां भी स्वैराचारी होने लगी हैं और हिंसा को भी अपना रही हैं। इससे पुरुष मानसिकता के अनेक प्रतिनिधि यह कहने लगे हैं कि स्त्रियों का महिमान्वयन ठीक नहीं है, क्योंकि त्रिया चरित्र ही उनका वास्तविक गुण है। जब वे और ज्यादा आजाद होंगी, तो और कहर मचाएंगी।

पश्चिम में जहां स्त्रियां काफी हद तक आजाद हो चुकी हैं, ऐसे प्रमाण नहीं मिलते कि वे बड़े पैमान पर डायन हो चुकी हैं। उनमें से अनेक हिंसा कर रही हैं और परिवारों को बरबाद कर रही हैं, यह तथ्य है। लेकिन यह साबित होना बाकी है कि स्त्री का वास्तविक रूप यही है। सभी समाजों में स्त्रियां अधिक मानवीय दिखाई देती हैं। शायद प्रकृति ने उन्हें ऐसा बनाया ही है, क्योंकि इसके बिना वे संतति परंपरा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं कर पातीं। बेशक कुछ माताएं भी क्रूर साबित हुई हैं, लेकिन ये घटनाएं अपवाद ही हैं, नियम का रूप नहीं ले पाई हैं। फिर भी यह मानने में कोई हर्ज नहीं दिखाई देता कि हम वास्तविक स्त्री को नहीं जानते। अभी तक स्त्रियों को बनाया गया है। वे अपने स्वाभाविक रूप में प्रस्फुटित नहीं हुई हैं। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पुरुष भी वैसे बनाए गए हैं जिस रूप में वे उपलब्ध हैं। अर्थात एक ही संस्कृति एक खास तरह के पुरुष और एक खास तरह की स्त्रियों का निर्माण कर रही है। फिर भी इसी संस्कृति में गौतम बुद्ध, ईसा मसीह और गांधी जैसे पुरुष पैदा होते हैं और कैकेयी, तिष्यरक्षिता तथा फूलन जैसी स्त्रियां।

तथ्य यह भी है कि जब पुरुष कोई क्रूर घटना करता है, तो हम दांतों तले उंगली नहीं दबाते। लेकिन जब स्त्री ऐसा करती है, तो हम घोर आश्चर्य में पड़ जाते हैं। इसी से साबित होता है कि पुरुष की तुलना में स्त्रियों से अधिक मानवीय होने की अपेक्षा की जाती है। क्या इसी बात में स्त्री चरित्र के बेहतर होने की स्थापना निहित नहीं है? आखिर कोई तो वजह है कि अब तक कोई स्त्री हिटलर, मुसोलिनी, स्टालिन या माओ नहीं बनी। इसका यह उत्तर पर्याप्त नहीं है कि स्त्रियों को पर्याप्त राजनीतिक सत्ता नहीं मिली है। जबाब यह भी दिया जा सकता है कि स्त्रियों के हाथ में पहले सत्ता तो दीजिए, फिर देखिए क्या होता है। हो सकता है कि स्त्री-पुरुष के बारे में परंपरागत मान्यताएं ध्वस्त हो जाएं। हो सकता है, व्यवस्था में सुधार आए। जो भी हो, निवेदन है कि पुरुष की तरह स्त्री को भी वैसा बनने का हक दीजिए जैसा वह होना चाहती है। एक वर्ग आजाद हो या नहीं, इसका फैसला करनेवाला दूसरा वर्ग कैसे हो सकता है? 000

Sunday, May 18, 2008

अस्तित्व की जंग

मैं भी एक औरत हूँ शायद इसलिए ही इस विषय का चुनाव किया है, यानि मैं भी स्वार्थी हुई। इस स्वार्थ के लिए क्षमा चाहती हूँ........
चलिए इसकी शुरुआत करते हैं वेदों सें जहाँ नारी पूज्य थी। उसमें एक संस्कार अभीप्सित था। यहाँ ये बता देना आवश्यक है कि संस्कार वो है जो हमारे अंतरतम तक पैठा हुआ है। यह पैठ इतनी गहरी होती है जिसे बड़ी मशक्कत के बाद ही उखाड़ फेका जा सकता है। नारी ने आरंभ से ही अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष किया है, सच यही है।
भले ही वेदों में लिखा गया हो-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते
रमन्ते तत्र देवता।

लेकिन सच इससे हमेंशा से अलहदा रहा है। मैथिली शरण गुप्त की ये पंक्तियाँ नारी पर हमेशा से मौजूं रही हैं चाहे वो वैदिक कालीन सभ्यता हो चाहे हड़प्पा कालीन चाहे छायावादी युग रहा हो या फिर इक्कीसवीं शताब्दी।
अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी ।
आंचल में है दूध और आँखों में पानी ।।
एक दिन यूंही अपने घर की छत पर टहल रही थी... हवा तेज़ चल रही थी.... आँखें अनायास ही क्षितिज पर जा टिक रहीं थी। कभी मन बादल की बनती बिगड़ती रेखाओं पर जा टिकता तो कभी एक शायद फालतू समझी जाने वाली चीज़, जी हां क्योंकी स्त्री आज केवल एक चीज़ ही रह गयी है। लेकिन इसके लिए दोशी केवल समाज नहीं काफी हद तक वो ख़ुद है। इसकी अगर गहरी पड़ताल की जाय तो पूरी तरह से वो ख़ुद भी दोषी नहीं ,बल्की घूम-फिरकर बात वहीं संस्कारों पर आ टिकती है कि कहीं न कहीं इसके लिए उसके संस्कार ज़िम्मेदार हैं।
प्रेम,त्याग और भोग की वस्तु समझी जाने वाली नारी में कभी हम उसके प्रगतिवादी रूप की कल्पना नहीं करना चाहते। हमारे लिए उसके इस रूप की कल्पना उसे दुश्चरित्रता की कोटि में ला खड़ा करती है हालाकि कवि दिनकर ने ये बात समझी थी-
दृष्टि का जो पेय है रक्त का भोजन नहीं है ।
रूप की आराधना का मार्ग आलिंगन नहीं है।।

क्रान्ति की बयार कहीं भी बह सकती है, उसकी दिशा निर्धारित नहीं होती।
घर पर बैठकर आँसू बहाना और भाग्य को दोष देना केवल कायर ही कर सकता है, कर्मठ जूझते- लड़ते झंझावातों का सामना करते गन्तव्य तक पँहुच ही जाता है।भले ही इसमें उसे बहुत वक़्त लग जाए और वह लहू लुहान भी हो जाए ।


स्त्री को अबला नाम के चक्रव्यूह् से बाहर निकलने की ज़रूरत है।साथ ही स्त्री की तरक्की के उदाहरण दे कर सब कुछ बदल गया है कि दुहाई देने वालों को भी असलियत से मुँह नही मोडना चाहिये । एक अरब से अधिक की आबादी वाले इस देश में आज महिलाओं से जुड़े उदाहरण हम अपनी उंगलियों पर गिना सकते हैं। ये शर्मनाक नहीं त्रासदीपूर्ण है।

नारी केवल श्रद्धा नहीं है, अबला नहीं है, केवल दया की पात्र नहीं है बल्कि आज उसे ख़ुद अंधेरे गलियारों में टहल कर संभावनाएं तलाशनें की ज़रूरत है। उसके अस्तित्व की जंग अनादि काल से किस काल तक जारी रहने वाली है पता नही , लेकिन यह संघर्ष जारी रहना ज़रूरी है , मशाल का जलाए रखना ज़रूरी है , सवाल उठना ज़रूरी है ... ..............


स्मृति दुबे



स्मृति दुबे दिल्ली की एक सजग टी वी पत्रकार हैं ।पत्रकारिता के हालिया परिदृश्य को लेकर वे चिंतित दिखाई देती हैं लेकिन आत्मविश्वास से भरपूर हैं । स्मृति समाज व राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य को लेकर गम्भीर भी हैं । चोखेर बाली में यह उनकी पहली पोस्ट हैं ।उम्मीद है स्वप्नों और हौसलों से भरी यह युवा पत्रकार चिंतन और अनुभवों के बहुत से रंग रूप हमे दिखा पायेंगी ।

Saturday, May 17, 2008

" कर्म - योगिनी "

कर्म योगी बनो ,कहा हमेँ हरि मधुसूदन ने,
गीता का अमर सँदेश हुआ आम आज घर घर मेँ


क्या भारत या क्या विदेश ,
नारी बनी " कर्म - योगिनी "
आज वो नही थकती ,
अपनों के लिए , स्वयं के लिए ,
वह क्या कुछ आज , नही किया करती !


किँतु, आज भी प्रश्नोँ के चक्रव्युहोँ से नहीँ उभरी,


अभिमन्यु, बीँध गया शर से, हो गया अमर !


नारी, पीती रही कई घूँट, हाला के,


ना बन पाई "नीलक़ँठी" ना बन पाई अमर !


- लावण्या

Friday, May 16, 2008

अपराधों का लैंगिक वर्गीकरण

अनुराग अन्वेषी


सुरेश जी का 'दहल' जाना पढ़ा और दूसरों को 'दहलाने की उनकी कोशिश' भी
देखी। सुरेश जी कितने संवेदनशील हैं इस बात का पता इससे ही चल जाता है कि
उन्होंने इतनी भयंकर वारदात को महज 'घटना' माना है। उन्होंने लिखा है 'यह
नारी अशिक्षित नहीं है. उसने अंग्रेजी में एम् ऐ किया है. ' सुरेश जी,
शिक्षित होने का संबंध जो लोग डिग्रियों से तौलते हैं, मुझे उनके शिक्षित
होने पर संदेह होने लगता है। आपको ढेर सारे ऐसे लोगों के उदाहरण अपने
समाज में मिल जाएंगे, जिन्होंने स्कूल-कॉलेज का चेहरा तक नहीं देखा, पर
उनकी शालीनता और उनके संस्कार के सामने डिग्रीधारी भी बौने नजर आने लगते
हैं।
आपने लिखा 'उसके पिता ने अपनी इस एकलौती बेटी को बेटों जैसा प्यार दिया.
शिक्षा पूरी होने पर उसे एक स्कूल में अध्यापिका की जाब दिला दी.'
दो-तीन बातें इन दो वाक्यों पर। पहली बात तो यह कि उस पिता ने सिर्फ
प्यार दिया। यह आकलन आपका है क्या कि बेटों जैसा प्यार दिया? जो परिवार
अपनी बेटी को एमए तक की पढ़ाई करने का अवसर दे, वह दकियानूसी नहीं हो
सकता। दकियानूस दृष्टि यह है कि हम उसे कहें कि उसे बेटों जैसा प्यार
दिया। खतरनाक बात यह कि अध्यापक पिता ने अपनी बेटी को पढ़ा तो दिया पर
उसके भीतर समझ पैदा नहीं कर सका, संस्कार पैदा नहीं कर सका। और तो और
आपके मुताबिक 'शिक्षा पूरी होने पर उसे एक स्कूल में अध्यापिका की जाब
दिला दी।' गौर करें सुरेश जी, वह लड़की इतनी भी शिक्षित नहीं थी कि एक
छोटी-सी जॉब पा सके। आपके मुताबिक, उसके टीचर पिता ने उसे जॉब दिलाई थी।
एक दुखद बात और कि जो टीचर अपने घर के बच्चे को सही और गलत के अंतर को
समझ पाने की दृष्टि नहीं दे सका, वह समाज को क्या सिखलाएगा? और आखिर में
एक कुतर्क, अगर बाप ने बेटी को बेटों जैसा प्यार दिया, तो बेटी ने भी उस
प्यार का सम्मान करते हुए बेटों जैसा काम किया। बहरहाल, अपराध न बेटा
(पुरुष) करता है, न बेटी (स्त्री)। यह आपको भी समझना चाहिए।

आपने लिखा 'मैंने भी जब इस के बारे में सुना... '। पर आपने हमें जो
सुनाया, वह तो लाइव कमेंट्री की तरह है। लगा ऐसा कि हत्याएं हो रही हैं
और आप वहां खड़े होकर बारीक तरीके से वारदात के हर स्टेप को अपनी डायरी
में दर्ज कर रहे हों। दरअसल, आपने इस वारदात को अपनी ओर से रोचक बनाने की
अथक कोशिश की है। हां सुरेश जी, अपराध की प्रकृति ही ऐसी होती है कि वह
रोचक नहीं हो सकता, वह घृणित ही रहेगा। उसे रोचक अंदाज में पेश करने की
कोशिश उससे भी ज्यादा घृणित। ऐसी किसी वारदात को स्त्री-पुरुष से जोड़कर
देखने वाली दृष्टि इस समाज के लिए कितनी खतरनाक है, इस पर अगर आप विचार
कर सकें (मुझे संदेह है) तो करें। और फिर बताएं कि यह अपराध किसी स्त्री
ने किया या किसी पुरुष ने?

अनुराग अन्वेषी

Wednesday, May 14, 2008

न महिला ,न पुरुष....केवल इंसान

कल सुरेश जी की पोस्ट पढ़ने के बाद अपने आप को रोक नहीं सकी ये पोस्ट लिखने से!एक अपराध की घटना इसलिए यहाँ स्थान पाती है क्योकी इसमें महिला शामिल है!कार्यों, व्यवसायों के साथ अब हमने अपराध पर भी लिंग भेद करना शुरू कर दिया है! मुझे आश्चर्य होता है जब कई पढे लिखे लोग मुझसे कहते हैं की अच्छा है आप ईमानदार है, महिलाओं के लिए भ्रष्टाचार ठीक नहीं!पता नहीं कौन सी सोच है जो पुरुषों के लिए भ्रष्टाचार को जस्टिफाई करती है !हम क्यों ये नहीं सोच सकते की अमुक चीज़ इंसानों के लिए गलत है और अमुक चीज़ सही!महिला के सिगरेट, शराब पीने पर आश्चर्य क्यों!कोई पुरुष के लिए तो मैंने किसी को इन चीजों के लिए आश्चर्य करते नहीं देखा! महिला भी एक आम इंसान है...वो भी अच्छी ,बुरी, दोनों तरह की हो सकती है!

२ वर्ष पहले की बात है..ग्वालियर में पहली बार एक महिला को शराब का ठेका मिला!सभी मर्दों के बीच वही एक महिला थी जो उस कार्य को कर रही थी! अगले दिन एक पत्रकार मेरे पास आया और बोला कि इस विषय पर मुझे आपकी राय चाहिए...एक महिला होकर शराब का व्यवसाय कर रही है!आप क्या सोचती हैं? मैंने सहज भाव में उत्तर दिया कि इसमें सोचने जैसी क्या बात है, वो अपनी मर्जी का व्यवसाय कर रही है! उस पत्रकार को मुझ से इस उत्तर की उम्मीद नहीं थी! उसने हैरानी से पुनः प्रश्न किया" क्या आप इसे ठीक मानती हैं कि एक भारतीय महिला शराब का व्यवसाय करे? मैंने इस बार उससे प्रश्न किया "क्या आप शराब के व्यवसाय को गलत मानते हैं" वो बोला "बिलकुल नहीं, लेकिन एक महिला....? मैंने कहा यदि पुरुष के लिए शराब व्यवसाय सही है तो महिला के लिए भी किसी कोण से गलत नहीं है" खैर उसको मन माफिक जवाब नहीं मिला...और उसने मेरे इस बयान को अखबार में स्थान नहीं दिया!

लेकिन मेरे मन में कई प्रश्न कौंध गए! क्या उस पत्रकार की गलती है कि वह ऐसे सोचता है? क्यों महिलाओं को आश्चर्य से देखा जाता है जब वे तथाकथित पुरुषों वाले व्यवसाय में प्रवेश करती हैं? मैंने इन प्रश्नों के जवाब खोजने कि कोशिश की.. वास्तव में मुझे लगता है कि हम जाने अनजाने ही बचपन से ही नन्हें बच्चे ,बच्चियों के मन में बीज पैदा कर देते है कि उन्हें क्या करना है,क्या नहीं! एक छोटा सा उदाहरण लें.....किसी छोटे लड़के के जन्मदिन पर हम जाते हैं तो उसे कोई कार,कोई गेम या कोई बंदूक उपहार में देते हैं जबकि किसी छोटी बच्ची के जन्मदिन पर हम उसे कोई गुडिया ,सॉफ्ट टॉय, पेंटिंग बुक या किचन सेट उपहार में देते हैं! मैंने कभी नहीं देखा कि हम किसी लड़के को किचन सेट गिफ्ट करते हों! जब एक बच्चा पैदा होता है तो सिर्फ उसके बायोलोजिकल जेंडर स्त्री या पुरुष होते हैं....लेकिन धीरे धीरे उसके सोशल जेंडर भी चेंज हो जाते हैं!बचपन से ही उन्हें सिखाया जाता है कि आगे चलकर तुम्हारे रोल क्या होंगे!

हमारे सामजिक ढांचा ही ऐसा है! अभी पिछले हफ्ते मैंने एक टी.वी प्रोग्राम पर अभिनेत्री तनुजा का स्टेटमेंट देखा जिसमे उन्होने बताया कि उन्हें और उनके भाइयों को एक साथ खाना बनाना, कपडे धोना और बाहर साइकल चलाना सिखाया गया!मुझे अच्छा लगा...लेकिन आज भी कितने ऐसे परिवार हैं जो लड़कों से रसोई में उतना ही काम करवाते है जितना कि लड़कियों से! हांलाकि सोच बदल रही है लेकिन परिवर्तन लाने के लिए हर एक को अपने विचारों में परिवर्तन लाना होगा! ये काम भाषण देने से नहीं होगा हम खुद अमल करेंगे तब दुसरे खुद बा खुद समझेंगे!हर समाज की अपनी मान्यताएं हैं...जब मैं गोवा गयी तो मैंने देखा वहाँ वाइन शॉप पर लडकियां ही काम कर रही थीं और वहाँ पर यह उतना ही सामान्य था जितना हमारे यहाँ लड़कियों का ब्यूटी पार्लर में काम करना!

जेंडर इशू पर एक बार एक सज्जन ने कुतर्क करते हुए कहा कि कल को आप माओं को भी कहेंगी कि बच्चे पालना उनका काम नहीं है...मुझे उन्हें ये बात समझाने में काफी समय लगा कि मातृत्व एक प्राकृतिक गुण है जो माँ बनने के साथ ही जन्म लेता है!और ये भावना तो जानवरों में भी पायी जाती है जो जेंडर से बिलकुल परे हैं! खैर ख़ुशी कि बात यह रही कि वो सज्जन अंततः कुछ कुछ समझ गए! शायद धीरे धीरे समाज भी समझ जाए!

Tuesday, May 13, 2008

औरत ऐसी भी होती है क्या

मैं आपका ध्यान एक ऐसी घटना की और दिलाना चाहता हूँ जिस ने घटना शेत्र के लोगों को अन्दर तक दहला दिया है. मैंने भी जब इस के बारे में सुना तो अन्दर तक दहल गया. इस घटना का मुख्य पात्र एक नारी है जो आज समाज की आँख की किरकिरी बन गई है. यह नारी अशिक्षित नहीं है. उसने अंग्रेजी में एम् ऐ किया है. उसके पिता ने अपनी इस एकलौती बेटी को बेटों जैसा प्यार दिया. शिक्षा पूरी होने पर उसे एक स्कूल में अध्यापिका की जाब दिला दी. कोई भेद भाव नहीं. कोई बन्धन नहीं. उसके मुहं से 'बाबा' सुनते वह दौड़े आते. उस की हर फरमाइश पूरी करते. बेटी की आँख में एक आंसू भी उन्हें दुखी कर देता.

यह नारी थी - अथाह प्यार करने वाले माँ-बाप की बेटी, दो प्यार करने वाले भाइयों की बहन, एक प्यार करने वाली भाभी की ननद, एक प्यारे भतीजे की बुआ, एक ममेरी बहन की दीदी. एक भाई अपनी पत्नी और बेटे के साथ शहर में नौकरी करता. दूसरा भाई शहर में पढ़ता. एक दिन जब सब घर आए हुए थे इस नारी ने सारे परिवार की हत्या कर दी. यह कार्य उसने अपने प्रेमी की मदद से किया. सब को खाने में बेहोशी की दवा दे दी. जब सब बेहोश हो गए तब इस ने अपने प्रेमी को बुलाया और एक एक कर सबकी गर्दनें काट डाली. वह बाल पकड़ कर सर ऊपर उठाती और उस का प्रेमी कुल्हाड़ी से गर्दन काट देता. भतीजे को उस के प्रेमी ने गला धोंट कर मारा. इस काम को पूरा कर उस का प्रेमी कुल्हाड़ी लेकर वहाँ से भाग गया और वह आगे का नाटक करने की तैयारी करने लगी. इतने में उस का भतीजा रोने लगा. शायद गला घोंटने में कोई कमी रह गई थी. इस कमी को पूरा उसकी बुआ ने किया. वह उस बच्चे की गर्दन तब तक दबाती रही जब तक वह तड़प कर शांत नहीं हो गया.

मिनटों में इस नारी ने एक प्यार भरे घर को कब्रिस्तान बना डाला. कहते हैं नारी माँ होती है पर इस नारी ने तो एक डायन का रोल अदा किया. क्यों किया उस ने यह सब? क्या कमी थी उसे? क्या चल रहा था उस के मन में? क्या उस ने यह सब अपने प्रेमी के लिए किया? इन सवालों का जवाब खोज रही है पुलिस. लोग कह रहे हैं, भगवान् ऐसी बेटी किसी को न दे. कुछ उसे डायन कहते हैं और कुछ नारी जाति पर कलंक.

यह घटना घटी, उत्तर प्रदेश के जे पी नगर जिला मुख्यालय से १७ कि मी दूर बाबनखेरी गाँव में. शौकत मियां एक अध्यापक थे. गाँव के अमीर लोगो में थे. सब उन्हें एक नरम दिल शान्ति प्रिय इंसान के रूप में जानते थे. वह अपने बच्चों से बहुत प्यार करते थे. खास तौर पर अपनी बेटी शबनम से. पर उन्हें क्या पता था कि उनकी यह प्यारी बेटी ही उनकी कातिल बन जायेगी. उनके बाल पकड़ कर उन का सर ऊपर उठाएगी और कहेगी अपने प्रेमी से 'चल काट गर्दन'.

नारी माँ होती है. अन्याय के ख़िलाफ़ नारी दुर्गा भी बन जाती है. अन्याय के ख़िलाफ़ जंग करने पर यदि समाज उसे आँख की किरकिरी मानता है तो माने. मैं तो ऐसी नारी का स्वागत करूंगा. पर यह कैसा रूप हे नारी का. क्या इस आँख की किरकिरी को समाज को बर्दाश्त करना चाहिए? क्या इस को नारी समाज का समर्थन मिलना चाहिए? हो सकता है शबनम को अपने परिवार से कोई शिकायत हो. हो सकता है उसके पिता उस पर कोई दबाब डाल रहे हों जो उसे नागवार लग रहा हो. पर ऐसी बेरहम हत्या. क्या कोई भी कारण इसे सही ठहरा सकता है?


suresh gupta

यह लेख सुरेश गुप्ता जी ने चोखेर बाली के लिए भेजा है और ऐसी नारी के बारे में चोखेर बालियों के विचार जानने की इच्छा भी जताई है ।

Monday, May 12, 2008

Mothers' day celebrations

Yesterday we as members of Uttaranchal Mahila Association went to Premdham ,the home for aged people , to celebrate mothers'day . Athough everyday is important for mothers but this day children gave flowers, gift etc. to their mothers to make their day special and make them feel special. I was really overwhelmed to talk to the old ladies who were residing in the Pemdham as they were not ready to disclose the name of their children who left them there.
They were all happy and enjoyed the programme we presented and even showed their gratitude as we spent our time with them. After all a mother is a mother, always, thinking of her children, worried about her children !!!

हैप्पी मदर्स डे

अमेरिका मे आज मातृ दिन है । आप सबको बहुत शुभ कामनाएं । माँ होने के दो महत्वपूर्ण पहलू होते
हैं । पहला है बिना शर्त असीम प्यार और दूसरा बच्चे की जरूरतें समझ कर उन्हें पूरा करना और इसके लिये कुछ भी कर गुजरना । इसके विपरीत पिता का प्यार शर्तों में बंधा है । अगर आपका व्यवहार अच्छा है, आप पढाई में तेज हैं, उनकी उम्मीदों पर खरे उतरते है तो आप इस प्यार के हकदार हैं । वैसे तो हम में से कोई भी हमेशा बिना शर्त प्यार नही लुटाता पर कभी ना कभी सभी ऐसा प्यार करते हैं ।
हम सब को जरूरत होती हे इन दोनो किस्म के प्यार की । और वह मिलता भी है ।
कई बार ये भूमिकाएँ बदल जातीं हैं जब पिता माँ की भूमिका में आ जाते हैं और बिना शर्त प्यार करते हैं और माँ और पिता की भूमिका में आकर सख्त रवैया अपनाती है ।




बहुत आसान होता है गोद के बच्चों को बिना शर्त प्यार देना और उनकी जरूरतें समझना । मुश्किल तो तब आती है जब ये बच्चे बडे होने लगते हैं । तब नियम कानून अनिवार्य हो जाते हैं । यदि इस वक्त हम बिना शर्त प्यार वाली बात पर अमल करें तो शायद हम अपने ही बच्चों के दुश्मन बन जायें । जरूरतों और माँगों में फर्क करना भी जरूरी है और ये फर्क हमे समझना चाहिये और बच्चों को भी समझाना चाहिये । जितना हमारा और बच्चों का संवाद अच्छा रहेगा माँ होने का दायित्व हम उतना ही अच्छा निभा पायेंगे ।
हम सब में कहीं न कहीं एक माँ छुपी होती है और एक बच्चा भी । अक्सर हम सबने ही बडी बहन को माँ जैसा प्यार देते हुए देखा है । भाभी भी माँ के समान प्यार करती है और पत्नी को भी किसी किसी वक्त अपने पती की माँ की भूमिका में आना पडता है और वह बखूबी इस भूमिका को निभाती है । पती भी अक्सर पत्नी के अस्वस्थ रहने पर भावुक होकर माँ जैसै दायित्व निभाते हैं । ऐसी स्थिती में दूसरा सदस्य अक्सर बच्चा बन जाता है ।
मैने तो अपनी ननद से भी माँ जैसा प्यार पाया है । वैसे तो उम्र में वे मेरे पती से केवल एक वर्ष ही बडीं हैं पर हैं ममता से भरपूर ।
तो अपने अंदर की माँ और बच्चा दोनों को सहेज कर रखिये । Happy Mother’s Day !

Saturday, May 10, 2008

माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले ही

जिनका मैं गुनहगार

राजकिशोर

दुनिया भर में जिस व्यक्ति का मैं सबसे ज्यादा गुनहगार हूं, वह है मेरी मां। जिस स्त्री ने मेरे सारे नखरे उठाए, जिसने मुझे सबसे ज्यादा भरोसा दिया, जिसने मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं की, उसे मैंने कोई सुख नहीं दिया। दुख शायद कई दिए। अब जब वह नहीं है, मेरा हृदय उसके लिए जार-जार रोता है।

लगभग साल भर से अकसर रात को सपने के वक्त या सपने में मेरी मां, मेरे पिता, मेरी भौजी, मेरे बड़े भाई किसी न किसी दृश्य में मेरे सामने आ उपस्थित होते हैं। बड़े भाई की मृत्यु पिछले साल ही हुई। वे मेरे पूर्व पारिवारिक जीवन की एकमात्र जीवित कड़ी थे। शायद उनकी मृत्यु के बाद से ही पुराने पारिवारिक दृश्य बार-बार मेरी स्मृति में या मेरे स्वप्न जगत में मुझे घेर ले रहे हैं। उस समय न कोई विषाद होता है, न कोई आनंद। बस मैं उस दृश्यावली का सामान्य अंग बना अपने अतीत को जीता रहता हूं। लेकिन आंख खुलने पर या वर्तमान में लौटने पर मुझे अपनी मां और पिता दोनों की बहुत याद आती है । यह ग्लानि घेर लेती है कि मैंने उनके साथ बहुत अन्याय किया। खासकर मां के साथ, जिसने मुझे अपने ढंग से बहुत प्यार दिया।

परिश्रमी तो मेरे पिता भी थे, पर मां के मेहनती होने को मैं अधिक गाढ़ी स्याही से रेखांकित करना चाहता हूं। हमारे समुदाय में स्त्रियों का मुख्य काम होता है खाना बनाना, कपड़े धोना और घर को साफ-सुथरा रखना। शुरू में यह सब करते हुए मैंने अपनी मां को कभी नहीं देखा, क्योंकि जब मैंने होश संभाला, मेरी ममतामयी भौजी घर का चार्ज ले चुकी थीं। मां मेरे और मेरे छोटे भाई और बहन के कपड़े जरूर धो देती थी। लेकिन बाद में जब पारिवारिक कलह के कारण मेरे बड़े भाई ने अपनी अलग इकाई बना ली, तो मां ने गजब जीवट का परिचय दिया। वह हम सबके लिए खाना बनाती थी, कपड़े भी धोती थी और दुकानदारी में पिताजी के साथ सहयोग भी करती थी। एक पल के लिए भी बेकार बैठना उसे गवारा नहीं था।

मैं उन दिनों आधुनिक साहित्य पढ़-पढ़ कर ऐसा उल्लू का पट्ठा हो चुका था कि एक छोटी-सी बात पर नाराज हो कर मैंने घर छोड़ दिया और अलग अकेले रहने लगा। वह दृश्य मुझे कभी नहीं भूलेगा जब करीब ग्यारह बजे अपने दो-चार कपड़े और कुछ किताबें एक छोटे-से सूटकेस में भर कर मैं घर छोड़ रहा था। पिताजी देख रहे थे, मां देख रही थी, पर किसी ने भी मुझे नहीं रोका। यह दुख अभी तक सालता है। वैसे तो थोड़ा बड़ा होते ही मुझे यह एहसास होने लगा था कि मेरा कोई नहीं है, पर उस घटना के बाद इसका फैसला भी हो गया।

दरअसल, मुझे न तो पिता पसंद थे, न मां। वे दोनों बहुत ही साधारण भारतीय थे। उन्हें न तो बच्चों से लाड़-प्यार करना आता था और न उनकी देखभाल करना। घर-द्वार सजाने में भी उनकी कोई रुचि नहीं थी। कपड़े फट जाने पर सिल-सिल कर पहने जाते थे -- जब तक वे एकदम खत्म न हो जाएं। गरीबी थी, पर उससे ज्यादा मानसिक गरीबी थी। एक तरह से मैं अपने आप ही पला, जैसे सड़क पर पैदा हो जानेवाले पिल्ले पल जाते हैं या मोटरगाड़ियों के रास्ते के किनारे के पौधे पेड़ होते जाते हैं। इसीलिए मेरे मानसिक ढांचे में काफी खुरदरापन है। प्रेम पाने की इच्छा है, प्रेम देने की इच्छा है, भावुकता भी है, लेकिन कुछ अक्खड़पन, कुछ लापरवाही, कुछ व्यंग्यात्मकता और कुछ गुस्सा भी है। आज मैं इस बात की सच्चाई को अच्छी तरह समझता हूं कि जिसे बचपन में दुलार नहीं मिला, उसका व्यक्तित्व जीवन भर के लिए कुंठित हो जाता है। मैं बहुत मुस्तैदी से इस कुंठाग्रस्तता से लड़ता हूं, फिर भी पार नहीं पाता।

दरअसल, मेरे कॉलेज जाने तक मेरे शेष परिवार और मेरे बीच एक भयानक खाई उभर आई थी। मैं पढ़ते-लिखते हुए मध्यवर्गीय जीवन के सपने देख रहा था और इसमें मेरे माता-पिता की कोई भूमिका नहीं थी। मैं एक नई भाषा सीख रहा था और वे भाषा और संस्कृति की दृष्टि से बहुत पिछड़े हुए थे। वे न अखबार पढ़ते थे न रेडियो सुनते थे। मां पिता की तुलना में और भी पिछड़ी हुई थी। इस तरह के तथ्य मध्यवर्गीय चाहतों वाले मेरे मन में हीन भावना भरते थे। जब से उसे देखने की मुझे याद है, वह बूढ़ी ही थी और स्त्रीत्व की कोई चमक उसमें नहीं थी। शुरू में उसके प्रति मेरे मन में बहुत चाव था। जब चांद से लाए हुए पत्थर के टुकड़ों में से एक टुकड़े का प्रदर्शन कोलकाता में किया जा रहा था, मैं उसे अपने साथ वह टुकड़ा दिखाने ले गया था। लेकिन धीरे-धीरे मैं उससे उदासीन होने लगा, हालांकि वह अपने ढंग से मेरी चिंता करती रही। मैं जब घर के पास एक छोटा-सा कमरा ले कर रहने लगा, तो उसने ग्वाले से कह कर मेरे लिए रोज एक पाव दूध का इंतजाम कर दिया था।

विवाह होने के बाद मुझमें थोड़ी पारिवारिकता आई। मैंने दो कमरों का एक फ्लैट लिया और उसमें रहने के लिए मां-पिता और छोटे भाई-बहन को आमंत्रित किया। वे कुछ दिन कितने सुंदर थे। लेकिन एक बार पिताजी द्वारा एक मामूली-सी घटना के बाद, जो हिन्दू परिवारों के लिए सामान्य-सी बात है, पर उन दिनों मेरे सिर पर लोहिया सवार होने के कारण मैंने उन्हें कहला दिया कि जब तक वे मेरी पत्नी से माफी नहीं मांगते, अब वे मेरे घर में खाना नहीं खा सकते। माफी मांगना मेरे घरेलू परिवेश में एक सर्वथा नई बात थी, जिसका अर्थ समझ या समझा पाना भी मुश्किल था। सो पिताजी अलग हो गए। उनके साथ ही दूसरे सदस्य भी उनके साथ हो लिए। मैंने उस समय मुक्ति की सांस ली थी, पर अब लगता है कि वह मेरी हृदयहीनता थी। जवानी में आदमी बहुत-से ऐसे काम करता है जिनके अनुपयुक्त होने का पछतावा बाद में होता है जब प्रौढ़ता आती है। ऐसे कितने ही पछतावे मेरे सीने में दफन हैं। कभी-कभी वे कब्र से निकलते हैं और रुला देते हैं।

बाद में मां से मेरा संपर्क बहुत कम रहा। एक बार जब वह बीमार पड़ी, मैं उसे अपने घर ले आया और उसका इलाज कराया। एक बार जब वह गांव में मेरे मामा के साथ रह रही थी, 'रविवार' के लिए किसी रिपोर्टिंग के सिलसिले में मेरा उत्तर प्रदेश जाना हुआ और मैं जा कर उससे मिल आया। मां को लकवा मार गया था। कुछ घंटे उसके साथ बैठ कर चलने को हुआ, तो मैंने उसकी मुट्ठी में दो सौ रुपए रख दिए था। वैसा आनंद न उसके पहले मिला था. न उसके बाद मिला। कोलकाता में जब उसे हृदयाघात हुआ, यह मैं ही था जिसके प्रयास से उसे अस्पताल में भरती कराया गया। अस्पताल में उसकी सुश्रूषा के लिए मैंने एक नर्स रख दी थी। उन दिनों मेरी पत्नी ने भी मां की बहुत सेवा की। यह मेरे लिए चिरंतन अफसोस की बात रहेगी कि जिस दिन उसका देहांत हुआ, मेरे दफ्तर, आनंद बाजार पत्रिका समूह, में अचानक हड़ताल हो गई थी और मैं दफ्तर के लिए घर से निकला, तो दोस्तों-सहकर्मियों के साथ गप-शप करते हुए काफी समय बीत गया और मैं देर रात गए घर लौटा। उन दिनों मोबााइल नहीं था, नहीं तो इतनी बडा अघटन नहीं होता कि मैं मां के शवदाह में शामिल न हो सका। यह सारा दायित्व मेरी पत्नी ने लगभग अकेले संभाला।

जब से मैं भारत के हिन्दी प्रदेश में आधुनिकता की सीमाएं समझने लगा, तभी से मेरी पिछली गलतियां बुरी तरह मुझे हांट कर रही हैं। मैं परिवार में एकमात्र उच्च शिक्षित लड़का था। मुझे संयुक्त परिवार को ढहने से रोकने की पूरी कोशिश करनी चाहिए थी। मुझे अपने मां-बाप की, खासकर बूढ़ी मां की, सेवा और मदद करनी चाहिए थी। लेकिन यह मैंने नहीं किया। उन दिनों मेरी जो आमदनी थी, वह खुद मेरे लिए ही काफी नहीं थी। लेकिन यह मुख्य कारण नहीं था। मां से मेरा मन उचट चुका था। मैं उसकी दुनिया से निकल आया था और अपनी दुनिया में पूरी तरह रम चुका था। मुझे यह याद भी नहीं रहता था कि मेरी कोई मां भी है। उसे शायद याद आता रहता हो, पर वह क्या कर सकती थी? अगर कुछ कर सकती होती, तब भी उसने नहीं किया। लेकिन इसमें सारा दोष मैं अपना ही मानता हूं (अब मानता हूं; उन दिनों दोष की बात दिमाग में भी नहीं आती थी)। यह एक ऐसा पाप था, जिसकी कोई माफी नहीं है। मैं माफी मांगना भी नहीं चाहता -- मांगूं भी तो किससे। मैं अपने हृदयस्थल में अपने उस पाप को ढोना चाहता हूं, ताकि उसके अनुताप की रोशनी में अपने सत्यों का लगातार संशोधन और परिमार्जन कर सकूं।

मुझे इस बात का एहसास है कि मेरे साथ जो बीती है, वह सिर्फ मेरी कहानी नहीं है। वह लाखों (शायद करोड़ांें) लोगों की बदबूदार कहानी है। निम्न वर्ग या निम्न-मध्य वर्ग से आनेवाले नौजवान जब थोड़ी-बहुत सफलता अर्जित कर लेते हैं, तो उनके पुराने पारिवारिक रिश्ते धूमिल होने लगते हैं। इनमें सबसे ज्यादा उपेक्षा मां की होती है। वह सिर्फ देती ही देती जाती है, पाती कुछ नहीं है। यहां तक कि कृतज्ञता का स्वीकार भी नहीं। मैं मां को ले कर भावुकता का वह वातावरण नहीं बनाना चाहता जो हिन्दी कविता में एक दशक से बना हुआ है (इसके पहले यह दर्जा पिता को मिला हुआ था)। लेकिन मां-बेटे या मां-बेटी का रिश्ता एक अद्भुत और अनन्य रिश्ता है। इस रिश्ते का सम्मान करना जो नहीं सीख पाया, वह थोड़ा कम आदमी है। मेरी मां जैसी भी रही हो, 'साकेत' में मैथिलीशरण गुप्त की यह पंक्ति मेरे सीने में खुदी हुई है कि माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले ही। मैं कुपुत्र साबित हुआ, मेरा यह दुख कोई भी चीज कम नहीं कर सकती। उसका प्रायश्चित यही है, अगर कोई प्रायश्चित हो सकता है, कि मैं एक ऐसी संस्कृति की रचना करने में अपने को होम कर दूं जिसमें मां का स्थान जीवन के शीर्ष पर होता है।

जो अपनी मां को प्यार नहीं कर पाया, वह दुनिया में किसी और को प्यार कर सकेगा, इसमें गहरा संदेह है।

Wednesday, May 7, 2008

रेबारियों की ढाणी : चार बरस का दूल्हा, दुल्हन पांच साल की दुल्हन: और अन्य प्रान्तों से ऐसी खबरें क्या कहतीं हैं ?

चार व्यक्ति गिरफ्तार , महिला की मौत :-( चेन्नई से ख़बर और ये चित्र --
http://www.hindu.com/2008/05/05/stories/2008050550320100.htm भारत के समाचार अकसर , वेब से ही पहुँचते हैं। आज के समय में जब् पूरा विश्व एक इकाई बन गया है और दूर दर्राज के क्षेत्रों की खबरें , आसानी से मिल जातीं हैं , ऐसे में, भारत के एक समाचार पत्र से स्त्री / कन्या के लिए ऐसी headlines पढ़कर , मन दुखी हो जाता है।

क्या यही हो रहा है आज भी भारत के गाँवों में और शहरों में ? ...ना जाने कब , भारत से ऐसी मनस्थिति दूर होगी ? ये खबर महानगर मुम्बई से --

http://timesofindia.indiatimes.com/Cities/Mumbai/Elderly_woman_found_murdered/articleshow/3010572.cms

और अब , ये नीचे दी गयीं , सारी खबरें एक ही न्यूज़ पेपर से मिलीं हैं .

आप भी सुनिए

ऐसे मारा कि पेट का बच्चा मर गया

पति ने की पत्नी की हत्या

दूसरी पत्नी को जिंदा जला डाला

ये तो खबरें है छत्तीसगढ़ के रायपुर बिलासपुर इलाकों की अब ,

पंजाब , पटियाला। से - अवैध संबंधों के शक में मां को चाकू से गोदा

अमृतसर से - पति की जंग: एक जीती दूसरी हारी

चंडीगढ़ से - मुस्कान मर्डर:दोषियों को उम्र कैद

मध्य प्रदेश, ग्वालियर से - महिला को बेचने वाले पकड़े

और, पति को 15 हजार में मिली वापस

और इंदौर से -- फोन कर रही बहन, धौंस दे रहा भाई

और अब चलते हैं राजस्थान --

अजमेर , मासूम ज्योति का बुलंद हौसला

कोटा से - युवती ने की आत्महत्या

शेखावटी से - बावरी ने की थी आत्महत्या

और

उदयपुर में - ब्रिटिश महिला पत्रकार से ज्यादती के आरोपी को उम्रकैद

मावली से :चार बरस का दूल्हा, दुल्हन पांच साल की दुल्हन

और प्रमुख कार्यकर्ता ने कहा , " उपखंड मुख्यालय पर बाल विवाह हुआ है, इसकी मुझे जानकारी नहीं है। " जगमोहनसिंह, एसडीएम, मावली
" रविवार को मावली में होने वाले बाल विवाह की सूचना हमें नहीं थी। " डॉन के जोस, प्रशिक्षु आईपीएस, थानाधिकारी मावली ।

और अंत में , जोधपुर के इस ख़बर से खुशी हुई -

बेटे से ज्यादा बेटी की चाह --- चलो , कहीं बदलाव आया --

झुंझुनूं: हाडीरानी महिला बटालियन





Tuesday, May 6, 2008

33 फीसदी क्यों, 50 फीसदी क्यों नहीं?


हिंदुस्तान की राजनीतिक संस्थाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण के मुद्दे में दिलचस्पी है तो इस तसवीर पर गौर कीजिए। हाल में चर्चित हुई यह तसवीर आपने जरूर देखी होगी। यह गर्भवती महिला हैं, स्पेन की नई रक्षा मंत्री कारमे चाकोन। पूरा नाम है कारमे चाकोन पीकेर्रास जो वहां हाल ही में प्रधानमंत्री जोस लुईस रॉड्रिग्ज़ ज़पातेरो के नेतृत्व में गठित नई सरकार में शामिल हैं। स्पैनिश सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी के ज़पातेरो दूसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं।

उनके इस नए मंत्रिमंडल की कुछ खास बातें-

--17 सदस्यों के मंत्रीदल में नौ महिलाएं और आठ पुरुष हैं।

--देश की पहली महिला रक्षा मंत्री 37 वर्षीया कारमे चाकोन बनी हैं। पिछले मंत्रिमंडल में वे हाउसिंग मिनिस्टर थीं।

--कारमे चाकोन ने जब अप्रैल में कार्यभार संभाला तब वे सात माह की गर्भवती थीं।

--सबसे सक्रिय मंत्रियों में शुमार चाकोन ने इसी हालत में मज़े से सैनिक परेड का निरीक्षण भी किया।

--10 साल पहले तक यहां महिलाओं के लिए सेना के दरवाज़े बंद थे। आज स्पेन की सेना में शामिल 1.30 लाख सैनिकों में 15 फीसदी महिलाएं हैं।

--पुरुष प्रधान देश में लैंगिक समानता लाना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।

--स्त्री-पुरुष समानता के लिए नया समानता मंत्रालय बनाया गया है जिसकी पहली मंत्री एक महिला- 31 वर्षीय विवियाना आइदो हैं। स्पेन के इतिहास में उनका नाम सबसे कम उम्र मंत्री के तौर पर दर्ज हो गया है।

--मारिया तेरेसा फर्नांडेज़ दे ला वेगा 2004 में स्पेन की पहली उप-प्रधानमंत्री बनी थीं। वे नई सरकार में फिर उप-प्रधानमंत्री बनी हैं।

--मॉलिक्युलर बायलोजी की विशेषज्ञ क्रिस्टीना गारमेन्दिया एक और नए मत्रालय- विज्ञान और खोज का काम देख रही हैं।

--सरकार ने तलाक की प्रक्रिया सरल बनाने, नौकरियों में औरतों की संख्या बढ़ाने के लिए कानून बनाए और कंपनियों के बोर्डरूम और चुनावी मैदान में ज्यादा औरतों को जगह देने की जोरदार वकालत की है।

--देश ने 36 साल तक तानाशाही झेली। यहां का लोकतंत्र अभी महज 30 साल पुराना है।

Monday, May 5, 2008

संसद में दिखेंगी ३३ फीसदी महिलाएं

देश की राजनीतिक संस्थाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर से गरम होने वाला है। आज सुबह एक सर्वदलीय बैठक में इस मामले पर चर्चा की गई। जिसमें सोनिया गंधी सहित एऩडीए व यूपीए के कई बड़े नेता थे। हालांकि महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण को लेकर एक नजर से तो सभी राजनीतिक दल सहमत हैं लेकिन लाल यादव की राजद ,शरद यादव के नेतृत्व वाली जनता दल यूनाइटेड और राम विलास पासवान की लोजपा जैसी पार्टियां हैं जिनके कुछ वैचारिक मतभेद हैं खासकर आरक्षण के मामले को लेकर । कुछ अंदरूनी लोगों के मुताबिक इस सत्र में यह विधेयक पेश हो जाएगा। इसके बाद संसद का चेहरा बदल जाएगा। कम से कम एक तिहाई महिलाओं को देखना सचमुच एक सुखद आश्चर्य होगा। इसका अर्थ है कि मंत्रीमंडल में भी एक तिहाई चेहरे फेयर सेक्स के होंगे। अभी तो मंत्रीमंडल में महिला मंत्रियों की संख्या इतनी कम है कि ये अंगुलियां पर गिनी जा सकती है। केवल भारत ही नहीं पूरी दुनिया की यही हालत है। दुनिया भर की सभी सरकारों में केवल 14 फीसदी महिला मंत्री हैं, कुछ देसों में तो ये केवल 3 से 4 फीसदी महिला मंत्री हैं। महिलाओं की स्थिति में तब तक सुधार नहीं हो सकता जब तक निर्णय करने वाली स्वयं महिलाओं नहीं होगीं। ऐसे में अगर इस सत्र में महिला आरक्षण बिल आ जाता है तो ये महिलाओं के लिए एक अच्छी खबर होगी।

Sunday, May 4, 2008

संग और संगिनी

एक लड़की ने ईमेल में अपने प्रेमी को संगी कह कर संबोधित किया और अपने को उसकी संगिनी बताया। साथ ही, उससे अनुरोध किया कि संगी के नाते तुम्हारा एक कर्तव्य यह है कि मुझे दलदल से निकालो। संगी ने जवाब में पूछा कि संगिनी शब्द का अर्थ क्या है। लड़की ने बताया कि हर भाषा में संगिनी का एक ही अर्थ हैः संगिनी। जवाब में उसके संगी ने जो लिखा, वह शायद पढ़ने लायक हैः


संगिनी का अर्थ अंग्रेजी और अन्य सभी भाषाओं में एक ही है। यानी यह प्रजाति हर देश में, हर काल में पाई जाती है। इसका मतलब है सभी जगह इसका रंग-रूप एक ही होता है। नहीं, मैंने गलत कहा। रंग बदल सकता है - काला, गोरा, पीताभ, रक्ताभ। रूप भी एक जैसा नहीं हो सकता। कोई कम रूपवती, कोई सिर्फ रूपवती, कोई महा रूपवती। कोई रूप-गर्विता, कोई रूप-शर्मिता। लेकिन तुम कहती हो, सबका चरित्र एक ही होता है। चूंकि यह किसी संगिनी की ही व्याख्या है, इसलिए इस पर बहस नहीं की जा सकती। लेकिन इस संगिनी ने क्या अन्य संगिनियों को भी देखा है? तर्कशास्त्र के अनुसार सिर्फ एक कौए को देख कर यह घोषणा नहीं की जा सकती कि सभी कौए काले होते हैं। जब तक दुनिया के हर कौए को देख न लिया जाए, तब तक कोई साधारणीकरण नहीं हो सकता। अगर एक भी कौआ छूट गया है, तो यह संभावना बनी रहती है कि वह सफेद हो सकता है। इसलिए सभी संगिनियों को जाने बिना अगर कोई समय से पूर्व पक्व लड़की संगिनी होने का दावा करती है, तो वह ठीक-ठीक बता नहीं सकती कि संगिनी शब्द का अर्थ भले ही हर भाषा में समान हो, पर संगिनी होना वास्तव में होता क्या है।

एक दूसरा पहलू लिया जाए। हो सकता है, इस लड़की ने कई संगियों के साथ संगिनी की भूमिका अदा की हो। इसलिए वह संगिनी होने का अर्थ खूब जानती हो। लेकिन संगिनी का पूरा अर्थ जानने के लिए क्या इतना अनुभव काफी है? यह दुनिया भर में देखा गया है कि संगी का चरित्र संगिनी को प्रभावित करता है। दूध को कोयले पर ढाला जाए, तो उसके रंग में कालापन आ जाएगा। दूध को मधु के साथ मिला दिया जाए, तो वह सुनहला हो जाएगा। दूध और पानी मिलें, तो पानी गाढ़ा और दूध पतला हो जाएगा। संगी भी आखिर एक जीवित प्राणी है। इसी तरह, संगिनी भी। हर जीवित प्राणी अपने परिवेश से प्रभावित होता है और उसे प्रभावित करता है। तो जिसने भी कई बार कई संदर्भों में संगिनी की भूमिका की हो, उसके प्रत्येक बार के अनुभव एक नहीं हो सकते। चूंकि हर संगी विशिष्ट होता है, इसलिए हर संगिनी भी विशिष्ट होती है।

इसलिए तर्क से यह सिद्ध हुआ कि न तो कोई संगी कॉमन हो सकता है और न कोई संगिनी। इनका साधारणीकरण नहीं किया जा सकता।

इसलिए तर्क से यह सिद्ध हुआ कि हम वास्तव में संगी या संगिनी होते नहीं, ऐसा होने की कामना करते हैं। यह तमन्ना ही हममें प्राण का संचार किए रहती है।

तर्क से यह भी सिद्ध हुआ कि हर संगिनी को अपनी तरह के संगी की तलाश रहती है और हर संगी को अपनी तरह की संगिनी की। लेकिन बिना संगी हुए कोई किसी संगिनी को पूरी तरह क्या जान सकता है? इसी तरह, बिना संगिनी हुए क्या कोई किसी संगी को पूरी तरह जान सकती है? संग को इतने समय तक ट्रायल पर रखा गया, तो क्या इतना समय नहीं निकल जाएगा कि परिणाम पर विचार करने की गुंजाइश ही न रह जाए? मान लिया जाए कि जिस समय चयन और ग्हण किया गया था, उस समय ये परफेक्ट थे, तब कैसी स्थिति बनती है? चूंकि व्यक्ति स्वभाव से ही परिवर्तनशील है, इसलिए जो संगी या संगिनी चुने गए, जरूरी नहीं कि संग की पूरी अवधि के दौरान वे वैसे ही बने रहें। फिर संग का क्या होगा? उसका चरित्र बदलता है, तो संगी और संगिनी की पारस्परिक भूमिका भी बदलेगी। उसके बाद क्या दोनों अपने संग के भविष्य पर पुनर्विचार करेंगे? या, दोनों संगजनित मोह के कारण एक-दूसरे से यानी अपने आपसे समझौता करेंगे?

तो तर्क से यह भी साबित हुआ कि संगी या संगिनी मात्र सुविधाजनक शब्द हैं उस तलाश को व्यक्त करने के लिए जो प्लेटो के अनुसार जन्म से ही शुरू हो जाती है। प्लेटो मानते थे कि हर संगी की एक खास संगिनी और हर संगिनी का एक खास संगी होता है। जब दोनों का सम्मिलन होता है, तभी वे पूर्ण होते हैं और किसी प्रकार का असंतोष नहीं बच रहता। लेकिन अनेक संगियों और संगिनियों का संग पाए बिना कोई जानेगा कैसे कि उसकी खोज पूरी हो चुकी है? क्या इसीलिए नीरज को लिखना पड़ा कि मैं पा गया तुम्हें था, घर बदल-बदल कर?

अगर ऐसा है, तो क्या तो संगी और क्या तो संगिनी! दोनों एक ही तालाब की मछलियां जान पड़ती हैं। ऐसी मछलियां जो महासागर में तैरते हुए प्रियतम की खोज में लगी रहती हैं। प्रश्न यह उठता है कि जब तक वह नहीं मिलता या नहीं मिलती, तब तक क्या वे अंडे देना स्थगित किए रखें? इस तरह क्या उनका जीवन ही स्थगित नहीं हो जाएगा? संगी या संगिनी की तलाश जीवन के लिए है या जीवन संगी या संगिनी की तलाश के लिए? या, दोनों एक-दूसरे के पर्याय हैं?

अब दूसरे प्रश्न पर विचार किया जाए। क्या कोई संगी किसी संगिनी को दलदल से निकाल सकता है? दलदल से निकाल कर वह जहां ले जाएगा, इस बात की गारंटी क्या है कि वह जमीन ठोस तो दिखेगी, पर दलदली नहीं होगी? क्या यह पूरी धरती ही एक बड़ा दलदल नहीं है? नहीं तो लोग मुक्ति की तलाश में क्यों रहते हैं? फिर इस बात की भी गारंटी क्या है कि जिससे यह अपेक्षा की जा रही हो कि वह अपनी संगिनी को दलदल से निकाल ले, वह स्वयं किसी दलदल में न पड़ा हुआ हो? क्या ऐसा अकसर नहीं होता कि जो अपने को ठोस जमीन पर खड़ा मान रहा हो, उसके पैरों के थोड़ा नीचे वाकई कोई दलदल होता है? इसी तरह, अगर किसी लड़की को अपनी जमीन दलदली नजर आ रही है, तो क्या इस संभावना को खारिज किया जा सकता है कि वास्तव में वह दलदल सिर्फ पांच इंच ऊंचाई का हो और उसके नीचे ठोस जमीन हो? यानी जैसे ही वह अपने दलदल में थोड़ा और धंसेगी, अपनी साबुत जमीन पर पहुंच जाएगी ? यानी वह जिसे दलदल समझ रही थी, वह सिर्फ उसकी नजर में दलदल था और दलदलों का विशेषज्ञ समझ रहा था कि यह लडकी बेकार ही घबरा रही थी । इसलिए अपने दलदल की जांच करना, अपने दलदल का वास्तविक चरित्र जानना ही दलदल से निकलने की एकमात्र शर्त है ?
तो तर्क से यह सिद्ध हुआ कि संगी या संगिनी दलदल को समझने में मदद तो कर सकते हैं, पर दलदल से निकलना तो अपना ही निर्णय और अपना ही कर्म होगा।

तर्क से यह भी सिद्ध हुआ कि एक दलदल से निकल कर दूसरे दलदल में जाना काम्य है या ठोस जमीन पर जाना, यह निर्णय किए बिना कोई प्रयास करना व्यर्थ है। ठोस जमीन किसे कहते हैं, जिसे ठोस जमीन माना जाता है, कहीं वह भी एक नई किस्म का दलदल तो नहीं है, इन जटिल प्रश्नों का उत्तर निश्चित किए बगैर प्रयास में तत्परता कैसे आएगी?

देवी

देवी कह कर, झूटा संतोष दिलाकर
अब न छल पाओगे हमें
क्यूंकि देवियों का दिव्यत्व
खुद में ही लाने की ठान ली है हमने
लक्ष्मी तो हम हैं ही, उसे पैदा करने की क्षमता
भी विकसित करेंगे अपने में
बनना होगा हमें सरस्वती भी, उसकी पूजा करके नही
विद्या को हासिल करके
और दुर्गा भी बनेंगे हम और प्राप्त करेंगे
असीम शक्ती को ताकि कोई भी पुरुष
हमें अपने पैरों तले रौंद कर
आगे निकलने की हिम्मत न जुटा पाये

Friday, May 2, 2008

न रहेगा बांस तो कैसे बजेगी बांसुरी


लेखिका -
लावण्या शाह




भ्रूण हत्या पर काबू पाने के लिए एक उपाय यह किया जा सकता है कि गर्भ मे आते ही शिशु की माँ का रजिस्टर में नाम लिख लिया जाए और जन्म तक उस शिशु पर यानी गर्भवती माँ पर निगरनी रखी जाए और गर्भपात यदि आवश्यक हो तो उसके लिए पहले सरकार से अनुमति ली जाए । यानी गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण !माने जनता तो नही सुधरेगी ,इसलिए नियम बनाया जाए । बाहर से आने वाले इस फोर्स से कब तक कामयाबी मिल पाएगी कहना मुश्किल है ।भारत की महिला और बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी गर्भवती के महिलाओं के पंजीकरण के पक्ष में हैं.रेणुका चौधरी का कहना है कि इससे भ्रूण हत्या पर काबू पाया जा सकेगा. पंजीकरण के बाद सरकार भ्रूण हत्या पर रोक लगा सकेगी जो उत्तर भारत के कई इलाक़ों में धड़ल्ले से होती है.साथ ही विशेष परिस्थितियों में सरकार की तरफ से गर्भपात की इजाज़त देने का प्रावधान भी होना चाहिए.


वैसे उन्होंने यह नहीं बताया कि वो परिस्थितियाँ क्या होंगी.लेकिन जानकारों का कहना है कि इस क़दम से लोगों की व्यक्तिगत आज़ादी का उल्लघंन होगा और इसका ग़लत इस्तेमाल भी हो सकता है.यूँ गलत इस्तेमाल हर कानून का हुआ ही है ।पिछली राष्ट्रीय जनगणना के अनुसार देश में हज़ार लड़कों पर सिर्फ़ ९२७ लड़कियाँ ही थीं.ये एक बढती समस्या है जिसका कडा विरोध मारत के प्रधान मँत्री श्री मममोहन सिँह जी ने भी किया।

देश के अमीर राज्यों में घटते लिंग अनुपात की समस्या को विकट बताते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दिल्ली में लड़की बचाओ विषय पर आयोजित एक राष्ट्रीय बैठक का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा, कहा कि भारत प्रतिकूल लिंग संतुलन के कलंक के साथ जी रहा है."पिछली जनगणना ने घटता लिंग अनुपात दिखाया था. हमारे देश में पैत्रिक समाज की वजह से लड़कियों और महिलाओं के ख़िलाफ़ पक्षपाती रवैया बन गया है."यह शर्मनाक है और हमें इस चुनौती को स्वीकार करना होगा. कोई भी राष्ट्र, समाज या समुदाय जब तक इस आधी आबादी के खिलाफ़ होने वाले पक्षपात का विरोध नहीं करेगा, तब तक अपना सिर ऊँचा नहीं कर सकता और न ही वह किसी सभ्य समाज का हिस्सा होने का दावा कर सकता है.उन्होंने कहा, "हमारी सभ्यता पुरानी है और हम ख़ुद को आधुनिक देश कहते हैं. लेकिन फिर भी हम महिलाओं के खिलाफ़ सामाजिक पक्षपात की वजह से पनपे प्रतिकूल लिंग संतुलन के कलंक के साथ जी रहे हैं."


"जनगणना के आँकड़े बताते हैं कि देश के कुछ अमीर राज्यों में यह समस्या ज़्यादा विकट है जैसे पंजाब जहाँ प्रति एक हज़ार लड़कों पर सिर्फ़ 798 लड़कियाँ हैं, हरियाणा में 819, दिल्ली में 868 और गुजरात में 883 कन्याएं हैं."इससे संकेत मिलते हैं कि बढ़ती आर्थिक संपन्नता और शिक्षा के विकास ने भी इस समस्या को कम नहीं किया है.उन्होंने कहा, ""हमें सामाजिक जागरूकता और जन्म से पूर्व भ्रूण के लिंग परीक्षण आदि के खिलाफ़ कानून को कड़ाई से लागू कर इस समस्या को सुलझाना चाहिए.मैं सभी संबंधित लोगों से अपील करता हूँ कि वे जीवन बचाने की इस तकनीक के दुरुपयोग पर रोक लगाएँ.""इससे भी ज़्यादा ध्यान महिलाओं की शिक्षा पर दिया जाएगा ताकि आज हमारे देश में लिंग अनुपात की जो समस्या है उसके बारे में लोग भी समझें.""हमें समाज के नेताओं, ख़ासतौर पर धार्मिक नेताओं को इस दिशा में अग्रसर करने की ज़रूरत है, कि वे समाज में महिलाओं के प्रति हो रहे हर तरह के भेदभाव के ख़िलाफ़ राष्ट्रव्यापी अभियान चलाएं.

"मौन आपातकाल :

महिला और शिशु विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने घटते लिंग अनुपात को 'मौन आपातकाल' बताया.उन्होंने कहा, "ऐसा काम करने वाले लोग शिक्षित और संभ्रांत हैं. इससे उन महिलाओं पर शारीरिक दबाव भी बढ़ता है जो बेटे की ख़्वाहिश में कई संतानों को जन्म दे देती हैं."एक सवाल फिर भी बचा रह जाता है कि यदि शिक्षित लोग भी ऐसा कर रहे हैं तो फिर त्रुटि कहाँ है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि शिक्षा अपने उद्देश्यों मे सफल ही नही हो पा रही ! या कहें शिक्षा का कोई उद्देश्य जीवन और मानवीय मूल्यों से जुड़ा रह ही नहीगया है ?

जो भी है यह वाकई शर्मनाक है किलिंग अनुपात की राष्ट्रीय दर- 933 है और सभी प्रयासों के बाद भी बढ नही पा रही ।# नक्शे में लिखे गए अंक के समकक्ष प्रदेश और केंद्रित शासित प्रदेश का नाम नीचे लिखा गया है.

वर्ष 2001 की जनगणना के मुताबिक विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लिंग अनुपात:( कोष्ठक में दिया गया आँकड़ा 1991 की जनगणना का है)1. अरुणाचल प्रदेश- 901 (859)
2. नगालैंड- 909 (886)
3. मणिपुर- 978 (958)
4. मिज़ोरम- 938 (921)
5. त्रिपुरा -950 (945)
6. मेघालय- 975 (955)
7. असम -932 (923)
8. पश्चिम बंगाल- 934 (917)
9. झारखंड- 941 (922)
10.उड़ीसा- 972 (971)11. छत्तीसगढ़ -990 (985)
12.मध्य प्रदेश- 920 (912)
13.गुजरात -921 (934)
14.दमन एवं दीव -709 (969)
15.दादर एवं नगर हवेली- 811 (952)
16.महाराष्ट्र- 922 (934)
17.आंध्र प्रदेश -978 (972)
18.कर्नाटक- 964 (960)
19.गोवा -960 (967)
20.लक्ष्यद्वीप- 947 (943)21.केरल- 1058 (1036)
22.तमिलनाडु- 986 (974)
23.पांडिचेरी- 1001 (979)
24.जम्मू और कश्मीर- 900( 876)
25.हिमाचल प्रदेश- 970 (976)
26.पंजाब- 874 (882)
27.चंडीगढ़- 773 (790)
28.उत्तराखंड -964 (936)
29.हरियाणा- 861 (865)
30.दिल्ली- 821 (827)
31.राजस्थान- 922 (910)
32.उत्तर प्रदेश- 898 (876)
33.बिहार -921 (907)
34. सिक्कम- 875 (878)
35.अंडमान निकोबार द्वीप समूह 846 (818)
(
बी.बी. सी . से साभार )


- लावण्यमय अंतर्मन ----

Thursday, May 1, 2008

स्त्री-पुरुष समानता और उससे आगे

समानता के कुछ उदाहरण जो तुरंत संभव हैं

राजकिशोर

'एक अनुभव बांटना चाहती हूं। तीन वर्ष पहले मसूरी में पूरे देश की महिला अधिकारियों का एक सेमिनार हुआ। कांस्टेबल से ले कर डीजी रैंक तक की महिलाएं उसमें मौजूद थीं। अपने प्रदेश की ओर से मुझे भी जाने का मौका मिला। उत्तरांचल की डीजी श्रीमती कंचन चौधरी भट्टाचार्य ने वह सेमिनार आयोजित किया था। तीन दिन तक विभिन्न स्थानीय मुद्दों पर चर्चा चलती रही। जब सभी प्रदेशों की अधिकारियों से समस्याएं पूछी गईं, तो सभी ने सबसे पहले जो समस्या बताई, वह काबिले-गौर है। (उनका कहना था कि) आज भी थानों में महिलाओं के लिए अलग से टॉयलेट्स की व्यवस्था नहीं है, जो मूलभूत आवश्यकता है। यदि लगातार घंटों काम करना हो, तो सभी को बहुत समस्या होती है। अधिकारी स्तर पर सुविधाएं हैं, लेकिन निचले स्तर पर सुविधाओं का अभाव है। इसलिए भी महिलाओं का कार्य प्रभावित होता है।'

यह भोपाल की पुलिस अधीक्षक पल्लवी त्रिवेदी हैं। उन्होंने 'चोखेर बाली' नामक सामूहिक ब्लॉग में, जिसकी समन्वयक सुजाता नाम की एक तेजस्वी महिला हैं, अपना यह अनुभव लिखा है। इस पोस्ट में जिस सेमिनार की चर्चा की गई है, वह तीन वर्ष पहले हुआ था। आज क्या हालत है? कृपया अपने सबसे नजदीक के थाने में जा कर स्थिति का जायजा लीजिए और हमें ताजातरीन स्थिति बताइए। मेरा अनुमान है कि आपमें से आधे से ज्यादा को भरपूर निराशा होगी

समानता ! आह, मानवता की देवी, तुम्हारी कृपा इस अभागे देश पर कब होगी? ईसा मसीह, जिन्होंने यह संदेश दिया कि हम सभी एक ही पिता की संतानें हैं और किसी को भी दूसरों से ज्यादा लेने का अधिकार नहीं है, बहुत बाद में आए। सामाजिक और राजनीतिक बराबरी का पैगाम देनेवाले हजरत मुहम्मद और भी बाद में आए। आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक बराबरी की बात करनेवाले महात्मा गांधी ने अपना ज्यादातर काम पिछली शताब्दी के उत्तरार्ध में ही किया था। उनके साथ काम किए हुए लोग अभी भी मौजूद हैं। लेकिन समानता की देवी, तू तो औपनिषदिक युग से ही हमारे साथ है। फिर हम इतने विषमताग्रस्त समाज क्यों हैं? उस सुदूर युग के ऋषियों ने ही सबसे पहले पहचाना था कि शरीर तो माया है, असली चीज आत्मा है और आत्माएं सब बराबर हैं। ब्राह्मण के शरीर में जो आत्मा रहती है, वही आत्मा चांडाल के शरीर में भी निवास करती हैं। फिर हम भारतीय पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह कैसे भूल गए कि समानता जीवन और व्यवस्था का सबसे बड़ा मूल्य है, जिसके बिना स्वतंत्रता पर भी ग्रहण लग सकता है। समानता की देवी, तू कब हमारी आत्माओं में समाएगी और उन्हें परिशुद्ध करेगी?

धर्म ने हजारों साल तक जो काम किया, उसका एक बड़ा उत्तराधिकार लोकतंत्र ने संभाला है। लोकतंत्र का बुनियादी मूल्य है, समानता। इसे सिर्फ 'एक व्यक्ति एक वोट' के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक समाजवादी व्यवस्था भी है। यों कि समाज के जितने भी संसाधन हैं, वे समाज के सभी सदस्यों के लिए हैं और सामाजिक सहमति से ही उनका उपयोग किया जा सकता है। शायद संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान में पहली बार यह अंकित किया गया था कि सभी मनुष्य बराबर पैदा होते हैं और सबको सुखी जीवन जीने का अधिकार है। यह सही है कि पैसा ही सुखमय जीवन का एकमात्र आधार नहीं है, लेकिन पैसे की गैरबराबरी समाज और राजनीति में इतनी विकृतियां पैदा करती है कि कोई भी आदमी सुखी जीवन बिता ही नहीं सकता। यह अकारण नहीं है कि अमेरिकी समाज में अवसाद का समाधान करनेवाली दवाएं सबसे ज्यादा बिकती हैं और हथियारों की सबसे ज्यादा बिक्री यही देश करता है। ऐसे समाज में सुख की खोज असाधारण रास्तों से ही की जा सकती है।

भारत ने 1947 में जिस नई राज्य व्यवस्था का गठन किया, उसका सैद्धांतिक आधार भी समानता ही थी। संविधान निर्माताओं ने संविधान की उद्देशिका में जिन तीन बड़े उद्देश्यों को राष्ट्रीय सक्ष्यों के रूप में निरूपित किया था, उनमें 'सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय' और 'प्रतिष्ठा तथा अवसर की समानता' का अन्यतम स्थान है। साम्यवादी देशों के संविधानों को छोड़ कर, जिनमें खाने के जितने दांत हैं, उससे अधिक दिखाने के, दुनिया का और कौन-सा संविधान है, जिसमें इतना साफ-साफ कहा गया है कि 'राज्य, विशिष्टतया, आय की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा और न केवल व्यष्टियों के बीच, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में रहनेवाले और विभिन्न व्यवसायों में लगे हुए लोगों के समूहों के बीच भी प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानता समाप्त करने का प्रयास करेगा।' ऐसे सुंदर संविधान के मौजूद रहते हुए अगर थानों में भी ट्वॉयलेट की असमानता को दूर नहीं किया जा सका, तो यह दावा कैसे किया जा सकता है कि हम एक गैर-वादाखिलाफ समाज में रहते हैं?

ट्वायलेट के नाम पर मुंह बिचकानेवालों से निवेदन है कि यह कोई साधारण मामला नहीं है। यह समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया थे जिन्होंने लोक सभा में ग्रामीण महिलाओं के लिए शौचालय की व्यवस्था न होने का सवाल जोर दे कर उठाया था। यह व्यवस्था न होने के कारण गांव की महिलाएं या तो मुंह अंधेरे या गोधूलि के बाद ही शौच के लिए जा सकती हैं। जो लोग समझते हैं कि यह लोहिया का पगलेटपन था, उन्हें 1962 की अपनी भारत यात्रा पर आधारित वीएस नॉयपाल की चर्चित किताब 'एन एरिया ऑफ डार्कनेस' पढ़नी चाहिए, जिसमें रेल की पटरियों के करीब लोगों के शौच करने पर जुगुप्सामूलक वृत्तांत हैं। जो लोग नियमित रेल यात्रा करते हैं, वे गवाही देंगे कि स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। अफसोस की बात है कि देश की राजधानी दिल्ली में, जहां एक महिला ने पच्चीस वर्ष तक प्रधानमंत्री के रूप में शासन किया, जहां दो-दो महिलाए मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, जिनमें से एक अभी भी मुख्यमंत्री हैं और जहां एक महिला ने हाल ही में राष्ट्रपति पद संभाला है, अभी भी पुरुषों के लिए जितने शोचालय हैं, उसके आधे भी महिलाओं को मयस्सर नहीं हैं। यह एक ऐसी विषमता है, जिसे थोड़े-से खर्च से तुरंत दूर किया जा सकता है और एक बुनियादी हक के मामले में समानता लाई जा सकती है।

यह तो एक छोटा-सा उदाहरण है, जहां तक हमारी समानतावादी दृष्टि नहीं पहुंच पाती। यह कोई दुनिया बरोब्बर करने का मामला नहीं है, भारत की स्त्री नागरिकों को एक अत्यंत मूलभूत सुविधा प्रदान करने की बात है। जब स्त्रियों को पुरुषों के बराबर ट्वॉयलेट सुविधाएं मिल जाएंगी, तब देश के सभी नागरिकों को न्यूनतम शौचालय सुविधा देने का अवसर आएगा। अभी हालात ये हैं कि ज्यादातर नागरिकों को शौचालय की उचित सुविधा नहीं है, जबकि बड़े फ्लैटों में रहनेवाले पांच-छह व्यक्तियों के लिए दो या तीन ट्वॉयलेट हैं।

अब कुछ आगे की बात करें। मैं कई बार यह मुद्दा उठा चुका हूं कि कोलकाता की ट्रामों में पहला और दूसरा दर्जा क्यों है। कम से कम तीस वर्षों से कोलकाता की ट्राम व्यवस्था राज्य के वामपंथी नेताओं के हाथ में है। पहले राज्य सरकार ने उसका प्रबंधन अपने हाथ में लिया, फिर उसका राजकीयकरण ही कर लिया। एक समानतावादी व्यक्ति जानना चाहेगा कि अगर कोलकाता की ट्रामों से पहला दर्जा खत्म कर दिया जाए, तो राज्य सरकार को कितने पैसे की हानि होगी। अर्थशास्त्र का कोई भी विद्यार्थी बता सकता है कि कोई ऐसी हानि नहीं होगी कि विश्व बैंक से कर्ज लेना पड़ जाए। वह यह भी कह सकता है कि राज्य सरकार की आय शायद बढ़ जाए, क्योंकि अभी पहले दर्जे में कम भीड़ होती है और दूसरे दर्जे में ज्यादा भीड़ होती है। दोनों दर्जों का किराया एक हो जाए, तो साधारण लोग भी अगले डिब्बे में यात्रा करने लगेंगे, जिससे ट्राम यात्रियों की संख्या बढ़ जाएगी और ट्रामों से होनेवाली कुल आय बढ़ जाएगी। कहते हैं, मार्क्सवाद का नजरिया मूलतः आर्थिक विश्लेषण का होता है, लेकिन कोलकाता के मार्क्सवादियों का ध्यान इस तुच्छ-सी बात पर नहीं जा सका है। इसका कारण क्या हो सकता है? एकमात्र कारण यह प्रतीत होता है कि समानता का मुद्दा उनके नुक्ता-ए-नजर में कहीं है ही नहीं। जब तक दृष्टि नहीं बदलती, तब तक दृश्य कैसे बदल सकता है?

दृष्टि बदले, तो यह भी दिखाई पड़ सकता है कि नाट्यगृहों में तीन-चार दर्जों के टिकट रखने की जरूरत क्या है। वहां ढेर सारे नाटक ऐसे दिखाए जाते हैं जिनकी तह में समानता का मूल्य होता है। ब्रेख्त के नाटक ऐसे ही हैं। कुछ नाटक तो इतने क्रांतिकारी होते हैं कि उनमें पूंजीवाद और सम्राज्यवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने की प्रेरणा दी जाती है। लेकिन ये नाटक देखनेवाले भी कई आर्थिक वर्गों में बंटे होते हैं। कुछ पचास रुपयों का टिकट खरीद कर प्रेक्षागृह में प्रवेश करते हैं, तो कुछ सौ या डेढ़ सौ रुपए चुकाते हैं। जो ज्यादा कीमत का टिकट खरीदते हैं, वे अग्रिम पंक्ति में बैठ कर नाटक देखते हैं। जिनका टिकट कम मूल्य का होता है, उन्हें पीछे बैठाया जाता है। नाटक आखिकार साहित्य की ही एक विधा है। साहित्य की दुनिया में यह विषमता लोगों को क्यों नहीं अखरती?

आजकल यह शिकायत आम है कि सिनेमाघरों में दर्शक कम होते जा रहे हैं। खासकर महानगरों में। हाल ही में मैं कोलकाता गया, तो मैंने पाया कि कई अच्छे सिनामाघर बंद हो चुके हैं। दिल्ली में सिनेमाघर बंद तो नहीं हो रहे हैं, पर उनके दर्शक तेजी से घट रहे हैं। इसके कई कारण होंगे, पर यह कारण तो यह है ही कि सिनेमा देखना बहुत मंहगा हो गया है। इसका एक समाधान यह हो सकता है कि सिनेमाघरों को वर्गविहीन कर दिया जाए। इससे टिकटों का औसत मूल्य एक ऐसे स्तर पर आ जाएगा, जिसे चुकाना सभी के लिए शक्य होगा। इसका एक परिणाम यह जरूर होगा कि किसी बड़े स्टोर के मालिक का बेटा जिस सीट पर बैठ कर फिल्म देख रहा हो, उसके ठीक बगल में कोई रिक्शा या ऑटो चालक बैठा हुआ हो। लेकिन यही तो लोकतंत्र है!

लोकतंत्र की इस परिभाषा को अपनाने पर हम यह उम्दा सवाल भी उठा सकेंगे कि रेल में एक ही दर्जा क्यों न हो। एसी डिब्बों के संडासों में ये न्यूनतम सुविधाएं होती हैं -- बिजली का एक ट्यूब, नल से अविरत बह सकनेवाला पानी और बिजली का पंखा। हाथ धोने के लिए तरल साबुन भी। ये वे सुविधाएं हैं जो करोड़ों एपीएल परिवारों को अपने घर में भी उपलब्ध नहीं हैं। विषमता की इतनी भयावह परिस्थितियों में जो लोकतंत्र जारी है, वह कोई अंधा और लंगड़ा-लूला लोकतंत्र ही हो सकता है। पहले कुछ बुनियादी मामलों में समानता का दर्शन लागू हो जाए, तो शिक्षा,े चिकित्सा आदि क्षेत्रों में समानता का प्रश्न उठाया जाए।