Wednesday, July 30, 2008

शादी कितनी ज़रूरी है एक लड़की के लिए ....

मैनें हमेशा यह महसूस किया कि अगर भारतीय माता-पिता अपनी पुत्री के विवाह और विवाहित जीवन के बारे में इतने चिंतित न रहते तो उनकी अधिकांश {लड़कियों व अभिभावकों}समस्याएँ खत्म हो गयीं होतीं ।

आप माने या न मानें , पर लड़कियों को क्या करियर चुनना चाहिये और कैसे कपड़े पहनने से लेकर कैसे चलना - बोलना चाहिये तक सब कुछ जो वे करती हैं वह उस पुत्री के एकमात्र भविष्य़ को ध्यान में रखते हुए होता है जिसमें वह एक अच्छी पत्नी होगी एक ऐसे उदार मना, विशाल हृदय पुरुष की जो पर्याप्त दहेज लेकर उससे शादी करने की कृपा करेगा ।

और इस तरह भारतीय अभिभावक एक योग्य दामाद पाकर पुत्री के सपनों का बलिदान कर देंगे उसे वह देने के लिए जिसे वह एक सपने के साकार होने से कम नही समझते ।एक सपनो का राजकुमार ! एक परफेक्ट कैच ...ऊप्स ..मैच !!


एक लड़की को अनिवार्यत: विवाह करना चाहिये । यह बिल्कुल गैर-ज़रूरी है कि जिसके साथ वह चाह रही है या पसन्द करती है उसके साथ । बल्कि उसके साथ जो उसे सुरक्षा दे सके । लेकिन यह चयन भी समस्यारहित नही होता । लड़की उसका मूल्य अपनी खुशी,मानसिक शांति और आज़ादी देकर चुकाती है । और कई बार जान भी ।


ज़रा सोचिये ,क्या हम और हमारी पुत्रियाँ चैन की सांस नहीं ले सकेंगे अगर हम उन्हें एक सुरक्षित ,सुखी पत्नी बनने के लिए बड़ा करने की बजाए एक व्यक्ति बनने के लिए पालन-पोषण करेंगे ।


* अगर हम उन्हें आत्मनिर्भर, स्नेहमयी,ज़िम्मेदार,स्वतंत्र,भरोसेमन्द,विवेकवान और प्रसन्न चित्त व्यक्ति के रूप में बड़ा

करें ..
*अगर हम उन्हें विवाह करने और विवाहित रहने के कर्तव्य से मुक्त कर दें .....{तलाक और सम्बन्ध विच्छेद के लिए हमेशा सभी उसे हतोत्सहित करते हैं और एडजस्ट करने की नसीहतें देते हैं...और विवाहित बने रहने के कर्तव्य के तले वह घुटती रहती है }


*अगर हम उन्हें जब वे चाहें और जब उन्हें अपने लायक जीवन साथी मिले उससे शादी करने दें...{लड़की के सर इज़्ज़त का ठीकरा है सो उसे ही इमोशनल ब्लैकमेल ज़्यादा किया जाता है ...घर से भागे लड़के के घर लौटने के दरवाज़े सदा खुले होते हैं , घर से भाग कर शादी करने वाली लड़की के लिए वे हमेशा बन्द रहते हैं}

* अगर हम उन्हें सपोर्ट करें ऐसे साथी से विवाह के लिए जो उन्हें बराबरी पर मानता हो और सहज भाव से इसे स्वीकार करता हो कि दोनो साथी अपने - अपने दिमाग से सोचेंगे .....
{अक्सर पत्नी के लिए सोचने और फैसले लेने की ज़िम्मेदारी पति अपने ऊपर खुशी-खुशी ले लेता है :-)}


*ऐसा जो पुत्री के परिवार को भी वैसा ही प्यार व सम्मान दे जैसा वह अपने लिए अपेक्षा करता है ....

*कोई ऐसा जो पुरुष होने से पहले एक मानव हो ...जो पत्नी को पूरक न मान कर टीम का साझीदर माने ..कि वे दोनों मिलकर एक टीम हैं ....{टीम में हमेशा भूमिका बदलने और बराबरी पर रहने की गुंजाएश रहती है }

क्या आप सोच सकते हैं उस लड़की के व्यक्तित्व और आत्मविश्वास के बारे में जिसके माता-पिता उसके जन्म से लेकर रात दिन उसके विवाह के बारे में चिंतित नही रहते .......?
साभार -

an Indian home maker

चलताऊ अनुवाद के लिए अग्रिम क्षमा

Tuesday, July 29, 2008

सार्थकता की तलाश में

पिछले तीन महीनों से व्यस्त थी। पहले भतीजी पलक छुट्टियाँ बिताने मेरे पास आई, फ़िर छोटी ननद, फ़िर छोटे भाई के बच्चे-आदित्य और निक्की। बीच के समय में मैं कुछ दिन के लिये मायके चली गई, और वहाँ से अस्वस्थ छोटी बहन के पास। मेरे घर लौटने के बाद हमारा बेटा तुषार परिवार सहित मिलने आ गया। परिजन के साथ समय जैसे पंख लगा कर उड़ गया।
सबके चले जाने के बाद एक अवसाद सा मन पर घिर आया। अपने दोनों बच्चों के जाने के बाद यूँ भी घर चुप-चुप और अकेला सा लगता है। पर इस अकेलेपन का अहसास व्यस्तता के अचानक समाप्त हो जाने के बाद बड़ी तीव्रता से होता है।
पहले कई सालों तक स्कूल में पढ़ाया करती थी, तो आधे से ज़्यादा दिन वहाँ बीत जाता था, बच्चों और साथियों के साथ मन लग जाता था। कुछ साल पहले पारिवारिक कारणों से नौकरी छोड़ दी और पूरी तरह घरेलू महिला बन गई। छ-सात साल बाद जब फ़ुर्सत मिली तो फ़िर से नौकरी के बंधनों में बंधने का जी नहीं चाहा। अच्छी लगने लगी यह आज़ादी कि जब जी चाहे, जहाँ मर्ज़ी हो आ-जा सकती हूँ, किसी से इज़ाज़त नहीं लेनी है, किसी की जवाबदारी नहीं है अपने पर।
औरत होने के बहुत डिसएडवांटेज होते हैं ज़िंदगी में, पर यह एक एडवांटेज मिला है मुझे। नौकरी करना मेरे लिए एक मजबूरी नहीं है। घर चलाने के लिये कमाने की ज़िम्मेदारी पति की है, मेरा काम घर को सुचारु रूप से चलाना भर है। इसलिये पहले भी जब नौकरी की तो इसलिए कि मुझे पढा़ना अच्छा लगता है, बच्चों के साथ काम करना अच्छा लगता है। उनकी भोली-भाली बातें मेरे दिल को भाती हैं । जहाँ बड़ों की दुनिया का छल कपट मन को खिन्न कर देता है, बच्चों की निश्छलता से रूबरू होकर मेरा इंसान की मूलभूत अच्छाई में विश्वास फ़िर से पक्का हो जाता है। बच्चों को कुछ नया, कुछ नयी तरह से सिखाने में जो उपलब्धि का अहसास होता है, वह अलग।
जब पहली बार अकेली हुई थी तो मैं मुम्बई में थी। पहले मैंने अपने खालीपन को भरने की कोशिश की- किताबों से, टीवी से, कंप्यूटर से और इंटरनेट से। फ़िर भी खाली-खाली लगता रहा तो एक एन जी ओ- आशा किरण- द्वारा संचालित एक झोपड़-पट्टी के स्कूल में दिन के तीन घंटे पढाने लगी। बच्चों का साथ फ़िर से मिल गया था जिसने मेरे अकेलेपन को भर दिया । कुछ समय बाद पति का बंगलोर तबादला होने पर यहाँ चली आई। यहाँ आकर वैसा ही काम ढूंढने की कोशिश की तो देखा कि स्थानीय भाषा जाने बिना यहाँ एन जी ओ में काम का अवसर मिलना मुश्किल है। मुम्बई में सभी हिन्दी जानते हैं, समझते हैं पर बंगलोर का गरीब तबका केवल कन्नड़ भाषा जानता है। उनकी भाषा जाने बिना उनके साथ काम कैसे करूं?
फ़िर से किताबों, टीवी और इंटरनेट का सहारा लिया। इसी तरह इंटरनेट की दुनिया में घूमते-भटकते हुए चोखेर बाली से पहचान हो गई। अच्छा लगा पल्लवी, सुजाता, अनुराधा, आभा, स्वप्नदर्शी, अशोक पांडे जैसे लोगों के विचार पढ कर, वे लोग जो इतने सही और तार्किक ढंग से सोचते हैं। लगा कि ये सब मेरे मन की बात कह रहे हैं। मैं लगभग रोज़ चोखेर बाली के साथ कुछ वक्त बिताने लगी। पर कुछ दिन बाद लगने लगा कि मैं कुछ सार्थक नहीं कर रही हूँ। सिर्फ़ अच्छी और सही बातें पढ़ने और लिखने से क्या होगा? क्या इससे किसी को कोई लाभ हो रहा है? किसी की ज़िन्दगी में कोई बदलाव आ रहा है? जो लोग यह बातें पढ़ या लिख रहे हैं, वह तो पहले से जागे हुए हैं। क्या यह विमर्श किसी सोये इंसान को भी जगा पा रहा है? उसकी तो पहुँच ही इस मीडियम तक नहीं है।
यह बेचैनी मुझे फ़िर एक ऐसे एन जी ओ की तलाश की ओर ले गई जहाँ मैं कुछ ऐसा कर सकूं जिससे कुछ फ़र्क पडे। आखिरकार मुझे एक ऐसा स्कूल मिल गया जहाँ भाषा की दिक्कत के बावज़ूद मैं कुछ मदद कर सकती हूँ। इस संस्था में रोज़ तीन घंटे झोपड़-पट्टी के बच्चों के साथ बिताती हूँ। हम टूटी-फूटी भाषा में एक-दूसरे से बातें करते हैं। शब्दों का सहारा लिये बिना अपनी बात एक-दूसरे को समझाने का प्रयास करते हैं। सच कहूँ, बहुत मज़ा आता है।
अब जब कोई पूछता है कि आप आज कल क्या कर रही हैं तो मैं यह सवाल अपने आप से नहीं करने लगती। जब पति शाम को घर आने के बाद पूछते हैं कि आज क्या- क्या किया दिन भर, तो उत्तर देने के लिये सोचना नहीं पड़ता। कई सारे बच्चे मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में फ़िर से शामिल हो गये हैं। बच्चों के साथ ने फ़िर एक बार मेरे अकेलेपन को एक सार्थकता के अहसास से भर दिया है।

मैं सेंत सेंत कर रखती हूँ चालीस साल पुराने अचार की तरह, वक़्त

एक बड़े कुनबे के बीच अकेले पिसते हुए और अपनी छोटी छोटी चाहतों और ज़रूरी कामों को हमेशा पीछे रखते हुए , स्त्री जो मह्सूस करती है उसे सपना चमड़िया की यह कविता बखूबी बयान करती है ।ब्रह्म मुहूर्त में शुरु हुई स्त्री की भाग दौड़ रात सबके सो जाने के बाद तक जारी रहती है ।ऐसे में वक़्त उसे अपने हाथ से फिसलती रेत सा महसूस होता है जिसे थोड़ा भी बचा पाना और उसे अपने लिए खर्च कर पाना एक संघर्ष बन जाता है ।




मुझसे ज़्यादा कौन जानता है
वक़्त के बारे में
जो है तो मेरे पास
मुकम्मल
पर एक पूरे अभाव की तरह ।
जबकि ठीक मेरी नाक के नीचे
कुछ लोग उसे भोग रहे हैं
रौन्द रहे हैं
चहल कदमी कर रहे हैं
बाँहों में बाँहें डाले
मेहरबान चाँदनी में ।
घने पेड़ों के साँए में ।
वक़्त मेहरबन है उनपर
इतना
कि कभी कभार नही
अक्सर ही लेकर उसे
निकल जाते हैं लम्बी ड्राइव पर
जबकि मैं सेंत सेंत कर रखती हूँउसे
नानी के डाले ,
40 साल पुराने नींबू के अचार की तरह
मर्तबान में कसकर,
जो अब स्वाद से ज़्यादा
अचार से ज़्यादा
दवा बन गया है ।
फिर भी बचता नहीं
खर्च ही हो जाता है
हारी-बीमारी में
कि कुनबा बहुत बड़ा है मेरा ।
इसलिए मुझसे ज़्यादा
कौन जानता है
वक़्त के बारे में ।


सपना चमड़िया

Monday, July 28, 2008

हम ही हम हैं, और कोई दूजा नहीं!!

जब मैंने ये खबर पङी तो अनायास ही मन हुआ कि गाऊँ “यहाँ के हम सिकन्दर चाहें तो कर लें सबको अपनी जेब के अंदर” एक बार और सिद्ध हो गया कि हम औरतें मर्दों से कम नहीं, कम का तो सवाल ही नहीं उठता, कहना चाहिये हर क्षेत्र में उन्नत हैं।

http://news.in.msn.com/national/article.aspx?cp-documentid=1587592

हाल ही के सर्वे से ज्ञात हुआ है कि जिन संस्थानों में अधिक महिला अधिकारी कार्यरत हैं उन संस्थानों ने अपने आंकङो में बेहतर सुधार किया है। इतना ही नहीं महिलाओं ने वित्य विभाग के आंकङो को खासा प्रभावित किया है, जो बेहतरी की ओर अग्रसर हैं।


वर्ष 2001 से लेकर वर्ष 2006 तक परिषद सदस्यों के बीच महिलाओं कि संख्या में खासी बङोतरी हुई हैं, जो सिद्ध करता है कि महिलायें हर क्षेत्र में मर्दों से कहीं आगे हैं।

अब आप बतायें ये खबर पङकर आप कैसा महसूस करेगीं / करेगें

अ फेयरी टेल बोले तो दुनिया की सबसे छोटी परी कथा

एक बार एक पुरुष ने महिला से पूछा- "क्या तुम मुझसे शादी करोगी?" उस महिला ने कहा:" नहीं "!

और उसके बाद वह महिला सदा सुख से रहने लगी। वह खरीददारी करती, नाचती, पहाड़ों पर घूमने जाती, ट्रेकिंग और कैंपिंग करती, घर को हमेशा साफ सुथरा पाती, जब मन करता तभी पकाती, कभी बहस में नहीं पड़ती, पैसे नहीं बचाती और सर्दियों में सारा गर्म पानी अपने लिए इस्तेमाल कर पाती।

नाटक देखती, खेल कभी नहीं देखती, अपनी नजर में हमेशा ऊंची रहती, कभी नहीं रोती या झींकती, सज-धज कर, बन ठन कर कभी नहीं रहती, अपने सादे कपड़ों में ही रहती और हमेशा खुश और सहज रहती।

समाप्त

Friday, July 25, 2008

मौसियाँ / अनामिका

वे बारिश में धूप की तरह आती हैं–

थोड़े समय के लिए और अचानक हाथ के बुने स्वेटर,


इंद्रधनुष, तिल के लड्डू और सधोर की साड़ी लेकर वे आती हैं


झूला झुलाने पहली मितली की ख़बर पाकर और

गर्भ सहलाकर लेती हैं अन्तरिम रपट
गृहचक्र,

बिस्तर और खुदरा उदासियों की।
झाड़ती हैं जाले, संभालती हैं बक्से मेहनत से

सुलझाती हैं


भीतर तक उलझे बाल

कर देती हैं चोटी-पाटी और

डाँटती भी जाती हैं कि,


री पगली तूकिस धुन में रहती है
कि बालों की गाँठें भी तुझसे
ठीक से निकलती नहीं।

बालों के बहाने वे गाँठें सुलझाती हैं जीवन की

करती हैं परिहास,


सुनाती हैं किस्से और फिर हँसती-हँसाती
दबी-सधी आवाज़ में बताती जाती हैं–


चटनी-अचार-मूंगबड़ियाँ और बेस्वाद संबंध
चटपटा बनाने के गुप्त मसाले और नुस्खे

–सारी उन तकलीफ़ों के जिन पर

ध्यान भी नहीं जाता औरों का।

आँखों के नीचे धीरे-धीरे जिसके

पसर जाते हैं साये

और गर्भ से रिसते हैं


महीनों चुपचाप–
ख़ून के आँसू-से ,

चालीस के आसपास के अकेलेपन के उन

काले-कत्थई चकत्तों का

मौसियों के वैद्यक में एक ही इलाज है–



हँसी और काली पूजा और पूरे मोहल्ले की अम्मागिरी।


बीसवीं शती की कूड़ागाड़ी
लेती गई खेत से कोड़कर
अपने जीवन की कुछ ज़रूरी चीजें
–जैसे मौसीपन,
बुआपन, चाचीपंथी,अम्मागिरी
मग्न सारे भुवन की।



रचनाकार - अनामिका

मुजफ्फरपुर (बिहार), भारत
कुछ प्रमुख कृतियाँ :
गलत पते की चिट्ठी (कविता), बीजाक्षर (कविता), अनुष्टुप (कविता), वसंत को तुम्हारी जरूरत है(कविता)(२००४ ); दूब-धान / अनामिका

शिक्षा : दिल्ली विश्वविद्यालय से अँग्रेजी में एम.ए., पी.एचडी.। अध्यापन- अँग्रेजी विभाग, सत्यवती कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय।

संपर्क : डी–।।/83, किदवई नगर वेस्ट, नई दिल्ली। दूरभाष : 011–24105588

ई मेल : anamika1961@yahoo.co.in

{कविता कोष से से साभार }

Wednesday, July 23, 2008

रोना धोना किसी समस्या का हल नहीं है

कई बार लोगों को कहते सुना है की महिलायें रोकर दूसरों की सुहानुभूति हासिल करने की कोशिश करती हैं ,ज़रा ज़रा सी बात पर आंसू बहाने लगती हैं! रोना बुरा नहीं है बल्कि रोने से दिल का गुबार निकल जाता है और कुछ हद तक स्ट्रेस भी कम होता है लेकिन छोटी छोटी सी बातों पर रोना सिर्फ कमजोरी ही दर्शाता है! आज के ही एक वाकये ने मुझे ये पोस्ट लिखने को प्रेरित किया!

कल शाम को मैंने थाने पर नोट करा दिया था की मैं सुबह ११ बजे थाने आकर सभी कर्मचारियों की मीटिंग लूंगी!तय वक्त पर आज मैं थाने पहुंची लेकिन पाया की पहले से बताने के बावजूद कुछ कर्मचारी गैरहाजिर थे!पूछने पर पता चला की ये सभी अपनी ड्यूटी से अनुपस्थित हैं!मैंने सभी की अनुपस्थिति रोजनामचे में दर्ज करा दी....करीब दो घंटे बाद जब मीटिंग ख़त्म हो चुकी थी तब एक महिला कॉन्स्टेबल आई और न आने की माफ़ी मांगने लगी! मैंने उससे मीटिंग में उपस्थित न रहने का कारण पूछा तो उसने बताया की वह अपने बच्चों को स्कूल से घर छोड़ने गयी थी!मैंने पूछा की क्या वह अपने टी.आई. से पूछकर गयी थी तो उसने न में सर हिलाया!मैंने सख्ती से कहा कि उसे सजा मिलेगी..इस तरह की अनुशासन हीनता बर्दाश्त नहीं की जायेगी!इतना कहते ही उसने रोना शुरू कर दिया और सुबक सुबक कर कहने लगी कि ठीक है मैडम अगली बार से बच्चे स्कूल में ही बैठे रहेंगे! मुझे बहुत गुस्सा आया...उसके आंसू मुझ पर बेअसर थे!
मैंने उससे पूछा कि क्या कभी ऐसा हुआ है कि तुमने अपने बच्चों के लिए आधे घंटे की छुट्टी मांगी हो और तुम्हारे टी.आई. ने अनुमति न दी हो? क्या तुम्हे शोभा देता है कि पुलिस फोर्स में रहते हुए तुम अपनी ड्यूटी से बिना बताये गैर हाज़िर हो जाओ? और जब तुम्हे बच्चों को स्कूल से घर छोड़ने में केवल आधा घंटा लगता है तो दो घंटे बाद आने का क्या औचित्य है? इन सभी सवालों का उसके पास कोई उत्तर नहीं था ...अगर कुछ था तो न रुकने वाले आंसू!
उसके जाने के बाद टी.आई ने बताया कि सभी महिला कर्मचारियों का यही हाल है..ज़रा सा भी टोका जाए तो तुंरत रोना शुरू कर देती हैं...इसके बाद कोई ज्यादा कुछ कह नहीं पता!

अगर व्यथा सच्ची है तो आंसू बहाना जायज़ है लेकिन अपनी गलती को आंसुओं से छुपाना गलत है!कोई भी इन आंसुओं से एक या दो बार ही पिघलेगा इसके बाद ये आंसू केवल खीज ही पैदा करते हैं!और एक बार मान लिया गया कि अरे...ये तो रोने धोने का नाटक है फिर सच्चे आंसुओं का असर भी किसी पर नहीं होगा! मैं मानती हूँ कि महिलायें पुरुषों के मुकाबले ज्यादा रोती हैं लेकिन अगर ये बात बात पर रोना हमारे व्यक्तित्व को कमज़ोर बना रहा है तो क्या कोशिश नहीं करनी चाहिए कि ये कमजोरी दूर हो सके!यह भी सच है कि किसी भी महिला को चार लागों के बीच अगर डांट दिया जाए तो अपमान के कारण उसके तुंरत आंसू निकल आते हैं , शायद मुझे भी मेरा बॉस भरी मीटिंग में डांट दे तो मुझे भी बुरा लगेगा! इसलिए मैं हमेशा कोशिश करती आई हूँ कि मेरे काम में कोई कमी न निकाल सके! लेकिन हर वक्त ये संभव नहीं हो पता कि काम हमेशा अपडेट ही रहे!गलतियां भी होती ही हैं लेकिन आज मेरे अधिकारी ये जानते हैं कि मैंने मेहनत और कोशिश में कमी नहीं की है!

चूंकि दुसरे dipartments से मेरा ज्यादा वास्ता नहीं रहा इसलिए मैं केवल अपने विभाग की महिलाओं के बारे में ही बात करूंगी! पुलिस फोर्स एक अनुशासित फोर्स है और इसे ज्वाइन करने के पहले सभी को इसकी नौकरी की शर्तें पता होती हैं!एक तरफ आरक्षण की मांग की जाती है जो की दिया भी जा रहा है! लेकिन ज़रा सोचिये आरक्षण से ३३ प्रतिशत महिलायें फोर्स में आयें और कामचोरी करें तो क्या यह बात दिमाग में आना स्वाभाविक नहीं है की इससे अच्छा तो कोई पुरुष कर्मचारी होता कम से कम ड्यूटी तो करता!घर की जिम्मेदारी तो उम्र भर ही रहेगी लेकिन नौकरी और घर में सामंजस्य बैठाना बेहद ज़रूरी है ताकि नौकरी के साथ भी पूरा न्याय हो सके! यदि बच्चे छोटे हैं या अन्य कोई ऐसी समस्या है जिसके कारण घर पर ज्यादा वक्त देना पड़ता हो तो पुलिस विभाग में भी कई ऐसी पोस्टिंग्स हैं जहां दस से पांच बजे तक ही काम करना पड़ता है और सन्डे की छुट्टी भी होती है!और अपनी पारिवारिक परिस्थितियों का हवाला देने पर पदस्थापना आसानी से मिल जाती है!लेकिन नहीं...पोस्टिंग चाहिए शहर के सबसे बड़े थाने में...जहां ऊपरी आमदनी की गुंजाईश हो और काम करने के नाम पर घर और बच्चों का बहाना! बात कड़वी है लेकिन सच है ! हांलाकि सभी महिलायें ऐसी नहीं हैं लेकिन एक बड़ा प्रतिशत व्यावसायिक रूप से दक्ष नहीं है इसलिए सभी महिलाओं के सन्दर्भ में यही सन्देश जाता है! हांलाकि निचले स्तर पर यह समस्या ज्यादा है!अधिकारी स्तर पर जिम्मेदारी का बोध है!

मैं रोने के खिलाफ नहीं हूँ न ही ऐसा है की मैं नहीं रोती हूँ !लेकिन मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूँ कि अपने आंसू किसी जायज वजह के लिए बहायें न कि हर समस्या का समाधान आंसुओं से करने की कोशिश करें! साहस से परिस्थितियों का सामना करने से ही समस्याओं का निदान निकलेगा!चाहे घर हो या कार्य स्थल...बहादुर बने और याद रखें " रोना धोना किसी समस्या का हल नहीं है"

Tuesday, July 22, 2008

हमारी बेटियों की बार्बी अपना साथी खुद चुनती हो !!

बार्बी हमारी बेटियों की पसंदीदा गुडिया है ! बार्बी एक आधुनिका नवयौवना और रॉयल मिज़ाज़ की सुंदरी है ! इस गुडिया को छोटी बच्चियों के हाथ में देकर हम अ[पनी बेटी के लिए सपने बुनते हैं- जैसी हसीन कमसिन और आभिजात्य यह गुडिया है वैसी ही हमारी बेटी भी बननी चाहिए ! हमारी बेटियां भी इस डॉल को अपना आदर्श मानती है ! इस बार्बी का एक ब्वाय फेंड है ऎलेन ! बार्बी का आदर्श साथी- सजीला जोशीला जवान ! पर भारत की बार्बी से खेलने वाली बेटियां नहीं जानती कि बार्बी का एक प्रेम साथी भी है सो वे शायद उसको खरीदने की ज़िद भी नहीं पालतीं !

बार्बी कंपनी के एक सर्वे में यह पाया गया है कि भारत में बार्बी के इस साथी ऎलेने के लिए कोई गुंजाइश नहीं है क्योंकि यहाँ भारतीय अरेंज मैरिज के आदर्श के लिए एक बडा खतरा हो सकता है ! यूं तो बाजार के द्वारा किए गए सर्वे की कोई सामाजिक ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं होती पर इस तरह के सर्वे हमारे समाज के मन की भीतरी परतों को उखाड कर सामने रखने का काम भी कर देते हैं ! महंगी बार्बी खरीदने वाला समाज भी अपनी मान्यताओं में कितना पुरातन और डरा हुआ है यह तथ्य हमें परेशान करता है ! अपने बच्चों को बडे स्कूलों में पढाने वाला , प्रेमाचार और यौनाचार भरी फिल्मकहानियों पर मर मिटने वाला ,बेटियों को बराबरी का माहौल देने का दावा करता समाज प्रेम विवाह के विचार से कितना भयभीत है यह तथ्य हमें चौकाता है ! दोहरे मानदंडों वाले भारतीय माता -पिता बेटी के सपने में भी प्रेम का विचार नहीं आने देना चाहते ! वे बेटी वहीं बांधेगे जहां उनका सोशल स्टेतस ,बिरादरी और उनका अहमं संतुष्ट होता है ! प्यार पर्दे की चीज़ है रोजमर्रा की ज़िंदगी में तो सबसे वाहिताय चीज़ है ! प्यार मनोरंजन की कहानी का नाम है जिसके लिए फॆंटेसी में जगह है रीयेलिटी में नहीं ! इसलिए बार्बी अकेली ही चलेगी ब्वॉयफेंड के साथ नहीं !

जहां औरतें गढी जाती हों उस देश के अभिभावक बेटियों को औरत बनाने पर आमादा है ! बच्ची का बचपन औरतपने को समर्पित एक कडा यज्ञ है हमारे लिए ! यहां तमाम बराबरी होगी ! आधुनिकता होगी ! पर प्रेम और विवाह के लिए आजादी नहीं होगी ! विवाह हमारे देश में पारीवारिक सामाजिक संबंध माना जाता है उसमें व्यक्तिगत चुनाव सबसे घृणित खयाल है ! हमारे लिए बेटी लगातार गढने की चीज है जिसका अपना अस्तित्व पनपना परिवार के लिए सबसे डरावनी चीज़ है ! बार्बी उसमें औरत पैदा करने के लिए है इसलिए नहीं कि वह हमारी बनी बनाई जमी जमाई परंपराओं की नींव हिला दे ! इसलिए कम समझदार अभिभावक भी बार्बी के ब्वायफ्रेंड के निहितार्थ समझते हैं !
.................. ये बस संयोग की बात है अपनी बेटी को जी भर आजाद खयाल बनाने वाले हम माता-पिता कल बेटी की बात पर बहुत हैरान हुए ! खेल और मजाक के माहौल में पापा ने जब कहा तुम्हारी ममा तो मेरी गर्लफ्रेंड हैं ! इसपर साढे पांच साल की बेटी का कहना था कि नहीं ममा आपकी बीवी हैं गर्लफ्रेंड की बात तो झूठ होती है ..वो सिर्फ फिल्मों में होती है ..!जाहिर है बेटी का समाजीकरण करने में कई ताकतें एक साथ जुटी हैं और हम चाहकर भी अपनी बेटी को उनके असर से बचा नहीं पा रहे हैं !

जिसमें देश में प्यार मोहब्बत इश्क लव जैसे लफ्जों वाले गाने ज़ुबानों पर रटे रहते हों , इश्क के लिए मरने मिटने वाली कहानियां सुनहले पर्दे से सीधे दिलों में उतरती हों , कथांत में प्रेमी प्रेमिका के मिलन को देख दर्शक किलकित हो जाते हों उस देश के लोगों के लिए बच्चों के प्रेम विवाह की कल्पना तक डरा देने वाली हो--विचित्र है !
प्रेम और विवाह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और प्रेम एक निहायत ही निजी वस्तु है !

नारी

नारी है कोमलता, नारी है सुंदरता
नारी है भावुकता, नारी है सह्रदयता

नारी है उदारता, नारी है सहिष्णुता
नारी है त्यागमयी, नारी साक्षात् ममता

नारी है क्षमाशील, नारी ही है स्थिरता
नारी ही है जननी, नारी ही है दुहिता


नारी का हाथ लगे, मिट्टी हो जाये स्वर्ण
नारी का हाथ फिरे, घर आंगन हो प्रसन्न

ये तो सब सद्-गुण हैं ,ना समझो दुर्बलता
वक्त अगर पड़ जाये, वज्र सी है कठोरता

राक्षस के दमन हेतु, नारी साक्षात् काली
दुर्जन के दंड हेतु, नारी ही है दुर्गा

नारी से इस जग में, जीवन है सुगम सरल
नारी ही ना हो तो, होगा साक्षात गरल

पुरुष और नारी भी, दोनों हैं आवश्यक
आदर के साथ बनें, इक दूजे के पूरक

Thursday, July 17, 2008

उनमें फर्क है , पर वे समान हैं ....

चोखेर बाली के बाद और कोई परिवर्तन हुआ हो या न हुआ हो , इतना ज़रूर है कि हिन्दी ब्लॉग जगत अब जेंडर विमर्श करने लगा है चाहे उसका मंच चोखेर बाली हो या नही हो । और प्रतिक्रियावादी ज़ोरदार तरीके से उसका विरोध भी करने लगे हैं । इस वर्ष के आरम्भ से हिन्दी ब्लॉग जगत में स्त्री लेखन में जो सक्रियता आयी है उसके जवाब में या तो चुप्पी है ,या सहमति है {जो कि बहुत कम है} या सीधा सीधा विरोध है । ab inconvenienti , हों या बलबिन्दर , या सुनील ज़ालिम या सुरेश गुप्ता जी सभी अपने अपने तरीके से अपना विरोध् ज़ाहिर कर रहे हैं । कोई विज्ञान के तर्क के सहारे , कोई खबरों के सहारे , कोई भावुकता से , कोई धूर्तता से ।

पर फिर भी ये चुप्पी से बेहतर हैं !

मैं बहुत विस्तार में न जाकर सीधे जेंडर डिफेरेंस वाले वैज्ञानिक तर्कों को यहँ लेना चाहूंगी ।ab inconvenienti जी ने लिखा -


नारीवादी और समलैंगिक (गे) आलोचक अक्सर इन सवालों का जवाब 'ना' में देते हैं. उनका तर्क यह होता है की, जो भी अन्तर देखने में आता है वह ज्यादातर पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था का परिणाम है, और पितृसत्ता के दमन के कारण स्त्रियों को घर गृहस्थी के कामों तक सीमित कर दिया गया. जैविक और प्राकृतिक संरचना क्षमता और भूमिका(लिंग आधारित) का निर्धारण नहीं करती.
{घरेलू श्रम का अवमूल्यन :मार्क्सवाद और उससे आगे में हमने कुछ ऐसे ही तर्कों को खोजा था और नारीवाद की मार्क्सवादी धारा में इस पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है , पल्लवी , आर अनुराधा , घुघुती जी ने भी इस पर बहुत अच्छा लिखा था}

ab inconvenienti आगे लिखते हैं -

कुछ नारीवादीयों का मानना है की "भिन्न लिंग" (यानि स्त्री और पुरूष) का विचार एक भ्रम या मिथ्या धारणा से अधिक कुछ भी नहीं है.

{साफ होना चाहिये कि हम सेक्स की बात नही कर रहे , हमारा मुद्दा जेंडर है ।सेक्स और जेंडर में अंतर है । और अगर यह जेंडर ही है , तो वाकई यह एक सामाजिक अवधारणा है जिसे हमी लोगों ने बानाया है । सेक्स प्राकृतिक होता है और उससे जुड़ी कुछ प्राकृतिक विशेषताएँ होती हैं। निश्चित रूप से इसमें हम कैसा सोचते हैं यह भी आता है }

वे आगे लिखते हैं -

यह कहना की नर और नारी 'एक जैसे' हैं, सीधे सच को नकारना ही है.


{इसे नकारा जा ही नही सकता । पर जैसा कि मैने उनके यहाँ अपनी टिप्पणी में भी कहा कि - दोनों में फर्क है , पर वे समान हैं - इस बात को समझने मे भूल के कारण ही ज़्यादातर पुरुष और स्त्री भड़क जाते हैं । समानता का मतलब , एक जैसे होने का मतलब , बराबरी का मतलब , साइंस नही दे सकती । ये समाज के प्रश्न हैं । समाज विज्ञान ही इनका उत्तर दे सकता है ।क्योंकि जेंडर समाज ने बनाए हैं न कि विज्ञान ने । शारीरिक रूप से फर्क तो एक वयस्क और बच्चे में भी होता है तो क्या इसलिए हम कहें कि दोनों बराबर नहीं । मानव होने के नाते दोनों को जो गरिमा और सम्मान मिलना चाहिये वह इससे प्रभावित नही हो सकता कि कोई एक अपनी शारीरिक विशेषताओं के कारण किसी काम को करने में समर्थ या असमर्थ है ।


दूसरा ,

बराबरी का मतलब है -


1. एक दूसरे की भिन्नताओं का सम्मान करना ।
2.समान अवसर उबलब्ध होना ।
3. समान सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्मान मिलना ।
4.समान रूप से सभी सम्वैधानिक अधिकार मिलना ।
5.समान श्रम के लिए समान वेतन मिलना ।}

इसमें सबसे पहला सबसे महत्वपूर्ण है ।

आप जानते हैं कि पुरुष शिशु को जन्म नही दे सकता । फिर भी उसे अगर इस बात के लिए नीचा दिखाया जाए । उसे संतान सुख से वंचित किया जाए । या समाज उसे ताने दे । या उसकी इस इस शरीरिक विशेषता को उसके जीवन और अधिकारों को रेग्युलेट करने के लिए इस्तेमाल किया जाए तो इसे क्या कहेंगे ?


अब आप जानते हैं कि कोई स्त्री माह के कुछ दिन परेशान रहती है , या वह गर्भवती हो सकती है और आप बस में उसे अपनी सीट ऑफर करते हैं तो इसमें किसी को विशेष सुविधा देना नही कह सकते । वही स्त्री जिसे आपने सीट ऑफर की यदि आप ही की पत्नी या बेटी हो तब आप समझ पायेंगे कि एक पुरुष साथी होने के नाते यह कितना ज़रूरी और सही है ।।

इस सब के लिए स्वयम ही सम्वेदनशील रहना चाहिये । नही रहते हैं इसलिए सीट रिज़र्व करनी पड़ती है । ठीक वैसे ही जैसे आपको अपनी पुत्री या बहन को अपनी सम्पत्ति का समान भागीदार बनाना चाहिये । नही बनाते हैं इसलिए कानून को इस समान अधिकार की रक्षा के लिए कदम उठाना पड़ता है ।

आगे वे लिखते हैं -


लड़के क्यों कार और बंदूकों वाले खिलौने पसंद करते हैं पर क्यों लड़कियां गुड्डे-गुड़िया, डॉल और टेडी जैंसे खिलौने पसंद करतीं हैं? आमतौर पर फेमिनिस्ट्स क दावा होता है की यह सामाजिक कारणों से होता है, पर अब हमारे पास यह कहने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण हैं की लड़कियां और लड़के अपने अपने हारमोन स्तर से प्रभावित होते हैं.



{यह फिर एक सामाजिक प्रक्रिया है जिसे एक वैज्ञानिक अपने तरीके से देख रहा है ।बच्चे के जन्म के साथ ही यह निर्धारित नही हो जाता कि उसे गुड़िया पसन्द आयेगी या बन्दूक । बच्चे के जन्म के समय मेहमान उपहार लाते हैं । लड़की हुई तो डॉल लाते हैं , लड़का हुआ तो बंदूक ले आते हैं । यहाँ तक कि बच्ची के जन्म के समय उसे गुड़िया नाम तक मिल जाता है , जैसे मुझे मिल गया था ।


बच्चे घर में अपनी माँ को हमेशा रसोई मे देखते हैं और पिता को हमेशा दफ्तर से आते , चाय मंगवाते , सुबह देर से उठते और माँ के लिए फैसले लेते देखते हैं ।

और यह तो मनोविश्लेषक फ्राय़ड ही कहते हैं न कि बेटी की रोल मॉडल माँ होती है और बेटे के लिए पिता । सो एक बड़ी भूमिका समाजीकरण की प्रक्रिया की है , जिसे नकारना और नारीवाद को दोष देना , सरासर गलत है }


आखिर में ---
जिन नामों को ab inconvenienti जी ने अपनी बात के पक्ष में उद्दृत किया वे हैं -
प्रोफेसर स्टीवन गोल्डबर्ग
डॉ. जेम्स डोबसन
एमरम शेंफील्ड
जॉन स्टोशेल
माइकल लेविस
रॉबर्ट नादे
फ्रेंक यार्क

मेरे हिसाब से सभी पुरुष हैं । स्त्री के सम्बन्ध में खुद स्त्री ने कम ही लिखा है । सच यह है कि शोध और अनुसन्धान के क्षेत्र भी तो अब तक पुरुष वर्चस्व के इलाके थे । आगे देखिये शायद स्त्रियाँ अनुसन्धान करें और ये सारे के सारे तर्क उलट जाएँ ।


इस विषय पर आगे भी जारी ................

Tuesday, July 15, 2008

औरत के हक में .....

अन्नू का ब्लॉग साइबर स्पेस में स्त्री के लिए जगह का दावा करता है ।अपने ब्लॉग औरत के हक में अपनी पहली पोस्ट में अन्नू लिखती हैं -
पेशे से टीचर हूं। रोज घर से स्कूल के बीच अनेक अनुभव होते हैं। यहां तक कि स्कूल में भी। कई दफा ऐसे वाकये सामने आते हैं कि मन खिन्न हो जाता है। जैसे कल का ही वाकया। यह घटनाक्रम औरतों को उनकी औकात बताने की साजिश से कम नहीं है।कल छुट्टी का दिन था। सो, एक सहेली के पास गई थी। कुछ देर इधर-उधर की बातों के बाद वो अपना दुखड़ा सुनाने बैठ गई। दरअसल उनके परिवार में तीन भाइयों के बीच हाल ही बंटवारा हुआ है। वो अपने एक बेटे और दो बेटियों को राजधानी में पढ़ाना चाहती है। उसका गांव कोई ४५ किलोमीटर दूर है शहर से। अपने एक बेटे को तो शहर में एक स्कूल में दाखिला दिलवा दिया। साथ में उनकी बड़ी बहन के बेटे को, जो इस साल १२ वीं में पहुंच गया है, को भी दाखिला दिलवा दिया। .....परसों वो अपनी दो छोटी-छोटी प्यारी सी बेटियों को भी पढ़ाने के लिए राजधानी ले आई। यह बात शायद उनके जेठ, जो उनके जीजा भी हैं, को सहन नहीं हुई कि औरत कैसे इतना बड़ा फैसला ले सकती है। ...........
एक महिला, जिसने दो बेटियों के लिए कुछ साहस दिखाया तो उसे समूचे समाज ने मिलकर कमजोर साबित कर दिया। सबने जता दिया कि वह घर, परिवार, समाज तथा रिश्तों की देहरी से बाहर नहीं है। जब उसने प्रतिरोध की ध्वनि को अनसुना कर राजधानी में कदम रखे, तो यह घर के पुरुष को बर्दाश्त नहीं हुआ। उसका अहं आहत हुआ और उसने समाज का सहारा लिया। उसके पैरों में जंजीर पहना दी। एक औरत को, कमजोर साबित कर एक भयभीत पुरुष का अहंकार शांत हो गया? नहीं, यह उसका भ्रम है, क्योंकि सम्पूर्ण चर्चा के बाद उस सहेली की आंखों में मैंने दृढ़ता के भाव देखे हैं। जो और भी बड़े फैसले की ओर बढ़ रही है।


स्पेस फॉर विमेन

Friday, July 11, 2008

ऑल द ब्रिजेज़ दैट यू बर्न, कम बैक वन डे टू हॉन्ट यू



ट्रेसी चैपमैन का नाम चोखेर बाली के पाठकों और श्रोताओं के लिए नया नहीं है. ट्रेसी का संगीत यहां पहले भी लगाया और प्रशंसित किया जा चुका है. आज सुनिये इस महान गायिका की आवाज़ में उनके दूसरे अलबम 'क्रॉसरोड्स' (१९८९) से एक अद्भुत प्रेम गीत. एक गीत होता ही कितना लम्बा है या कितना लम्बा हो सकता है! ... लेकिन इसे सुनिये ... बार-बार सुनिये ... और तब सोचिएगा इस बात को ... प्रेम के कितने-कितने मानी एक के बाद एक आपके सामने साफ़-शफ़्फ़ाक खुलते चले जाते हैं. मैं अब भी मानता हूं विश्व संगीत की सबसे ईमानदार आवाज़ों में से एक की मालकिन है ट्रेसी.



All the bridges that you burn
Come back one day to haunt you
One day you'll find you're walking
Lonely

Baby I
Never meant to hurt you
Sometimes the best intentions
Still don't make things right

But all my ghosts they find me
Like my past they think they own me
In dreams and dark corners they surround me
Till I cry I cry

Let me take this time to set the record straight
Let me take this time to take it all back
Let me take this time to tell you how I felt
Let me take this time to try and make it right

But you can
Walk away
Run alone
Spend all your time
Thinking about the way things used to be
If love feels right
You work it out
You don't give it up
Baby

Anybody tell you that
Anybody tell you that
Anybody tell you that

You should take some time maybe sleep on it tonight
You should take some time baby heed the words I said
You should take some time think about your life
You should take some time before you throw it all away

I ain't got the time
To sit here and wait around
But I got the time
If you say I'm what you want

तमाशे की एक नई हद?


वासना के जुनून में मारा गया आरुषि तलवार को? बदला लेने के लिए आरुषि का कत्ल किया गया? घरेलू नौकर हेमराज ने मारा उसे? पिता राजेश तलवार ने अवैध संबंधों में बाधा बनने पर मारा आरुषि को? आरुषि का चरित्र ही खराब था...? आदि इत्यादि।

एक नई कहानी (?) कल रात से इलेक्ट्रानिक और आज सुबह से प्रिंट मीडिया में छाई पड़ी है। मीडिया वाले `ऐलान` कर रहे हैं कि मामला सुलट गया है, हत्या तो हुई ही, रेप भी हुआ था, सब नौकरों का किया धरा था, अडो़स पड़ोस के नौकरों के साथ मिल कर इस कत्ल को अंजाम दिया गया। एक चैनल के पास तो बाकायदा वह टेप है जो सीबीआई से किसी तरह उसने हासिल कर लिया है। यह टेप उन सवाल- जवाबो का ब्यौरा है जो नाकोZ टेस्ट के दौरान राजकुमार से पूछे गए। एकता कपूर के घटिया नाटकों की तरह नित नए खुलासे हो रहे हैं। एक गंभीर अपराध पर नौटंकी हो रही है। इस नौटंकी का सूत्रधार बन कर उभर रहा है मीडिया। इसमें मजा कौन ले रहा है, यह तो मेरी अल्पबुिद्ध में आता नहीं। मगर, कच्चा माल पुलिस मुहैया करवाती रही और अब सीबीआई के कथित सूत्र करवा रहे हैं।


अभी तक इस बाबत किसी सीबीआई प्रवक्ता का बयान नहीं आया है मगर हर ओर `कातिल का खुलासा` होने की खबरें आने लगी हैं। क्या यह एक नया तमाशा है? आरुषि के मर्डर केस में रेप शब्द भी जुड़ चुका है। किसी तिलिस्मी कहानी या सीग्रेड फिल्मों की तरह इस सारे मामले को डील किया जा रहा है मीडिया द्वारा। संवदेना को भुनाने की प्रक्रिया अपने आप में संवदेनहीनता की पराकाष्ठा है। न जाने किस आधार पर पिता राजेश तलवार को बेटी आरुषि का हत्यारा करार दिया गया। संदेहों को विश्वास में बदल दिया गया और ऐसा माहौल बनाया गया कि लगा संपूर्ण समाज रसातल में जा रहाहै...बचोरे।

ऐसा नहीं कि मीडिया अपनी भूमिका गंभीरता से कभी भी नहीं निभाता है। मगर क्राइम और देह की बात आते ही, उसका बावलापन और उतावलापन उसके विवेक पर हावी हो जाता है। अपने होने के औचित्य को ताक पर रखते हुए वह सनसनी ही जीता है, सनसनी ही पीता है और सनसनी ही परोसता है। बिना कुछ सोचे समझे आरुषि के चरित्र को ही हीनता की श्रेणी में रख दिया गया। चौदह साल की बेटी को पापा के अवैध संबंधों का साक्षी करार दे दिया गया। पिता कितना भी जलील या निर्दयी क्यों न हो, कुछ खास समुदायों या प्रांतों को छोड़ दें तो उसके बेटी की हत्या करने की बात भी आराम से गले के नीचे नहीं उतरती। मगर, इस मामले में भौचक्के अंदाज में गलप की जाती रही। लोगों द्वारा भी, टीवी चैनलों द्वारा भी और अपने आप को सनसनी से दूर मान कर रिअल पत्रकारिता करने का दंभ भरने वाले प्रिंंट मीडिया के भी।

मगर इस सबमें असल मुद्दा हमेशा की तरह गायब! आरुषि कांड की सच्चाई पता नहीं कब आएगी, मगर जो माहौल बन चुका है और जिस तरह के दबाव बन रहे हैं, डर है कहीं सच भीतर ही दफन न हो जाए। कहीं ऐसा न हो कि जो सामने आए, वह सच का मुखौटा पहने झूठ हो।.........

Thursday, July 10, 2008

तिलिस्म तोड़ती औरतें , राज़ ढूंढती औरतें .....



Bhavna Paliwal
Age: 32
Head of: Tejas Detective Agency in Delhi.
First case: Fed up with journalism, she responded to an ad in a daily, seeking a lady detective. She was asked to check out the character of a married woman.
Personality quirks: Loves changing her looks and act to approach different types of people for information.
Job profile: Matrimonial and teen issues, family crimes, character and job verification, corporate surveillance.




यह प्रोफाइल है एक महिला जासूस का । जी हाँ - "जासूसी " साहस , चुनौती , खतरों , रोमांच और थ्रिल्ल भरा एक प्रोफेशन । ज़ाहिर है , इसलिए महिलाओ का इस प्रोफेशन में दखल न के बराबर ही रहा ।लेकिन ये गुज़रे ज़माने की बात हुई । नये ज़माने मे जैसा कि बहुत लोग स्त्री विमर्शकारों को सिखाते और समझाते रहते हैं कि - भई ज़माना बदल गया है , ये मुक्ति , ये उत्पीड़न सब पुरानी बातें हुईं । अब तो स्त्री बराबर क्या पुरुष से भी आगे है कान काटने में


इंडिया टुडे ने भी अपनी एक स्टोरी में साबित कर दिखाया है कि स्त्रियाँ जासूसी के व्यवसाय में भी अब पीछे नहीं रहीं । दिल्ली में 60 डिकेक्टिव एजेंसियाँ हैं जिनमें से 6 के हेड स्त्री है ।




वैसे इंडिया टुडे भी साफ साफ कह रहा है कि खबर अच्छी है पर किसी मुगालते मे मत रहिये क्योंकि ये महिलाएँ अभी तक सिर्फ घरेलू केस जिनमें से ज़्यादातर तलाक से जुड़े हुए - पति-पत्नी की चारित्रिक जासूसी वाले होते हैं । और इनमें स्त्री जासूस किसी भी मर्द जासूस से बेहतर काम कर रही है और कम समय में कर रही है ।






Women check employee credentials for corporates, do under-cover operations,
survey public opinion for political parties, carry out surveillance for fashion
houses.
But most of all, they excel in patrolling the dark alleys of that
holy Indian institution—the family







Not surprisingly, most detective agencies with lady detectives advertise “pre-post matrimonial, family problem, shadowing, evidence in divorce and court proof”.


मंजरी प्रभु , कहती हैं - स्त्री को इस व्यवसाय में आने के बाद ज़्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है समाज में अपनी योग्यता को सिद्ध करने के लिए ।हालांकि ज़्यादातर अपने जेंडर को इस व्यवसाय के लिए एक रुकावट या फायदे की तरह नहीं देखतीं । तो भी स्वामीनाथन का कहना है कि - स्त्रियाँ घरेलू मामलों की बेहतर समझ रखती हैं ।



सो अब हर बात में मेरी नकारात्मक एंगल खोजने वाली बुद्द्धि को दोष न दीजियेगा क्योंकि डिटेक्टिव एजंसियाँ खुद ही कह रही हैं कि जासूसी ही क्यों न हो स्त्री की भूमिका अब भी परिवार के गिर्द ही चक्कर काट रही है ।ऐसा क्यों है ? क्या जासूसी जैसे व्यवसाय में आने का साह्स करने के बाद भी स्त्री को खतरा महसूस होता है ? वह खतरे भरे प्रोफेशन में भी कम खतरे के काम का हिस्सा जुटा रही है ? ताकि उसका खुद का भी परिवार बदस्तूर चलता रहे ?



परिवार को पवित्र संस्था कहकर स्वयम इंडिया टुडे ने सार्कास्टि टोन दे दी है । अपनी शुरुआती स्थिति में भी परिवार या घर जैसी संस्थाएँ कितनी पवित्र थीं इस पर भी खोज बीन की ज़रूरत है ।शायद इस बात पर भी आपत्ति हो बहुतों को , लेकिन सच यही है कि परिवार बचाओ आन्दोलन स्त्री की पितृसता वाली इमेज को खत्म करो आन्दोलन से बड़ा नही होना चाहिये । परिवार बचना है तो उसे स्त्री से ही घर बनता है वाली पूर्वधारणा के बिना बचाना होगा । न कि उसकी कीमत पर । घर बनेगा तो दो से चाअर से या पांच से या .........अकेले के दम पर नहीं ......मेरे मत से तो इस बोझ से अपनी बेटी को पालना भी एक बड़ा अपराध है ।



खैर , यह अवांतर प्रसंग है जो एक अलग पोस्ट की मांग करता है । फिलहाल जासूसी में स्त्री के इन कदमों का स्वागत होना चाहिये और यह जासूसी घर से इतर भी कुछ ज़रूरी कामों में स्त्री को खतरों का सामना करने को और अपनी साख बनाने को तैयार रहना चाहिये ।घरेलू समझ करियर के विस्तार व अन्य पक्षों में रुकावट न बनने पाए ।

Wednesday, July 9, 2008

ज्यादा अधिकार प्राप्त करने की चेष्टा में मिले अधिकारों को मत खो देना.

Suresh Gupta has left a new comment on your post "यूँ हुआ घरेलू श्रम का अवमूल्यन : मार्क्सवाद और उसस...":

चोखेरवालिओं जरा रुको, सोचो कहीं कोई गलती तो नहीं हो रही. मेरी बात सुनो. हो सकता है तुम्हें तुंरत मेरी बात अच्छी न लगे, पर इस पर सोचो. और ज्यादा अधिकार प्राप्त करने की चेष्टा में मिले अधिकारों को मत खो देना. वृक्ष से टूट कर पत्ता अपना आधार खो देता है और हवा उसे यहाँ-वहां उड़ाती रहती है.

"घर में काम करना किसी स्त्री की नियति नही है", यह कहना एक नकारात्मक मानसिकता का परिणाम है. घर है तो घर का काम कोई तो करेगा. स्त्री घर में है तो घर का काम करेगी. दफ्तर में है तो दफ्तर का काम करेगी. इसमें नियति कहाँ से आ गई? मैं एक बात नहीं समझ पाता हूँ कि कुछ लोग हर बात को उलझाने की कोशिश क्यों करते हैं? घर का काम स्त्री क्यों करे? घर के काम की मजदूरी मिलनी चाहिए. अरे भई घर में रहते हो तो घर का मतलब समझो, घर के लिए अपनी जिम्मेदारी समझो, घर तो हर हालत में होता है, चाहे एक ही व्यक्ति क्यों न हो घर में तब भी वह घर ही होता है. ऐसे घर में भी काम होता है. जहाँ एक से ज्यादा व्यक्ति होते हैं उस घर में जिम्मेदारियों बंट जाती हैं. अगर कोई परेशानी है तो उसे घर के अन्य सदस्यों के साथ बात करके सुलझाओ. जरूरी लगे तो जिम्मेदारियों का फ़िर से बंटवारा कर लो. घर से बाहर निकल कर घर की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता.
बचपन में एक कहानी पढ़ी थी एक बूढ़ी औरत की, जिसकी सुईं उसकी झोपड़ी में खो गई पर वह उसे चौराहे पर तलाश कर रही थी. लगता है आज कि प्रगतिशील नारी उसी औरत की कहानी दोहरा रही है. घर की समस्याओं का हल घर के बाहर तलाश रही है.

Monday, July 7, 2008

मुझे किसी के घर मत भेज बाबुल

ज़िन्दगी का अनुवाद

सपना चमड़िया

अभी अभी एक रेडियो पर लोकगीत बज रहा है जो इस तरह समझ पड़ रहा है -

बाबुल मेरी इतनी अरज मान कि मुझे सोनार के घर मत भेज , मुझे गहने पहनने का शौक नही । मुझे व्यापारी के घर भी मत भेज क्योंकि मुझे रुपए पैसे से भी कोई मोह नही है । और मुझे राजा के घर तो बिलकुल मत भेजना , क्योंकि मुझे राज-पाट करना तो आता ही नही है । और भेजना ही है तो लोहर के भेज देना जो मेरी बेड़ियाँ काट दे ।


शायद उसके अनकहे शब्दों में मैं उसे बोलते सुन रही हूँ कि - मुझे किसी के घर मत भेजो बाबुल !!

---------


पिछले दिनों एक शादी में शिरकत की
आलता लगावाने कोजब मोज़े उतारे
नाइन के साथ साथ
सबकी आँखें
मेरे पैरों मे लिथड़ गयीं


मेरे पायल -बिछुआ रहित दोनो पैर
हिकारत से देखे गये
गुलाम परम्परा के खून के अपराधी के रूप में
इन्हें बख्शा नही जाएगा

नाइन मेरे पैरों मे
सुर्ख आलता
हिकारत से
लगा रही थी ।
भारतीय स्त्री को
सुर्ख रंगों से पीछा
छुड़ाना होगा ।

----------

सपना की डायरी के पिछले 6 अंश यहाँ पढें ।

Friday, July 4, 2008

यूँ हुआ घरेलू श्रम का अवमूल्यन : मार्क्सवाद और उससे आगे

जब पल्लवी ने घरेलू कामों के मूल्य की बात उठाई तो बहुतों को अटपटा लगा । चोखेर बालियों को क्या हो गया है ? हर बात को नकारात्मक ढंग से क्यों देखा जा रहा है ? बच्चे को दूध पिलाने की भी कीमत होगी अब ? घर में पुरुष भी काम करते हैं ! पत्नी और कामवाली मे क्या फर्क है ? वगैरह - वगैरह !
अनुराधा जी ने कहा - परिवार के सभी साझा काम साझे तरीके से हों और आपसी सहमति से निर्णय लिये जाएँ
{बशर्ते कि सहमति दबाव तहत न बनवाई गयी हो }।
कमोबेश इसी तरह की सहभागिता की बात घुघुती जी ने भी कही ।
ये वाकई आदर्श स्थितियाँ हैं ।
ज़्यादतर टिप्पणियाँ करने वाले भी इस से सहमत हैं । वेतन की बात से किसी की सहमति नही है । लेकिन घरेलू कार्यों का भी मूल्य है यह स्वीकार करते ही हमें घर के कामों की व्यर्थता और घर के काम करने वाला व्यर्थ दिखाई देना बन्द हो जाएगा।
अब तक हुई चर्चा के निष्कर्ष देने का मेरा इरादा इरादा नही है । जो निष्कर्ष पहले ही दिये जा चुके उसमें मेरी सहमति भी है । पर मुझे लगता है कि कारणों तक पहुँचना बहुत ज़रूरी है ।


मेरे सामने प्रश्न उठ रहे हैं कि घरेलू कार्यों का अवमूल्यन कैसे हुआ और स्त्री के द्वारा घर में किये कामों का कही कोई खाता क्यों नही है ?

अगर मैं मार्क्सवादी दृष्टि से सोचना शुरु करूँ तो समग्र मानव समाज की व्यवस्था को उत्पादन और श्रम की शब्दावलियों में सबसे पहले समझना होगा ।एंगेल्स के अनुसार पितृसत्ता का जन्म उत्पादन व उत्पादन के साधनों पर पुरुष के नियंत्रण के साथ शुरु होता है ।

मानव समाज की शुरुआत एक साम्यवादी समाजिक व्यव्स्था से हुई ।और इस साम्यवादी व्यवस्था में स्त्री-पुरुष के रिश्ते “प्राकृति के स्वाभाविक विकास के रूप में पवित्र और सरल थे ”।पुरुष शिकार करते , भोजन के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराते और इन कामों के लिए ज़रूरी उपकरण तैयार करते । स्त्री के साथ स्थिति दूसरी थी । प्रकृति ने उसे मातृत्व का भार दिया था । शिशु के जन्म से पहले और बाद के काफी समय वह निष्क्रिय हो जाती । इसलिए शिशु की देखभाल और घर का दायित्व उसके पास आ गया ।पर सब कुछ साझा था ।काम भी और उत्पादन भी । आप कहेंगे कि फिर दिक्कत क्या है ? अगर हम इसे स्वाभाविक् , और प्राकृतिक श्रम -विभाजन मान रहे हैं व स्त्री-पुरुष के रिश्ते का पवित्र विकास कह रहे हैं तो फिर किस बात की बहस ?लेकिन इस रिश्ते का एक पहलू और था ।यह वह समय था जब स्त्री घर में नियंता थी ।यौन सम्बन्ध अपेक्षाकृत अधिक उन्मुक्त थे । पुरुष निर्भरता नही थी बल्कि पुरुष केवल अतिथि के रूप में घर में रहते थे और अवांछित होने पर उन्हें घर से जाना होता था ।

तो समस्या वहाँ शुरु होती है जब मानव समुदाय एक ही स्थान पर दीर्घ समय के लिए रहने लगे खेती करने लगे और पशुपालन करने लगे और सरप्लस पैदा हुआ । यहाँ से शुरुआत होती है निजी सम्पत्ति की अवधारणा की ।और समाज की संरचना बदल गयी । उत्पादन और उत्पादन के साधनों पर लड़ाइयाँ होने लगी ।और लड़ाई में हारने वालों को विजेता के अधीन हो जाना पड़ा ।यह वह विभाजन था जिसे एंगेल्स ने समाज का सबसे पहला और बड़ा वर्ग -विभाजन कहा है । प्रजनन भी उत्पादन ही था , रीप्रोडक्शन , सो उस पर भी पुरुष ने नियंत्रण कायम किया ।
सम्पत्ति बढी , जो उत्पादन का नतीजा थी , और उत्पादन पूरी तरह से पुरुष के अधिकार में था सो समाज के केन्द्र में उत्पादन एक महत्वपूर्ण कार्य हो गया और घरेलू कार्य क्षेत्र जहाँ स्त्रियों का महत्व था , उसने अपना महत्व खो दिया । उसे एक निजी श्रम मान लिया गया और पत्नियाँ सबसे पहली घरेलू श्रमिक बना दी गयीं जिन्हे सामाजिक जीवन में भागीदारिता से वंचित कर दिया गया ।यह फीमेल सेक्स की ऐतिहासिक हार थी । सो घरेलू श्रम का अवमूल्यन हो गया । निजी सम्पत्ति में पशु, ज़मीन और नौकर तो थे ही जल्द ही स्त्रियाँ भी इसमें शामिल कर लीं गयीं ।

तो एंगेल्स की दृष्टि से देखें तो स्त्री की मुक्ति तभी सम्भव है जब वह बड़े स्तर पर समाजिक उत्पादन का हिस्सा बनें और घरेलू काम की ज़िम्मेदारी न्यूनतम हो ।
लेकिन स्त्री की मुक्ति सिर्फ इतने भर से नही हो जाती और स्त्री की मातहती सिर्फ यहीं तक सीमित नही रहती । बाद की फेमिनिस्ट आलोचनाओं में कहा गया कि पितृसता का आरम्भ उत्पादन पर नियंत्रण से नही बल्कि संतानोत्पादन पर , या कहें स्त्री की कोख और उसकी यौनिकता पर नियंत्रण से होता है । यह निजी सम्पत्ति की अवधारणा से भी पूर्व हो गया था ।
लेकिन उत्पादन या प्रजनन को स्त्री के मातहतीकरण के लिए अलग अलग ज़िम्मेदार नही ठहराया जा सकता । उत्पादन और प्रजनन साथ साथ पुरुष वर्चस्व को सुनिश्चित करते रहे ।
जूलियेट मिशेल इसे चार स्तरों पर घटित होता हुआ देखती हैं –उत्पादन , प्रजनन , सामाजीकरण ,यौनिकता ।समाजीकरण में वे सभी बातें आती हैं जिन्हें अपनी संतान को दुनिया की ज़रूरतों के लिए उपयुक्त बनाने के लिए ध्यान में रखा जाता है । इसे ही मैं जेंडरिंग कहना चाहूंगी । जेंडर रोल्स के मुताबिक बच्चों को पाला-पोसा जाने लगा । स्त्री की यौनिकता और उसकी कोख पर पुरुष नियंत्रण के लिए तरह तरह के मिथक और समाजिक परम्पराएँ गढी गयीं । विवाह ऐसी ही संस्था थी । कौमार्य ऐसी ही अवधारणा है । जो एंश्योर करती हैं कि पुरुष की सम्पत्ति का वारिस उसी की अपनी संतान हो ।पुरुष निर्भरता बढती गयी । सम्पत्ति , दास , उत्पादन , परिवार और पत्नी पुरुष के लिए थी और पत्नी के लिए केवल प्रजनन और संतान पालन ।
इन्हीं चारों स्तरों पर एकजुट रूप में स्त्री की मातहती सुनिश्चित होती है । अत: मिशेल का मानना है कि स्त्री की मुक्ति तभी सम्भव है जब इन चारों स्तरों पर एक साथ बदलाव आए । किसी एक स्तर पर बदलाव आने से बात नही बनेगी ।इससे केवल किसी दूसरे स्तर पर शोषण को बल मिलेगा ।
इस पर आगे कभी और विस्तार से बात होगी । फिलहाल यह महत्वपूर्ण है कि घरेलू श्रम के "मूल्य " का प्रश्न व्यर्थ का प्रशन नही है न ही यह बात इतनी सरल है जितनी की समझी जा रही है ।इस बहस को हम उपरोक्त सन्दर्भ में देखने लगें तो पायेंगे कि स्त्री के घरेलू कार्यों का आर्थिक मूल्य क्या है यह मानना और उसे प्रोडक्टिव काम की मान्यता देना कितना ज़रूरी है ।यहीं समाजीकरण , जेन्डरिंग और देह मुक्ति के और सवाल भी जुड़ते हैं ।

सुजाता

Wednesday, July 2, 2008

परिन्दे का चहचहाना ही मेरा जनमदिन है

सारा शगुफ़्ता एक पाकिस्तानी शायरा थीं जिन्होंने १९८० के दशक के शुरू के सालों में बहुत कम आयु में आत्महत्या कर ली थी. कविता की ऊष्मा को एक स्त्री के नितान्त निजी अनुभवों में गूंथ कर उन्होंने तत्कालीन उर्दू कविता की सारी पारम्परिक नियमावलियों को नज़र अन्दाज़ कर दिया. सदियों से औरत को दबाती आई सामाजिक रूढ़ियों के प्रति उनके भीतर जो गुस्सा था, उसे उन्होंने अपनी कविता का हिस्सा बनाया. 'आंखें' शीर्षक उनका एक संग्रह प्रकाशित हुआ. इस किताब में उन्होंने एक पत्रनुमा कविता में इस गुस्से को यूं व्यक्त किया था

मुझे १०५ डिग्री बुख़ार था
मैंने बस पकड़ी और घर चली आई
मेरी छातियां बस उमड़ने को ही थीं
मैंने दूध का एक गिलास भरा और मेज़ पर रख दिया
फिर कवि और बाक़ी के लेखक आए
मैंने कवि से कहा: मैंने एक बेटा जना लेकिन वह मर गया है"
उसने बेपरवाही से मेरी बात सुनी और बाक़ी लोगों को बताया.
कमरे में दो मिनट ख़ामोशी रही
फ़्रायड के बारे में तुम्हारे क्या विचार हैं?
रिम्बॉ क्या कहता है?
क्या कह गया है सादी?
वारिस शाह था सबसे महान.
मुझे ये अलफ़ाज़ रोज़ सुनने को मिलते थे
लेकिन आज सब साफ़ हो गया.
मानो ये सारे महान लोग एक पल को थम गए थे मेरे ख़ून में.
मानो फ़्रायड और रिम्बॉ मेरे गर्भ से छीन रहे थे मेरे बच्चे को.
उस दिन ज्ञान पहली बार मेरे घर घुसा था
और चिल्लाता हुआ हंस रहा था मेरे ख़ून में
ज़रा देखो तो मेरे बच्चे का जनम !

यहां यह बताना भी मौजूं होगा कि एक और शानदार पाकिस्तानी कवयित्री परवीन शाकिर ने सारा शगुफ़्ता की मौत पर एक कविता 'टोमैटो कैचप' लिखी थी.इन्हीं सारा शगुफ़्ता की एक नज़्मपढ़िये:

परिन्दे की आंख खुल जाती है

किसी परिन्दे की रात पेड़ पर फड़फड़ाती है
रात, पेड़ और परिन्दा
अंधेरे के ये तीनों राही
एक सीध में आकर खड़े होते हैं
रात अंधेरे में फ़ंस जाती है
रात तूने मेरी छांव क्या की!
जंगल छोटा है
इसलिये तुम्हें गहरी लग रही हूं
गहरी तो मैं परिन्दे के सो जाने से हुई थी
मैं रोज़ परिन्दे को दिलासा देने के बाद
अपनी कमान की तरफ़ लौट जाती हूं
तेरी कमान क्या सुबह है
मैं जब मरी तो मेरा नाम रात रख दिया गया
अब मेरा नाम फ़ासला है
तेरा दूसरा जनम कब होगा
जब ये परिन्दा बेदार होगा
परिन्दे का चहचहाना ही मेरा जनमदिन है
फ़ासला और पेड़ हाथ मिलाते हैं
और परिन्दे की आंख खुल जाती है


सारा के जीवन पर लिखे गए एक नाटक के बारे में यहां देखें:दानिश इक़बाल का ताज़ा नाटक सारा शगुफ़्ता की ज़िंदगी पर

Tuesday, July 1, 2008

वैधव्य : यह भी संघर्ष ......

दीपा मेहता की फिल्म वॉटर जो आने से पहले ही विवादों मे घिर गयी थी , वारानसी के आश्रम मे रहने वाली विधवाओं के जीवन की कहानी कहती है । फिल्म का देश -काल ब्रिटिशकालीन भारत है । कईं दशाब्दियाँ बीत चुकी हैं । लेकिन मेट्रो शहरों को अपवाद मान लिया जाए तो अब भी कमोबेश हालात ऐसे ही हैं ।मेट्रो शहरों में भी अकेली रहने वाली महिलाओं के लिए कितनी सुविधा और आज़ादी छोड़िये कितना सम्मान है , यह भी शोध करने लायक विषय है ।और दरअसल बात शहर और गाँव की भी नही है , उस मानसिकता की है जिसके चलते विधवा होने पर स्त्री दुनिया का वह क्रूर चेहरा देखती है जो शायद ही उसने पहले कभी देखा हो । सम्पत्ति , घर , ज़मीन उससे छिनने को होते हैं । अशिक्षित हो तो उसकी लड़ाई और भी ज़्यादा कष्टपूर्ण हो जाती है ।


मन्जुला सुद लेसीस्टर शहेर की लोर्ड मेयर हैँ - उन्होने पहल करते हुए ऐलान किया है कि भारत मेँ और अन्य उभरते देशोँ मेँ, विधवाओँ को सँरक्षण और सहायता शीघ्रातीत मिलना जरुरी है - डी मोन्टफर्ट युनिवर्सिटी के प्राँगण में , कयी रँगबिरँगी गुब्बारे , आशा के प्रतीक जैसे, खुले आसमान मैं छोडते हुए, लुम्बा ट्रस्ट के प्रवधान मेँ इस घोषणा को जारी किया गया ।


ये घोषणा अन्तराष्ट्रीय विधवा दिवस को की गयी ! क्या आप जानते थे , ऐसा भी कोई दिवस होता है ? लन्दन के त्रफालगर स्क्वायर में , इसे समारोह का दर्जा हासिल हुआ है -


मंजुला जी सन १९९६ से विधवा जीवन जी रही हैं। उनका कहना था के, " आज का दिन , मेरे लिए भावुकता से भरा भरा है ! मैं जानती हूँ, अपने स्वयं के अनुभवों से , किन, मुश्किलों से जीकर , आगे बढ़ना पङता है ! लन्दन जैसे देशों में, विधवाओं को, सहायता मिल भी जाती है - परन्तु कई विकासशील देशों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है - आज ये समय आ गया है जब हम आगे बढ़कर, ऐसी जरूरतमंद महिलाओं की सहायता करें " -


लुम्बा ट्रस्ट, ऐसी ही कई विधवाओं की संतानों की सहायता करता है। उन्हें किस तरह शिक्षा प्राप्ति के लिए मार्ग और दिशा का चुनाव करना चाहीये के जिससे आगे का भविष्य सुगम बने ऐसी बातों को सीखालाया जाता है - १९९७ से इस ट्रस्ट की स्थापना हुई और सन २००५ को इसी के सौजन्य से " अन्तराष्ट्रीय विधवा दिवस " का आयोजन ग्रेट ब्रिटेन के प्रधान मंत्री की पत्नी श्रीमती चेरी ब्लेयर ने इसका बाकायदा विमोचन किया था।


श्रीमान राज लुम्बा इसके संयोजक और निर्माता हैं। उनहोंने कहा के, " ये लन्दन के बाहर आयोजित पहला समारोह है जिसे अंतराष्टीय ख्याति प्राप्त हो रही है ! खुशी है , लोग जुड़ रहे हैं, सहायता कर रहे हैं और हम आगे दूसरों को मदद कराने में सफल हो रहे हैं ! लाखों विधवा समूह जिनके परिवार शिक्षा और अन्य सहायता से वंचित थे, आज उनको सहाय करने में हमारी पहल कामयाब हो रही है - कई दुखों को हम भूला रहे हैं ! "


भारत के कई सारे युवाओं को लुम्बा ट्रस्ट के तहत, मोंत्फार्ट यूनिवर्सिटी में कालिज की शिक्षा प्राप्ति मिले इसकी भी योजनाएं बन रहीं हैं ।


डेविड ऐस्च , जो उप कुलपति हैं उन्होंने कहा , " जिन्हें आज से पहले , ऐसी , सहायता नहीं मिलीं वैसे बच्चों को लुम्बा ट्रस्ट सहायता कर रहा है ! शिक्षण मिलने पे यही बच्चे अपने परिवारों का भविष्य संवारने में सफल होंगें ..जिस से , गरीबी की चक्रवाती प्रथा का नाश और स्तम्भन होगा !"

राजस्थान में भी एकल नारी संगठन इस दिशा मे पहल कर रहा है । और सही भी है कि समाजिक पहल , शिक्षा और स्वावलम्बन ही इन स्थितियों मे सुधार हो सकेगा ।



-- लावण्या