Wednesday, August 27, 2008

बातचीत

उसने कहा पति परमेश्वर होता है,
दूसरी ने कहा तो पत्नी क्या है?
वो तुम्हें एक सम्पूर्ण स्त्री एक माँ बनाता है,
तो क्या औरत उसे एक मर्द साबित नहीं करती
पिता नहीं बनाती
सारे व्रत पुत्र और पति के लिये ही क्यों?
पुत्री या पत्नी के लिये क्यों नहीं?
आदमी मेहनत करता है पैसे कमाता है
तो क्या औरत घर और उसके कमाये
पैसे नहीं सभालती
बहस कुछ देर और चलती है
दो औरते अलग अलग राय रखती हैं
अंत मे मालूम होता है एक शादीशुदा है
और दूसरी कुंवारी
मुझे लगा विचारों में असमानता का
यही एक कारण हो या शायद कुछ और


Monday, August 25, 2008

अकेली लड़की खुली तिजोरी की तरह होती है{?}

आप सोचते होंगे कि इतने दिन से यूट्यूब पर से गीत,फिल्में ला लाकर जाने क्या कर रही हैं !पर एक तस्वीर कईं शब्दों से ज़्यादा ताकतवर होती है।कई बार एक फिल्म मे कुछ साधारण बातें हमें सोचने को उकसा देती हैं।और अचानक लगता है कि यह उन्हें दिखाएँ जो कहते हैं -


बराबरी मिल तो रही है या सम्मान तो हमसे ज़्यादा मिलता है फिर क्या शिकायत है ?स्वतंत्रता तो है या आरक्षण भी मिलता है या काश मै भी लड़की होता तो बहुत से फायदे लड़की होने से मिल जाते,बॉस प्रमोशन कर देता यूँ ही।

इस नुकसान का क्या करेंगे??



ह्म्म !

शाहिद कपूर नही आता न हर जगह !उसका इंतज़ार भी नही करना चाहिये ।आत्मरक्षा के तरीके सिखाए जाने चाहिये बच्चियों को ।
पर मेरा अभिप्राय है कि समाज , कानून , प्रशासन, सरकार क्या करेगी??
अकेली लड़की खुली तिजोरी की तरह होती है-यह ज्ञान देने के लिए यहाँ सब तैयार रहते हैं। भारत के किसी रेलवे स्टेशन या बस सटैंड या कहीं भी अगर लड़की अकेली है तो उसके लिए हालात इससे अलग होंगे क्या?
संरक्षण से निकलेंगी तो यही होगा , क्या यही चेतावनी हम स्त्रियों , बच्चियों ,लड़कियों को नही देते?बजाय इसके कि हम माहौल को सुरक्षित करें हम जगह जगह प्रचारित कर रहे हैं -स्त्री अपने शील {?}, जो उसकी जान से कीमती है, की रक्षा स्वयम करे{किसी पुरुष के संरक्षण मे रहकर }मानो रेलवे ,कानून या राज्य कह रहा हो सवारी अपने सामान ,अधिकार,सम्मान की सुरक्षा स्वयम करे ।
कानून और प्रशासन की इस समय क्या भूमिका होती है इससे सभी वाकिफ हैं,थानों मे बदसलूकियाँ या बलात्कार की खबरें सुनी ही होंगी।दिल्ली पुलिस के विज्ञापन भी यही कहते हैं न
"समाज के मर्द ही स्त्री को छेड-खानी से बचायेंगे",या अन्धेरे स्थानो पर अकेली न जाएँ जैसी बातें।ऊपर फिल्म में रेलवे इंस्पेक्टर और पुलिस और प्रशासन और सरकार मे क्या कोई फर्क है ??

Saturday, August 23, 2008

प्यार करने की सज़ा


दुआ खलील ,17 साल की लड़की,भीड़ द्वारा दबोची गयी,उघाड़ी गयी,पत्थ्रों से मार मार कर मौत की नीन्द सुला दी गयी। भीड़ चहक रही थी।भीड़ मे सिर्फ पुरुष थे।उन्होने धर्म की रक्षा की थी।पुलिस फोर्सेस तमाशा देख रही थीं।लड़की का कसूर था कि उसने अपना प्यार का साथी खुद चुन लिया था। जबकि यह उसके पिता, भाई ताऊ चाचा का काम था।सिक्युरिटी उसके लिए कुछ नही कर सकती थी।
कहिये यह तो ईराक़ था ।
क्या आपको भारत में ऐसे दृश्य देखने को नही मिले?

Friday, August 22, 2008

यह लौटना सचमुच लौटना हो अपने घर: अनीता वर्मा की कविता

रांची में रहने वाली अनीता वर्मा इस समय हिन्दी में लिख रहे सारे कवियों में मुझे अलग नज़र आती हैं - कवियोचित अतिसंवेदनशीलता, गहरी उदात्तता और चीज़ों को समूचे पसमंजर में देख-रख-परख पाने वाली दुर्लभ किन्तु विनम्र निगाह. इस अतिप्रिय रचनाकार की यह कविता चोखेर बाली पर लगाने की मुझे लम्बे समय से बड़ी इच्छा थी पर उनका संग्रह कोई ले गया था. 'एक जन्म में सब' नाम का यह अद्भुत संग्रह कल ही वापस आया.

स्त्रियों से

जब कुछ ही समय बाद डूब जाएगी यह पूरी सदी
बीज और घास की क़िस्में हमें पुख़्ता कर लेनी हैं
भूली हुई कोमलता की गोद कितनी बड़ी करनी है
इसे देखना है शुरू के दिन से
जब सहीं थीं न मालूम कितनी यातनाएं
कई तरह के आंसू बहाये थे
जब उनके नियमों से ख़ास स्त्री थी

अभी शायद सांस लेने का और मुक्त होने का
फ़र्क़ भी नहीं कर पाए हम
अगर यह वही है जो है उनके पास
तब तो वे हैं चिरकाल से मुक्त
पर स्थितियों का बदलना क्या इतने बड़े शब्द को
अर्थवान कर सकता है

रखनी होगी हवाओं के घर में हमें
वह पारदर्शी सुनहरी नदी
जिसके तट पर प्यार खड़ा है
अपने भीतर गुम न होते हुए टीले पर से
पकड़नी होगी बच्चे की छोटी उंगली
एक समूह जो जीवित है दर्द में
उसका एक हिस्सा बनकर अपनी निविड़ताओं से
निकाल लानी होगी उजली हंसी
नदियों का साफ़ बहता पानी आईने सी धूप
यह लौटना सचमुच लौटना हो अपने घर
घर जो बहुत बड़ा है.

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अनीता जी की कविताएं यहां भी हैं:

प्रभु मेरी दिव्यता में सुबह-सबेरे ठंड में कांपते रिक्शेवाले की फटी कमीज़ ख़लल डालती है
प्रार्थना
वान गॉग के अन्तिम आत्मचित्र से बातचीत

मर्लिन मुनरो समझाती है डायमेंड्स एक लड़की के बेस्ट फ्रेंड क्यो है?सुनिये....

पिछली पोस्ट के सन्दर्भ मे -
diamonds are a girls best friend एक गीत है जिसे जेंटलमेन प्रिफर ब्लोंडस के लिए कैरोल चैन्निंग ने इंट्रोड्यूस किया था। Gentlemen Prefer Blondes (1949){माने -सम्भ्रांत पुरुष सुनहरे बाल और गोरे व्यक्ति पसन्द करते हैं},अनिता लूस के एक उपन्यास पर आधारित एक म्यूज़िकल थी। Marilyn Monroe के गाये इस गीत को यू ट्यूब पर ढूंढा तो मिल गया देखिये आप भी । गीत के बोल कुछ इस तरह हैं-

फ्रेंच पुरुष प्यार ले लिए युद्ध लड़ते और मरते हैं
पर मै ऐसा पुरुष चाहती हूँ जो जिए और दे मुझे कीमती तोहफे
हाथ पर एक चुम्बन बेशक यूरोपीय रीतियों के मुताबिक होगा
पर एक डायमेंड ही लड़की का सच्चा मित्र है।
एक चुम्बन शानदार,भव्य हो सकता है
पर उससे मकान का भाड़ा नही दिया जा सकता।
जब जेंटलमेन कोल्ड हो जाते हैं और लड़कियाँ ओल्ड हो जाती हैं,और अपना आकर्षण खोने लगती हैं तब सिर्फ डायमेंड्स ही गोल,चकोर जो भी आकार हो उसे बरकरार रखते हुए चमकते रहते हैं।
इसलिए डायमेंड्स आर अ गर्ल्स बेस्ट फ्रेंड।
अफेयर्स प्लैटोनिक नही लैकोनिक होने चाहिये
वक़्त का पहिया घूमेगा
आपके पुरुष की समृद्धि नुकसान मे बदल सकती है
यौवन बुढापे मे बदल सकता है
आप झुक कर उठ नही सकोगे
पर ऐसे मे भी
टिफनी के डायमेंडस वैसे ही रहेंगे जैसे थे।
इसलिए
डायमेंड आर अ गर्ल्स बेस्ट फ्रेंड !!



इस फिल्म की कहानी जो अपने आप मे कटाक्ष है सम्भ्रांत पुरुषों पर ,कुछ इस तरह हैं। लोरेली जो मुख्य किरदार है कहानी की,उसने अम्रेरिका के भौतिकतावाद को आतम्सात कर लिया और अपार धन इकट्ठा कर संस्कृति को कोल्ड कैश और मूर्त वस्तुओं के समतुल्य ला दिया।यह एक एक्स्ट्रीम स्थिति है।
इसके बाद मडोना का गीत "वी अर लिविंग इन अ मटीरिअल वर्ल्ड अंड आयम अ मटीरियल गर्ल्"{1985} इसी अन्दाज़ मे आया और मशहूर हुआ।

टिफनी अमरीका की एक प्रतिष्ठित आभूषण कम्पनी है जिसका ज़िक्र इस गीत मे है।

Thursday, August 21, 2008

कुछ तस्वीर को भी कहने दें......

वैसे तो यह महज़ एक मज़ेदार रेखांकन है, आप इसे गंभीर टिप्पणी भी मान सकते हैं।

Wednesday, August 20, 2008

डायमेंडस आर अ गर्ल्स बेस्ट फ्रेंड {?}


बार-बार यह कहते हुए मुझे कि पितृसत्ता ने स्त्री की मातहती और दासता के लिए हर व्यवस्था और बदलाव के साथ साथ शोषण के अपने औज़ारों को और पैना व तीखा किया है ,मुझे पूरी आशंका रहती है कि "घर बिगाड़ू और समाज विध्वंसक" जैसी लानते और मिली खुशियों को खो देने की चेतावनियाँ मिलेंगी । और वे मिलती हैं। हम भी ढीठ ही हैं। बुरी औरतें हैं।पर बुरी औरतों की यह तादाद बढ रही है।इस बात की खुशी है।
पितृसता का बाज़ार ने और पूंजीवाद ने खूब साथ दिया है।इसलिए जब काली लड़की के विवाह मे बाधा आती है तो तुरंत फेयर्नेस क्रीम वाले आगे आते हैं इस नारे के साथ-"खूबसूरती बस मे, दुनिया कदमों में" या ऐसे वाशिंग पाउडर की खोज होती है जिससे पत्नी को कपड़े धोने मे कम पसीना बहाना पड़े और नो पसीना कमीशन पतियों को पकड- कर केस न कर सके। हँसी हँसी मे ,खेल खेल मे कपड़े धोना पत्नी का पुरातन दायित्व स्वीकार करने को मान्यता मिल गयी।
मुझे लगा मेरे मन की बात कह दी गयी जब बारबरा ने हैरान होकर लिखा-कि
कलकत्ता में उसने बड़े बड़े होर्डिन्ग्स पर गहनों के विज्ञापनों में "डायमेंडस आर अ गर्ल्स बेस्ट फ्रेंड" लिखा देखा ।विज्ञापनों मे सुन्दर मॉडलों को आकर्षक मुस्कान और संतोषपूर्ण भाव भंगिमा में देखना सोच मे डालता है।वे लिखती हैं -
Their alluring smiles and ecstatic countenance as if to display a sense of happiness, fulfillment, makes me wonder what would happen if those signs were replaced with ones that speak of female feoticide and infanticide, of the dowry murders that plague India. Would it prompt women to long for the life, freedom, and power of themselves over the ephemeral pleasure that their jewels bring? How is it, I ask myself, that what a woman decorates herself with is more important than her safety, her liberty, her life?
हद है कि आज भी अभिभावक बेटी को ज़्यादा से ज़्यादा गहने देन मे नही हिचकिचाते पर उसे आत्मरक्षा व आत्म सम्मान की रक्षा की शिक्षा और विवेक देने मे हमेशा कंजूसी कर जाते हैं।

RAW फ़िर दागदार

अमर उजाला में छपी ख़बर पढ़कर हैरानी नही हुई ...कब तक इंडिया में महिलाओं को अपने बॉस ( जॉब में ) की ग़लत हरकतों को सहना होगा ? विरोध करने पर निशा प्रिय भाटिया ( Director ) की तरह मानसिक रोगी करार दिया जाएगा ...मुझे लगता है इस मुद्दे पर विचार मंथन की जरुरत है ........
----नीलिमा गर्ग

Monday, August 18, 2008

स्वागत कुलदीपिकाओं का

कुछ दिन पहले मेरे एक संबंधी डाक्टर तिवारी, जो एक गायनाकोलोजिस्ट हैं, तीन-चार दिनों के लिए हमारे घर आए थे। वह पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक बडे़ शहर में अपना एक छोटा सा मेटर्निटी होम चलाते हैं जिसे वह एक जूनियर डाक्टर के जिम्मे छोड़ कर आए थे। यहाँ रहने के दौरान भी नियमित रूप से मोबाइल के द्वारा वह अपने मेटर्निटी होम के कर्मचारियों से वहाँ की खबर लेते रहते थे। एक दिन वहाँ से बात-चीत के बाद उन्हें प्रसन्न देख कर पूछ बैठी,

कुछ बढ़िया खबर है क्या?” ,

हाँ, आज हमारे अस्पताल में तीन लड़के पैदा हुए,” उत्तर मिला।

क्या वे बच्चे आपके मित्र परिवारों के हैं?”

नहीं भाभीजी, मेरे मरीज़ हैं, बस”

फ़िर इस खुशी की वजह?”

वजह तो वही सनातन है- तीन कुलदीपक जन्मे हैं- तीन घरों के चिराग,”

लेकिन इससे आपको क्या फ़र्क पड़ता है?”

भाभीजी, लड़का पैदा होते ही अस्पताल में खुशी की लहर दौड़ जाती है। बच्चे की दादी हा्थ जोड़ कर धन्यवाद देने लगती है, पिता मिठाई की दुकान को दौड़ता है। नर्सों, दाइयों को अच्छा इनाम पाने की उम्मीद बँध जाती है। और तो और, मैं भी खुश हो जाता हूँ कि ये लोग अस्पताल का बिल चुकाने में आनाकानी नहीं करेंगे। लड़की हुई तो ऐसा मुँह लटकता है सबका कि क्या कहूँ। सोचते और अक्सर कहते भी हैं कि इतनी बड़ी मुसीबत घर आ गई है उनके, सो मुझे उनके साथ हमदर्दी और रियायत से पेश आना चाहिए और और कुछ नहीं तो उनका अस्पताल का बिल तो माफ़ कर ही कर देना चाहिए,” डा. साहब हँस कर बोले।

हमेशा ऐसा होता है?”

नहीं, हमेशा तो नहीं। कभी-कभार लड़की के पैदा होने पर भी मिठाई मिल जाती है, उसके माता-पिता खुश दिखाई देते हैं। पर ऐसा कम होता है।”

क्या पढे़-लिखे लोग भी लड़की होने पर दुखी होते हैं?”

टीचर हैं न, इसलिये आपको पढा़ई-लिखाई पर बड़ा विश्वास है। भाभी जी, पढा़ई से लोग वाकई कुछ सीखते तो भला शिक्षित समाज की यह हालत होती? इतना भ्रष्टाचार होता समाज में और शहरों में इतने पढ़े लिखे लोग अपनी बहुएं जलाते?”

डा. साहब की बात ने मुझे सोच में डाल दिया। हमारी शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य क्या सिर्फ़ लोगों को लिखना- पढ़ना सिखा कर उनकी आजीविका का प्रबंध करना है या इसके साथ-साथ उन्हें एक बेहतर, विवेकी और न्यायशील इंसान बनाना भी है? अगर मौज़ूदा शिक्षा प्रणाली ऐसा नही कर पा रही है तो क्या उस में बदलाव लाने की ज़रूरत नहीं है?

पर यह भी सच है कि कुछ हद तक तो समाज में बदलाव आया है इस शिक्षा प्रणाली के चलते और यह बदलाव हमें अपने आस-पास दिखाई भी दे रहा है। मेरी माँ की पीढी़ से लेकर मेरी बेटी की पीढी़ तक काफ़ी कुछ बदल गया है। मेरी माँ ने अपने घर में रह कर मेट्रिक तक पढ़ाई की। उनको अपने ही गाँव में अपनी सहेली के घर जाने तक की इजाज़त नहीं मिली थी, न उसकी शादी में, न उसकी माँ के देहांत के समय। कोई दो फ़र्लांग की दूरी पर रह रही सहेलियाँ कभी-कभार एक दूसरे को पत्र लिख कर नौकरानी के हाथों भेज कर अपना हाल-चाल लिया-दिया करती थीं। माँ का विवाह होने के बाद भी संयुक्त परिवार में उन पर कमोबेश बंधन बने रहे, इतने बरसों तक, कि जब वह बंधन हटे तबतक वह अपना आत्मविश्वास खो चुकी थीं। वह अब ७५ वर्ष की हैं पर आज तक कभी अकेले बाज़ार तक नहीं गई हैं। उन्हें कहीं भी जाने के लिये साथ या सहारा चाहिए।

विवाह पूर्व स्कूल-कालेज छोड़ कर और कहीं अकेले आने-जाने की आज़ादी मु्झे भी नहीं थी। पिता मुझे होस्टल भेजने को तैयार नहीं थे इसलिये एक अच्छे इंजीनियरिंग कालेज में प्रवेश मिलने के बाद भी मुझे वहाँ पढ़ने नहीं भेजा। मैंने अपने शहर के कालेज से ही स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की। पर एक फ़ौजी अफ़सर से विवाह के बाद मेरी परिस्थितियाँ बदल गईं। मैंने बाज़ार ही नहीं, बैंक, पोस्ट आफ़िस, बिजली दफ़्तर, टेलीफ़ोन एक्सचेंज, अस्पताल आदि जगहों पर अकेले जाकर अपना काम करवाना सीखा और बस और रेलगाड़ियों में अकेले और बच्चों के साथ सफ़र करना भी।

मेरी बेटी १५ वर्ष की उम्र से होस्टल में रह कर पढी़। पढा़ई के बाद एक दूसरे शहर में नौकरी मिली तो वहाँ कमरा लेकर रहने लगी। विवाहपूर्व अपनी कंपनी की ट्रेनिंग के लिए छः हफ़्ते के लिए अकेली अमेरिका गई और वापस आते समय रास्ते में तीन-चार दिन रुक कर पेरिस और वियेना घूमने के बाद भारत लौटी।

मेरी माँ की लगभग हाउस-अरेस्ट जैसी स्थिति से लेकर मेरी बेटी की अकेले विदेश यात्रा तक का यह जो सफ़र पचास वर्षों में तय हुआ है, उसका कारण शिक्षा के अतिरिक्त और क्या हो सकता है? यह मानना होगा कि शिक्षा पाने के बाद कुछ लोगों की सोच बदली है और वे अपनी बेटियों को समान अवसर दे रहे हैं या देना चाहते हैं। बाकी की भी सोच सही दिशा में बदले, इसके लिए क्या करना चाहिये?

इस बदलाव को लाने में एक बड़ी सशक्त भूमिका मीडिया निभा सकता है। मीडिया की पहुँच अब उन तबकों तक पहुँच गई है जहाँ बदलाव की सख्त ज़रूरत है। पर क्या मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहा है? टीवी सीरियलों को ही देख लीजिए। ज़्यादातर सीरियलों में या तो औरत मजबूर और रोती हुई दिखाई जाएगी, या बिलकुल मंथरा का अवतार। कंज़्यूमरिज़्म के दबाव में आकर हमारे ज़्यादातर सीरियल सास-बहू, ननद-भाभी के झगड़ों, भविष्यवाणियों, अन्धविश्वासों के जाल में उलझे हुए हैं। इस संबंध में एक अपवाद ध्यान में आ रहा है। एक अपेक्षाकृत नये चैनल में दिखाए जा रहे दो टीवी सीरियल -एक पैकेट उम्मीद- और -राधा की बेटियाँ कुछ कर दिखाएंगी-नारी शक्ति और क्षमता को बहुत पाज़िटिव ढंग से उजागर करते हैं। साथ जुड़ कर लड़कियाँ या नारियाँ बहुत कुछ कर सकती हैं।

बदलाव तो आना ही है। यह बदलाव जल्दी आए और सही दिशा में आए इसके लिए हम सबको मिल कर प्रयास करना है। काश, वह दिन जल्दी आए जब हर बेटी के जन्म पर उसके परिवारजन कुलदीपिका के आने की खुशी मनाते दिखाई दें।

Wednesday, August 13, 2008

सईदा को सलाम!

पूजा प्रसाद

मन बाग- बाग हुआ जा रहा है।

खबर है डॉक्टर सैयदा हमीद ने कल रात एक जोड़े का निकाह करवाया है। बात अपने आप में अलग और खासमखास इसलिए है क्योंकि

यह पहली बार है जब किसी महिला ने मुस्मिल धार्मिक नीति से निकाह करवाया हो।

साथ ही, यह सारी रस्म उन्होंने अंग्रेजी भाषा में अदा की।

विवाह पर बहिष्कार नहीं किया गया था, जैसा कि हो सकने की आशंका थी, बल्कि शहर के बड़े और सम्मानजन निकाह स्थल पर उपस्थित थे।

विवाह में 'गवाह' के तौर पर चार महिलाएं थीं, जबकि पारंपरिक रूप से पुरूष गवाहों का होना आवश्यक होता है।

सैयदा हमीद शिया समुदाय से हैं जबकि दूल्हा- दुल्हन सुन्नी समुदाय से। यहां जाति की बाड़ें भी टूट गई हैं।

इस बाबत मुस्लिम महिला संगठन आगे आए थे और उन्होंने विवाह हेतु ऐसा निकाहनामा तैयार किया जिसमें महिला हकों की बात विशेष तौर पर की गई थी।

दुल्हन ने पारंपरिक इस्लामिक वेशभूषा की बजाय अपनी सुविधानुसार साड़ी पहनी थी।

दूल्हे ने शेरवानी तो पहनी थी मगर सेहरा नहीं लगाया था।

मैं सोच रही हूं कि हिंदुओं का विवाह भी क्या अंग्रेजी या अन्य किसी विदेशी भाषा में कभी करवाया जा सकेगा? बजरंग दल सरीखे संगठन इस पर हो हल्ला मचाना तो आरंभ नहीं कर देंगे? और भी पता नहीं क्या क्या.. मन खूब- खुश हो रहा है। इस खबर पर ऊंची -ऊंची कुलांचे मार रहा है। महिला सशक्तिकरण की दिशा में, इंसानी बराबरी की दिशा में एक और कदम। बधाई चोखरेबालियां।

"थाने में खड़ी लड़कियाँ"

कई लङकियों का भाग्य लङकी होने से, कहीं ज्यादा खराब होता है. शायद उनकी जिन्दगी हम से कहीं बदतर होती होगी. जहाँ समाज में उनके लिये कोई जगह नही, जानवरों के साथ किया जाने वाला सलूक और एक तिरस्कृत जीवन, अवहेलना की लङकी के नाम पर कंलक हो. लेकिन फिर भी वो लङकी तो हैं हमारी लङकियों जैसी, लेकिन हमारी नहीं. शायद वो जीना चाहती होगीं आम लङकी की तरह, सांसे लेना चाहती होगीं खुले आसमान में. पिछले दिनों "कृत्या" में नरेन्द्र पुण्डरिक कि कविता "थाने में खड़ी लड़कियाँ" पङी सो यहाँ भी पोस्ट कर रही हूँ.

थाने में खड़ी लड़कियाँ
मेरी अपनी लड़की तरह
लम्बा कुर्ता और सलवार पहने थीं
और वैसे ही सामने के उभारों को
दुप्पटे से छुपा कर रखे थीं

मेरी अपनी लड़की की तरह ही वह
घर की नहीं थाने की फर्श को
अपने अँगूठे से कुरेद रही थी
अपनी गल्तियों पर,

मेरी अपनी लड़की तरह
इनमें मिन्नत से भरा
टपक कर चू पड़ने वाला भोलापन था
थाने में खड़ी लड़कियाँ
मेरी अपनी लड़कियों से
अलग नहीं दिख रही थी
अन्तर सिर्फ इतना था कि
यह घर नहीं थाना था
जो लड़कियों के अपने वजूद को
इकदम से बदले दे रहा था
---------------------

Tuesday, August 12, 2008

जो भी रास्ता पकड़ो, वह कहीं न कहीं जा कर बंद हो जाता है।

मंदाकिनी
लेखक - राजकिशोर

मंदाकिनी से जो एक बार मिल लेगा, वह उसे कभी भूल नहीं सकेगा। वह लड़की नहीं, किसी उपन्यास की पात्र लगती है। ऐसे पात्र जो अन्य पात्रों-कुपात्रों की भीड़ में अलग से जगमगाते हैं। कथा में उनकी भूमिका छोटी-सी होती है, पर उनका व्यक्तित्व इतना बड़ा होता है कि छोटी-सी भूमिका में वह समा नहीं पाता। सीमांत पर रहते हुए भी सीमाओं की विस्तृत चौहद्दी में सांस लेनेवाले पात्रों को बौना कर देता है। मंदाकिनी ने जान-बूझ कर कभी ऐसा करना चाहा हो, यह मुझे याद नहीं। न कभी यह लगा कि वह ऐसा करना चाह सकती है। लेकिन उसकी संपूर्ण अभिव्यक्ति में कुछ ऐसा है जो उसे सुंदर और शीलयुक्त बनाता है। इन दोनों को सात्विक निखार मिलता है उसकी प्रत्युत्पन्न मति और बौद्धिक तीक्ष्णता से। उसने मुझे कई ऐसे किस्से सुनाए थे, जब उसने अपने से बड़ों को ढेर कर दिया था। एक साहब उसके साथ मनाली की सैर करना चाहते थे। मंदाकिनी ने कहा कि दिल्ली में मेरे एक लोकल गार्डियन हैं। दिल्ली से बाहर जाने के लिए मुझे उनसे अनुमति लेनी होगी। एक दूसरे साहब उसे एक टीवी चैनल में ऐंकर बना रहे थे। मंदाकिनी ने बताया कि मैं पीएचडी खत्म करने के बाद ही कोई नौकरी करूंगी। इसके लिए मुझे कम से कम तीन साल इंतजार करना होगा। सच यह था कि तब तक उसने एमए भी नहीं किया था।

वही मंदाकिन जब पिछले महीने मिली, तो तरद्दुद में थी। इसके पहले मैंने उसी दुविधा में नहीं देखा था। परेशान होने पर भी वह नहीं चाहती थी कि किसी को उसकी परेशानी की हवा लगे। एक बार उसने कहा था कि सहानुभूति प्रगट करनेवाले और उसके लिए कुछ भी उठा न रखने की कोशिश करनेवाले उसे इतने मिले थे कि अब वह उनसे कोसों दूर रहना चाहती है। उसने जिसकी भी सहानुभूति ली थी, वह कीमत वसूल करने के लिए घोड़े पर सवार हो जाता था। एक लेखक महोदय ने अपने प्रकाशक के यहां उसे प्रूफ रीडर लगवा दिया था। दस दिन के बाद ही उनका आग्रह हुआ कि दफ्तर से लौटते हुए मेरे घर आ जाया करना और एक घंटा मेरी किताबों के प्रूफ पढ़ दिया करना। मंदाकिनी बहुत खुश हुई कि उसे एक स्थापित लेखक के साथ काम करने का मौका मिलेगा और वह भाषा की बारीकियां सीख सकेगी। पहले दिन वह लेखक के घर गई, तो पता चला कि जिस उपन्यास के प्रूफ उसे पढ़ने हैं, वह अभी लिखा जाना है। महीना पूरा करने के बाद उसने यह नौकरी छोड़ दी। इससे मिलते-जुलते कारणों से उसे कई नौकरियां बीच में ही छोड़नी पड़ गई थीं। तब भी जब उसे पैसों की सख्त जरूरत थी।

चाय का प्याला आते ही वह खुल पड़ी। उसकी बात, जितना मुझे याद है, उसके शब्दों में ही सुनिए -- 'सर, पहली बार इतनी मुश्किल में पड़ी हूं। आप जानते ही हैं कि किसी को प्यार करना और उसके साथ घर बसाने की बात सोचना मेरे लिए कितना मुश्किल है। बचपन से ही मेरा शरीर पुरुषों की लोलुपता का कातर साक्षी रहा है। प्रतिरोध करना मैंने बहुत बाद में सीखा। तब से मैंने किसी को अपने शिष्ट होने का फायदा उठाने नहीं दिया। शायद मेरी किस्मत ही कुछ ऐसी है कि मुझे हर बिल में सांप ही दिखाई देता है। जो अपने को जितना स्त्री समर्थक दिखाता है, उससे मुझे उतना ही डर लगता है। लेकिन इस बार एक ऐसे लड़के से मेरा पाला पड़ा है, जिसकी मनुष्यता के आगे मैं हार गई। इतना सीधा और सज्जन है कि आज तक उसने मुझे छुआ तक नहीं है। सिनेमा हॉल के अंधेरे में भी। लेकिन मैं जानती हूं कि वह हर क्षण मेरे ही बारे में सोचता रहता है। एमबीए का आखिरी साल है। कल उसने कहा कि मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं। मैं कोई जवाब नहीं दे पाई। सर, आप ही बताइए, मुझे क्या करना चाहिए।'

मैं क्या बताता। इस मामले में मेरे अनुभव ऐसे हैं कि सलाह देना असंभव जान पड़ता है। स्त्री-पुरुष संबंधों में जो पेच हैं, उनका कोई हल नहीं है। इसलिए जो भी रास्ता पकड़ो, वह कहीं न कहीं जा कर बंद हो जाता है। फिर भी, चूंकि मंदाकिनी लगातार इसरार किए जा रही थी, इसलिए हालांकि, अगर, मगर वगैरह लगाते हुए मैंने कहा,'मेरे खयाल से, तुम्हें अब सेट्ल हो जाना चाहिए। तुम भी नौकरी करती हो। एमबीए पूरा करने के बाद उसे भी अच्छी नौकरी मिल जाएगी। कब तक खुद भटकती रहोगी और दूसरों के भटकाव का कारण बनती रहोगी?' इस पर मंदाकिनी ठठा कर हंस पड़ी। बोली, 'जॉर्ज बर्नार्ड शॉ की सीख है कि पुरुष को जितनी देर से हो सके, शादी करनी चाहिए और स्त्री को जितनी जल्दी हो सके, शादी कर लेनी चाहिए !'

एक हफ्ते बाद एक साहित्यिक कार्यक्रम के समापन पर मंदाकिनी से मुलाकात हो गई। मंडी हाउस में पेड़ों की छांह-छांह चलते हुए मैंने पूछा, 'तो अंत में तुमने क्या फैसला किया?' वह बेहद संजीदा हो आई। फिर मुसकराते हुए कहा, 'मैंने उससे कह दिया कि मेरी शादी हो चुकी है।' अब संजीदा होने की बारी मेरी थी। उसने मुझे भारहीन करने के लक्ष्य से कहा, 'सर, मैं उससे कहती कि चलो, शादी के बिना ही साथ रहते हैं, तो वह कतई राजी नहीं होता।'

Friday, August 8, 2008

कन्या

कन्या

जगत की जीवनदायिनी शक्ति

क्यूँ है शापित जनम से

जन्म लेने के अधिकार से वंचित क्यूँ है ?

प्रकृति का कोमल उपहार

भोर की उजली किरण

जीवन की प्रथम कलि

खिलने से पहले ही मुरझाने को विवश क्यूँ है ?

कन्या

माँ ,बेटी, बहन है

जन्मदायिनी माँ की आंख का आंसू क्यूँ है ?

--नीलिमा गर्ग

गाय दूध देती है

रश्मि सरस


कक्षा में बच्चों को आज भी पढाया जाता है कि गाय दूध देती है , पेड़ फल देते हैं , नदियाँ जल देती हैं वगैरह। सो यह हमें कितना स्वाभाविक लगता है । मानो गाय सहर्ष दूध देती हो और उसके दूध की एकमात्र सार्थकता यही है कि उसे हम अधिक से अधिक दुहते जाएँ और छक कर उसका भोग करते रहें ।
इस छल में भाषा हमार भरपूर साथ देती है। वह हमारी चेतना पर मनचाहे आवरण डाल देती है। फिर दुनिया हमें वैसी नही दिखती जैसी कि है बल्कि ऐसी नज़र आती है जैसी देखी जाने से हमारे स्वार्थ सधते हों।साफ है कि भाषा सच और झूठ , दोनो की वाहक होती है। भाषा के माध्यम से गढे हुए एक व्यापक मिथक के कारण ही गटागट दूध पीते हुए यह विचार हमें नही कचोटता कि हम जिसका हक मार रहे हैं वह एक निरीह बछड़ा है ।
अगर दूध से हड्डियाँ मज़बूत होती हैं और शरीर में ताकत आती है, तो हम शेर चीती , भेड़िया आदि स्तनधारियों का दूध क्यों नही पीते?
सीधी बात है , उनका दूध हासिल करना हमारे लिए सम्भव नही है ।गाय सरलता से काबू में आ जाने वाली सीधी और स्त्रीलिंग प्राणी है ।इसलिए उसके कातर शरीर में जो दूध उसके बच्चे के लिए उत्पन्न होता है , उस पर हम अपना हक मान लेते हैं ।
किसी भी दुधारू जीव के शरीरे में दूध और खून बनने का स्रोत एक ही होता है । आंतरिक ग्रंथियाँ हार्मोनों की उत्तेजना से प्रेरित होकर खून से दूध बनाती हैं ।सभी स्तनधारी माँओं के शरीर मे उनके बच्चों के पोषण के लिए दूध बनता है ।इसी उद्देश्य से कुदरत सीमित मात्रा मे और निश्चित अवधि के लिए धूध का निर्माण करती है ।पर लालची आदमी गाय, भैंस,बकरी ,ऊण्टनी आदि निरीह प्राणियों के बच्चों को परे कर उनके हिस्से का दूध हड़प लेना चाहता है । धरती पर मानव अकेला ऐसा जीव है जो मरने तक दूध पीता है -वह भी दूसरी प्रजातियों का ।

दूध हड़पने के तरीके इतने क्रूर हैं कि मानव जाति को सभ्य बताने का मित्र्हक रचने वाली भाषा पर पुनर्विचार की ज़रूरत है । गाय और भैंस् जैसे दुधारू पशु ममता से कातर अपने बच्चे को देखते रहते हैं और उनका सारा दूध निचोड़ लिया जाता है ।कई बार सिर्फ अपने बच्चे को दूध पिलाने की ललक से गाय अपना दूध सुखा लेती है या कहें कि अपने सांतान से विछोह की वेदना उसकी ग्रंथियों मे संकुचन पैदा कर देती है और उसका दूध नही निकलता। तब कहा जाता है कि वह दूध की चोरी कर लेती है ।
इस चोरी को रोकने के लिए उसके बच्छड़े को थन मे लगाया जाता है और दूध उतर जाने पर उसे अलग कर गाय का सारा दूध निचोड़ लिया जाता है ।भैंस के नर बच्चे को तो पैदा होते ही मार दिया जाता है ,फिर उसकी खाल मे भूसा भरकर उसे उसकी माँ के पास लाया जाता हैताकि उसकी ममता दूध बनकर बहती रहे ।
अब तो विज्ञान ने ऐसे तरीके मनुष्य को दे दिये हैं कि एक इंजेकशन लगा कर दिमाग को इतना उत्तेजित कर दिया जाता है कि उसके असर के आगे सारी ममता मस्त हो जाती है और कम समय मे ज़्यद से ज़्यादा प्राणरस खींचा जा सकत है । बड़ी बड़ी डेयरियों में भैंस के थन से दूध खींचने के लिए स्वचालित यंत्रों का प्रयोग किया जाता है {जो निश्चित ही दुखदायी है}
आज भी किसी स्त्री की प्रशंस में कहा जाता है कि वह तो निरी गाय है ।इस उपमा से समझा जा सकता है कि स्त्री से क्या अपेक्षा होती है ।शायद इसी का विस्तार कहानीकारों की इस कल्पना में मिलता है कि स्त्री को सचमुच गाय जैसा बन जाना पड़ता है । सुभाष पंत की कहानी दूध का दाम में एक अफसर की इस धुन पर कि उसे अपने बच्चे को गाय का दूध पिलाना है , एक गरीब स्त्री अपना दूध उसके पास भिजवाने लगती है, क्योंकि उस पूरे गाँव मे कोई गाय नही थी ।


हम और हमारे भोले बच्चे कक्षा मे सीखते रहते हैं "गाय दूध देती है .........."

रश्मि सरस

साभार - जनसत्ता
7 जुलाई 2008

Thursday, August 7, 2008

स्त्री सशक्तिकरण के समीकरण



संगीता मनराल

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ऐसे तो कई मुद्दे हैं, जबकि कोई दबाव नहीं, कोई मजबूरी नहीं और ना ही कहीं कोई तानाशाही है, लेकिन ये बात कई बार दिल को कचोट जाती है कि औरत तो औरत है और औरत ही रहेगी.

स्त्री के प्रति भेदभाव पूर्ण नज़रिये की बात होती है तो ज़्यादा तर लोग कहते पाए जाते हैं कि बराबरी और सम्मान मिल तो रहा है ! हर क्षेत्र मे स्त्री ने पाँव जमा लिये हैं । उन्हें आरक्षण भी मिलता है । किस बात का रोना है ? अभी किसी पिछली पोस्ट में{शायद अनुराधा जी की फेयरी टेल के सम्बन्ध में} गौरव जी ने स्त्री सशक्तिकरण के समीकरण की बात उठाई थी, तो सोचा उनके जवाब में अपनी पुरानी पोस्ट यहाँ भी पोस्ट कर दूँ.


कुछ सालों पीछे चली जाँऊ (ज्यादा नहीं सिर्फ २० साल) तो माँ बताती हैं कि दादा जी ने उन्हें नौकरी करने कि मंजूरी नहीं दी थी, शायद ये कहकर कि भले घर कि औरते काम पर जाती हैं क्या? या फिर ये सोचकर की अपने पति से अच्छी नौकरी भला, कैसे तुम कर सकती हो? फिर तो कई बहाने, कई सुविधाओं को गिना दिया गया अरे इतनी दूर है, रोज़ बस से आना जाना कैसे करोगी?? बस फिर क्या था, पापा ने भी दादा जी की बातों को तवज्जो देकर माँ को नौकरी नहीं करने दी. ऐसा नहीं है कि दादा या पापा पढे लिखे नहीं हैं लेकिन फिर भी ऐसी कई बन्दिशों में एक पुरुष मानसिकता निहित थी ।
आज इकीसवीं सदी तक पँहुचते पँहुचते ये बदलाव तो है कि औरत नौकरी कर सकती है, कुछ पैसे कमा सकती है. लेकिन फिर भी कुछ तो बंदिशे अब भी बरकरार हैं .व्यवसाय चुनने से लेकर कार्यस्थल पर व्यवहार करने तक . अगर औरत घर अक्सर देर से लौटेने लगे तो इन हिदायतों का मिलना तो लाज़मी सा है.
देर तक बैठना पङता है तो छोङ क्यों नहीं देतीं?

घर कि तरफ भी तो देखा करो?
अरे अब बस करों, क्या मेरा कमाया पैसा कम पङता है?
अगर आदमी प्रोफैशनल बनकर अपना काम लेट आर्स तक बैठ कर कर सकता है, तो औरत के ऐसा करने पर ऐतराज़ क्यों?
अरे, इतनी दूर आफिस ज्वाइन करने वाली हो, पता है पूरे १ घंटे की ड्रईव है. फिर तुम्हें घर भी तो दिखना है कौन करेगा ये सब???

कुल मिलाकर यह कि स्त्री के लिए प्राथमिकता हमेशा परिवार और घर ही रहता है,इस जकड़ से वह बाहर निकलेगी तभी अपना असली स्वरूप जान पाएगी ।महात्मा बुद्द्ध जाने कहाँ कहाँ भटके थे । { इस पर कुछ टिप्पणियाँ आयेंगी - समस्या का हल घर के बाहर खोज रही हैं ये प्रगतिशील औरतें ।तो उनसे भी कहेंगे कि घर की चार दीवारी के भीतर रहकर स्वयम को वे भी पहचानने की कोशिश करें ।}

ऐसी कई बातें है जो स्त्री सशक्तिकरण के समीकरणों को झुठला देती हैं.ऊपर से देखने पर जहाँ सब तरफ लोकतंत्र नज़र आता है वहाँ पर समानता और बन्धुत्व की उड़ती हुई धज्जियाँ आपको भी दिखाई दे रही होंगी ।पर फिर भी उम्मीद है आने वाला कल और बेहतर होगा.

लडकी

अरे फिर से लडकी ¡
यही सुना था गुडिया के जन्म पर
दादी का गुस्साया चेहेरा
माँ की बेचारगी
पिता की बेरुखी
यही झेलते झेलते बडी हो रही थीं हम तीनो बहनें

पिर आया भाई, घरमें खुशी लहराई
दादीने नजर उतारी, अम्मा जाये वारी वारी ।

घर खुशी से भर गया
सब कुछ लगता नया नया
हम बहनें भी दौड दौड
काम करतीं लेकर होड
भाई को खिलातीं, दुलरातीं
सुलातीं, हँसाती
भाई को छींक भी आये तो अम्मा बाबूजी की नींद हराम
हम बुखार में तपें तो भी कोई न कहता करो आराम
दीदी का हायस्कूल का रिज़ल्ट
फर्स्ट क्लास विद डिस्टिंक्शन
पर किसी के चेहेरे पर कोई खास खुशी नही
अच्छा है जैसा ठंडा रेसपॉन्स
भाई को टीका लगने की वजह से थोडा बुखार
उसी की परेशानी और त्रास
१२वीं का दीदी का १० वी का मेरा और ८वी का गुडिया का रिज़ल्ट
तीनों क्लास में अव्वल
भाई भी अपनी छोटी कक्षा मे होशियार
शिक्षकों का प्यारा
घरमें सब की आँखों का तारा
दीदी को होना है डॉक्टर
मुझे पढना है कम्प्यूटर
और गुडिया को बनना है रिपोर्टर
बाबूजी की सीमित आय
और हमारे हौसले
क्या होंगे सपने पूरे
जब तौले जायेंगे वे भाई के सपनों से
पर हम तीनों हैं एक साथ
करेंगे मदद एक दूजे की और पायेंगे मंजिल अपनी अपनी

Wednesday, August 6, 2008

कुछ चर्चा हो जाए

1. तीन अगस्त को हिमाचल प्रदेश के मशहूर नैनादेवी के मंदिर में भगदड़ मचने से करीब 150 लोग मारे गए और 300 से ज्यादा घायल हुए। मरने वालों में ज्यादातर महिलाएं और बच्चे थे। घायलों में भी ज्यादातर शारीरिक रूप से कमजोर- महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग थे। ऐसी घटनाएं होती रही हैं और होती रहेंगी। जहां भीड़ जुड़ती है वहां भगदड़ भी होने की संभावना रहती है। लेकिन इतनी बड़ी व्यवस्था प्रणाली में क्या इतनी सी गुंजाइश नहीं निकलती कि भगदड़ के बावजूद ऐसी घटनाओं को रोकने, सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम हो।

2. जम्मू में अमरनाथ श्राइन बोर्ड की जमीन के हस्तांतरण के मुद्दे पर लंबे समय से चल रहे घमासान में
कई लोग मारे गए। मरने वाले जो भी हों, सबसे ज्यादा खामियाजा औरतों और बच्चों को ही भुगतना पड़ता है- बेघर, बेसहारा, बेरोजगार, विस्थापित और शोषित होकर।
जम्मू में रह रहे लोगों का संपर्क बाकी दुनिया से कट गया है। फोन, एसएमएस, रेलगाड़ियां, बसें, स्थानीय यातायात, दुकानें, दूध, तेल, राशन, दवाएं, अस्पताल, सभी सेवाएं ठप्प हैं।

3. मुंबई की निकेता मेहता के 20 सप्ताह से ज्यादा समय के गर्भ को वहां के उच्च न्यायालय ने नष्ट करने की इजाजत नहीं दी। निकेता के डॊक्टर का कहना है कि उसके बच्चे में दिल की कुछ गंभीर बीमारियां हो सकती हैं जिससे उस बच्चे के लिए सामान्य जीवन जी पाना कठिन भी हो सकता है। लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि जबतक सचमुच बच्चा विकृतियों के साथ पैदा न हो, सिर्फ आशंका के आधार पर उसे 'मार देना' उचित नहीं। कई बार मशीनों की आंख से देखी गई ये आशंकाएं बाद में गलत साबित होती हैं, या अपने बढ़ने की प्रक्रिया में गर्भ खुद भी कई गड़बड़ियों को ठीक कर लेता है। अब लगता है निकेता ने वास्तविकता को स्वीकार कर लिया है । उधर कई संगठन, डॊक्टर उस होने वाले बच्चे के लिए मदद की पेशकश कर रहे हैं।

-साथियों आज के ये सभी ज्वलंत मुद्दे महिलाओं से जुड़े हैं और कुछ सोच मांगते हैं। अगर हम इनसे अपना जुड़ाव पाते हैं तो सोचे बिना रह भी नहीं सकते। क्यों न इन पर कुछ चर्चा हो। और राय बने या न बने पर इस तरफ भी सोचने का मन बने!

Monday, August 4, 2008

"मेरी दोस्त मंजू"

पिछले दिनों चोखेर बाली में लडके-लङकी की क्लासिफिकेशन मे कई बातें ऐसी उजागर हुई जो ये आज भी सिद्ध करतीं हैं कि हम चाहे कस्बे में रहे या एक विकसित शहर में, या फिर विकाशील राज्य का हिस्सा हों. कुछ नियम कानून लङकियों के लिये तय से हैं, मॉर्डनाइस सोच के पीछे जरूरी नहीं कि हम तुलनात्मक ना हों या फिर जो जैंडर क्लासिफिकेशन है वो करना छोङ दें. शायद ये समाज जो मर्दों द्वारा, मर्दों कि सहुलीयत और मर्दों कि शर्तों पर ही चलता है. खैर छोङिये, ये बात तो जग जाहिर हैं.
बात शादी को लेकर याद आ रही है तो सोचा आप सबसे भी बाँटू.
मेरी दोस्त मंजू, हम साथ एक बस में रोज़ आफिस के लिये आते-जाते थे, बस उसी दौरान उससे जान पहचान हुई और वो मेरी दोस्त बन गई फिर बातों का सिलसिला आगे बढा और मालूम हुआ कि वो अपनी शादी को लेकर परेशान है, क्योंकि उसके माँ-पापा को अपनी बिरादरी मे काबिल लङका नहीं मिल रहा, या शायद वो ज्यादा पढलिख गई है. रिश्ते तो कई आते लेकिन सभी में कोई ना कोई बदिशें होती जैसे वो शादी नहीं कोई कोन्ट्रैक्ट साईन करा रहे हों.
मंजू बहुत शांत स्वभाव की, पेशे से इन्टिरियर डैकोरेटर, समझदार, संवेदनशील और एक जिम्मेदार लङकी थी. दो बहनों और भाईयों के बीच सबसे बढी होने कि वजह से थोङी जिम्मेदारियाँ उस पर भी थीं. वो भी अपने मन मुताबिक अपना जीवन साथी चुनना चहती, लेकिन कभी घर वालों तो कभी समाज का सोचकर अपने विचार को बदल लेती और सिर्फ इतना ही सोच पाती कि घर वालों के मन मुताबिक और उनके बताये लङके के साथ ही उसे अपनी पूरी जिन्दगी गुजारनी होगी. बहुत जद्दोजहद के बाद एक रिश्ता आया, लङका पेशे से सिविल इंजिनियर था. यहाँ पर वो खुश थी कि कम से कम लङका पढा लिखा तो है, क्योंकी घर वाले तो सिर्फ शादी करना चाहते थे और कई बार ऐसे रिश्तों मे भी हामी भर आते जहाँ लङका चपरासी होता या फिर किसान.
इंजिनियर लङके के परिवार वालों को भी लङकी पंसद आ गई, खुले-आम दहेज कि मांग ने मज़ू को थोङा दुखी कर दिया. लङके वालो की दलील थी कि लङके को पडाने लिखाने में कई खर्चे हुये हैं और फिर जो भी आप दोगे आपकी बेटी के लिये ही होगा, जिसका उपयोग उसी को करना है. घर वाले पहले तो सोचते रहे कि इस रिश्ते को भी मना कर दिया जाये, लेकिन फिर वही ख्याल घर कर लेता कि अगर फिर से कोई अच्छा रिश्ता नहीं आया तो क्या करेगें. इसलिये कैसे भी करके दहेज़ कि डिमांड को स्वीकार लिया गया. बात गाङी माँगने से मोटर-साइकिल पर आकर खत्म हुई और अप्रैल मे मंजू कि शादी हो गई, हम लोग भी उसकी शादी में शामिल हुये.
वो शादी को लेकर खुश नहीं थी लेकिन इस बात का इतमिनान था कि माँ - पापा का बोझ कम हो गया है. वो अच्छा कमाती थी, माँ - पापा का ख्याल रखती, घर के अहम फैसलों पर अपनी राय देती, पापा से लाड करती, छोटे भाई - बहनों कि जरूरतों का ध्यान रखती फिर भी वो अपने को अपने परिवार पर एक बोझ जैसा महसूस करती.
शादी होने के बाद उससे सिर्फ एक बार बात हुई पूछने पर मालूम हुआ की ठीक है, यहाँ अपने देवर और पति के साथ रहती है. घर संभाल लिया है, और आफिस भी ठीक चल रहा है. माँ - पापा से मिल लेती है, ससूराल वाले ज्यादा खुश नहीं क्योंकी मन मुताबिक दहेज़ जो नहीं मिला था. देवर का व्यवहार ठीक नहीं, ताने देता है और पति उसे या अपने घर वालों को कुछ नहीं कह पाते, सिर्फ मंजू को सांत्वना दे देते है.

फिर उसने मुझे जून में फोन किया मेरे जन्मदिन पर, मुझे विश करने के लिये. आवाज़ में थोङा भारीपन होने कि वज़ह से बहुत बार पूछने पर बताया कि तबियत ठीक नहीं है, बुखार है दो दिन से इसलिये आफिस भी नहीं जा सकी. दो दिन बाद उसकी छोटी बहन का फोन आया कि मंजू नहीं रही. मैं सकते में थी ऐसा कैसे हो सकता है, अभी दो दिन पहले ही तो बात हुई थी उससे. उसके घर गये तो पता लगा कि शादी के बाद ही वो बीमार हो गई थी और कई दिनों तक माँ के घर ही रही, उसके ससूराल वालों ने एक बार भी उसे अपने पास रखने कि जहमत नहीं उठाई. ठीक होने पर वो वापस चली गई थी और बेहतर थी, अभी एक हफ्ते से ही वायरल था लेकिन पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि वो नहीं रही. उसकी माँ ने बताया आज शाम ५ बजे फोन पर बात हुई तो बता रही थी कि पडोस कि भाभी के घर बैठी है और ठीक है, पङोस कि भाभी से मालूम हुआ कि मंजू एकदम ठीक लग रही थी और कह रही थी कि कल से आफिस ज्वाईन करेगी और करीब ७ बजे अपने घर के वापस अपने घर चली गई क्यों की उसका देवर आ गया था. रात ८ बजे मंजू के घर फोन जाता है कि वो बहुत तेज़ बुखार में है, उसे कोई दवा दे दी है लेकिन वो बुरी तरह कांप रही है इसलिये अस्पताल ले जाया जा रहा है, अस्पताल पँहुचने से पहले ही उसने दम तोङ दिया.
वो आज हमारे बीच नहीं है लेकिन सिर्फ यादे हैं जो एक टीस पैदा करती हैं कि क्या लङकी का जीवन ये सब भोगने के लिये ही होता है. क्या सच लङकी होना एक पाप करने जैसा है?? जिसकी सजा अकसर भुगतनी होती है. हर कदम पर कुछ ऐसा जरूर हो जाता है जो ये अहसास दिलाता है कि हम लङकी हैं और उससे ज्यादा कुछ नहीं.
आज वो जहाँ कहीं भी हो दुआ करती हूँ कि खुश और खुशहाल हो. आमीन!!

Friday, August 1, 2008

लड़कियों कि परवरिश का उद्देश्य ही महज शादी करना होता है

हमारे समाज मे इसे बहुत खुलेपन के साथ कहा जाता है कि पत्नी नही पनौती है , या ज्वालामुखी है , या मै फिर से बैचलर होना चाहता हूँ , या पत्नी से पीछा छुड़ाने की कोशिश {इसमें पत्नी की मौत की कामना, भले ही मज़ाक में हालाँकि स्त्री मज़ाक में भी यह नही कह -सोच सकती , भी शामिल होती है और मायके भेजने की साजिश भी} करते हुए फिल्मों और टीवी सीरियलों में साइड भूमिका वाले पुरुष पात्र । बैचलर होकर जीने की इच्छा तो पुरुष जाने कब से जताता रहा है , इस पर चुट्कुले भी बनते रहे , शादी के समय विवाहित दोस्त कहते हैं - बकरा हलाल होने जा रहा है , जबकि शादी के रिश्ते में ज़्यादातर पुरुष को ही उसकी मर्ज़ी और सुविधा के मुताबिक मिलता है ।
एक स्त्री के लिए तो यह सोचना ही भयावह माना जाता है । कभी सुना है किसी विवाहित महिला को कहते आपने कि काश मैं फिर से कुँवारी हो जाऊँ ! या काश मेरी इस पति से पिंड छूटे । या पति नही पनौती है ।या इसे इसके माँ -बाप के पास भेज दूँ किसी तरह कुछ दिन चैन से रहने को मिले । उसे तो हमेशा यही मानना सिखाया जाता है कि- जैसा भी है तेरा आदमी तो है ।
मेरे मन में प्रश्न आने लगे हैं कि - क्या वाकई सुरक्षा और सुविधा की चाहत पाने के लिए लड़कियाँ सेल्फिश होती हैं और इसलिए वे शादी करने को लालायित रहती हैं ?क्या उन्हें हमेशा से ही संरक्षणीय माना गया है इसी लिए तो यह चाहत नही होती ?क्या यह एक समाधान नही हो सकता कि हम स्त्री से बिना कमाए घर पर रह सकने की सुविधा {यदि किसी की नज़र में यह वाकई एक सुविधा है ,डिसएडवांटेज नही } को छीन लें और उसे डाल पर से धक्का दे दें चिड़िया जैसे अपने नन्हे बच्चे को उड़ना सिखाने के लिए दे देती है , ताकि वे खुद ब खुद आत्मनिर्भर हों ।और ज़ाहिर सी बात है कि छीनने का मतलब सच में हाथ से कुछ छीन लेना नही बलकि इस तरह की परवरिश से है जिसमें निहित हो कि हर व्यक्ति के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता ज़रूरी है ।



an Indian homemaker की पिछली पोस्ट पर आईं टिप्पणियाँ इस विषय में बहुत ज़रूरी लग रही हैं ,देखें -


----pallavi trivedi said....

मेरी भी अभी तक शादी नहीं हुई है! कारण सिर्फ एक है कि अभी तक मुझे मेरी पसंद का जीवनसाथी नहीं मिला है जिसके साथ मैं सुखपूर्वक जिंदगी गुजार सकूं!सिर्फ इसलिए कि शादी एक काम है और उसे निपटाना है ,मैं शादी नहीं कर सकती ! मैं आत्मनिर्भर हूँ, बिना शादी किये भी जिंदगी खुश रहकर गुजार सकती हूँ! मैं शादी करना चाहती हूँ क्योकी मुझे एक companion चाहिए!लेकिन यह सही है कि अगर मैं आत्मनिर्भर नहीं होती तो आज से कई साल पहले मेरी शादी हो गयी होती! और मैं न करने कि स्थिति में नहीं होती!शादी का फैसला पूर्णतः निजी होना चाहिए और सही निजी फैसला लेने के लिए शिक्षा और आत्मनिर्भरता दोनों कि ज़रुरत है वरना कम उम्र में अक्सर लड़कियों को गलत फैसला लेते देखा गया है!लेकिन ये भी उतना ही बड़ा सच है कि कई परिवारों में लड़कियों कि परवरिश का उद्देश्य ही महज शादी करना होता है!



Lovely kumari said...

1>. sadi waikalpik honi chahiye aniwary nahi.
2>.bilkul sahi baat adhikans ladkiyan shadi ke liye lalayit hoti hain n sirf lalayit blki unhe yah sari samsyayon ka hal lagata hai.
3>.galat baat ka virodh jaruri chahen wah koi bhi kahe.
bilkul sachi baat jo is manch se kahi gayi.


गरिमा said...
क्या कहूँ, मै तो इस स्टुपिड से रिश्ते के बारे मे सोचना ही नही चाहती, छिन जायेंगे मौज के दिन.. अभी तो गाडी निकल रही है, आगे भी चलती रहे :)


neelima sukhija arora said...
आज दिन में अमृता प्रीतम की कम्मी और नन्दा पढ़ रही थी। कम्मी अपनी मां से पूछती है कि मां तुम बाऊजी को छोड़ क्यों नहीं देती, मां कहती हैं औरतें गीले आटे जैसी होती हैं, घर में रहती हैं तो उन्हें चूहे खाते हैं और बाहर कौए उन्हें नहीं छोड़ते। शायद ये बात शब्दों में हमें कभी नहीं कही जाती, लेकिन कौए ना खा पाए इसलिए किसी चूहे के हवाले कर दिया जाता है। बस चूहा ऐसा हो जो इस आटे को हमेशा गीला बना रहने दे। सूखने न दे।


रचना said...

आपने जो कुछ भी लिखा हैं उससे सहमत होते हुए मे सिर्फ़ एक बात कहना चाहती हूँ . स्वयं लड़की से महिला तक का सफर अविवाहित रह कर पूरा किया है इस लिये एक बात जानती हौं की लडकियां अपनी लड़ाई लड़ना ही नहीं चाहती . समय रहते वह अपनी माता पिता से विरोध ही नहीं करती . हम इसके लिये बहुत से कारण तलाश कर सकते हैं पर सबसे बड़ा कारन हैं की लड़किया , महिला अपने को हमेशा "अकेला " समझती हैं सब नहीं तो बहुत सी लड़किया ख़ुद शादी के लिये लालईत रहती हैं . उन्हे लड़का न भी पसंद हो तब भी शादी करती हैं क्योकि माँ बाप जहाँ करेगे वहाँ दहेज़ मिलेगा और अगर पति से ना या ससुराल मे ना बने तो बिचारे माँ - बाप हैं ही ताना मारने के लिये . जिन बातो का विरोध एक महिला शादी के बाद करते हैं उसको अपनी घर मे शादी से पहले क्यों नहीं करती ?? सही हैं लड़कियों को समझाया यही जाता हैं पर अपनी समझ का क्या , जब आप पढ़ लिख जाते हैं तो आप क्यों नहीं अस्सेर्ट कर के नौकरी करते हैं ? पता नहीं पर मुझे हमेशा लगता हैं की लड़किया ज्यादातर "सेल्फिश " होते हैं और केवल सुरक्षा , सुविधा से रहना और सामाजिक रूप से स्वंतंत्र हो जाना शादी करके जी हाँ हमारे समाज मे एक विवाहिता जितनी स्वतंत्र हैं एक अविवाहिता नहीं हैं . हो सकता हैं मे कुछ ज्यादा सवाल जवाब कर रही हूँ पर ख़ुद भी बहुत इसी विषय पर लिखती हूँ सो आप का लिखा देखा तो मन कर गया लिखने का .



siddharth said...
लड़कियों को उचित और पर्याप्त शिक्षा दी जाय ताकि वे अपने भविष्य का निर्धारण खुद कर सकें। इतनी बात तो सोलह आने सच है। लेकिन स्वतंत्रता केवल वैवाहिक बंधन से बाहर ही मिलेगी, यह सोच पुनर्विचार के योग्य है। ईश्वर ने स्त्री और पुरुष को अलग-अलग गुणों से परिपूर्ण करने के साथ-साथ बहुत सी समानताएं भी दी हैं।
इन दोनो बातों का सम्मान होना चाहिए और इन अद्‍भुत कृतियों (लड़की-लड़का) के बीच एक विवेकपूर्ण तालमेल की खोज करना चाहिए। विवाह नामक संस्था की स्थापना इसी खोज का नतीजा है। इसमें जो कमियाँ रह गयी हों उन्हे दूर करने का साझा प्रयास करना उचित और आवश्यक है, लेकिन इसे सिरे से ही ख़ारिज कर देना विवेक की कमी दर्शाता है।
विचारणीय मुद्दा उठाया है आपने। साधुवाद।

जितेन्द़ said...
एक स्‍त्री को बचपन से ही अनुकूलि‍त कि‍या जाता है कि‍ उसे पराये घर जाना है,ससुराल पक्ष की सेवा करनी है।कई बार मुझे खुद लगता है कि‍ वि‍वाह की यंत्रणा सहने से अच्‍छा है स्‍त्री का अवि‍वाहि‍त रहना। सुझाए गए सारे रास्‍तों से मैं सहमत हूँ ,ये जानते हुए कि‍ इनमें कई व्‍यवहारि‍क कठि‍नाइयां हैं।

Mrs. Asha Joglekar said...
बहुत सही मुद्दा उठाया है आपने । बहुत सी लडकियाँ लालायित होती हैं शादी करने के लिये । क्यूं कि माँ बाप के घर में जो हजारों बंदिशें उन पर होती हैं वे सोचती हैं कि शादी के बाद उनसे मुक्ति मिल जायेगी । माँ बाप सोचते हैं कि समाज को तो वे बदल नही सकते पर लडकियों को ही समाज के अनुसार ढाला जा सकता है तो वही करे ताकि लडकी सुखी (?) रहे ।
पर कुछ हिम्मत वाली लडकियाँ भी देखी हैं मैने जो शादी तभी करती हैं जब वे अपनी पसंद का जीवन साथी पा जाती ङैं । या ता उम्र अकेली और स्वतंत्र जीवन जीती हैं ।





swapandarshi said...
विवाह सस्था एक बडे एतिहासिक पडाव से होकर यहा तक पहुंची है. निश्चित रूप से वर्ग-विभाजन, कर्म-विभाजन, और सम्पति के मालिकाना हक़ के साथ ही ये भी अस्तित्व मे आयी है. पर फिर भी लगातार विवाह के भीतर भी परिवर्तन आये है और समय के साथ-साथ और भी आयेंगे.

हिन्दुस्तान के ही सन्दर्भ मे जन्हा पर एक समय मे स्त्री को पूर्ण स्वतंत्रता थी अपने जीवन साथी को चुनने की, आज के समय मे इसी का सबसे ज्यादा विरोध है. हिन्दु धर्म मे 12 तरह के विवाह, जिनमे प्रेम-विवाह भी शामिल है, को मान्यता है, परंतु प्रजापति -विवाह जिसमे पिता पुत्री का दान करता है, आज सिर्फ वही मान्य है.

और इसके भी अपने कारण है, अगर समाज सामंती है, व्यक्तिगत स्वतंत्रता स्त्री और पुरुष दोनो के लिये, नही है, या फिर परिवार और समाज व्यक्ति के लिये स्पेस नही छोड्ता है, तो व्यक्ति, चाहे वो स्त्री हो या पुरुष सिर्फ महज एक उपयोगी वस्तु बन जाता है. ज़िसका नियंता कोई दूसरा है.

जैसे कि समाज का पलडा पुरुष की तरफ है, तो पुरुष को स्त्री के मुकाबिले विवाह की संस्था थोडी राहत देती है, पर अगर ये मान लिया जाय कि पुरुष इस संत्रास से बाहर है तो थोडी बेईमानी होगी.

हमारे समाज के बडे हिस्से मे, पुरुष भी अपनी मर्ज़ी से शादी नही करते. उन्हें भी विवाह के मंच पर पिता एक उत्पाद की तरह बेच देता है, और दहेज की कीमत लेता है. पुरुष के परिवार, पत्नी और बच्चे तक एक तरह से बूढे मा-बाप के बिन खरीद दास होते है. इसमे जो कुछ भी परिवर्तन होता है, वो स्त्री की कभी हार न मानने वाली इच्छा शक्ति, त्रिया चरित्र और आज की बदली स्थिति से ही आया है. जब सन्युक्त परिवार की एक ईकाई स्वंतंत्र होकर सांस लेती है.

इसीलिये विवाह को खारिज़ कर देना, या फिर ये मान लेना कि प्रेम-विवाह हो गया, और मंपसन्द जीवनसाथी मिल गया तो सारी समस्या हल हो गयी, ये एक सरलीक़रण है.

प्रेम-विवाह भी अब एक हिस्से मे स्वीक्रित है, परंतु परिवार का सामंती स्वरूप, और प्रेम विवाह मे भी दहेज, स्त्री की दोयम दर्ज़े की स्थिति और और परिवार के भीतर नयी बहु के लिये एक व्यक्ति का सम्मान अभी भी दूर की गोटी है. मतलब् कि वो कैसे कपडे पहने, क्या खाय, क्या भजन् गाये या ना गाये, किससे मिले, घर से बाहर कब जाय, कब ना जाय, और परिवार के सदस्यो की बेगारी करें. अगर कमा कर लाये, तो उसका खुद इस कमाई पर कितना हक़ हो? बेटा पैदा करें कि बेटी? जैसे सवाल भी बेईमानी है. बहुत सी चीज़ो के लिये रोज़-बरोज़ जद्दोजहद करनी पडती है. कई बार ये भार प्रेम-विवाह वाले जोडो पर ज्यादा होता है.

कई बार प्रेम-विवाह से भी ज्यादा इस बात का महत्व है कि परिवार मे हर सदस्य को स्पेस मिले, आगे बढने के मौके मिले, और एक तनाव्मुक्त परिवारिक महौल मिले बच्चो को बडा होने के लिये. इसीलिये परिवार के स्वरूप मे जनवाद और व्यक्तिगत स्वतंत्र्ता और थोडी सी मानवता शामिल कर ली जाय तो शायद, स्त्री-पुरुष सब को राहत मिले.


इस पोस्ट के सन्दर्भ में आर.अनुराधा पोस्ट - अ फेयरी टेल बोले तो दुनिया की सबसे छोटी परी कथा
देखी जा सकती है ।