Monday, August 4, 2008

"मेरी दोस्त मंजू"

पिछले दिनों चोखेर बाली में लडके-लङकी की क्लासिफिकेशन मे कई बातें ऐसी उजागर हुई जो ये आज भी सिद्ध करतीं हैं कि हम चाहे कस्बे में रहे या एक विकसित शहर में, या फिर विकाशील राज्य का हिस्सा हों. कुछ नियम कानून लङकियों के लिये तय से हैं, मॉर्डनाइस सोच के पीछे जरूरी नहीं कि हम तुलनात्मक ना हों या फिर जो जैंडर क्लासिफिकेशन है वो करना छोङ दें. शायद ये समाज जो मर्दों द्वारा, मर्दों कि सहुलीयत और मर्दों कि शर्तों पर ही चलता है. खैर छोङिये, ये बात तो जग जाहिर हैं.
बात शादी को लेकर याद आ रही है तो सोचा आप सबसे भी बाँटू.
मेरी दोस्त मंजू, हम साथ एक बस में रोज़ आफिस के लिये आते-जाते थे, बस उसी दौरान उससे जान पहचान हुई और वो मेरी दोस्त बन गई फिर बातों का सिलसिला आगे बढा और मालूम हुआ कि वो अपनी शादी को लेकर परेशान है, क्योंकि उसके माँ-पापा को अपनी बिरादरी मे काबिल लङका नहीं मिल रहा, या शायद वो ज्यादा पढलिख गई है. रिश्ते तो कई आते लेकिन सभी में कोई ना कोई बदिशें होती जैसे वो शादी नहीं कोई कोन्ट्रैक्ट साईन करा रहे हों.
मंजू बहुत शांत स्वभाव की, पेशे से इन्टिरियर डैकोरेटर, समझदार, संवेदनशील और एक जिम्मेदार लङकी थी. दो बहनों और भाईयों के बीच सबसे बढी होने कि वजह से थोङी जिम्मेदारियाँ उस पर भी थीं. वो भी अपने मन मुताबिक अपना जीवन साथी चुनना चहती, लेकिन कभी घर वालों तो कभी समाज का सोचकर अपने विचार को बदल लेती और सिर्फ इतना ही सोच पाती कि घर वालों के मन मुताबिक और उनके बताये लङके के साथ ही उसे अपनी पूरी जिन्दगी गुजारनी होगी. बहुत जद्दोजहद के बाद एक रिश्ता आया, लङका पेशे से सिविल इंजिनियर था. यहाँ पर वो खुश थी कि कम से कम लङका पढा लिखा तो है, क्योंकी घर वाले तो सिर्फ शादी करना चाहते थे और कई बार ऐसे रिश्तों मे भी हामी भर आते जहाँ लङका चपरासी होता या फिर किसान.
इंजिनियर लङके के परिवार वालों को भी लङकी पंसद आ गई, खुले-आम दहेज कि मांग ने मज़ू को थोङा दुखी कर दिया. लङके वालो की दलील थी कि लङके को पडाने लिखाने में कई खर्चे हुये हैं और फिर जो भी आप दोगे आपकी बेटी के लिये ही होगा, जिसका उपयोग उसी को करना है. घर वाले पहले तो सोचते रहे कि इस रिश्ते को भी मना कर दिया जाये, लेकिन फिर वही ख्याल घर कर लेता कि अगर फिर से कोई अच्छा रिश्ता नहीं आया तो क्या करेगें. इसलिये कैसे भी करके दहेज़ कि डिमांड को स्वीकार लिया गया. बात गाङी माँगने से मोटर-साइकिल पर आकर खत्म हुई और अप्रैल मे मंजू कि शादी हो गई, हम लोग भी उसकी शादी में शामिल हुये.
वो शादी को लेकर खुश नहीं थी लेकिन इस बात का इतमिनान था कि माँ - पापा का बोझ कम हो गया है. वो अच्छा कमाती थी, माँ - पापा का ख्याल रखती, घर के अहम फैसलों पर अपनी राय देती, पापा से लाड करती, छोटे भाई - बहनों कि जरूरतों का ध्यान रखती फिर भी वो अपने को अपने परिवार पर एक बोझ जैसा महसूस करती.
शादी होने के बाद उससे सिर्फ एक बार बात हुई पूछने पर मालूम हुआ की ठीक है, यहाँ अपने देवर और पति के साथ रहती है. घर संभाल लिया है, और आफिस भी ठीक चल रहा है. माँ - पापा से मिल लेती है, ससूराल वाले ज्यादा खुश नहीं क्योंकी मन मुताबिक दहेज़ जो नहीं मिला था. देवर का व्यवहार ठीक नहीं, ताने देता है और पति उसे या अपने घर वालों को कुछ नहीं कह पाते, सिर्फ मंजू को सांत्वना दे देते है.

फिर उसने मुझे जून में फोन किया मेरे जन्मदिन पर, मुझे विश करने के लिये. आवाज़ में थोङा भारीपन होने कि वज़ह से बहुत बार पूछने पर बताया कि तबियत ठीक नहीं है, बुखार है दो दिन से इसलिये आफिस भी नहीं जा सकी. दो दिन बाद उसकी छोटी बहन का फोन आया कि मंजू नहीं रही. मैं सकते में थी ऐसा कैसे हो सकता है, अभी दो दिन पहले ही तो बात हुई थी उससे. उसके घर गये तो पता लगा कि शादी के बाद ही वो बीमार हो गई थी और कई दिनों तक माँ के घर ही रही, उसके ससूराल वालों ने एक बार भी उसे अपने पास रखने कि जहमत नहीं उठाई. ठीक होने पर वो वापस चली गई थी और बेहतर थी, अभी एक हफ्ते से ही वायरल था लेकिन पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि वो नहीं रही. उसकी माँ ने बताया आज शाम ५ बजे फोन पर बात हुई तो बता रही थी कि पडोस कि भाभी के घर बैठी है और ठीक है, पङोस कि भाभी से मालूम हुआ कि मंजू एकदम ठीक लग रही थी और कह रही थी कि कल से आफिस ज्वाईन करेगी और करीब ७ बजे अपने घर के वापस अपने घर चली गई क्यों की उसका देवर आ गया था. रात ८ बजे मंजू के घर फोन जाता है कि वो बहुत तेज़ बुखार में है, उसे कोई दवा दे दी है लेकिन वो बुरी तरह कांप रही है इसलिये अस्पताल ले जाया जा रहा है, अस्पताल पँहुचने से पहले ही उसने दम तोङ दिया.
वो आज हमारे बीच नहीं है लेकिन सिर्फ यादे हैं जो एक टीस पैदा करती हैं कि क्या लङकी का जीवन ये सब भोगने के लिये ही होता है. क्या सच लङकी होना एक पाप करने जैसा है?? जिसकी सजा अकसर भुगतनी होती है. हर कदम पर कुछ ऐसा जरूर हो जाता है जो ये अहसास दिलाता है कि हम लङकी हैं और उससे ज्यादा कुछ नहीं.
आज वो जहाँ कहीं भी हो दुआ करती हूँ कि खुश और खुशहाल हो. आमीन!!

59 comments:

जितेन्द़ भगत said...

शादी और उसके लि‍ए दहेज- ये दोनों ही चीज़े manage करने में वर्षो लग जाते हैं। इसके बाद ससुराल में जो कुछ घटा,वह काफी दुखद था और अंत तो और भी दर्दनाक था!लडकी की नि‍यति‍ को बदल पाना आसान नहीं है।

Unknown said...

मंजू पर जो गुजरी उसे पढ़ कर दुःख हुआ. एक प्रतिभावान व्यक्तित्व का ऐसा अंत किसी समाज और उस में रहने वालों के लिए शर्म की बात है. पर एक बात बताइए संगीता जी, आपने उस के मरने के बाद यह पोस्ट लिखी. उस के जीवन में आप ने उस को कोई अच्छी सलाह क्यों नहीं दी? उसकी शादी की मजबूरी आपने इस ब्लाग पर पहले ही सबके साथ क्यों नहीं बांटी? मंजू आप की दोस्त थी. क्या एक मित्र होने के नाते, एक नारी होने के नाते, चोखेरवाली ब्लाग से सम्बंधित होने के नाते यह आपका फ़र्ज़ नहीं बनता था कि आप उसे सही सलाह दें कि वह दहेज़ के लालची परिवार में विवाह न करे. क्या आपने एक बार भी अपनी दोस्त के माता-पिता से इस बारे में बात की? कितना आसान है घटना घट जाने के बाद उस पर टीका-टिपण्णी करना और दूसरों पर दोषारोपण करना.

संगीता मनराल said...

सुरेश जी, ये वाकया आज से ४ साल पहले का है. हम भी चाहते है कि ये समाज बदले और हमारी सोच के मुताबिक सभी की सोच हो जाये, लेकिन फिर भी हमारे देश का एक तबका स्त्री नितियों के लिये भरा पङा है, गाँव - गाँव तक टेलीफोन सुविधा है, बिज़ली है, इंडिया शानिंग है लेकिन फिर भी स्त्री शस्क्तिकरण के समीकरण कुछ और ही हैं.

गरिमा said...

संगीता जी क्या कहूँ, मेरी सहेली भी कुछ ऐसे ही हादसे का शिकार हो, जब उसकी शादी हूई थी, तब तो हम अभी बच्चे ही थे, और मौत हूई तब भी बच्चे ही थे, खैर बडे भी होते तो क्या कर लेते?
बोलते चिल्लाते, फिर....?

सबसे बडी दिक्कत यह है कि लडकियाँ अगर यह सोच लेती हैं कि माँ-बाप पर बोझ हैं, पर उस बोझ को हटाने का एक मात्र उपाय विवाह ही नही है, अन्य रास्ते भी हैं, पर ...

अभी कोई शब्द नही बन पा रहे हैं.. जो कुछ बोल सकूँ।

Unknown said...

संगीता जी, बाकया ४ साल पहले का हो या आज का, सवाल तो वही है कि एक नारी ने दूसरी नारी के लिए क्या? एक दोस्त ने दूसरे दोस्त के लिए क्या किया? आप चाहती हैं कि ये समाज बदले और आपकी सोच के मुताबिक सभी की सोच हो जाये, बहुत अच्छी बात है, पर इस सोच में दूसरों के लिए कुछ करने की इच्छा भी होनी चाहिए. क्या ४ साल बाद एक ब्लाग पर लिख देने भर से कर्तव्य की इतिश्री हो जाती है?

इन चार साल में बहुत सी स्त्रियों के सशक्तिकरण में आपने योगदान किया होगा.कृपा करके उस के बारे में भी बताइये. दूसरों को प्रोत्साहन मिलेगा. समाज पर और पुरुषों पर दोष लगाने मात्र से समस्या नहीं सुलझेगी. नारियों पर अत्याचार नारियों द्बारा भी होते हैं. नारी द्बारा नारी का शोषण बंद हो इस बारे में भी आप कुछ कर रही हैं क्या?

Unknown said...

गरिमा जी ने कहा, " बडे भी होते तो क्या कर लेते? बोलते चिल्लाते, फिर....? ........... सबसे बडी दिक्कत यह है कि लडकियाँ अगर यह सोच लेती हैं कि माँ-बाप पर बोझ हैं, पर उस बोझ को हटाने का एक मात्र उपाय विवाह ही नही है, अन्य रास्ते भी हैं, पर ...".

अब शिक्षित और सही सोच वाली महिलायें भी ऐसी निराशा की बात करेंगी तो बेचारी अशिक्षित या स्वयं को माता-पिता पर वोझ समझने वाली महिलाओं का क्या होगा? बोलने चिल्लाने के अलाबा क्या और कुछ और नहीं हो सकता उनके लिए? ब्लाग पर लिखा जा रहा है यह अच्छी बात है. ब्लाग से बाहर निकल कर, उनके पास जाकर, उनकी मदद करने के लिए आगे आना चाहिए. जब तक शिक्षित नारी अशिक्षित नारी की उनके बीच जाकर मदद नहीं करेगी, नारी जाति की प्रगति मुश्किल है.

Anonymous said...

जब तक लड़की के अभिभावक लड़कियों की शादी को उनके आर्थिक सक्षमता से ज्यादा महत्व देते रहेगे ऐसा ही होगा . जब तक लड़की के अभिभावक लड़की को कहते रहेगे ये तुम्हारा घर नहीं हैं ससुराल तुम्हारा घर हैं तब तक भी यही सब होगा .
और ये कहना की बाकी औरते क्या करती हैं इन महिलो के लिये इसका बहुत सीधा जवाब हैं हर औरत दूसरी औरत को सिर्फ़ सहनशीलता का पाठ पढाती हैं , पुरूष के अहम् को ऊपर रख कर गृह शान्ति का पाठ पढाती हैं और वोह इसलिये करती हैं ताकि "परिवार " बचा रहे . औरत मरती हैं तो मरने दो दूसरी मिल जायेगी पर "शादी " और " परिवार " को बचाना बहुत जरुरी हैं , अब भारतीये संस्कृति को बचाने के लिये एक औरत मर भी गयी तो क्या फरक पड़ गया . और मरी हैं तो भी बाकी औरतो की ही ग़लती हैं जिन्होने उसके लिये कुछ नहीं किया केवल ब्लॉग पर लिख दिया .आँख के अंधे नाम नयन सुख

सुजाता said...

सुरेश जी ,

मुझे लगता है आप समाज में मंजू जैसी लड़की के लिए कुछ नही करेंगे क्योंकि आप चोखेर बाली से नही जुड़े हैं !जैसा कि आपने कहा था मेरी तो आदत है ही पर्सनल होने की , आप की भी हो गयी है ।

पहली बात चोखेर बाली कोई एन जी ओ नही है ,यह एक वैचारिक मंच है ।{ पर लगता है आपकी उम्मीद जल्द पूरी भी होगी }।
हम सभी में स्थितियों को आलोचनात्मक तरीके से परखने और विश्लेषित करने की क्षमता होनी चाहिये और वक़्त व हालात पड़ने पर उसका सही जगह सही तरीके से उपयोग भी करना चाहिये इसमे कोई दो राय नही हो सकती।

जबकि हम सभी स्त्रियाँ एक खास तरह की जेंडरिंग प्रक्रिया के तहत पाली-पोसी जाती हैं तब ऐसे में शिक्षित और सक्षम हो जाने के बाद भी कई बार स्त्री व्यवस्था के षडयंत्र को नही समझ पाती , जो कि मंजू के साथ हुआ !सुरेश जी के तरीके से कहूँ तो मंजू चोखेर बाली से जुड़ी होती तो उसके हालात ऐसे न होते । दर असल चोखेर बाली से जुड़ने के लिए भी उस लर्निंग से अपने को मुक्त करना होता है जो लर्निंग स्त्री के रूप में अब तक स्त्रियों की हुई है ।

मैं पूरे विश्वास के साथ यह बात कह सकती हूँ कि जो स्थिति मेरे सामने आज से 5 साल पहले थी अगर आज होती तो मैं मेरे तेवर ही फर्क होते, वे बोल्ड हो जाते और शार्प हो जाते । एक गुलाम परम्परा में पलने के बाद भी अपनी लर्निंग को त्याग कर चोखेर बाली पर खुले आम सिस्टम को गरियाने की हिम्मत मुझमें भी आज से 5 6 साल पहले नही थी !एक पुरुष के पास जो पोज़ीशन और रौब और अहम जन्म के बाद से आने लगता है उसे हम स्त्रियाँ एक लम्बी प्रक्रिया के बाद हासिल कर पाती हैं ।

रचना जी की बाकी बातों से सहमत हूँ इसे छोड़कर --और मरी हैं तो भी बाकी औरतो की ही ग़लती हैं जिन्होने उसके लिये कुछ नहीं किया केवल ब्लॉग पर लिख दिया .आँख के अंधे नाम नयन सुख ।
इस बात में और सुरेश गुप्ता जी के दृष्टिकोण में कोई अंतर नही है !पुरुष भी स्त्री की स्थिति के लिए स्त्री को दोषी कहता रहता है और सारी बदलाव की प्रक्रिया से अपना पल्ला झाड़ ले जाता है ।अन्य स्त्री की मदद को इच्छुक स्त्री के पतियों -पिताओं को मैने नसीहत करते सुना है - तुम दूसरों के पचड़े मे मत पड़ो , या तुम अपना घर देखो ,तुम चुप रहना !

Unknown said...

रचना जी, अब आपके लेखन में तल्खी आती जा रही है. बैसे यह बात आपने सही कही, "हर औरत दूसरी औरत को सिर्फ़ सहनशीलता का पाठ पढाती हैं , पुरूष के अहम् को ऊपर रख कर गृह शान्ति का पाठ पढाती हैं और वोह इसलिये करती हैं ताकि "परिवार " बचा रहे . औरत मरती हैं तो मरने दो दूसरी मिल जायेगी". अब इन औरतों का सोच सही करने की जिम्मेदारी क्या आप जैसी शिक्षित और सही सोचने वाली महिलाओं की नहीं है? यह जानकारी काफ़ी महत्वपूर्ण होगी कि आप जैसी शिक्षित और सही सोच वाली महिलाओं ने कितनी अशिक्षित महिलाओं के जीवन में सुधार किया. यह दुःख की बात है कि अभी तक तो किसी ने ऐसी कोई जानकारी दी नहीं. बस ब्लाग पर ही बहादुरी दिखाई जा रही है.

लड़की के अभिभावक पुरूष और स्त्री दोनों होते हैं. पुरूष अविभावकों को ही दोष क्यों देती हें? कुछ दोष स्त्री अविभावकों को भी दीजिये. लेकिन आप तो स्त्रियों के दोष के लियेpar भी पुरुषों को ही दोष देंगी. अब आप मेरे लिये 'आँख के अंधे नाम नयन सुख' का प्रयोग करें तो अजीब सा लगता है.

Unknown said...

सुजाता जी, आप को ग़लत लगता है. मैंने पहले ही कहा है, "मंजू पर जो गुजरी उसे पढ़ कर दुःख हुआ. एक प्रतिभावान व्यक्तित्व का ऐसा अंत किसी समाज और उस में रहने वालों के लिए शर्म की बात है". मेरे आसपास अगर ऐसा होता तो मैं जरूर मंजू के साथ ऐसा नहीं होने देता. अपने कार्यकाल में ऐसे अनेक अवसर आए जब मैंने महिलाओं पर अत्याचार और यौन शोषण के ख़िलाफ़ आवाज उठाई. कुछ मामलों में अपराधी पुरुषों को सजा भी हुई. मंजू के साथ जो हुआ वह मैंने नहीं देखा पर संगीता जी ने देखा, पर उन्होंने मंजू की कोई मदद नहीं की.

चोखेरवाली मात्र एक बैचारिक मंच हो सकता है, पर मेरे लिये बिचार और कर्म दोनों जरूरी हें. केवल विचारों से बात नहीं बनती. मैंने यही बात कही है, "ब्लाग से बाहर निकल कर, उनके पास जाकर, उनकी मदद करने के लिए आगे आना चाहिए. जब तक शिक्षित नारी अशिक्षित नारी की उनके बीच जाकर मदद नहीं करेगी, नारी जाति की प्रगति मुश्किल है". बात मंजू जैसी स्त्रियों के चोखेरवाली से जुड़ने की नहीं है, चोखेरवालिओं को उनके पास जाकर उनकी मदद करने की है, उनके सोच को बदलने की है, उनके साथ संघर्ष में खड़े होने की है. यह दुःख की बात है कि चोखेरवाली मंच पर कोई शिक्षित नारी यह नहीं कहती कि उन्होंने नारी उद्धार के लिये कुछ किया, बस समाज और पुरुषों को बुरा कहना ही उनका एकमात्र उद्देश्य लगता है.

आप एनजीओ बना रही हें, अच्छी बात है, पर अगर आपके एनजीओ ने बाहर जाकर केवल पुरुषों के ख़िलाफ़ नारे ही लगाए तो कुछ भला होने वाला नहीं. पुरुषों को साथ लेकर चलिए. आप सही सोचती हें, बहुत अच्छी बात है, पर दूसरे भी सही सोच सकते हें. सही सोचने पर किसी का एकाधिकार नहीं हो सकता.

Anonymous said...

रचना जी की बाकी बातों से सहमत हूँ इसे छोड़कर --और मरी हैं तो भी बाकी औरतो की ही ग़लती हैं जिन्होने उसके लिये कुछ नहीं किया केवल ब्लॉग पर लिख दिया .आँख के अंधे नाम नयन सुख ।
sujata
i wish you had read in between these lines these were reply for suresh guptas comment that why we woman do nothing for woman
i really wish you should have understood आँख के अंधे नाम नयन सुख ।
was a staayer on the thinking of suresh gupta .
you mistook the whole comment
the society has a penchant to critisize everything the woman does and in this psot also suresh gupta found woman to be responsible for doing nothing
please reread the comment given by me and may be you will get the depth of it
and mr gupta please understand one thing that I AM NOT ANSWERABLE TO YOU . WHAT WE DO FOR WOMAN OR WHAT WE DONT DO FOR WOMAN SHOULD NOT BOTHER YOU AND YOU SHOULD NOT ASK US TO GIVE YOU AN EXPLANATION

सुजाता said...

रचना जी ,
सुरेश जी को दिये गये आपके जवाब से सहमत हूँ !आपके प्रयास सराहनीय है ।आपका सटायर भी समझ आया ।
सुरेश जी ,
चोखेर बाली एन जी ओ भी होता तो भी आपको कोई न कोई कष्ट ही रहता ।क्योंकि वह भी आपके मुताबिक तो काम नही कर पाता !!चोखेर बाली आपकी सोच मे लेश मात्र भी बदलाव नही ला पाया ....जबकि आप इसे इतना नियमित पढते हैं और जबकि यहाँ कोई नारेबाज़ी या ज़ोर ज़बरदस्ती नही है आप सोचिये कि यह काम कितना कठिन है और यह भी कि आप और बाकी सभी कहीं पुरुष सोच और व्यवहार को लेकर कहीं रिजिड तो नहीं है ?

ghughutibasuti said...

मंजू के बारे में जानकर दुख हुआ। सच कहूँ तो यहाँ हर दूसरे तीसरे घर में एक मंजू है। गुप्ता जी से उलझना नहीं चाहती। कुछ घाव हरे हो जाते हैं। हाँ, गुप्ता जी को इतना अवश्य कहूँगी कि अपनी बेटियों के साथ ऐसा नहीं होने दूँगी। यदि हर स्त्री समाज कल्याण न भी कर पाए, केवल अपनी बेटियों को ही सशक्त बनाए तो भी बहुत कुछ बदल सकता है। न इससे अधिक का दावा कभी किया है न करूँगी। गलत बातों में अपनी असहमति दर्ज कराना भी आवश्यक है। यह तो करती रहूँगी। वैसे एक बात और, जिस समाज में बेटियों को जन्म दे पाना ही एक साहसिक काम हो वहाँ हर दो एक बेटी की माँ एक तमगे की अधिकारिणी है।
घुघूती बासूती

Anonymous said...
This comment has been removed by a blog administrator.
Anonymous said...

sujata
our compassion on woman based issues will always over ride any personal differences . i was amazed when iread this post because before reading thi spost i had posted my post today on Nari . There is a stinking similarity . Do find time to read and see how Sangeeta Manrals Manju and My SUSHMA share the same agony

Anonymous said...

गलत बातों में अपनी असहमति दर्ज कराना भी आवश्यक है।
GB Mam
If all woman make this the moto . problems will be solved very soon

Unknown said...

मंजू का अंत दुखद तो था ही सबसे दुखद बात .े कि हमारी लडकियाँ अपने माँ बाप तक से खुल कर बात करने में असमर्थ हैं क्यूंकि माँ बाप की तरफ से भी एक दबाव रहता है कि जैसे भी हो उन्हें निभाना ही है । जरूरी है कि पढी लिखी लडकियाँ आत्म निर्भर बनें और जो पढीलिखी नहीं हैं वे भी कुछ पढकर या किसी प्रकार का ट्रेनिंग लेकर अपने पाँव पर खडी हों ताकि एसी नैबत न आये । इसके लिये हममें से हर एक अपने सम्पर्क में आने वाली लडकियों को बताये । सुरेश गुप्ता भी ।

सुजाता said...

आशा जी से सहमति है । न बोलने या चुप रहने की जो संस्कृतिया कहना चाहिये ट्रेनिंग लड़की को दी जाती है , वही उसकी जान लेती है । ऐसे में बाहर से कोई लाख समझाए असर होने की सम्भावनाएँ क्षीण रहती हैं क्योंकि ट्रेनिंग करने वाले ज़्यादा समीप के लोग होते हैं और संख्या में भी अधिक । मंजू जैसी लड़कियाँ जब तक स्वयम अपनी ट्रेनिंग नहीं उलट देंगी समस्या पर बाहर से हल लागाने और उसे हल करने की कोशिशें निरस्त होती रहेंगी । स्त्री के मामले में किसी एन जी ओ के हस्तक्षेप करते ही उन्हें घर तोड़ू महिलाएँ कहकर पीडित को फुसलाया जाता है । सच कहूँ तो एन जी ओ की कार्यप्रणाली में मेरा बहुत यकीन भी नही है , क्योंकि उनका सत्य भी देखा है ।
इसलिए अधिकांश ज़ोर इस बात पर होना चाहिये कि प्रत्येक स्त्री अपनी स्थिति का आलोचनात्मक परीक्षण कर सके । जिसे वह अपनी नियति मानती आयी है उसके पीछे छिपे उस सत्य को समझे जिसके लिए वे सभी पोस्ट्स ज़रूरी हैं जो अब तक चोखेर बाली पर लिखी गयीं हैं और आगे लिखी जाएंगी ।

सुजाता said...

लेकिन अतिशय मामलों में एन जी ओ जैसे संस्थानों की भूमिका बहुत अहम हो जाती है इसे नकारा नही जा सकता । और बहुत से एन जी ओ बहुत बेहतर काम करते हैं । यह भी सही है कि कुछ मामलों में विचार विमर्श से बात नहे बनती और वहाँ झगड़ना , संघर्ष करना , कानून व सम्विधान जैसी अन्य ताकतों का सहारा लेना आवश्यक हो जाता है ।

सुजाता said...

वैचारिक परिवर्तन के प्रयास होम्योपैथी है , एन जी ओ एलोपैथी है । दोनो अलग हैं और दोनो कारगर हैं । एक त्वरित निदान करता है , दूसरा देर से समस्या हल करता है पर स्थायी प्रभाव छोड़ता है
तेज़ बुखार में मैं होम्योपैथी का इंतज़ार नही करूंगी ,क्रोसिन या निमुलिड लेने भागूंगी । लेकिन पुरान साइनस हो या माइग्रेन मैं होम्योपैथी अपनाना चाहूंगी । शायद , मै सुरेश जी के लिए सरलतम उदाहरण दे पायी हूँ !:-)

Anonymous said...

शायद , मै सुरेश जी के लिए सरलतम उदाहरण दे पायी हू
rather inspire woman to change themselfs why try to change someone else . the moment the change will come in woman community that they are not answerable to everyone for every task they do the change will come in the society dear sujata

Anonymous said...

शायद , मै सुरेश जी के लिए सरलतम उदाहरण दे पायी हू
rather inspire woman to change themselfs why try to change someone else . the moment the change will come in woman community that they are not answerable to everyone for every task they do the change will come in the society dear sujata

Anonymous said...

शायद , मै सुरेश जी के लिए सरलतम उदाहरण दे पायी हू
rather inspire woman to change themselfs why try to change someone else . the moment the change will come in woman community that they are not answerable to everyone for every task they do the change will come in the society dear sujata

सुजाता said...

अनाम जी ,

वे नही बदलेंगे , पर गान्धी जी वाले हृदय परिवर्तन में थोड़ा बहुत यकीन है सो उसे आज़मा लेती हूँ कभी कभी । आपकी बात बिल्कुल सही है कि स्त्री को तो बदलना ही होगा अपनी सोच को !

संगीता मनराल said...

सुरेश जी, मैं कोई एन.जी.ओ. की कार्यकरता नहीं कि अनशन पर बैठ जाँऊ, या नारे बाज़ी करू, या फिर मिडिया से मिलकर इस पूरे मामले कि पङताल करू, यहाँ ये सब लिखने का मकसद सिर्फ इतना ही था कि लङकियाँ अपने पैरों पर भी खङी हों, शहर में रहती हों फिर भी स्थिती वही हैं| ये सच है कि समय बदल रहा है और स्त्री की छवि भी लेकिन कहीं ना कहीं ये अहसास भी होता है कि समाज का एक बडा तबगा अब भी उन सभी कायदे कानून में विश्वास रखता है.

मंजू पर मेरा हक था सो मैंने उसे समझाया, उसके माँ - पापा को भी आगाह किया लेकिन वो कहते हैं ना अकेला चना क्या भाङ फोङेगा. कई बार जब तक कुछ गलत ना हो जाये तब तक गलती का अहसास नहीं होता. आज भी उसके माँ - पापा अपने इस फैसले पर पछता रहे हैं.

रचना जी, आप सच बोल रही हैं, ये सब तो आज भी होता है घर परिवार को संजोये रखना, और कई जगह परिवार के लिये बङे - बङे त्याग करना औरतों कि ज़िम्मेदारी हैं. जहाँ मुझे गलत लगता है वहाँ पर मैं भी आवाज़ उठाती हूँ. लेकिन आप किसी को समझा सकते हो, स्पोर्टॅ कर सकते हो,आगाह कर सकते हो. तब तक कुछ कदम नहीं उठा सकते जब तक कुछ घटित ना हो जाये.

Unknown said...

रचना जी ने कहा, "and mr gupta please understand one thing that I AM NOT ANSWERABLE TO YOU . WHAT WE DO FOR WOMAN OR WHAT WE DONT DO FOR WOMAN SHOULD NOT BOTHER YOU AND YOU SHOULD NOT ASK US TO GIVE YOU AN EXPLANATION"

यह तो एक विचार-विमर्श है. आप अपने विचार रखती हैं, मैं अपने विचार रखता हूँ. आप इतना नाराज क्यों जाती हैं रचना जी? मैं आपसे जवाब मांगने वाला कौन होता हूँ? आप क्या करती हैं, आप क्या नहीं करती हैं, यह आपका व्यक्तिगत मामला है. मैं तो आपकी किसी बात का बुरा नहीं मानता. यह तो इस मंच पर विचार विमर्श हो रहा है. गुस्सा करने क्या होगा?

सुजाता जी ने कहा, "चोखेर बाली एन जी ओ भी होता तो भी आपको कोई न कोई कष्ट ही रहता ।क्योंकि वह भी आपके मुताबिक तो काम नही कर पाता !!चोखेर बाली आपकी सोच मे लेश मात्र भी बदलाव नही ला पाया".

मुझे आप के 'चोखेरवाली बैचारिक मंच' से कोई कष्ट नहीं है, और न ही आपके 'चोखेरवाली एनजीओ' से होगा. आप के अनुसार मेरी सोच में कोई बदलाब नहीं आया, पर मुझे तो लगता है कि चोखेरवाली पर कोई मेरे सोच को समझ ही नहीं पाया. आप नारी मुक्ति और प्रगति की समर्थक हैं और मैं भी. बस इस के लिए क्या किया जाय इसमें अन्तर हो सकता है. मैं सोचता हूँ कि जो हो गया है उसे बदला नहीं जा सकता, आगे ऐसा न हो इसके लिए प्रयत्न करना चाहिए. यह प्रयत्न केवल ब्लाग्स पर लिख भर देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, ब्लाग से बाहर निकल कर अशिक्षित और पुराने सोच से ग्रसित नारियों के बीच में जाकर काम करना भी बहुत जरूरी है, और यह सब किसी पर दोषारोपण किए बिना करना है. कहीं न कहीं समाज का हर सदस्य दोषी है, अगर दोष देने में ही लगे रहे तो कुछ नहीं कर पायेंगे. बापू ने कहा था, 'पाप से नफरत करो पापी से नहीं'. मुझे तो अपने इस सोच में कोई बुराई नजर नहीं आती. इसलिए मैं चोखेरवालिओं के सोच को बदलने की कोशिश कर रहा हूँ. आपको यह जानकर अजीब तो लगेगा पर यही सच है.

घुघूती बासूती जी ने बहुत अच्छी बात कही है, पर इस में उलझने जैसी बात कहाँ से आ गई?

आशाजी की बात से मैं भी सहमत हूँ, पर आशाजी आपने 'सुरेश गुप्ता भी' कहना जरूरी समझा इस पर मुझे आश्चर्य है. आपसे सहमति जताते हुए सुजाता जी ने कहा, "ऐसे में बाहर से कोई लाख समझाए असर होने की सम्भावनाएँ क्षीण रहती हैं क्योंकि ट्रेनिंग करने वाले ज़्यादा समीप के लोग होते हैं और संख्या में भी अधिक । मंजू जैसी लड़कियाँ जब तक स्वयम अपनी ट्रेनिंग नहीं उलट देंगी समस्या पर बाहर से हल लागाने और उसे हल करने की कोशिशें निरस्त होती रहेंगी।" ऐसा वह लोग कहते हैं जो अपनी जिम्मेदारियों से बचना चाहते हैं. इस सोच के होते तो मंजू जैसी नारियां हमेशा अकेली रहेंगी. सब कुछ वह ही कर लेंगी तो 'चोखेरवाली बैचारिक मंच' और 'चोखेरवाली एनजीओ' की क्या जरूरत है?

सुजाता जी का सरलतम उदाहरण दिलचस्प है पर इस समस्या पर फिट नहीं होता.

यह अचानक ही कोई चोखेरवाली बेनामी क्यों बन जाती है? बैसे इन का सुझाव सही है, "inspire woman to change themselves". पर इसके लिए ब्लाग से बाहर जाना होगा, जिन्हें इस की जरूरत है उनमें अधिकांश अशिक्षित हैं और आपके ब्लाग के बारे में तो उन्हें पता भी नहीं होगा.

और एक बात, मैंने न बदलने की कसम नहीं खा रखी है. पर मेरा अनुभव कहता है कि मेरा सोच सही है.

Anonymous said...

श्री सुरेश गुप्ता को हमेशा लगता हैं की उनकी बात को कोई समझना नहीं चाहता , उनके अनुभवों से कोई सीखना नहीं चाहता . कभी उन्हे रचना नाराज़ लगती हैं , कभी उन्हे सुजाता पर्सनल होती दिखायी देती हैं , कभी उन्हे घुघूती बासूती का कमेन्ट सही लगते हुए भी उसका टंच नहीं समझ आता और फिर आशा का कहना भी उनको सही नहीं लगता . एक बात जो उनको नहीं दिखती की पूरा ब्लॉग का स्त्री समाज एक सुर मे उनको गलत बता रहा , इनके आये हुए कमेन्ट केवल इस पोस्ट के नहीं पुराने ना जाने कितने पोस्ट के और ना जाने कितने स्त्री विमर्श के अन्य ब्लॉग पर औए इनके कमेन्ट और लेख केवल ब्लॉग समाज मे लेखन करती स्त्रियों के प्रति इनके कुंधित मन को दीखते हैं . इनके एक कमेन्ट मे ये रचना के नारी ब्लॉग पर लिखते हैं "अब जिन नारियों की यह जरूरतें विवाह के बिना पूरी हो जाती हैं तो उन्हें विवाह करने की कोई जरूरत ही नहीं है. कानून भी बिना विवाह किए साथ रहने की मंजूरी देता है. कुछ पुरूष यदि इस का विरोध करते हैं तो उस की परवाह करने की कोई जरूरत नहीं हैं. यह प्रगतिशीलता का युग है. नारी को प्रगति की नई राहों पर चलते रहना चाहिए" https://www.blogger.com/comment.g?blogID=5725786189329623646&postID=7146706068044107817
और अपने ब्लॉग पर ये लिखते हैं चोखेर बाली के लिये . " मुझे एक दूल्हा चाहिए. मैं एक प्रगतिशील नारी हूँ. मेरा नाम है ........... जाने दीजिये, क्या करेंगे मेरा नाम जानकर. बैसे, नारी प्रगति के विरोधी मुझे 'आंख की किरकिरी' के नाम से जानते हैं. मैं विवाह की संस्था को दकियानूसी और नारी के विरुद्ध एक षड़यंत्र मानती हूँ. आप कहेंगे फ़िर मुझे दूल्हा किसलिए चाहिए? दरअसल मेरी मां ने यह धमकी दे दी है कि अगर मैं विवाह नहीं करूंगी तब वह आत्महत्या कर लेंगी. अब अपनी मां की जान बचाना मेरा कर्तव्य बन जाता है.

दूसरा कारण यह भी है कि जिस पुरूष के साथ मैं लिव-इन-रिलेशनशिप में रहती थी," http://samaaj-parivaar.blogspot.com/2008/07/blog-post_20.html
इनके लेखो मे समाज सुधार कम और सुजाता और रचना के कम्युनिटी ब्लॉग के प्रति एक पूर्वाग्रह ज्यादा दीखता हैं . नारी ब्लॉग पर अब इनका जाना कम होगया हैं क्योकि वहाँ मोडरेटर ने लिख दिया हैं की अगर नारी को गाली देनी हैं तो यहाँ मत आए . चोखेर बाली मंच पर बार बार अपने विचार दे कर इनको लगता हैं की ये उन सब महिला की सोच को बदल देगे कभी भी इनके घर की किसी महिला को ब्लॉग लिखते नहीं देखा या उनका कोई कमेन्ट भी नहीं पढा क्या इनके घर मे स्त्री को कंप्यूटर पर आने की जरुरत नहीं महसूस होती ?? क्या उनकी जिन्दगी इनकी बनी चार दीवारों मे ख़तम हो जायेगी ??
रिटायर होने के बाद समय बहुत होता हैं , सुरेश को चाहिये की अपने घर की महिलो को प्ररित करे और सीखाये ब्लॉग लेखन . उनको चोखेर बाली , नारी ब्लॉग की मंद बुद्धि महिलाओ से संवाद करना चाहीये ताकि इन सबको उनका दृष्टीकोंद पता लगे . बस एक ही खतरा हैं पता नहीं कहीं आप की घर की महिला भी एक नया नारी विमश ब्लॉग ना बना ले ये बार बार दम्भित हो कर अपने ऑफिस मे किये हुए कार्य का जिक्र करते रहते हैं पर पिछले तीन महीनो से जब से इनका पहला ब्लॉग बना हैं इन्होने आज तक अपनी पत्नी या पुत्रवधू को ब्लॉग लेखन के लिये प्रेरित नहीं किया हैं .

Unknown said...

बेनामी जी, आपकी टिपण्णी बहुत दिलचस्प है. पर आप बेनामी होकर क्यों लिखती हैं? आपका कोई नाम तो होगा. बैसे आपने बहुत समय नष्ट कर दिया मेरे बारे में और मेरे परिवार के बारे में लिखने के लिए. इस में कुछ ऐसा भी है जो शिष्टाचार की लक्ष्मण रेखा को लाँघ रहा है. आप सब उम्र में मुझसे छोटी हैं. वैचारिक मंच पर शिष्टाचार जरूरी है. अब आप शायद यह कहेंगी कि 'में कौन होता हूँ आपको शिष्टाचार समझाने वाला? मेरी मर्जी है मैं जैसे चाहे लिखूं.'

सुजाता, रचना, सुरेश, चोखेरवाली, नारी, यह कुछ नाम हैं जो ब्लाग्स ( वैचारिक मंच) पर विचार रूप में नजर आते हैं. बहुत से विचार मिल जाते हैं. बहुत से नहीं मिलते. चोखेरवालिओं को लगता है कि मेरे विचार उन से नहीं मिल रहे. मुझे लगता है उनके और मेरे विचारों में कोई फर्क नहीं है. फर्क अगर है तो इतना कि समस्या को कैसे सुलझाया जाय.

Anonymous said...

जो शिष्टाचार की लक्ष्मण रेखा को लाँघ रहा है. आप सब उम्र में मुझसे छोटी हैं. वैचारिक मंच पर शिष्टाचार जरूरी है.
आप के दोनों कमेन्ट लिंक के साथ ऊपर दिये हैं वो किसी शिष्टाचार की परिधि मे आते हैं ? सामजिक शिष्टाचार भी होता हैं . कोई उम्र मे बड़ा हो तो इसका मतलब ये नहीं होता हैं की वो गाली देता जाए और बाकि सब सुनते जाए . इसे dictatorship कहा जाता हैं . आप किसी भी महिला के प्रति कुछ भी कहते रहे वैचारिक मतभेद के नाम पर और सब उसको मान ले जरुरी नहीं . आप के आपतिजनक शब्दों को क्यों सुना या पढा जाए . बहुत से पुरुषों मे आदत होती हैं "सबका पिता बनने की ताकि वो सबको समझा सके . जब कही professional बात करे तो उम्र और रिश्तो से हट करे . बड़ा इंसान उम्र से नहीं सोच से होता है उम्र का अपरिपक्व सोच से कोई लेना देना नहीं हैं . शुरू करवाए अपने घर की स्त्रियों के ब्लॉग ताकि उनसे भी बात हो सके आप को तीन महीने मे काफी पढ़ लिया और समझ भी लिया . जितने प्रगतिशील पुरूष होते हैं वो अपने घर मे tyrant देखे गए हैं

Anonymous said...

To All
Please conserve all the sparks coming very frequently from inside.
Be like a river, think, think about the solution rather arguing and blaming each other.
An there is a famous quote that arguing with a fool proves there are two.
So if u think someone is fool and you are the intelligent one then don't argue because solution comes by the cool and calm discussion.

Anonymous said...

संगीता जी ने कहा-सुरेश जी, ये वाकया आज से ४ साल पहले का है. हम भी चाहते है कि ये समाज बदले और हमारी सोच के मुताबिक सभी की सोच हो जाये, लेकिन फिर भी हमारे देश का एक तबका स्त्री नितियों के लिये भरा पङा है, गाँव - गाँव तक टेलीफोन सुविधा है, बिज़ली है, इंडिया शानिंग है लेकिन फिर भी स्त्री शस्क्तिकरण के समीकरण कुछ और ही हैं.......

मैँ संगीता जी से पूछना चाहता हूँ किस समीकरण की बात वो कर रही है?

और ऐसे पक्षवादी विचार किसी बुधिजीवी की ओर से शोभा नही देती...

हमेशा चाहे पुरुष हो या महिला समीकरणो की ही बात क्युँ करे, क्युँ न हम उन समीकरणो को बदलने की बात करे अगर हम सही मे मानवता के पक्ष मे हैँ।

हम उन अभिभावको की बात क्युँ करे जो की गलत समीकरणो पे चलते हैम, हम अपनी बात क्युँ ना करे जो कि खुद एक भावी या वर्तमान मे अभिभावक है।

अगर हम अकेले खुद को बदलते है तो यह देश के 1/10000000000 लोगो का बद्लाव है।

मेरे अनुसार तो अगर हम खुद को प्रकाशित करने मे सक्षम है तो आसपास का प्रकशित होना तो लाज़मी है....
अतः जरूरत है हमे वचंबद्ध होने ताकि हमारे आगे कि पीढि मे ऐसी घटनाये ना हो पाये....


गौरव

Unknown said...

बेनामी जी,मैंने किसी को गाली नहीं दी. आप ऐसा क्यों कह रही हैं? अगर मेरी किसी बात ने आपको इतना कष्ट पहुंचाया है कि आप उसे गाली मान रही हैं, तो मैं माफ़ी मांगता हूँ. मेरा इस ब्लाग पर आने का उद्देश्य आपको गाली देना नहीं है.

Anonymous said...

माफ़ी मांगने के लिये धन्यवाद . आगे से किसी की पीडा को पढे तो ये अवश्य ध्यान दे की पीडा को लिखना उस पीड़ा से दुबारा निकलना होता हैं . भाषण देना बहुत आसन हैं और स्त्री के हर काम पर आलोचनातमक कमेन्ट करना और भी बहुत आसन हैं . कभी स्त्री जो घरो मे चार दिवारी मे बंद हैं और जिन को ये समझाया जाता हैं " यही स्त्री होने का धर्म हैं , पति की सेवा , चूल्हा चौका और धार्मिक ज्ञान भरी पुस्तकों को पढ़ना , बच्चे का पालन पोषण " उनसे पूछ कर देखे की वो चाहती क्या हैं ??

अनूप भार्गव said...

Anonymous said...
भाषण देना बहुत आसन हैं -----
-----
वास्तव में भाषण देना बहुत आसान है यदि वह ’बेनामी’ के पर्दे में दिया जाये जैसा कि आप कर रहे/रही हैं । मुझे एक भी कारण समझ नहीं आता कि इस तरह के ब्लौग पर टिप्पणी करने के लिये Annonymous के पर्दे में छुप कर अपनी बात कहनी पड़े । सुरेश जी चाहे गलत या सही , जो सोचते हैं, उसे गालियां खाते हुए भी डंके की चोट कह तो रहे हैं ।
एक सवाल और पूछना चाहूँगा कि मंजु नें पढे लिखे होने के बावज़ूद शादी से पहले और शादी के बाद अपने आत्म विकास और सुरक्षा के लिये कितने प्रयत्न किये ? कड़वा सच है लेकिन इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता जब की शोषण करने वाले वर्ग ने स्वेच्छा से अपने शोषण के अधिकारों का समर्पण कर दिया हो । पहली आवाज़ शोषित की ओर से ही उठनी होगी । ज़रूरी नहीं कि हर शोषित की उठने वाली आवाज़ सफ़ल ही हो लेकिन हर उठने वाली आवाज़ भविष्य में उठने वाली आवज़ को सरल ज़रूर कर देगी ।

Anonymous said...

श्री अनूप भार्गव जी अगर आप को लगता हैं चोखेर बाली मंच पर " Annonymous " को कमेन्ट नहीं करना चाहिये तो इस सुविधा को दिसबले करवा दे. आज़ादी की लड़ाई मे बहुत सी हिंदू औरते बुर्के मे रहती थी , बहुत से क्रांतिकारी भेष बदल कर काम करते थे . सुरेश डंके की चोट पर गाली देते हैं तो गाली खाते हैं . हम भी डंके की चोट पर ही कर रहे हैं और नाम का क्या हैं कौन जानता हैं अंतरजाल पर किसका नाम क्या हैं और किसका नाम कितना सच्चा और सही हैं . यहाँ वहाँ जा कर स्त्री ब्लॉग पढ़ना और उनपर अपनी भडास निकलना और वो भी वैचारिक !!!!!! . डंके की चोट पर बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो इतिहास मे अपना नाम दर्ज नहीं करना चाहते पर शोषण के खिलाफ अपनी आवाज जरुर उठाते हैं और अगर ऐसा न होता तो इतनी अनाम कवियों की कविता और क़ुओततिओन्स हमारे साहित्य मे ना मिलते . सुरेश जगह जगह जो परोस रहे हैं उसको जरुर पढे . ये मंच मेरा नहीं है अगर सूत्रधार मना करदे तो पुनेह वापसी भी नहीं है पर तब तक अनाम ही सही . नाम के साथ गलत काम करे से और गलत का साथ देने से अनाम हो शोषण का विरोध करना और फिर आप के शब्दों मे पहली आवाज शोषित की होगी तभी आगे आने वालो का रास्ता आसन होगा .

आर. अनुराधा said...

बहुत अफसोस हो रहा है देखकर कि अच्छी खासी बहस एक गलत दिशा में जाने लगी है। वैसे कोई जानना चाहे तो- दुनिया के लगभग सभी बेहतरीन, पॉपुलर ब्लॉगर गुमनाम या नकली नाम से लिखते हैं। इसके बावजूद वे अपने छद्म नाम से खासे लोकप्रिय हैं। वहां उनकी सच्ची पहचान और निजता का छुपना कहीं भी वैचारिक विमर्ष के आड़े नहीं आता। ये तो हम नए-नए ब्लॉगर्स हैं जो नादानी, सरलता में अपनी सही पहचान, चेहरा सब कुछ सामने ला देते हैं। इसमें भी पहचान बताने वाले को कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन समस्या उन लोगों को होती दिख रही है जो ब्लॉगर को एक वैचारिक व्यक्तित्व की जगह 'व्यक्ति' समझ कर टिप्पणियां करते हैं। मैं इस वैचारिक विमर्ष के मंच पर किसी पर निजी टिप्पणी के हमेशा खिलाफ रही हूं। वैसे तो हम ब्लॉगर, लोगों को उनकी ब्लॉगर पहचान से ही जानते हैं, उससे ज्यादा नहीं। इसलिए बेहतर हो किसी की निजता पर कोई टिप्पणी न की जाए।

इसी संदर्भ में, कोई अनामी हो या सनामी, किसी को क्या तकलीफ है। अगर कोई यहां अपनी ज्यादा उम्र का रौब दिखाने की कोशिश करे तो लोग तो हंसेगे ही क्योंकि ब्लॉगर एक बच्चे या बुजुर्ग की तरह नहीं बल्कि एक विचार की तरह विमर्ष में शामिल होता है। यहां वह न चाचा-मामा-ताऊ होता है और न नानी-दादी-मौसी या बुआ। विचार को विचार से ही काटें या सहमति दें। यह आम सहमति वैसे तो प्रबुद्ध लोगों में खुद ही बन सकती है, लेकिन अभी जो हाल मैं देख रही हूं उसकी प्रतिक्रिया में यह सब कहना पड़ा है। उम्मीद है हम सब ब्लॉगर चोखेर बाली और दूसरे ब्लॉगों पर यह अनुशासन बनाए रखने का ध्यान रखेंगे।

अनूप भार्गव said...

Annonymous जी :

न तो चोखेर बाली मेरा ब्लौग है और न ही मुझे वहां पर Annonymous Comments को बन्द करवाने मे रुची है । मुझे जो कहना था , मैं कह चुका हूँ । Annonymous टिप्पणी का ज़वाब देना मेरे लिये दीवार से बात करना है और मुझे उस में कोई विशेष आनन्द नहीं आता । अपने को आज़ादी की लड़ाई लड़ने वालों और क्रान्तिकारियों से तुलना कर के उन का अपमान न कीजिये । मेरा आप से यह आखिरी संवाद है , यदि अपने नाम के साथ कुछ कहने का साहस जुटा सकें तो ज़रूर गुफ़्तगु होगी ।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

@ आर.अनुराधा
“यह आम सहमति वैसे तो प्रबुद्ध लोगों में खुद ही बन सकती है,...”
मुझे भी यही आशा रहती है। लेकिन यहाँ जो पढ़ने-सुनने को मिल रहा है, वह प्रबुद्धता का बेहतरीन उदाहरण कत्तई नहीं है। यहाँ समस्या का समाधान खोजने के बजाय एक दूसरे के आत्मसम्मान को कुरेदने और चोट पहुँचाने का प्रयास अधिक दिख रहा है। मुझे तो ऐसी जगहों पर आने में ही डर लगने लगा है। जाने कौन सी बात इन लड़ाकों को अखर जाय? और इनकी ऊर्जा फालतू में ज़ाया हो।

Anonymous said...

इसी संदर्भ में, कोई अनामी हो या सनामी, किसी को क्या तकलीफ है। अगर कोई यहां अपनी ज्यादा उम्र का रौब दिखाने की कोशिश करे तो लोग तो हंसेगे ही क्योंकि ब्लॉगर एक बच्चे या बुजुर्ग की तरह नहीं बल्कि एक विचार की तरह विमर्ष में शामिल होता है।
@ आर.अनुराधा
धन्यवाद इस बात को कहने के लिये . अफ़सोस बस इतना हैं की बाकी चोखेर बालियाँ चुप ही रह गयी हैं . ग़लत को स्वीकारना ही सबसे बड़ी ग़लती हैं .
@ anup haargav
Annonymous टिप्पणी का ज़वाब देना मेरे लिये दीवार से बात करना है और मुझे उस में कोई विशेष आनन्द नहीं आता ।
सालो से औरते दीवारों से ही सर टकरा रही हैं . उन चार दीवारों से जहाँ उनकी बात कोई नहीं सुनता . और
"आज़ादी की लड़ाई लड़ने वालों और क्रान्तिकारियों से तुलना कर के उन का अपमान न कीजिये ।"
दुसरो के मान अपमान की इतनी चिंता ना करे बहस करे जितनी चाहे करे अपने नाम और आक्रोश से ना डराए क्योकि मंजू बहिन थी मेरी और उसे जो करना पडा उसका अंजाम आगे आने वाले भविष्य को भुगतना नी होगा . मंजू मरी नहीं शहीद हुई हैं वो ना लड़ सकी पर रास्ता खोल गयी हैं .

Unknown said...

बेनामी जी, मैंने आपको कोई गाली नहीं दी. यह बात मैं फ़िर इसलिए कह रहा हूँ कि आप बार-बार मेरा नाम लेकर यही दोहराए जा रही हैं कि मैंने आपको गाली दी है. मैंने कोई गाली नहीं दी फ़िर भी मैंने सोचा कि किसी की भावनाएं आहत हुई हैं, इसलिए मुझे खेद प्रकट करना चाहिए. वह मैंने किया. लेकिन मुझे इस बात का दुःख है कि इसे भी एक गाली ही समझा गया. खैर अगर आपको इसी से सुख मिलता है तो यही सही.

Dr. Ravi Srivastava said...

आज मुझे आप का ब्लॉग देखने का सुअवसर मिला।
वाकई आपने बहुत अच्छा लिखा है। आशा है आपकी कलम इसी तरह चलती रहेगी
और हमें अच्छी -अच्छी रचनाएं पढ़ने को मिलेंगे
बधाई स्वीकारें।
आप मेरे ब्लॉग पर आए, शुक्रिया.
मुझे आप के अमूल्य सुझावों की ज़रूरत पड़ती रहेगी.
Really i like it and desirous to get your all new creations.

...रवि
http://meri-awaj.blogspot.com/
http://mere-khwabon-me.blogspot.com/

सुजाता said...

अनाम कमेंट से कोई दिक्कत नही होनी चहिये । ब्लॉग ही क्यों साहित्य ने भी हमेशा इस बात की सुविधा दी है कि उपनाम से लिखा जाए और विचार सामने आए ।एक पूरी पोस्ट जब फूहड़ तर्क {या कहना चाहिये कुतर्क}की भेंट चढ जाती है तो दुख होता है ।इसलिए गलत का जवाब देना ज़रूरी है पर आगे बढते रहना भी बहुत ज़रूरी है ।जैसा कि आज की पोस्ट मे अनुराधा जी ने कहा कि कम से कम आप सोचें तो सही , यही शुरुआत नही होती ,आगे कैसे बढा जाए ! सुरेश जी का दावा है कि वे चोखेर बालियों की सोच बदलना चाहते हैं । उनका यहाँ सदा स्वागत है , पर यदि उनका इरादा सोच बदलने का है तो मुझे बहुत खेद है ।

अनूप भार्गव said...

सुजाता:

- अनाम टिप्पणियो से मुझे कोई दिक्कत नहीं है , यह मेरा निजी फ़ैसला है कि मैं किसी Annonymous से सार्थक संवाद नहीं कर सकता ।

- पहले अनाम की तुलना ’क्रान्तिकारियो और आजादी में लड़ने वालों से की गई’ अब साहित्यकार जो उपनाम से लिखते हैं, उन से की जा रही है । Annonymous टिप्पणियों की तुलना निश्चित रूप से हरिवंशराय जी के ’बच्चन’ और सम्पूरण सिंह के ’गुलज़ार’ उपनाम से लिखने से नहीं की जा सकती । लेखन के लिये अपना नया नाम चुनने और ’अनाम टिप्पणियां’ लिखने में अन्तर है ।

- ’फ़िक्शन’ में अनाम की बात फ़िर भी समझ आती है लेकिन किसी ऐसे विचारक का ध्यान नहीं आता जिस नें अपनी बात Annonymous कही हो, जिस की आइडेन्टिटी पता न हो और उसे गम्भीरता से लिया गया हो ।

- यह कोई co-incidence नहीं है कि ब्लौग ज़गत में अक्सर below-the-belt और बेहूदा टिप्पणियां Annonymous ही आती है । When you don't have to own what you say, it is easy to say anything. You think twice when your name is attached to something.
- कुछ कारण ही होगा कि न्यूयार्क टाइम्स और अन्य सभी प्रतिष्ठित समाचार पत्र सम्पादक के नाम पत्र (Letter to Editor में ’अनाम’ पत्र की आज्ञा नहीं देते ।
- यदि कोई अपनी बात Annonymous हो कर इसलिये कह रहा है कि वह वास्तव में पीड़ित है और अपना नाम उजागर करने से उसे और परेशानी हो सकती है तो हमें सब से पहले उस की मदद करनी चाहिये । यदि ऐसी बाध्यता नहीं है तो Annonymous टिप्पणियॊं के पीछे ’कायरता’ ही नज़र आती है ।

- विषयान्तर का इरादा नहीं था , इसलिये अपनी दूसरी बात जो मैनें अपनी पहली टिप्पणी में कही थी (और जिस का ज़वाब सुनने को नहीं मिला) , दोबारा से अलग ’पोस्ट’ कर रहा हूँ ।


अनूप

अनूप भार्गव said...

मंजु और उस के परिवार से सहानुभूति जता लेने और उस के ससुराल वालों को दोषी ठहरा लेने के बाद अगला सवाल यह उठता है कि :
- मंजु नें पढे लिखे होने के बावज़ूद शादी से पहले और शादी के बाद अपने आत्म विकास और आत्म सुरक्षा के लिये कितने प्रयत्न किये ? कड़वा सच है लेकिन इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता जब की शोषण करने वाले वर्ग ने स्वेच्छा से अपने शोषण के अधिकारों का समर्पण कर दिया हो । पहली आवाज़ शोषित की ओर से ही उठनी होगी । ज़रूरी नहीं कि हर शोषित की उठने वाली आवाज़ सफ़ल ही हो लेकिन हर उठने वाली आवाज़ भविष्य में उठने वाली आवज़ को सरल ज़रूर कर देगी ।

- यदि मंजु नें बिल्कुल प्रयत्न नहीं किये तो यह कुछ हद तक उस की गलती है और यदि उस नें प्रयत्न किये और सफ़ल नहीं हुई तो यह उस का आगे वाली पीढियों के लिये योगदान और आहुति है ।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

देख चिठेरे सह रहे, यूँ नेट पर उत्पात।
बिना नाम की टिप्पणी, बिन मर्यादा बात॥

बिन मर्यादा बात,बड़ी तकरार बढ़ाती।
उत्साहित ब्लॉगरजी की त्यौरियाँ चढ़ातीं॥

सुन सत्यार्थमित्र की चिन्ता विकट बढ़े रे।
भुगत रहे आघात, टिप्पणी देख चिठेरे॥

सुजाता said...

कड़वा सच है लेकिन इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता जब की शोषण करने वाले वर्ग ने स्वेच्छा से अपने शोषण के अधिकारों का समर्पण कर दिया हो । पहली आवाज़ शोषित की ओर से ही उठनी होगी । ज़रूरी नहीं कि हर शोषित की उठने वाली आवाज़ सफ़ल ही हो लेकिन हर उठने वाली आवाज़ भविष्य में उठने वाली आवज़ को सरल ज़रूर कर देगी ।
-------
अनूप जी ,
आपकी इस बात से पूर्ण सहमति है कि शोषण करने वाले वर्ग ने स्वेच्छा से अपने शोषण के अधिकारों का समर्पण कर दिया हो ।
लेकिन इस सन्दर्भ में गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक का लेख "कैन दि सबाल्टर्न स्पीक ?" अवश्य देखें ।
दूसरी बात ,
मंजू का सोशिओ-इकॉनमिक बैकग्राउंड देखा जाना बहुत ज़रूरी है ।उसने आवाज़ नही उठाई इसलिए उसका मर जाना उचित है ऐसा तो नही कह सकते न !सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट के सिद्धांत ने आधुनिकता का जितना भी उपकार किया हो निर्बलों को शोषित होने देने के लिए कॉर्पोरेट के हाथ मे तर्क का हथियार ज़रूर थमा दिया है ।

सुजाता said...

जब की शोषण करने वाले वर्ग ने स्वेच्छा से अपने शोषण के अधिकारों का समर्पण कर दिया हो । पहली आवाज़ शोषित की ओर से ही उठनी होगी । ज़रूरी नहीं कि हर शोषित की उठने वाली आवाज़ सफ़ल ही हो लेकिन हर उठने वाली आवाज़ भविष्य में उठने वाली आवज़ को सरल ज़रूर कर देगी ।
--------
आपकी इस बात से सहमत हूँ । लेकिन इस सन्दर्भ में गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक का लेख "कैन दि सबॉलटर्न स्पीक?" देखा जाना ज़रूरी होगा ।
दूसरी बात ,
मंजू आवाज़ नही उठा पाई इसलिए उसका मर जाना जस्टिफायेबल है , यह कहना अन्याय होगा । सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट के सिद्धांत ने आधुनिकता का जितना भी भला किया हो , पर निर्बलों के शोषण के लिए सबलों को तर्क का हथियार ज़रूर दिया है ।

सुजाता said...

जब की शोषण करने वाले वर्ग ने स्वेच्छा से अपने शोषण के अधिकारों का समर्पण कर दिया हो । पहली आवाज़ शोषित की ओर से ही उठनी होगी । ज़रूरी नहीं कि हर शोषित की उठने वाली आवाज़ सफ़ल ही हो लेकिन हर उठने वाली आवाज़ भविष्य में उठने वाली आवज़ को सरल ज़रूर कर देगी ।
--------
आपकी इस बात से सहमत हूँ । लेकिन इस सन्दर्भ में गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक का लेख "कैन दि सबॉलटर्न स्पीक?" देखा जाना ज़रूरी होगा ।
दूसरी बात ,
मंजू आवाज़ नही उठा पाई इसलिए उसका मर जाना जस्टिफायेबल है , यह कहना अन्याय होगा । सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट के सिद्धांत ने आधुनिकता का जितना भी भला किया हो , पर निर्बलों के शोषण के लिए सबलों को तर्क का हथियार ज़रूर दिया है ।

Unknown said...

लगता है मेरा खेद प्रकट करना बेकार गया. बैचारिक और भाषाई कटुता अभी भी बरकरार है.

Unknown said...

लगता है मेरा खेद प्रकट करना बेकार गया. बैचारिक और भाषाई कटुता अभी भी बरकरार है.

Unknown said...

लगता है मेरा खेद प्रकट करना बेकार गया. बैचारिक और भाषाई कटुता अभी भी बरकरार है.

Unknown said...

लगता है मेरा खेद प्रकट करना बेकार गया. बैचारिक और भाषाई कटुता अभी भी बरकरार है.

Unknown said...

लगता है मेरा खेद प्रकट करना बेकार गया. बैचारिक और भाषाई कटुता अभी भी बरकरार है.

Unknown said...

कुछ समस्या लगती है. मेरी टिपण्णी छप नहीं रही.

Unknown said...

कुछ समस्या लगती है. मेरी टिपण्णी छप नहीं रही.

Unknown said...

कुछ समस्या लगती है. मेरी टिपण्णी छप नहीं रही.

shailesh pandey said...

manju jaisianginat st ussey bhijyada vo babas matapitabhai hai,joapni ladki ko sukhi dekhne ke liye,apni saktiorsamarthya se jyada dhaezdetahai,susral walo kamuh sidha nahi hota,saskodhaezkamlagtahai,sasurko cash,damado ko gift,natiza bebas bap or bhai ka over budget,lagbhag dooguna,susral mai koi farkk nahi,koikhus nahi ladki pareshanbhai bandhu karz mesaalo tak byaz ki rakam chookayenge,bhabhiapni sari purchase karna band karegi,bhai apne bike ka petrol apni dukan par pedal gata,bhatije do saal tak summer holiday me ghoomne jana nahi chahatey,maa bete ki bebasi par pareshan,udhar susral wale ladki ki pihar nahi bhejna chhate,

अनूप भार्गव said...

सुजाता:

गायत्री चक्रवर्ती के जिस लेख का तुमने ज़िक्र किया , उसे पढना चाहूँगा । यदि लिंक उपलब्ध हो तो भेजना ।
मंजु नें आवाज़ नही उठाई इसलिए उसका मर जाना उचित है, ऐसा बिल्कुल नहीं कह रहा हूँ । ऐसा तो वही कह सकता है जिस की भावनाएं बिल्कुल शुष्क हो गई हों । मेरी टिप्पणी को पढें तो मैनें ऐसा लिखा था :
"यदि मंजु नें बिल्कुल प्रयत्न नहीं किये तो यह कुछ हद तक उस की गलती है" ।

यह कथन इस तरह से भी हो सकता था :

"यदि मंजु नें प्रयत्न नहीं किये तो यह उस की गलती है"

दोनो में अन्तर है ।

परिवार की , समाज की , उस के पति की तो गलती है ही लेकिन अगर मंजु नें उन्हें अपनी जान तक ले लेने दी (या उस के प्रति लापरवाही बरती ) तो कुछ हद तक गलती उसकी भी है ।

tor potky chody said...

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