Sunday, September 28, 2008

हम अपनी बेटियों को क्या सिखा रहे हैं?

मैंने अपने को हमेशा एक वंचित बेटी समझा है जिसे पदार्थ के रूप में तो समृद्धि हमेशा मिली लेकिन भावनात्मक संतुष्टि की तलाश में परिवार के बाहर सहृदय लोगों का मुंह देखना पड़ा। इसमें मां की गलती नहीं है कि वे मुझे उम्र के उस बदलावों भरे तूफानी दौर में दिलासा नहीं दे पाईं, जिसकी मुझे सख्त जरूरत थी। दरअसल मां ने भी जो सीखा था, वही व्यवहार मेरे साथ किया। लेकिन आज की मांएं यह बेहतर समझती हैं कि अपनी बेटी को उस कठिन समय में संभालना, जानकारी देना, मजबूती देना और भरोसा दिलाना हर मां के लिए एक बड़ी जिम्मेदारी होती है। अपनी आत्मकथात्मक पुस्तक ‘इंद्रधनुष के पीछे-पीछे: एक कैंसर विजेता की डायरी’ के कुछ संबंधित हिस्से आपके साथ बांट रही हूं।

“मन के कोने में एक बात छुपी हुई है जिसे संकोच के परदे हटा कर बाहर लाने की पूरी कोशिश करती हूं- इस बात को कहने का यह, शायद जीवन का एकमात्र, मौका मैं खोना नहीं चाहती। मैं नहीं जानती, ऐसा कुछ मेरे जमाने में हर किशोर होती लड़की को सहना पड़ा होगा या नहीं। लेकिन मेरे दिलो-दिमाग में वे बातें गहरी खुदी हुई हैं। अच्छा लगता है आज की किशोरियों की मांओं यानी अपनी पीढ़ी की परिचित औरतों को अपनी बेटियों के सामान्य विकास की परवाह करता देख कर।

मैं उस समय चौदह साल की थी और अपने आप से ही जूझ रही थी- शरीर और मन के बदलावों से। लगता था सारी दुनिया की नज़रें मुझ पर हैं। हर जगह, हर समय बंदिश है, कुछ अपने संकोच की, कुछ मां की हिदायतों की। मन करता था, किसी ऐसी जगह जा कर रहा जाए जहां मन-मुताबिक हाथों-पैरों और दिलो-दिमाग को पूरी तरह ढीला छोड़कर कुछ देर जिया जा सके। छातियों के बढ़ने के दर्द को सहा पर कभी किसी से कह नहीं पाई। मां ने कभी इन सब विषयों पर बात नहीं की। मुझसे बड़ी एक बहन भी थी, लेकिन कभी खयाल नहीं आया कि उससे ही कुछ पूछा जाए। उस स्तर पर उससे कभी बातचीत ही नहीं होती थी। मां ने कभी बात तो नहीं की लेकिन कभी शाम को कॉलोनी की ही सहेलियों के घर से लौटने में देरी हो तो ताने जरूर दिए- लाज-शर्म नहीं है। और जबाव मेरी आवेश भरी आंखों में होता था- हां, तो मैं क्या करूं। इसमें मेरी क्या गलती है। और एक बार नहीं, अनेक बार मैंने मनाया कि मैं लड़की रहूं भी तो इन छातियों के साथ नहीं। उन्हें छुपाने की कोशिश में कसी हुई शमीज पहनने से लेकर स्कर्ट या मिडी में टक-इन की हुई शर्ट को ढीला रखते हुए उसके नीचे पहनी शमीज़ को खींच-खींच कर रखने जैसे न जाने कितने उपाय किए लेकिन उनका आकार नहीं घटा, बल्कि बढ़ता ही गया।...

...लेकिन स्तन क्या इतने ही अवांछनीय और शर्मिंदगी का विषय हैं कि उनके बारे में चर्चा भी सहज होकर न की जा सके? दरअसल यह बात मुझे काफी देर हो जाने के बाद समझ में आई कि ये शर्मिंदगी का विषय तब हैं, जब छोटी-छोटी अनभिज्ञताओं की वजह से नवजात शिशु दूध न पी पाए। समय पर उनका वास्तविक इस्तेमाल न हो पाए।

समान कपड़ों और बालों वाले समूह में स्त्री-पुरुष की पहचान करनी हो तो नजर सबसे पहले सीने की तरफ जाती है। यह स्त्रीत्व का बाहरी निशान है। मेडिकल तथ्य यह है कि इसका आकार-प्रकार बच्चे को दूध पिलाने का अपना मकसद पूरा करने में आड़े नहीं आता। लेकिन पुरुष प्रधान समाज में इसे ही स्त्रीत्व मान लिया जाता है।

एक तरफ तो बार्बी डॉल जैसे अवास्तविक आदर्श हैं और मर्लिन मुनरो जैसी फैंटसी, जिनसे बराबरी की भावना समाज बचपन से ही हमारे मन में लगातार भरता रहता है। और इसी लक्ष्य को पाने की कोशिश में हम कभी अपने शरीर के इस हिस्से को जैसा है, उसी रूप में स्वीकार नहीं कर पातीं। उसमें हमेशा कमी-बेशी नजर आती है। हमें हमेशा याद दिलाया जाता है कि यही हमारे नारीत्व का केंद्र है और इसे आदर्श रूप में रखना है।

दूसरी तरफ हमें उसी पर शर्मिंदा होना भी सिखाया जाता है। शो बिजनेस से जुड़ी औरतें शरीर के इस हिस्से का प्रदर्शन कर सकती हैं। लेकिन सामान्य ' भद्र' महिला से उम्मीद की जाती है कि वह लोगों के बीच इसे ठीक ढंग से ढक-छुपा कर रखे। 'प्लेबॉय' और 'कॉस्मोपॉलिटन' के कवर पेज पर इस प्रदर्शन का स्वागत है लेकिन आम औरत का सार्वजनिक रूप से इस तरह के गैर-इरादतन व्यवहार का अंश मात्र भी निंदनीय और दंडनीय है।...

...स्तन कैंसर के शुरुआती लक्षण भी उन्हीं दिनों उभर रहे थे। अगर मैं इस बारे में जानती होती या डॉक्टर ध्यान देते तो सब समझा जा सकता था। अब (कैंसर के बारे में) इतना कुछ पढ़ने-जानने के बाद साफ-साफ एक ही दिशा (स्तन में कैंसर होने) की ओर इशारा करती उन घटनाओं का सिलसिला जोड़ने में कोई कठिनाई नहीं होती।“

दो सुंदर तसवीरें बेटियों के दिन पर



इन तसवीरों की मिठास के साथ आप नीचे का लेख पढ़ना जारी रखें।

डिसअपीयरिंग डॉटर्स और डॉटर्स डे,यह उत्सव का नही चिंता का विषय है







बेशक बेटी दिवस की शुरुआत भी बाज़ार के पीछे छिपे दिमागों की उपज है लेकिन क्या डिस अपीयरिंग डॉटर्स को प्यार देने ,उनकी चिंता करने और याद करने के लिए और बचाने के लिए ऐसे दिवसों का ही आयोजन नही हो रहा बल्कि उत्सवों ,नारों ,समारोहों ,सेमिनार्स ,गोष्ठियों का आयोजन भी लगातार हो रहा है और यह वाकई चिंता का विषय है ...आपको नही लगता ?
मैत्रेयी पुष्पा ने अपने हाल के एक लेख मे कटाक्ष करते हुए लिखा था कि आने वाले दिनों में बेटी पैदा करना शायद ज़्यादा फायदे का सौदा होगा उन मा बापो के लिए जो अभी बेटियों को शाप समझते हैं ,क्योंकि अगर बाज़ार का नियम माने तो वस्तु की कमी उसकी कीमतें बढाती है। औरत की ज़रूरत तो आदमियों को रहने ही वाली है और बेटियाँ कम होने से यह मांग भी बढेगी , कीमत भी बढेगी ।
बेटी फिर शायद ऊंचे दामों पर जायेगी और बेटी पालन एक प्रमुख व्यवसाय होगा । अब भी वक़्त है चेत जाने का ।
सभी तस्वीरें गूगल इमेज खोज से ली गयी हैं ।

Friday, September 26, 2008

हालिया मंजूर चाइल्ट-केयर लीव क्या अनुचित है?

कुछ दिनों पहले इन्हीं पन्नों पर एक पोस्ट डाली थी कि अब सरकारी क्षेत्र की महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश 6 महीने का मिलेगा। पुरुषों के लिए पितृत्व अवकाश 15 दिन से बढ़ा कर एक महीने का कर दिया गया है। साथ ही महिलाएं अपने दो बच्चों के लिए उनके 18 साल के होने तक कभी भी, किसी भी समय कुल दो साल तक की चाइल्ड केयर लीव ले सकती हैं।

इस पर अंजलि सिन्हा का राष्ट्रीय सहारा में एक लेख है जो इस मसले के कई दूसरे पहलुओं को भी सामने लाता है।

उनका कहना है कि "यह घिसे-पिटे/स्टीरियोटाइप नजरिये का नतीजा है कि बच्चे के पालन–पोषण की जिम्मेदारी सिर्फ औरत पर डाली जाय तथा उसे अपनी नौकरी पर काम करने के अवसर वे वंचित किया जाय। कोई यह भी मान सकता है कि जो औरत छुट्टी न लेना चाहे तो वह नहीं लेगी लेकिन इससे आखिर बढ़ावा किस प्रवृत्ति को मिलने वाला है ? सरकार को अपनी तरफ से घरेलू काम की इन जिम्मेदारियों के लिये पुरूषों को भी प्रेरित करना चाहिये।"

आगे वे लिखती हैं- "कल को घर का पुरूष सदस्य यह कह सकेगा कि तुम्हें सरकार से इसीलिए छूट मिली है कि घर में रहकर अपनी जिम्मेदारी निभाआ॓। इसी समझ के कारण परिवार कल्याण मंत्रालय ने पिताओं के लिए कभी क्रैश/पालनाघर की सुविधा की बात नहीं सोची न ही पिताओं ने अपने लिए ऐसी सुविधा की मांग सरकार से की। दूसरी समस्या यह आयेगी कि प्राइवेट नियोक्ता यह सोचेगा या सोेचेगी कि यदि औरत को फलां समय तक बैठ बिठाये वेतन देना है तो उसे नियुक्त ही क्यों करे ?"

मैंने सोचा क्यों न उनके विचार आपके सामने भी रखूं और हम इस पर बातचीत को आगे बढ़ाएं। घरेलू जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए खास तौर पर महिलाओँ को मिलने वाली छुट्टियां क्या अनुचित हैं, औरतों को घरों में बांधने की ज़ंजीरें हैं? क्या ऐसी छुट्टियां उन्हें वापस, 100 साल पीछे धकेलने की तैयारी हैं? या उनके नौकरी जारी रखने के लिए एक सहयोग, सपोर्ट? आपके विचारों का इंतज़ार है।

Thursday, September 25, 2008

या तन को दिवला करूँ - प्रभा खेतान को श्रद्धांजलि


या तन को दिवला करूँ , बाती मेलूँ जीव
लोहू सींचौ तेल ज्यूँ,कब मुख देखौ पीव


इस तन का दीपक बनाऊँ , प्राण की बाती करूँ , लोहू से तेल की तरह सींचूँ कि कब पिया का मुख देख पाउंगी ।

कबीर की ये पन्क्तियाँ मुझे जाने कब से बेकरार करती रही हैं और जब से स्त्री विमर्श को लेकर जागरूक हुई मन मे जब तब गूंज उठती हैं।पर आज इन्हें याद करने का क्या कारण है ?डॉ प्रभा खेतान का देहांत ।
। एक साहसी स्त्री{कभी कभी बोल्ड की एक निगेटिव सेंस में }, सामाजिक कार्यकर्ता , लेखिका के रूप मे जानी जाने वाली प्रभा खेतान ।
सीमोन दि बोवुआर की पुस्तक सेकेंड सेक्स का हिन्दी अनुवाद "स्त्री उपेक्षिता" नाम से करते हुए डॉ. प्रभा खेतान ने भूमिका मे लिखा था -
क्या देह के अलावा औरत की और कोई पूंजी नही है?


देह को जलाकर ,प्राणों की बाती बनाकर वह संसार मे एक अखंड लौ की जलती आती है और डॉ प्रभा खेतान की आत्मकथा"अन्या से अनन्या" पढकर इन्हीं प्रश्नों के गिर्द मन चक्कर काटने लगता है कि वाकई स्त्री की देह के अलावा उसकी कोई और पूंजी नही है?अंतर्राष्ट्रीय आंकड़ो से पता लगता है कि दुनिया की 98% पूंजी पर पुरुषों का कब्ज़ा है। और अगर औरत की देह भी उसके लिए पूंजी है तो सोचिये कि स्थिति कितनी भयावह है।

प्रभा खेतान की आत्मकथा मे ऐसा क्या था ?


बकौल मसिजीवी -प्रभा खेतान की आत्‍मकथा के अंश हमारे युग के खलनायक (बकौल साधना अग्रवाल) राजेंद्र यादव की हँस में नियमित प्रकाशित हुए हैं और हिंदी समाज में लगातार उथल पुथल पैदा कर रहे हैं। अब एक सुस्‍थापित सुसंपन्‍न लेखिका साफ साफ बताए कि वह एक रखैल है और क्‍यों है तो द्विवेदी युगीन चेतना वालों के लिए अपच होना स्‍वाभाविक है। जी प्रभा रखैल हैं किसी पद्मश्री ऑंखों के डाक्‍टर की (अपनी कतई इच्‍छा नहीं कि जानें कि ये डाक्‍टर कौन हैं भला) और यह घोषणा आत्‍मकभा में है किसी कहानी में नहीं। अपनी टिप्‍पणी क्‍या हो ? अभी तो कह सकता हूँ कि -
मेरे हृदय में
प्रसन्‍न चित्‍त एक मूर्ख बैठा है
जो मत्‍त हुआ जाता है
कि
जगत स्‍वायत्‍त हुआ जाता है (मुक्तिबोध

हिन्दी मे दलित और स्त्री विमर्श के चलते आत्मकथाओं का एक दौर आया और कुछ बहुत अच्छी और कुछ फैशन मुताबिक आत्मकथाएँ भी आयीं। लेकिन स्त्री की आत्मकथा को देखने की दुनिया का नज़रिया पुरुषवादी ही रहा।बकौल मेरा ई पन्ना -
स्त्री मुक्ति को लेकर पुरुषो का रवैया सामंती ही है। मुक्ति का प्रश्न उठते ही चतुर सामंत की तरह आज का पुरुष तरह तरह की दलीले देकर कि स्त्री तो महान है , वह पुरुष से ज़्यादा सामर्थ्यवान है, वह जीवन का सही उद्देश्य जानती है, वह दैवीय गुण युकत है वगैरह..... , कन्नी काटता है। इससे भी काम ना बने तो छिछोरों की तरह कहने लगते हैं- हटिये, हटिये स्त्रीवादी आयीं,या उसके निजी जीवन मे ताक झाँक बढा देते हैं ।कुछ उसके लेखन मे कामुक आनन्द लेने लगते हैं ।जैसे प्रभा खैतान की आत्मकथा" अन्या से अनन्या" आयी तो लोग उत्सुक होकर लपके उनके डॉक्टर साहब के साथ प्रेम प्रसंग को पढने ।the second sex की भूमिका लिखते हुए डॉ प्रभा खैतान पूछती हैं- क्या शरीर के अलावा औरत की और कोई पूँजी नही है ?
सुबह सुनील दीपक का पोस्ट देख कर भी ऐसे प्रश्न सामने आए ।
अभय कुमार दुबे "{सी एस डी एस से जुड़े हैं}कहते हैं -
मन्नू भंडारी की आत्मकथा ' एक कहानी यह भी ', प्रभा खेतान की आत्मकथा ' अन्या से अनन्या ' और मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा ' गुड़िया भीतर गुड़िया ' का संदेश यह है कि संबंधों की अंतरंगता स्त्री जीवन को पुरुष के मुकाबले अधिक गहराई से प्रभावित करती है। ये तीनों महिलाएं आदर्श सह-जीवन की खोज कर रही हैं। एक स्त्री विवाह किए बिना केवल प्रेम के जरिए , दूसरी प्रेम विवाह करके और तीसरी परंपरा द्वारा थमाए गए वैवाहिक जीवन के भीतर यही तलाश कर रही है। दिलचस्प बात यह है कि जब विवाहेतर आकर्षण के बगावती प्रभावों से दाम्पत्य का शीशा चटख जाता है और स्त्री उसमें अपनी छवि निहारती है तो उसे लगता है कि आज उसका चेहरा पहले से सुंदर लग रहा है।

कुल मिला कर ये आत्मकथाएं बताती हैं कि स्त्री एक ' पौरुषपूर्ण समय ' में रहने के लिए अभिशप्त है। वह पुरुष के साथ अपने संबंधों को केवल यौन कामना की भाषा में ही परिभाषित नहीं करना चाहती। वह चाहती है कि अंतरंगता के सभी पहलुओं को सेक्सुअल न माना जाए। अंतरंगता बौद्धिक भी हो सकती है , राजनीतिक हो सकती है , और प्रगाढ़ मैत्री के रूप में भी। लेकिन स्त्री की मुश्किल यह है कि वह जिन अंतरंगताओं को अपनी तरफ से ' ए-सेक्सुअल ' या अ-यौनिक मान कर चलती है और उसी रूप में उन्हें निभाना चाहती है , जरूरी नहीं कि संबंध का दूसरा पक्ष उसके प्रति वही नजरिया रखता हो। अधिकतर स्थितियों में पुरुष की तरफ से मानस के धरातल पर (भले ही देह के स्तर पर उसकी अभिव्यक्ति हो पाए या न हो पाए) कामनाओं का खेल अपने व्यक्त-अव्यक्त रूपों में जारी रहता है।


जाने किस इंतज़ार मे स्त्री अपना समस्त जीवन ऐसे ही देह की दिया -बाती बनाते बनाते खप जाती है।नयनतारा बनने की कवायद भी उतनी ही आत्म पीड़क है जितनी कि चोखेर बाली कही जाकर अपने जीवन के शोध और प्रयोग की प्रक्रिया,पहचान की तलाश ।ऐसे मे आज तक स्त्री का कुल जमा हासिल क्या है?देह और देह के पार एक इंसान होने की चाहत को लिए एक विकल जीवन जीते जाना शायद!


अदम्य स्त्री ,प्रभा खेतान को हमारी श्रद्धांजलि ।

Wednesday, September 24, 2008

लड़कियों का पहला कॉलेज बंद हो जाएगा?

देश का पहला लड़कियों का कॉलेज सेंट बीड्’स, जल्दी ही बंद हो जाएगा। राष्ट्रीय बालिका दिवस पर ये खबर आई है। 1904 में बने शिमला के इस कॉलेज के प्रशासन ने सरकार से कहा है कि अगर उन्हें मिल रही आर्थिक मदद को बढ़ाया नहीं गया तो कॉलेज बंद करना ही होगा। कॉलेज बंदी की योजना बनने भी लगी है। दरअसल इस साल मार्च में सरकार ने एक नियम बना कर निजी कॉलेजों को मदद 95 फीसदी से घटा कर 50 फीसदी कर दी।

प्रिंसिपल मौली अब्राहम का कहना है कि फीस बढ़ा कर पैसे की तंगी को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। लेकिन हम लड़कियों को सस्ती शिक्षा के अपने मकसद से हटना नहीं चाहते। 1970 से कॉलेज की फीस 70 रुपए प्रतिमाह तय है।दिल्ली के प्रतिष्ठित जीजस एंड मैरी का सहयोगी संस्थान सेंट बीड्’स राज्य का एकमात्र कॉलेज है जिसे एन ए ए सी का ए प्लस का दर्जा मिला हुआ है।

दिलचस्प बात ये है कि 1967 में जब दिल्ली में नया जीजस एंड मैरी कॉलेज बना तो यह तय हुआ कि शिमला के इस कॉलेज को बंद कर दिया जाए। तब हिमाचल सरकार और स्थानीय लोगों के कहने पर इसे बंद करने का पैसला टाल दिया गया। डाक विभाग ने संस्थान के 100 साल होने पर डाक टिकट भी जारी किया है।

इस कॉलेज से जुड़ी कुछ मशहूर हस्तियां हैं- हिमाचल की पहली महिला आई पी एस अधिकारी सतवंत अटवाल त्रिवेदी, पहली महिला हिमाचल पुलिस अधिकारी पुनीता कुमार, मिस इंडिया अंजना कुथलिया, फिल्मी हस्ती प्रिटी ज़िंटा।

Tuesday, September 23, 2008

23 sep --बालिका दिवस


आज उमा द्वारा देहरादून में बालिका दिवस मनाया गया ....बालिकाओं के विकास और समाज में उनके महत्त्व को लेकर बातें हुईं ...कार्यक्रम में सभी ने शिक्षा, पोषण, और सुरक्षा पर जोर दिया
---नीलिमा गर्ग

Saturday, September 20, 2008

सार्थक पहल

माँ बच्चे को जन्म देती है अथ सभी दस्तावेजों में माँ और पिता दोनों का नाम होना चाहिए जो उचित ही है ...सरकार को एस विषय में सार्थक पहल करनी चाहिए ...
----नीलिमा गर्ग

Friday, September 19, 2008

'"मेरा घर" का सजावटी भ्रम

सपना चमड़िया
ज़िन्दगी का अनुवाद
नवां भाग
आज शाम जब दरवाज़े की घण्टी बजी तो मैने एक परिचित चेहरे को दरवाज़े पर पाया।आँखे कह रही थीं कि इस व्यक्ति को मैने कई बार देखा है,बातें भी की हैं।चेहरे पर असमंजस के भाव तो थे ही कि आने वाले ने भी टोक दिया-"भूल गयीं आप मुझे"
मैने कहा "नही तो आइये"
लेकिन सच है कि मुझे याद नही आ रहा था।इस पर भी कि वह व्यक्ति घर मे इतना आता जाता था कि स्वयम ही कमरे के भीतर घुसा ,कम्प्यूटर टेबल के पस रुका और कम्पयूटर ऑन करके बैठ गया।ओह!
यह तो अजीत है ।अक्सर हमारे यहाँ कम्प्यूटर ठीक करने आता था।मै हैरान थी अपने आप पर कि इसे मै पहचान नही पाई मै कहँ गुम रहती हूँ।अच्छा मान लीजिये कि उस दिन वह कम्प्यूटर ठीक करने नही मुझसे मिलने आता और देर तक उस कुर्सी पर बैठा बतियाता रहता तो शायद मै उसके जाने तक भी उसे नही पहचान पाती।यात्रा कहाँ से चली और कहाँ जाकर खत्म हुई,व्यक्ति से वस्तु पर।घर मे आने वाले एक व्यक्ति की पहचान एक वस्तु ने कराई।

सुनीता भाभी एक दिन् बहुत खुश हो रही थीं कि जब भी वे पति से कोई उपहार मांगती हैं तो जवाब मिलता है"सब कुछ तो तुम्हारा ही है"।सुनीता भाभी को तो आप जानते ही होंगे।मेरे ठीक सामने वाले घर मे रहती हैं-एक बेतरह सजे घर मे।उनके घर का एक- एक कोना सजावटी वस्तुओं से लबालब भरा हुआ है।अक्सर जब मै उनके घर मे बैठ कर सांस लेने की कोशिश करती हूँ तो मेरी सांसे कभी किसी फूलदान या औरत की इज़्ज़त जैसे महीन नाज़ुक कांच के डेकोरेशन पीस से टकरा कर टूट जाती हैं।
आपका घर बेहद खूबसूरत है याआपने कितना बढिया घर सजाया है, बनाया है मेंटेन किया है जैसे वाक्य लोग अक्सर उनकी झोली मे डाल जाते हैंऔर सुनीता भाभी उन्हें कभी तमगे या शो पीस की तरह घर के बच गये कोनो मे सजा लेती हैं।और ये सब चीज़े सुनीता भाभी की अपनी हैं,घर उनका है --
एक भ्रम जो अपने सजावटी रूप से मूर्ख बना रहा है।और मै एक काल्पनिक स्थिति की रचना करती हूँ-एक सुहानी सुबह है -छुट्टी का दिन है,बढिया नाश्ता,भरा पूर घर ,मधुर हंसी ठिठोली,या कुछ नया बड़ा सामान खरीदने का चाव भरी बातें....ऐसे मे सुनीता भाभी का कॉलेज का कोई दोस्त पता ढूंढता ढूंढता उनके दरवाज़े आ जाता है और अचानक सारा परिदृश्य बदल जाता है,उस गुद् गुदे गद्दे वाले सोफे पर और सुनहरे पर्दों से सजे कमरे मे सुनीता भाभी कितनी देर अपने मित्र को बिठा पायेंगी।वो घर जहाँ सब कुछ उनका है , उनकी सांसे रुक जाएंगी , वे असहज हो जाएंगी,नाश्ता बेस्वाद हो जाएगा,बड़ी बड़ी चीज़ें तुच्छ् हो जाएंगी एक पल मे और सुनीता भाभी का डरा मन ज़रूर ज़रूर यह चाहेगा कि उस आगंतुक को किसी सामान की तरह उठाएँ और घर के सुरक्षा घेरे से बाहर कर दें।पर ऐसा कभी नही होगा , मै कुछ ज़्याद ही सोच गयी।किसी पुरुष का किसी औरत से परिचय की डोर पकड़ कर मिलने आना हमारे घरों मे आज भी वर्जित है। जो महिला दबंग हो,ठहाके लगा कर हंसती हो,पुरुषो से न डरती हो ऐसी स्त्री को भी हमारे घर चौखट नही लांघने देना चाहते।
महिलाएँ, जिनके लिए कहा जाता है कि उन्हें वस्तुओं से बहुत प्यार होता है,-दर असल उसके बहुत पुख्ता सामाजिक कारण होते हैं।जब घर में लड़ की पैदा होती है और होश सम्भालती है तभी से उसे घर की साज सम्वार और रख रखाव मे लगा दिया जाता है-बाहरी दुनिया और समाज से उसका परिचय न के बराबर होता है। व्यक्तियों के नाम पर आस पास के रिश्ते ही मिलते है वे भी बड़ो की छत्र छाया में-किसी तरह का स्वतंत्र सम्वाद कायम नही हो पाता।साथ ही वे रिश्ते भी जो नापसन्द हो ताउम्र हमें उन्हें अपना दायित्व बनाकर निभाना होता है।ऐसे मे वस्तुओं से उम्र भर का सम्बन्ध बन जाना आश्चर्य नही।

बेटियों को तैयार किया जाता है -औरों के लिए
बेटो को तैयार किया जाता है - बस अपने लिए
डॉ.सपना चमड़िया

पिछले भाग

Thursday, September 18, 2008

बराबर दर्जा



बहस के लिए विचार आमंत्रित हें .......

---नीलिमा गर्ग

शिशु किसकी ज़िम्मेदारी ?

माँ बनना गौरव का विषय है , मै भी मानती हूँ , माँ हूँ भी ,इससे जानती हूँ कि माँ के विषय मे जो भी कुछ कहा सुना जाता है उसकी वास्तविकता क्या है और उसके अंडर्टोंस क्या हैं?
एक अच्छा पुत्र या पुत्री पर सर्वस्व वार कर माँ को जो सुख हासिल होता है वह कोई नही समझ सकता ,जन्म देने और अपनी छाती से लगा कर शिशु को पालने का कष्ट और अहसास कोई अन्य नही जान सकता ।पुत्री समझ सकती है ,जब वह खुद माँ बनती है।पुत्र तो किसी भी तरह समझ नही सकता कि गर्भ मे भ्रूण के अव्स्थित होने से लेकर बच्चे के वयस्क हो जाने तक एक माँ कैसे कैसे शारीरिक ,मानसिक्, भावनात्मक ,समाजिक ,पारिवारिक दबावों को झेलती है।लेकिन दम्भी होने का उसका पूरा हक होता है।और माँ को यह बताने का भी कि क्या तुम्हारे कर्तव्य क्षेत्र में है और तुम्हारे जीवन की रूप रेखा क्या हो ?
मुझे एम फिल का शोध लेखन पूरा करना था।और मेरे पास कुल मिलाकर तीन महीने का समय था जबकि मेरा पुत्र मात्र दो ही महीने का था। सो सुबह सवेरे घर का काम समाप्त कर, दोपहर तक का भोजन बना कर ,बच्चे को दूध पिलाकर मुझे लाइब्रेरी निकलना होता था।शाम के सात बजे तक लौटती थी और आते ही बच्चे को गोद मे लेना चाहती थी। केवल तीन महीने का कष्ट था,और मेरा बच्चा किसी क्रेश मे नही था किसी आया के पास नही था।अपनी दादी के पास था।पर क्या यह बात वह जान पाएगा कि वह समय मेरे लिए कितना मानसिक उथल पुथल का था जब हर कोई छोड़ क्यों नही देती पढाई , नौकरी -जैसी बातें कहता या सोचता था और "संडे मम्मी " जैसे ताने दिया करता था।
मेरे घर मे उस समय मेरे अलावा दो स्त्री सद्स्य और दो पुरुष सद्स्य थे।बच्चे की पीछे से अच्छी देखभाल होती थी पर शाम ढले घर आने पर मुझे उसका मुख देखने की बजाए रसोई मे जाना होता था , दिन भर मैने बाहर गुज़ारा ,घर पर के अपने कर्तव्य पूरे नही किये , सभी ने मेरे बच्चे को पीछे से सम्भाला , इस नाते यह मेरा फर्ज़ मान जाता था कि मै शाम का सारा काम यथासम्भव अधिकाधिक योगदान देकर पूरा करूँ।
रोने पर बच्चा मेरी गोद से छीन लिया जाता था, दूध पीते पीते नन्हे शिशु के मेरे कान से खेलने पर कहा जाता था- अच्छा है अभी से माँ के कान खींच कर रखेगा -
नानी या मौसी के यहाँ क्यों गया इस पर बवाल हो जाया करता था...
घर पर रहती थी तो माँ मात्र बच्चे की परिचारिका ही है माने नौकरानी , वह आराम से गोदी मे खिलाया जाता , पॉटी करे तो जा कपड़े ले आ , अब गर्म करके तेल ले आ , अब नहाने का पानी तैयार कर , अब नये कपड़े निकाल ला,अब सेरेलक बना ला ,सेरेलक नही खा रहा बच्चा तो ले अब- अपना दूध पिला दे।एक टिप्पणी मे यह कहा गया कि नौकरी करने वाली औरत न माँ है न पत्नी वह तो पहले नौकरानी है । तो वह औरत घर मे किसकी नौकरानी नहीं है ?और देखा जाए तो नौकरानी के माने क्या हैं ? कोई गिरी हुई औरत जो अपनी मजबूरी में आपके घर कपड़े धोने या बर्तन मानजने आती हैं ?क्या आप उसे इतनी हीन दृष्टि से देखने के आदि हैं ?क्या यह अपने अच्छे हालात पर दम्भ करना और किसी दूसरे को नीच दिखाने जैसा नही है?

आज मेरे साथ कोई नही रहता, मै उसी घर् मे हूँ ।कोई विदेश मे बस गया और कोई अपना पैतृक घर बनवा रहा है। भविष्य मे भी मेरे साथ कोई नही होगा , कौन होता है , रह भी पाता है हमेशा साथ। पर मेरी शिक्षा , मेरा योग्यता और आत्मनिर्भरता साथ है, जिसे खत्म करने के लिए पर्याप्त हतोत्साहित करने वाली स्थितियाँ मौजूद थीं।

इस व्यवस्था में किसी का दोष नही है। बच्चे हमारे हैं सो हमे पालने हैं , किसी का मुँह नही जोह सकते । लेकिन वे जिस खानदान का चिराग कहलाते हैं , वे जिस समाज का हिस्सा बनेंगे , जिस स्कूल के उत्पाद कहलायेंगे , जिस राष्ट्र के नागरिक कहलायेंगे उसकी इस सब के बीच क्या भूमिका है ? जो माँ अपना पुत्र या पुत्री देश सेवा समाज सेवा ससुराल सेवा के लिए अपना खून जलाकर तैयार करती है उसके इस कर्तव्य मे भूमिका लेने कोई तब क्यों नही आगे आता जब उसके जीवन का सब्से कष्ट कर समय चल रहा होता है?मुझे यह कहते संकोच नही कि दुनिया की , सम्बन्धों की ,असलियत मैने उसी दिन जानी जिस दिन मेरे मातृत्व नीँव पड़ी थी।आज मुझे अपना बच्चा सबसे प्रिय है और उसी की खातिर मुझे अपना जीना सार्थक लगता है।मुझे खुशी है कि मै काम करती हूँ और बुढापे मे मै कुण्ठित हो कर उसे ताने नही दूंगी कि तेरे लिए मैने सब सहा सब छोड़ दिया ,पढाई करियर नौकरी और तेरे लिए आज मेरे पास वक़्त नही है ?

बहुत बार उसकी उपेक्षा हुई , मुझे अपनी आँखों से देखना पड़ता था ,लेकिन क्या इसलिए कि मै बुरी माँ हूँ या इसलिए कि जो भी कोई आदमी मुझ पर यह आक्षेप लगायेगा वह खुद इस आरोप से बरी नहीं है कि इस शिशु के पालन मे उसने अपनी भूमिका का ठीक निर्वाह नही किया ?क्योंकि अंतत: माँ बनने का फैसला किसी स्त्री का एकल निर्णय कभी नही हो सकता। आप विवाह के बाद दो साल बिना बच्चे पैदा किये नही गुज़ार सकते ।अगर ऐसा होगा तो दुनिया भर से हिमायती लोगों की भीड-अ आपको यह सम्झाने के लिए उमड़ पड़ेगी कि अब बहुत हुआ बच्चा पैदा कर लो । इससे भी अधिक समय हो जाए तो आपको डॉक्टर से परामर्श लेने भेजा जायेगा ।यदि वाकई सम्स्या है और डॉक्टर से भी कुछ बात न बनी तो तलाक की नौबत भी आ सकती है।स्ट्रेस , और स्ट्रेस ।ऐसे मे बहुत अच्छा लगता है कि आपका पालन पोषण एक ऐसी महिला के रूप मे हुआ होता कि आपको शादी, बच्चा ,परिवार के अलावा कुछ सोचना ही सिखाया न गया होता।इससे बहुत आसानी रहती है पितृसत्ता को ।लेकिन यह भी कष्ट्कर हो जाता है बहुत बार ।

एक स्कूल में , आज से 7 साल पहले , मुझे स्कूल के बाद यूनिवर्सिटी जाते हुए , एक सहकर्मी ने कहा - "मेरा भी बहुत मन था कि मेरी एम फिल पूरी हो जाती, पर उस दौरान मेरा बेटा हो गया , घर वालों ने कहा छोड़ अब क्या पेपेर देने जाएगी ,अपना बच्चा देखो .....किसी ने थोड़ा बहुत सहयोग किया होता तो ...." और फिर जैसे फिर से मन को समझाने बैठ जाती , और वाकई मै कुछ क्षण बाद उसे फिर से हंसते बोलते हुए पाती ।



शायद यह हमारी सरकार ने अब जाकर समझा है कि बच्चे इस राष्ट्र की आने वाली पीढी हैं , भावी समाज हैं , भावी नागरिक हैं और इसका ज़िम्मा अगर हमने स्त्री पर अकेले ही डाल दिया है तो उसे सताने के बजाए कम से कम उसकी मदद करनी चाहिए , सम्वेदनशील होना चाहिये।शशि, रंजना ,अनुराधा मेरी सभी मित्र कष्ट पूर्ण समय से पार हो गयीं हैं पर यह बेहद खुशी का सबब होगा शशि के लिए कि अब उसके सास-ससुर की तरह कोई यह नही कहेगा कि "बड़ी आयी है नौकरी वाली ,होने दो एक बच्चा ,इसे तो हम बताएंगे "जिसे बताते बताते वह आंसुओं से रो जाया करती थी । और शायद कोई यह भी नही कह सकेगा कि "रोज़ रोज़ अपना बच्चा छोड़ जाती है हमारे पास , छोड क्यों नही देती नौकरी" ।

माँ बनना एक चॉयस है , चुनाव है , सज़ा नही है ,कर्तव्य भी नही है ,और विवशता भी नही होनी चाहिये । मातृत्व सुखद और खुश होना चाहिये वर्न बच्चे पर इसका बुरा असर होता है। बच्चे को वात्सल्य का अधिकार है तो माँ को भी संतुषट और खुश रखना एक दायित्व है । जो माँ सताई जाती है कोई जाती है वह बच्चे को क्या तो पाल सकेगी और क्या ही उसे समझ दे सकेगी ।डॉ. बेजी ने एक बार इसी सन्दर्भ मे लिखा था -
एक शिशु का मतलब क्या है.....
कुदरत का यह खूबसूरत करिश्मा जिसमें स्त्री पुरुष की साझेदारी है। ढ़ेर सारा अनुराग, अनुभूतियों का स्रोत....। इतनी मासूमियत की लगता है परम को छू लिया हो....।

एक शिशु का मतलब नींद में खलल, कई बार बीमार पड़ना, लगातार किसी का हम पर निर्भर रहना....सुसु, पौटी.....उल्टी, हिचकी, डकार, बेमतलब, बेहिसाब रोना, हँसना.....

इतने बदलाव के लिये सबसे जरूरी है कि स्त्री और पुरुष एक दूसरे का संबल बन सहजता से इस सौंदर्य को अपने जीवन में सहेजें...


और इसी पोस्ट मे एक बेहद ज़रूरी बात थी -

The most important thing a father can do for his children is to love their mother.
– Henry Ward Beecher

माँ होना निश्चित ही एक निराला अनुभव है पर यह कतई नही मानना चाहिये कि इसमें कोई कष्ट नही है। यह पग पर पर चुनौती भरा रास्ता है और सभे को समान हक है यह चुनने का कि वह इस राह पर कब चलना चाहता है , या नही चलना चाहता है। पति और ससुराल की चॉयस भी तभी स्वीकार्य हो सकती है जब इसमे सबकी साझी ज़िम्मेदारी निर्वाह करने की योग्यता हो।अकेली पड़ गयी माँ को देख बच्चा भी विद्रोही ही बनता है।
मातृत्व पर आक्षेप करने वालों को अपने दायित्वों को भी भली भांति समझना होगा ।यह भी समझना होगा कि कुछेक परिवारों को छोड़ दें तो सर्वत्र निम्नमध्यवर्गीय , निम्नवर्गीय स्त्री के लिए यह एक दुरूह काम बना दिया जाता है।
बहुत ज़रूरी है कि पिता को भी यह छूट दी जाए कि वह 2 साल का अवकाश अपने बच्चों के लिए ले सकता है और माता पिता को पूरी कार्यकल मे एक बार इस तरह के अवकाश की छूट हो। लीव वेकेंसी पर ही सही किसी को रोज़गार भी मिलेगा:-)और इस देश की भावी संतान , भावी समाज, भावी नागरिकों की नींव भी दुरुस्त हो जाएगी ।

Wednesday, September 17, 2008

जब स्टाफ रूम मे कोई महिला शिक्षक न हो ..

अरे राय जी तो पागल हैं, हमेशा क्‍लास में फोटो-कॉपी बॉंटते रहते हैं, केवल सेमि‍नार आयोजि‍त कराने से क्या होता है, हमारे बीच स्‍टाफ-रूम में तो कभी बैठते नहीं..........., अरे मोहनलाल जी फर्स्‍ट ईयर की क्‍लास तो आजकल बि‍ल्‍कुल मि‍स नहीं करते, सुना है, उनके क्‍लास की वह स्‍टूडेंट मि‍स फेमि‍ना के लि‍ए चुनी गई है, अपना तो लक ही खराब है, पि‍छले पॉंच साल से लड़को को ही पढ़ा रहा हूँ, और जो स्‍टूडेंट आई भी, उनका रूप तो माशाअल्लाह........., और मि‍सेस लता का क्‍या कहना, क्‍लास के बाद कॉमर्स के रमण बाबू के साथ उनकी कार में बैठकर न जाने कहॉं की हवा खा रही हैं........अरे वाह, जूते तो ब्रांडेड लग रहे हैं, कि‍स कंपनी के हैं, और सर्ट.....,इस प्रकार कुछ और भी अंतरंग मुद्दे थे जि‍नके बारे में मैं बता नहीं सकता। जब स्‍टाफ-रूम में कोई महि‍ला शि‍क्षक नहीं होती तो शि‍क्षकों के मुँह से आपको गाली तक सुनाई पड़ सकती थी, और महि‍ला शि‍क्षकों की काया पर टीका-टि‍प्‍पणी तो श्रृंगार रस में डुबो-डुबोकर की जाती थी। ऐसे माहौल में वहॉं बैठकर अगली क्‍लास का इंतजार करना नारकीय हो जाता था।
आगे पढें जितेन्द्र भगत की पूरी पोस्ट

क्या आपका ऑफिस या स्टाफरूम इससे अलग है , यदि है तो हमसे उसका विवरण बांटें !नहीं है ! तो कैसा है हमें यह भी बताएँ!

.: घर घेऊ का घर?

.: घर घेऊ का घर?
Chanach aahe lekh.

Tuesday, September 16, 2008

इंसान

मुआफी चाहती हूँ काफी समय हुए कुछ लिख नहीं पायी.......लेखन वाकेई आसान कला नहीं जब उमड़ती है तो रुकने का नाम नहीं लेती और जब नहीं उमड़ना चाहती तो मन और भावनाओं को बंजर बना देती है........सच ही कहा है-
लव्ज़ एहसास से छाने लगे ये तो हद है
लव्ज़ माने भी छुपाने लगे ये तो हद है............
इन दिनों देश में कुछ इस तरह की घटनाएं हुईं कि कभी ख़ुद पर तो कभी समाज पर और कभी इसके तह में छिपी राजनीति पर कोफ़्त होता है..............क्या हम इतने अपाहिज हो चुके हैं, कुछ भी होता रहे हमारी ऑखों के सामने और हम सहने को मजबूर हैं....कोई दूसरा रास्ता नहीं सिवाय सहने के........
पर ये देश ऐसा है जहॉ ऑसुओं के साथ भी खिलवाड़ होता है........संवेदनाओं से राजनीति की जाती है.........
इस देश पर फ़क्र है हमें............
फक्र है कि हम इस देश के नागरिक हैं..........
ये देश प्रतीक है गंगा-जमुनी तहज़ीब का ........
हिन्दू-मुस्लिम-सिख-इसाई एकता का........
हिन्दी-मराठी,सभी भाषाओं और बोलियों का.........
पर क्या वाकेई ?
इस देश के टुकड़े-टुकड़े करने को तैयार हैं यहॉ के रहनुमा। बात सिर्फ हिन्दू और मुसलमा की नहीं है ,बात अब हिन्दी और मराठी की भी है....
बात मज़हब की ही नहीं , बात अब भाषा कीभी है
आखिर कब तक ये तांडव जारी रहेगा........
तांडव मौत का ,
बेगुनाहों की मौत का ......
क्या आप में से कोई है जो ज़िन्दा है...............

अब दो साल का सवैतनिक बच्चा पालन अवकाश

सरकारी दफ्तरों में काम करने वाली महिलाओं के लिए अच्छी खबर है। पता नहीं क्यों, अखबारों ने इन्हें खास तवज्जो नहीं दी, लेकिन है यह काम की खबर।

अब महिलाओं को अब साढ़े चार के बजाए छह महीने की मैटरनिटी लीव मिलेगी। उससे भी ज्यादा दिलचस्प और खुशी की बात है कि उन्हें अपने बच्चों के पालन के लिए अलग से दो साल की सवेतन छुट्टी मिलेगी और इसे वे किसी भी समय, टुकड़ों में भी, ले सकती हैं। शर्त बस ये है कि बच्चे/बच्चों की उम्र 18 साल से ज्यादा न हुई हो। उन्हें इस छुट्टी के दौरान तनख्वाह तो मिलती रहेगी ही, उनकी सीनियॉरिटी भी बनी रहेगी। यह पहली सितंबर से लागू है।

अब कोई इसे चुनावी हथकंडा कहे, पर सरकारी कामकाजी महिलाओं के लिए काफी सुविधा हो गई है। इसका मतलब यह है कि वे बच्चों की परीक्षा के समय उन्हें पढ़ाने, हारी-बीमारी में देखभाल, उसे किसी हॉबी आदि के अभ्यास या ट्रेनिंग, प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए शहर से बाहर ले जाने या घर में बच्चे की किसी और जरूरत के लिए भी छुट्टी ले सकती हैं।

उम्मीद करें कि केंद्र सरकार के इस नियम को और दफ्तरों में भी लागू किया जाएगा।

Monday, September 15, 2008

उत्तर-आधुनिक समय में स्त्री-पुरुष

पिछली पोस्ट में कबीर मुक्तिबोध ने उत्तर-आधुनिक समय की स्थितियों का जो खूबसूरत चित्र खींचा है, क्या वाकई हम इस स्तर पर पहुंच चुके हैं? क्या बच्चा एक बार मैगी खाने की तकलीफ याद कर दूसरी बार उसे खाने से बचता है? यह सुंदर दृष्य अगर सच्चा है तो मुझे खुशी है और अफसोस भी कि मैं इस सुंदर समय में अब भी नहीं पहुंच पाई हूं। उत्तर आधुनिकता तक हमारा समाज कहां पहुंच रहा है! आज भी बच्चे संभालना, नौकरी करें ये न करें, घर की देखभाल करना, घूमने जाने की इच्छा होते हुए भी बच्चे का होमवर्क करवाना औरत के जिम्मे है और मित्रों के साथ शाम बिताना, खेल या दूसरे शौक पूरे करना पुरुषों के लिए सहज बात है।

इसी सिलसिले में एक मज़ेदार उत्तर-आधुनिक किस्सा है-

एक आदमी रोज़-रोज़ नौकरी करते-करते थक गया, ऊब गया। उसे अपनी घरेलू बीवी से रश्क होने लगा कि वह सारा दिन मज़े से घर में रहती है। उसने भगवान से प्रार्थना की कि हर दिन आठ घंटे की नौकरी के बजाए उसके शरीर को उसकी पत्नी के शरीर से बदल दें ताकि वह बिना नौकरी की चिंता के घर में सारा दिन बिता सके।

भगवान ने उसकी सुन ली। अगले दिन जब वह सोकर उठा तो वह औरत बन चुका था। उसने सबके लिए नाश्ता बनाया, बच्चों के जगाया, उन्हें स्कूल के लिए तैयार किया, उन्हें नाश्ता कराया, उनको टिफिन दिया, उन्हें बस में चढ़ा कर लौटा और घर की सफाई और कपड़ों की धुलाई में लग गया। फिर बिजली का बिल जमा करने निकला तो रास्ते में बैंक में चेक भी जमा कर दिया। घर के लिए सब्जी और राशन खरीदा और घर लौट कर उसे व्यवस्थित कर लिया। तब तक एक बजा चाहता था, वह रसोई में जुट गया। खाना बना कर निकला तो बच्चों को लाने का समय हो गया था। रास्ते में उसकी बच्चों से झड़प हो गई। घर में उन्हें खाना देकर होमवर्क करने बैठाकर उसने इस्त्री का काम उठा लिया। इस बीच टीवी भी चला दिया ताकि अपना मनपसंद सीरियल देख पाए।

अब शाम होने लगी तो उसने सूखे कपड़े तह किए, बच्चों का बिखरा सामान समेटा, बच्चों को दूध-नाश्ता देकर खेलने भेजा और खुद रसोई में जुट गया क्योंकि रात के खाने पर पत्नी के मित्र आने वाले थे। इधर मेहमानों को संभाला, उधर ऊंघते बच्चों को किसी तरह खिला कर सुलाया ताकि अगली सुबह वे स्कूल के लिए समय पर जाग पाएँ।

मेहमानों के जाने तक वह थक कर चूर हो चुका था। हालांकि उसके कुछ काम अब भी बाकी थे लेकिन हिम्मत नहीं। उन्हें छोड़ वह सोने चला गया। लेकिन वहां उसकी बीवी इंतज़ार में थी। उसे अपना वैवाहिक कर्तव्य भी निभाना था जो कि उसने बिना शिकायत किए पूरा कर लिया।

अगली सुबह जैसे ही उसकी आंख खुली, वह भगवान के सामने फिर नतमस्तक था, लेकिन इस बार उसने फिर से पुरुष हो जाने का वरदान मांगा- ‘हे भगवान, मैं गलतफहमी में था, मुझसे भूल हुई। घर पर रहने का मज़ा मैंने चख लिया अब मुझे फिर से पुरुष बना दो।’

भगवान ने कहा,- ‘वत्स, मुझे खुशी है कि तुम्हें वास्तविकता का पता चल गया है। अब तुम्हें फिर पुरुष बनाने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन तुम्हें नौ महीने तक इंतज़ार करना पड़ेगा। तुमने कल रात गर्भ धारण कर लिया है’!

उत्तर आधुनिकता

उत्तर आधुनिकता
उन्नीसवी सदी की शुरुआत में हर कोई अपने को आधुनिक कहलाने में फक्र महसूस करता था , लेकिन इकिस्वीं सदी के शुरू में कोई भी उत्तराधुनिक नहीं कहलाना चाहता । सही मायने में उत्तरआधुनिकता का स्वरुप विरोधाभासी है । जैसा कि हर प्राकृतिक पदार्थ या प्रक्रिया का होता है । हालाँकि उत्तरआधुनिकता को बाजारी शक्तियों द्वारा पैदा कि गई प्रवृति कई बार माना गया है फिर भी उत्तर आधुनिकता में बहुत कुछ ऐसा पनपा है जो बाजारी शक्तियों और बाज़ार की रणनीति के बाहर की बात है और उसकी पकड़ से बहुत दूर है । हाशिये पर पड़े लोगों को उत्तर आधुनिक तकनीकी विकास ने जो फलक और ताकत दी है वह आज से पहले सम्भव नहीं थी । मॉल की चकाचोंध ने आम आदमी को अपनी ओर ललचाती निगाहों से देखने को मजबूर किया है तो दूसरी तरफ़ अनेकों को रोजीरोटी भी दी है । जिन चीजों को वह पहले बस टीवी या सिनेमा के परदे पर ही देखता था उन्हें छू कर उनकी वास्तविकता को जाँच परख सकता है । वायवी दुनिया के सच को भी वह अब ज्यादा करीब से और खरा खरा जनता है । बच्चा मैगी या चिप्स खाने की जिद करता है , माँ-बाप उसे ले भी देते हैं , लेकिन जब पेट में दर्द होता है तो उसका कारण बताने पर अगली बार बच्चा लेने से पहले सोचता है । उत्तराधुनिक जीवन शैली को जीते हुए हम सब लोग इसकी कमियों से बच कर अपने जीवन को सुरक्षित और सुखी बनाने में ही लगे हैं और यदि ईमानदारी से जिएँ और कहें तो अधिकतर सफल भी हो रहें हैं । संतुलित जीवन के इससे अच्छे और सफल आदर्श हमें आज से पहले मुश्किल ही मिलते थे ।

Sunday, September 14, 2008

हमारी हिन्दी

हिन्दी ने वरदान दिया ,
जीने का अभिमान दिया
इसकी सेवा में मन प्राण अपने लगायेंगे
जन-जन की प्यारी भाषा यह
उन्मुक्त उड़ने की अभिलाषा यह
अपने संग सबको आगे लेजायेगी ,
मन और बुद्धि की सच्ची आजादी क्या है
इसकी परिभाषा बतलाएगी ।

Saturday, September 13, 2008

उङान - ०१

११- सितम्बर -२००८ सायं ६:३०, इंडिया हैबीटैट सेंटर का "स्टाइन सभागार" दर्शकों कि भीङ से भर चुका है आज वहाँ सभी जयजयवंती वार्षिकोत्सव मनाने को एकत्रित हुये हैं और खास बात यह भी है कि वहाँ "अनुभूति" "अभिव्यक्ति" कि संपादिका सुश्री पूर्णिमा वर्मन जी को "जयजयवंती सम्मान" से सम्मनित किया जायेगा शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो इंटरनेट हिन्दी से जुङा हो और उन्हें ना जानता हो, अगर मैं उन्हें इंटरनेट पर हिन्दी कि जननी कहूँ तो इसमें कोई दो राय नहीं. आज हज़ारों कि संख्या में ब्लाग्स हैं संकङो कि संख्या में हिन्दी वेबसाइटस हैं. उनपर कोई अपने लिये काम कर रहा है, कोई प्रसिद्धी पाने के लिये तो कोई तानाकशी के लिये. निष्पक्ष भावना से सिर्फ हिन्दी के लिये काम करने वालों में पूर्णिमा जी का नाम सर्वोपरि है.

ये समस्त स्त्री वर्ग और साहित्य से जुङे लोगों के लिये अत्यंत गौरव की बात है. पूर्णिमा जी बहुत सरल और बहुमुखी प्रतिभा वालीं व्यक्तितव हैं. उनसे मिलना, बातें करना, उनके काम करने कि शैली, उनकी लगन और हिंदी के लिये उनका प्रेम सभी कुछ प्रेरित करता है हिन्दी के लिये कुछ करने के लिये.

पूर्णिमा जी ने अपने छोटे से वक्तव्य में कहा हिन्दीं कई जगहों पर अभी भी बहुत पीछे हैं, जैसे यदि विकीपीडिया में सभी रोज़ कुछ ना कुछ डालें तो भी हम हिन्दी को बेहतरी के ओर ला सकते हैं. हिन्दी से कैसे ज्यादा से ज्यादा लोग जुङे इसके लिये उनके अथक प्रयास हमेशा अग्रसर रहते हैं। वे अपनी वेबसाईट पर कई महोत्सव कराती रहती हैं, अभी वे व्यापक ढंग से कथा महोत्सव करा रही हैं. आप सब भी उस महोत्सव में अपनी उपस्थिती दर्ज करा सकते हैं.

ये कुछ लिंक "अनुभूति" "अभिव्यक्ति" के
http://www.abhivyakti-hindi.org/
वहाँ लिये गये कुछ फोटों जल्द ही आप लोगो के साथ भी बाँटूगी।

समय बहुत बदल रहा है, खासकर स्त्रियों के लिये. आज की हर नारी एक प्रेरणा हैं मिसाल है, हमारी आने वाली अगली नस्लों के लिये. यहाँ तक का सफर स्त्री ने खुद ही तय किया है और आगे उम्मीद है कंधे से कंधा मिलाकर वो अपनी सहस्र शक्तियों से अवगत कराती रहेगी.

Friday, September 12, 2008

हिमालय से कोई गंगा निकालनी चाहिए ------

हो गई है पीर पर्वत सी , पिघलनी चाहिए इस हिमालय से कोई गंगा निकालनी चाहिए
संघर्ष से निकली मन्दाकिनी कितनों के पाप धोएगी , कितनों का कल्याण करेगी , कितनों की प्यास बुझाएगी और कितनों की पर लगायेगी गंगा के अमरत्व से अमर बनने की चाह तो सबकी है , लेकिन समस्या यह है कि इस अमरत्व देने वाले जल को लाने का संघर्ष कौन करेगा सदियों से इस संघर्ष का बीड़ा बहुधा , बहुत से समाजों में औरतों ने ही उठा रखा था , लेकिन अब कहीं उनकी कमर टूट चुकी है तो कहीं वे स्त्री विमर्श में डूब चुकी हैं कहीं उनकी प्रोफेशनल आकांक्षा सर उठा आस्मां चुना चाहती है तो कहीं जन्म से पहले ही उनका सर कुचल दिया गाया है कहने वाले कहेंगे कि सारी व्यवस्थाएं बिगड़ गयीं , सारे समीकरण बदल रहे हैं और अब सब ख़त्म हो जाएगा
हम जो देख रहे हैं , सोच रहे हैं, समझ रहे हैं वह ही सब कुछ नहीं, मुझे ऐसा लगता है हडबडाने से कुछ संवरेगा नहीं , बल्कि हम अपना और भी नुकसान कर सकते हैं प्रकृति और समाज के बदलते हालत का हमें जयादा गहराई और संजीदगी से अध्ययन करना चाहिए धैर्य के साथ परस्पर देश, जाति, लिंग, धर्म आदि के
मतभेदों को केवल अपनी ही नहीं , दूसरों की दृष्टि से भी देख समझ कर उनका हल खोजना चाहिए ऊंची कुर्सी पर बैठे समाज के नियंताओं की दृष्टि अक्सर धरातल की गहराइयों और सूक्ष्मताओं को देख नहीं पाती नियंता अपने अधिकार के अंहकार या मोह में बहुत सी अटल में छिपी सचाइयों को कई बार तो देख ही नहीं पाता तभी उसके निर्णय सफल नहीं हो पाते हम सब जहाँ भी जिस अधिकार की कुर्सी पर बैठे हैं , सोच समझ कर सारे निर्णय लें पुरूष , माँ, स्त्री , पिता , सरकारी या सामाजिक अधिकारी या कोई भी रूप अपने हर रूप में हमारे पास कुछ न कुछ मूलभूत जीने के और दूसरों को सुंदर जीवन देने अधिकार अवश्य ही हैं

Thursday, September 11, 2008

सच्ची कहानी

-स्तुति रानी

निराली सी इक बात सच्ची कहानी
मुझको है जो याद पर मुंह जबानी
कहती थी मुझको यह बचपन में नानी
समझती थी जब मैं उसको कहानी
शायद न समझी थी तब उसका मानी
वो सच्ची कहानी, नहीं थी कहानी
हमारी तुम्हारी ही थी जिंदगानी


स्तुति दिल्ली और पत्रकारिता के लिए नई हैं लेकिन कलम के लिए नहीं। वे बचपन से कविताएं लिखती रही हैं, पर ज्यादातर अपनी डायरी के लिए ही। मेरे कहने पर सकुचाते हुए उन्होंने इस कविता को बाहर की दुनिया दिखाई है। इसमें जो अनकही बात है हम सब उसको बिना सुने भी समझते हैं। है कि नहीं?

Tuesday, September 9, 2008

Being vegetarian

Its really impressive that global warming can be reduced by being vegetarian . It is an added advantage and will reduce the emission of greenhouse gases . As it is global warming is causing srrious problems for the world and vegetarian people may feel happy ....being the reason for reducing it.

Monday, September 8, 2008

पुरुष की यह रूढ छवि पुरुषों की पहल से ही बदलेगी

पिछले दिनों मुझे पुस्तक मेले से एक नायाब किताब मिली,इस् पुस्तक की लेखिका हैं चित्रा गर्ग जो भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार से भी सम्मानित है ।पुस्तक का शीर्षक है "नारी अपने रिश्तों का निर्वाह कैसे करे"।यह स्न्योग ही है कि जिस समय हिन्दी के ब्लॉगर स्त्री की नैतिकता और मर्यादा की अहमियत पर पोस्टस लिख रहे थे , मुझे यह पुस्तक देखने को मिल गयी।मात्र 68 रु. की यह किताब मुझे बहुत आकर्षक लगी।इसके कई उपयोग हैं जो कंटेंट देख कर कहा जा सकता है।पर कुल मिलाकर 68 रु.भी बर्बाद करने की क्या ज़रूरत है क्योंकि इस तरह का ज्ञान तो हमारे देश मे हर कोई लड़की, बच्ची , स्त्री को मुफ्त बांटता फिरता है।चाहे वह रेलवे प्लैटफोर्म का अधिकारी हो या एक पिता।पर मुझे तो आप सभी से यह बांटना था ,इस बहाने कुछ लोगों के पैसे बच जायेंगे :-)
किताब की विषय सूची मे ग्यारह अध्याय हैं -
1.पति-पत्नी के रिश्ते
{किसी वूमेन पत्रिका के लिए बढिया सामग्री है}
2.देवर-भाभी के रिश्ते कितने नाज़ुक
3.ननद-भाभी के रिश्ते कितने नाज़ुक
4.देवर-जेठ से रिश्ते
5.सास-बहू के रिश्ते
6.ससुराल के अन्य रिश्ते
7.जीजा-साली के रिश्ते
8.सहेली से रिश्ते
9.कामकाजी नववधुओं के रिश्ते
10.माँ-बेटी के रिश्ते
11.माँ-बेटे के रिश्ते

एक अध्याय की कुछ पंक्तियाँ पेश ए नज़र हैं
"कार्यालय में कभी कभार अपने पति व बच्चों के बारे मे बात करती रहें,ताकिपुरुष कर्मियों को इस बात का अहसास रहे कि आप परिवार को समर्पित महिला हैं।वे आपमे आदर्श पत्नी या स्त्री की छवि ही देखेंगे व आपको छेड़ने का साहस नही कर सकेंगे"
पृ.155
"विवाहित महिलाओं के लिए बेहतर यही है कि वे किसी मौके पर अपने पति से अपने सहकर्मियों की मुलाकात करवएँ। ऐसे मे सहकर्मी आपके पति व परिवार के बारे मे जानकर बेवजह आपके निकट नहीं आयेंगे"
पृ.154
"यह एक समान्य सी बात है किजीजा-साली के बीच छेड़छाड़ चलती रहे,परंतु हर लड़की का दायित्व है कि अपने जीजा के अति नज़दीक आने से बचे।उसे अपने पर फिदा होने का इतना मौका न दे कि जीजा उसकी बहन को भूलकर केवल उसकी ओर आकर्षित हो जाए।कोई भी लड़की यह कदापि नही चाहेगी कि उसकी बहन का परिवार टूट जाए।"
"हर लड़की को अपने जीजा के चुम्बन व ऐसी छेड़ छाड़ का शुरु से ही विरोध करना चाहिये।...जीजा से अकेले मिलना,बहन के बिना अकेले घूमने जाना,फिल्म या प्रदर्शनी देखने जाना।ऐसी अवस्था से बचना चाहिये।कई बार बीमार बड़ी बहन की तीमारदारी करने आई बहन की ओर जीजा आकृष्ट हो जाता है....."पृ.137
एक पुत्री का हितचिंतक पिता या स्नेही बड़ा भाई या माँ ऐसी पुस्तक बेटी को किशोरावस्था मे प्रवेश करते ही पकड़ा दे और पढवा दे तो सोचिये समाज का कितना भला होगा।दुनिया बड़ी खराब है। आखिर आप दूसरों को तो नही समझा सकते ,पर अपनी बेटी को तो समझा ही सकते हैं न!
ऊपर के समस्त उद्धरण पढकर ऐसा नही लगता कि यह मान्य तथ्य औत सत्य है कि पुरुष स्वभावत:भ्रष्ट है , दुराचारी है ,मर्यादाहीन है ,और उसे सुधारा भी नही जा सकता, शिक्षा भी नही दी जा सकती और उसके ऐसे व्यवहार को बहुत हद तक समाज का समर्थन है वर्ना एकाध पुस्तक तो ऐसी भी लिखी ही जा सकती थीकि "पुरुष अपने रिश्तों का निर्वाह कैसे करे" जैसी कि आदत है नैतिकता की सारी ज़िम्मेदारी स्त्री की है, और पुरुष की अनैतिकता की ज़िम्मेदारी भी स्त्री की ही है।इसलिए ही यह कहावत बार बार कहते हैं लोग- "चाकू सेब पर गिरे या सेब चाकू पर ,कटेगा तो सेब ही। "तो माना जाए कि पुरुष की अनैतिकता को अप्रत्यक्ष समर्थन है और इस छवि में बदलाव न लाना पुरुष को आज़ादी और सहूलियत देता है !नहीं तो प्रयास करने होंगे हमे इस धारणा को बदलने के।


मेरी दृष्टि में, पुरुष समाज की यह छवि जो बन गयी है, उसे तोड़ने का पुरज़ोर प्रयास आज की पीढी द्वारा किया जाना चाहिये।आप कैसे सह सकते हैं कि पुस्तकें , नीतिशास्त्र ,लोक व्यवहार आपको बार बार व्यभिचारी ,लोलुप और भ्रष्ट कहे और साबित भी करे??और एक स्त्री को आपके अन्याय ,दुराचार के खिलाफ हमेशा सतर्क होने की सलाहें दे?

पुरुष समाज की ऐसी छवि को तोड़ने की पहल पुरुष की ओर से ही हो सकती है। मुझे पूरी उम्मीद है कि यह छवि किसी आत्मसम्मानी पुरुष को स्वीकार्य नही है।क्योंकि मै मानती हूँ कि सभी पुरुष व्यभिचारी नहीं हैं।तो उठो मित्रों सिद्ध करो कि यह प्रपंच है , बकवास है !पुरुष बॉस , जीजा, देवर ,मंगेतर के रूप में पुरुष को अन्य परिवार जनों और स्त्री साथियों से कैसा व्यवहार करना चाहिये इसकी कुछ शिक्षा अपने बेटो को भी दें ।
वास्तव मे पिता की पहल से ही समाज मे हालात बदलेंगे ।स्त्री के बीच साथी-साथिन का रिश्ता हो न कि भेड़- भेड़िया का ।ऐसे रिश्तों की इमेज बनने वाली पुसतकों और कहावतो का खुल कर विरोध करें।


इस पुस्तक के अन्य अध्यायों के बारे मे आगे भी आपको अवगत कराऊंगी।

Saturday, September 6, 2008

नया ज्ञानोदय मे साइबर फेमिनिज़्म और हिन्दुस्तान में चोखेर बालियाँ

यह मानविन्दर भिम्बर का सराहनीय प्रयास है कि हिन्दुस्तान के मेरठ संसकरण में रीमिक्स पेज के "ब्लॉग से" कॉलम में वे हिन्दी के ब्लॉग्स पर जानकारियाँ और समीक्षा लिख रही हैं।कल के अंक में उन्होंने चोखेर बाली पर एक बेहद अच्छा लेख लिखा है जिसे आप यहाँ पढ सकते हैं या सीधे उनके ब्लॉग पर कमेंटस के साथ भी।




इसके अतिरिक्त इस बार के "नया ज्ञानोदय" के अंक में मनीषा कुलश्रेष्ठ का लेख आया है "सायबर फेमिनिज़्म" जिसमें उन्होंने सायबर फेमिनिज़्म को परिभाषित करते हुए - मोहल्ला, प्रत्यक्षा,डॉटर्स क्लब , मनोशी ,चोखेर बाली का उल्लेख किया है।मोहल्ला ,डॉटर्स क्लब ,और प्रत्यक्षा के ब्लॉग के पते मौजूद हैं {जिनमें सिर्फ मोहल्ला का पता सही रूप से छपा है,बाकि शायद छापे की त्रुटि के शिकार हो गये}चोखेर बाली का पता नही दिया गया है।साथ ही एक छोटी {जो शायद उतनी छोटी नही}सी भूल यह है कि मानोशी के ब्लॉग का पता उन्मुक्त ब्लॉगस्पॉट दिया गया है।
यह एक अच्छा प्रयास है। पर और भी अच्छा लगता कि लेखिका हिन्दी ब्लॉगजगत के समूचे परिदृश्य को निष्पक्ष रहकर ,ठहरकर देखतीं ।अन्य ब्लॉग पर हो रहे स्त्री विमर्श को भी स्थान देतीं और चोखेर बाली के नामोल्लेख के साथ कुछ परिचयात्मक भी कहतीं।पर कुल मिलाकर यह हिन्दी ब्लॉग्स के लिए अच्छा है कि प्रिंट की चर्चा मे लगातार बनें हुए हैं।

कैंसर को हराते लोग

इंदौर में कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें कभी कैंसर ने दबोचा था लेकिन उनमें ऐसा कुछ था जिसके चलते उन्होंने न केवल इसे हराया बल्कि वापस जीवन में लौटकर वे फिर हंसते-गाते देखे जा सकते हैं। जीवन के रस से सराबोर, हर पल को अमूल्य समझते हुए अपने परिजनों और मित्रों के साथ खिलखिलाते हुए। उनके जीवन में आस्था के फूल खिले हैं और उनकी खुशबू में अपनी जिजीविषा को वे नए अर्थ दे रहे हैं। वेब दुनिया के रवींद्र व्यास ने 2002 में यह लेख लिखा था, लेकिन यह आज भी बराबर सामयिक और सार्थक है।- अनुराधा

गुडबाय कैंसर

रवींद्र व्यास

पता नहीं वह किस दिशा से आता है। कब आता है। बिना कोई आहट किए...देब पांव। धीरे-धीरे, चुपचाप। और आकर ऐसे दबोचता है कि जीवन का रस सूखने लगता है और जीवन के वसंत में पतझड़ का सन्नाटा पसर जाता है। लगता है जैसे वह किसी केकड़े की तरह सरकता हुआ भरे-पूरे जीवन को अपने जबड़ों जकड़ लेता है। उसका नाम सुनते ही भय पैदा होता है। सिहरन-सी दौड़ जाती है...कंपकंपी पैदा होती है....कैंसर।

मेरे शहर इंदौर मे कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें कैंसर ने कभी दबोचा था लेकिन उनमें ऐसा कुछ माद्दा था जिसके चलते उन्होंने न केवल कैंसर को हराया बल्कि जीवन में वापस लौटकर वे फिर हंसते-गाते देखे जा सकते हैं। जीवन के रस से सराबोर, हर पल को अमूल्य समझते हुए। अपने परिजनों और मित्रों के साथ खिलखिलाते हुए। उनके जीवन में आस्था के फूल खिले हैं और उनकी खुशबू में अपनी जिजीविषा को वे नए अर्थ दे रहे हैं।

अपने आत्मबल, आत्मविश्वास, अदम्य और अथक संघर्ष के साथ वे एक भरा-पूरा जीवन जी रहे हैं। कुछ मित्र-परिजनों का आत्मीय साथ, हमेशा हिम्मत बंधाता हुआ। और मौन के समुद्र में प्रार्थना के मोती झिलमिला रहे हैं जिनसे निकलती रोशनी की किरणें उनके जीवन को सुनहरा बना रही हैं। श्रीमती सीमा नातू को सन् 98 में पता चला कि उन्हें कैंसर है। वे कहती हैं-तब मेरे सामने मेरा दो साल का बेटा था। मैंने ज्यादा सोचा नहीं क्योंकि आदमी सोच-सोचकर ही आधा मर जाता है। बेटे को देख-देखकर ही मैंने ठाना कि कि मुझे जीना है। स्वस्थ रहना है। मैंने कई शारीरिक और मानसिक तकलीफों को सहा और भोगा लेकिन हार नहीं मानी। आज मैं स्वस्थ हूं।

सुगम संगीत की शौकीन श्रीमती नातू अब सामान्य जीवन बिता रही हैं। वे कहती हैं-मैं जीवन का हर पल जीना चाहती हूं। हर पल का सदुपयोग करना चाहती हूं।

एक युवा हैं नितीन शुक्ल। हट्टे-कट्टे। हमेशा हंसते-खिलखिलाते। उन्हें देखकर कल्पना करना मुश्किल है कि उन्हें कैंसर हुआ था। उनका हंसमुख व्यक्तित्व बरबस ही आकर्षित करता है। वे बहुत ही मार्मिक बात कहते हैं-यह जानकर कि मुझे कैंसर है, मैं डरा नहीं। निराश भी नहीं हुआ। मुझे लगता है कैंसर रोगी उतना प्रभावित नहीं होता जितना उसके परिवार वाले। उनके चेहरों पर हमेशा दुःख और भय की परछाइयां देखी-महसूस की जा सकती हैं। इसलिए मैंने तय किया कि मैं कैंसर से फाइट करूंगा और अपने परिवार को बचा लूंगा। दो बेटियों के पिता नितीन कहते हैं मैं अपने छोटे भाई के साथ मुंबई अकेला गया। सारी टेस्ट कराईं। इलाज कराया। मैंने हिम्मत नहीं हारी औऱ आज आप मुझे अपने परिवार के साथ हंसता-खेलता देख रहे हैं।

कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने कैंसर पर विजय पाकर अपने जीवन को दूसरों के लिए समर्पित कर दिया है। इनमें से एक हैं श्रीमती विशाखा मराठे। वे इंदौर के एक वृद्धाश्रम में बुजुर्गों की सेवा करती हैं। उन्हें सन् 96 स्तन कैंसर हुआ था। पहला आपरेशन बिगड़ गया वे दुःखी थीं लेकिन टूटी नहीं, हारी नहीं। वे कहती हैं-मेरे तीन आपरेशन हुए और ठीक होने के बाद मैंने तय किया कि असहाय लोगों के लिए काम करूंगी। मुंबई में टाटा इंस्टिट्यूट में ट्रेनिंग ली, गाड़ी चलाना सीखा और आज मैं घर और बाहर के अपने सारे काम करती हूं।

इसी तरह युवा आरती खेर का मामला भी बहुत विलक्षण है। परिवार में सबसे पहले उन्हें ही सन् 95 में पता लगा कि उन्हें ब्लड कैंसर है। वे कहती हैं- आप विश्वास नहीं करेंगे, मैं कतई दुःखी नहीं हुई। निराश भी नहीं। शारीरिक तकलीफ तो सहन करना ही पड़ती है। मुझे नहीं पता मुझे कहां से शक्ति आ गई थी। मैंने अपने डॉक्टर के निर्देशों का सख्ती से पालन किया। इसीलिए जल्दी अच्छे रिजल्ट्स मिलने लगे और एक दिन मैं ठीक हो गई। आरती ठीक हो गई हैं और पेंटिंग का अपना शौक बरकरार रखे हुए हैं। वे मनचाही तस्वीर बनाती हैं, मनचाहे रंग भरती हैं। वे बच्चों को पढ़ाती भी हैं।

श्रीमती आशा क्षीरसागर का मामला अलग है। उन्हें जब मालूम हुआ कि वे कैंसरग्रस्त हैं तो उन्हें धक्का लगा। वे बेहत हताश हो गईं। वे कहती हैं-मुझे लगा अब जिंदगी मेरे हाथ छूट गई है। मुंबई इलाज के लिए गई। वापस आई तो लगा जीवन ऐसे ही खत्म नहीं हो सकता। इसलिए अपने दुःख-निराशा को झाड़-पोंछकर फिर सामान्य जीवन में आ गई हूं। अब मैं घर के सारे काम बखूबी संभाल लेती हूं। खूब घुमती-फिरती हूं। फिल्में देखती हूं। लगता है कैंसर के बावजूद जीवन कितना सुंदर है।

बैंक के सेवानिवृत्त अधिकारी एम.एल. वर्मा को सन् 89 में इसोफेगस का कैंसर हुआ। उनकी आवाज चली गई थी। बोलने में बेहत तकलीफ होती थी। सांस लेने में जान जाती लगती थी। वे कहती हैं-मेरी चार लड़कियां हैं। मुझे ठीक होना ही था। मैं ठीक हुआ। कैंसर से लड़ने की ताकत मुझे अपनी बेटियों से मिली। मैं तीन की शादी कर चुका हूं, चौथी की तैयारी है। श्री वर्मा का स्वर यंत्र निकलने के बावजूद वे अब ठीक से बोल पाते हैं। खाने-पीने में शुरुआती तकलीफ के बाद अब इसमें कोई समस्या नहीं आती। वे कहते हैं-मौत एक बार आनी ही है लेकिन विल पावर के चलते आप बड़ी से बड़ी प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ सकते हैं। दो-तीन कीमो-थैरेपी और 30 रेडिएशन के बाद उनके गले में छेद किया गया था जिसके बदौलत वे बोल पाते हैं। पेट से हवा खींचकर वे अपने स्पीच को इम्प्रूव कर रहे हैं। यानी बिना स्वर यंत्र के जीवन से सुर मिला रहे हैं। वे कहते हैं-कैंसर होने के आठ साल तक यानी सेवानिवृत्त होने तक ईमानदारी से नौकरी की। आज मैं अपने जीवन से संतुष्ट हूं।

तो ये वे लोग हैं जो कैंसर को पूरी तरह जीत चुके हैं। कहने की जरूरत नहीं, जीवन जीने की की अदम्य चाह के कारण ही वे एक बड़े रोग से गुजरकर, जीवन के वसंत में सांसें ले रहे हैं। जहां उनके स्वप्न हैं, उनकी आकांक्षाएं हैं, छोटे-छोटे सुख हैं और है एक भरा-पूरा संसार जो लगातार उन्हें कुछ सार्थक करने की प्रेरणा और उत्साह देता रहता है। क्या इनका जीवन दूसरे लोगों के लिए प्रेरणा नहीं बन सकता?

Friday, September 5, 2008

मेरे मालिक


-जब कहा उसने-
-मै अकेली नही-
-मेरे मालिक हैं साथ मेरे-
-क्या तुम अकेली हो?
-मैने देखा उसे मुस्कुराकर और कहा-
-जो मालिक है तेरा वही तो है सबका रखवाला-
-जो रहता है तेरे साथ वही तो है मेरे साथ-
-सुनकर वो झल्लाई,थोडा पगलाई और बोली-
-हम बात करते है अपने पालन हार की-
-मैने कहा हाँ वही तो है जग का पालन हार-
-मै भी तो हूँ उसके साथ-
-इस बार सब्र टूट गया-
-सुन्दर प्यारी आँखों मे-
-पानी सा घूम गया-
-कहा उसने हैरान परेशान-
-अरे! नही है मेरा घरवाला बेईमान-
-मेरा मालिक बस मेरा है-
-उसकी आँखों की सच्चाई-
-उस पुरानी फ़िल्म से जा टकराई-
-जो देखी थी बचपन में कभी-
-कि मेरा पति मेरा देवता है-
-मै असमंजस में थी-
-जिंदगी भर का वादा कर-
-कैसे बन जाता है कोई देवता या मालिक?
-क्या औरत है एक मकान-की चाहर दिवारी-
-और वो मालिक-
-जो रखे उसकी साज-सम्भाल,
-टूट-फ़ूट की जिम्मेदारी-
-कब आयेगी ऎसी बेला-


-जब होगा उसका अपना वजूद-
-और नारी होगी बस एक नारी-





सुनीता शानू

शिक्षक diwas

आज शिक्षक दिवस हा और मैं अपने श्रद्धा सुमन उनको अर्पित करती हूँ।

मेरे विचार मे शिक्षको योगदान समाज मे बहुत ही महत्वपूर्ण हा, वोह ही नींव मजबूत करते हैं, मैं अज भी अपने पहले शिक्षक को नही भूल सकती और वोह थे श्री रामेश्वर दयाल शर्मा, उस जमाने मे उन्हें अंग्रेजी नही आती थी,पर मेरे जीवन मे शिक्षा और ज्ञान का आरम्भ उन्ही से हुआ, उन्होंने मुझे सिखाया की---पढ़ाई मन लगा के करना , कभी नक़ल न करना,परीक्षा मे इमानदारी भी उतनी ही जरूरी हा जितना अच्छे मार्क्स आना। और उन्होंने नींव डाली एक अच्छे नागरिक की जो इमानदारी मे, म्हणत मे विश्वास रखा हो।

मेरे ससुरजी भी शिक्षक थे, और यह विश्वास था उनका की शिक्षा को बेचा नही जा सकता, और इसीलिए वोह बच्चो को पढाते थे पर कभी पैसा नही लेते थे, उनके परिवार ने काफ़ी आर्थिक समस्याओ का सामना किया प उन्होंने अपने विचार नही बदले, और आज उनके सब बच्चे उच्च शिक्षित हा और उनके शिष्य भी।

लेकिन अज हमारे समाज मे शिक्षको की न वोह इज्ज़त हा और न ही शिक्षक वैसे हा, और कहीं शिक्षको का भी शोषण हो रहा हा। इज्ज़त तो इसलिए नही हा की अब शिक्षको मे वोह जज्बा ही नही रहा अब तो तुइशन का जमाना हा, कक्षा मे ठीक से पढाने से टयूशन कहाँ मिलेगी.और विद्यार्थियों के लिए शिक्षा का महत्व ज्ञान से नही मार्क्स से रह गया हा।

अज पब्लिक स्कूल मे कितने शिक्षक ऐसे हैं जो बहुत ही शोषित अवस्था मे जीवन व्यातीत कर रहे हैं, उन से काम बहुत ज्यादा लिया जाता हा और सलरी दी नही जाती ठीक से,कहीं कहीं १००-२०० / वर्ष का इन्क्रीमेंट बस.और कहीं कोई पूछने वाला नही, विशेष रूप से महिला शिक्षक, अज टाईम्स ऑफ़ इंडिया मे आया हा की महिलाओं की सेलेरी को इतनी प्राथमिकता नहिऊ दी जाती. यह इतने पे कमीशन अदि बैठते हैं पर कोई इन स्कूलों को नही देखता.जर्रोरत हा अज राज्य सर्कोरी की जो सक्रिय हा और हमारे शिक्षको की गरिमा को वापस लायें और उन्हें गुरु का स्थान वापस दिल्याये। अज आर्थिक कारणों से शिक्षक इतना दयनीय हो गया हा की इस व्यवसाय मे कम लोग जाना चाहते हैं, और जब तक गुरु अच्छे नही होंगे, हमारा भविष्य अच्छा कैसे होगा.

Thursday, September 4, 2008

मेरी सखी,तस्वीर मेरी


अर्चना पांडा

ज़िन्दगी भर उस से मेरी होड़ सी लगी रही,
वो पहेली, मेरी सहेली , निज रक्त सी सगी रही ,
बात करके आज उस से , मन लगा उड़ने वहां पर ,
घर द्वार , इस संसार से, हट के बसे दुनिया जहाँ पर ,

जल उठी मेरी मन की नारी , उस चंचला को देख कर ,
स्वयं को उस आकांक्षी से नापते लगता है डर ,
चले तो एक साथ थे , हम दोनों एक चाह में,
उच्च शिखरों के स्वप्न में , अभिलाषा के राह में ,

मेरी सखी, जिसने रखी, जो भी कहा सब कर गई ,
मैं तो जैसे , इतनी जल्दी, इस जीवन से डर गई ,
पच्चीस में ही पचास का एहसास जब होने लगे ,
उमंगें जब कर्तव्य के काँधें पे ही सोने लगे ,
जब स्वप्न से आकर भिडें धरातल की वो सच्चाइयाँ,
तोड़ दे तरंगों को जो संसार की परछाईयाँ,

तो विद्रोह कर उठ ता है मन की क्यों चडी उस डाल पर,
जहाँ पहुँच कर बस नहीं है , स्वयं अपना काल पर ,
जब नचाता है समय इंसान को निज ताल पर ,
देख हंस देता है मानव स्वयं अपने हाल पर ,

कहने लगी मेरी सखी क्या थी तू क्या हो गई ,
क्या तेरे सपनों की वो सारी कलियाँ खो गई ?
बादल, झरने, बरखा, पानी ,
तितली , छतरी , आसमानी ,
क्या तेरे जग जीतने की वो अभिलाषा खो गई ?
तू तो एक छोटे से घर की हो गई ,

उत्तर दिया मुड कर उसे मेरे विवेक ने गर्व से ,
हैं कम नहीं मेरे ये दिन त्यौहार या किसी पर्व से ,
जीता जगत तो क्या जीता , बन गए राजा तो क्या जानें ?
कर सको जीवन रचना , फूँक सको प्राण तो हम मानें !

पाया जो नारी का ये तन वात्सल्य प्रथम कर्तव्य है ,
आज ममता के ही दम से विश्व जनता सभ्य है ,
कर सकें हम गर किसी एक हृदय का शुद्ध विकास ,
तभी रास्ट्र निर्माण बन पायेगा सक्षम अविनाश ,

मत मान लो, घर द्वार मेरे स्वप्न का परित्याग है ,
मेरी आकांक्षा तो बड्नावल की वो आग है ,
कर्तव्य की प्राथमिकता अनुसार नारी ढलती है यहाँ ,
पर आकांक्षाएं तो संग संग चलती है यहाँ ,

पंचम में बृहस्पति अब मेरा गुरु हुआ है ,
अरे देखो ना , जीवन तो अभी शुरू हुआ है !
जो कहा था मैंने ना कर दूँ, अब वही तीर तो साधा है,
सब होगा सिद्ध अब जीवन में, ये मेरा तुमसे वादा है !

सुन मेरे ये वचन मेरी सखी अब मौन है ,
बंधुओं अब ये तो बूझो, वो सखी आख़िर कौन है ?
इस बात को कैसे कहूँ, इसी बात का तो दुःख है ,
वो कोई और नहीं मेरी तस्वीर का ही रुख है ,

रुख वह जो अब तक बचपन के उन ख़्वाबों में बंद है ,
जो उन्मुक्त है , आजाद है , स्वतंत्र है, स्वछन्द है ,
एक रुख ये है जो रखे है पहले जिम्मेदारियों को ,
प्रणाम करते हैं अंत में सब माँओं को सब नारियों को |

अर्चना पांडा ने अपनी यह कविता चोखेर बाली के लिए भेजी है।उनकी कविताओं का सस्वर वाचन यूट्य़ूब पर देख सकते हैं उनके ब्लॉग कविता प्रयास पर ।

Wednesday, September 3, 2008

कुछ ऐसे ही

आज मन हुआ कुछ ऐसे ही लिखा जाये, कलम को कुरेदने देते है दिमाग की परत दर परत को और देखते हैं क्या निकलता है. शायद गपशप, कुछ सवाल, कुछ प्रतिक्रियायें या न जाने क्या क्या. पता नहीं आप में से कितने लोग नये चैनल "कलर्स" में प्रसारित होने वाले कार्यक्रम "बालिका वधू" (जो हर रात ८ बजे आता है) देखते हैं अरे नहीं मैं कोई मार्केटिंग नहीं कर रही, मुझे ये प्रोग्राम बहुत पंसद है इसलिये सोचा आप सब से भी पूछूँ. आनन्दी (१० या १२ साल की उम्र है) का किरदार निभा रही छोटी, प्यारी सी बच्ची बहुत सहज है जिसका विवाह हो चुका है. शायद ये प्रोग्राम भी हमारे मंच से कहीं ना कहीं तो मेल खाता ही है, अब कल का एपिसोड ही देख लीजिये -- "आनन्दी के ताऊ ससुर सज संवर रहे हैं, जिनकी बीवी (आनन्दी की ताई सास) की अभी हाल फिलहाल ही मृत्यु हुई है आनन्दी बहुत सहजता और मासूमियत से बोलती है ताऊ जी आप ये इत्र मत डालिये दादी देखेगी तो खूब डाटेगीं. आप को ऐसे सजना संवरना शोभा नहीं देता, क्यों की मेरे गाँव मे जो फूलवा थी ना, वो भी विधवा हो गई थी और विधवा हो जाने के बाद सजते संवरते नहीं है, तो आप भी तो विधवा हो गये हैं"

कल मेरी एक मित्र है "भावना" उससे बात हो रही थी. बोली यार चोखेर बाली पङने से मन बहुत खराब हो जाता है, मुझे पता है, इनफैक्ट मुझे क्या सभी को पता होगा कि ये सब तो होता ही है लङकियों के साथ इसमें नया क्या है लेकिन पता होने के बाद जब ये सब पढा भी जाये तो बहुत आघात लगता है और एक नेगेटिविटी आती है. मैंने कहा सच बोल रही हो लेकिन क्या हम कुछ झूठ लिखते हैं?? कई बार लङकियों के पोसिटिव साईड भी तो लिखते हैं, पर क्या करें जब नेगेटिव बाते ज्यादा हैं तो पोसेटिविटी खुद ही दरकिनार हो जाती है. शायद इसीलिये कहते हैं सच कङवा होता है.

खैर छोङिये, कोशिश रहेगी की लङकियो - औरतों के पोसेटिव ऐरियाज़ को ज्यादा उजागर किया जाये, जहाँ एक उमंग हो, एक जज्बा कुछ कर दिखाने का और सहस्रशक्ती कि हम सर्वत्र हैं.

उड़ान

बादलों से कह दो कि अगर
देखनी है हमारी उड़ान ,
तो अपना कद बढ़ा लें
हम पंखों से नही ,
हौसलों से उड़ान भरते हैं ......
सच ही है कि आज कि नारी का विश्वास , साहस ही उसकी पहचान है , उसकी उड़ान निहित है मन कि शक्ति में .....मेरी नजर में येही सही नारीवाद है ...

-----नीलिमा गर्ग

Monday, September 1, 2008

कितना मासूम सवाल है यह..इस मासूमियत पर वारी न जाएँ तो क्या करें

कितना मासूम सवाल पूछा है ,देखिये ,

अब बताईए भला औरत की दुश्मन औरत नहीं तो कौन है?

उफ्फ!!इस मासूमियत पर कोई वारी वारी न जाए तो क्या करे भला !!
जाइये पोस्ट पढ आइए और उस पर हमारी प्रतिक्रिया और फिर आगे पढिये मृणाल पाण्डे {सम्पादक -हिन्दुस्तान } क्या कहती हैं।भई हम तो कुछ है नहीं मृणाल पाण्डे का कहा तो अनसुना नहीं करेंगे न ।

मित्र से संलाप

मैं चुपचाप उसकी बातें सुनती गयी।...
औरत ही औरत की दुश्मन होती है।ब्ब्ब..ब्ब्ब
सारी फेमिनिस्ट औरतें तर्क-विमुख होती हैं और पुरुषों से घृणा करती हैं।ब्ब ..ब्ब्ब्ब..ब्ब्ब्ब
फेमिनिज़्म एक पच्छिमी दर्शन है।कोकाकोला की तरह झागदार और लुभावना आयात भर।ब्ब्ब्ब...ब्ब्ब्ब.ब्ब
नारी-संगठन बस नारे बाज़ी और गोष्ठियों का आयोजन भर करते हैं। गाँवों मे उनकी कोई रुचि नही।ब्ब...ब्ब्ब
मध्यवर्ग की शहरी कामकाजी औरतें काम तो क्या मटरगश्ती करने जाती हैं।घर-बच्चे इसी से टूट रहे है।ब्ब..ब्ब्ब
जो लड़कियाँ ससुराली शोषण और सड़कों पर छेड़छाड़ की शिकायत करती हैं एडजस्ट करना नही जानतीं।ब्ब..ब्ब्ब।

उसकी इस फितूरी और बकवासी,उसकी चुहलभरी तर्ज और उससे भी बढ कर उसका कौवे की तरह तिरछी दृष्टि से बीच बीच में मेरे क्रोध के अप्रत्याशित उफान को मापने की चिर परिचित चेष्टा करना,इन सबसे मेरे भीतर एक आग सी सुलगने लगी थी,पर फिर भी उसका जोश बैठने की उम्मीद में मैने चेहरा भावशून्य और प्रतिक्रियाहीन बनाए रखा।या कम से कम मैने समझा कि मै ऐसा कर रही हूँ।
वैसे वह एक भलमानस और पुराना सहपाठी मित्र है।उसके-मेरे बाल एक साथ सफेद हुए हैं।कई राष्ट्रीय परिवारिक मसलों पर हमने एक दूसरे के विद्रोह को मूक या मुखर समर्थन भी दिया है।कम से कम पुरानी मित्रता की दरकार थी कि उसे पूरा का पूरा सुन ही डाला जाए।सींग भिड़ाए जाएँ तो उसके बाद ही।इससे कम से कम इस कम्बख्त की एक स्थपना तो तुरंत निरस्त होती चलेगी,कि आज की पढी लिखी कामकाजी औरतें अपनी ही कहती है दूसरे की नही सुनतीं।
और भई ईमान से पूछा जाए तो फिर औरतों के मामलों में समाज की स्वीकृत नैतिकता से मिला अंतिम फतवा देने का अधिकार छोड़ने के लिए भला कौन सहजता से तैयार हो जाता है ?

.....
दरअसल ,नारीवाद का विषय ही हैसा है कमबख्त ,कि सालों पुराने और अच्छे खासे बुद्धिमान पुरुष मित्र भी इसे हाथ मे लेते ही अपनी सहज मानवीयता छोड़कर एक पकी पकाई पारम्परिक भाषा मे न्यायाधीश के सुर में बोलने लगते हैं-सभाओं में ,घरों में,सम्पादकीयों में......पुरुष मित्रों की बतकही से लेकर अखबारों-विज्ञापनों और फिल्मों तक में अक्सर स्त्रियों की दश परखते समय ठोस भौतिक सच्चाइयों को तो हम लोग लगातार परे ढकेलते चले जाते हैं,और हमारी तमाम वक्तृता उसके कुछ बेहद रूढिवादी तेवरों या खास तरह की बातचीत या पहनने ओढने ,उठने बैठने की प्रदर्शनकारी वृत्तियों पर ही केन्द्रित होकर रह जाती है।
.......
{दरअसल ठोस सम्वेदनात्मक अनुभव उनके दिमागी खांचे मे फिट नही होते}
क्यों नारी को नारी का शत्रु मानने का इतना गलाफाड़ प्रचार होता है,जबकि कसौटी महायुद्ध हों, या कि अदालती मुकद्दमे बाज़ी या फिर {हर देश के }साहित्य में पिता-पुत्र सम्बन्धों की अभिव्यक्ति ,जितनी तल्ख मारक कड़वी टकराहटें वहाँ पर हमें अनादिकाल से पुरुषों के बीच होतीं दीखती हैं,और किसी के बीच नही। फिर दो मनुष्य़ो के बीच का टकराव जितना उनके व्यक्तित्व पर निर्भर नही करत, उतना उनकी स्थिति पर निर्भर करता है।जेलों के कैदियों के बीच,जंजीर से बन्धे पालतू कुत्तों के बीच ,मालिक के अनुशासन तले पशुवत जीवन बिताते बन्धुआ मजूरों के बीच भी परसपर तीखी घृणा तथा हिंसा का प्रदर्शन आम है।उनके द्वेश दूसरे के प्रति आक्रोश से नहीं,खुद अपने प्रति ,अपनी पराश्रयी, हीन स्थिति के प्रति एक उत्कट आत्मघृणा से उपजते हैं।पराधीन जो भी होगा उसे चूँकि सपनेहुँ सुख नही मिलेगा, अत: वह दूसरों को भी क्यों सुख देन चाहेगा? स्त्री को स्त्री से अलग करने भर से परिवारों में हिंसा और घृणा की प्रवृत्तियाँ नहीं मिटी हैं। मिटी हैं,तो स्त्रियों की पराधीनता घटाने से।
...

जारी.......