Friday, October 31, 2008

स्त्री के लिए एक नया क्षेत्र

९८० से भारत के महाराष्ट्र प्राँत के हिन्दुत्व के पुराने गढ सरीखे एक शहर पुणे मेँ स्त्री के लिये अभीतक जो स्थान रिक्त रहा करता था उसे भरने के उपाय स्वरुप एक नई तरह की पाठशाला खोली गई !


आप सोचेँगेँ ऐसा क्या सीखाया जाता होगा यहाँ जो पहले स्त्रियाँ सीख ना पाई होँ ? तो जी ये है स्त्री को पण्डित की तरह धार्मिक अनुष्ठान, विधि विधान करवाने के लिये दिया जानेवाला प्रशिक्षण !

ताज्जुब की बात है के, ईसाई धर्म भी इन्ही मुद्दों से जूझ रहा है - जबके पश्चिम और पूर्व के सामाजिक धार्मिक मसलों में बहुत सारी भिन्नता है फ़िर भी स्त्री कहाँ और क्या काम कर सकती है , इस मामले में , आज भी , एक तरह से , काफी अवरोध हैं जिन्हें स्त्री ने २१ वीं सदी तक आते आते, हीम्मत से सामना करते हुए, अपने लिए नए क्षेत्र खोले और कई नए कामों में अपने लिए जगह बनाई है जिस में ख़ास तौर से टीचर , नर्स , मोडल , सिने तारिका, घर का काम, सरकारी दफ्तर, बैंक, जैसे क्षेत्र स्त्री के लिए सफल क्षेत्र साबित हुए हैं -

धार्मिक अनुष्ठान आज भी पुरूष प्रधान , पुरूष प्रतिपादीत व्यवस्था ही रही है जिसका विरोध रोमन केथोलिक चर्च भी नही कर पाया है !



पुणे से कई नवीन तथा रुढिवादी परँपराओँ को तोडने की पहल पहले भी हुई है -जैसे "विधवा पुनर विवाह " जैसे मामलोँ मेँ पहल करना - इसी तरह, आज स्त्री क्यूँ ना धार्मिक यज्ञ, पूजा ना करेँ ? क्योँ पुरूष पण्डित ही ऐसे अनुष्ठान करेँ ?

सोच को बदलने की प्रक्रिया आरँभ हो चुकी है आज तक , स्त्री सिर्फ़ भक्त हो सकीं मीरा बन कर अमर हुई पर , धार्मिक अगवा ना बन सकीं --

पर आज बदलाव शुरू हो गया है -



३० वर्षीया प्रीति अग्रवाल ने अपने घर पर सरस्वती पूजा करने के लिये सुनीता जोषी नामक स्त्री पण्डिताईन को नियुक्त किया और सादर घर पर बुलवाया -


" शँकर सेवा समीति " नामक कार्यालय की स्थापना , श्रीमान शँकर राव थत्ते ने की है

शहर मेँ लग्न सेवा से जुडा हुआ उध्यान कार्यालय भी उन्हीँका व्यवसाय है -" ज्ञान प्रबोधिनी " तथा शँकर सेवा समीति जहाँ पर माह का प्रशिक्षण दिया जाता है जिससे स्त्री भी शादी , यज्ञोपवीत जैसे पुरातन संस्कारों की रीति सम्पन्न करवा पायेँ और पॅडित की जगह ले सकेँ इसकी सुविधा शुरु की गई है -



ज्ञान प्रबोधिनी के शिक्षक है श्रीमान विश्वनाथ गुजर जिनका कहना है कि स्त्री भी मोक्ष की उतनी ही हक्दार है जितना की पुरुष और भारतीय शास्त्रोँ मेँ कहीँ भी ऐसा नहीँ लिखा है कि स्त्री पुरुष के समकक्ष नहीँ है - दोनोँ एक समान हैँ -



पुरी के शँकराचार्य ने स्त्री के वेदाअधिकार की आलोचना की थी फिर भी पुणे के इस सँस्थान मेँ स्त्रीयोँ के उत्साह मेँ कोई कमी ना पायी है -


५२ वर्षीया वासँती खाडीलकर जी का कहना है कि " पुरातन शास्त्रोँ मेँ विदुषी नारीयोँ ने भी योगदान किया जैसे, गार्गी, मैत्रेयी,सौलभा,रोमशा, लोपामुद्रा घोषा ये ब्र्हदारण्यक उपनिषदमेँ भी लिखा है और जो शिक्षित हैँ वे अपनी कन्याओँ को विदुषी और शिक्षित हुआ देखना चाहते हैँ। "



पहले से महीने तक का प्रशिक्षण हुआ करता था जो अब १२ माह तक का हुआ है और ज्ञान प्रबोधिनी मेँ १२ क्लास मेँ ३० से ३५ स्त्रियाँ पँडितकर्म की शिक्षा ग्रहण कर रहीँ हैँ -



सँध्या कुलकर्णी जी अपने आपको "पुरोहित " कहतीँ हैँ और गत १० साल से पूजा अनुष्ठान करवा रहीँ हैँ वे सँस्कृत भाषा मेँ पी। एच। डी।किये हुए हैँ


गृह - प्रवेश, यज्नोपवित यज्ञोपवित्`, उपनयन , सँस्कार विवाह विधि ये सारे ही अब स्त्री पुरोहित करवा रहीँ हैं



माधुरी करवडे पिछले सालोँ से धार्मिक कार्योँ को सम्पन्न करवा रहीँ हैँ






- लावण्या

Friday, October 24, 2008

शुभ दीपावली


आप सभी को दिवाली , प्रकाश पर्व की शुभ कामनाएं ....

"पापा , मेरा रंग काला क्यों है ? "

अर्चना पांडा की कहानी


बड़ी खलबली मची है | हर तरफ़ कुछ न कुछ बिखरा है .. किसी का शर्ट प्रेस नहीं है तो किसी की बिंदी नहीं मिल रही | कभी कोई बच्चा रो रहा है तो किसी ओर हँसी के ठहाके सुने दे रहे हैं | बिल्कुल इंडिया की तरह लग रहा है | आज घर - एक घर की तरह लग रहा है ....

पर मौसी हैं की कोई फिकर नहीं है की क्या पहनेंगी ? बस सुबह से किचेन में लगी हैं, जाने क्या कर रही हैं | अरे यार , चलो मैं उन्हें तैयार करवाती हूँ , अभी एक घंटे में निकलना है ना | कहीं देर ना हो जाए | यहाँ तो इवेंट्स के टाइम बुक होते हैं तो बस वही टाइम मिलता है , उसे और खींच नहीं सकते | यहाँ वक्त के सब पाबन्द हैं | हम कभी ये सीख नहीं पाये , यहाँ दस साल रहने के बाद भी नहीं.. नागरिक बन गए तो क्या ...खून तो ओरिजनल है !

मौसी प्याज़ काट रही थीं , आँसू टप टप बहते ही जा रहे थे ...
"अरे रे मौसी जी ! लोग तो बेटी के ब्याह पर नैन भिगोते हैं , और आप तो बेटे की सगाई पर सेंटी हो रहे हो | क्या मौसी ?" मैंने मज़ाक में कहा |
"क्या बेटा और क्या बेटी अब तो सब समान है , गुडिया " उनका बड़ा उखडा उखडा सा जवाब था |
मुझे लगा की ये आँसू प्याज़ के नहीं हैं, किसी राज़ के हैं | वक्त नहीं था कुछ कहने सुनने के लिए | पर लगा ज़रूरी है सुनना - जो ये कहना चाहती हैं | अभी तक सब कुछ कितना जल्दी हो गया था |

कुछ दिनों पहले मौसी आयीं यहाँ , राजू की शादी तय करने | साथ लायीं ढेर सारी विवाह योग्य कन्याओं के फोटो और कुंडली | लगता था मौसी ने कोई matrimony की वेबसाइट नहीं छोड़ी थी , सब छान छान के अपने आई आई टी , आई आई एम् पास बेटे के लिए एक से बढ़कर एक रिश्ते ले कर आई थीं | मैंने भी अपने सर्कल के सभी लड़कयों से राजू का इंट्रो तो करा ही दिया था | पर राजू था की जैसे दुनिया से उसे कोई लेना देना नहीं था | एक ही शहर में रहकर भी वो कई महीनों से कभी हमसे मिलने नहीं आता था | मैं उससे मिलना चाहती तो काम का बहाना कर के टाल देता था | हाँ ! आज कल के लड़के अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं भई ! और वो भी अमेरिका में हैं तो बल्ले बल्ले !

छ न न ना ..........मौसी कटे प्याज़ का गरम तेल में छौंका लगा रही थीं |
"अच्छा सोचते हैं मौसी , आज के दिन तो और अच्छा सोचते हैं , देखो न कितनी अच्छी लड़की मिली है राजू को , हम आप ढूंढ के भी इतनी अच्छी नहीं ला सकते थे, उसके लिए, है नहीं क्या?" मैंने कहा |
"नहीं बेटा , मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है | देख ना, लड़की इंडियन नहीं गोरी है , क्रिस्तान है , पता नहीं ये ब्रह्मण का बेटा कैसे .... इसको ... चलो इसको भी अगर मैं भूल जाऊं ...पर साथ साथ रह रहे हैं इतने महीनों से .....और कभी बताया भी नहीं इसने ...कैसे .... कैसे अपनी माँ से कोई इस तरह कर सकता है (मौसी आँचल से आँख पोंछते हुए बोलीं )... इतना किया है ...एक ही तो बेटा है ... मैं वापस जाकर सबसे क्या कहूँगी ? इसने तो...इसने ...तो.. " मौसी का गला बहुत रुंध रहा था , रुक रहा था |
"इस.. ने ... तो .... बेटा .... मेरी नाक कटा दी... बेटा... मैं क्या करुँ, अब वापस नहीं जा पाऊंगी...मैं क्या मुंह लेकर जा... ऊँगी..ऊऊंंऊऊंं ऊऊंं " मौसी संभाल नहीं पायीं | घर में लोग थे, इस कारण ज़ोर से नहीं रो पा रहीं थीं |
"अरे मौसी किस ज़माने में रह रही हो , आजकल ज़माना बदल रहा है , देखो ये देस विदेस का चक्कर मन से निकाल दो , लड़की देखो तुम, कितना पढ़ी लिखी है , समझदार है , तुम तो भाग्य शाली हो , ज़रूर कोई पुण्य किया होगा जो ऐसी बहू पा रही हो " मैंने उनको हिम्मत देने की कोशिश की |
"गुडिया , हमें कौनसा उनके साथ रहना है , जो चाहें करें , पर मेरे बेटे के हमेशा साथ रहेगी , इसकी वो गारंटी देगी मुझे " मौसी आँख पोंछते हुए पूछीं |
"अच्छा आप ये बताओ मौसी, कि आज कि कोई इंडियन लड़की क्या ये गारंटी दे सकती है ? मौसी मैंने यहीं, अपने आंखों के सामने कितने ही इंडियन लोगों को डिवोर्स लेते देखा है | वो तो आपकी किस्मत है मौसी और आपका विश्वास "
"मैं तो सह लूंगी गुड्डो पर तेरे मौसा जी , और ये देखो इन दोनों को - चल रोजी तो नहीं जानती हमारे संस्कार पर राजू भी... तूने देखा ना कैसे कमर पकड़ पकड़ के चलते हैं , सब के सामने चूमा चाटी करते शर्म नहीं आती इन लम्पटों को ... मेरा तो जी बहुत घबरा रहा है बेटा ..सुबह से दुर्गा चालीसा पढ़ चुकी हूँ कितनी बार पर मन है कि बार बार उथल पुथल हो रहा है , क्या करुँ बेटा , तू ही बता .." मौसीजी कडचि ज़ोर ज़ोर से कढाई पर चला रही थीं | लग रहा था सारा गुस्सा सब्जी पर निकाल रही हैं |
"कुछ मत सोचो मौसी , बस राम का नाम लो और सब उस पर छोड़ दो , देखना सब अच्छा होगा, जब हम सब कुछ अपने आप करना चाहते हैं ना मौसी तो ना होने पर कष्ठ होता है | अरे ! कुछ उसके लिए छोड़ कर देखो , देखना फिर कैसे सब फिट फटांग होता है ! " आँख मारते हुए मैंने मौसी से कहा | "और फिलहाल तो आप तैयार हो जाओ | ये लो आपकी साड़ी मैंने निकाल दी है | इसे पहन लों | अरे, हमारी मौसी भी तो मुंडे दी माँ लगनी चाहिए | बाकी लोग जो पहनें , सो पहनें - कि फर्क पैंदा है ? अरे मौसी , इन गोरों को भी तो पता चले हमारी मौसी का जलवा !" मैंने उनको ज़रा हल्का फील कराने कि कोशिश में कहा |
"चल हट ! ज़रा देखती हूँ राजू ने शेरवानी पहनी या नहीं ... ये लड़का भी न ...."
मौसी साड़ी लेकर , मुंह पोंछते हुए , कुछ बुदबुदाते हुए चल पड़ी |
"गुडिया , सब्जी को देख लेना " पीछे से मौसी बोलती गयीं |
"हाँ मौसी सब्जी को कहीं नहीं जाना है , पर आप ....... " मेरी बात अब कोई नहीं सुन रहा था |

समय भी कैसे कैसे खेल खेलता है , कभी आगे ले जाता है और कभी बहुत पीछे .....


मुन्नी अभी अभी इंजीनियरिंग करके वापस घर आई थी | मम्मी पापा रिश्ते की खोज में थे | खाना खाकर सब बैठे ही थे की नर्मदा मौसी ने अपना पिटारा खोल दिया |
"सुन लीजिये भाई साहब , इससे अच्छा रिश्ता आपको नहीं मिलेगा " मौसी अपनी जिद पर अडी थीं |
"पर निम्मो तुम देखो ना ये रिश्ता अपनी मुन्नी को जचता नहीं है , हाँ थोडी सांवली है हमारी ..." पापा की बात काटते हुए मौसी गरजीं - "अजी हाँ ! बेटी को तो आप सर पर बैठा कर रखिये | घर पर बैठी रहेगी तो आपका ही नाम ख़राब होगा जीजाजी , मुझे क्या है , ज़रा आप सोचिये , रंग काला है , और उस पर इंजीनियरिंग , उमर वैसे भी हो गई है , कौन लेगा इसको , मैं तो कहती हूँ भाई साहब , काम ख़तम कीजिये और गंगा नहाइए , अभी एक और है ब्याहने को, ये जाए तो दूसरी को सोचो, क्या कहते हो ? बात आगे करुँ? " मौसी तो जैसे अपनी जीत सोच कर ही आई थीं |
"रुको ज़रा मुन्नी से पूछते हैं , फिर बताएँगे , तुम थोड़ा आराम कर लो निम्मो " पापा ने बड़ी स्थिरता से कहा |
"भाई साहब ! जब तक दीदी कि दो जवान बेटियाँ घर पे है कहाँ आराम मिलता है | छोटी तब भी निकल जायेगी - रंग चिट्टा है और लम्बाई भी खूब है, चिंता है तो मुझे इस कालो रानी कि है ... " मौसी को अपने ही मज़ाक पर हंसने कि आदत है |

शाम को मुन्नी लगी हुई थी -शायद कुछ फॉर्म भर रही थी |
"बेटा , ये निम्मो मौसी कोई रिश्ता लेकर आई है , सुना तुमने ? लड़का अच्छे घर का है - इंजिनियर है " पापा ने बड़े प्यार से मुन्नी से पूछा|
"पर पापा वो एक नम्बर का गधा है | डोनेशन कॉलेज से पढ़ा हुआ | एक बात पूछो तो नहीं आता | उसका दिमाग काम ही नही करता पापा | किसी भी रिश्ते में आदर का होना बहुत ज़रूरी है पापा, है न ?" मुन्नी ने बड़ी सादगी से पूछा |
"ये बात तो सही है बेटा पर कुछ तो हमें भी एडजस्ट करना होगा , देखो तुम टोपर हो अपने क्लास में - तो हर एक का दिमाग एक सा नहीं होता न बेटा , फिर अपनी बिरादरी का पढ़ा लिखा लड़का मिलना भी मुश्किल है | अगर तुम्हारे कोलेज का कोई तुम्हे पसंद हो तो तुम मुझे बता सकती हो " पापा दुनियादारी समझा रहे थे |
"नहीं पापा ऐसी बात नहीं है , आप मुझे जानते हैं , फिर ऐसा क्यों पूछ रहे हैं? और ऐसा कहाँ लिखा है की बिरादरी में ही शादी करनी है ..बताइए " मुन्नी को ऐसी बात करते बड़ी शर्म आ रही थी |

कुछ समय बड़ी खामोशी थी उस कमरे में | बज रहा था तो बस वो पुराना पंखा जो हवा से ज़्यादा आवाज़ देता था |

"पापा , मेरा रंग काला क्यों है ? " एक बहुत ही अनदेखा सा सवाल पूछा मुन्नी ने |
"मम्मी तो गोरी हैं , रूपा भी गोरी है फिर मुझे आपने काला क्यों बनाया , पापा " मुन्नी की आंखों के कोने से कुछ चमक चमक कर दिख रहा था पर बाहर आते शायद डर रहा था |
"नहीं बेटा देखो जब इश्वर काला रंग देता है न तो वो उसमे कला भी छुपा कर दे देता है | हम सब काला रंग तो देखते हैं पर जो उस काला में कला देख लेगा न बेटा बस उसी के साथ आपको हम भेजेंगे | आप MBA के सारे फॉर्म देख कर भरना | हम निम्मो मौसी को "ना" कर देते हैं | और हमें पता है कि आपको किसी अच्छे बी-स्कूल में दाखिला ज़रूर मिलेगा " पापा ने मुन्नी के सर पर हाथ फेरते हुए कहा |
.......................................

"अर्चना , कहाँ हो ? मैं आधे लोगों को ले जाता हूँ | तुम बाकी लोगों को अपनी गाड़ी में ले आना | सन फ्रांसिस्को में ट्रैफिक होगा | जल्दी निकलना | गराज से इन्होने मुझे आवाज़ लगायी तो मैं भूत से वर्तमान में आ गई | देखा मौसी अपनी साड़ी का पल्लू ठीक कर रही थीं | बड़ी सुंदर लग रही थीं | मौसा जी भी कुरते में जच रहे थे |

"गुडिया आज तेरे साथ दुःख बाँट कर दिल हल्का हो गया " मौसी अब मुस्कुरा रही थीं |

बहुत अच्छा हुआ मौसी , रोना बहुत अच्छा होता है , सब दुःख बह जाते हैं, और अगर कोई साथ हो तो फिर शक्ति मिलती है, हौसला बढ़ता है | पर हर इंसान इतना भाग्यशाली नहीं होता निम्मो मौसी | किसी दिन मुन्नी , आपकी गुडिया, भी बहुत रोई थी मौसी , आपसे छुप कर | हाँ आज आप अपने किस्मत के रंग को नहीं बदल पा रहीं ,तब मुन्नी भी अपने रंग को नहीं बदल पा रही थी | पर मौसी , आज आप बहुत खुश होंगी ना, आपकी इकलौती बहू गोरी जो है .....

Thursday, October 23, 2008

बालिका- वधू उनके लिए सीरियल के पैटर्न बदलने का मामला भर है





तो समझिए चैनल नहीं चाहते कि लड़कियों की तस्वीर बदले
विनीत कुमार




अभिषेक बच्चन ने आनंदी से सवाल किया कि- तुम स्कूल क्यों नहीं जाती. आनंदी ने जबाब दिया, मेरी शादी हो चुकी है न। उसके बाद अभिषेक ने बगल में खड़ी उसकी सहेली से भी यही सवाल किया-तुम क्यों नहीं जाती स्कूल। वो कुछ कहती इसके पहले ही आनंदी चहकते हुए बोल पड़ी- इसकी भी शादी हो चुकी है न। लेकिन बगल में खड़ा जगदीश जो कि आनंदी का पति है वो रोज स्कूल जाता है और न सिर्फ स्कूल जाता है, बल्कि धीरे-धीरे वो सबकुछ सीख रहा है जो कि पितृसत्तात्मक समाज को बनाए रखने के लिए और उस समाज में बने रहने के लिए जरुरी है.
टीआरपी की दौड़ में अच्छे-अच्छे सास-बहू सीरियलों को पछाड़ चुके बालिका-वधू की कुल मिलाकर यही कहानी है कि बाल-विवाह किस तरह से लड़कियों के बचपन को, उसके स्वाभाविक विकास को और उसकी जीवंतता को लील जाता है। बिहार, मध्यप्रदेश और खासकर राजस्थान में कच्ची उम्र में लड़कियों की एक बड़ी समस्या है। आप कह लीजिए कि जिस उम्र में लड़कियों की शादी होनी चाहिए, उस उम्र तक आते ही वो विधवा हो जाती है. बचपन का गला तो पहले से ही घोंट दिया जाता है, और इसी क्रम में आगे के जीवन को तबाह करने की तैयारी हो जाती है।
सास-बहू सीरियलों को देख-देखकर जो लोग पक चुके हैं, उनके लिए संभव है, बालिका-वधू इसलिए अच्छा लगे कि एक नए ढंग का फ्लेवर मिल रहा है। सात-सात साल से भी अधिक चले आ रहे सीरियलों को लेकर ऑडिएंस की एक लॉट राय भी बना चुकी है कि सब बकबास है, कुछ नहीं रखा है इन सीरियलों में, आज उनमें से भी कुछ लोग इस सीरियल को लेकर टीवी पर फिर से जमने लगे हैं। उन्हें न सिर्फ स्टोरीलाइन पसंद आ रही है बल्कि लम्बे समय के बाद और वो भी किसी निजी मनोरंजन चैनल पर राजस्थान का टिपिकल ग्रामीण परिवेश दिखाई दे रहा है। मैंने कलर्स चैनल के लांच होने के पहले ही दिन लिखा था कि- बाकी जो भी हो, इस चैनल के लगभग सारे कार्यक्रमों के फुटेज आंचलिकता को छूती हुई जाती है। खैर,
टेलीविजन में दुनियाभर की बकवास आ जाने के बाद भी जो लोग इससे सामाजिक विकास की उम्मीद लगाए बैठे हैं उन्हें बालिका-वधू में एक जबरदस्त सोशल मैसेज दिखायी दे रहा है। एक हद तक आप कह लें कि जो काम आज न्यूज चैनल नहीं कर पा रहे हैं वो एक सीरियल करने की कोशिश में लगा है। सीरियल की कहानी समस्यामूलक है। संभव है आनेवाले समय में मैलोड्रामा पैदा करने के लिए इसमें अबतक की सीरियलों की तरह की खुरपेंच किए जाएं। लेकिन अच्छी बात है कि सीरियल के बीच-बीच में जो कैप्शन आते हैं, उसका सीधा संबंध सामाजिक जागरुकता से है? जो लोग सीरियल में रुचि नहीं लेते लेकिन स्त्री समस्याओं और उसके अधिकारों को लेकर काम कर रहे हैं, लिख-पढ़ रहे हैं उनके लिए ये बेहतर संदर्भ है। अबतक के एपिसोड को लेकर अपनी तो समझदारी इसी रुप में बनी है।
लेकिन इसी क्रम में इस कार्यक्रम को लेकर अगर न्यूज चैनलों की बात करें तो उनकी समझदारी मेरी समझदारी से बिल्कुल अलग है।
कहानी घर-घर की पिछले सप्ताह खत्म हो गया। बालाजी टेलीफिल्मस ने १० नबम्बर को क्योंकि सास भी कभी बहू थी, खत्म करने की घोषणा कर दी है। न्यूज चैनलों के लिए इस दौरान बढ़िया मसाला मिलेगा। उनकी भाषा में कहें तो खेलने के लिए बहुत कुछ है। चूंकि इ-२४ देश का पहला मनोरंजन न्यूज चैनल है इसलिए उसे इस मामले को लेकर औरों से पहले तैयार होना स्वाभाविक है। उसने अभी से ही इस पर स्पेशल पैकेज बनाने शुरु कर दिए हैं।
कल रात इ-स्पेशल में चैनल ने क्योंकि सास भी कभी बहू थी की तुलसी और बालिका-वधू की आनंदी को आमने-सामने लाकर रख दिया। चैनल के मुताबिक अब धाराशायी हो रही है तुलसी। एक दौर था कि जब देश की महिलाएं चाहती थीं कि उसे तुलसी जैसी बहू मिले और वही तुलसी जब सास बन गई तो हर लड़कियां सोचने लगी कि उसे तुलसी जैसी सास मिले। लेकिन अब तुलसी के उपदेश लोगों को रास नहीं आ रहे हैं। अब लोग तुलसी के बजाए, बहू के रुप में लोग चुलबुली चुहिया यानि आनंदी को देखना पसंद कर रहे हैं। अब जब लोग तुलसी को पसंद नहीं कर रहे हैं तो जाहिर है कि उसे भी आनेवाली बहू के लिए जगह तो छोड़नी ही होगी। चैनल बालिका-वधू की लोकप्रियता को पीढ़ी के बदलाब के रुप में देख रही है। थोड़ा आगे जाकर समझें तो लोग अब इन्नोसेंट बहुएं पसंद करने लगे हैं.
यहां पर एक तो कलर्स चैनल की खुद की गड़बड़ी है कि आनंदी बालिका बधू है, दिन-रात मांस्सा के ताने और उपेक्षा झेलती हुई जिंदगी, लेकिन उसके चेहरे पर कभी भी शिकन नहीं दिखाया। हमेशा नटखट और मनचली। चैनल ने टीआरपी के फेर में उसके बचपन को बख्श दिया है। बीच-बीच में भले ही कहती है कि- एक तो शादी कर दी औऱ अब उपर से अमिया भी नहीं तोड़ सकती। लेकिन कहीं भी बहुत रोते-बिलखते नहीं दिखाया गया। इससे ज्यादा तो आदर्श उम्र की बहुएं रोती हैं। अब दूसरा काम ये चैनल कर रहे हैं।
नियत चाहे जो भी हो लेकिन यदि किसी मनोरंजन चैनल ने सामाजिक मुद्दों को आधार बनाकर सीरियल शुरु किए हैं तो न्यूज चैनलों को उसे प्रोग्रेसिव एलीमेंट इस्टैब्लिश करने चाहिए। उसे आधार बनाकर उस इलाके की समस्याओं को सामने लाने चाहिए थे। जो काम सीरियल के स्तर पर हो रहे हैं, वहीं काम रिपोर्टिंग केएस्तर पर होने चाहिए. लेकिन बिडंबना देखि कि लाफ्टर चैनल की दर्ज पर लगभग सारे चैनल हंसी के हंसगुल्ले परोसने के लिए तैयार हैं लेकिन बदलाव के नाम पर सक्रिय होना तो दूर उल्टे उसमें मिट्टी डालने का काम कर रहे हैं। तो क्या बालिका- वधू उनके लिए सीरियल के पैटर्न बदलने का मामला भर है।
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यह सबूत मुझे अभी यूट्यूब मिला , आप भी देखें -


Wednesday, October 22, 2008

अपनी सुरक्षा के कुछ उपाय

बेंगलूरु में फिरौती के लिए उस महिला के अपहरण की घटना और सौम्या विश्वनाथन की हत्या जैसी घटनाओं के बीच देश की राजधानी और दूसरे शहरों की भी महिलाओं में अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता की स्थिति और फिर राज्य की महिला मुख्यमंत्री का यह कहना कि "Driving at 3 AM alone in a city, which people believe is not very safe for women after dark...one should not be adventurous". इसके बाद अब सरकार की ओर से भी किसी पुख्ता कदम की उम्मीद नहीं की जा सकती।

ऐसे में, और वैसे भी जरूरी है कि हम अपनी सुरक्षा आप करने की पहल करें। अपराधों के खिलाफ कुछ अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के सुरक्षा टिप्स के कुछ पॊइंट्स हम सब जानें, समझें और अमल में लाने की कोशिश करें। आखिर अपनी सुरक्षा की सबसे पहली जिम्मेदारी खुद की है।


पैदल चलते समय-


हमेशा सतर्क रहें। अपने आस-पास के लोगों, माहौल के बारे में सजग और चौकन्ने रहें, खास तौर पर अंधेरी, संकरी जगहों पर।

जहां तक हो सके, अंधेरी जगहों में न जाएं, रौशनी वाले इलाके में ही रहें।

हो सके तो पतली गलियों से न गुज़रें, चौड़े, खुले और आबादी वाले रास्तों से जाएं।

झाड़ियों, पगडंडियों, दरवाजों के पीछे कोई छुपा हो सकता है, इसलिए इनसे से दूर हट कर चलें।

पूरे आत्मविश्वास के साथ एक-समान चाल से चलें।

आस-पास चल रहे लोगों से नज़रें चुराने की कोशिश न करें। सहज रहें।

रास्ते में अजनबियों से बातचीत के जवाब में रुकें नहीं, चलते रहें।

दौड़ो! अगर कोई गले पड़ ही जाए तो विपरीत दिशा में दौड़ें। इससे हमारे आस-पास के लोग सजग हो जाएंगे और हमें मदद मिल पाएगी।

शोर मचाएं! खतरे की आशंका को भांपते ही ज्यादातर जानवर शोर मचाने लगते हैं। हम भी अपनी इस मूल प्रवृत्ति को जागृत करें और खतरे में औरों से मदद मांगें।

बस में यात्रा करते समय-

किसी खाली बस स्टॊप पर रहने से बचें।

बस के आने तक सड़क के एकदम किनारे पर खड़े होने से बचें।

सहयात्रियों के प्रति सतर्क रहें। एकदम खाली बस में चढ़ने के पहले दोबारा सोचें।

सहयात्री परेशान करे तो सीट बदल लें और ड्राइवर/कंडक्टर को बताएं।

खाली बस में जहां तक हो सके ड्राइवर के नज़दीक वाली सीट पर बैठें।

ताई कोन डो- हमारी कुहनी शरीर का सबसे मज़बूत हिस्सा है। दुश्मन ज्यादा करीब हो तो इसका इस्तेमाल करें।

अगर वह दो फुट की दूरी पर हो तो ताई कोन डो की एक और चाल है- अपने पैर के एड़ी से अंगुलियों तक के फ्लैट हिस्से से सामने वाले की टांगों के बीच नीचे से ऊपर की ओर जम कर आघात करें। अगला कितना भी मज़बूत हो, डगमगाएगा जरूर। तब तक हमें बचने का समय मिल जाएगा।

कार में-

कार में बैठने के बाद और उसे छोड़ते समय दरवाजों को अच्छी तरह बंद करके लॊक करें।

अच्छी रौशनी वाले इलाके में पार्क करें, कोने-किनारों में पार्किंग से बचें, खास तौर पर शाम और रात को।

पार्किंग स्थल में आने के पहले ही कार की चाबियां हाथ में रखें ताकि वहां ज्य़ादा समय न गुजारना पड़े।

कार में चढ़ने के बाद सबसे पहले दरवाजों को लॊक करें फिर ही उसका गियर लॊक आदि खोल कर चलने की कार्रवाई करें।

कइयों को आदत होती है- खरीददारी के बाद कार में बैठ कर सारे सामान, बिल और पैसों का हिसाब-किताब करने की। यह काम कार के दरवाजों को लॊक करने के बाद ही करें। बेहतर है, घर जा कर करें। हो सकता है कोई ताक में बैठा हो। उसके लिए तो यह सुनहरी अवसर होगा!

कार के अंदर आने के पहले देख कर सुनिश्चित कर लें कि पीछे और ड्राइवर के बगल की सीट पर कोई बैठा तो नहीं।

अगर आपकी कार के बगल में खड़े वाहन में संदेहास्पद पुरुष बैठा है तो सतर्क हो जाएं। चाहें तो वापस अपने दफ्तर/दुकान में जाएं और गार्ड/ पुलिस या किसी सहयोगी की मदद लें।

अगर लगे कि कोई आपकी कार का पीछा कर रहा है तो किसी सार्वजनिक स्थान, पुलिस थाने या फायर स्टेशन पर रुक जाएं।

औरतें फितरतन संवेदनशील होती हैं, पर रास्ते में अजनबी युवकों की खराब गाड़ी पर दया दिखाना भारी भी पड़ सकता है। रास्ते में किसी खराब हुए दोपहिया वाहनचालक की मदद के लिए वहां खुद न रुकें बल्कि मदद के लिए अपने सेल फोन से या पास के फोन बूथ से किसी को फोन करके बुलाएं।

कुछ विज्ञापन - कन्या बचाइये

(१)
(२)
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(४)
(5)
कितनी आसानी से अपनी बात कह गये - है ना

अपहरण एक महिला का बंगलौर मे

http://timesofindia.indiatimes.com/Cities/Blore_Wipro_staffer_abducted_rescued/articleshow/3625445.cms
एक और अपराध महिला के साथ और वोह भी अपने ही कर्मचारी का, यह क्या हो रहा हा? क्या हम मे से कोई इसका हल बतायेगा?

Monday, October 20, 2008

हम तो अतार्किक हैं, जब ईश्वर समझदारी बांट रहा था हम करवा चौथ कथा सुन रहे थे ..

सवाल - पुरुषों को कब लगता है कि स्त्रियाँ अतार्किक हैं ?




जवाब - जब कोई स्त्री उनसे सहमत नही होती !

इसलिए जब पब जाने वाली स्त्री को हीनता सूचक अर्थ मे करवा चौथ करने वाली स्त्री की महानता के बरक्स खड़ा किया गया और हमने इस सोच का विरोध किया तो हम भी अतार्किक हो गये और "उस सोच "की सतर्क व्याख्या करने हमारे मित्रों की भीड़ आ जुटी ।
साथ ही बहुत बारीकी से एक लड़ाई पब जाने वाली और करवा चौथ करने वाली स्त्री के बीच भी पैदा कर दी गयी । अब दोनो किस्म की औरतें आपस में लड़ें कि कौन ज़्यादा चरित्रवान है और कौन भ्रष्ट ,और आप तमाशा देखें ,उन लड़ाका औरतों की मूढ मति पर मन्द मन्द मुस्काएँ और दोस्तों की महफिल में एक जुमला छोड़ दें- हमने तो कहा था ये बेवकूफ होती हैं ,व्यर्थ बातों पर झगड़ती हैं,ईश्वर इन्हें सद्बुद्धि दे!
पहली बात ,कुल मिलाकर नतीजा यह निकला कि पब जाने वाली स्त्री भ्रष्ट है ,करवा चौथ न करने वाली भी ।और मुझे इसी बात से आपत्ति है ।इस तरह के पैरामीटर्स तय करने वाले कोई भी कैसे खड़े हो जाते हैं ?
दूसरी बात ,
लिव इन रिलेशन से यदि व्यभिचार बढेगा तो क्या यह मान लें कि वैवाहिक सम्बन्धों मे अब तक तो कोई व्यभिचार है ही नहीं ?
तीसरी बात ,
यह फिर से लक्षणों और अज्ञात भयों पर बात करेने जैसा हुआ जिसका कोई सार्थक परिणाम नही आता कभी ।यदि विवाह की बजाए लिव इन रिलेशन् प्रचलित हो रहा है तो हमें यह नहीं जानने का प्रयास करना चाहिये कि आखिर विवाह में ऐसी क्या गड़बड़ी है कि हमारी संतानें उस ओर झुक रही हैं? यह पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव न होकर कहीं भारतीय संस्कृति की कोई भयानक त्रुटि तो नहीं है ?
जो अतार्किक हैं वे कभी इस पर बात नहीं करना चाहेंगे कि विवाह लड़के -लड़की के लिए अक्सर कितना भयानक हो जाता है , वे केवल इतना भर सोचेंगे कि जिसे अभी तक वेश्यालयों तक सीमित रखा गया और छिपाया गया वह उजागर होने लगेगा ...व्यभिचार के संस्कार भी फिर तो हमारे दिये हुए ही है न । बस अब तक इतना समझाया गया था कि-बेटा करो पर बात खुलने न पाए ..
चौथी बात ,
यदि ऐसा माना जा रहा है कि स्त्री का शोषण इससे बढेगा तो चोखेर बाली व अन्य नारियों की अब तक की पोस्टें दिखा चुकीं कि स्त्री का शोषण लिव इन रिश्तों की शुरुआत से बहुत पहले से ही किया जा रहा है । और यूँ भी जो स्त्री ऐसा निर्णय अपने लिए लेगी उसे मैं इतना तो समझदार मानूंगी कि वह उसके सम्भावित बुरे परिणामों को जानती होगी ।
पांचवी बात ,
संतान की समस्या निश्चित ही गम्भीर है और मै मानती हूँ कि माता पिता के अपने जीवन के जो भी फैसलें हों , उनका संतान के जीवन पर क्यों प्रभाव आना चाहिये । सो यदि संतान का फैसला कोई ऐसा दम्पत्ति लेता है तो उसे इस बारे मे आश्वस्त होना होगा कि {अगर हमारा समाज उन्हें अपने फैसले लेने काबिल मानता है तो ,अन्यथा तो बात इस ढंग से होती है कि संतानें तो हो जातीं है ,की नही जातीं }उसे संतान को माता पिता दोनों सम्बन्धों की प्यार और रखरखाव दे सके ।

और बाकी, यदि विवाह संस्था की गड़बड़ियाँ अब भी न थमीं तो इसके लिए भी तैयार रहिये कि आने वाले समय मे स्त्री पुरुष रिश्तों का स्वरूप यही होने वाला है ।
शादी दो वयस्क व्यक्तियों के बीच का सम्बन्ध है ,उनका नितांत निजी सम्बन्ध जिसे समाज ही स्वीकृति देता है उन्हें वयस्क और समझदार मान कर ...लेकिन हम लोग इतनी बुरी आदतों के शिकार हैं कि हमेशा इनके बीच अपनी भोंडी नाक घुसाना चाहते हैं -शादी किससे हो ,कितना दहेज आये ,लड़के के सम्बन्धियों को क्या क्या मिले,किसके लिए बहू कितना काम करे ,बेटा बहू बच्चा कब पैदा करें और कितने बच्चे और किस लिंग के पैदा करें ,वे कहाँ जाएँ ,कहाँ न जाएँ , किस त्योहार पर किसके लिए क्या करे ,कौन सी नौकरी करे कौन सी न करे....कमाएगी तो अपने लिए हम क्यों सपोर्ट करें..अंतहीन है अपेक्षाएँ ...और शिकायतें अलग ....उस दिन चाय नही बनाई , फलाँ दिन व्रत नही रखा , मुझसे पूछे बिना अपने मायके गयी , कल देर से क्यों आयी ,आज देर से क्यों उठी ,संडे है तो क्या ,हमें तो 6 बजे चाय चाहिये होती है ........इसका बाप ऐसा , भाई वैसा , बहनें ही खराब हैं ,माँ सिखाती है सब .....लड़का लगाम कस के नही रखता न..दो झापड़ लगाए तो अभी ठीक रास्ते आए ..

स्त्री पुरुष का आपसी प्यार ?? वह क्या चीज़ है ?? उसकी किसे ज़रूरत है भाई साहब ? शादी चलाने के लिए प्यार व्यार की ज़रूरत नही होती !! है न !बच्चों के फैसलें ? अजी वो इतने समझदार कब से हुए कि अपने फैसले खुद लेने लगें , हम क्या मर गये हैं ?हमारी जीते जी तो ऐसा होगा नही , हमारी लाश पर से गुज़र कर लाइयो उस लड़की को घर !

सिर्फ दबाव , प्रेशर , कंट्रोल , नियंत्रण ,शासन ......क्या इंसान पढ लिख कर भी इतना वाहियात और गैर ज़िम्मेदार रहता है कि उस पर निरंतर दमघोंटू दबाव बनाए रखा जाना चाहिये ?

ऐसे लोगों से कहें कि बाज आइये ,अब भी वक़्त है स्त्री के चरित्र की आड़ मे और पाश्चात्य संस्कृति के कुप्रभावों का नाम लेकर अपनी खामियों को न छिपाएँ । हो सके तो उन्हें दुरुस्त करें, न हो सके तो उनके नष्ट हो जाने का इंतज़ार करें ,छाती पीटें और तमाशा देखें ।

इसके बाद भी कहूंगी कि विवाह एक सुन्दर सम्बन्ध है ...संतान होना बहुत सुखद होता है पर ये दोनों फैसलें कर्तव्य नही चयन होना चाहिये । हर एक व्यक्ति शिक्षित होने के साथ साथ ज़िम्मेदार नागरिक होना चाहिये । और अगर हम अपनी 25-30 साल की संतान को भी बच्चा मानने पर उतारू हैं और उसे अपने जीवन के फैसलें नही करने देते तो यह मुहिम भी चलानी चाहिये कि देश में वोटिंग का अधिकार् केवल बुज़ुर्गों के पास हो क्योंकि हमारे देश के युवा निहायत बेवकूफ,व्यभिचारी ,बदमाश और बेईमान हैं !

Saturday, October 18, 2008

जो मन्दिर नही जातीं वे ज़रूर पब जाती हैं-कैसे सोच लेते हैं ?

कहीं न कहीं जाना और माथा टिकाना बहुत ज़रूरी होता है ,आस्था इस या उस किसी न किसी चीज़ के प्रति होगी ही होगी ।कोई प्रेमी या ब्वायफ्रेंड तो होगा ही होगा । करवा चौथ नही तो लिव इन होगा ।सिन्दूर नही तो एक्स्ट्रा मैराइटल होगा । कभी किसी लड़की के पीछे आने वाली लड़के बार बार प्रेम के अस्वीकार किये जाने पर पूछते हैं -"क्यों प्रिये कोई और है क्या ?" उफ्फ!
हद ही है न!अगर मै मन्दिर नही जाती तो आप यह मान लेंगे कि मै ज़रूर पब जाती हूँ ? यानि कोई भी स्त्री अगर सास के साथ नही रहती तो ज़रूर् परिवार को लात मार रखी होगी ,और करवा चौथ नही करती तो आज की हॉट बेब कहलाने के लिए ! मेहन्दी नही लगाती तो ज़रूर कमर के बहुत नीचे या छाती पर सिजलिंग टैटू गुदवाती होगी । और अगर लिव इन रिलेशन मे रहती है तो निश्चित ही चरित्रहीना है और हर रात नया खिलाड़ी पसन्द करती है ,एक ही चेहरा बोरिंग लगता होगा न !
अगर आपकी ऐसी सोच है तो निहायत अफसोसनाक है और निन्दनीय भी ।माने यह सम्भावना ही नही छोड़ी जाती है कि स्त्री एक भी काम स्थापित मान्यताओं से हट कर करे अन्यथा आप उसे पब गामिनी और क्लीवेज व नाभि प्रदर्शिणी ,रोज़ नया सम्भोग साथी तलाशने वाली बेगैरत औरत मान लेंगे ? जो पुरुष मन्दिर नही जाता और अपनी पत्नी के घरवालों से जिसके प्रगाढ सम्बन्ध नही उसे भी क्या पब गामी ,वेश्या गामी की उपाधि दी जाती है?
लिव इन हो या विवाह - क्या स्त्री को इस तरह की वाहियात शर्तो पर परखना कभी बन्द नही होगा ? व्यक्तिगत पसन्द और व्यक्तिगत उसूल नाम की कोई चीज़ क्यों स्त्री के लिए मानी नही जाती ?मन्दिर न जाना या करवा चौथ न करना या सिन्दूर न लगाना या प्रेम को बिना सम्बन्ध का नाम दिये जीना ...छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बात जो स्त्री अपनी मर्ज़ी और पसन्द से करें उसे ही कुलक्षण की संज्ञा मिल जाती है । वास्तव में यही वह दृष्टि है जो स्त्री और पुरुष के बीच खाइयों को बढाती है ,और वास्तविक स्त्री विमर्श को पुरुष की भर्त्सना की ओर ले जाती है । अगर उपरोक्त विचारों वाले बुद्धि के अनुसार कहना चाहूँ तो यह आग लगाने वाली भाषा और सोच है ।
बुद्द्धिवान जनों को इससे बचना चाहिये !

Friday, October 17, 2008

आत्म का विस्तार कर संतत्व को प्राप्त हुईं जो...


अब से कुछ दिन पहले तक हम नही जानते थे सिस्टर अल्फोंसा को ,जाना तो वेटिकन सिटी मे उन्हें मिली संत की पदवी मिलने की खबर से जाना ।केरल मे जन्मीं अल्फोंसा ने नन की तरह जीवन जिया और अंत समय तक पीड़ितों की सेवा की। यह खुशी की खबर थी कि वे संत की पदवी पा गयीं ,पर शायद इससे बेखबर अधिकांश भारतीय स्त्रियाँ अपने घर परिवारों को सहेजती सम्भालतीं बचपन से ही किसी अखबार को पढने,खबरें सुनने और जागरूक रहने की किसी ट्रेनिंग के बिना एक लीक पे जीती और खटती चली जाती हैं। मेरी माँ , उनकी माँ ,उनके नानी,उनकी सास ,उनकी दादी .....कईं पीढियाँ ...40 की होते होते अनेक बीमारियाँ अपने उपेक्षित शरीर और मन में पैदा कर लेती हैं और बच्चों की शादियाँ उनके बच्चे ...वगैरह वगैरह के बीच रोते-कलपते कभी संतुष्ट रहकर अंतिम परिणति को प्राप्त होती हैं।
मुझे पता नही क्यों लगता है कि हमारी ये माएँ ,नानियाँ ,दादियाँ ,परदादियाँ ,परनानियाँ ....यदि अपनी सेवा त्याग बलिदान समर्पण और सहनशीलता को चार दीवारी और चन्द स्वार्थों के भीतर बान्धने की बजाए अगर उनका जगत के लिए कुछ और विस्तार कर लेतीं तो संत ही होतीं ।अगर खाना विशिष्ट स्वादिष्ट है या कम पड़ रहा हो तो मैने अपने हिस्से का भोजन बांटते हुए ही माँओं को देखा है।अपने हिस्से का आराम भी पति के लिए छोड़ देते देखा है।अपने सामर्थ्य और शक्ति को पूरी तरह घर पर खर्च कर देते देखा है ।राजकिशोर जी ने अपने पिछले लेख मे लिखा था-"पुरुष स्त्री के मानव गुणों को अपना कर एक समेकित मनुष्य बनना चाहता है। उदाहरण के लिए, स्त्रीत्व के बहुत-से गुण ईसा मसीह, गौतम बुद्ध और महात्मा गांधी में देखे जा सकते हैं। सच तो यह है कि ये पुरुष कम, स्त्री ज्यादा लगते हैं। गांधी जी का तो मानना ही था कि वे अपने बच्चों के पिता और माता दोनों ही हैं। उनकी पौत्री मनु गांधी ने अपनी एक किताब के शीर्षक में गांधी जी को अपनी मां बताया है। प्रेमचंद ने कहा है कि जब पुरुष में स्त्री के गुण आ जाते हैं, तब वह देवता बन जाता है।"
मै नही जानती कि इन बातों का निहितार्थ उतना ही सीधा है जितना दिखता है या उससे कहीं अधिक गहरा है । पर यह तो निश्चित है कि जो मुक्त है वही आत्म का विस्तार कर सकता है ...जो स्वयम मुक्त नही वह किसी और को भी मुक्त नही कर सकता ..न कष्टों से न कुरीतियों से ,न अन्धविश्वासों से ....
स्त्री की ज़रूरत घर से बाहर समाज को भी है ,इसलिए उसे मुक्त होना होगा संकीर्णताओं से । कामना करूंगी कि स्त्री खुद को मुक्त करने का प्रयास करे और जो मुक्त सोच वाले साथी-साथिन हैं वे दूसरों की मुक्ति के लिए सदा प्रयास करें ..
और संत अल्फोंसा को नमन !

Thursday, October 16, 2008

यदि मातृत्व स्तुत्य है तो ..

संगीता जी ने अपनी पिछली पोस्ट मे लिखा था कुछ् सुख और खुशियों पर सिर्फ औरतों का हक होता है...बहुत दिन से नेट से दूर थी लेकिन जब यह पोस्ट पढी तो टिप्पणियाँ देखकर अच्छा लगा और कुछ टिप्पणियाँ देखकर हँसी भी आयी ।
लेखिका ने जिन स्त्री पात्रों की बात की है , वे काल्पनिक हैं ।लेकिन पढने वाले महान होते हैं , वे उन्हें माँ बनने की बधाई दे गये हैं:-)
खैर ,

अनायास ही मेरे मन से वाक्य फूटा -कुछ दर्द और कष्टों पर भी सिर्फ औरत का ही हक होता है।सुख में तो लोग भागीदार हो सकते हैं ,उत्सवों मे लोग उपहर देकर ,आशीष देकर ,खा पीकर लौट जाते हैं ,पर स्त्री के उन कष्टो मे कोई भागीदर भी नही होता जो उसके अंत तक उसके साथ चलते हैं।
इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहूंगी कि मेरे आस पास जो भी स्त्री मिली वह मातृत्व प्राप्ति के बाद के कष्टों और तनावों से दबी मथी हुई मिली।इस सम्बन्ध मे पहले भी हम लोग लिख चुके हैं कि शिशु आखिर किसकी ज़िम्मेदारी है!पर संगीता जी की पोस्ट से जो सवाल अनुराधा और स्वप्नदर्शी के मन मे उठ खड़े हुए हैं दर असल वे मेरी चिंता का कारण हैं ।
अनुराधा जी के कुछ प्रश्न जो परम्पराओं की तह मे झांकने की कोशिश करते हैं -

3) 'मां' के महिमामंडन के बहाने उस बच्चे की सारी जिम्मेदारी क्या गुप-चुप उस महिला पर डालने का षड्यंत्र नहीं है यह?
4) क्या पुरुष द्वारा बच्चा पालने की अपनी जिम्मेदारियां मां पर डालने की शुरुआत यहीं से नहीं हो गई है?
5) क्या इस कार्यक्रम के बाद भी उस महिला को मां बनने और परवरिश के पूरे दौर में परिवार का उतना ही सपोर्ट मिलता रहेगा, भले ही बिटिया पैदा हो?
6) क्या इस उत्सव के दौरान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से यह बात उस होने वाली मां की कुंवारी या अब तक मां न बनी सखियों को नहीं याद दिलाई गई कि अब तुम्हारी बार है, चाहे तुम्हारी इच्छा हो या नहीं?

7}"माँ बनना केवल औरत का हक है ।" अगर ऐसा है तो तो मां न बनना भी उसका हक होना चाहिए,है न! पर ऐसा है क्या?

और एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न स्वप्नदर्शी जी का

There is also other aspect of motherhood. If motherhood is the occasion of celebration and only the afair for women and her child, then it should be equally celebrative for unmarried women, or women who got pregnant in extramarital relations, . But those women are still and their motherhood is condemned and takes their lives.
So being mother and having children is not solely the issue of happiness for mother and occasion where she can find solace from the injustice done to her in every corner.
मातृत्व स्तुत्य है तो अनब्याही माँ होना अपराध क्यों हो जाता है , और वहीं किसी पुरुष द्वारा उस स्त्री व बच्चे को अपना लेने से वही मातृत्व फिर से पवित्र हो जाता है ?और मातृत्व स्तुत्य है तो बेटियों की माँ हमेशा तिरस्कृत्त क्यों होती है ?कहीं समाज के मानदण्डों के अनुसार मातृत्व के स्तुत्य होने की शर्त विवाह संस्था के भीतर प्राप्त हुआ मातृत्व और केवल बेटे का जन्म तो नही है ?
और अगर बात केवल पिता के प्यार दुलार की बच्चे को आवश्यकता की है तो आप भी जानते हैं कितनी स्त्रियाँ पति की मृत्यु के बाद सब अकेले सम्भाल रही हैं हमारे आस पास , या किसी अन्य कारण से वे पति द्वारा तिरस्कृत कर दी गयीं , बच्चों समेत ।
अगर वाकई इन सवालों के जवाब हमारे पास हैं तो बात आगे बढाई जा सकती है ...और नहीं हैं तो बहत निराशाजनक स्थिति है यह !

Wednesday, October 15, 2008

शर्मनाक हादसा

http://timesofindia.indiatimes.com/Indians_Abroad/NRI_woman_paraded_nude_in_Punjab/articleshow/3596874.कम्स

कितनी घृणित घटना है यह, कारण कुछ भी हो, यह हक किसने दिया सरपंच को? इसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है। कोई भी महिला अपने घर मे क्या करती है किसे बुलाती है, इस का निर्णय सिर्फ़ वही कर सकती है और कोई नही, और इसमे उसका इतना अपमान ! शर्म से सर झुक जाता है देख कर, और यह पहली बार नही हुआ है, नियमित रूप से ऐसी घटना कही न कही होती रहती है, हम सब कुछ दिन कहते हैं और बात ख़तम, इसके लिए हमें एक संस्था बनानी चाहिए, हर शहर मे जो उन महिलाओं को सहायता दे सके क्योंकि बाकी समाज और पुलिस तो कुछ करते नही हैं समय पर.

माफ करें, यह तो पुरुष विमर्श है

राजकिशोर

बहुत ही खेद के साथ लिखना पड़ता है कि हिन्दी में जिसे सर्वसम्मति से स्त्री विमर्श कहा जाता है, वह मुख्यत: पुरुष विमर्श है। उसमें स्त्री की चर्चा कम, पुरुष की चर्चा ज्यादा होती है। अगर सारी चर्चा यहीं तक सीमित रहे कि पुरुष कैसा होता है, उसने स्त्री के साथ क्या किया है, वह स्त्री के साथ क्या कर रहा है, तो इसे पुरुष विमर्श नहीं तो और क्या कहा जाए? जैसे रीतिकालीन साहित्य का लक्ष्य स्त्री चर्चा थी यानी स्त्री का सौन्दर्य, स्त्रियों के प्रकार, स्त्रियों के कौशल, स्त्री के साथ प्रेम या रति प्रसंग, वैसे ही जिसे स्त्री विमर्श का साहित्य कहा जा रहा है, वह मुख्यत: पुरुषों के स्वभावगत लक्षणों, उनकी दमनकारी विधियों और उसके द्वारा होनेवाला स्त्रियों का शोषण आदि पर केंद्रित होता है। इसमें स्त्री का अपना संघर्ष कम है, पुरुष के प्रति शिकायत
यह काफी हद तक स्वाभाविक है, क्योंकि किसी भी स्त्री के आंसुओं में पुरुषों के जुल्मो-सितम का लंबा इतिहास समाया हुआ होता है। 'पर्सनल इज पोलिटिकल' को सही मान लें, हालांकि मुझे इसमें थोड़ी शंका है, तो नारीवाद मुख्यत: एक राजनीतिक आंदोलन है। यह पुरुष राजनीति को स्त्री राजनीति से संतुलित करना चाहता है।

वैसे तो स्त्री आदि काल से ही अपनी भावनाओं को व्यक्त करती रही है। उसे मुख्य साहित्य में स्थान नहीं मिला, तो उसने लोक गीतो, लोक कथाओं का माध्यम चुना। हिन्दी की लोक भाषाओं -- अवधी, भोजपुरी, मैथिली, राजस्थानी, बुंदेलखंडी आदि -- में चित्रित स्त्री की व्यथा को एकत्रित किया जाए, तो एक और गंगा बह निकलेगी। खड़ी बोली प्रारंभ से ही पुरुष-भाषा रही है। लेकिन वह हिन्दी क्षेत्र में आधुनिक चेतना के उदय की भाषा भी है। इस उदय में स्त्रियां भी भागीदार रही हैं। अत: खड़ी बोली हिन्दी साहित्य के प्रारंभ से ही स्त्री स्वर भी उपस्थित दिखाई देता है। यह स्वर पिछले एक दशक में तीव्र और व्यापक हुआ है। इसलिए दलित विमर्श की तरह एक अलग नाम भी मिला है -- स्त्री विमर्श।

अगर इतने साहित्यिक और वैचारिक विकास के बावजूद स्त्री स्वर अभी भी पुरुष समाज को अपराधी ठहराने पर ही केंद्रित है, तो मैं कहना चाहूंगा कि पुरुष को पर्याप्त पहचान लिया गया है, उसके दोहरे स्वभाव और पुरुष वर्चस्व की इस चली आ रही संस्कृति को मोटा मोटी बहुत बारीकी से समझ लिया गया है, इसी विषय को दुहराते जाने से क्या फायदा? साहित्य में पुनरावृत्ति नाम का दोष भी होता है। यह दोष इस समय इतना फैला हुआ है कि एक स्त्री लेखक और दूसरी स्त्री लेखक के स्वरों में फर्क करना मुश्किल हो गया है। जिधर देखता हूं, उधर तू ही तू है। ऐसे कब तक चलेगा? हिन्दी का स्वर स्वर प्रौढ़ होने से हिचक क्यों कर रहा है? वास्तविक स्त्री विमर्श की ओर बढ़ने से वह डर क्यों रहा है?अगर नारी विमर्श में पुरुष विमर्श भी स्वस्थ और पूर्णतावादी होता, तो हमारी मित्रगण देख पातीं कि ऐसे पुरुषों की भी एक परंपरा रही है, जिन्होंने स्त्री के श्रेष्ठ गुणों को अपने में समोने में का प्रयास किया है, जिस तरह अनेक स्त्रियों ने पुरुषों के लिए स्वाभाविक माने जाने वाली अधिकार चेतना और खूंखारियत की नकल करने की कोशिश की है।

दुख की बात है कि जिस तरह वर्तमान स्त्री विमर्श में इस दूसरी प्रवृत्ति को समझने और उसकी निंदा करने की समझ दिखाई नहीं देती, वैसे ही पुरुष संस्कृति की इस दूसरी धारा की पूर्ण अवज्ञा है जिसमें पुरुष स्त्री के मानव गुणों को अपना कर एक समेकित मनुष्य बनना चाहता है। उदाहरण के लिए, स्त्रीत्व के बहुत-से गुण ईसा मसीह, गौतम बुद्ध और महात्मा गांधी में देखे जा सकते हैं। सच तो यह है कि ये पुरुष कम, स्त्री ज्यादा लगते हैं। गांधी जी का तो मानना ही था कि वे अपने बच्चों के पिता और माता दोनों ही हैं। उनकी पौत्री मनु गांधी ने अपनी एक किताब के शीर्षक में गांधी जी को अपनी मां बताया है। प्रेमचंद ने कहा है कि जब पुरुष में स्त्री के गुण आ जाते हैं, तब वह देवता बन जाता है। ऐसे देवता-स्वरूप पुरुषों की समानांतर चर्चा चलती रहती, तो स्त्री विमर्श इस संभावना को भी देख पाता कि पुरुष संस्कृति में भी महत्वपूर्ण अंतर्विरोध हैं, जिसकी कोख से वह सज्जन पुरुष निकल सकता है जिसकी स्त्री विमर्शकारों को प्रतीक्षा है। ऐसा कोई आदर्शवाद नहीं है जिसमें जीवन के यथार्थ की अनुगूंज नहीं सुनाई पड़ती हो। इसी तरह, ऐसा कोई यथार्थवाद नहीं है जिसमें आदर्शवाद के कुछ तत्व न हों। इसी द्वंद्वात्मकता के माध्यम से ही वर्तमान कलुषित संस्कृति के बीच से एक बेहतर संस्कृति की पीठिका खोजी जा सकती है और उसमें नए रंग-रूप भरे जा सकते हैं।
एक बात और। आज तक कोई ऐसा महत्वपूर्ण आंदोलन नहीं हुआ, जिसके सदस्यों ने अपने लिए आचरण संहिता न बनाई हो। ईसा मसीह को माननेवाला किस तरह की जिंदगी जिएगा, इसकी एक लिखित-अलिखित संहिता थी। इस संहिता का एक सूत्र यह था कि अगर कोई तुम्हारा कोट मांगे, तो तुम उसे अपनी कमीज भी उतार कर दे दो। गौतम बुद्ध का अनुयायी किसी भी स्थिति में अन्याय और हिंसा नहीं कर सकता था। गांधी जी ने तो अपने पीछे चलनेवालों के लिए इतने नियम-उपनियम बना रखे थे कि उन पर खुद गांधी जी का भी चलना मुश्किल जान पड़ता था। वे अपनी कसौटियों से स्खलित होते रहते थे। उदाहरण के लिए, उन्होंने स्वयं बताया है कि अंतिम दिनों तक उन्हें स्वप्नदोष होता रहा। प्रश्न यह है, स्त्री विमर्श अपनी विमर्शकारों को किस तरह का जीवन बिताने की सलाह देता है? पुरुष की अधीनता में दिन और रात गुजारती जाओ, इसकी सारी सुरक्षाओं का लाभ लेती रहो और अपने साहित्यिक पाठिकाओं-पाठकों को बताती रहो कि ये मर्द बड़े हरामी होते हैं। सारी मांग पुरुषों से है, स्त्रियों से कोई अपेक्षा नहीं कि उनका चरित्र या व्यक्तित्व कैसा होना चाहिए। इतने एकतरफापन से कोई बड़ी चीज नहीं उभर सकती।

Friday, October 10, 2008

महिला सुरक्षा --एक अहम् मुद्ददा

हाल ही में सौम्या मर्डर केस & अन्य सोचने पर विवश करते हैं कि घर से बाहर नारी सुरक्षित नही ....जो चिंताजनक स्थिति है ...देश की आधी आबादी में भय है राजधानी में सबसे अधिक असुरक्षा है तो देश के अन्य शहरों में क्या होगा ....???
----नीलिमा गर्ग

Thursday, October 9, 2008

विजय दसमी शुभ हो सब को !

फ़िर से संदेश देना आया दशहरा ,
अँधेरा हो कितना ही गहरा,
अच्छे पे लगा हो कितना ही पहरा,
जीत सदा होती हा सच की
मुबारक हो तुमको सच का दशहरा.

Wednesday, October 8, 2008

आग

मेरे अंदर एक आग जल रही है
जो मुझे चैन से जीने नही देती ।
वैसे भी एक स्त्री को जीने के लिये चाहिये क्या
पेट भर खाना, कपडा, और सिर पे छत,
शायद थोडे से जेवर थोडे अच्छे कपडे
मैं अपनी आग को समेट कर मुस्कुराती हूँ
मेहमानों का स्वागत करती हूँ
घरवालों को खुश रखने का भरसक प्रयास करती हूँ
लेकिन कोई मुझे भीतर से कचोटता रहता है
क्यूं नही मैं अपने स्वत्व को ललकारती
अपनी अस्मिता को उभारती
क्यूं नही अपना आप निखारती
क्यूं , क्यूं, क्यूं,
मेरे अंदर यही आग जल रही है
जो मुझे चैन से जीने नही देती ।

Monday, October 6, 2008

क्यों कम हो रही है लड़कियां

यह वास्तव में चिंता का विषय है कि जिस देश में कन्या की पूजा होती है , वंहा लड़कियों की संख्या घटी जा रही है ..कुछ तो गर्भ में आते ही हत्या कर दी जाती है कुछ बाद में ..यही वजह है कि महिलाओं का अनुपात गिरता जा रहा है ..आज नही तो कल जवाब तो देना ही होगा .... नवरात्र में जब सभी नारी शक्ति ..कन्या का पूजन करतें हैं तो जीवित कन्याओं से दुर्वयवहार क्यों ...समाज का यह दोगलापन कब समाप्त होगा ...???
---नीलिमा गर्ग

Wednesday, October 1, 2008

सुख-खुशी

कई सुख और खुशियों पर सिर्फ औरतों का हक होता है, अच्छा लगता है ये सब देखते।

आज रश्मि कि गोद भराई की रस्म है, वो बहुत खुश है उसके घर वाले उसका खूब ख्याल रखते हैं घर में एक नन्हा मेहमान आने वाला है रश्मि की सास उसे अपनी बेटी सा प्यार देती है, सभी बहुत उत्सुक है कब वो मेहमान आयेगा रश्मि आज बहुत सुंदर दिख रही है, उसके सर पर लाल सुनहरे गोटे वाली चुनरी और माथे पर बङी गोल सिंदूर की लाल बिंदिया थी एकदम जैसे राजसी महारानी

उसकी सासू माँ ने उसे नज़र का काला टीका लगाया दाँये कान के ठीक पीछे,लेकिन फिर भी वो हर दो मिनट बाद आकर उसके चहरे को अपने दोनों हाथों से प्यार से सहलाती और फिर हाथों को अंगुलियों से चूम लेती तो कभी उसके सर पर अपने दोनों हाथ घुमाकर अपने माथे के दोनों ओर अंगुलियों से कङक की अवाज़ करती जैसे आज शायद सारे ज़माने की बलायें उस पर आ गिरेगीं।

सभी औरते बारी बारी से उसकी गोद में अपने उपहार रखतीं और पास आकर कान मे अच्छी बातें कहती और रश्मि ये सब सुनकर खिलखिलाकर हँस पङती. सच ये खुशी कि हकदार तो औरत ही है
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अभी पिछले दिनों रितू से मुलाकात हुई बहुत खुशी से बता रही थी उसकी २ साल की बेटी ने पहला शब्द माँ बोला ऐसा लगा जैसे आत्मा तृप्त हो गई उसके पति इर्ष्यावश बोले रितू ये क्या बात हुई बेटी के लिये इतने खिलौने, चाकलेट, कपङे मैं लाता हूँ, लेकिन उसने अपना पहला शब्द तुम्हें दिया

सच ये सुख, खुशी कि मिठास सभी दर्द को भुला देने में सक्षम होते हैं जिनपर सिर्फ औरत का अधिकार होता है मतृत्व ऐसी छाँव है जहाँ सारे जग की धूप भी सुहानी लगती है यहाँ रश्मि और रितू कोई नहीं महज़ एक कल्पना है, एक जरिया है ये दिखाने का कि औरतों के लिये जाहे जितने दुख, भेदभाव या बंदिशे हों ये भी एक पहलू है जहाँ औरत की खुशी उसका सुख सर्वोपरी है और जो उसे सभी से अलग करता है