Friday, November 28, 2008

आतंक के ४० घंटे

आतंक के ४० घंटे
पिछले ४० घंटों से देश की धडकनें तेज हैं, आम आदमी चिंताग्रस्त है । जो प्रत्यक्ष तौर पर मुम्बई में बचाव कार्यों से किसी भी रूप में जुडे हैं उनका तन मन आतंक से बहादुरी से जूझ रहे हैं, हम तक सूचनाएँ पहुँचा रहे हैं, हमारी हिम्मत पुरजोर बढ़ा रहे हैं। हम पिछले ४० घंटों से टी.वी. से चिपके परिस्थितियों के सकारात्मक दिशा में बढ़ने की बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं । रोजमर्रा के काम करते हुए भी हमारे मन प्राण उस घटना के तारों से जुडे़ हुए हैं । भीतर की सारी मानवीय भावनाआें को कुचल कर ये किशोर युवा आतंकवादी शायद तमाशे का मज़ा लेने में लगे हैं कि वे कितने बडे़ नियंता बन गए हैं । दुनिया के जनसंख्या के लिहाज़ से दूसरे बड़े देश, एक अरब की आबादी वाले देश की भावनाएँ आज उनकी एक एक गतिविधि से संचालित हो रही हैं ।यह पूरा संसार इन किशोर युवा आतंकियों को शायद मिट्टी या मृत्तिका स्वरूप लग रहा है जिसके वे एकमात्र नियंता हैं । नियंता बनने के भावना हर बालक में होती है, बचपन के खेलों का वह अभिन्न हिस्सा होती है, हम सबको याद ही होगा । बचपन के उन खेलों को सही मार्गदर्शन मिल जाए तो हम सुंदर संसार का निर्माण कर उसके नियंता होने की कामना करते हैं आैर यही बचपन यही कुंठित दमित हो जाए तो भावनाएँ हिंसक हो उठती हैं, मौका लगते ही कुंठित दमित बचपन आतंकी युवा बन समाज का नियंता बनने का हर संभव प्रयत्न करता । सुनहरे भविष्य के लिए हमें आज के बचपन का भरसक सही पालन पोषण करना होगा, उनकी भावना के पंछियों को खुले आकाश की उदारता से परिचय करवाना ही होगा ।दहशत की इस रात की जल्दी ही सुबह हो, देश के साहसी सपूत जो निस्वार्थ बलिदान दे रहें है, उनको मेरी अश्रुपूरित भावभीनी श्रद्धांजलि । हर कोई शक्तिभर प्रयास करे, सफलता अवश्य मिलेगी ।

Thursday, November 27, 2008

थर्रातें मुंबई की इन ललनाओं को सलाम

- श्रुति अग्रवाल

कल रात दस बजे से निगाहें टीवी पर टिकी थीं। इस बार आतंकवादियों ने देश की व्यावसायिक राजधानी मुंबई को, ताज होटल को नहीं बल्कि हमारे देश के मस्तक को निशाना बनाया । देश में लगातार आतंकी हमले हो रहे हैं राजनैतिक पार्टियाँ और खुद हम सभी नपुंसक बने हैं...दिल्ली के सीपी के बाद फिर एक बार देश के अर्थतंत्र को निशाना बनाया गया। दस बजे के बाद जैसे-जैसे घड़ी की सुई आगे बढ़ रही थी जज्ब़ा डूब रहा था। हर तरफ खून और लाशें दिखाई दें रहीं थी...घृणा और शर्मिंदगी के साथ।

अचानक नजर गई रिपोर्टिंग कर रही एक नई पत्रकार पर। उन्नीस-बीस साल की यह युवती हर तरफ बिखरे खून को देख घबराने की जगह सही खबर पहुँचाने में लगी थी...कभी पुलिस कर्मियों से ताज होटल के कुछ नजदीक जाने की अनुमति माँगते तो कभी लाइव करते हुए सही खबर जनता तक पहुँचाने की जद्दोजहद से दो-चार होती। चैनल बदले...एनडीटीवी हो या आजतक, जी न्यूज हो या सहारा या फिर आईबीएन सेवन हर तरफ कमोबेश यही स्थिति थी...लड़कियाँ, वरिष्ठ पत्रकार महिलाएँ सभी अपनी जगह मोर्चा संभाले देखी जा रही थीं...

और यह सिलसिला जो रात दस बजे शुरू हुआ वह पूरी रात बल्कि भोर के उजाले तक लगातर चलता रहा। कुछ पल के लिए ही सही लेकिन गर्व की एक अनुभूती हुई कि अब मैदान में एक नहीं कई बरखा दत्त हैं। जो अंधाधुंध चलती गोलियों, फिदायी हमलों के बीच अपनी जान की परवाह न करते हुए यहाँ वहाँ बिखरे खून और लाशों से विचलित होने की जगह अपना काम कर रहीं थीं।

आप ही सोचिए क्यों हमें अबला कहा जाएँ? हम लड़कियाँ तो चंड़ी का अवतार बन सकती हैं। मैंने खुद कई आदमियों को मरच्युरी में जाने से बचते देखा है... सड़ी-गली लाशें देखने के बाद उबकाई लेते देखा है। जबकि ये महिला पत्रकार हर विपरीत परिस्थिति में अपनी जिंदगी की परवाह करे बिना घटना कवर करती नजर आईं। उन रूढ़ियों को तोड़ती नजर आईं कि लड़कियाँ तो काकरोच, छिपकली से डर जाती हैं। जरा सी विपरीत परिस्थिति हुई नहीं कि गश खाकर गिर जाती हैं, आदि।

मेरी हर माँ से गुजारिश है कि वें हर मोर्चें पर पुरषों से कंधा मिलाते चलती ही नहीं बल्कि दो कदम आगे बढ़ा रहीं इन ललनाओं को देंखे। अपनी बच्चियों में भी इसी तरह का जोश और जज्ब़ा भरने की कोशिश करें। क्योंकि आतंकवाद और नफरत के बीच से देश और दुनिया को अब सृष्टी की सृजनकर्ताएँ ही बचा सकतीं हैं...



श्रुति अग्रवाल खुद पत्रकार हैं। फिलहाल इंदौर में वॉइस ऑफ इंडिया में मालवा-निमाड़ संभाल रही हैं। इससे पहले भास्कर, सहारा समय, नईदुनिया-वेबदुनिया और बीबीसी लंदन(फ्रीलांस) में काम कर चुकी हैं।

य़ह आक्रोश, विरोध और दुख का चित्र है। कल/आज की मुंबई की और पिछली तमाम ऐसी घटनाओं के खिलाफ। इस चित्र को अपने ब्लॉग पोस्ट मे भी डालें और साथ दें । इस एक दिन हम सब हिन्दी ब्लॉग पर अपना सम्मिलित आक्रोश व्यक्त करे । चित्र आभार

इसके आगे, अब डर कैसा कथांश की दूसरी किश्त पढ़ना जारी रखें। ...

अब डर कैसा

अब डर कैसा
अब जब शुभ काम होना तय हो ही गया है तो सबने कहा कि कोई पंगा न करो । मेरा तो बहुत मन था कि मैं अपने कौशल भैया को भी कानपुर सगाई के लिए बुलाउं । लेकिन सब उनसे पूछे बिना ही कह रहे हैं कि वे अपने कामधंधे में व्यस्त हैं । उन्हें शादी पर बुला लेना । अभी उनकी मां को ही साथ ले चलते हैं । न चाहते हुए भी मैंने कहा चलो ठीक है । सगाई हो ही गई और उसके साथ ही नई समस्या ख़डी हो गई कि शादी कहां होगी । कानपुर शादी करवानी बहुत मंहगी पड़ेगी, इसलिए लड़के वाले चाहते हैं कि सहारनपुर में ही शादी हो जाए, लेकिन फिर सारी जिम्मेदारियां जो लड़केवालों की होती हैं वे भी मां पर ही आ पड़ेंगी । अंतत: मां ने ही सारी जिम्मेदारी ओढ़ ली । हम लड़कीवाले जो ठहरे। और कई तरह की अडचनों को पार करते हुए, शादी भी हो ही गई । खूब खुशियां मनाई गई भाभी को बड़ी वाहवाही मिली कि एक विकलांग लड़की की शादी करवाकर उन्होंने बड़े पुन्य का काम किया है । भाभी बहुत खुश थीं ।मैं सहारनपुर के स्टेशन पर अपने नए नवेले दुल्हे और सास के साथ खड़ी थी । द्रेन आ गई और मैं मां से अलग होकर अपने नए परिवार के साथ अपने को बैठा हुआ देखती हूँ । मन में एक टीस सी उठती है । हालात का ऐसा जादू कि मैं अपने पर भी उसी का नियंत्रण सा महसूस कर रही थी । मां से जाकर चिपक जाना चाहती थी लेकिन पैर जैसे जम से गए थे । गाड़ी चल पड़ी और मां की डबडबाती आँखें मेरे सीने में कहीं गड़ सी गईं । मैं गुमसुम सी खिड़की के पास बैठ गई और मेरा दुल्हा और सास सामने बैठे कभी कनखियों से मुझे देखते और कभी आपस में कुछ धीमे धीमे बात कर लेते । मैं उदास तो थी लेकिन यह भी चाह रही थी कि किसी से बात करूं या कोई मुझसे ही बात कर ले । लेकिन नई दुल्हन का संकोच कैसे छोडती । पूरा सफर चुप रहकर ही काटना पड़ा । जाने कब आँख लग गई और जागी तो गाड़ी से उतरने की गहमागहमी में मैंने अपने को भी कानपुर स्टेशन के प्लेटफार्म पर खड़े पाया । आटो में अपना सारा साजो सामान रख मैं अपने नए परिवार के साथ अपने नए घर पहुँची । सुबह का मौसम ठंडक भरा था । नमी और ओस की ठंडक भरी हवा से मेरा समूचा शरीर कांपने सा लगा । लेकिन नए रिश्ते की गर्मी ने तन मन दोनों से मौसम की ठंडक के एहसास को गायब सा कर दिया । इस तरह मैं आई थी तुम्हारे घर नई नवेली दुल्हन बन कर ।इन सब बातों को बीते अभी दो ही साल हुए होंगे लेकिन, मुझे ऐसा लग रहा है मानो अरसा बीत गया । मुझे तो ऐसा लग रहा है ये मानो मेरा तीसरा जन्म है । पहला जन्म शादी से पहले, दूसरा शादी के बाद और तीसरा अब जब जिंदगी फिर एक बार रिश्तों को नए सिरे से समझने को मज़बूर है। मैने तो हर संभव कोशिश की । मां से छुप छुप कर बहुत से समझौते किए । लेकिन अपनी जिंदगी खोकर तो मैं यह रिश्ता नहीं निभा सकती थी । साल भर ससुराल में रहने और हर तरह से वहां की जिंदगी में ढलने की कोशिश करते करते मुझे पता ही नहीं चला कि कब बीमारी ने मुझे जकड़ लिया । मां ने जब सुना कि लगातार पंद्रह बीस दिन में बुखार चढ़ने की बात सुनी तो डाक्टर के पास ले गयी । पूरी जांच हुई ।खतरनाक हद तक ब्रोंकाइटिस और वजन मात्र २६ किलो डाक्टर भी देखकर हैरान कि आप जी कैसे रही हैं । मां ने ता ठान लिया कि अब चाहे कुछ हो जाए । मैं अपनी बेटी को दोबारा मरने के लिए ससुराल नहीं भेजने वाली । उन्हें अपनी उस भांजी की याद हो आई जो गर्भावस्था में अपनी मां, अपने भाई और पिता से सहायता मांग थक गई लेकिन सबने उसे ससुराल वालों की जिम्मेदारी समझ उसके हाल पर ही छोड़ दिया ।

Wednesday, November 26, 2008

सबसे खतरनाक होता है

'पाश'(अवतार सिंह संधु)

अर्चना की कविता त्रासद पढ़ने के बाद बेसाख्ता पाश की यह मशहूर कविता याद आ गई और मैं सबको फिर एक बार इसे पढ़वाने से खुद को रोक नहीं पा रही हूं। मुझे अंदाज़ा है कि त्रासदी कविता को यहां पर आए कुछ ही घंटे हुए हैं और उस पर सबसे खतरनाक... को चेप कर मैं उसके साथ न्याय नहीं कर रही। फिर भी...। उम्मीद है, सब इस जानदार कविता को पढ़ने के बाद आप मुझे इस हिमाकत के लिए माफ करेंगे।

मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती,
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती,
गद्दारी, लोभ का मिलना सबसे खतरनाक नहीं होता,
सोते हुये से पकडा जाना बुरा तो है,
सहमी सी चुप्पी में जकड जाना बुरा तो है,
पर सबसे खतरनाक नहीं होता,

सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शान्ति से भर जाना,
न होना तडप का सब कुछ सहन कर जाना,
घर से निकलना काम पर और काम से लौट कर घर आना,
सबसे खतरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना ।

सबसे खतरनाक होती है, कलाई पर चलती घडी, जो वर्षों से स्थिर है।
सबसे खतरनाक होती है वो आंखें जो सब कुछ देख कर भी पथराई सी है,
वो आंखें जो संसार को प्यार से निहारना भूल गयी है,
वो आंखें जो भौतिक संसार के कोहरे के धुंध में खो गयी हो,
जो भूल गयी हो दिखने वाली वस्तुओं के सामान्य
अर्थ और खो गयी हो व्यर्थ के खेल के वापसी में ।

सबसे खतरनाक होता है वो चांद, जो प्रत्येक हत्या के बाद उगता है सूने हुए आंगन में,
जो चुभता भी नहीं आंखों में, गर्म मिर्च के सामान
सबसे खतरनाक होता है वो गीत जो मातमी विलाप के साथ कानों में पडता है,
और दुहराता है बुरे आदमी की दस्तक, डरे हुए लोगों के दरवाजे पर ।

त्रासद

इतना त्रासद नहीं है
तमाम उम्र ढूढ़ते रहना
सपने के उस पुरूष को
जिसे तराशा था आपने तब
जब आपने सपने देखने की
शुरुआत की थी।

त्रासद यह भी नहीं
कि उम्र के एक मोड़ पर आकर
वह आपको दिखे तो जरूर
पर आपको देख न पाये।

त्रासद यह भी नहीं है
कि सपनों का वह पुरूष
दौपदी की चाहत की तरह
अलग-अलग पुरुषों में मिले।

त्रासद तो ये है
कि जिसे आपने कभी चाहा ही नहीं
उससे यह कहते हुए तमाम उम्र गुजारना
कि तुम ही तो थे मेरे सपनों में।

अर्चना की कविता ऊब और दूब से साभार

समाधान सतत जागृत रहने से ही संभव

समाधान सतत जागृत रहने से ही संभव
महिलाओं और बच्चों के लिए वयस्क समाज अक्सर संवेदनशील नहीं होता । उनकी इच्छाओं और सोच को परिवार की निर्णय लेने वाली इकाई किसी गिनती में ही नहीं लाते । इसी का परिणाम है चाहते न चाहते, जाने अनजाने उन पर अत्याचार । परिवार ही नहीं समाज की अन्य इकाइयों में भी हम देखते है चाहे स्कूल में बच्चे हों या फिर आफिस में काम करने वाली सामान्य स्तर की महिला कर्मी दोनों की ही बात नहीं सुनी जाती । हमेशा दूसरों द्वारा लिए गए निर्णय ही उन पर लादे जाते हैं । जो भी अधिकार की कुर्सी पर बैठा है वह अक्सर ही बिना हालात की गहराई को समझे अपनी सोच समझ और साथ ही अंहकार के चलते निर्णय लेता है । अधिकार की कुर्सियों पर जब तक जाति, लिंग, धर्म, धन या अन्य किसी भी अहंकार को लेकर मनुष्य बैठेगा, या जब तक मनुष्य बनकर मनुष्य नहीं बैठे और निर्णय लेगा तब तक अन्याय होता ही रहेगा ।

Saturday, November 22, 2008

उस भयानक हरकत को रोकना होगा, घंटी बजानी ही होगी


"मां भी शादी के बाद गृहस्थी का और पति का सुख नहीं देख पाई बस संतान सुख या कहो दुख मुझ विकलांग बच्ची के रूप में उन्होंने पाया । बड़ी मुशि्कल से जान बचाकर वह ससुराल से वापस सहारनपुर आ सकी । मैं जब गर्भ में थी तो उनके ससुर ने उन्हें इतना मारा कि उसका फल विकलांगता के रूप में मैं जीवन भर भोग रही हूं । मम्मी की भी रूह कांप जाती है जब कोई उन्हें वही सब याद दिलाकर मेरी शादी न करने की सलाह देता है।"

इसी ब्लॉग की पोस्ट अब डर कैसा की कुछ पंक्तियां मैंने यहां उतारी हैं। कहानी आगे किस दिशा में जाती है, यह तो आगे ही पता चलेगा, लेकिन कहानी को दिशा देने वाली इस घटना को मैं नजर-अंदाज नहीं कर पाई।

पिछले दिनों टीवी पर एक विज्ञापन देखा। एक आम निम्न-मध्यम वर्गीय मोहल्ले के मैदान में बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं। किसी के पैर में जूते नहीं हैं, तो कोई बड़े साइज की कंधे से ढलकती टी शर्ट संभालता फिर रहा है। पर सबमें जोश की कोई कमी नहीं। फिर ऐदान के तीन ओर फैले चॉल के एक कमरे से आदमी-औरत के झगड़े की आवाजें, चीखें आती है। आवाजों से समझ में आता है कि पुरुष शराब पी कर आया है और पत्न को मार रहा है। इन आवाजों से बैट्समैन बल्ले पर पकड़ ठोड़ देता है और गेंदबाज भी लड़खड़ा जाता है।

फिर दर्शक देखते हैं कि बच्चों की पूरी टीम खेल छोड़कर उस दरवाजे पर पहुंची हैं और घंटी बजा रही है। आदमी दरवाजे को आधा खोल कर झांकता है तो बच्चे गेंद का इशारा करते हैं। वह घर (कमरे) में जाता है और बाहर निकलता है। जाहिर हैं, उसे गेंद घर के अंदर नहीं मिली क्योंकि वह तो एक लड़के के हाथ में ही है जो उसे दादा टाइप अंदाज में उछाल रहा है।

फिर संदेश आता है- घरेलू हिंसा को रोको, घंटी बजाओ। पिछले कुछ समय में इतना प्रभावशाली विज्ञापन और स्लोगन, किसी सामाजिक बुराई को रोकने का इतना सरल लेकिन प्रभावशाली, तत्काल असर पैदा करने वाला खालिस देसी उपाय देखने में नहीं आया था।

महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा पर 2002 में हुए एक अध्ययन के मुताबक 45 फीसदी भारतीय पत्नियां अपने पतियों द्वारा मार-थप्पड़ से लेकर लात-घूंसों और किसी ठोस चीज से वार तक सहती हैं। गर्भावस्था के दौरान हिंसा झेलने में भारतीय पत्नियां दुनिया में अव्वल हैं। अध्ययन के मुताबिक हिंसा की रिपोर्ट दर्ज कराने वाली महिलाओं में से 50 फीसदी गर्भवती थीं। उन औरतों को कोई और सुरक्षित रास्ता नहीं दिखता, इसीलिए उनमें से 74.8 फीसदी आत्महत्या तक की कोशिशें करतीं हैं। अक्टूबर 2005 के संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 15 से 49 उम्र की 70 फीसदी शादीशुदा औरतें यानी हर तीन में से दो, घरेलू हिंसा सहती है। हालांकि मिस्र में यह संख्या 94, जांबिया में 91 फीसदी है। इसमें पिटाई, बलात्कार और असहज यौन-व्यवहार शामिल हैं।

घरेलू हिंसा से महिलाओं को बचाने के लिए अक्टूबर 2006 से भारत में डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट लागू है। फिर भी ऐसी घटनाओं में कोई कमी नहीं आ रही है। और दिलचस्प यह है कि औरत के खिलाफ शरीर की ताकत का इस्तेमाल दुनिया भर में हर देश, जाति, वर्ग, धर्म में समान रूप से होता आया है, थोड़े-बहुत फर्क के साथ। औरतों के खिलाफ हिंसा में पति-पत्नी के बीच झगड़े-फसाद के अलावा बालिका गर्भ का समापन, दहेज के लिए प्रताड़ना या हत्या, मानसिक और शारीरिक पीड़ा देना, वेश्यावृत्ति के लिए खरीद-बिक्री और लोगों के सामने अपमान भी शामिल हैं। घरेलू हिंसा का अर्थ सिर्फ मार-पीट, झगड़ा या बहस नहीं है। यह दरअसल ताकत का गलत इस्तेमाल है। धमकियां देकर, डर दिखा कर, और शारीरिक हिंसा के जरिए किसी को पीड़ा, यंत्रणा देना और उस पर नियंत्रण करने की कोशिश करना। इसकी पहली शिकार आम तौर पर महिलाएं होती हैं।

घरेलू हिंसा के बारे में अपने लोगों को कम उम्र से ही जागरूक बनाने और इसके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश होनी चाहिए। समाज भी औरतों के खिलाफ अत्याचार को परिवार का आंतरिक मसला मानकर नजरअंदाज न करे। औरतों को पता होना चाहिए कि अगर परिवार में ऐसी कोई घटना हो तो सहायता मांगने की जरूरत है न कि घटना को छुपाने की, क्योंकि यह गंभीर मामला है, परिवार की बेइज्जती से ज्यादा परिवार के भीतर औरत की बेइज्जती, असुरक्षा, उत्पीड़न का मसला है। हिंसा की शुरुआत हो, इससे पहले ही लोगों को बताया जाए कि यह गलत है, गैर-कानूनी है। इसे रोकने के लिए हम सब कोशिश कर सकते हैं। अगर हम अपने सामाजिक सरोकारों के प्रति सजग हैं, अपने घर-परिवार और पास-पड़ोस में घरेलू हिंसा को रोकना चाहते हैं तो एक घंटी तो बजा ही सकते हैं।

Wednesday, November 19, 2008

अब डर कैसा

बहुत लोग मना कर रहे हैं, कि ये शादी निभ नहीं पाएगी । अकेले ही मैं अच्छा जीवन जी पाउंगी ! घर गृहस्थी संभालना मेरे बस की बात नहीं । लेकिन मुझे लगता है कि कुछ तो एसी सलाह इसलिए दे रहे हैं कि मुझसे जलते हैं, कुछ शायद सचमुच भी मेरे लिए चिंतित हैं। कुछ एसे भी हैं जो मां के कारण मुझे भी शादी करने से मना कर रहे हैं । मां भी शादी के बाद गृहस्थी का और पति का सुख नहीं देख पाई बस संतान सुख या कहो दुख मुझ विकलांग बच्ची के रूप में उन्होंने पाया । बड़ी मुशि्कल से जान बचाकर वह ससुराल से वापस सहारनपुर आ सकी । मैं जब गर्भ में थी तो उनके ससुर ने उन्हें इतना मारा कि उसका फल विकलांगता के रूप में मैं जीवन भर भोग रही हूं । मम्मी की भी रूह कांप जाती है जब कोई उन्हें वही सब याद दिलाकर मेरी शादी न करने की सलाह देता है

मां इस बात से बहुत दुखी रहती हैं कि मैंने बचपनसे ही कभी ठीकठाक जीवन को न देखा न समझा । वो चाहती हैं कम से कम अब तो मैं जीवन को सामान्य सहज रूप में जी सकूं , जब एक मौका मिला है तो उसे छोड़ा क्यों जाए । क्या पता भगवान ने ही कुछ बेहतर जिंदगी मेरे लिए सोची हो, जीवन का नया रूप मुझे दिखाना हो । मां जब ससुराल से बचती बचाती मामा के घर पहुंची तो नानी के घर भी मेरे साथ मामा मामी या नानी के बर्ताव से मां खुश नहीं थी। मां भी इन सब बातों से कभी खीझती, कभी मुझे ही पीटने लगती, तो कभी ज्यादा ही दुलार बरसाने लगती । मैने भी जिंदगी से कभी ज्यादा उम्मीद ही नहीं की । सदा यही सोचा कि जिंदगी ऐसी ही होती है । लेकिन यह तो हमेशा लगता रहा कि मैं बाकियों से कुछ अलग हूं । मुझे बहुत कुछ नहीं करना चाहिए । पापा या डैडी के नाम पर मेरे पास बताने के लिए कुछ नहीं है । पर अब मम्मी कहती हैं कि सब कुछ ठीक हो जाएगा । इतनी मेहनत और जद्दोज़हद से मां ने अपनी शादी से पहले वाली सरकारी नौकरी पुन: हासिल की, छोटा सा ही, लेकिन अपना घर बना ही लिया, जहां मुझे और मां को कोई फालतू की बातें या ताने नहीं सुना सकता और पिछले सात आठ साल से हम दोनों मां बेटी सुकूल की जिंदगी जी रहे हैं । हालांकि मम्मी की बडी बहन और उनके बेटों ने हर दुख तकलीफ में हमें सहारा दिया । लेकिन अब हम अपने सहारे भरा पूरा जीवन जी ही रहें हैं । दीनहीन समझ कर तो कोई मेरा रिश्ता नहीं ही लाया होगा ।भाभी भी तो मुझे काफी प्यार करती हैं । जब से वो ब्याह कर कानपुर से सहारनपुर आईं हैं मैं ही तो उन्हें सब जगह ले जाती हूं । और किसी से वो कह भी नहीं पाती और भैया के पास ज्यादा समय होता नहीं । सहारनपुर के सारे बा़जा़र मैंने ही उन्हें दिखाये । एन.टी.टी भी हम दोनों ने साथ साथ ही की । भाभी से ज्यादा तो वो मेरी सहेली जैसी ही हैं । उन्होंने जरूर मेरे लिए अच्छा ही सोचा होगा। तो मां भाभी को मना नहीं कर पाई । सगाई की तारीख तय हो गई, सितम्बर में और शादी दिसम्बर में होगी ।सगाई में मेरे मुंहबोले भाई को बुलाने के लिए भाभी मना कर रही है । समझ नहीं आ रहा क्यों ?

झाड़ू-पोंछे से लेखिका बनने का सफ़र

नाम बहुत आम सा "बेबी हालदार" दुबली-पतली, सांवला रंग और इच्छायें शायद अनेकों लेकिन वक्त बेवक्त ये अहसास हो जाता आखिर गरीब आदमी की औकात ही क्या होती है और ऊपर से औरत कई लोग कहते हैं किस्मत थी और कई की, वो तो उसकी लगन और मेहनत ही थी की उस मुकाम तक आ पहुँची जहाँ शायद वो अपने सजीले सपनों में ही पहुँच सकती थी आज जहाँ है वहाँ उसे देख कई लोग हैरान हैं, कई परेशान और कई बेहद खुश वो एक प्रेरणा का स्रोत है और आदर्श भी उसके बच्चे आज गर्व से कहते हैं "माई मदर इस ए राईटर" ये तो सच ही है कोई चमत्कार नहीं जब इंसान कुछ करने की ठान ही लेता है तो कोई कैसे उसे रोक सकता है फिर वो कहावत भी तो सटीक है जब कोई कुछ दिल से करना चाहता है तो कुदरत भी खुद उसके लिये कई ऐसे रस्ते बुनती है जो उसके लिये मददगार सबित होते हैं खैर आईये मिलते है बेबी हालदार से मैं उनसे मिली नहीं लेकिन उनको पङा जरूर है फिर ख्याल आया आप सब भी तो जरूर मिलना चाहेगें और मिलकर जरूर खुश होंगे जैसे मैं हुई थी सो अपनी खुशी आप सभी से बांट रही हूँ
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दूसरों के घरों में झाड़ू-पोंछा लगाने वाली एक नौकरानी का लेखक बन जाना किसी फ़िल्म की तरह कपोल-कल्पित कहानी लगती है. लेकिन यह चमत्कार सचमुच हुआ है और बेबी हालदार अब बाक़ायदा एक लेखिका हैं.

उनकी पहली किताब “आलो आंधारि” पिछले साल हिंदी में प्रकाशित हुई और अब तक उसके दो संस्करण छप चुके हैं। हाल ही में इसका बांग्ला संस्करण प्रकाशित हुआ है और इसका विमोचन सुपरिचित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने किया है.

“आलो आंधारि” छपने के बाद तो अड़ोस-पड़ोस में काम करने वाली दूसरी नौकरानियों को भी लगने लगा है कि ये उनकी ही कहानी है।बेबी हालदार अपने को “काजेर मेये” (काम करने वाली) कहती हैं.

29 साल पहले जम्मू-काश्मीर के किसी ऐसी जगह में उनका जन्म हुआ, जहां उनके पिता सेना में थे. अभाव और दुख की पीड़ा झेलती बेबी अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि अपनी किताब “आलो आंधारि” को मानती हैं.

पिछले दिनों वे छत्तीसगढ़ के बिलासपुर पहुँचीं तो आलोक प्रकाश पुतुल ने उनसे लंबी बात की।
बेबी हालदार की आत्मकथा सुनिए उन्हीं की ज़ुबानी -

पिता सेना में थे, लेकिन घर से उनका सरोकार कम ही था। सेना की नौकरी से रिटायर होने के बाद पिता बिना किसी को कुछ बताए, कई-कई दिनों के लिए कहीं चले जाते। लौटते तो हर रोज़ घर में कलह होता।

एक दिन पिता कहीं गए और उसके कुछ दिन बाद मां मन में दुख और गोद में मेरे छोटे भाई को लेकर यह कह कर चली गई कि बाज़ार जा रही हैं. इसके बाद मां घर नहीं लौटीं.
इधर पिता ने एक के बाद एक तीन शादियां कीं. इस दौरान मैं कभी अपनी नई मां के साथ रहती, कभी अपनी बड़ी बहन के ससुराल में और कभी अपनी बुआ के घर.मां की अनुपस्थिति ने मन में पहाड़ जैसा दुख भर दिया था.यहां-वहां रहने और पिता की लापरवाही के कारण पढ़ने-लिखने से तो जैसे कोई रिश्ता ही नहीं बचा था.

शादी और दुख
सातवीं तक की पढ़ाई करते-करते 13 वर्ष की उम्र में मेरी शादी, मुझसे लगभग दुगनी उम्र के एक युवक से कर दी गई.फिर तो जैसे अंतहीन दुखों का सिलसिला-सा शुरु हो गया.पति द्वारा अकारण मार-पीट लगभग हर रोज़ की बात थी. पति की प्रताड़ना और पैसों की तंगी के बीच ज़िल्लत भरे दिन सरकते रहे.एक-एक कर तीन बच्चे हुए.उसी क्रम में दो जून की रोटी की मशक़्कत के बीच पति का अत्याचार बढ़ता गया. अंततः एक दिन अपने बच्चों को लेकर घर से निकल गई. दुर्गापुर...फ़रीदाबाद...गुड़गांव. एक घर से दूसरे घर, नौकरानी के बतौर लंबे समय तक काम किया. नौकरानी के बजाय बंधुआ मज़दूर कहना ज़्यादा बेहतर होगा. सुबह से देर रात तक की हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी ख़ुशियों की कोई रोशनी कहीं नज़र नहीं आ रही थी.

प्रेमचंद के परिवार का सहारा
ऐसे ही किसी दिन मेरे एक जान-पहचान वाले ने मुझे गुड़गाँव में एक नए घर में काम दिलवाया. यहां मैंने पाया कि इस घर का हर शख़्स मेरे साथ इस तरह व्यवहार करता था, जैसे मैं इस घर की एक सदस्य हूँ.

बांग्ला में लिखी किताब पहले हिंदी में छपी
घर के बुजुर्ग मुखिया, जिन्हें सब की तरह मैं भी तातुश कहती थी, (यह मुझे बाद में पता चला कि इसका अर्थ पिता है) अक्सर मुझसे मेरे घर-परिवार के बारे में पूछते रहते. उनकी कोशिश रहती कि हर तरह से मेरी मदद करें.कुछ माह बाद अतिक्रमण हटाने के दौरान मेरे किराए के घर को भी ढहा दिया गया और अंततः तातुश ने मुझे अपने बच्चों के साथ अपने घर में रहने की जगह दी. इसके बाद दूसरे घरों में काम करने का सिलसिला भी ख़त्म हो गया. तातुश के घर में सैकड़ों-हज़ारों किताबें थीं. बाद में पता चला कि तातुश प्रोफ़ेसर के साथ-साथ बड़े कथाकार हैं. उनकी कहानियां और लेख इधर-उधर छपते रहते हैं. उनका नाम प्रबोध कुमार है. और यह भी कि तातुश हिंदी के सबसे बड़े उपन्यासकार प्रेमचंद के नाती हैं.

अक्सर किताबों की साफ़-सफ़ाई के दौरान मैं उन्हें उलटते-पलटते पढ़ने की कोशिश करती। ख़ास तौर पर बंगला की किताबों को देखती तो मुझे अपने बचपन के दिन याद आ जाते।

तातुश ने एक दिन मुझे ऐसा करते देखा तो उन्होंने एक किताब देकर मुझे उसका नाम पढ़ने को कहा। मैंने सोचा, पढ़ तो ठीक ही लूंगी लेकिन ग़लती हो गयी तो? फिर तातुश ने टोका तो मैंने झट से किताब का नाम पढ़ दिया-“आमार मेये बेला, तसलीमा नसरीन!” तातुश ने किताब देते हुए कहा कि जब भी फुर्सत मिले, इस किताब को पढ़ जाना।

फिर एक दिन कॉपी-पेन देते हुए तातुश ने अपने जीवन के बारे में लिखने को कहा. मेरे लिए इतने दिनों बाद कुछ लिखने के लिए कलम पकड़ना किसी परीक्षा से कम न था.

लिखने का सिलसिला
मैंने हर रोज़ काम ख़त्म करने के बाद देर रात गए तक अपने बारे में लिखना शुरु किया. आपबीती लिखना दुखों का सामना फिर करने की तरह था.पन्नों पर अपने बारे में लिखना ऐसा लगता था, जैसे फिर से उन्हीं दुखों से सामना हो रहा हो. तातुश उन पन्नों को पढ़ते, उन्हें सुधारते और उनकी ज़ेराक्स करवाते. लिखने का यह काम महीनों चलता रहा.

एक
दिन मेरे नाम एक पैकेट आया, जिसमें कुछ पत्रिकाएं थीं। अंदर देखा तो देखती रह गयी. अपने बच्चों को दिखाया और उन्हें पढ़ने को कहा. मेरी बेटी ने पढ़ा - बेबी हालदार! मेरे बच्चे चौंक गए-“मां, किताब में तुम्हारा नाम.” तातुश के कहानीकार दोस्त अशोक सेकसरिया और रमेश गोस्वामी ने कहा-ये तो एन फ्रैंक की डायरी से भी अच्छी रचना है. मैं अपनी कहानी लिखती गई॥लिखती गई.

फिर एक दिन एक प्रकाशक आए. वो मेरी किताब छापना चाहते थे. तातुश ने मेरी बंगला में लिखी आत्मकथा का पूरा अनुवाद हिंदी में कर दिया था. इस तरह मेरी पहली किताब छपी- “आलो आंधारि.” कोलकाता के रोशनाई प्रकाशन ने इस किताब को प्रकाशित किया है. कुछ ही समय में किताब का दूसरा संस्करण निकला... फिर इसका बांगला संस्करण.

इधर मैंने हाल ही में अपनी दूसरी किताब पूरी की है। अब मेरी बेटी बड़े गर्व के साथ मेरा परिचय देती है- माइ मदर इज़ अ राइटर इस किताब में “आलो आंधारि” के छपने के बाद मेरे जैसी नौकरानी के प्रति समाज के व्यवहार में आए बदलाव को केंद्र में रखा गया है। ज़ाहिर है, कल तक जो लोग मेरी तरफ़ देखते भी नहीं थे, वो अब मुझसे बात करने को लालायित रहते हैं।

हर रोज़ कई चिट्ठियां आती हैं। अंधेरे और उजाले की मेरी इस कहानी का कोई नाट्य रुपांतरण करना चाहता है, कोई किसी और भाषा में अनुवाद। कोई इसका काव्य रुपांतरण करना चाहता है तो कोई इस पर फ़िल्म बनाना चाहता है। पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में इस पर चर्चा हो रही है।

लेकिन मैं कोई लेखिका नहीं हूं, मैं तो अब भी एक काजेर मेये (काम करने वाली) ही हूं। मैं तो अब भी यह समझ नहीं पाती कि मेरी अपनी कहानी लोगों को क्यों इतनी पसंद आई। तातुश को पूछती हूं तो वो टाल जाते हैं।हां, कल तक मेरे बच्चे अपनी मां का परिचय देने में शरमाते थे।
मैं गुड़गाँव में ही रहती हूँ. अब मेरी बेटी बड़े गर्व के साथ मेरा परिचय देती है- माइ मदर इज़ अ राइटर.
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मुझे उम्मीद है आप सब भी "बेबी हालदार" से मिलकर खुश हुये होगें

(इन्टरव्यू : बी।बी।सी। हिन्दी के सौजन्य से)

Friday, November 14, 2008

ज़ोर का झटका धीरे से लगे




Women work all the time .

Men put up signs whenever they work !

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what do men and women have in common ?

they both distrust men !

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scientists have just discovered something that can do the work of five men ...
....a woman !!
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whats a mans idea of helping with the house work ?
-lifting his legs so you can clean the floor !
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how many men does it take to change a toilet paper roll ?
Nobody knows ,it has never happened !
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How many men does it take to dirty up 12 pots while cooking a meal?

one .
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Few women admit their age
Few men act theirs !!
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What would get your man to puT down the toilet seat ?

A sex change operation !!
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A woman without a man ......


:

:

is like a fish without a bicycle.
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If a woman can cook ,
so can a man ,
:
:
Because a woman doesnt cook with her womb !!
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सन्दर्भ :
laughing matters
Kamla Bhasin and Bindiya Thapar
published by :
JAGORI
jagori@jagori.org

Thursday, November 13, 2008

रंग-भेद और महिलाओं की अलग जगह के खिलाफ गार्डिमर का अपने देश में स्वागत!

नादिन गॉर्डिमर दक्षिण अफ्रीका की श्वेत साहित्यकार हैं जिन्होंने अपने साहित्य और सामाजिक क्षेत्र में काम के जरिए रंगभेद की मुखालफत की है। आश्चर्य नहीं कि उनके 14 में से ज्यादातर उपन्यास कम या ज्यादा समय के लिए गुलाम द. अफ्रीका में प्रतिबंधित रहे, कोई 10 साल तो कोई 12 साल तक।

खास खबर यह है कि नोबेल पुरस्कार पाने वाली यह साहित्यकार और राजनीतिक कार्यकर्ता दो दिन के भारत दौरे पर हैं। आज दिल्ली और कल मुंबई में वे रहेंगी। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, भारत सरकार की नोबेल विजेता व्याख्यान श्रृंखला की दूसरी कड़ी के रूप में वे भारत आई हैं।

20 नवंबर 1923 को जन्मी गॉर्डिमर को औपचारिक शिक्षा नहीं के बराबर मिली। जोहानेसबर्ग की स्थानीय लाइब्रेरी ही उनकी शिक्षण संस्था थी। इसीलिए वे कहती हैं कि अगर उनकी चमड़ी का रंग काला होता तो वे साहित्यकार नहीं बन पातीं, क्योंकि उस लाइब्रेरी में अश्वेतों के आने की मनाही थी।

गॉर्डिमर के उपन्यासों के चरित्र आम जीवन से उठाए गए हैं। प्रेम और राजनीति में गुथे उनके पात्र चित्रण या कथन से नहीं, अपने फैसलों से अपना परिचय तय करते हैं। उनके चरित्रों के नाम भी अपने समय की एक पूरी कहानी कह जाते हैं।

गॉर्डिमर ने 1998 में ब्रिटेन के ऑरेंज ब्रॉडबैंड साहित्य पुरस्कार के लिए शार्टलिस्ट होने से भी मना कर दिया क्योंकि यह पुरस्कार सिर्फ महिलाओं के लिए है। और गॉर्डिमर का मानना है कि महिलाओं को अलग खंड में , अलग स्तर पर रखने से उनकी बेहतरी नहीं हो सकती। इसके लिए उन्हें पुरुषों के साथ बराबरी की प्रतियोगिता का मौका मिलना चाहिए। एक बाग नहीं, एक खेत नहीं हम सारी दुनिया मांगेंगे!

आइए अपने देश में स्वागत करें इस विलक्षण, जुझारू, अगले हफ्ते 85 की होने जा रही नोबेल विजेता साहित्यकार, एड्स कार्यकर्ता (खास बात ये है कि इस एकमात्र मोर्चे पर वे दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति मबेकी की विरोधी हैं), राजनीतिक विचारक नादिन गॉर्डिमर का।

साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार स्वीकार करते वक्त उनके दिल को छू लेने वाले, एकदम बेबाक-सच्चे शब्दों को पढ़ना हो तो यहां क्लिक करें

Monday, November 10, 2008

ये चोखेर बाली क्या चीज है यह नहीं जानता

2008/11/9 Rajeev Nandan Dwivedi
मैडम नमस्कार,
आप इतना अच्छा लिखती हैं, पर ये चोखेर बाली क्या चीज है यह नहीं जानता. यदि इस पर थोड़ा सा प्रकाश डालें तो...
प्रगतिशील विचारों वाली हैं आप, फ़िर ये आंखों की किरकिरी वाली बात नहीं समझ में आई.
अरे आगे आइये और सबकी सहायता कीजिये. सभी गिरे हुओं को ऊपर उठाइये. ये दूसरों को चुभने जैसा ब्लॉग का नाम क्यों चुना !
आपकी सोच तो समाज के पुनर्निर्माण में अत्यन्त ही सही और सहायक है फ़िर ये आंखों को कष्ट देने वाला नाम नहीं जंचता.
वैसे आपका ब्लॉग है आप जो चाहे करें पर मेरा मानना है की यह एक नए जागरण और उत्थान का द्योतक है अतः नाम भी कुछ ऐसा ही होना चाहिए था.
बिना मांगे सलाह दे रहा हूँ अतः माफ़ी चाहूंगा पर आपका लंबे समय से पाठक हूँ. अतः पराया नहीं हूँ मैं आपके लिए. अपना समझ कर सलाह दी है पर डर रहा हूँ की कहीं आप इसे अपना विरोध न समझ बैठें. :)
मैंने इतिहास पढ़ा है, शायद कुछ ज्यादा ही गहराई से.
आप का लेखन मुझे ' सम्राट अकबर ' की याद दिलाता है.
जिस प्रकार से उसने अपने काल में विरोधों का सामना कर के हिंदू-मुस्लिम भेद-भाव को दूर करने की कोशिश की थी उसी तरह आप भी स्त्री-पुरूष भेद को घटाने के साथ ही सही सोच को भी दृढ़ता से रख रही हैं. धन्यवाद.
आपके उत्तम लेखन के लिए आप को हार्दिक शुभकामनाएं,
आपका
ई-गुरु राजीव
Blogs Pundit
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chokher bali to rajeev

राजीव जी,

आपका पत्र पाकर अच्छा लगा ।आप चोखेर बाली को निरंतर पढते हैं यह भी हमें उत्साहित करता है ।"सम्राट अकबर" से तुलना ज़्यादा बड़ी बात हो गयी है। अपना समझ सलाह देने का शुक्रिया ! किसी भी अन्य सामुदायिक या व्यक्ति ब्लॉग को इतनी सलाहें नहीं मिलतीं जितनी आज तक चोखेर बाली को मिली हैं । इसे सौभाग्य कहूँ या चोखेर बाली नाम की सार्थकता ! आपने कहा -आप सलाह देते डर रहे हैं । पर डरते डरते भी सलाह देने का लोभ सम्वरण नही कर पा रहे हैं ।कुछ पोस्ट्स आप पुन: पढें और राय दें कि यदि चोखेर बाली का नाम चोखेर बाली की जगह
प्रगतिशील नारी, नयनतारा , गृहशोभा ,सरिता या अनामिका या कुछ भी और होता लेकिन कंटेंट यही रहता तो भी क्या लोगों का रेस्पॉंस यही नही होता?
http://sandoftheeye.blogspot.com/2008/08/blog-post_25.html
http://sandoftheeye.blogspot.com/2008/07/blog-post_17.html
http://sandoftheeye.blogspot.com/2008/07/blog-post_09.html

अब यह भी कि यदि चोखेर बाली का नाम यही रहता और कंटेंट कुछ ऐसा होता
1.पति को रिझाने के 10 टिप्स
2.मुन्ने की सही मालिश के 5 तरीके
3.गर्मियों मे दिन का मेक अप कैसे करें
4.नारी अपने रिश्तों का निर्वाह कैसे करे
5.बॉस को कैसे संतुष करें
6,ऑफिस जाने के परिधान कैसे हों
7.दीवाली की साज-सज्जा ,सफाई कैसे करें
8.होली के पकवान
9स्वेअटर विशेषांक
10. महिलाएँ करियर कैसे चुनें
11.मेहन्दी रंग लाएगी - मेहन्दी के 25 डिज़ाइन
वगैरह ...........

तो आपका रेस्पॉंस क्या होता ? उपरोक्त बातें पितृसत्ता को चुनौती नहीं देतीं ,है न! और तब शायद तब चोखेर बाली सहज स्वीकार्य भी होता और स्तुत्य भी ,अपनी बहन- बेटी को इसे बांचने की सलाहें दी जातीं ।
खैर ,
चोखेर बाली नाम से आपकी आपत्ति हमारे लिए नई बात नही है,पहले दिन से इसे सुनते आ रहे हैं और चोखेर बाली की शुरुआत में जो सवाल चोखेर बाली के एजेंडा और वैचारिक आधार व प्रयोजन को लेकर उठे थे वे अब लगभग सभी को स्पष्ट हो चुके होंगे ऐसा मुझे प्रतीत होता है।
स्त्री का समाज मे जो स्थान और स्थिति है ,बहुत विचित्र है कि उसमे केवल सामाजिक-पारिवारिक अपेक्षाओं और वर्जनाओं के लिए स्थान है,अस्मिता और स्वतंत्र पहचान के लिए नहीं ...लीक से अलग हट कर चल सकने की तो बिलकुल नही । स्त्री को हमेशा बान्धने ,संजोने की भूमिकाएँ मिली और बिना एक आज़ाद चेतन इंसान हुए उन्हें निभाते चले जाने की सीख भी बचपन से ट्रेनिंग की तरह मिली। "न" शब्द स्त्री के शब्दकोश मे कभी डाला ही नही गया ।
इस लिए जब भी स्त्री ने "न" कहने का साहस किया , लीक से हटने की कोशिश की,स्वयम को एक स्वतंत्र -चिंतनशील प्राणी के रूप मे पहचानने और स्थापित करने का प्रयास किया समाज के पितृसत्ता-पोषकों ,चरित्र के ठेकेदारों ,धर्म के रखवालों {इनमे पुरुष और साथ ही पितृसतात्मक मानसिकता और संरचना मे ढली स्त्रियाँ भी हैं} को यह नागवार गुज़रा और बहकी स्त्रियों को तरह तरह से राह पर लाने और दण्डित किये जाने के लिए तरह तरह के उपाय किये जाने लगे ।वे स्त्रियाँ समाज की आँखों को खटकने लगीं ,उन्हें जल्द खत्म करने ,दबाने का प्रयास होने लगा वर्ना अपनी बहू बेटियों के बिगड़ने का डर था ।अपनी बहू बेटी का चिंतंशील होना माने अपने पैरों कुल्हाड़ी मारना । वे जवाब देतीं , आपके अन्याय व्यभिचार के खिलाफ आवाज़ बुलन्द करतीं ,अपनी इच्छा से शादी करतीं या ना करतीं ,आपकी सेवा न करतीं , पति को परमेश्वर न मानतीं ,परिवार व्यवस्था ढह जाती ,....और बहुत से भय ।इसलिए पूजा चौहान जब अर्द्ध्नग्नावस्था मे सड़कों पर उतर आयी अन्याय के खिलाफ तो शरीफ बहू बेटियाँ अन्दर कर दी गयीं और सड़कों पर पूजा के आजू बाजू केवल और केवल सभ्रांत मर्द ही दिखाई दे रहे थे।
तो यह जो आँख की किरकिरी हैं यह वो बदमज़ा औरतें है जो सड़ी गली व्यवस्था का पोषण करने के खिलाफ मानस तैयार करना चाहती है ,जो पितृसत्ता के सामने पितृसत्ता के खिलाफ लिखती है और यहाँ वहाँ कमेंट में .उपहास से ".......वालियाँ "कहीं जाती हैं। यह जो बदलाव की बात है यह आतंक की तरह छाई है ।आपने कमेंट्स मे लिखा देखा होगा सभ्य जनों से ----मार्कस्वाद को परिवार से दूर रखो ....परिवार को बचाओ ....घर से बाहर कदम निकालने वाली महिला का घर अस्त व्यस्त हो जाता है .....नौकरी करने वाली स्त्री नौकरानी है न किसी की माँ न किसी की पत्नी.. ।
सो चोखेर बाली ही वह नाम हो सकता था जो स्त्री मुद्दों से जुड़े हमारे -आपके -सबके विचारों को एक साथ वहन करने की क्षमता रखता है॥


सादर ,
सुजाता




और हाँ , केवल नाम ही चुभने जैसा होता तो कोई समस्या नही थी , दर असल बड़ी बात यह है कि चोखेर बाली का कथ्य भी चुभता हुआ ही है। क्या कीजियेगा , जब बात कड़वी है तो कड़वी लगेगी , उसे चासनी मे भिगो कर कैसे दे भला !
आपकी शुभकामनाएँ साथ हैं तो भविष्य के लिए आश्वस्त होने का एक कारण मिल सकता है !

सादर ,
सुजाता

Saturday, November 8, 2008

अब डर कैसा

2008

अब डर कैसा (कथांश)
मैं आई तुम्हारे घर, नई नवेली दुल्हन बनकर । कितने सारे सपने लेकर ! मैं विकलांग थी, शरीर से । सोचा भी नहीं था कि कभी शादी होगी । लेकिन मेरा स्वस्थ मन कहता रहता था, मेरी भी शादी होगी, मेरे भी सपनों का राजकुमार आएगा । और एक दिन यह सच भी हो गया, मेरे लिए भी न_नुकर करते करते एक रिश्ता आ ही गया । पहले भी कई लोग रिश्ते लेकर तो आए थे, लेकिन उनका मकसद रिश्ता जोड़ने से ज्यादा सहानुभूति दिखाना ही अधिक होता था और यह मां को बातों बातों में समझ आ ही जाता था । लेकिन इस बार बात कुछ अलग थी, रिश्ता बहुत ही नज़दीक की भाभी लाई थी, वो भी अपने भाई का । मां भी हैरान थीं । लेकिन बात टाल न सकीं । उनके मन में भी आशा की किरण जाग ही उठी । मैं भी अपनी बेटी को डोली बिठाउंगी, वह भी और लड़कियों की तरह ससुराल जाएगी । चलो मेरे जाने के बाद उसका ख्याल रखने वाला उसका अपना पति होगा । उसका भी अपना भरापूरा संसार होगा । वह भी मां बनेगी और भी जाने क्या क्या ।.......मैं भी भरपूर सोचने लगी । सपने बुनने लगी । भाभी यूं ही हवा में बात तो नहीं कर सकती , कुछ तो जरूर सोचा ही होगा तभी तो ये बात मां से सीधे सीधे कही है । पहले भी उनके भाई का एक बार उनके भाई का रिश्ता सुना था हो गया था, फिर पता नहीं चल पाया था कि कैसे वह टूट गया । इन्होंने तोड़ा या लड़की वालों की तरफ से तोड़ा गया । लेकिन उस बात को भी साल भर तो हो ही गया है, बहुत ढूंढ रहे थे कोई लड़की मिल ही नहीं रही । देखने में तो इनका भई सुमित सुन्दर नहीं तो ठीक ही है । उससे भी बुरी शक्ल वाले लड़कों की शादियां होते देखी हैं पर उसे पता नहीं लड़की क्यों नहीं मिली ? मुझसे एकाध बार भाभी के घर पर ही मिला भी, सब ठीक ही लगता है, हां बस कमाई कम है , लेकिन क्या कम कमाने वालों की शादी नहीं होती, अभी हमारे यहां तो एसी नौबत नहीं । शादी भी खूब हो जाती है और रिश्तेदार आगे गृहस्थी को भी लेदेकर चलवा ही देते हैं अपने ही मोहल्ले में कितने घर हैं जहां आदमी ज्यादा कमाते हो । ज्यादा तो औरतें ही कुछ न कुछ कर पति की इज्जत बचाने और गृहस्थी के खर्चे पूरे करने में जी तोड़ लगी रहती हैं । मैं भी कर ही लूंगी किसी तरह गुजारा । मां ने तो वैसे भी मुझे सब कुछ सिखाया ही है । सिलाई मुझे आती है, ब्यूटिशियन का काम मुझे आता है, खाना भी मैं अच्छा बना ही लेती हूं, प्राइमरी टीचर का कोर्स और नौकरी भी मैंने की ही हुई है । बस कुछ न कुछ तो हो ही जाएगा । बस बात बन जाए ।

Thursday, November 6, 2008

एक खबर का फॉलोअप

एक दिलचस्प खबर का फॉलोअप देखना और भी दिलचस्प है।

खबर ये है कि दिल्ली में विपक्ष के नेता जयकृष्ण शर्मा ने चंद दिनों पहले मेयर आरती मेहरा की जैकेट पर टिप्पणी की और फिर किसी और मुद्दे पर उन्हें 'औरत के नाम पर धब्बा' बताया।

इस पर आरती मेहरा ने कई जगहों, मंचों पर इस मुद्दे को उठाया है। राष्ट्रीय महिला आयोग को भी इसकी शिकायत भेजी। जवाब में उनसे 48 घंटे के अंदर जवाब मांगा गया है।

इतना सब होने के बाद जयकृष्ण शर्मा जी ने इस गैर-इरादतन गलती के लिए आरती जी से सार्वजनिक रूप से माफी मांगी है और कहा है कि वे उनकी बहन हैं।

लेकिन आरती जी ने तत्काल जवाब दिया कि वे 'ऐसे व्यक्ति की बहन नहीं बनना चाहतीं जिसने शराफत की हदें पार कर ली हों।'

अब शर्माजी को कल, शुक्रवार 7 नवंबर को दोपहर तीन बजे राष्ट्रीय महिला आयोग के समक्ष पेश होना है।

Wednesday, November 5, 2008

तेज़ाब का आतंक

आज सुबह
घर से निकलते झुकी थीं मेरी गर्दन और
सचेत निगाहें उठ जाती थीं रह रह कर
टोह लेने
आस पास
सड़्क पर चलते
मेरे छोटे भाई, हम उम्र साथी , पिता की उम्र के पुरुष
आज सभी मेरे
सन्देह के घेरे मे थे
सुरक्षित ,गंतव्य तक पहुँचना
था
कनखियों से ही
मुझ सी बहुत सी
सहमी लड़कियाँ दीख रही थीं
कल रात की

खबर सुनने के बाद
कि तेज़ाबी आदमी दिल्ली की सड़
कों पर निकल आया है
वह फेंकता है एसिड
लड़कियों पर ही

मुझे भय था
ज़्यादा
कि पगलाए चैनल की खबर
-"घर से अकेली निकली लड़कियों पर करता है हमला"
बहुत सी लड़कियों के
पिताओं का छीन लेगी चैन
भाई जाने नही देंगे
ट्य़ूशन भी पढने,
पहले भी करते ही थे मना
जिसके लिए
माओ बहनों बेटियों के चेहरे बिगड़ जाने की चिंता
और रोष
गहरा गया था

और खुद को बचाने की कोशिश मे
ज़िन्दगी बची नही रह जाएगी उन
लड़कियों के पास ।







http://nationalnewsofindia.blogspot.com/2008/11/another-acid-attack-in-delhi-one.html

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Tuesday, November 4, 2008

"हम गुनहगार औरतें"

मेरी पसन्दीदा पाकिस्तानी कवयित्री किश्वर नाहिद की कविता



ये हम गुनहगार औरतें हैं
जो मानती नहीं रौब चोगाधारियों की
शान का

जो बेचती नहीं अपने जिस्म
जो झुकाती नहीं अपने सिर
जो जोड़ती नहीं अपने हाथ।

ये हम गुनहगार औरतें हैं
जबकि हमारे जिस्मों की फसल बेचने वाले
करते हैं आनंद
हो जाते हैं लब्ध-प्रतिष्ठ
बन जाते हैं राजकुमार इस दुनिया के।

ये हम गुनहगार औरतें हैं
जो निकलती हैं सत्य का झंडा उठाए
राजमार्गों पर झूठों के अवरोधों के खिलाफ
जिन्हें मिलती हैं अत्याचार की कहानियाँ हरेक दहलीज पर
ढेर की ढेर
जो देखती हैं कि सत्य बोलने वाली ज़बानें
दी गयीं हैं काट

ये हम गुनहगार औरतें हैं
अब,चाहे रात भी करे पीछा
ये आंखें बुझेंगी नहीं
क्योंकि जो दीवार ढाह दी गयी है

मत करो ज़िद दोबारा खड़ा करने की उसे ।




ये हम गुनहगार औरतें हैं
जो मानती नहीं रौब चोगाधारियों की
शान का
जो बेचती नहीं अपने जिस्म
जो झुकाती नहीं अपने सिर
जो जोड़ती नहीं अपने हाथ।

अनुवाद : माइकेल मोजेज़
पुस्तक: कहती है औरतें - सम्पादन -अनामिका
साहित्य उपक्रम
इतिहास बोध प्रकाशन ,इलाहाबाद

Monday, November 3, 2008

"गुलाबी गैंग"


पिछले दिनों दिवाली मनाने घर गये हुये थे अम्मा की सहेलियों के साथ गप्पों का सिलसिला आगे बडा और बातों बातों मे मालूम हुआ की बांदा जिले में "गुलाबी गैंग" महशूर है गुलाबी गैंग मैंने आश्चार्य से पूछा, ये क्या बला है भला? मालूम हुआ गुलाबी गैंग औरतों का गैंग है जो औरतों के लिये काम करता है और जिसकी लीडर हैं श्रीमती समंपत पाल देवी गुलाबी गैंग इसलिये है क्यों की गैंग में शामिल औरते गुलाबी साङी पहनती हैं, वे गाँव-गाँव जाकर औरतों से बात करती हैं, उन्हें आत्मनिर्भर बनने पर जोर देती हैं, औरतों को कैसे अपनी सुरक्षा करनी चाहिये इस बात की जानकारी देती हैं और ये भी पूछती है कि उन्हें किसी भी प्रकार की तकलीफ तो नहीं या कोई उनका शोषण तो नहीं कर रहा संमपत पाल देवी जी ने कुछ समय सरकारी नौकरी की लेकिन उनको तो कुछ और ही करना था सो वो नौकरी छोङ अपना एक दल बना लिया और देखते ही देखते कांरवा बन गया आज करीब १५०-२०० औरते उनके साथ मिलकर काम कर रही है समाज के लिये और औरतों के लिये "गुलाबी गैंग" भारत के छोटे -छोटे कस्बों तक ही सिमित नहीं हैं वो अपनी पहचान विदेशों मे भी बना चुका है है ना कमाल, यकीन ना हो तो खुद ही पङ लिजिये
क्या हम लोग मिलकर कुछ ऐसा कर सकते हैं???

Saturday, November 1, 2008

अपनी ज़मीन खुद तय करो!

सिमोन बोआ की बात एकदम सरल है, फिर भी गूढ़ - पुरुषों के बनाये ढाँचे के हिसाब से अपना मूल्याँकन मत करो। अलग हटो, दूर जाओ, अपने माप दंड खुद बनाओ, अपनी ज़मीन खुद तय करो।


स्त्री के लिए एक नया क्षेत्र
पोस्ट पर कुछ ज्यादा लंबी टिप्पणी यहां पोस्ट के रूप में दे रही हूं।

यह सही कहा है कि

"अगर स्त्री ऐस्ट्रोनोट बन सकती है, डाक्टर बन सकती है, माँ बन सकती है तब पण्डिता भी अवश्य बन सकती है -
कोई भी जन्म से सब सीख कर पैदा नहीँ होता -
शिक्षा ही व्यक्ति को सबल बनाती है"

एक पेशे के तौर पर यह सब सीखना और करना ठीक है। दुनिया में हज़ारों-लाखों पेशे हैं, उनमें से एक यह भी, जिसे स्त्रियां भी अब अपनाने लगी हैं और समाज खुल रहा है, इसे स्वीकृति देने में। बहुत अच्छा है।

हाल के समय में समाज में एक ऐसी ही, मिलती-जुलती घटनाएं हुईं हैं, जिनका जिक्र जरूरी है। इस साल के शुरू में हरिद्वार में शंकराचार्य की तर्ज पर एक महिला के लिए पार्वत्याचार्य का पद बनाया गया जिसकी तारीफ कम हुई, धार्मिक अखाड़ों में विरोध खूब हुआ, 'सत्ता' और 'ताकत' के बंटवारे के मुद्दे पर।

इसी तरह कुछ समय पहले आंध्र प्रदेश के अनंतपुर शहर के एक मंदिर में प्रवेश का हक पाने के लिए 6-8 दलितों का एक दल जबर्दस्ती मंदिर में घुसा। इस पर मंदिर में तो हुआ ही, शहर भर में भी काफी हंगामा हुआ। देश के कई हिस्सों में बहस छिड़ गई कि दलितों को मंदिर प्रवेश का हक होना चाहिए या नहीं, और इस हक को पाने के लिए जबर्दस्ती प्रवेश का यह तरीका उचित है या अनुचित।

"पुरूष प्रतिपादीत व्यवस्था" में "धार्मिक अनुष्ठान आज भी पुरूष प्रधान" "ही रहे है जिसका विरोध रोमन केथोलिक चर्च भी नही कर पाया है!" ऐसे में स्त्री को पण्डित की तरह धार्मिक अनुष्ठान, विधि विधान करवाने के लिए प्रशिक्षण, शंकराचार्य की तर्ज पर एक महिला के लिए पार्वत्याचार्य का पद बनाए जाने और दलितों के मंदिर प्रवेश की घटनाएं मुझे एक तरह की लगती हैं।

आज के समय में दलित के पास यह सामाजिक और आर्थिक ताकत है कि वह आगे आकर कहे कि उसे मंदिर जैसे ढकोसले में पड़ कर सदियों पीछे नहीं जाना है बल्कि जाति व्यवस्था के स्टीरियोटाइप को तोड़ कर इससे आगे बढ़ना है। खोखली हो रही मंदिर व्यवस्था का बहिष्कार कर, और दिशाओं में अपनी ऊर्जा लगानी है ताकि तरक्की करके जमाने के साथ चल सके, बल्कि उससे आगे निकल सके।

इसी तर्ज पर महिलाएं सदियों पुरानी और असामयिक साबित होती शंकराचार्य परंपरा को नए सिरे से अपना कर सदियों पीछे क्यों चली जाएं? इसे आगे बढ़ने और बराबरी पाने का जरिया क्यों मानें? उसे पाना क्यों चाहें और मिल जाए तो उसे अपनी जीत क्यों माने और पाकर खुश क्यों हों? उसे हक मानने की बजाए क्यों न उसका बहिष्कार करे? क्यों न वे साफ कहें कि जिस व्यवस्था में हम सदियों तक लगातार गैर-बराबरी झेलती रहीं, अपने लिए जगह खोजने की बेकार कोशिश करती रह गई, उसकी जीर्णावस्था में हम क्यों उसे महत्व दें? लेकिन सोचने की बात यह है कि जब अभी तक उसके बिना हमारा गुजारा चल गया तो अब जबकि हमारे पास और विकल्प हैं अपनाने के लिए, साधन हैं कुछ बेहतर लक्ष्य पाने के लिए। फिर क्यों इस मृतप्राय, बेकार बासी व्यवस्था को अपनाने की जुगत में खुद सदियों पिछड़े हो जाएं?

और अगर कोई कहे कि परंपरा को बचाए रखने....(इत्यादि), तो इसका जिम्मा अब इसकी मृतप्राय हालत में औरतों पर क्यों? जब पुरुष इस पेशे में मलाई काट रहे थे तब औरतों को इसे सुनने से भी वंचित रखा गया,("दलित और स्त्री वेद सुनें तो उनके कानों में पिघला सीसा डाल दिया जाए"- मनु स्मृति) और अब जबकि इस पेशे की हालत मरणासन्न है तो सेवा-सुश्रुषा महिला के जिम्मे, वह भी सदियों पुरानी झूठे महिमामंडन की तरकीब से!!

और अगर यह सिर्फ व्यवसाय है तो एक बड़ा तथ्य यह है कि आज कोई भी पुजारी सिर्फ कर्मकांड करवा कर अपना और परिवार का पेट नहीं पाल सकता। इसके लिए उसे कोई और रोजगार करना ही होगा। यह सिर्फ साइड बिज़नेस या रिटायर होने के बाद का काम होगा। या फिर उसका एक मठ हो जिसमें सारे राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक शोषण के दांव-पेंच चलते हों। क्या ये प्रशिक्षित पुरेहित महिलाएं भी आर्थिक स्वावलंबन के लिए कुछ और करती हैं/ करेंगी? और अगर यह सिर्फ व्यवसाय है तो फिर "ऋतुकाल" में "स्वेच्छा से कई पण्डिता अपने यजमान का मान रखते हुए या स्वयम्` के निर्णय से प्रेरीत होकर इस अवधि मेँ धार्मिक कार्य नहीँ करतीँ - " जैसे स्पष्टीकरण की क्या जरूरत है?

लब्बोलुबाब ये कि विशुद्ध पेशे के तौर पर (एक आम हिंदुस्तानी के लिए पुरोहिताई एक पेशा बिल्कुल नहीं है, बल्कि भावनाओं से जुड़ा एक पवित्र भगवत् कार्य है, खास तौर पर औरतों के लिए) पुरोहिताई को अपनाना आज कतई फायदे का सौदा नहीं है। क्यों न अपने टैलेंट से, काबिलियत से कोई, रॉकेट साइंस न सही, आज की दुनिया का काम-काज सीखा जाए जो वाकई एक पेशे का संतोष दे सके!?

और अगर यह सिर्फ व्यवसाय नहीं है, तो फिर मरते हाथी का बोझ हम अपनी पीठ पर क्यों ढोएँ, जिसकी सवारी का हमें कभी हक नहीं दिया गया?

क्या सोच रहे हैं आप?