Wednesday, November 5, 2008

तेज़ाब का आतंक

आज सुबह
घर से निकलते झुकी थीं मेरी गर्दन और
सचेत निगाहें उठ जाती थीं रह रह कर
टोह लेने
आस पास
सड़्क पर चलते
मेरे छोटे भाई, हम उम्र साथी , पिता की उम्र के पुरुष
आज सभी मेरे
सन्देह के घेरे मे थे
सुरक्षित ,गंतव्य तक पहुँचना
था
कनखियों से ही
मुझ सी बहुत सी
सहमी लड़कियाँ दीख रही थीं
कल रात की

खबर सुनने के बाद
कि तेज़ाबी आदमी दिल्ली की सड़
कों पर निकल आया है
वह फेंकता है एसिड
लड़कियों पर ही

मुझे भय था
ज़्यादा
कि पगलाए चैनल की खबर
-"घर से अकेली निकली लड़कियों पर करता है हमला"
बहुत सी लड़कियों के
पिताओं का छीन लेगी चैन
भाई जाने नही देंगे
ट्य़ूशन भी पढने,
पहले भी करते ही थे मना
जिसके लिए
माओ बहनों बेटियों के चेहरे बिगड़ जाने की चिंता
और रोष
गहरा गया था

और खुद को बचाने की कोशिश मे
ज़िन्दगी बची नही रह जाएगी उन
लड़कियों के पास ।







http://nationalnewsofindia.blogspot.com/2008/11/another-acid-attack-in-delhi-one.html

------

9 comments:

डॉ .अनुराग said...

मुझे अब तक समझ नही आ रहा की तेजाब को कड़े अपराध की धारा में क्यों नही लिया जा रहा है ,इसकी बिक्री में भी कुछ सख्त कानून के प्रावधान की आवश्यककता है ,ये ठीक वैसे ही है जैसे अमेरिका में बन्दूक खरीदना ,मैंने लोगो की पुरी जिंदगी तबाह होते देखी है ओर बतोर डॉ ये भी जानता हूँ की त्वचा के कुछ नुकसान किसी भी कीमत पर वापिस नही लाये जा सकते .

Anonymous said...

it was in the news yesterday that they are bringing in the law of life imprisionment for the culprit and rs 5 lakhs as compensation for victim . saw girija vyas interview and fully agree with dr anurag that something constructive should be done and would humbly request him to write a post on immediate first aid that can be given to the victim . we would like to circulate that post /infomation on our blogs . mass awareness needs to be created for immediate relief and first aid

तरुण गुप्ता said...

पिछले १२ दिनों में लड़कियों पर तेजाब डालने की चार घटनाएँ घट चुकी है कल सुबह ही घोंडा (मौजपुर) में एक लड़की पर तेजाब डाला गया । वह अभी भी गुऱु तेगबहादुर अस्पताल में भर्ती है । यह वास्तव में हमारे समय और समाज के लिए ञासद है । कल जब मुझे ये खबर लगी उस वक़्त में अस्पताल में ही था वहाँ जलने के कई केस आए हुए थे वे सभी दुर्घटना थे । घर आने पर दिमाग़ की टेन्शन कम करने के लिए टी.वी खोला था जिस पर घोंडा वाली घटना की न्यूज़ आ रही थी । चैनल बदला । लेकिन वहाँ हिन्दी फिल्म गंगाजल का ट्रेलर दिखा । कुछ समझ आया ?

दिनेशराय द्विवेदी said...

महानगरों की विमानवीयता और भीड़ में अकेले पन का एक और उदाहरण।

गिरीश बिल्लोरे मुकुल said...

अति गंभीर मसला है यह मानसिक गलीचपन कुंठा ही नारी को उसे कमज़ोर समझकर के विरुद्ध हिंसक हो जाते हैं

Anonymous said...

ये कविता पढ़कर एक बार फ़िर लगा हुआ कि कैसे सिरफ़िरापन दिखाते होंगे लोग। किसी का चेहरा खराब करके क्या पाते होंगे?

पुनीत ओमर said...

मानव मन की सबसे विक्रत तम अवस्था है यह जब कोई ऐसा करने की सोचे.
ईश्वर ऐसे लोगों को सन्मार्ग पर भेजे.

Unknown said...

यह तो एकदम तालीबानी रवैया हो गया । ( अभी अभी खत्म की है यह किताब तो सहज ही लिखा गया)।

Unknown said...

आपने यथार्थ चित्रण किया है इस भयावह परिस्थिति का. इतनी नफरत भर गई है लोगों के दिलों में, जो तेजाब बन कर बाहर आ रही है. दिल्ली सरकार और पुलिस दोनों ही प्रभावहीन हो गईं हैं. कोई तो आए बन कर मसीहा प्यार का, विश्वास का.