Tuesday, December 30, 2008

रेड लाइट एरिया माने बगैर गाली दिए स्त्री के विरुद्ध हिंसा कर सकने की काबिलियत

प्रश्न : निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए ।

गद्यांश : cmpershad ( चन्द्र मौलेश्वर प्रसाद ) said
मालामाल चर्चा।
लगता है महिलाएं भी पुरुषों का मुकाबिला गाली-गलौच में भी करना चाहती हैं! करें, जरूर करें, कौन रोकता है। पुरुषों की तरह सिगरेट पियें [पश्चिम में तो पुरुषों से अधिक महिलाएं ही पीती हैं तो भारत में पीछे क्यों रहें], शराब पियें, आगे बढ़कर अपने लिए एक रेड लाईट एरिया[ चाहें तो रंग बदल लें] खोल लें .... तभी ना, यह कहा जा सकेगा कि स्त्री भी पुरुष से कम नहीं!!
यदि महिलाएं पुरुषों के गंदे आचरण को अपनाना चाहें तो पुरुष कौन होता है रोकने के लिए। मुझे प्रसन्नता है कि मेरे कटु शब्दों ने महिलाओं में विरोध के शब्द उठे और यही है सुजाताजी को उनकी स्वतंत्रता का उत्तर।

प्रसंग : पुरुष अपने वाहियातपने या पतितावस्था को सगर्व स्वीकार क्यों करता है?शर्मिन्दा क्यों नहीं होता?


व्याख्या :
"स्वतंत्र होकर गाली देना चाहती हो? तो आओ ,करो मेरा मुकाबला , मुझसे ज़्यादा पतित नही हो पाओगी ,देखो मै बिना गाली दिए भी भाषा का ऐसा प्रयोग करूंगा कि वह किसी भद्दी गाली से कम नही होगा, पतित होने की होड़ मे तुम मुझसे नही जीत सकती , इसलिए मान लो कि गालियाँ पितृसत्ता की सम्माननीय धरोहर है और तुम अपनी तमीज़,सभ्यता,शिष्टाचार वगैरह..वगैरह...जो अभी तुम्हें मेरे जैसे विद्वान समझा कर गए हैं उसे स्वीकार कर लो...हमारी नीयत पर सवाल उठाओगी या हमें आइना दिखाने की कोशिश करोगी तो तुम्हें सरे आम वेश्या कह डालेंगे , हमें चिंता नही कि आने वाले समय में बेटियाँ गालियों के पितृसत्तात्मक चरित्र को समझने लगेंगी और इसके प्रति सहज हो जाएंगी क्योंकि हमारी बेटियाँ , बहुएँ ,पत्नियाँ हमारा चलित्तर खूब समझती हैं और पंगा नही लेतीं, वे हमारे कब्ज़े मे हैं, और उन्हें कब्ज़े मे रखना भी हमें आता है,अब बताओ , क्या तुम गिर सकीं मेरे बराबर ? नहीं न !हमे पता था पतन मे हमारा मुकाबला नही है। अब भी मान लो और गाली चर्चा छोड़ दो , यह तुम्हारा इलाका नही,देखो हम बस एक बार तुम्हें गरिया दें तो तुम आहत हो जाओगी , हम ऐसी कोमलांगिनियों को आहत नही करना चाहते फिर भी तुम ज़िद ठाने थीं तो लो यह भेंट कोठे पर बैठ जाने की सलाह स्वरूप तुम्हारे लिए। "

विशेष :1. तर्क का नितांत अभाव , बहस की कतई गुंजाइश नही ।
2. जानकारी का अभाव
3.दीप्ति की पोस्ट से चोखेर बाली , घुघुती बासूती, नारी सभी ओर विरोध के ही तो स्वर उठ रहे हैं ,चिट्ठाचर्चा मे पहली बार नही हुआ।
4.वेश्यावृत्ति का भारत में उदय आधुनिक युग की घटना नही , मानव सभ्यता के आरम्भ से है। न ही यह पश्चिम का प्रभाव है। वेश्यावृत्ति तो एशिया महाद्वीप की खासियत है।पश्चिम में इसे छिपाया नही जाता। लेकिन भारत जैसे परिवारवाद, नैतिकतावादी समाज मे इसका स्वरूप पश्चिम से अधिक भयंकर है।यहाँ के पुरुष पारिवारिक मूल्यों को बहुत महत्व देते हैं लेकिन परिवार से उनका मतलब परिवार के स्थायित्व से है ,यानि तलाक न हों , न कि पत्नी के प्रति वफादार होने से।इसलिए यहाँ की यौन संहिता का आडम्बर झूठा है।

सन्दर्भ ग्रंथ :
लुईज़ ब्राउन की किताब "यौन दासियाँ: एशिया का सेक्स बाज़ार"
वाणी प्रकाशन , नई दिल्ली,2005

Monday, December 29, 2008

पुरुष अपने वाहियातपने या पतितावस्था को सगर्व स्वीकार क्यों करता है?शर्मिन्दा क्यों नहीं होता?

पिछली पोस्ट "क्या भाषा और व्यवहार की सारी तमीज़ का ठेका स्त्रियों ने लिया हुआ है?" पर डॉ अनुराग लिखते हैं --"मै तो ये सोचकर काँप गया हूँ जब औरते इस की अभ्यस्त हो जायेगी ..? एक आइना दिखाया है हम सब को .शुक्रिया"
वे पोस्ट की निहितार्थ समझ गए थे।यह गान्धीगिरी का रास्ता है कि जब बेटी पिता के मुख से "भैन.." सुने तो अगली बार उसी के सामने यह गाली दें ताकि अगली बार से वह अपने भाषा व्यवहार मे सचेत रहे।ऐसी कल्पना से आपको आभास होगा कि गाली देना कितना आहत करता है।यह वाचिक हिंसा है स्त्री के प्रति।अब मैने कोई मुहिम तो चलाई नही यह केवल मेरा ओबज़र्वेशन , और उसके आधार पर आने वाले समय की चेतावनी, और नाराज़गी थी।

लेकिन यह बात दूर तलक जाती है और बहुत से लोगों के लिए गाली विमर्श स्त्री सशक्तीकरण की बेहूदी तकनीक हो जाती है।उन्हें लगने लगता है कि स्त्रियाँ हर जगह पुरुष की बराबरी करके बराबरी हासिल करना चाहती हैं।
जब डॉ अमर ज्योति कहते हैं
Dr. Amar Jyoti said...
"फूहड़ यौनिक/लैंगिक गालियों पर लज्जित या नाराज़ होने के स्थान पर यदि स्त्री उनमें रस लेने लगती है तो यह उसका विकास कहलायेगा या अधःपतन ?
तो पोस्ट के पीछे की नाराज़गी को वे क्या नज़र अंदाज़ कर गए हैं ?
HEY PRABHU YEH TERA PATH said...क्या पुरुष प्रधान सस्कृति कि बराबरी के लिये इस तरह कि बॉतो को कोनसे तर्क से सही ठहरायॉ जा सकता है।
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी कहते हैं-
स्त्री सशक्तीकरण के जोश में पुरुषों से गन्दी आदतों की होड़ लगाना कहीं से भी नारी समाज को महिमा मण्डित नहीं करेगा। गाली तो त्याज्य वस्तु है। इसमें कैसी प्रतिद्वन्द्विता?
वहीं आलोचक भी कहते हैं कि स्त्री पुरुष की बराबरी क्यों करना चाहती है?
वहीं सारस्वत शेखर कहते हैं -बराबरी करनी है किसी सुसंस्कृत मुद्दे पर करनी चाहिए|
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कमेंट्स मे यह स्पष्ट दिखता है कि -गालियाँ पुरुष प्रधान संस्कृति की विशेषता है,यह गन्दी आदत है ,यह पुरुषों की गन्दी आदत है।
लेकिन इस गन्दगी पर शर्मिन्दगी इनमें से किसे कमेंट मे नही है बल्कि सवाल करने वाली एक स्त्री को उसकी ओछी ख्वाहिश के लिए शर्मिन्दा करने की नीयत ज़रूर है।इनमें से कोई नही कहता कि हाँ यह गलत है और अगर हम चाह्ते हैं कि हमारी बेटियाँ ऐसी भाषा न बोलें तो हमें इस गन्दी आदत को छोड़ना होगा। क्यों ? पतन पर इतना मोह क्यों ?

जब आप कहते हैं कि स्त्री भी पुरुष की तरह वाहियात गालियाँ देना चाहती है, एकाधिक पुरुषों से संसर्ग करना चाहती है , पतित होना चाहती है, होड़ करना चाहती है .....तो क्या आप यह स्वीकार कर रहे हैं कि पुरुष खुशी से पतित होना स्वीकार करता है?और वह पतित होना चाहता है ? कहीं इसलिए तो नही कि पतित होकर वह् ज़्यादा मनुष्य हो पाता है,ज़्यादा सहज,ज़्यादा स्वतंत्र ,ज़्यादा मानवीय ? क्या इसलिए आप सगर्व कहते हैं कि हम तो गिरे हुए हैं तुम क्यों गिरना चाहती हो? और यह भी कि इस पतन को कंट्रोल करना भी ज़रूरी है इसलिए इसे स्त्रियों के लिए प्रतिबन्धित किया जाए?इसका यही तरीक हो सकता है कि जो ज़्यादा आज़ाद है(संतनोत्पत्ति ,संतान पालन आदि से)वह और आज़ाद रहे....जो बन्धा है वह और बन्ध जाए!


जैसे स्वाभाविक इच्छा किसी पुरुष की हो सकती है -सिगरेट पीने ,शराब पीने , दोस्तों के साथ ट्रेकिंग पर जाने,अपने करियर मे श्रेष्ठतम मुकाम तक पहुँचने और उसके पीछे जुनून की हद तक पड़ने,या फ्लर्ट करने, या गाली देने, या लड़कियों को छेड़ने ,या गली के नुक्कड़ पर अपने समूह मे खड़े रहकर गपियाने ...............
ठीक इसी तरह ऐसे या इससे अलग बहुत सारी इच्छाएँ स्त्री की स्वाभाविक इच्छाएँ हैं जिन्हें करते आपने उन्हें अपने बन्द समाज मे नही देखा आज देख रहे हैं लेकिन स्वीकार नही कर पा रहे और स्त्री वैसा न करे कहते ही आप सिरे से यह नकारते हैं कि वह एक मनुष्य है,विचारवान है,वयस्क है,अस्मितावान है ....और वह जो जो चाहती है कानून और शिष्टाचार के दायरे मे रहकर वह सब करने की हकदार है भले ही वह आपको बुरा लगता है ।( यहाँ भी स्त्री के लिए शिष्ट और पुरुष के लिए शिष्ट की भेदक रेखाएँ खींची गयी हैं जो कि गलत है)



मान लीजिए आपके सामने लड़कियाँ ,स्त्रियों गालियाँ प्रयोग सहज हो कर कर रही हैं तो आप क्या केवल दुखी होकर ,क्या ज़माना आ गया है कहते हुए निकल जायेंगे ? या कान मूंद लेंगे?
मै चाह रही हूँ आप न कान बन्द करें , न दुखी हों , न दिल पर हाथ रखे ज़माने को कोसें ...
आप इसके कारणो को समझने का प्रयास करें और उन्हें दूर करने का प्रयास करें । मै चाहती हूँ कि आप लक्षणों का इलाज न करें । आप जड़ को खत्म करने का प्रयास करें । आपके कहे अनुसार जो घटिया विरासत पुरुषों के पास है उसे "घटिया" मानते हैं तो नष्ट भी कर दीजिए बजाए इसके कि उसकी तरफ न झाँकने से बेटियों,स्त्रियों ,लड़कियों को यह कह कर रोकते रहिए कि -यह तुम पर शोभा नही देता क्योंकि तुम लड़की हो।जड़ को खत्म करने के लिए गालियों को सबसे पहले अपने अभिव्यक्ति कोश मे से निकालना होगा। और शायद हम यह करने को तैयार नही हैं। क्यों?

माता-पिता कमरे मे बैठ कर वयस्कों का कार्यक्रम देख रहे हैं और बच्चे को लगातार कह रहे हैं -"तुम खेलो यह तुम्हारे लिए नही है!"
अगर आपको खुद पर नियंत्रण नही तो ,
बच्चा कब तक इस बात को सुनेगा कि यह तुम्हारे लिए नही है? जब तक वह समझदार नही होता,है न! फिर वह क्या देखना चाह्ता है ,करता है ,आपसे पूछेगा भी नही। सही है न!अब भी आप उसे यही कहेंगे कि मै तो ड्रिंक करता हूँ और जानता हूँ कि यह गलत बात है पर यह तुम्हारे लिए सही नही है तो क्या आपका 20 साल का बेटा मानेगा, मानेगा तो भी एक द्वन्द्व उसके मन मे चलता रहेगा, और आपकी इज़्ज़त कम होती रहेगी।

स्त्रियाँ जब तक पितृसत्ता के बस मे रहती है उसके लिए करणीय-अकरणीय के दायरे घर-समाज के पुरुष खींचते हैं।जब वह खुद सोचती समझती है और अपने दायरे खुद बनाती है तो इसे सराहने के बजाए बहुत आसानी से कह दिया जाता है कि वह होड़ करना चाहती है।

दर असल सब तभी तक खुश हैं जब तक स्त्री को घर-समाज-पितृसता "बनाती " है जैसा वह स्त्री को देखना चाहती है।
मेरे खयाल से इस बहस से सिर्फ इतना हासिल है कि हम यह अपनी बेटियों पर ही छोड़ दें कि वे अपने लिए क्या चुनें और चुनाव मे उनकी फ्रीडम को अपनी घरेलू,सामाजिक शिक्षा से प्रभावित करने की कोशिश न करें जो कि हम हमेशा करते आए हैं।इज़्ज़त और तमीज़ की दुहाई मे उनकी समझदारी और व्यक्तित्व को कुँठित न होने दें।आने वाले ज़माने की बेटियाँ अपने पिताओं की दोगली नीतियों की वे अच्छी खबर लेने वाली हैं यह जान लीजिए।अब वे आपकी ही खबर न लें इसके लिए आप उन्हें समझदार न बनने दें,जानकार न होने दें,बरगला कर रखें, तो यह बे ईमानी होगी, धोखा होगा।

Saturday, December 27, 2008

क्या भाषा और व्यवहार की सारी तमीज़ का ठेका स्त्रियों ,बेटियों ने लिया हुआ है?

दीप्ति ,माने लड़की, अपनी पोस्ट मे ऐसा शब्द कैसे इस्तेमाल कर सकती है? यह आपत्ति पितृसत्ता के किसी पैरोकार की ओर से आने वाली है मुझे भनक थी। अंशुमाली जी ने वहाँ कहा कि गालियों के प्रति भावनात्मक न बनें और उन्हें इंज्वाय करें।सही भी है , कि जब आप भाषा के इस भदेसपने पर गर्व करते हैं तो यह गर्व स्त्री के हिस्से भी आना चाहिए।और सभ्यता की नदी के उस किनारे रेत मे लिपटी दुर्गन्ध उठाती भदेस को अपने लिए चुनते हुए आप तैयार रहें कि आपकी पत्नी और आपकी बेटी भी अपनी अभिव्यक्तियों के लिए उसी रेत मे लिथड़ी हिन्दी का प्रयोग करे और आप उसे जेंडर ,तमीज़ , समाज आदि बहाने से सभ्य भाषा और व्यवहार का पाठ न पढाएँ। आफ्टर ऑल क्या भाषा और व्यवहार की सारी तमीज़ का ठेका स्त्रियों ,बेटियों ने लिया हुआ है?

तभी मैने वहाँ कमेंट में कहा था कि आप सभी के पाँवों तले ज़मीन खिसक जाएगी यदि स्त्रियों ने इन गालियों को इंज्वाय करना और इनके प्रति सहज होना सीख लिया।आप चाह्ते है कि गालियों का धाराप्रवाह प्रयोग वातावरण मे होता रहे और बेटियाँ सहज बनी रहें। यह सम्भव नही है। इसलिए यदि इनका प्रयोग बन्द नही करेंगे तो धीरे धीरे सहज होने के लिए वे भी प्रयोग शुरु कर देंगी और तब अहसास होगा कि गालियों के प्रति सहज होना किसे कहते हैं।अंग्रेज़ी मे ऐसे प्रयोग अब लड़कियाँ आम करने लगीं है।अंग्रेज़ी की गाली की खनक शायद कम सुनाई देती है।पर जब यह अपनी भाषा मे होगा तो सोचिए!
ब्लॉग लिखने से कम से कम उसे पढने वाले आप जैसे विचारवान लोग तो अपनी शब्दावली सुधर लेंगे और अपने बेटे ,दोस्तों आदि से भी कहेंगे।"साला" एक बेहद प्रचलित प्रयोग है जिसे आज मैं तक प्रयोग कर जाती हूँ क्योंकि वातावरण मे यह इतना घुला मिला है।सोचिए किसी बेहद क्रोध व उत्तेजना की स्थिति मे मै भैन ,यापा..आदि का भी प्रयोग कर सकती हूँ ..और यह इतना सहज हो जाए कि शायद मुझे पता भी न चले कि मेरे मुँह से ऐसा निकल गया है।फट गई,फाड़ दी, ले ली .. जैसे प्रयोग आज लड़कियों मे आम हैं....अपने मित्रों के बीच।शायद वे भी इंज्वाय करना सीख रही हैं।शायद उनकी अभिव्यक्ति भी श्लील-अश्लील के द्वन्द्व से मुक्त हो रही है।
मैं नही जानती कि बिन गाली जग सून होगा या नही पर बेटियों लड़कियों पत्नियों बहुओ को गाली देते सुनकर्
मुँह फाड़कर "हौ जी" करें यह आपके चरित्र का दोगलापन कहलाएगा।

Friday, December 26, 2008

मैं ऐंवे थोड़ी तेरे उत्ते मरदा नी ...



बहुत दिन से इस गाने ने परेशान किया हुआ था -

इक उच्चा लम्बा कद
नाले गोरी वी तू हद
उत्ते रूप तेरा चमचम करदा नी
...
मैं ऐंवे थोड़ी तेरे उत्ते मरदा नी ...

वैसे तो पॉप संगीत ने पंजाबी की काफी समझ लोगों में पैदा कर दी है तो भी कुछ शायद म्यूज़िक पर ही थिरकते होंगे इसलिए इन पंक्तियों का तर्जुमा कर ही देना चाहिए-
एक तो ऊँचा , लम्बा कद
उस पर से गोरी भी हद ,
और उस पर रूप तेरा चम चम करता है
मै ऐसे ही थोड़ी तेरे ऊपर मरता हूँ

आप कहेंगे कि इस गाने की लाइनें यहाँ हाइलाइट करने का मतलब क्या है ?अब चोखेर बालियाँ क्या नयनतारा बनने की होड़ करना चाहती हैं {जिसका आशय इस पोस्ट की दूसरी ही टिप्पणी में था ,भले ही पोस्ट को ठीक से समझे बिना दिया गया?}तो अब क्या चोखेर बाली पर ब्लीच , क्रीम , मेड ,फिगर की बातें हुआ करेंगी ?
ज़रा रुकिये !
जैसा कि पहले भी एक पोस्ट में कहा जा चुका कि यह मान लिया गया है कि “सुन्दरता किसी भी स्त्री का कर्तव्य है ” । सुन्दरता स्त्री के लिए ज़रूरी है ताकि कोई पुरुष उसे पसन्द कर सके । वर्ना यह कैसे होता है कि जो माता पिता बेटी को विवाह से पहले तक सजने सँवरने से मना करते हैं वही विवाह के लिए देखने आये लड़के के सामने उसे सजा-धजा कर पेश करते हैं।

जानती हूँ यह विचार भी प्रचलित है कि हर स्पीशिज़ मे सुन्दर दिखने की चाहत होती है फिर हम तो मनुष्य हैं। ठीक बात है। इसमे कोई दोराय नही हो सकती कि आप सुन्दर दिखना चाहें और उसके लिए कुछ प्रसाधनों और आभूषणो को धारण करें।
दिक्कत वहाँ पैदा होती है जब लड़कियाँ सुन्दर दिखने की चाहत इसलिए करने लगें कि वे किसी (या हर एक को)को पसन्द आएँ और वह उन्हें हासिल करना चाहे।यह एक प्रकार का वस्तुकरण है। लड़कियाँ इस पूरी व्यवस्था मे यह भूल जाती हैं कि उनका शरीर बाज़ार मे रखा कोई पण्य नही है जिसका उद्देश्य किसी और के आनन्द और मनोरंजन की सिद्धि करना है। यह शरीर उसके लिए भी इस दुनिया के तमाम सुखों और आनन्द को भोगने का माध्यम है यह वे भूल जाती हैं।दूसरी ओर लड़को मे भी यही धारणा बलवती होती है कि ये जो बने ठनी हमारे आगे घूमती दिख रही हैं इनके हँसने ,गाने, खेलने , उड़ने,मँडराने या सजने,सँवरने,विशेष पोशाक धारण करने का एक ही प्रयोजन है ....यह तो बस हमारे लिए है।ऊपर गाने मे भी हीरो सकारण बता रहा है कि मै यूँ ही तुम्हारे ऊपर नही मरता।तुम्हारे ऊपर मरने की वजह तुम्हारा मन,दिमाग,व्यक्तित्व नही है केवल रूप है!

एक ऑबजेक्ट मे तबदील होती लड़कियों और उपभोक्ता होते लड़कों की मानसिकता को बनाने मे हम सभी का कहाँ
कहाँ क्या योगदान है क्या हम कभी इस पर विचार करेंगे? कब कब माता-पिता ने चाहा कि लड़के वालों के आने से पहले लड़की फेशियल करा ले ,ब्लीच करा ले और सजी-धजी गुड़िया बन कर सामने आए ताकि कोई लड़का उसे पसन्द करे।

बॉलीवुड की संस्कृति जो सिखा रही है कि - आओ , मै ही सबसे सेक्सी हूँ ,मेरे साथ सेक्स करो ....के चलते कैसे इस पीढी की लड़कियों के एक बड़े हिस्से को वस्तु बनने से बचाया जा सकेगा ? नए उत्पादों की प्रदर्शनी मे सुन्दर बालाओं को साथ मे खड़ा रखने और इसमे गर्व महसूस करने से कैसे इन लड़कियों को रोका जा सकेगा ?
वे वाकई नही जानतीं कि वे एक ऐसी व्यवस्था के पंजे मे जकड़ी हैं जो उन्हें गुलाम बनाने के नित्य नए तरीके ईजाद कर रहा है। जब वे चूल्हे-चौखट तक सीमित थीं तब भी और अब जब वे देहरी के बाहर कामयाब होने निकलीं हैं तब भी धीमी धीमी ट्रेनिंग से वे गुलाम ,पण्य़ वस्तु ,एक मॉडल(जिसे दिमाग इस्तेमाल करने की इजाज़त नही , मधुर भंडारकर की "फैशन" में दिखाया गया कि मॉडल होना एक ऐसा प्रोफेशन है जिसमें आप केवल एक वस्तु हैं ,एक शरीर जिसे सोचने नही दिया जाता,और फिर जो धीरे धीरे सोचना बन्द कर देता है)एक उत्पाद में तब्दील की जा रही हैं। इस ब्रेन वॉश से अपनी लड़कियों को नही बचाया जा सका तो स्त्री-मुक्ति की हकीकत सदियों दूर हो जाएगी।

बार्बी और ज़ीरो फिगर मॉडलस को आदर्श मानने वाली लड़कियाँ अगर चिंतनशील हैं,विचारवान हैं ,अपनी अस्मिता के प्रति सचेत हैं,स्वयम को इनसान से वस्तु मे तबदील होने नही देना चाहतीं , तब शायद चिंता की बात नही ...पर क्या वाकई ऐसा है?मुझे नही लगता!

Friday, December 19, 2008

अब तोड़ने ही होंगे दुर्ग सब ,ढहाने ही होंगे मठ और गढ,करनी ही होगी शिखरों की यात्रा!


जमनालाल बजाज इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट ,मुम्बई से मैनेजमेंट डिग्री प्राप्त 46 वर्षीया चन्दा कोचड़ अब भारत के सबसे बड़े प्राइवेट बैंक ICICI की नयी सी. ई. ओ. होंगी। चन्दा आगामी वर्ष मई से बैंक के संरचनागत बदलावों की शुरुआत करेंगी।अब तक की सबसे पॉवरफुल व्यवसायी महिलाओं में चन्दा कोचड़ का नाम लिया जाता है।इससे पहले वे आई सी आई सी मे ही जॉइंट डायरेक्टर रह चुकी हैं।
उनकी सफलता व उपलब्धियों के कुछ प्रमाण --

Ranked 33th in the Fortune’s List of Most Powerful Women in Business, 2007
Ranked 37th in the Fortune’s List of Most Powerful Women in Business, 2006
Ranked 47th in the Fortune’s List of Most Powerful Women in Business, 2005
Awarded Business Woman of the Year 2005 by The Economic Times
Selected as Retail Banker of the Year 2004 (Asia-Pacific region) by The Asian Banker from amongst prominent retail bankers in the Asia Pacific region
Selected as ‘Rising Star Award’ for Global Awards 2006 by Retail Banker International

निश्चित रूप से कठिन परिश्रम और लगन से ही वे इस ओहदे तक पहुँची हैं। आर्ट्स मे बी ए करने के बाद उन्होंने एम बी ए की परीक्षा मे टॉप कर दिखाया और बतौर ट्रेनी ICICI जॉइन करने के बाद आगे ही बढती गयीं।

मै अभी सोच रही हूँ ,कि ऐसी खबरें हौसला बढाती हैं अवश्य ..लेकिन क्या उस समय हम यह भी सोच रहे होते हैं कि अपनी एक बेटी और एक बेटे को पालने पोसने के साथ साथ चन्दा कैसे यह सब कर पाती होगी?

गृहस्थ जीवन जीते हुए ,बिज़नेस वूमेन ऑफ थ यिअर अवार्ड लेने पर लाखों लोग चन्दा के लिए तालियाँ बजाते क्या केवल यही नही सोचते होंगे कि - देखो भई , घर ,बच्चे सम्भालते हुए भी इतनी सफल महिला है। बात काबिले तारीफ है।लेकिन वह कौन सा सपोर्ट सिस्टम है जिसकी वजह से चंदा किसी आम कामकाजी स्त्री की तरह ऑफिस खत्म होने से 5 मिनट पहले घर की ओर सर पर पैर रखकर नही दौड़ती ,कि देर हुई तो बच्चे को क्रेश से कौन लेगा? या क्लास खत्म कर नाक की सीध मे बच्चे के स्कूल उसे लेने नही पहुँच जाती कि देर हुई तो बच्चा बस स्टॉप पर अकेले खड़ा रहेगा? या कि देर रात आने पर उसे लोगों के चेहरे पहले रसोई की तरफ और फिर उसकी ओर उठते हुए नही दिखते ,और पति से यह कहने नही मिलता कि - बस का नही है तो छोड़ क्यों नही देतीं नौकरी ? अपना घर देखो ! पता है कल राहुल का एग्ज़ाम है?रितु का फ्लॉर डेकोरेशन कम्पीटीशन है ? माँ की तबीयत खराब है , बाबूजी की आँख का ऑपरेशन हुआ है और तुम्हें बिज़नेस से फुर्सत नही ?
बहुत सम्भव है कि यह सब चन्दा ने अनुभव भी किया होगा और विपरीत परिस्थितियों मे लड़ी भी होगी । यह भी सम्भव है कि वह सपोर्ट सिस्ट्म घर परिवार रहा हो , या आर्थिक सबलता रहा हो ।

मै जानना चाहती हूँ कि ऐसी सफल स्त्री ,गृहस्थ स्त्री ,व्यवसायी स्त्री ,कर्मठ स्त्री ....क्या आपकी नौकरी पेशा पत्नी,बहन,बेटी ...जैसी अभी है और जैसी आप उन्हें चाहते हैं कि वे रहें ....वैसी ही रहते हुए भी और हम सबके भी जैसे है वैसे ही रहते हुए भी .........वैसी स्त्री हो सकना सम्भव है ?? बाहर चुनौतियों के बढने के साथ क्या हम पत्नियों और बहनो बेटियों के लिए घर मे भी चुनौतियाँ बढा नही देते ? यदि हाँ ! तो चन्दा कोचड़ आपके -मेरे परिवार मे तो कैसे ही हो पाएगी भला!और अगर हुई तो निश्चित जानिए कि आपके बनाए ढांचो को ढहाए बिना नही हो सकेगी ! ढाँचे ढह जाने से आपका विद्वेष बढेगा और ईर्ष्या भी बढेगी और ऐसा समाज स्वस्थ समाज कैसे हो सकेगा जहाँ दोनो विपरीत
लिंगी सथियों के बीच ऐसा विद्वेष हो।
क्या मै इस निष्कर्ष पर पहुँच सकती हूँ कि सफलता की ऊंचाइयों पर पहुँचने के लिए एक स्त्री को समाज संरचनागत बहुत सी परम्पराएँ तोड़नी पड़ती हैं और दुर्ग ढहाने पडते हैं ? एक आम स्त्री के लिए यह संघर्ष तो बेहद दर्दनाक और कठिन होता है।
और क्या इसका मतलब यह है कि स्वयम को साबित करने और अपनी क्षमताओं से सर्वोत्तम प्राप्त करने मे पितृसत्ता अधिकांशत: स्त्री के खिलाफ ही खड़ी होती है ?
यदि ऐसा है तो निश्चित रूप से यह सफलता पुरुष की हासिल सफलता से कई गुना महत्वपूर्ण होती है । और यही कारण है कि ऐसी खबरें हमारे लिए सुर्खियाँ बन जाती है।

Tuesday, December 16, 2008

लड़की थी वह..

लड़की थी वह------

कड़ाकेदार सर्दी की वह रात थी. घर के सभी सदस्य रजाइयों में दुबके पड़े थे. दिन भर से बिजली का कट था जो पंजाब वासियों के लिए आम बात है. इन्वर्टर से पैदा हुई रौशनी में खाने पीने से निपट कर, टी.वी न देख पाने के कारण समय बिताने के लिए अन्ताक्षरी खेलते-खेलते सब सर्दी से ठिठुरते रजाइयों में घुस गए थे. दिसम्बर की छुट्टियों में ही हम दो तीन सप्ताह के लिए भारत जा पातें हैं. बेटे की छुट्टियां तभी होतीं हैं. दूर दराज़ के रिश्तेदारों को पापा घर पर ही मिलने के लिए बुला लेतें हैं. उन्हें लगता है कि हम इतने कम समय में कहाँ-कहाँ मिलने जायेंगे. मिले बिना वापिस भी नहीं आया जाएगा. हमारे जाने पर घर में खूब गहमागहमी और रौनक हो जाती है. बेटे को अमेरिका की शांत जीवन शैली उपरांत चहल-पहल बहुत भली लगती है. हर साल हम से पहले भारत जाने के लिए तैयार हो जाता है. दिन भर के कार्यों से थके मांदे रजाइयों की गर्माहट पाते ही सब सो गए. करीब आधी रात को कुत्तों के भौंकनें की आवाज़ें आनी शुरू हुई...आवाज़ें तेज़ एवं ऊंचीं होती गईं. नींद खुलनी स्वाभाविक थी. रजाइयों को कानों और सिर पर लपेटा गया ताकि आवाज़ें ना आयें पर भौंकना और ऊंचा एवं करीब होता महसूस हुआ जैसे हमारे घरों के सामने खड़े भौंक रहें हों.....
हमारे घरेलू नौकर-नौकरानी मीनू- मनु साथवाले कमरे में सो रहे थे. उनकी आवाज़ें उभरीं--
'' रवि पाल (पड़ौसी) के दादाजी बहुत बीमार हैं, लगता है यम उन्हें लेने आयें हैं और कुत्तों ने यम को देख लिया है ''
''नहीं, यम देख कुत्ता रोता है, ये रो नहीं रहे ''
''तो क्या लड़ रहें हैं''
''नहीं लड़ भी नहीं रहे ''
''ऐसा लगता है कि ये हमें बुला रहें हैं''
''मैं तो इनकी बिरादरी की नहीं तुम्हीं को बुला रहे होंगें''
बाबूजीकी आवाज़ उभरी---मीनू, मनु कभी तो चुप रहा करो. मेरा बेटा अर्धनिद्रा में ऐंठा--ओह! गाश आई डोंट लाइक दिस. तभी हमारे सामने वाले घर का छोटा बेटा दिलबाग लाठी खड़काता माँ बहन की विशुद्ध गालियाँ बकता अपने घर के मेनगेट का ताला खोलने की कोशिश करने लगा. जालंधर में चीमा नगर (हमारा एरिया)बड़ा संभ्रांत एवं सुरक्षित माना जाता है. हर लेन अंत में बंद होती है. बाहरी आवाजाई कम होती है. फिर भी रात को सभी अपने-अपने मुख्य द्वार पर ताला लगा कर सोते हैं.
उसके ताला खोलने और लाठी ठोकते बहार निकलने की आवाज़ आई. वह एम्वे का मुख्य अधिकारी था और पंजाबी की अपभ्रंश गालियाँ अंग्रेज़ी लहजे में निकल रहीं थीं. लगता था रात पार्टी में पी शराब का नशा अभी तक उतरा नहीं था. अक्सर पार्टियों में टुन होकर जब वह घर आता था तो ऐसी ही भाषा का प्रयोग करता था. उसे देख कुत्ते भौंकते हुए भागने लगे, वह लाठी ज़मीन बजाता लेन वालों पर ऊंची आवाज़ में चिल्लाता उनके पीछे-पीछे भागने लगा ''साले--घरां विच डके सुते पए ऐ, एह नई की मेरे नाल आ के हरामियां नूं दुड़ान-भैन दे टके. मेरे बेटे ने करवट ली--सिरहाना कानों पर रखा--माम, आई लव इंडिया. आई लाइक दिस लैंगुएज. मैं अपने युवा बेटे पर मुस्कुराये बिना ना रह सकी, वह हिन्दी-पंजाबी अच्छी तरह जानता है और सोए हुए भी वह मुझे छेड़ने से बाज़ नहीं आया. मैं उसे किसी भी भाषा के भद्दे शब्द सीखने नहीं देती और वह हमेशा मेरे पास चुन-चुन कर ऐसे-ऐसे शब्दों के अर्थ जानना चाहता है और मुझे कहना पड़ता है कि सभ्य व्यक्ति कभी इस तरह के शब्दों का प्रयोग नहीं करते.
दिलबाग हमारे घर के साथ लगने वाले खाली प्लाट तक ही गया था( जो इस लेन का कूड़ादान बना हुआ था और कुत्तों की आश्रयस्थली) कि उसकी गालियाँ अचानक बंद हो गईं और ऊँची आवाज़ में लोगों को पुकारने में बदल गईं --जिन्दर, पम्मी, जसबीर, कुलवंत, डाक्डर साहब(मेरे पापा)जल्दी आयें. उसका चिल्ला कर पुकारना था कि हम सब यंत्रवत बिस्तरों से कूद पड़े, किसी ने स्वेटर उठाया, किसी ने शाल. सब अपनी- अपनी चप्पलें घसीटते हुए बाहर की ओर भागे. मनु ने मुख्य द्वार का ताला खोल दिया था. सर्दी की परवाह किए बिना सब खाली प्लाट की ओर दौड़े. खाली प्लाट का दृश्य देखने वाला था. सब कुत्ते दूर चुपचाप खड़े थे. गंद के ढेर पर एक पोटली के ऊपर स्तन धरे और उसे टांगों से घेर कर एक कुतिया बैठी थी. उस प्लाट से थोड़ी दूर नगरपालिका का बल्ब जल रहा था. जिसकी मद्धिम भीनी-भीनी रौशनी में दिखा कि पोटली में एक नवजात शिशु लिपटा हुआ पड़ा था और कुतिया ने अपने स्तनों के सहारे उसे समेटा हुआ था जैसे उसे दूध पिला रही हो. पूरी लेन वाले स्तब्ध रह गए. दृश्य ने सब को स्पंदनहीन कर दिया था. तब समझ में आया कि कुत्ते भौंक नहीं रहे थे हमें बुला रहे थे.
''पुलिस बुलाओ '' एक बुज़ुर्ग की आवाज़ ने सब की तंद्रा तोड़ी. अचानक हमारे पीछे से एक सांवली पर आकर्षित युवती शिशु की ओर बढ़ी. कुतिया उसे देख परे हट गई. उसने बच्चे को उठा सीने से लगा लिया. बच्चा जीवत था शायद कुतिया ने अपने साथ सटा कर, अपने घेरे में ले उसे सर्दी से यख होने से बचा लिया था. पहचानने में देर ना लगी कि यह तो अनुपमा थी जिसने बगल वाला मकान ख़रीदा है और अविवाहिता है. सुनने में आया था की गरीब माँ-बाप शादी नहीं कर पाए और इसने अपने दम पर उच्च शिक्षा ग्रहण की और स्थानीय महिला कालेज में प्राध्यापिका के पद पर आसीन हुई. यह भी सुनने में आया था कि लेन वाले इसे संदेहात्मक दृष्टि से देखतें हैं. हर आने जाने वाले पर नज़र रखी जाती है. लेन की औरतें इसके चारित्रिक गुण दोषों को चाय की चुस्कियों के साथ बखान करतीं हैं. जिस पर पापा ने कहा था'' बेटी अंगुली उठाने और संदेह के लिए औरत आसान निशाना होती है. समाज बुज़दिल है और औरतें अपनी ही ज़ात की दुश्मन जो उसकी पीठ ठोकनें व शाबाशी देने की बजाय उसे ग़लत कहतीं हैं. औरत-- औरत का साथ दे दे तो स्त्रियों के भविष्य की रूप रेखा ना बदल जाए, अफसोस तो इसी बात का है कि औरत ही औरत के दर्द को नहीं समझती. पुरूष से क्या गिला? बेटा, इसने अपने सारे बहन-भाई पढ़ाये. माँ-बाप को सुरक्षा दी. लड़की अविवाहिता है गुनहगार नहीं.''
''डाक्टर साहब इसे देखें ठीक है ना'' ---उसकी मधुर पर उदास वाणी ने मेरी सोच के सागर की तरंगों को विराम दिया. अपने शाल में लपेट कर नवजात शिशु उसने पापा की ओर बढ़ाया-- पापा ने गठरी की तरह लिपटा बच्चा खोला, लड़की थी वह------
सुधा ओम ढींगरा( अमेरिका)

Saturday, December 13, 2008

उस स्त्री के बारे में तुम्हे कुछ नहीं कहना ?

करवट बदल कर सो गई
उस स्त्री के बारे में तुम्हे कुछ नहीं कहना!

जिसके बारे में तुमने कहा था
उसकी त्वचा का रंग सूर्य की पहली किरण से
मिलता है

उसके खू़न में
पूर्वजों के बनाये सबसे पुराने कुएँ का जल है

और जिसके भीतर
इस धरती के सबसे बड़े जंगल की
निर्जनता है

जिसकी आँखों में तुम्हें एक पुरानी इमारत का
अकेलापन दिखा था
और....जिसे तुम बाँटना चाहते थे
जो... एक लम्बे गलियारे वाले
सूने घर के दरवाजे पर खड़ी
तुम्हारी राह तकती थी!
--------




यह कविता मैं सन्ध्या गुप्ता के ब्लॉग से उठा लाई हूँ। कविता मे स्त्री विमर्श कैसे होता है सन्ध्या की कविताएँ इसका ताज़ा उदाहरण हैं।झारखंड की रहने वाली सन्ध्या गुप्ता के इस ब्लॉग पर मेरी दृष्टि आज ही गयी और पहली ही झलक मे अनंत सम्भावना भरी कविताओं की अनंत सम्भावनाएँ मुझे दिखाई दीं।उनकी कल की ही पोस्ट की हुई कविता दोराहे पर खड़ी लड़कियाँ मानों स्त्री विमर्श पर आधारित कईं लेखों का निचोड़ चन्द मामूली शब्दों मे बयां कर देती हैं।आप भी देखें---- http://guptasandhya.blogspot.com

Monday, December 8, 2008

इन्हें चांद चाहिए

राजकिशोर

अलोकप्रिय या अलोकप्रिय बना देनेवाली बात कहने से घबराना नहीं चाहिए, यह सिद्धांत 'हितोपदेश' से जरा आगे का है। प्रस्ताव यह है कि 'सत्य वही बोलो जो प्रिय भी हो' की नीति व्यक्तिगत मामलों के लिए तो ठीक है, पर सामाजिक मामलों में कटुतम सत्य बोलने की जरूरत हो तो संकोच नहीं करना चाहिए। इसी आधार पर स्त्रियों के यौन शोषण के एक तकलीफदेह पहलू की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। आशा है, मेरी नीयत पर शक नहीं किया जाएगा। लेकिन कोई शक करता भी है, तो मुझे परवाह नहीं है। यह लड़ाई सच की है और सच के मामले में निजी फायदा-नुकसान नहीं देखा जाता।

तो किस्सा यह है कि यौन शोषण के हर मामले में पुरुष ही सब तरह से दोषी नहीं होता। यह सच है कि पुरुष से भी हम वैसे ही संयम की उम्मीद करते है जैसे स्त्री से। किसी स्त्री की स्थिति का लाभ उठाना महापाप है। यह हर स्त्री जानती है कि वह जैसी भी है, पुरुष कामना का विषय है। भगवान ने उसे ऐसा ही बनाया है। यदि ऐसा नहीं होता, तो इस सृष्टि या जगत के जारी रहने में गंभीर बाधा आ जाती। यह स्त्री की शक्ति भी है। प्रेम या विवाह में स्त्री की इस शक्ति और पुरुष की कामना का सुंदर समागम होता है। स्त्री-पुरुष के साहचर्य में यह समागम केंद्रीय होना चाहिए। बाकी सब छल या माया है।

स्त्री पर भी इस छल या माया का आरोप लगाया गया है। अनेक मामलों में पाया गया है कि पुरुष ही स्त्री को प्रदूषित नहीं करता, स्त्री भी पुरुष को प्रदूषित करती है। यौन जीवन के सभी सर्वेक्षणों में यह तथ्य उजागर होता रहा है कि कई पुरुषों ने स्त्रीत्व का पहला स्वाद अपने से ज्यादा उम्र की भाभी, चाची या मामी से प्राप्त किया था। मैं यह नहीं कह सकता कि यह अनैतिक है। जो बहुत-से मामले नैतिक-अनैतिक के वर्गीकरण से परे हैं, उन्हीं में एक यह है। सभी मनुस्मति या भारतीय दंड संहिता को कंठस्थ करने के बाद जीवन के गुह्य पहलुओं का ज्ञान या अनुभव प्राप्त नहीं करते। संस्कृति के साथ-साथ प्रकृति के भी दबाव होते हैं। संत वही है जो इस दबाव से मुक्त हो गया है। बाकी सभी लोग कामना और कर्तव्य के बीच झूलते रहते हैं तथा पारी-पारी से आनंद का सुख और ग्लानि का दंश महसूस करते हैं।

इसीलिए दुनिया में सच है तो धोखा भी है। कोई गुरु अपनी शिष्या को, मैनेजर अपनी अधीनस्थ कर्मचारी को और नेता अपनी अनुयायी को धोखे में रख कर यौन सुख हासिल करता है, तो वह इसलिए अपराधी है कि उसने अपनी उच्चतर स्थिति का नाजायज फायदा उठाया है। किसी अत्यंत पवित्रतावादी समाज में ऐसे अपराधियों को गोली से उड़ा दिया जाएगा। कुछ मामलों में सच्चा प्रेम भी हो सकता है, जिसका अपना आनंद और अपनी समस्याएं हैं, पर अधिकतर मामलों में किस्सा शोषण का ही होता है। माओ जे दुंग की सीमाहीन बहुगामिता का खुला रहस्य यही है। भारत में जनतंत्र है, पर यहां भी ऐसे किस्से अनंत हैं। यहां तक कि साधु, योगी, तांत्रिक और मठाधीश भी संदेह के घेरे से बाहर नहीं निकल पाते।

लेकिन ऐसी स्त्रियों की उपस्थिति से कौन इनकार कर सकता है जो अपने स्त्रीत्व के आकर्षण का अवसरवादी लाभ उठाती हैं? वे जानती हैं कि पुरुष की नजर में वे काम्य हैं और इस काम्यता का लाभ उठाने की लालसा का दयनीय शिकार हो जाती हैं। किसी को एमए में र्फस्ट होना है, किसी को, अपात्र होने पर भी, लेक्चररशिप चाहिए, कोई चुनाव का टिकट पाने के लिए लालायित है तो किसी को, परिवार की आय कम होने के बावजूद, ऐयाशी और मौज-मस्ती का जीवन चाहिए। किसी को टीवी पर एंकर बनना है, कोई फिल्म में रोल पाने के लिए बेताब है, कोई अपनी कमजोर रचनाएं छपवाना चाहती हैं, किसी को जल्दी-जल्दी प्रमोशन चाहिए तो कोई लाइन तोड़ कर आगे बढ़ना चाहती है। कोई-कोई ऐसी भी होती है जो खुद पीएचडी का शोध प्रबंध नहीं लिख सकती और अपने प्रोफेसर-सुपरवाइजर से लिखवा कर अपने नाम के पहले डॉक्टर लिखना चाहती है। ज्यादा उदाहरण देना इसलिए ठीक नहीं है कि हमें समाज का बखिया उधेड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं है। पर यह जरूर याद दिलाना चाहते हैं कि जिस स्त्री शक्ति के परिणामस्वरूप ये सारी इच्छाएं आनन-फानन में पूरी की जा सकती हैं, उसी का राजनीतिक उपयोग करते हुए सामंती काल में सुंदर कान्याओं को विष का क्रमिक आहार देते हुए और उसकी मात्रा बढ़ाते हुए विषकन्या का करियर अपनाने के लिए बाध्य किया जाता था। आज भी जासूसी के काम में स्त्रियों को लगाया जाता है। जिस आकर्षण का दुरुपयोग वे राज्य के काम के लिए कर सकती हैं, उसका अनैतिक इस्तेमाल वे अपने अवैध स्वार्थों की पूर्ति के लिए क्यों नहीं कर सकतीं?

एक बात तो तय है। किसी भी स्त्री से उसकी सहमति के बगैर संबंध नहीं बनाया जा सकता। बहुत-सी ऐसी स्त्रियां भी यौन हेरेसमेंट का शिकार बनाए जाने की शिकायत करती हैं जिन्होंने यह हरेसमेंट काफी दिनों तक इस उम्मीद में सहन किया कि उनका काम हो जाएगा। जब काम नहीं बनता, तो वे शिकायत करने लगती हैं कि मेरा शोषण हुआ है या मुझे परेशान किया गया है। मुझे रत्ती भर भी संदेह नहीं कि ऐसे मामलों में भी पुरुष ही अपराधी है। लेकिन यह सोच कर कम दुख नहीं होता कि कि हमारी बेटियां-बहनें इस जाल में अपनी मर्जी से दाखिल ही क्यों होती हैं। 'हम प्यार में धोखा खा बैठे' -- यह एक स्थिति है। दूसरी स्थिति यह है कि यह धोखा जान-बूझ कर खाया गया, क्योंकि नजर कहीं और थी। यह एक ऐसा मायावी संबंध है, जिसमें दोनों शिकार होते हैं और दोनों ही शिकारी।

कुल मिला कर स्थिति बहुत ही पेचीदा है। पुरुष की ओर से पेच ज्यादा हैं, पर कभी-कभी स्त्री भी पेच पैदा करती है। यह सच है कि अपने स्त्रीत्व का शोषण करनेवाली स्त्रियों की संख्या एक प्रतिशत भी नहीं होगी, पर यह धारणा गलत नहीं है कि एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है। यहां मामला तालाब को गंदा बनाने की नहीं, उसकी छवि बिगाड़ने का है। इसलिए 'सब धान तेइस पसेरी' का सोच एकांगी है। फिर भी, स्त्रियों का दोष कम करके आंका जाना चाहिए, क्योंकि वे जन्म से ही अन्याय और भेदभाव का शिकार होती हैं तथा अनुचित तरीके से अवैध लाभ हासिल करने के लालच में पड़ जाती हैं। ये अगर चांद की कामना न करें, तो इनकी गरिमा को कौन ठेस पहुंचा सकता है?

Saturday, December 6, 2008

कहीं कोई संदिग्ध व्यक्ति या वस्तु दिखे तो टेरर हेल्पलाइन 1090 पर फोन करें

अगर कहीं कोई संदिग्ध वस्तु दिखे तो हम आम तौर पर पुलिस को 100 नंबर पर फोन करते हैं। लेकिन इससे भी प्रभावी जगह अपनी आशंका को पहुंचाना हो, ताकि आतंकवाद की किसी संभावित घटना के खिलाफ सटीक कार्रवाई हो सके तो ऑल इंडिया टेरर हेल्पलाइन नंबर पर फोन करना ज्यादा कारगर होगा।

ऑल इंडिया टोल फ्री टेरर हेल्पलाइन नंबर है- 1090। खास बात यह है कि देश में हर जगह यह नंबर कारगर है। इस पर मोबाइल से भी फोन किया जा सकता है। खास बात यह है कि इसमें फोन करने वाले की पहचान छुपाने की भी व्यवस्था है।

अगर कहीं भी, कभी भी आपको आतंकी गतिविधि का अंदेशा हो तो इस नंबर '1090' पर तत्काल फोन करें। स्थानीय पुलिस या टेरर स्क्वाड तक खबर पहुंच जाएगी। क्या पता एक फोन भर से कोई संभावित बुरी घटना टल जाए!

Thursday, December 4, 2008

विश्व ऐड्स दिवस - 1 december







आज मैंने उत्तरखंड राज्य ऐड्स नियंत्रण समिति और उमा द्वारा आयोजित वर्कशॉप में भाग लिया ...जन जागरण में महिलाओं की भूमिका पर , उनके अहम् रोल पर चर्चा की गई AIDS जैसे खतरनाक बीमारी की कैसे रोकथाम की जा सकती है .....Prevention is better than cure......Awareness के लिए युवा वर्ग और महिलाएं आगे आयें और समाज को एक मजबूत दिशा दें ....

Tuesday, December 2, 2008

अब डर कैसा


मुझे अब अपनी मां के पास रहते एक साल होने को है । ससुराल वालों ने मेरी कोई खबर नहीं ली । भाभी जिन्होंने अपने भाई के साथ मेरी शादी करवाई, वैसे तो मेरे जीवन में कोई रूचि नहीं लेती और मैं अपने तथाकथित पति के बारे में पूछूँ तो उनका एक ही जवाब मिलता । मैं चुपचाप अपने ससुराल चली जाउं, इसी में मेरी भलाई है ।

पिछ्ले एक साल से मां के आंचल का साया और स्नेह मिला तो बहुत सी ऎसी सच्चाइयों को मैं समझ सकी जो ससुराल में रहते मैं नहीं समझ पाई थी । शादी करते समय तो मेरे मन बस कुछ कच्चे और भोले सपने थे, जिनका जिंदगी की सच्चाई से कभी आमना-सामना ही नहीं हुआ था। बचपन से ही इकलौती, विकलांग, शारीरिक रूप से कमजोर और बिन बाप की औलाद होने के कारण मां अतिरिक्त वात्सल्य, शायद सदा मेरा सुरक्षा कवच बना रहा।

मेरी डोली ससुराल पहुँची तो साथ ही साथ भाभी भी । आखिर उनके सगे भाई की शादी हुई थी और रिश्ता भी उन्होंने ही करवाया । ससुराल में पहली रात मैं उन भाभी के साथ ही सोयी। एक महीना भाभी मायके में रही और मुझ पर अपना स्नेह बरसाते हुए रोज़ मेरे साथ ही सोती थी । उनका यह स्नेह अचानक चिढ़ में बदल जाता जब मैं अपनी माँ से बात करने के लिए कहती । वे कहती अब अपनी माँ को अकेले रहने की आदत डालने दे । माँ का फोन आता तो भी सब मेरे सामने ही बैठ जाते कि पता चले मैं अपनी माँ से क्या बातें कर रही हूँ । संकोचवश मैं सिर्फ हां हूं करती रहती । इसी तरह जब भी मैं सुमित के साथ अकेली होती तो भाभी कहीं न कहीं से टपक पड़ती । मुझे छेड़ने लगती। किसी न किसी बहाने से मुझे या सुमित को अपने साथ ले जाती । मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि भाभी आखिर चाहती क्या हैं । एेसा तो मैने अपनी किसी भी सहेली से न सुना था कि शादी के तुरंत बाद पति अपनी पत्नी के साथ रहनेसोने को इच्छुक ही न हो। दो एक दिन बाद मैने भाभी से डरते और शर्माते हुए पूछा, तो उन्होंने कहा कि सुमित बहुत थक सा जाता है । वह तुम्हारी मां की तरह कोई सरकारी बाबू तो है नहीं कि बैठे बैठे काम करते रहे । और फिर तुम्हारी रीढ़ की हड्डी टेढ़ी होने के कारण तुममें वैसा तीव्र आकर्षण भी तो नहीं है। तुम्हारे भैया ने तो शादी के बाद महीने दो महीने मुझे एक पल को भी अकेला न छोड़ा था । कोई उन्हें बुलाता तो भी पल दो पल में बहाना बना कर फिर मेरे पास लौट आते । लेकिन तू चिंता न कर मैंने सुमित को सब समझा दिया है । तुझे मेहनत कर ससुराल में सबका दिल जीतना होगा । सब ठीक हो जाएगा । मैं सोचने लगी यह सब भाभी क्या कह रही हैं एेसा कुछ शादी से पहले या रिश्ते से पहले तो इन्होंने नहीं कहा । और मेरी विकलांगता कोई छिपी हुई बात तो थी नहीं , सुमित को पहले ही सब पता था। अब इन बातों का क्या मतलब ।

पति की मात्र दो हजार पगार (जो पहले भाभी ने चार पांच हजार बताई थी ) में अपनी गृहस्थी चलाने का मैने फैसला कर लिया था । भाभी के समझाने पर, मां को बिना बताए ही मैं अपनी डिग्रियों के ओरिजिनल प्रमाण पत्र भी कानपुर ले गई । नौकरी भी शुरू कर दी । 800 में छोटे से स्कूल में घर के पास ही । लेकिन शायद मेरे भाग्य में कुछ और ही लिखा था ।
अब मां के घर रहते हुए भी मानसिक तौर पर मैं अपने को स्वस्थ महसूस नहीं कर पा रही हूं । ससुराल से लगातार धमकी भरे फोन आ रहे हैं कि शराफत से लौट आओ नहीं तो अच्छा न होगा । मेरे ही नहीं , मेरे जिन जान पहचान के जो फोन नं. ससुराल वालो के पास हैं , उन सब के घर भी यही फोन आ रहे हैं कि लड़की को किसी तरह समझा कर भेज दिया जाए तो ही अच्छा है ।

अनुरोध --
अनुराधा और सुजाता का धन्यवाद देना चाहँगी कि उनकी बात पढ़कर मैं भी अपनी कहानी के सच को कह पाई । कहानी अभी बहुत लम्बी है, अपनी मानसिक हालत और अन्य कारणों से मैं अपना और अपने शहर का सच्चा नाम नहीं बता सकती, आगे भी बता पाउंगी या नहीं यह मेरे भविष्य पर निर्भर करता है। लेकिन अपनी पूरी कहानी कहकर , अपने भविष्य के बारे में क्या निर्णय लूं ,आपकी राय चाहती हूं । मैं भी आत्मसम्मान के साथ जीवन बसर करना चाहती हूं । मेरी तरह भारतीय समाज की और भी कई पीडि़त बेटियां होंगी, जिन्हें शायद अपनी कहानी कहने का मौका भी नहीं मिला । इसलिए अपनी मित्र के माध्यम से आप तक पहँच रही हूं । यह कहना तो शायद अतिशयोक्ति होगा कि इस समय मेरी हालत भी बम्बई की दहशत में फँसे लोगों की तरह है । लेकिन स्थिति गंभीर है।

क्योंकि

मरना मुश्किल है

लेकिन उससे भी ज्यादा मुश्किल है

पल पल, घंटों तक, कई दिनों तक, महीनों तक

और शायद सालों तक जीवन और मौत के बीत झूलते रहना ।

गुलामी में जीना मुश्किल है

लेकिन उससे भी ज्यादा मुश्किल है
पल पल, घंटों तक, कई दिनों तक, महीनों तक
और शायद सालों तक, आजा़द कहलाते हुए भी निरंतर गुलामी करना।

उन्मुक्त गगन में क्षितिज पाना मुश्किल है

लेकिन उससे भी ज्यादा मुश्किल है

हर पल, घंटों तक, कई दिनों तक, महीनों तक

और शायद सालों तक आनंदमयी उड़ान की सफ़ल योजनाएं बनाना।

आज़ादी की जिम्मेदारी सफलतापूर्वक संभालना ।