Saturday, December 27, 2008

क्या भाषा और व्यवहार की सारी तमीज़ का ठेका स्त्रियों ,बेटियों ने लिया हुआ है?

दीप्ति ,माने लड़की, अपनी पोस्ट मे ऐसा शब्द कैसे इस्तेमाल कर सकती है? यह आपत्ति पितृसत्ता के किसी पैरोकार की ओर से आने वाली है मुझे भनक थी। अंशुमाली जी ने वहाँ कहा कि गालियों के प्रति भावनात्मक न बनें और उन्हें इंज्वाय करें।सही भी है , कि जब आप भाषा के इस भदेसपने पर गर्व करते हैं तो यह गर्व स्त्री के हिस्से भी आना चाहिए।और सभ्यता की नदी के उस किनारे रेत मे लिपटी दुर्गन्ध उठाती भदेस को अपने लिए चुनते हुए आप तैयार रहें कि आपकी पत्नी और आपकी बेटी भी अपनी अभिव्यक्तियों के लिए उसी रेत मे लिथड़ी हिन्दी का प्रयोग करे और आप उसे जेंडर ,तमीज़ , समाज आदि बहाने से सभ्य भाषा और व्यवहार का पाठ न पढाएँ। आफ्टर ऑल क्या भाषा और व्यवहार की सारी तमीज़ का ठेका स्त्रियों ,बेटियों ने लिया हुआ है?

तभी मैने वहाँ कमेंट में कहा था कि आप सभी के पाँवों तले ज़मीन खिसक जाएगी यदि स्त्रियों ने इन गालियों को इंज्वाय करना और इनके प्रति सहज होना सीख लिया।आप चाह्ते है कि गालियों का धाराप्रवाह प्रयोग वातावरण मे होता रहे और बेटियाँ सहज बनी रहें। यह सम्भव नही है। इसलिए यदि इनका प्रयोग बन्द नही करेंगे तो धीरे धीरे सहज होने के लिए वे भी प्रयोग शुरु कर देंगी और तब अहसास होगा कि गालियों के प्रति सहज होना किसे कहते हैं।अंग्रेज़ी मे ऐसे प्रयोग अब लड़कियाँ आम करने लगीं है।अंग्रेज़ी की गाली की खनक शायद कम सुनाई देती है।पर जब यह अपनी भाषा मे होगा तो सोचिए!
ब्लॉग लिखने से कम से कम उसे पढने वाले आप जैसे विचारवान लोग तो अपनी शब्दावली सुधर लेंगे और अपने बेटे ,दोस्तों आदि से भी कहेंगे।"साला" एक बेहद प्रचलित प्रयोग है जिसे आज मैं तक प्रयोग कर जाती हूँ क्योंकि वातावरण मे यह इतना घुला मिला है।सोचिए किसी बेहद क्रोध व उत्तेजना की स्थिति मे मै भैन ,यापा..आदि का भी प्रयोग कर सकती हूँ ..और यह इतना सहज हो जाए कि शायद मुझे पता भी न चले कि मेरे मुँह से ऐसा निकल गया है।फट गई,फाड़ दी, ले ली .. जैसे प्रयोग आज लड़कियों मे आम हैं....अपने मित्रों के बीच।शायद वे भी इंज्वाय करना सीख रही हैं।शायद उनकी अभिव्यक्ति भी श्लील-अश्लील के द्वन्द्व से मुक्त हो रही है।
मैं नही जानती कि बिन गाली जग सून होगा या नही पर बेटियों लड़कियों पत्नियों बहुओ को गाली देते सुनकर्
मुँह फाड़कर "हौ जी" करें यह आपके चरित्र का दोगलापन कहलाएगा।

33 comments:

PD said...

100% agree..

वेद रत्न शुक्ल said...

गाली-गलौज इन्ज्वॉय करने की चीज है? मूर्ख लोग गाली देकर बात करते हैं। साला-साली तक तो चलाऊँ है लेकिन इससे आगे एक शब्द नहीं। मैं देख रहा हूँ कि तथाकथित सभ्य समाज में वाचिक अश्लीलता बढ़ती ही जा रही है। जैसे कि लेली-देली... आदि। अगर कोई दुष्टता पर उतारू है तो इसका मतलब नहीं कि बहू-बेटियां भी वही करने लगें।

पा.ना. सुब्रमणियन said...

हम आपका पूरा पूरा समर्थन करते हैं. हमने और भी ब्लोगों में देखा है इस कुसंस्कार को. एक बार तो हमने एक३ या ४ साल के बच्चे को देखा जो माँ की गाली धड़ल्ले से दे रहा था. अपने घर में ही सीखा होगा और उसके माँ बाप एंजाय करते होंगे.

डॉ .अनुराग said...

दुखद है !
हम भारतीय को बहुत सी चीजे अपने व्यवहार में सीखनी है ,या एक शब्द में कहे तो अनुशासित होना है ...भाषा उसी का एक हिस्सा है ,ओर इसे किसी प्रदेश की संस्क्रति कह कर टालना ठीक नही है ,आपने साहस किया जो इतना खुल कर कुछ शब्द लिखे ....ट्रेफिक नियम का पालन ,सड़क पर बेतरतीब गाड़ी खड़ी करना ,रात में डिम लाईट के बदले हाई बीम पर गाड़ी चलाना ,कही भी पान की पीक थूक देना ,चलती गाड़ी से खाने का सामान फेंकना ...सरकारी संपत्ति या किसी सार्वजनिक संपत्ति के प्रति लापरवाही बरतना ....मै तो ये सोचकर काँप गया हूँ जब औरते इस की अभ्यस्त हो जायेगी ..? एक आइना दिखाया है हम सब को .शुक्रिया

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बस अब यही शेष रह गया है कि यौनिक गालियाँ मजा लेने की चीज बन जाएं। जो चीज आप को मजा दे रही है वही कहीं किसी दूसरे को चोट तो नहीं पहुँचा रही है।

Dr. Amar Jyoti said...

फूहड़ यौनिक/लैंगिक गालियों पर लज्जित या नाराज़ होने के स्थान पर यदि स्त्री उनमें रस लेने लगती है तो यह उसका विकास कहलायेगा या अधःपतन?

cmpershad said...

हम हमारी संस्कृति और संस्कार से दूर होते जा रहे हैं जिसके चलते हमारे आचरण के साथ हमारी भाषा भि दूषित होती जा रही है। यह सही है कि जब कोई अंग्रेज़ी में बास्टेड कहता है तो हम उस पर ध्यान नहीं देते पर हरामज़ादा कहने पर अचकचा जाते हैं। भाषा को शालीन रखना हर नागरिक का कर्तव्य बनता है।

अजित वडनेरकर said...

सहमत हूं....
गाली कभी एंजॉय वाली बात नहीं हो सकती ।

आभा said...

सभ्य व्यवहार या बातचीत का तरीका किसी खास वर्ग के लिए ही नहीं होता ।अनुराग, दिनेश जी और अजीत भाई सही कह रहे हैं, जिस घर , समाज में हम रह रहे हैं हमे ही तय करना होता है हम क्या सीखे और क्या गुजर जाने दें।

E-Guru Rajeev said...

दिमाग भन्ना जाता है, गलियाँ देने वालों पर कैसे दे पाते हैं. मैंने कई बार विरोध किया है और बदले में लोगों ने कुतर्कों के द्वारा ख़ुद को सही ठहराया. यह बेशर्मी ही कही जायेगी.
कुतर्क यह कि गुस्से में माँ-बहन हो ही जाता है.
मैं कोई गाली नहीं देता पर कई बार मुझे लोगों ने यह सुनाया कि मुझमें अभी परिपक्वता नहीं है. यानी गाली देना परिपक्वता है.

समाज के छोटे-वर्गों में तो यह पूरी तरह से इंजॉय की जाती है. कभी-कभी महिलाओं के मुंह से भी सुना है, घोर ताज्जुब हुआ, आप पुरुषों के द्वारा गाली देने का विरोध करें. मैं भी करता हूँ पर महिलाओं को रोकना भी पूरी तरह से सही है.समाज का हर वर्ग सही होवे यही कामना है.

Mired Mirage said...

यदि गालियों का अर्थ सोचने समझने लग जाएँ तो लोग अपने कहे पर लज्जित भी हों परन्तु वे केवल मुँह से अपने अंदर का कचरा बाहर निकाल कर संतुष्ट हो जाते हैं। विडंबना यह कि लड़ाई या प्रेम भरी बातें दो पुरुष करते हैं और गालियों द्वारा घसीटा उसमें सदा स्त्रियों को ही जाता है। उस पर तुर्रा यह कि बहन बेटियाँ भी गाली देने लगें तो कैसा लगेगा? ठीक वैसा ही जैसा आपके मुख कमल से देने पर लगता है। जब गालियां हम पर ही बनी हैं तो हमसे उनसे परहेज की अपेक्षा क्यों?
वैसे बेहतर तो यह होगा कि हम पुरुषों के रंग में रंगने की बजाए पुरुषों को अपने रंग मे रंग दें। बात अति आशावादी तो है परन्तु असम्भव भी नहीं।
घुघूती बासूती

रंजन said...

सही कहा!!

E-Guru Rajeev said...

घुघूती जी से मैं पूरी तरह से सहमत हूँ. महिलाओं को ख़ुद गाली देना सीखने के बजाय पुरुषों को सुधरने का प्रयास करना चाहिए.

श्रुति अग्रवाल said...

सुजाता, गाली कोई भी दे निकृष्ट ही लगता है चाहे फिर वह पुरूष हो या महिला। इसी तरह गाली चाहे हिंदी में दी जाए या इंग्लिश में वाहियात ही लगती है। कभी गंदी सी बस्ती में रहने वाली महिला के मुँह से निकली कर्कश गाली सुनना वह भी भद्दा लगेगा। वहीं बस में चढ़ते हुए पुरूष द्वारा गालियों का प्रयोग भी घटिया लगेगा। कहीं न कहीं आपके अंतरमन को शर्मिंदा करेगा कि हम किस समाज में रहते हैं। मेरे सामने कोई गाली का उपयोग करने की हिमाकत नहीं कर सकता....चाहे फिर वह कोई भी हो। वैसे मेरा ख्याल है कि समाज की मर्यादा बचाना हम महिलाओं की ही जिम्मेदारी है क्योंकि हम सर्जनकर्ता हैं...हम ही नवकोपलों को अच्छाई और बुराई का अंतर समझा सकते हैं। अपने नौनिहालों को समाज में फैली गंदगी के बारे में समझा कर उन्हें भटकने से रोक सकते हैं। क्योंकि गाली कभी भी मीठी नहीं हो सकती...वह हमेशा भद्दी और कुरूप रहेगी...

श्रुति अग्रवाल said...

गंदी बस्ती में रहने वाली महिला का उदाहरण महिला की गरिमा को कम करने के लिए नहीं दिया बल्कि उस परवरिश और माहौल को दिया है जो वह नन्ही कली के रूप में आस-पास देखती है। इसलिए लगता है कि हम महिलाओं का कर्तव्य है कि समाज में फैल रही इस गंदगी को रोके...यदि हमारे बच्चे ही कलुषित होने से बच गए तो धीरे-धीरे पूरा समाज भी बदल जाएगा।

abha said...

श्रुति,आप की टिप्पणी ने बड़ी सहजता से सारी बातें साफ कर दी ।सुजाता की पोस्ट पर श्रुति को बहुत सारा .स्नेह.....

सुजाता said...

वैसे मेरा ख्याल है कि समाज की मर्यादा बचाना हम महिलाओं की ही जिम्मेदारी है क्योंकि हम सर्जनकर्ता हैं...हम ही नवकोपलों को अच्छाई और बुराई का अंतर समझा सकते हैं
श्रुति ,
आपकी और मेरी सोच मे बहुत सी समानताए होते हुए भी इस बात से सहमत नही हूँ।
समाज मे कुछ लोग इस बात का ज़िम्मा लें तो बहुत अच्छा है लेकिन यह ज़िम्मा इस आधार पर ओढा जाए कि स्त्रियाँ हैं ..यह दोगलापन है।
जिस गाली को कोई पिता अपनी बेटी के मुख से नही सुन सकता उसे वह गाली अपने मुख से निकालने का भी कोई हक नही । मेरा इशारा केवल इस ओर है कि गाली कोई भी दे आपकी प्रतिक्रिया वही रहनी चाहिए। कोई लड़का है या पुरुष है इससे उसका अश्लील होना चलता है , लड़की का नही क्योंकि वह लड़की है।यदि गाली मुँह से निकल जाना स्वाभाविक है तो इसका मतलब लड़कियों को आपने कई स्वभाविक अभिव्यक्तियों से वंचित कर दिया है।

गाली का समर्थन मेरा मुद्दा नही। वह पोस्ट मे साफ दिखता है।लेकिन स्त्रियों के लिए महानता की यह ओढी हुई ,ओढाई गयी दलील मुझे मान्य नही।
मेरे लिए सही गलत क्या है अगर यह इस बात से तय होता है कि मै स्त्री हूँ तो मै ऐसी नीति का विरोध करना चाहती हूँ।कितना कर पाती हूँ और मनवा पाती हूँ यह देखना है।

सुनीता शानू said...

सुजाता जी आप बिलकुल सही कह रही हैं, हम महिलायें ही जैसा चाहें अपने परिवार को ढाल सकती हैं, लेकिन इसमे घर के पुरूष वर्ग का साथ बहुत जरूरी है, अगर गाली को हर समय स्वीट डिश की तरह प्रयुक्त किया जायेगा तो एक न एक दिन बच्चों पर असर कर ही देगी, घर में मिले संस्कार और बाहर दोस्तों की बैठक सभी कुछ जिम्मेदार हैं समाज को बिगाड़ने में, हम जानते हैं क्या गलत है क्या सही, मगर हमारे बच्चे जो अभी कच्ची मिट्टी के हैं नही जानते की उन्हे क्या सीखना है, बाहर की गलत हवा न लगे इसके लिये उन्हे उचित मार्गदर्शन माता-पिता से ही मिल सकता है...
औरत के लिये एक और वाणी औरत का शृंगार कहा गया है गाली अभद्रता कही जायेगी...अतः गाली या अपशब्द जहाँ तक हो सके हम औरतों को प्रयोग में नही लाने चाहिये ताकि हम अपने बच्चों को भी उचित सलाह दे सकें...किन्तु कभी-कभी किसी के प्रति आक्रोश में हमारे मुह से भी ऎसे साला या साले शब्द निकल ही जाते है,हम नव वर्ष से यह नियम ले सकते हैं की हम कोई भी ऎसा शब्द किसी और के लिये प्रयोग नही करेंगे जो स्वंय के प्रति न सुन पायें...

सागर नाहर said...

सुजाता
मैं बरसों सुरत(गुजरात) में रहा हूँ, वहां घांची, गोला और खत्री ये तीन जाति की महिलाएं बहुत सहजता से गालियां बोलती है। हाँ, मां बहन सब पर बनी और कई आश्चर्यजनक गालियां भी, जिन्हें में यहां लिख नहीं सकता।
मां अपने बेटे को- बहन अपने पिता तक को!!!!
जब मैं सबसे पहले पहल गया था, कई बार महिलाओं के मुंह से इस तरह गालियां सुनकर बहुत असहज होजाता था, दीप्ती ने बताया उस तरह आपसी बातचीत में लोगों के मुंह से भे.. सुनकर झगड़ा भी हूँ। पर सुरतीलाला इन गालियों को मात्रभाषा मानते हैं।
मैने कहीं गाली के पर्यायवची शब्द के रूप में सुरती सब्द भी पढ़ा-सुना है।

सागर नाहर said...

मातृभाषा*

सुजाता said...

सागर जी ,

सर्वाइवल ऑफ थ फिटेस्ट का सिद्धांत यही कहता है कि मै धीरे धीरे इन सब बातों के प्रति इम्यून हो जाऊँ या इनमें शामिल हो जाऊँ।इम्यून होने का दौर गुज़र गया है ,गुज़र रहा है..अब लड़कियाँ इनमें शामिल हो रही हैं।
बेहतर होगा कि हम सब अपना दोगलापन छोड़कर इन सब बातों को समान रूप से गलत मानें या समान रूप से सबकी अभिव्यक्ति का अंग माने, वर्ना अपनी बेटियों , बहनों ,लड़कियों को कोई ठोस तार्किक वैज्ञानिक कारण दें कि सिर्फ वे ही गालियों का प्रयोग क्यों न करें या उन पर बात तक न करें।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

@वैसे बेहतर तो यह होगा कि हम पुरुषों के रंग में रंगने की बजाए पुरुषों को अपने रंग मे रंग दें। बात अति आशावादी तो है परन्तु असम्भव भी नहीं।
घुघूती बासूती


इस चर्चा की सबसे सार्थक बात यही है।

सुजाता जी,
आपसे यह विनती है कि सभ्यता और संस्कृति के मामले में यदि महिलाओं को पुरुषों से आगे दिखाने वाली कुछ बातें स्वाभाविक रूप से सबके मन में बैठी हुई हैं तो उन्हें ‘दोगलापन’ कहकर गाली की वस्तु न बनाइये।

वस्तुतः यह सच्चाई है कि अश्लील शब्द पुरुष की अपेक्षा महिला के मुँह से निकलने पर अधिक खटकते हैं। केवल हम पुरुषों को नहीं बल्कि असंख्य नारियों को भी। लेकिन मैं इसे दोगलापन कहने के बजाय महिलाओं की ‘श्रेष्ठता’ या पतन की राह में न जाने का सूचक कहूंगा।

स्त्री सशक्तीकरण के जोश में पुरुषों से गन्दी आदतों की होड़ लगाना कहीं से भी नारी समाज को महिमा मण्डित नहीं करेगा। गाली तो त्याज्य वस्तु है। इसमें कैसी प्रतिद्वन्द्विता?

गाली देनी ही है तो गाली को ही गाली दीजिए। :)

सुजाता said...

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी :वस्तुतः यह सच्चाई है कि अश्लील शब्द पुरुष की अपेक्षा महिला के मुँह से निकलने पर अधिक खटकते हैं।
_____
आपकी यह सोच दोगलापन है , आप माने या न माने।गाली की होड़ मेरा मुद्दा नही है , भाषिक व्यंजना को समझने मे आपसे भूल हो रही है । मेरा विश्वास है कि आप पोस्ट को दो बार और पढि ए और फिर मेरे मंतव्य पर बात कीजिए।
सुजाता चाहे न चाहे लड़कियों ने आम तौर पर कुछ प्रयोग करने शुरु कर दिए हैं , जो मुझे साफ दिखते हैं और ऐसा वे
मेरी सोच का अनुसरण नही कर रही हैं। एम टी वी पर रोडीज़ एक उदाहरण है ।वे सहज हो रही हैं , वे श्लील अश्लील के द्वन्द्व से मुक्त हो रही हैं जिसमे आपने सदियों से उसे डाल रखा है।
यह ऑबज़र्वेशन है, समझ है ,आप असहमत हो सकते हैं।आप संस्कृति और सभ्यता की दुहाई दे सकते हैं।पर समाज आपके हिसाब से नही बदलेगा न, न मेरे हिसाब से बदलेगा। मैने ओब्ज़र्वेशन और तर्क के हिसाब से कुछ निष्कर्ष बताए हैं। आप इसके तोड़ के तर्क लाइए कि कोई अश्लील बात पुरुष की अपेक्षा स्त्री के मुख से सुनने से ज़्यादा बुरा क्यों लगता है?आप इसे सहज होकर स्वीकार क्यों नही कर पाते?स्वीकार करें यह मैने नही कहा ।आप अपनी बेटी को जो चाहे वह शिक्षा दें , जब वह बाहर निकलेगी तो बहुत सी बातें स्वयम सीख लेगी, जीना तो उसी ने है दुनिया में।परम्परा के नाम पर ऐसा बहुत कुछ है जो स्त्री के साथ गलत हुआ है और अब उस सब अतार्किक को स्वीकार करने से वह मना कर रही है।आप तर्क दें , मै मानने को तैयार हूँ।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

सुजाता: सबसे पहले एक वस्तुनिष्ठ सच्चाई को मेरी सोच का नाम देकर उसे दोगलापन कहने पर मेरी आपत्ति दर्ज करें। तर्क की बात करनी है तो भाषा में व्यक्तिगत आक्षेप का प्रयोग न करें।

जहाँ तक आपकी वैज्ञानिक तर्कों की कामना का प्रश्न है तो दुनिया खालिस वैज्ञानिक तर्कों पर भी नहीं चलने वाली है। प्रकृति को यदि स्त्री-पुरुष को हूबहू एक समान बनाना होता जैसा कि आप की तार्किकता से प्रसूत इच्छा लगती है तो यह दुनिया ही नहीं बनती। शायद आप स्त्री-पुरुष के बीच अन्तर केवल बायोलॉजिकल मानती हैं। यदि हाँ तो माफ कीजिएगा। मुझे आपसे तर्क करने में कोई रुचि नहीं है।

मुझे तो लगता है कि स्त्री और पुरुष का व्यक्तित्व बिलकुल दो अलग-अलग पैराडाइम में विकसित होता है। वैज्ञानिक इसका कुछ अंश हार्मोन्स के अध्ययन से जान पाये हैं लेकिन पूरा नहीं जान सकते।

मैने तो पढ़ा था कि विकास के प्रारम्भिक चरण में मातृसत्तात्मक समाज का ही अभ्युदय हुआ था लेकिन जनसंख्या बढ़ने के बाद कृषि, पशुपालन और शिकार के लिए पुरुष में शारीरिक शक्ति अधिक होने से नियन्त्रण उसके हाथ में आ गया। इसका दोष देने के लिए आपको प्रकृति को ही दोगला कहना पड़ेगा।

आज सभ्यता के जिस चरण में हम पहुँचे हुए हैं वहाँ पाशविक शक्ति के ऊपर मानसिक शक्ति और समता मूलक मानवीय मूल्यों को अधिक महत्व दिया जा रहा है। इसी लिए अब नारी की खोई हुई गरिमा को वापस स्थापित करने की प्रक्रिया चल पड़ी है। लैगिक समानता और नारी सशक्तिकरण के फोरम को सक्रिय समर्थन देने वाले पुरुषों की कमी नहीं है। लेकिन उस पाशविक विरासत से बहुत से पुरुष (और महिलाएं भी) मुक्त नहीं हो पाये हैं।

गाली का प्रयोग पाशविक सभ्यता की विरासत है। जैसे बलात्कार और एकाधिक औरतों के साथ संसर्ग की छूट। इसमें नारी की मजबूरी का शोषण था। लेकिन आज यदि सुजाता यह तर्क दें कि महिलाओं को भी पुरुषों का बलात्कार करने और एकाधिक पुरुषों के साथ संसर्ग करने में सहज होना चाहिए और कुछ नई लड़किया सहज हो भी रही हैं तो मुझे तकलीफ ही होगी। आप इसे दोगलापन कहें तो मुझे आपकी सोच पर भी दया ही आएगी। भले ही मैं आपके मीनू के हिसाब से वैज्ञानिक तर्क न दे पाऊँ।

स्त्री सशक्तिकरण के अनुष्ठान में इन बुराइयों को दूर करने पर बात होनी चाहिए न कि इस घटिया विरासत में बराबर की हिस्सेदारी की। ऐसी सोच तो असल समस्या को समाप्त करने के बजाय उसका प्रसार करेगी।

जहाँ तक समाज को बदलने में हमारे या आपके योगदान का प्रश्न है तो मुझे कोई मुगालता नहीं है। लेकिन अच्छे विचार आगे बढ़ें और घटिया बातों का शमन हो इसका प्रयास प्रत्येक जिम्मेदार और उन्नत सोच वाले व्यक्ति को यथासामर्थ्य करना चाहिए।

सुजाता said...

सिद्धार्थ जी

आप पोस्ट का तात्पर्य सिरे से ही गलत समझ रहे हैं और मै आपसे किसी तरह सहमत नही हो पा रही हूँ । बहुत सम्भव है कि आप और मै अलग अलग कोण से फलक को देख रहे हैं ,हम दोनो ही अलग अलग भूमि पर खड़े होअकर बात कर रहे हैं और स्त्री विमर्श से जुड़ी अधिकांश बातों पर ऐसे ही बवाल हुआ करते हैं ।सीधी बात यह है कि जब आप स्त्री विमर्श से जुड़े किसी लेख को पढते हैं तो आप उसे एक तयशुदा फ्रेम मे देखते हैं,और हमारी दिक्कत यह है कि जब तक आप चोखेर बाली को देखने समझने के लिए एक वैकल्पिक सौन्दर्य दृष्टि या आलोचना दृष्टि नही लायेंगे तब तक आप यही सोचते रहेंगे कि सुजाता या अनुराधा या वन्दना या कोई भी चोखेर बाली समाज को तोड़ने और स्त्री के निरंकुश ,बदतमीज़,असभ्य हो जाने की पक्षधर हैं।
यह स्त्री विमर्श की नियति है , इसमे आपका दोष नही। यह वाकई दयनीय है कि मैने यहाँ जो कुछ भी कहा उसके केन्द्रीय भाव तक काफी कम लोग पहुँच पाए।और यह भी दयनीय है कि आप ऐसे निष्कर्षों ---" लेकिन आज यदि सुजाता यह तर्क दें कि महिलाओं को भी पुरुषों का बलात्कार करने और एकाधिक पुरुषों के साथ संसर्ग करने में सहज होना चाहिए और कुछ नई लड़किया सहज हो भी रही हैं तो मुझे तकलीफ ही होगी " तक पहुँच पाए।

सुजाता said...

दुखद यह भी है कि मेरी चेतावनी तक को आपने नज़र अन्दाज़ कर दिया। मान लीजिए आपके सामने लड़कियाँ फटना-फाड़ना जैसे प्रयोग सहज हो कर कर रही हैं तो आप क्या केवल दुखी होकर ,क्या ज़माना आ गया है कहते हुए निकल जायेंगे ? या कान मूंद लेंगे?
मै चाह रही हूँ आप न कान बन्द करें , न दुखी हों , न दिल पर हाथ रखे ज़माने को कोसें ...
आप इसके कारणो6 को समझने का प्रयास करें और उन्हें दूर करने का प्रयास करें । मै चाहती हूँ कि आप लक्षणों का इलाज न करें । आप जड़ को खत्म करने का प्रयास करें । आपके कहे अनुसार जो घटिया विरासत पुरुषों के पास है उसे "घटिया" मानते हैं तो नष्ट भी कर दीजिए बजाए इसके कि उसकी तरफ न झाँकने से बेटियों,स्त्रियों ,लड़कियों को यह कह कर रोकते रहिए कि -यह तुम पर शोभा नही देता क्योंकि तुम लड़की हो।

Shashwat Shekhar said...

सुजाता जी मैं आपकी बातों से सहमत हूँ की ठेका महिलाओं ने नही ले रखा, लेकिन माँ, बहन, बीवी बनने का ठेका जरूर ले रखा है|
सिद्धार्थ जी ने बिल्कुल सही कहा, "मुझे तो लगता है कि स्त्री और पुरुष का व्यक्तित्व बिलकुल दो अलग-अलग पैराडाइम में विकसित होता है।"
बराबरी करनी है किसी सुसंस्कृत मुद्दे पर करनी चाहिए|

KK Yadav said...

बड़ी खूबसूरती से विचार व्यक्त किये गए हैं. कभी मेरे शब्द-सृजन (www.kkyadav.blogspot.com)पर भी झाँकें !!

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

एक रस्सी को पकड कर दो आदमी खीचते है। एक इघर तो दुसरा उधर। परिणाम क्या होता है ? रस्सी तुटती है । दोनो ही गिर जाते है। खिचाव करने वाला अर्थात गिरनेवाला। जो खिचाव को मिटाता है वह अपने को गिरने से उबार लेता है। विचार सप्रेषण का सर्वाघिक शक्तिशाली ओर व्यापक माध्यम है शब्दः सही अर्थ मे प्रयुक्त शब्द क्रान्ति को जन्म देता है। गलत अर्थ से प्रयुक्त शब्द भ्रान्ति को जन्म देते है। कुछ शब्दो का प्रयोग व्यापक स्तर पर भ्रान्ति पैदा कर रहे है। जैसे गालि-अपशब्द बदनाम पुरुषप्रधान समाज और नारी जगत मे गालियॉ देने का अधिकार किसे ?

अपशब्द के मुल मे प्रस्थीतियो को समझना होगा:-

१ पृकति का नियम

२मान्यता

३ विश्वास

४ सामाजिक आधार

५ शिष्टाचार

५ रीति-रिवाज

६ सामाजिक नियम

७चरित्र

८समाजिक मत आर्थि स्थीति आदि आदि

गालियो का कालत्रृमिक इतिहास है।

राजस्थान सहित कई राज्यो मे विवाह मे स्त्रियॉ सामुहिक रुप से गॉलियॉ गाती है। यह सामाजिक कुप्रथा सदियो से चली आ रही है।आज भी गॉवो मे अशिक्षा के चलते यह प्रथा चलती है। उत्तर भारत सहित कई प्रान्तो मे होलि के समय महिलाये फागणियॉ गीतो मे भद्दी भद्दी गालियॉ देती है यह एक कुप्रथा है। जहॉ देश मे कई तरह कि सस्कृतियो का सगम है तो वहा यह भिन्ता होनी ही है। इसे नये जमाने के लोग अशिक्षा का प्रभाव मानते है। भारत के गॉवो मे कई जातियो कि औरते बिडी, तम्बाकु, शराब का सेवन करना वर्षो पुराना इतिहास है। दुसरी ओर वर्तमान मे शिक्षित लड़कीयॉ शहरो मे पब मे शराब, नशा, घुम्रपान, अफिम का सेवन करती पाई गई। मुम्बई जैसे शहरो मे लडकियॉ खुले आम सडको पर सिगरेट का सेवन करती है। तो क्या पुरुष प्रधान सस्कृति कि बराबरी के लिये इस तरह कि बॉतो को कोनसे तर्क से सही ठहरायॉ जा सकता है। दुसरी बॉत के पुरुष द्वारा गॉलि गलोज को भी सही नही ठहरायॉ जा सकता है। गलत बात पुरे समाज के लिये सही नही है। चाहे नर हो या नारी। भारत देश मे विभिन्न जातियॉ, सस्कृतियॉ, रितिरिवाज बसते है। रबारी जाति महिला प्रधान है। उनकि ओरते समस्त आर्थिक पहलु को अपने हाथ मे रखती है । एक अन्य जाति मे शादी के बाद ससुराल मे जाकर पुरुष को जीवन बिताना पडता है। पुरुषो कि बराबरी करने मे नारी जगत कही अपने बच्चो का आने वाला भविष्य तो दाव पर नही लगा रही है। एक सर्वे के अनुशार पिछले कुछ वर्षो मे भारत मे तलाक के मामलो मे ५२% का इजाफा हुआ। कारण नारी का अघिक शिक्षत होना। कारण महिलऔ कि उच्च शिक्षा और नोकरियो द्वारा आर्थिक सम्पनता। अपने नोकरी या व्यापर कि वजह से महिलायो कि गृहस्ती बसने के पहले ही उजड जाती है। पश्चिम के देशो से बतर हालत अपने परिवारो के होते जा रहे है। ईस तरह कि लडाई से महिला क्या हासिल पायेगी, या पुरुष के हाथ क्या आयेगा ? समय रहते अगर सामाजिक ढासे मे सुधार नही हुआ तो बच्चे जन्मते ही कान्वेन्ट मे डालने पडेगे। (ईग्लेण्ड मे अनाथलय अर्थात कोनवेन्ट स्कुले) वहॉ यह स्कुले सरकारी मदद से चलती है जहॉ शादि के एक दो शाल मे तलाक हो जाता है ओर नवजात शिशु को अनातलाय यानि कोनवेन्ट मे डालाना पडता है) मैकेले ने भारत मे राजारॉय मोहन कि मदद से भारत मे गुरुकुलो को बन्द करवाकर कॉनवेन्ट प्रथा लाई।)

गालि एक बुरी बात है भले नर दे या नारी।

गान्घीजी के बन्दरो ने कहा था उसे समझो

"बुरा मत कहो,

बुरा मत सुनो,

बुरा मत बोलो।"

" स्त्री-पुरुष दोनो को यह बात समझनी पडेगी। TRP के चक्र से बचना हि होगा, नही तो आने वाला भविष्य हम सभी के लिये खराब है।

सुजाता said...

गालि एक बुरी बात है भले नर दे या नारी।
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हाँ बहुत देर से इसी पर तो बहस है सारी की सारी कि आप स्वीकारे कि गाली वाहियात चीज़ है तो दोनो के लिए है , यह क्या कि आप गालियों को प्रिसर्व भी करते जाते है और उसे वाहियात चीज़ कहकर यौनिकता पर आधारित उन्हीं गालियों को उन्हीं के मुख से सुनकर ज़माने की नई चाल पर आहत भी होते जाते हैं!यह दुख मनाना ,आहत होना यही दोगलापन है।
और एक सार्वजनिक मंच पर पॉलीटिकली करेक्ट साबित होने के चक्कर मे कुछ लोग यदि यह कह रहे हैं कि गाली बुरी चीज़ है -तो यह और भी बुरा कर रहे हैं।
गाली अगर बुरी बात है तो दोनो के लिए , अभिव्यक्ति और सहजता के लिए है तो भी दोनो के लिए।आप यह न कहें कि क्योंकि पुरुष तो होता ही वाहियात है इसलिए कम से कम आप वाहियात न बनें ,हम सह नही पाएंगे..यह बात तर्क से परे है।
गाली देने का अधिकार किसे है - यह प्रशन ही नही है।और यह बात आपने स्वीकार कर ली है कि गालि एक बुरी बात है भले नर दे या नारी।
धन्यवाद !

सुलभ [Sulabh] said...

इस पोस्ट में सुजाता जी ने महिलाओं (बेटियो, बहनों) द्वारा पुरुषों के किसी भी कृत्य(अच्छे अथवा बुरे) की बराबरी करने की वकालत नही की है. दरअसल इसके मूल में मुद्दा यही है की समाज के लोगों (पुरूष महिला दोनों) द्वारा महिलाओं (बेटियो, बहनों) के मामले में अपनाया गया नजरिया, द्विधारी दृष्टिकोण (या दोगलापन) क्यों है. "क्या महिलाओ ने ही तमीज का ठेका ले रखा है...." ये शब्द नारि जाती को एक निश्चित दायरे में रखने के प्रयास के फलस्वरूप उत्पन्न क्रोध एवं अपमान के कारण स्वतः बाहर आये हैं. इसका यह मतलब लगाना ठीक नही की सुजाता या उस जैसी अन्य महिलायें समान लैंगिक विकास की दौर में पश्चंधता की समर्थक है.

जैसा की सिद्धार्थ त्रिपाठी जी ने कुछ मौलिक प्राकृतिक एवं निरंतर बदलते सामाजिक संरचनागत अंतरों की तरफ़ इशारा किया है इससे हम भी इत्तेफाक रखते हैं और मानते हैं की कुछ जिम्मेदारियों (जैसे एक माँ के रूप में संतान को सदैव सभ्य शब्दों का प्रयोग करना सिखाना, विपरीत लिंगो के प्रति कैसा हो आचरण आदि बातें शामिल हो सकती हैं) को महिलायें बेहतर निभा सकती हैं और कुछ जिम्मेदारियों (जिसमे आर्थिक सामाजिक उन्नति के लिए कठोर श्रमसाध्य कार्य/हल-बैल आदि शामिल हैं) को पुरूष के हाथों में छोड़ना युक्तिसंगत होगा.

हमारे गाँवो में आज भी नवजवान बेटे लालटेन की रोशनियो में मोटे किताब पढ़कर परीक्षा में पास होते हैं और बेटियाँ हलके रौशनी में श्रृंगार कर पड़ोस के विवाह कार्यक्रमों में पुरी कुशलता के साथ पचीसियो लोगों को अपने हाथो से व्यंजन बना खिलाती है. कुछ पढ़ी लिखी आधुनिकायें यदि अमीरी गरीबी का भेद किए बिना यहाँ भी नारि के ऊपर अन्याय को रेखांकित करती हैं तो मुझे कोई आश्चर्य नही होगा.

नारी सशक्तिकरण के लिए उठाया गया कोई भी मुद्दा उस देश/समाज में तब तक अधूरे हैं जब तक वहां अशिक्षा एवं गरीबी का समूल नाश न हो जाये. और यदि इसके बाद भी "हम एक दुसरे से कम नही.." के मुद्दे पे लडेंगे तो जाहिर है टकराव तो होगा ही और टकरावों के बीच अन्याय/अत्याचार भी होंगे. आज यही सब पश्चिमी/ विकसित देशों में देखने को मिल रहा है. जहाँ एक तरफ़ बच्चों का नैन्नी/बेबीसिटर या कॉन्वेंट के हाथो पालन पोषण हो रहा है तो दूसरी तरफ़ युवाओं की उश्रिन्खलता एवं वृद्धों का एकाकीपन उस समाज का लिए अभिशाप सा बन गया है.

आज जब मैं किसी विकसित सभ्यता के चमचमाती तस्वीरों को देखता हूँ तो ये पंक्तियाँ सहज ही याद आ जाती है - इस दौर-ऐ-तरक्की के अंदाज निराले हैं. जेहन में अंधेरे और सडको पे उजाले हैं.

बहरहाल चोखेर बाली के इस मंच पर सार्थक बहस जारी रहनी चाहिए.

- सुलभ ( यादों का इंद्रजाल )

सुजाता said...

सुलभ जी ,
सहमत हूँ कि अशिक्षा और गरीबी के उन्मूल हुए बिना कोई सुधार पूरी तरह नही होगा।

लेकिन हम गौर से सोचें कि दो लोगों के बीच जब एक ही चीज़ के लिए द्वन्द्व होगा तो वह कटु ही होगा।स्त्री को अपना स्पेस चाहिए , पुरुष अपना छोड़ने को तैयार नही । निश्चित रूप से एक का दायरा बढेगा तो दूसरे का ज़रा सा सीमित भी होगा।
यदि मै अपने वर्किंग आर्स मे छूट लेती हूँ तो निश्चित रूप से घर परिवार के लिए पति को अपने घर से बाहर बिताने वाले समय को सीमित करना पड़ेगा।ऐसे मे यदि वह अड़ा रहे कि मै पुरुष हूँ मेरा आना जाना कैसा बन्धा हो सकता है , या घर बार देखना मेरा कम नही तो ...क्लेश होगा ही।ऐसे मे समाज स्त्री को ही चुप करा कर पीछे खदेड़ेगा। और स्त्री कुण्ठित होगी।आक्रोश पैदा होगा।
क्या ऐसे मे एक स्वस्थ सम्बन्ध पनपना सम्भव है?
क्या इस स्थिति का समाधान "ऐसा होता आया है या ऐसा कभी नही हुआ" वाले कुतर्क के आधार पर कभी भी किया जा सकता है?
बोलने मे अधिकांशत: पुरुष ने आज तक शालीनता और लोकतांत्रिक मूल्यों को प्राथमिकता पर नही रखा , इसलिए अब ज़माना बदल रहा है तो वे इस बात पर तिलमिलाएगा ही कि अपनी ज़बान पर लगाम लगाना पड़ रहा है।आपका भाषिक स्पेस स्त्री की बदलती छवि से सीमित हो रहा है , इसे स्वीकारने मे सामनतवादी नज़रिये के कुछ लोगों को अभी भयंकर परेशानी है।

AMAR said...

बेहूदा बातों में ऊर्जा और समय का अपव्यय करके ब्लागिंग से कुछ हासिल नहीं हो सकता, सिवाय टिप्पणियों में चंद इज़ाफ़े के । अश्लील लगने वाले मुद्दे यहाँ उठाने से कूछ हासिल नहीं होता .. क्योंकि अभी आर्कुट इफ़ेक्ट से लोग उबर नहीं पाये हैं ! ऎसी पोस्ट को नज़र अंदाज़ कर के ही ऎसे बेहूदे बहस से छुटकारा पाया जा सकता है ।
खुले आम रस ले ले की गई बहस कतिपय छिछले-चरित्र तत्वों को बढावा ही देती हैं, ऎसा मेरा सोचना है ।