Sunday, March 30, 2008

इनसान बनने से पहले औरत का अफसाना कैसे बन गया !!

सपना चमड़िया
"ज़िन्दगी का अनुवाद "
तीसरा भाग

मेरे घराने की एक महिला के बारे में बताऊँ-उन्हें रात से डर लगता है ।रात होते ही उन्हें बेहद घबराहट होने लगती है। वे कहती हैं -"मुझे अपने कमरे में जाने से डर लगता है,ऐसा लगता है किसी काली ,अन्धेरी गुफा में घुसती जा रही हूँ और मन ही मन सोचती हूँ कि अज की रात बच जाऊँ। पर नहीं जब से यह बेगार का पट्टा गले में पड़ा है-रात-दिन क भेद मिट गया है । सुबह पाँच बजे जब मुर्गे,गधा,कुत्ता,बैल,गाय,पखेरू उठते हैं तभी मैं भी उठ जाती हूँ और फिर दिन भर कभी इस पैर कभी उस पैर पर नाचती हूँ ।कभी मालिक का, कभी उस के बच्चों का ,कभी उसके रिश्तेदारों का हुक्म बजती दौड़ती फिरती हूँ । एक ही दिन में कई बोलियाँ बोलती हूँ बदल -बदल कर और सच मानिए एक ही दिन में कई जून भुगतती हूँ।जल्दी सुबह उठती हूँ मुर्गे की तरह , काम में मुझे गधा या बैल समझो,खाने में कुत्ता,सीधेपन में गाय और रात होते होते मुझे एक खूबसूरत परी में तब्दील हो जाना पड़ता है जो मालिक का हर सही गलत हुक्म बजा लाने का हुनर जानती हो। "
मैं जब भी अपने बारे में कुछ कहने लगती हूँ मेरे घराने की कोई न कोई औरत मेरे सामने आ कर खड़ी हो जाती है। पहले मुझसे झिझकती है ,दस-पन्द्रह मिनट तक अपने मालिक के बारे में बेहद प्रशन्सा से भरे हुए शब्द उच्चारती है। अपने आप को दुनिया की सबसे सुखी औरत साबित करने की पुरज़ोर कोशिश करती है। इसी बीच मैं धीरे से उसका हाथ पकड़ लेती हूँ और जब मेरे हाथों का कड़ापन,रूखापन यह बता देता है कि मैं भी उसी की तरह न्यूनतम मज़दूरी भी न पाने वाली बेगारों की परम्परा में आती हूँ तो अचानक वोह अपना नकाब उतार फेंकती है और मुझसे कहती है-मेरी कहानी लिखोगी ?
मुझे सोचना होगा,जानना होगा और लिखना होगा कि इनसान बनने से पहले औरत का अफसाना कैसे बन गया !!

मुझे मालूम है कि मैं जो कुछ लिख रही हूँ उसमें कोई तरीका ,कोई सिलसिला नहीहै । बस यूँ ही कुछ इधर से उठाया कुछ उधर से , जैसा जो याद आता गया बस वही कागज़ पर उतार दिया ।दर असल वक़्त मेरे साथ नही चलता , मुझे भाग भाग कर वक़्त को पकड़्ना पड़्ता है औत तब भी पूरा वक़्त कभी मुझे मिला नही बल्कि एक नज़र भर भी मैने उसे नही देखा ।मेरे कई परिचितों ने शिकायत की कि मैं जब भी फोन उठाती हूँ-ऐसा लगता है कि कहीँ से भाग कर आ रही हूँ, आवाज़ हमेशा हाँफती हुई होती है ।शायद वे हैरान होते हैं कि तीन कमरों में ऐसा क्या है जो मैं पकड़ना चाह्ती हूँ ,क्यों मैं हाँ रही हूँ । मैं जानती हूँ मुझे किस चीज़ की तलाश है, यह कौन सी यात्रा है जिसे वर्षॉ से सदियों से चलते रहने के बावजूद वह मुकम्मल नही हो पायी है।घट के भीतर भी -घट के बाहर भी यह यात्रा भी सिलसिलेवार नही है-इसमें कोई तरीका नही है,इसलिए मेरे लिखने मे कोई तरीका नही है ।मेरे पास जो है वो पूरा नही है इसलिए जो कुछ मैं लिख रही हूँ वह आपको रुक कर टुकड़ों को जोड़ कर पढना पड़ेगा।जब मुझे ही कुछ पूरा नही मिला तो आपको पढने के लिए एक पूरी सुविधाजनक कथा कैसे दे सकती हूँ !


पहला अंश
दूसरा अंश

Saturday, March 29, 2008

द वूमन्स वर्क इज़ नेवर डन

व्यक्तिगत रूप से मैं ट्रेसी चैपमैन का बहुत बड़ा प्रशंसक हूं। पिछले बीस-तीस सालों में विश्व के संगीत-संसार में उभरी सबसे मीठी और सजग आवाज़ों में एक आवाज़ है ट्रेसी की। प्रेम को पूरी ईमानदारी से निभाने वाली स्त्री को मिलने वाले छलावे और दर्द को ट्रेसी अपने ज़्यादातर गीतों का विषय बनाती हैं। आम तौर पर बाकी गानों में इस थीम पर बहुत हायहाय करने का रिवाज़ है। ट्रेसी चैपमैन के यहां प्रेम में हार पाई औरत कोई दयनीय नायिका नहीं होती; वह उतनी ही संवेदनशील बनी रहती है और तार्किकता की सान पर बीते समय को परखती है और पहले से अधिक मजबूत बन कर बाहर आती है।




आज जो गीत मैं इस ब्लॉग पर अपनी पहली पोस्ट के तौर पर लगा रहा हूं, उस के लिए इस से बेहतर प्लेटफ़ॉर्म और कहां मिलेगा। (यह बार दीगर है कि इस गीत को कुछ माह पहले कबाड़ख़ाने पर लगाया जा चुका है। लेकिन तब तक इस तरह का कोई और कम्यूनिटी ब्लॉग नहीं था।) मुझे आशा है मैं शीघ्र ही ट्रेसी के नए अल्बम 'टैलिंग स्टोरीज़' से जल्द ही आपको कुछ और संगीत सुना सकूंगा।

गीत के बोल देखिए:

Early in the morning she rises
The woman's work is never done
And it's not because she doesn't try
She's fighting a battle with no one on her side

She rises up in the morning
And she works 'til way past dusk
The woman better slow down
Or she's gonna come down hard

Early in the morning she rises
The woman's work is never done

मुझे बेगार की परम्परा बदलनी होगी

सपना चमड़िया

अब तो इस काम में मैं इतनी निपुण हो गयी हूँ और ऐसी आदत पड़ गयी है मुझे इस काम की कि अगर आप नीन्द में भी उठा कर मुझसे पूछे कि-भिंडी को कैसे छोंकना है तो मैं तुरंत जवाब दूंगी कि"मेथी दाने से" मुझे इसके लिए कुछ सोचना नही पड़ेगा। मैं कितनी ही दुख तकलीफ में क्यों न रहूँ मेरे हाथ अनायास काम करते रहते हैं और मेरे दुखों का असर मेरे बेगार पर कभी नही पड़ता ।बल्कि सच यह भी है कि मुझे अपने काम से प्यार हो गया है-सुनकर बहुत सदमा लगा न ! आपने सोचा होगा कि मैं इस बेगार से सिर्फ नफरत ही करती हूँ और यही यहाँ पर बताना चाहती हूँ। लेकिन मैं जो प्यार की बात कर रही हूँ यह और भी हैरत की और खतरनाक बात है। मैं जब इस घर में नयी नयी आयी तो इस बेगार से मेर आत्मीय सम्बन्ध स्थापित नही हो पाया था-मेरे हाथ से अक्सर बर्तन छूट जाते,कभी झाड़ू फिसल जाता और कभी-कभी तो मैं ही गिर पड़ती।सामने होती मालिकों की एक पूरी जमात जो मेरे बाज़ार जाने पर या किसी रिश्तेदार के यहाँ जाने पर मेरे खिलाफ पंचायत बिठाती और निर्णय सुनाती, फतवे जारी करती। जब मैं वापस लौटती तो मुझे हमेशा घर का माहौल कुछ घुटा ,कुछ कसा ,कुछ बदरंग -सा लगता और मालिकों के मुँह कुछ सूजे हुए दिखते ।
पर सबसे ज़्यादा हैरत की बात है कि इस पूरी बेगार-परम्परा को मैंने जल्द ही आत्मसात कर लिया-ठीक वैसे ही जैसे चिड़िया का बच्चा उड़ना सीख जाता है,साँप का बच्चा काटना ,फूल खिलना ,गरमी के बाद बारिश का आना ।ठीक ऐसे ही औरत की बच्ची ने बेगारों के रजिस्टर में अपना नाम लिखवा लिया। इस रजिस्टर के बारे में तो आप जानते ही होंगे न ,जिसमें अंगूठा लगवाया जाता है 500 की रकम पर पर मिलते हैं सिर्फ 50 रुपए ।
मुझे शर्म आती है यह सोचकर कि मैं खुद भी कितनी उतावली थी इस बेगार की परम्परा में आने के लिए।नए कपड़े ,नए गहने खरीदना,नए घर की कल्पना में डूबे रहना,फिजूल की हँसी-ठिठोली । दुनिया के और रंग मुझ पर खिलते-खुलते उससे पहले ही गहरे लाल रंग नें मुझे ढांक -छिपा लिया।मेरे घराने की कोई सुखी-सम्पना महिला बहुत बेज़ार और दुखी होकर कभी-कभी अपने इमिदियेट मालिक का नाम लेकर कहती है -कि हे प्रभु ,मुझे अगले जनम में न तो इस घर की बहू बनाना न ही इस आदमी की पत्नी ।और मैं सोचती हूँ कि-इस घर या उस घर, यह आदमी या वह आदमी-बहू बनना,पत्नी बनना या बिना सम्पूर्ण तैयारी के माँ भी बनना कोई बड़े सौभाग्य की बात नही है ।आज अपने वक़्त में,अपनी कलम से मैं जो लिखूंगी -सच लिखूंगी। मैने कई बार इन मालिकों के साम्राज्य में रहते हुए सोचा कि कहीं मैं अपना मालिक बदल लूँ.....मैंने खुली आँखों से कल्पना की और अंतत: ईमान से कहती हूँ मैने अपने आप को वहीं पाया-वही घुटी हुई रसोई,वही बिस्तर ,वही बेगार,वही दिन-रात ।मुझे लगने लगा कि मालिक बदलने से कुछ नही होगा,मुझे बेगार की परम्परा बदलनी होगी


"ज़िन्दगी का अनुवाद" -दूसरा अंश

Friday, March 28, 2008

मेरी कलम चोरी हो गयी ........


सपना चमड़िया

मेरे घराने की उन नैतिक , पवित्र ,सुन्दर ,सुघड़ औरतों को बस पंख मिल जाएँ................इस कामना के साथ.....


अक्सर मेरी कलम चोरी हो जाती है और हैरत की बात है कि चोरी घर में ही होती है । बहुत बार मैं नयी कलम ले कर आती हूँ लेकिन फिर वही हादसा होता है ।कलम की चोरी ।अगर कभी मिल भी जाती है तो बिल्कुल खाली ,उसके लिखने की क्षमता बिल्कुल खत्म।ठूँठ सी खाली कलम कभी मुझे देखती है और मैं उसे । जी करता है किसी और की कलम चुरा लूँ,लेकिन दूसरे की कलम से अपनी बात कैसे कहूँगी । मुझे तो मेरी कलम चाहिये ,मुकम्मल ।
फिर सोचती हूँ कलम की सलमती हासिल कर भी लूँ तो मेरे पास अपना मुकम्मल वक़्त कहाँ है। कुछ लिखने के लिए कलम मिल भी जाए तो भी वक़्त तो चुराना पड़ेगा-कभी यहाँ से ,कभी वहाँ से और चुराया वक़्त मेरे मुकम्मल वक़्त के आड़े आयेगा । मैं लिखना कुछ चाहूँगी वक़्त कुछ और लिखवायेगा। मुश्किल है मिलना, पूरा वक़्त और सलामत कलम ।
बड़ी हैरत की बात है न कि मेरा वक़्त और मेरी कलम दोनो चोरी हो गये ।यहीं ,इसी जगह,इस तीन कमरों के घर में ,आप लाख चाहें तो भी इसे ढूँढ नही पायेंगे ।लेकिन ऐसे हैरतंगेज़ कारनामे मेरे साथ होते रहते हैं ठीक उसी तरह जैसे बराबरी के झाँसे में आकर औरतें घर से बाहर निकलती हैं और कई तरह के बलात्कार का बोझ लिये घर लौट आती हैं। घर में तो बलात्कार पुरानी आदत बन चुकी होती है ।अगर आप मेरा जीवन उठा कर देखें, हालाँकि वह भी कोई सही -सलामत चीज़ नही है,इसलिए उसे भी इधर-उधर कईं जगहों से उठाकर जोड़-जाड़कर देखना पड़ेगा ,तो ऐसे हैरतनाक वाकयों से भरा पड़ा है मेरा जीवन ।
और वक़्त बिल्कुल नही है मेरे पास । पेशे से मैं एक बेगार औरत हूँ ।25 साल तक मुझे बाकायदा सिलसिलेवार ट्रेनिंग दी गयी बेगारी की और फिर एक बड़े से समारोह में मुझे मेरे मालिक को सौंप दिया गया।दस-बारह साल से निरंतर ,बिना रुके,बिना थके एक ही तरह के काम में मसरूफ हूँ और धीर-धीरे उसी एक काम में निपुणता हासिल करती जा रही हूँ । दर असल जिस घराने से मैं ताल्लुक रखती हूँ उसमें सदियों से यही काम होता आ रहा है। मेरे घराने को आपको थोडा समझना होगा ।मेरी दादी- नानी और माँ तो इसमें आती ही हैं लेकिन मेरी सास का भी घराना यही है ।हाँ ,मेरे मालिक का घराना अलग है ।वही । जिसमें मेरे पिता और ससुर एक साथ आते हैं ।उनके घराने में ज़बर्दस्त एकता है -मसला कोई भी हो सब एक स्वर में बात कहते हैं और भाषा भी एक -सी है। बल्कि गड़बड़ी इधर से ही होती है ,मेरे घराने से , बार-बार यही लोग पाला बदल लेते हैं और हर मुद्दे पर "उनके" साथ हाँ जी हाँ जी करते नज़र आते हैं ।मैने कई बार इन्हे लामबन्द करने की कोशिश की पर अब तक नाकाम! वरना अगर हम मिलकर अपनी बात कहते तो कम से कम हमारी न्यूनतम मज़दूरी तो तय हो जाती !
हाँ ,तो बात हो रही थी मेरे वक़्त की जो कि मेरे पास नही है क्योंकि पेशे से मैं बेगार हूँ । एक बेगार के पास अपना कोई वक़्त नही होता । मालिक को इख्तियार है कि वो जब चाहे मुझे काम में झोंक दे ।

"ज़िन्दगी का अनुवाद "से पहला अंश ।



सपना जी दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन करती हैं । प्रबुद्ध लेखिका हैं ,कवयित्री हैं ।इसके अलावा भी उनका एक परिचय है जिसे बताना ज़रूरी नही क्योंकि उसका अनुमान लगा लिया गया होगा ।महत्वपूर्ण यह है कि उनकी स्त्रीवादी सोच किताबी न होकर जीवन के साथ -साथ परिपक्व हुई है और अपने आस-पास जो भी कुछ उन्होने देखा समझा उसे विचार में बान्धने की कोशिश की है । जब भी उन्हें विषय अवसर देता है, वे अपनी कक्षाओं में स्त्री-विमर्श के लिये सहजता से जगह बना लेती हैं ।
डॉ.सपना चमड़िया की डायरी के अंश हम सिलसिलेवार प्रकाशित करेंगे ।यह डायरी उन आपबीती और जगबीती अनुभवों के अधार पर लिखी गयी है जिन्हें विचार की आंच में पकाया गया है । इसमें निजी कुछ नही है ,सब सांझा है ,हम सबका भोगा हुआ । बस उसे शब्द मिल गये हैं ।जब मैने आरम्भ के 3-4 पृष्ठ पढे तो लगा मेरी-सी बातें सपना जी की कलम से लिखी गयी हैं ।अपने लिए मुझे भी वक़्त चुराना पड़्ता है ,पर अपने मुकम्मल वक़्त की ख्वाहिश बरकरार है ,आखिर चोरी में छुपा ग्लानि भाव भी तो लेखन के आड़े आता है । आभा भी कुछ ऐसा ही कहती हैं -कि मेरा घर ज़रूरी है या ब्लॉग का "अपना घर"................घरबारी रहते हुए स्त्री के लिए "लिखना "{या पढना या गृहस्थी के अलावा कोई काम ,नौकरी भी आजकल गृहस्थी के लिए ही है }इतना दुश्कर क्यों है ?

Tuesday, March 25, 2008

दो घटनाएँ

कल रात अचानक दो घटनाएं के बारे में जानकारी मिली जो अब तक दिमाग को झकझोर रही हैं। यमुनानगर में एक युवती को शादी के सिर्फ नौ दिन बाद मौत के घाट उतार दिया गया। वो भी इतनी बेदर्दी से , कि उसकी लाश रेलवे ट्रेक पर कई टुकड़ों में मिली। शादी के बाद आमतौर पर दुलहनों द्वारा पहने जाने वाले चटख रंगों की ही तरह इस नई बियाही ने भी सुर्ख रंग का जोड़ा पहना हुआ था, जो उसकी मौत के बाद खून के रंग के साथ मिलकर थोड़ा ज्यादा सुर्ख हो गया था। उसके हाथों पैरों की मेहंदी पर लगा खून उसके साथ जो हुआ होगा उस कहानी को बयां कर रहा था।
बताया जा रहा है कि इस दुलहन से उसके ससुराल वाले दहेज की मांग कर रहे थे। उनकी मोटरसाइकिल और सोने की मांग पूरी नहीं हो पाई थी, इसलिए प्रताड़ना का दौर शादी के बाद से ही शुरू हो गया था।
दूसरी घटना यमुनानगर से कई सौ किलोमीटर दूर की है, बलिया में एक युवती को उसके ससुराल वालों ने रातभर पीटा। पीटने पर भी उनका गुस्सा शांत नहीं हुआ तो उन लोगों ने सुबह मुंहअधेरे पहली मंजिल से नीचे फेंक दिया। उसकी भी गलती यही थी कि उसके मां-बाप उसके ससुराल वालों की आशा के अनुरूप दहेज नहीं दे पाए थे।
पहली मंजिल से गिरने के कारण उस लड़की के हाथ-पैर टूट गए। उसके सिर पर गहरी चोट थी और कई हड्डियां टूट चुकी थीं। पूरा शरीर पट्टियों में लिपटा था। बताया जाता था कि ये युवती तो गर्भवती भी थी। उसके ससुर खुद डाक्टर हैं जो सास के नाम पर अस्पताल चलाते हैं लेकिन साधारण घर की बेटी की सुन्दरता तो उन्हें भा गई लेकिन बेटे का दाम सही नहीं मिलने का गुस्सा ज्वालामुखी के रूप में उस लड़की पर फूटा। जो उसकी जान का ही दुश्मन बन बैठा।
दोनों घटनाएं बहुत दूर की हैं और उनमें आपस में कोई जुड़ाव भी नहीं है लेकिन दोनों में एक समानता है- ससुराल में प्रताड़ना। ये सोच कर ही दिल दहल जाता है कि उनके ससुराल वालों ने उसे किस कदर पीटा होगा। दोनों युवतियों को हालत की जिम्मेदार सिर्फ एक ही चीज है दहेज। दहेज और दहेज के लिए प्रताड़ना जिसका शिकार केवल महिलाएं ही होती हैं। अच्छे सम्पन्न घरों में बहुएं बनकर गई ये युवतियां उनकी पैसे की भूख शांत नहीं कर पाईं और उनमें से एक तो अपनी जान से हाथ धो बैठी। दूसरी अस्पताल में अभी मौत से लड़ाई लड़ रही है।

Sunday, March 23, 2008

हमें बताया गया ............




हिमांशी खरे

हमें बताया गया
कि स्त्री प्रेम की देवी होती है.
पर जब हमने
प्रेम किया तो
हमें नाक कटाऊ कहा गया
हमें बताया गया
कि स्त्री में भीषण कामाग्नि होती है
पर हमने देखा
कि स्त्री ही
हमेशा बलात्कार की शिकार होती है.
हमें बताया गया
कि स्त्री नरक में ले जाती है
पर हमने देखा कि
नरक में जाने की इच्छा रखने वालों की तादाद
हद से ज्यादा है.
इतनी ज्यादा
कि नरक में जगह कम पड़ जाए.
हमारी देह-
विमर्श का सदाबहार विषय है.
हम प्रेम करें
तो कामुक कहलाती हैं
और यदि
अपनी इच्छाओं का दमन करती रहें
तो हम आदर्श होती हैं
हमारी ज़रूरतें
बस भरपेट रोटी
और तन भर कपडा मानी जाती है
इससे ज्यादा की मांग करना
हमारी खुदगर्जी होती है
" औरत को क्या चाहिए-
पेट की संतुष्टि
और पेट के नीचे की संतुष्टि "
ये फतवा जारी करने वाले ने
हमारे शोषण
और
हमारे साथ होने वाले बलात्कार का
अधिकार-पत्र जारी कर दिया है.

*****
हिमांशी जी की यह कविता यहाँ भेजने के लिए अनूप भार्गव जी का धन्यवाद ।
* * * * * * * * * * *

Friday, March 21, 2008

आस पर, विश्वास पर दुनिया टिकी है।

कई साल पहले एक फ़िल्म देखी थी, फ़िज़ा। देखने के बाद एक बात बहुत देर तक मन को कुरेदती रही। एक विधवा माँ, जो सालों और बहुत कोशिशों बाद अपने खोए बेटे को वापस पाती है, बेटे को आतंकवादियों के हाथों एक बार फ़िर खो देने के बाद निराश हो कर आत्महत्या कर लेती है। वह एक बार भी नहीं सोचती कि उसके जाने के बाद उसकी युवा अविवाहित बेटी पर क्या बीतेगी। क्या उसका बेटा ही उसके जीने की वजह था? बेटी की खुशियों का कोई मूल्य नहीं था उसकी नज़र में?
रेनू की कहानी पढती हूँ तो फ़िर वह सवाल मन में उठता है। पति और बडे बेटे के तिरस्कारपूर्ण रवैये के कारण माँ को क्या अपनी किशोर वय की निर्दोष बेटियों को भी भूल जाना चाहिये था? अपने कठिन जीवन से पलायन करके अपने बाकी बच्चों को अपने वात्स्ल्य से, अपने सहारे से वंचित कर देना, क्या यह स्वार्थपूर्ण आ़चरण नहीं था?
या गहरी चोट खाई हुई स्त्री के जीवन में एक कमज़ोर क्षण होता है जिसमें वह अपनी तकलीफ़ के आगे कुछ सोच ही नहीं पाती।
कहीं ऐसा तो नहीं कि जो हिम्मत परिस्थितियों से लडने के लिए स्त्री में युवावस्था में होती है, वह मध्य वय तक आते आते चुक जाती है और उसे अपनी लडाई ’गिव अप’ कर देना ज़्यादा आसान लगता है।
पता नहीं.. अपने को किसी और के स्थान पर रख कर सोचना आसान नहीं होता। फ़िर भी सोचती हूँ कि किसी भी स्थिति में अपने जीवन को इतना सस्ता नहीं करना चाहिए कि किसी और की गलती की वजह से उसे खत्म कर दिया जाए। अपने जीने की कोई नई वजह ढूढना इतना भी मुश्किल नहीं होता। अपनी एक कविता की कुछ पंक्तियाँ लिख रही हूँ-

आस पर, विश्वास पर दुनिया टिकी है।
अनजान निर्जन पथ अंधेरी रात है,
एक भी आकाश में तारा नहीं,
दूर तक बस तिमिर का ही साथ है,
मुझको पता है पर, कि उस ओझल क्षितिज पर,
स्वर्ण सी एक ज्योति की रेखा खिंची है
आश पर, विश्वास पर दुनिया टिकी है।

क्लांत आँखें और बोझिल पाँव हैं,
थका-थका तन, बुझा हुआ मन,
दूर बहुत लगता, अपना घर-गाँव है,
पर कह रहा जैसे कोई कि उस छोर पर,
राह मेरी देखती मंज़िल खडी है
आस पर, विश्वास पर दुनिया टिकी है।

Thursday, March 20, 2008

रेनू की कहानी

रेनू की कहानी{पहला भाग }
भाग-2
रेनू की कहानियाँ पत्रिकाओं में छपने लगीं और पसन्द भी की जाने लगीं। उसे पाठकों के सराहना भरे पत्र मिलने लगे। संपादक उससे नई कहानियों के लिये आग्रह करने लगे। रेनू की रचनात्मकता को एक ठोस रूप मिलने लगा थ। पर रेनू की इस रुचि ने उसके लिये बहुत बड़ा संकट खडा़ कर दिया। उसके पति सुरेन्द्र उसकी बुद्धिजीवी रुचि को, उसकी सफलता को सहन नहीं कर सके। वह चाहते थे कि रेनू लिखना बन्द कर दे, पर रेनू इस अन्यायपूर्ण आदेश को मानने के लिये तैयार नहीं हुई। पति के अहंकार को ठेस पहुँची तो वह बदला लेने पर उतर आये। उन्होंने रेनू को घर का खर्च देना बन्द कर दिया। रेनू के घर में अनाज गाँव की खेती-बारी से आ जाता था। बाकी ज़रूरतों के लिये रेनू ट्यूशन करने लगी। कुछ पारिश्रमिक रचनाओं का भी मिल जाता था। बच्चों की पढ़ाई, कपड़े और रोज़ के खर्च, सबका इन्तज़ाम अब उसे ही करना था।
सुरेन्द्र रेनू को इस तरह नहीं झु्का पाये तो और भी गिरी हुई हरकतों पर उतर आये। उसे बात- बात पर मारने-पीटने लगे। यही नहीं, उसके चरित्र पर कई तरह के लांछन भी लगाने लगे। उन्होंने रेनू का घर से बाहर निकलना, लोगों से मिलना-जुलना बन्द कर दिया। रेनू की ज़िन्दगी दिन पर दिन घुटन भरी होती जा रही थी। बेचारी रेनू...घर की सबसे छोटी बेटी, सबकी दुलारी और अब इस तरह की प्रताड़ना भरी ज़िन्दगी बिता रही थी।
भैया रेनू की यह हालत देख कर बहुत दुखी थे। अपने हिसाब से उन्होंने बहुत देख-भाल कर रेनू की अच्छी शादी की थी लेकिन आज वही शादी रेनू को तबाह कर रही थी। इस बीच सुरेन्द्र के परिवार के मुखिया, उनके चाचाजी का असमय देहान्त हो गया था इसलिये उन पर किसी का कोई अंकुश भी नही रहा था। हम लोग निरुपाय रेनू की दुर्दशा देख रहे थे। रेनू कई बार इतनी परेशान हो जाती कि उसके मन में अपने को खत्म करने का विचार आता, पर बच्चों का मोह उसे जीवन से बांधे हुए था। सुरेन्द्र ने तो पहले ही सारी पारिवारिक ज़िम्मेदारियों से हाथ खींच रखा था।
उसकी इसी मनस्थिति में भैया रेनू को तीनों छोटे बच्चों के साथ अपने पास सरयूबाग ले आये। मैं उससे मिलने गयी तो उसकी सब व्यथा कथा सुनी। समझ में नहीं आया कि कोई इन्सान अपने ही बीवी-बच्चों के प्रति इतना क्रूर कैसे हो सकता है। मुझे लगा कि सुरेन्द्र मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं हैं। पर रेनू सोचती थी कि यह सिर्फ़ उनका मेल ईगो ’ है जो उसे त्रस्त देख कर सन्तुष्ट होता है।
रेनू ने तय किया कि अब वह मायके ही रहेगी। पढ़ी- लिखी है, अपना और अपने बच्चों का भरण पोषण करने की सामर्थ्य उसमें है। वह एक कोचिंग इंस्टिट्यूट खोलेगी और उससे अपनी जीविका चलायेगी। भैया उसकी योजना से सहमत थे, पर उनकी राय थी कि बच्चों की ज़िम्मेदारी सुरेन्द्र को ही सँभालनी चाहिये, आखिर वे बच्चे सुरेन्द्र के भी तो थे।
भैया ने सबसे छोटे मंटू को रेनू के पास छोड़ा और दोनों बेटियों को सुरेन्द्र के पास पहुँचा आए। बड़ा बेटा पिंटू वहाँ पहले से था ही। सुरेन्द्र ने भैया से कहा कि वह अपने बच्चों को सँभाल लेंगे।
पर एक सप्ताह के बाद ही सुरेन्द्र बच्चों सहित सरयूबाग में दिखाई दिये। कहना आसान होता है, पर बच्चों की ज़िम्मेदारी बड़े धैर्य और जीवट वाले ही उठा सकते हैं। सुरेन्द्र अकेले बच्चों को नहीं सँभाल सके। उन्होंने अयोध्या आकर बहुत आग्रह और मान-मनुहार से रेनू को मनाया। बच्चों का मोह आखिर रेनू को वापस उसके पति के घर खींच ले गया। कुछ दिन सब कुछ ठीक चला, पर आखिर किसी का स्वभाव कैसे बदल सकता है? सुरेन्द्र ने फ़िर रेनू को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। फ़र्क बस इतना था कि यह प्रताड़ना अब शब्दों तक सीमित थी। वह रेनू पर हाथ नहीं उठाते थे। रेनू ने इस अपमान को अपनी नियति मान लिया।
समय बीतता गया। बच्चे बड़े हो चले थे। पढ़ने में अच्छे थे। इस माहौल में भी पढ़ाई में अच्छे परिणाम लाते रहे। पिंटू भारतीय सेना में अफ़सर बन गया। रिप्पल बी ए में पढ़ने लगी थी और रोज़ी बारहवीं में थी। पिंटू की शादी उसकी पसन्द की लड़की से तय हो गई। रेनू ने सब रिश्तेदारों को बुलाया और बड़े शौक से बेटे की शादी की। जिस दिन पिंटू की बारात गई, घर में रात को खूब नाच-गाना हुआ। हमेशा की तरह रेनू गाने-बजाने में सबसे आगे रही, उसकी आवाज़ सबसे बुलंद थी। उसे खुश देख कर हमें बहुत अच्छा लगा। लगा कि उसकी वर्षों की तपस्या सफल हो गई है। सुरेन्द्र बाबू का व्यवहार भी रेनू के प्रति ठीक लगा। हमें लगा जैसे बहुत दिन बाद उसकी गृहस्थी की गाडी़ पटरी पर आई है।
अगले दिन रेनू हम लोगों को नैमिषारण्य घुमाने ले गई जहाँ एक मंदिर था। हम वहाँ बस से और फ़िर एक विचित्र ठेलेनुमा सवारी- खड़खड़िया-पर बैठ कर गए। हमने मंदिर में दर्शन किये और साथ के सरोवर में स्नान किया। हम लोगों को इस यात्रा में बहुत आनंद आया। रेनू का उत्साह तो देखते ही बनता था। उसके घर का पहला समारोह था और वह उसमें और अपने अतिथियों की देख-भाल में कोई कमी नहीं रहने देना चाहती थी। यह यात्रा हमारे लिये अविस्मरणीय थी। जितना आनंद घूमने में आया था, उतना ही परिवार के लोगों के साथ समय बिताने में। तब नहीं मालूम था कि हम रेनू के साथ यह आखिरी खुशी के दिन बिता रहे हैं।
पिंटू की शादी को बमुश्किल ढ़ाई महीने गुज़रे होंगे। एक दिन खबर मिली कि पिंटू के साथ कुछ कहा-सुनी के बाद रेनू घर छोड़ कर चली गई है। न वह सरयूबाग पहुँची, न किसी बहन के यहाँ, न और किसी रिश्तेदार के यहाँ। सब सोच रहे थे कि नाराज़ हो कर गई है, गुस्सा शांत होगा तो लौट आयेगी। कितने दिन अपनी बेटियों और दस साल के छोटे बेटे को छोड़ कर रह पायेगी? उसकी ममता उसे वापस खींच लायेगी। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। हम समझ नहीं पा रहे थे कि जिस रेनू ने बच्चों की खातिर जीवन के सभी झंझावातों को धैर्य से झेल लिया था, वह अब कैसे विचलित हो गयी? पर शायद ऐसा ही हुआ। रेनू ने बच्चों की खातिर सब दुख सह लिये थे, यह सोच कर कि पति न सही, बच्चे उसके संघर्ष को, उसकी ज़िन्दगी से हुई जद्दोजहद को समझते हैं। जिस बेटे की आँखों के सामने उसने यह लड़ाई लडी़ थी, उसकी उपेक्षा ने शायद उसका दिल तोड़ दिया और वह सब माया मोह के बन्धनों को पीछे छोड़ कर आगे कहीं निकल गई, सबसे दूर।
छः महीने बाद सुरेन्द्र की गहरी बीमारी की खबर मिली तो हम उनसे मिलने सीतापुर गये। रेनू के बिना घर कितना सूना लग रहा था, कितना विषादग्रस्त। विश्वास करना मुश्किल था कि हमने इसी घर में कुछ महीने पहले इतनी खुशी के पल देखे थे। सुरेन्द्र हमें देख कर रोने लगे, “ रेनू एक बार आ जाती तो मैं उससे अपने गुनाहों की माफ़ी माँग लेता।”
उदास रिप्पल ने मुझसे कहा, “मम्मी ने इस घर में बहुत दुख देखे। वह जहाँ भी होंगी, इससे तो ज्यादा सुख से होंगी।”
सुरेन्द्र के दिल की आवाज़ रेनू तक नहीं पहुँची। कुछ दिन बाद पश्चात्ताप का बोझ अपनी आत्मा पर लिये हुए वह परलोक सिधार गए।
रेनू को गए बारह साल बीत गए हैं। कभी- कभी लगता है कि वह अब इस दुनिया में ही नहीं है। होती, तो क्या इतने सालों में कभी उसे अपने बच्चों की, अपने भाई बहनों की याद नहीं आती? क्या इतना कुछ लिख डालने वाली रेनू एक चिट्ठी भी
नहीं लिख पाती? पर उम्मीद की एक हल्की सी रेखा है जो अबतक कायम है। शायद हमारी छोटी सी बहन कभी वापस आ जाए....
-शकुन्तला दूबे {मां का जन्म सन १९३३ में अयोध्या के एक गाँव में हुआ था। अपने परिवार द्वारा चलाये जा रहे
स्कूल में पाँचवीं तक पढाई हुई फ़िर ’सयानी’ हो जाने के कारण घर बैठा दिया गया। दृढ
इच्छा शक्ति के चलते घरेलू काम काज को निबटाने के साथ-साथ दसवीं की परीक्षा प्राइवेट
पास कर ली, फ़िर शादी हो गई। चार बच्चों को पाल पोस कर एक बार फ़िर किताबें पकडीं
और इस बार एम ए (समाज शास्त्र) तक पढ गईं। एक निहायत कंज़र्वेटिव माहौल में पले बढे
और ब्याहे जाने के बावज़ूद हर विषय पर स्वतन्त्र विचार रखती हैं, राजनीति पर भी।
लिखने पढने का शौक बचपन से रहा है। बहुत सी कविताएं कहानियां लिखीं, कुछ स्थानीय
पत्रिकाओं- अखबार में छ्पीं भी, पर ज्यादातर उनका लेखन स्वांतः सुखाय ही रहा। पिछ्ले
चार-पाँच साल से घुटनों के दर्द की वजह से ज़्यादा चल फ़िर नहीं सकतीं तो अपनी
रचनात्मकता को जाडे में स्वेटर बुन कर और गर्मी में लिख कर संतुष्ट करती हैं। इन सालों में
अपने शुरू के पैंतीस साल के जीवन की कहानी एक आत्म कथा के रूप में लिख चुकी हैं। रेनू मौसी
की कहानी उस का ही एक भाग है।---Vandana Pandey}

Wednesday, March 19, 2008

रेनू की कहानी


वन्दना पांडेय ने अपनी 75 वर्षीय माताजी -शकुंतला दुबे का एक संस्मरण चोखेर बाली में भेजा है । वन्दना से परिचित तो नही हूँ लेकिन स्त्री के अनुभवों की कम से कम कोई एक कडी उन्हें परिचय की सीमाओं और ज़रूरतों से परे कर देती है । एक अनुभव संसार ऐसा है जहाँ कोई स्त्री एक दूसरे से अपरिचित नही है , फिर चाहे बीच में आयु के अंतराल हों या शिक्षा के या सामाजिक प्रतिष्ठा के ।
शकुंतला जी के शब्दों में उनकी बहन रेनु की इस स्मृति को दो भागों में प्रस्तुत कर रहे हैं --
रेनु की कहानी { पहला भाग }

माँ अपनी ढलती उम्र में जन्मी सन्तान रेनू के भविष्य को लेकर काफ़ी चिन्तित रहा करती थीं। कौन इसे पढ़ाएगा, इसकी शादी करेगा? चाचा, यानी मेरे पिता, जिन्हें हम सारे बच्चे चाचा कहा करते थे, इस बात को लेकर अधिक चिन्ता नहीं करते थे।
“इतनी चिन्ता मत करो बच्ची के लिये। भगवान सबके लिये इन्तज़ाम करता है। मैं नहीं रहूँगा तो इसके भाई इसकी ज़िम्मेदारी उठाएंगे। पिता न हो तो बड़ा भाई ही पिता समान होता है,” वह कहते थे।
जिस बात का माँ को डर था वही हुआ। रेनू जब तेरह बरस की थी, हमारे पिता का देहान्त हो गया। रेनू बहुत दुखी थी और अपने भविष्य को लेकर चिन्तित भी। भैया ने उसे बुला कर कहा, “तुम्हें चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है। चाचा चले गये, उनकी कमी हमेशा रहेगी पर मैं अब भी तुम्हारे साथ हूँ। तुम्हारी सारी ज़िम्मेदारी अब मुझ पर है। किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो सीधे मुझसे कहना। तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई में कोई बाधा नहीं आयेगी।”
चाचा का कहना भी सच हुआ था। भैया ने रेनू के पिता का स्थान ले लिया था। एक बार माँ ने किसी बात पर रेनू को एक तमाचा लगा दिया। रेनू रोती हुई भैया के पास पहुँची। भैया ने उसे चुप कराया। शाम को माँ से बोले, “अगर कोई रेनू को मारता है तो वह मार रेनू को नहीं मुझे लगती है।”
माँ ने फ़िर रेनू को कभी नही