Monday, December 28, 2009

गलती कोई भी करे तुम माफी मांग लेना और सब ठीक हो जायेगा

प्रतिभा कटियार

बचपन में देखी गई फिल्मों में से मुझे कुछ ही याद हैं. उनमें से एक फिल्म मासूम भी है. मासूम फिल्म बचपन में देखे गये के हिसाब से तो लकड़ी की काठी के लिए याद होनी चाहिए लेकिन जाने क्यों जेहन में शबाना आजमी की वो तस्वीर चस्पा है जब उसे नसीर की जिंदगी की दूसरी औरत के बारे में पता चलता है. वो शबाना की खामोशी...और दु:खी, गुस्से में भरी, तड़पती ढेरों सवाल लिए खड़ी आंखें...उन आंखों में ऐसी मार थी कि उन्हें याद करके अब तक रोएं खड़े हो जाते हैं. खैर, फिल्म सबने देखी होगी और यह भी कि नसीर किस तरह माफी मांगता है शबाना से, किस तरह शर्मिंदा है अपने किए पर और शबाना उसे लगभग माफ कर ही देती है.

इसके बाद कई सारी फिल्मों में पुरुषों की गलतियां और उनके माफी मांगने के किस्से सामने आते रहे. समय के साथ स्त्रियों के उन्हें माफ करने या न करने के या कितना माफ करना है आदि के बारे में राय बदलती रही. वैसे कई फिल्मों में बल्कि ज्यादातर में पुरुष अपनी गलतियों के लिए माफी नहीं भी मांगते हैं बल्कि अपनी गलतियों को कुछ इस तरह जस्टीफाई करते हैं कि उसकी गल्ती के लिए औरत ही जिम्मेदार है, लेकिन आज बात माफी मांगने वाले पुरुषों की ही.

इसी माफी मांगने वाले फिल्मी पुरुषों की कड़ी में पिछले दिनों फिल्म 'पा' का एक पुरुष भी शामिल हो गया. पुरुष यानी फिल्म का नायक अमोल अत्रे. अमोल और विद्या का प्रेम संबंध बिना किसी फॉमर्ल कमिटमेंट के एक बच्चे की परिणिति का कारण बनता है. अमोल बच्चा नहीं चाहता, इन फैक्ट शादी भी नहीं करना चाहता. देश की सेवा करना चाहता है. करता भी है. उसे पता भी नहीं है कि उसका कोई बच्चा है, वह इस इंप्रेशन में है कि उसका बच्चा विद्या ने अबॉर्ट कर दिया है. लेकिन तेरह साल बाद जब ऑरो के रूप में उसे अपनी संतान का पता चलता है तो अमोल (अभिषेक) तुरंत अपनी पिछली से पिछली गलती को समझ जाता है. उसे एक्सेप्ट कर लेता है और पूरे देश के सामने एक रियलिटी शो में विद्या से माफी मांगता है और बच्चे को अपनाता भी है. अमोल एमपी है, उसका शानदार पॉलिटिकल करियर है. फिर भी वह माफी मांगता है इन चीजों की परवाह किये बगैर. विद्या का गुस्सा इस सबसे शांत नहीं होता. वह उसे माफ भी नहीं करती. वह अमोल के गले की हिचकी नहीं बनना चाहती.

कहां गए माफी मांगने वाले पुरुष

मेरे दिमाग में इस दौरान एक बात घूमती रही कि असल जिंदगी में इस तरह से माफी मांगने वाले पुरुष कहां गायब हैं. हां, गलतियां करने वाले पुरुषों की संख्या लगातार बढ़ रही है. लेकिन जैसे-जैसे वे समझदार हो रहे हैं, उनकी तार्किक शक्ति बढ़ रही है. अपनी चीजों को जस्टीफाई करने के तर्क भी. यथार्थ में माफी मांगने वाले पुरुष नदारद हैं. रिश्तों में माफी का बड़ा महत्व होता है. कोई भी माफी मांगने से छोटा नहीं होता. यह गुरुमंत्र जब मांएं अपनी बेटियों को दे रही होती हैं, तब उन्हें नहीं पता होता कि इसकी ध्वनि कुछ इस तरह जा रही है कि गलती कोई भी करे तुम माफी मांग लेना और सब ठीक हो जायेगा. ऐसा होता भी रहा है. इसी मंत्र ने परिवारों की बुनियाद को मजबूत बनाये रखा. दूसरों की गलतियों का इल्जाम अपने सर लेकर, खुद ही माफी मांगने के बावजूद, पिटने के बावजूद रिश्ता बचाने की जद्दोजेहद में औरतों ने अपने वजूद से ही लगभग किनारा कर लिया है. आत्म सम्मान वाली औरतें पुरुषों को लुभाती हैं, लेकिन वे घर की औरतें नहीं होतीं.

आखिर क्यों है ऐसा? दुनिया बदल रही है. समझदारियां भी बढ़ रही हैं. रिश्तों में स्पेस, डेमोक्रेसी जैसे शब्दों ने भी अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है. लेकिन यहीं कुछ गड़बड़ा रहा है. वो माफियां जो पुरुषों की जानिब से आनी थीं, उनका स्पेस खाली पड़ा है. स्त्रियों को उनका स्पेस मिले न मिले लेकिन माफियों का वो स्पेस रिश्तों के दरमियान लगातार बढ़ रहा है. जीवन फिल्म नहीं होता. जीवन में पुरुषों के पास माफी से बड़ा अहंकार होता है. जिसे पालने-पोसने में ही वे पुरुषत्व मानते हैं. जहां समझदारियां थोड़ी ज्यादा व्यापक हैं वहां माफियां आ तो जाती हैं लेकिन कुछ इस रूप में कि वे भी किसी सजा से कम नहीं होतीं. क्या इतना मुश्किल होता है पुरुषों का माफी मांगना. रिश्तों को संभाल लेने की सारी जिम्मेदारी स्त्रियों के मत्थे मढ़कर कब तक परिवारों के सुरक्षित रहने की खैर मनायी जा सकती है.


Friday, December 25, 2009

उत्सव बना झमेला

खुशी अफसोस में बदल गई

मेरे छोटे भाई की शादी तय हो गई थी। 12 फरवरी को शादी और 14 को रिसेप्सन ओ भी बिना लड़की देखे। कि शादी ही तो करनी है। लड़की से करनी है देखना क्या । मुख्य आधार था लड़की का एक सुघड़ भाभी से तुलना। मेरे भाई ने कहा जब लड़की उन भाभी की तरह है तो मैं कर लूँगा। लड़की एमएससी कर के रिसर्च कर रही है और हायर स्टडी के लिए अमेरिका जा रही है। लड़की फरवरी में अमेरिका जा रही है। दोनों की आपस में बात भी शुरू हो गई थी। जिसमें मेरे भाई ने कहा कि तुम अपना केरियर देखो। फिर भी माँ ने कहा कि तुम लड़की एक बार देख लो। शादी के पहले। शायद माँ के मन ने कुछ भाप लिया था। लड़की अपने भाई और पिता के साथ नोयडा आई और मेरा भाई हैदराबाद से आया अपनी भावी पत्नी को देखने।

मुझे छोड़ कर सभी थे। लेकिन जब मेरे भाई ने लड़की को देखा तो जिन भाभी से उस लड़की की तुलना की गई थी वो उसमें दूर-दूर तक नहीं दिखीं। इतना ही नहीं लड़की के कपड़े अस्त-व्यस्त थे साफ नहीं थे। नए नहीं थे। कुछ भी ऐसा नहीं लग रहा था कि वे लोग लड़की को दिखाने आए हैं। यही नहीं लड़की समेत वे सारे लोग बड़े रिजिड और अड़ियल दिखे। भाई फिर खूब उत्साहित था। सज-धज कर तैयार था आखिर उस लड़की से मिलने जा रहा था जो उसके सपनों से जुड़ रही थी।

मिल कर वह बात-व्यवहार और रंग-ढंग से कपड़े-लत्ते से दुखी हुआ। फिर भी भैया के कहने पर वह शादी के लिए मान गया। कि लड़की को देख कर मना नहीं करते। बात सही दिशा में थोड़ी देर चली तो मामला वेन्यू पर आ कर फिर अटक गया। भाई चाहता था कि शादी इलाहाबाद से हो। लेकिन वे लोग लखनऊ से शादी करने पर अड़े रहे। फिर भी मेरे बड़े भाई ने कहा कि सोच लीजिए अगर इलाहाबाद से हो तो अच्छा रहेगा। हम फिर बात कर लेंगे। अगले दिन लड़की के भाई का फोन आया कि शादी लखनऊ से ही होगी और रिसेप्सन भी यहीं से होगा। उनका यह रवैया भाई को ठीक न लगा। हमारी ओर से इलाहाबाद में शादी करने के अलावा और कोई माँग न थी। इस पर वे लोग असहज रूप से पेश आ रहे थे। जिस बात को बड़ी प्यार से मनवाया जा सकता था उस पर वे लोग कुछ ढ़ीठ की तरह डट गए।

और इस के बाद भाई ने शादी से इनकार कर दिया। माँ अभी भी यह चाहती है कि यही शादी हो जाए। उधर से लड़की मेरे भाई को फोन करने लगी। पूरे प्रकरण से परेशान भाई में पहले तो फोन लेने की हिम्मत न रही। फिर उसने बात किया तो लड़की ने पूछा कि क्या गलती हुई। मेरे भाई ने कहा कि मेरी और आपकी शादी लगता है नहीं लिखी है। आपको और अच्छे जीवन साथी मिलेंगे। यह मेरी दुआ है।

अपने इस निर्णय से भाई और मेरा पूरा घर दुखी है। ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी लड़की को देखने के बाद किसी और कारण से शादी से न करना पड़ा है। हम यह सोच कर परेशान हैं कि आखिर लड़की वालों को कैसा लग रहा होगा।

बाद में सोचने समझने पर समझ में आया कि बिचौलिए हड़बड़ी में थे। उन्होंने दोनों तरफ के लोगों को भरम में रखा। जिसका परिणाम यह निकला कि एक लड़की और एक लड़का बे वजह परेशान हो रहे हैं। दोनों अनायास ही एक दूसरे की नजर से गिर गए हैं। वे लोग अभी भी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि शादी क्यों टूटी। और इधर सो कोई उन्हें साफ-साफ यह नहीं कह पा रहा कि उनके अड़ियल बर्ताव से मामला बिगड़ रहा है। जब मैंने भाई से कहा कि तुम्हें लखनऊ बारात लेकर चलने में क्या दिक्कत है। तो वह बोला कि दिक्कत कुछ भी नहीं। बस उनके बोल बचन अच्छे नहीं लगे।

भाई की दुविधा यह है कि जो लड़की फोटो में बहुत अच्छी दिख रही थी वह सामने से इतनी उलट क्यों है। जो ल़ड़की फोन पर इतनी सहज और मीठी थी वह सामने से इतनी उलझी और कठोर क्यों थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि उनके यहाँ कोई आपसी संकट रहा हो। जिसके कारण लड़की को कोई उलझन रही हो। जो भी रहा हो। खामखा का एक संभावित उत्सव झमेले में बदल गया। 12 और 14 फरवरी 2010 मेरे भाई और उस लड़की के लिए एक मनहूस तारीख की तरह दर्ज हो गए हैं। बिचौलिए पति-पत्नी वहीं आपस में भिड़ गए कि मैंने कहा था तैने कहा था। लेकिन अभी इससे क्या। दोनों पक्षों की फजीहत हो रही है।

Wednesday, December 23, 2009

महिला सशक्तिकरण

२२/१२/०९ को उमा संस्था द्वारा महिला सशक्तिकरण पर भाषण प्रतियोगिता आयोजित कि गई अनेक स्कूलों कि छात्राओं ने बढ़कर हिस्सा लिया और अपने विचार प्रस्तुत किये महिलाओं कि जमीनी हकीकत पर भी विचार किया गया .......

Tuesday, December 22, 2009

छात्रावास की सीमा लांघती लड़कियां

कुछ समय (साल कहें) पहले ‘आजकल’ पत्रिका में एक कविता पढ़ी थी, जिसका सार यह था कि छात्रावास की लड़कियों के लिए ऊंची मजबूत दीवारें उठा दो वरना किसी असभ्य राहगीर के मन में चलते-चलते मूत्र-त्याग त्याग की इच्छा जागेगी। अजीब लगता है यह विचार लेकिन था। उसके जवाब में मुझे जो सूझा, लगभग पंक्ति-दर-पंक्ति, वह बहुत दिनों तक कॉपी के एक पन्ने के साथ नत्थी होकर यहां-वहां भटकता रहा था, कभी मिलता, कभी लापता होता। अब मिला है तो सोचा इधर लगा दूं। यह ब्लॉग कोई साहित्य का संग्राहक होने का दावा तो नहीं करता इसलिए उससे कुछ कमतर माल भी खप ही जाएगा। वैसे भी यहां शिल्प से ज्यादा विचार महत्वपूर्ण है। फिर भी अगर पसंद न आए तो लताड़/आलोचना सुनने के लिए प्रस्तुत हूं ही।– अनुराधा

ढहा दो वो दीवारें जो

रोकती हैं बाहर की हवा को

पकी ईंटों की वो कठोर दीवारें

जिन्हें भेदकर अंदर नहीं जा सकती

ठंडी और गुदगुदी हवा

जब लड़कियां आती हैं, सहेलियों से साथ ढहा देने पुरानी दीवारों को

न रोके उन्हें कोई

दीवारों को तोड़ने दो तब तक

जब तक सड़क इतनी आम न हो जाए

टूटी दीवारों का सिलसिला इतना आम न हो जाए

कि हर असभ्य राहगीर अघा जाए

उनसे, और चलते-चलते मूत्र-त्याग की उसकी

इच्छा ही मर जाए

Thursday, December 17, 2009

अब निडर हूं

पिछले एक साल से लगातार संघर्ष चलता रहा । मां ने आैर मैंने कहां कहां धक्के नहीं खाये ।बहुत ने हौसला बढा़या, यहां जिन साथियों ने हिम्मत दी उससे भी बल मिला । बीच में कुछ से सुनना कि यह कलयुग है, इंसाफ की उम्मीद न करो, कभी निराश भी करता था। लेकिन मुझे तो यह भी लगातार लगता रहा कि हर सुबह मेरे लिए नई उम्मीद व सहारा लिए आ रही है । बस लगी रही । अपने को नए रूप में खडे़ करने की कोशिश भी साथ ही शुरू कर दी । नए पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स में दाखिला लिया ।आज तो महसूस होता है, साथ देने वाले, आगे बढ़ाने वाले निराशा करने वालों से कहीं ज्यादा थे । तभी अपनी कहानी का सुखांत, आज लिख पा रही हूं । ससुराल वालों से न्याय ने मुझे मुक्ति दिला ही दी । अब उम्मीद है । छह महीने बाद कोर्स पूरा कर मैं बढि़या रोज़गार भी पा ही लूंगी । एक सम्मानित महिला की तरह बाकी जीवन जी सकूंगी ।

'अब डर कैसा' की पहली कड़ी इस लिंक पर और दूसरी कड़ी इस लिंक पर देखें।

एक पुरातन आखेट-कथा

(नए वक्त की एक घटना को याद करते)

तुम्हारे नीचे पूरी धरती बिछी थी
जिसे तुमने रौंदा
वह सिर्फ़ स्त्री नहीं थी
एक समूचा संसार था फूलों और तितलियों से भरा
रिश्तों और संभावनाओं से सजा

जो घुट गयी तुम्हारे हाथों तले
सिर्फ़ एक चीख़ नहीं थी
आर्तनाद था
समूची सृष्टि का

हर बार जो उघड़ा परत दर परत
सिर्फ शरीर नहीं था
इतिहास था
शरीर मात्र का

जिसे तुमने छोड़ा
जाते हुए वापस अपने अभियान से
ज़मीन पर
घास के खुले हुए गट्ठर -सा
उसकी जु़बान पर तुम्हारे थूक का नहीं
उससे उफनती घृणा का स्वाद था

वही स्वाद है
अब मेरी भी ज़ुबान पर !

(ये एक पुरानी कविता है - ९६ के ज़माने की !)

Wednesday, December 16, 2009

एक बेटे की चाहत में उन्नीस बेटियों का जन्म


घटना उत्तर प्रदेश के महोबा की है। यह घटना 8 दिसम्बर 2009 के अमर उजाला में पढ़ने को मिली। समाचार था कि उन्नीस बेटियों के बाद बेटे की मुराद पूरी हुई। समझ नहीं आया कि ऐसे समाचार पर रोया जाये या कि खुश हुआ जाये?
रोना इस कारण से कि

  • आदमी एक बेटे की चाहत में बेटियों को पैदा करते-करते जनसंख्या में वृद्धि करता जाता है।
  • आदमी बेटियों को अभी भी बेटों से कम करके आँक रहा है।
  • एक बेटे के लिए उन्नीस बेटियों का जन्म और एक स्त्री के शरीर पर एक प्रकार का अत्याचार।

खुश होने का मन इस कारण कर रहा था कि

  • कुछ स्त्रोतों से ज्ञात हुआ कि उस व्यक्ति ने किसी भी बच्चे के गर्भ में आने पर उल्ट्रासाउंड करवा कर लिंग का पता नहीं किया।
  • किसी भी कन्या भ्रूण की हत्या करने का प्रयास नहीं किया।
  • किसी भी बेटी को मारने का प्रयास नहीं किया।

समाचार के अनुसार पनवाड़ी के ग्राम स्योड़ी के चतुर्भुज अहिरवार का विवाह 1985 में लालकुँवर के साथ हुआ था। शादी के दो वर्ष बाद से लेकर अभी तक उसने कुल 20 बच्चों को जन्म दिया। पहली उन्नीस बेटियों में से आठ की मृत्यु हो चुकी है।
बच्चियों के भरण-पोषण के लिए चतुर्भुज ने गाँव छोड़ कर दिल्ली में ढेरा जमा लिया था और वहीं से प्रतिमाह बच्चियों की परवरिश के लिए पैसे भेजता रहता था।
बड़ी बेटी का किसी तरह विवाह करने के बाद भी बेटे की चाहत कम नहीं हुई। परिणामतः बीसवें बच्चे के रूप में उन्हें बेटा प्राप्त हुआ।
सामुदायिक केन्द्र में बेटे के जन्म देने के बाद लालकुँवर को जननी सुरक्षा योजना के अन्तर्गत 1400 रुपये का चेक भी दिया गया।
इस पोस्ट का उद्देश्य समाचार देना नहीं वरन् यह है कि ऐसी घटनाओं पर क्या किया जाये?
खुश हुआ जाये कि किसी भी रूप में इन दम्पत्ति ने कन्याओं की हत्या नहीं की या फिर दुःखी हुआ जाये कि विकास की राह पर चलने के बाद भी बेटे की चाहत बिलकुल कम नहीं हुई है?
कुछ भी हो यह तो स्पष्ट है कि उन्नीस में से शेष बची ग्यारह बेटियों के सामने अभाव तो रहता ही होगा और अपनी शारीरिक विकास की राह में अवरोध तो पाती ही होंगी। शिक्षा, भोजन, वस्त्र, चिकित्सा आदि का संकट तो रहता ही होगा। इन सबसे बचने का उपाय क्या होगा? यही दुःख होने की बात है।

Tuesday, December 15, 2009

क्या करेगी औरत

अब क्या करेगी औरत?
साठ वर्ष की उम्र में
आदेश मिला है उसे
निकल जाने का घर से।
नहीं, वो यह नहीं कह सकती
कि, क्यों निकले वो?
घर तो उसका भी है!
वह जानती है
इस वाक्य के खोखले पन को।
घबरा कर
उसकी दहाड़ती आवाज से
निकल गई है
दरवाजे से बाहर।
खड़ी है अंधेरे को घूरती।
कहाँ जाय ?
उम्र ख़त्म हो चुकी नौकरी की,
थक चुके हैं
हाथ - पांव,
मजदूरी भी नहीं कर सकेगी।
शिथिल पड़ चुकी है देह,
अब इस योग्य भी नहीं रह गई
कि कर सके वेश्यावृति भी।
एक बार फाटो माँ धरती,
समाने को खड़ी है
एक और सीता
तुम्हारे अन्दर!
लेकिन उसे पता है
नहीं होना है ऐसा।
उसे लौटना होगा
इन्हीं चार दीवारों
और छत के अन्दर ,
जिसे समाज कहता है
उसका घर।
प्रतीक्षा में बैठी है
शायद खोल कर किवाड़
वही कह दे
अन्दर आने के लिए।
रह जाए उसका
थोड़ा सम्मान।
हांलाकि वह जानती है
यह सिर्फ़ एक दुराशा है।
उसे तो बतानी है उसे
उसकी ओउकात।
तो क्या वह ख़ुद ही
खटखटा ले
बंद दरवाजे को?
हिम्मत नहीं जुटा पा रही है।
क्या होगा
अगर उसने नहीं खोला तब?
फैलने लगा है
सुबह का उजाला।
थोड़ी ही देर में
खुलने लगेंगे
पड़ोसियों के दरवाजे।
बचा ले उनकी निगाह में
अपनी इज्जत!
पलट गई वह।
उढ़का हुआ है दरवाजा
बंद नहीं किया गया था।
उसे भी पता था
लौट आयेगी वह।
वह भी जानती है
उसे भी कहाँ मिलेगी
तन के कपडे और
पेट के खाने पर
दिन-रात खटने वाली
ऐसी विश्वस्त परिचारिका?
घसीटती हुई पैरों को
बचाती हुई हर आहट
चली आई है रसोई में।
चुक गई सारी ताकत,
बिखर गई फर्श पर।
बह चले आखों से
अपमान और हताशा!
ठूंस कर मुंह में आँचल,
बेध रही है अपना ही कलेजा
अपनी चीखों से।
हे भगवान,
कितनी जरुरत है
ख़ुद के कमाए हुए
पैसों की!

Sunday, December 13, 2009

‘पा’ की औरतें और जमाने की हिचकियां

यह लेख आज,13 दिसंबर 2009 के राष्ट्रीय सहारा के संपादकीय पृष्ठ पर छपा है। वहां भी पढ़ा जा सकता है।

‘पा’ एक असामान्य फिल्म है। इसका अलग होना सिर्फ इस मायने में नहीं है कि इसमें एक अजीब सी बीमारी प्रोजेरिया के शिकार एक बच्चे को दिखाया गया है जो १२ साल की उम्र में साठ साल का या उससे भी बड़ा दिखता है और उसके शरीर के बढ़ने की रफ्तार जानलेवा होने की हद तक तेज है। अमिताभ बच्चन के नए अवतार ऑरो की भी काफी चर्चा है। लेकिन ‘पा’ की चर्चा इसके अलावा भी कुछ और कारणों से होनी चाहिए। दरअसल ये फिल्म परंपरा की कुछ पुरानी जकड़नों को बेहद निर्ममता के साथ ध्वस्त करती है। ‘पा’ फिल्म मजबूत महिला किरदारों की वजह से भी याद रखी जानी चाहिए। ये बाप-बेटे की नहीं मां-बेटे की कहानी है जिसमें पापा साइड रोल में है।


‘पा’ फिल्म की लीड करेक्टर विद्या कोई सामान्य लड़की नहीं है। विद्या की मां अरुधति नाग, जिसे ऑरो दादी की जगह मस्ती में 'बम' कहता है, भी सामान्य मां नहीं है। विद्या का जब अमोल (अभिषेक बच्चन) से शारीरिक संबंध बनता है तो वो जानती है कि इसका क्या नतीजा हो सकता है। आखिर वो मेडिकल की स्टूडेंट है। अमोल उसे अबॉर्शन यानी गर्भपात कराने की सलाह देता है। ये एक स्वार्थी-कैरयरिस्ट पुरुष की बेहद स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।

इस मोड़ पर विद्या और उसकी मां आम भारतीय परंपरागत लड़की और मां से अलग नजर आती है। परंपरा के बोझ से आजाद, विदेशी यूनिवर्सिटी में पढ़ रही विद्या अपना फैसला खुद लेने का साहस दिखाती है और बच्चा पैदा करने या ना करने के बारे में फैसला लेने की प्रक्रिया से पिता अमोल को अलग कर देती है। विद्या की मां भी आम भारतीय माताओं की तरह लड़की के बिगड़ जाने और पेट में बच्चा ठहर जाने को लेकर रोने पीटने नहीं लगती बल्कि मजबूती से यही पूछती है कि तुम्हें बच्चा चाहिए या नहीं। आखिरकार जब विद्या कहती है कि वो गर्भपात नहीं कराएगी तो विद्या की मां के चेहरे पर परेशानी की जगह एक आत्मविश्वास नजर आता है और एक तरह से अपनी बेटी के बोल्ड फैसले पर वो गर्व की मुद्रा में दिखती हैं।

भारतीय शहरों में भी बिनब्याही मां बनना अनहोनी बात ही है। फिल्मों में यदा कदा बिनब्याही मां का चरित्र आता है लेकिन बिना शादी के बच्चा पैदा करने के बेटी के फैसले पर संतोष व्यक्त करने वाली मां का किरदार किसी हिंदी फिल्म में ये कदाचित पहली बार आया है। विद्या की मां उस समय विधवा हो गईं थीं जब विद्या की उम्र सिर्फ दो साल थी। अकेले बच्चा पालने की तकलीफ का उन्हें एहसास है। फिर भी वो बेटी के फैसले से असहमत नहीं होतीं। बच्चे को पिता का नाम मिल जाए इसकी चिंता उन्हें है। लेकिन यहां पर उनकी बेटी विद्या इस बेहद मजबूती से जमे विचार की धज्जियां उड़ाती नजर आती हैं।

यहां तक कि विद्या अमोल को इस बात का हक देने के लिए तैयार नहीं हैं कि वो ऑरो को अपना बेटा कहे। वो बेहद सख्ती से कहती है कि तुमने अपने स्पर्म यानी शुक्राणु मेरे शरीर में डाल दिए, इतने भर से तुम्हें पिता होने का हक नहीं मिल जाएगा। स्त्री-पुरुष संबंधों का ये नया धरातल है। संबंधों की व्याख्या करने का पुरुष विशेषाधिकार यहां आकर टूटता है। आम तौर पर फिल्मों में महिलाएं ऐसे मामलों में बेटे या बेटी को पिता का नाम दिलाने के लिए संघर्ष करती दिखती हैं। लेकिन यहां एक मां है जो इससे बेपरवाह है और बेपरवाह ही नहीं है, इस विचार का ही वो विरोध करती हैं कि ऐसे पिता को पिता कहा जाए, जिसने पिता होने की कोई जिम्मेदारी ही नहीं निभाई। पिता होने को वो सेक्स के नतीजे यानी एक बायोलॉजिकल प्रक्रिया से बड़ा तथ्य मानती हैं और इसकी घोषणा भी करती हैं।

पा’ की औरतें जानती हैं कि उनका बोल्ड होना जमाने के लिए मुसीबत की वजह हैं। वो जानती हैं कि इस वजह से जमाने का गला सूखने लगता है और समाज को हिचकियां आने लगती हैं। लेकिन इस वजह से वो समझौता नहीं करतीं। वो समझौता करती भी हैं तो इसकी वजह परंपरा को मानने की मजबूरी नहीं हैं। जब ऑरो मृत्यु के करीब होता है और चाहता है कि उसकी मां और उसके पिता भी राउंड-राउंड घूमें जैसा कि शादी में होता है तो विद्या खुद ही पहल करती हैं और अमोल का हाथ पकड़कर ऑरो के बेड के चक्कर लगाती हैं। ये उसका अपना फैसला है, ये बेटे की इच्छा को पूरा करने की उसकी मजबूरी है।

स्त्री पात्रों का मजबूत चित्रण ‘पा’ फिल्म की एक बड़ी विशेषता है। सवाल ये है कि क्या इस मामले में ये फिल्म भारत के जमीनी यथार्थ से दूर है? इस सवाल का जवाब देते समय हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि भारतीय समाज कई लेयर्स यानी स्तरों में जी रहा है। समाज के एक हिस्से में सामंती जकड़न अब काफी हद तक टूट चुकी है। इस फिल्म की नायिकाएं उच्च मध्यवर्गीय महानगरीय परिवेश की हैं। विद्या की विदेश में हुई शिक्षा ने भी उसे लिबरेट किया है। ऐसे में उसके लिए अपने बारे में वैसे फैसले करने की स्वतंत्रता हासिल है जिसके लिए आम भारतीय लड़की सोच भी नहीं पाती।

फिल्मों में किसी विचार का आना इस बात का सबूत तो नहीं हो सकता कि समाज उस विचार को मानने और अपनाने के लिए तैयार है। मुमकिन है कि फिल्मकार को लगता है कि इस विचार का समय आ गया है और हो सकता है कि वो समय से काफी आगे चल रहा है। फंतासी और यथार्थ के बीच अक्सर काफी दूरी होती है। इसलिए ‘पा’ की महिलाओं के विचारों को समाज में कितनी स्वीकृति मिलेगी ये कह पाना अभी आसान नहीं है। लेकिन एक विचार के तौर पर ये बात आ गई है, ये तो ‘पा’ ने दिखा दिया है। इसकी वजह से समाज को आने वाली हिचकियों के कुछ संकेत तो फिल्मों में भी हैं और बाकी कुछ हिचकियों की हम कल्पना कर सकते हैं।

लड़कियों के उच्च शिक्षा क्षेत्र में आने और आर्थिक रूप से उनके स्वतंत्र होने के बाद भारतीय परिवार अब पहले जैसे तो नहीं रह सकते। शहरीकरण और कैप्सूल फैमिली के यथार्थ बन जाने से भी बहुत कुछ बदल गया है। विवाह संस्था, एकनिष्ठता, पुरुष वर्चस्व जैसी कई अवधारणाएं अब संकट में हैं। बदलाव की आहट चौतरफा है। इस बदलाव के कुछ नमूने ये फिल्म दिखा गई है।

Thursday, December 10, 2009

बेटियों ने किया पिता का अन्तिम संस्कार



उत्तर प्रदेश के छोटे से जनपद जालौन में लड़कियों द्वारा ऐतिहासिक कदम उठाया गया। पुत्र के न होने की दशा में पुत्रियों ने अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया साथ ही मुखग्नि भी दी।
प्रदेश में बुन्देलखण्ड क्षेत्र को हमेशा से पिछड़ा सिद्ध करने की साजिश होती रही है। ऐसे में इस क्षेत्र में इस प्रकार की घटना यह दर्शाती है कि इस क्षेत्र के लोग यदि अपनी परम्पराओं और संस्कार का निर्वहन करना जानते हैं तो वे रूढ़ियों को तोड़ने में भी विश्वास रखते हैं।
इस घटना में विशेष बात यह रही कि सभी ने लड़कियों के इस कार्य की सराहना की। किसी के द्वारा भी विरोध के स्वर सुनाई नहीं दिये।
वाकई ऐसी लड़कियाँ मिसाल हैं। शाबास...........


(यह घटना दिनांक 10 दिसम्बर 2009 के अमर उजाला, बुन्देलखण्ड संस्कारण में प्रकाशित की गई है।)

Monday, December 7, 2009

डीयू में सेक्शुअल हरासमेंट के खिलाफ पिंक लिटरेचर कैंपेन

दिल्ली विश्वविद्यालय की तरफ कोई निकले तो रैगिंग, धूम्रपान और ईव टीजिंग के खिलाफ पोस्टर जगह-जगह मिल जाएंगे। मेरा आम तौर पर उस तरफ जाना नहीं होता है। पर पिछले दिनों किसी काम से कैंपस में जाने का मौका मिला तो नजर वहां लगे टंगे पोस्टरों पर स्वाभाविक रूप से गई।

हाल के दिनों में दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू में महिला छात्रों या रिसर्चरों के खिलाफ सेक्शुअल हरासमेंट के कई मामले चर्चा में आए। उनकी जांच के लिए कमिटियों के बनने की भी चर्चाएं हुईं। डीयू के एक मामले में प्रोफेसर को बचाने की चौतरफा कोशिश के बाद भी उसे बर्खास्त होने से बचाया नहीं जा सका। इसी तरह जेएनयू जैसे वैचारिक रूप से विकसित और मुक्त माहौल में भी एक मामले में हाल के दिनों में एक प्रोफेसर को निलंबित कर दिया गया है।

लेकिन इतना कतई नाकाफी है। ऐसे दो-चार मामलों के बारे में हम जान पाते हैं, पर सेक्शुअल हरासमेंट के बाकी कई मामले दबे ही रह जाते हैं। ऐसे कई मामले तो वरिष्ठ छात्रों, शोधार्थियों और शिक्षकों तक के साथ हुए है। शिकायत के बाद कमिटियां वगैरह बना दी जाती हैं, पर इसके बावजूद उन मामलों पर कोई कार्रवाई नहीं होती। समय के साथ सब धुंधला होता जाता है और मामले अतीत के गर्त में खो जाते हैं।

इन बकाया मामलों की भी खोज-खबर लेने के लिए जिम्मेदार लोगों की नींद तोड़ने और हालात में बदलाव लाने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय में पिछले दिनों ऑपरेशन पिंक लिटरेचर शुरू किया गया। इससे पहले यहां हुए एक छोटे से सर्वे से यह बात सामने आई थी कि ज्यादातर पीड़ित शिकायत के लिए बने विशेष प्रकोष्ठ या कमिटी से बात करने या वहां शिकायत दर्ज कराने की बजाए अपने मित्रों और परिवार के लोगों से मदद मांगते हैं। कैंपस में हरासमेंट की घटनाओं को रोकने के लिए कोई छह साल पहले डीयू में आर्डिनेंस 15 डी बनाया गया था। लेकिन इसके बारे में भी कैंपस में जागरूकता कम है।

इन सब मसलों पर कैंपस में लोगों को सेंसिटाइज़ करने के लिए डीयू के कुछ छात्रों और शिक्षकों ने यह अभियान शुरू किया है और यह सभी के लिए खुला है, जो भी इससे जुड़ना चाहे।

हर महिला और पुरुष को एक इंसान के तौर पर देखने और उसकी मानवीय अस्मिता और गरिमा की इज्जत करने के बारे में संवेदनशील बनाए जाने की सख्त जरूरत है। अगर यह सीख कम उम्र में ही लोगों को मिले तो वे वह युवा होने पर इन मूल्यों को भी समझेंगे और उनका सम्मान करेंगे। इसके अलावा पीड़ित महिलाओं को पता हो कि अगर उनके साथ ऐसा कोई दुर्व्यवहार हो तो उन्हें इसके खिलाफ कहां शिकायत करे। डीयू की यह पहल स्वागत के लायक है।

Sunday, November 29, 2009

"लोकगीत में स्त्री" विषयक राष्ट्रीय सेमीनार में नहीं दिया जा सका एक सम्बोधन - शिरीष कुमार मौर्य

नंदा राजजात का एक दृश्य


देवियो और सज्जनो !
हिंदी की राष्ट्रव्यापी गोष्ठियों से गदगद इस समय में
मैं आप सबको अभिवादन करता हूँ !

मैं कहीं चूक भी सकता हूँ इसलिए पहले ही माफ़ी की दरकार करता हूँ

चूँकि बड़े-बड़े विद्वजनों को मैंने बोलते या बोलने का अभिनय करते देखा और सुना है इसलिए जानता हूँ कि गोष्ठियों में
इस तरह की `एंटीसिपेट्री बेल´ का विशेष प्रावधान होता है

हमारे बेहद ऊबड़खाबड़ प्रदेश
और उसके इस महान कठिन परिवेश के लोकगीतों में आखिर कहाँ है स्त्री
यह खोजने हम और आप आए हैं
उत्तराखंड की
समतल
सपाट
चपटी समझ वाली राजधानी में
जहाँ शराब और भूमाफियों का राज है
राजनीति है
विधानसभा है

मैं आपसे ही पूछता हूँ इस धन्य-धन्य वातावरण में
जंगल से घास काटकर आती
थक जाती
ढलानों पर सुस्ताती
और तब अपनी बेहद गोपन आवाज़ में
लोकगीत सरीखा कुछ गाती आपकी वो प्रतिनिधि औरत
आखिर कहाँ हैं ....

मेरा यह कहना गोष्ठी के सफल संचालन में कुछ ख़लल डाल सकता है
पर कवि हूँ मैं यह कहना मेरी ज़िम्मेदारी है
गीत को छोड़िए पहले लोक को खोजिए हमारे बदहाल होते गाँवों में
बीमार उपेक्षित बूढ़ों में -
उम्र के अंतिम मोड़ पर प्रेत की तरह गाँव के ढहते घर की हिफाजत करने को
अकेली छोड़ दी गई बूढ़ी औरतों में

आपके शहर की शाहराहों पर दम तोड़ते शब्दों में कहाँ पर खड़ा है यह शब्द - लोक
बिग बाज़ार में बिकती चीज़ों में कहाँ पर पड़ा है यह शब्द - लोक

चलिए
बचे हुए लोक को
एक परिभाषा दीजिए

क्या कहेंगे आप देहरादून में रहते हुए
उसके बारे में ...
कौन बचाता है उसे जब हम-आप विमर्श कर रहे होते हैं
ऐसे ही किसी सभागार में बैठ कर

बालों में सरसों का तेल डालकर रिबन बाँध स्कूल जाती एक किशोरी बचाती है उसे
घुघुती से न बोलने की गुहार लगाती एक विरहिणी बचाती है उसे जिसका पति फौज में है और ससुराल में प्यार नहीं
धीरे-धीरे धूमिल होते, बाज़ार में बदलते कौथीग भी बचाते हैं उसे किसी हद तक
गाँव की बटिया पर बीड़ी पीते एक आवार छोकरे की किंचित प्रदूषित आत्मा भी बचाती है उसे

कोई बचाए पर हम नहीं बचाते उसे
देवियो और सज्जनो !

बुरा न मानें तो कहूँगा कि हमें तो जुगाली तक करनी नहीं आती
हम अपने भीतर के ज्ञान को भी नहीं पचा पाते

और कितना भी छुपाना चाहें छुपा नहीं पाते अपना अज्ञान

तो ज्ञान और अज्ञान की इस संधि पर मुझे माफ़ करें
देवियो और सज्जनो !
मैं अधिक कुछ बोल पाने में तो समर्थ हूँ
पर आप सबकी भावनाओं को समझ पाने में असमर्थ

इस बार जब गाँव जाऊँगा
तो आप सबको याद रखूँगा
याद रखूँगा हमारी इस असफल बौद्धिक चवर्णा और विमर्श को
हमारी विराट आयोजकीय शक्ति को याद रखूँगा

इस सबसे बढ़कर वहाँ
जब जाऊँगा जँड़दा देवी के कौथीग* में
मैं याद रखूँगा अपनी शर्म को
जो मुझे अभी `लोकगीत में स्त्री´ विषयक सेमीनार के इस पोडियम पर
खड़े होकर आयी है
और यक़ीन करें मेरे साथ सैकड़ो किलोमीटर दूर जंगल में घास काट रही
एक बूढ़ी औरत भी शर्मायी है

हालाँकि
यह किसी भी तरह की अकादमिक जानकारी नहीं है
तब भी अगर जानना चाहे कोई
तो धीरे से बता दूँ उसे
कि लोकगीतों के भीतर और बाहर वह मेरी विधवा ताई है!

___________________________

*पौड़ी गढ़वाल में एक लोकदेवी, जिनके मन्दिर पर हर साल मेला लगता है। गढ़वाली में मेले को कौथीग कहते हैं।

Friday, November 27, 2009

ईडियट की स्पेलिंग भी जानती है ?

यूँ तो जितने कमेंट्स सेंगर जी की पिछली पोस्ट पर आए और अफलातून जी की पोस्ट पर आए उन्हे पढ लेने के बाद कुछ कहने की ज़रूरत रह नही जाती। चोखेरबाली की वर्षगाँठ के अवसर पर जब मधु किश्वर ने कहा कि पुरुषों को भी साथ लीजिए इसे जनाना डब्बा मत बनाइए तो राजकिशोर जी की कही यह बात याद आती है कि - आप पुरुषों को शामिल कीजिए , पर अभी उनपर विश्वास मत कीजिए!और यह मै आपके कान मे कहना चाहता हूँ , वे सुनेंगे तो मुझे छोड़ेंगे नही , हालाँकि यही सच है।
नही जानती कि इनमे से कौन बात पूरी तरह अमल मे लानी होगी, पर ये दो बातें विरोधी नही हैं !
खैर , मै एक उदाहरण से बात शुरु करती हूँ ।
बचपन मे सहेलियों के बीच यह खूब होता था कि लड़ाई-भिड़ाई में एक दूसरे को ईडियट या शट अप कह दिया तो भुनी हुई दूसरी सहेली झट कहती थी -हुँह ! ईडियट की स्पेलिंग भी जानती है ?
गोल गोल घुमाऊंगी नही बात को। चोखेरबाली स्त्री मुक्ति की झण्डा बरदारों की राजनीतिक पार्टी नही है। जिस राजनीतिक विचरधारा पर पार्टी चलाते हो उसके पुरोधाओं की पुस्तक भी पढी है या पूंजी के दास हो केवल ?
अब तक ऐसी स्त्रीवादी पार्टी नही बनी है सो यह सवाल नही उठता है ।बार बार यह बताने की ज़रूरतनही कि देखो , मै पहली महिला जिसने फलाँ फलाँ किया उसे जानती हूँ , भीखाई जी कामा हंसा मेंहता,राजकुमारी अमृत कौर,सरोजनी नायडू,अम्मू स्वामीनाथन, दुर्गाबाई देशमुख
सुचेता कृपलानी
के बारे मे पढा है मैने या वर्जीनिया वूल्फ ,उमा चक्रवर्ती , निवेदिता मेनन को पढा है ....इससे मुझे हक है कि मै अपने मन की बात लिखूँ !
जिन नारीवादियों का आह्वान किया गया है वे इस ब्लॉग पर कहीं नही हैं और जहाँ कहीं भी वे हैं ...वहाँ भी उनसे यह पूछना नारीवाद को सरासर न समझना ही माना जाएगा।

इस प्रकार तो आप न सिर्फ़ सामयिक नारीवादी लेखिकाओं - कार्यकर्ताओं के प्रति विद्वेषपूर्ण दिखते हैं अपितु इन महान स्त्रीवादी सामाजिक परिवर्तन की पुरोधाओं के प्रति भी अपमानजनक प्रतीत होते हैं। चूंकि मौजूदा पीढ़ी में इनकी बाबत सूचना न होने के पीछे भी पुरुष सत्ता्त्मक समाज का योगदान कहा जा सकता है ।(अफलातून)

यह ठीक उसी प्रकार का आरोप है कि -

नारीवादी स्त्रियों में आपसी एकता और परस्पर एकता की भावना नहीं होती !
औरत ही औरत की दुश्मन होती है !

सारी फेमेनिस्ट औरतें तर्क विमुख होती हैं !

फेमेनिज़्म एक पश्चिमी दर्शन है ! कोकाकोला की तरह झागदार और लुभावना आयात भर है!

नारी संगठन बस नारेबाज़ी और गोष्ठियों का आयोजन भर करते हैं !गावों में इनकी कोई रुचि नहीं !

मध्यवर्गीय कामकाजी औरतें घर से बाहर कामकाज के लिए नहीं मटरगश्ती के लिए निकलती हैं !

पारिवारिक शोषण की शिकायत करने वाली स्त्रियां ऎडजस्ट करना नहीं जानती !(नीलिमा)

और यह निश्चित तौर पर कह जा सकता है कि इस तरह के आरोप पुरुषों द्वारा भयाक्रांत होकर दिए जाते हैं।ठीक वैसे ही जब बचपन मे सहेलियाँ ईडियट सुनकर भुनभुना जाती थीं और कुछ न सूझने पर कहती थीं - तुझे स्पेलिंग भी पता है ईडियट की ?

आप स्त्री-विमर्श के स्वर को मजबूत नहीं कर सकते,मत कीजिए। लेकिन उसी की जमीन पर खड़े होकर उसी के खिलाफ अनर्गल बातें करें,ये हमें बर्दाश्त नहीं। (विनीत)
.
हमें क्या, कुछ साबित करना है और क्यूँ??....सरोजनी नायडू, को हाशिये पर कहना तो उनके अपमान जैसा है....
.हम आसपास ही रोज ऐसे उदाहरण देखते हैं जो झंडा लेकर नहीं चलती पर रोज किस जद्दोजहद से अपने अस्तित्व की लड़ाई लडती हैं.उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा नहीं लिया इसलिए उनकी रोज की अग्निपरीक्षा कहीं से कमतर नहीं है.(रश्मि रविजा)

अगर कोई महिला अगर इस या उस सूची की महिलाओं को नहीं जानती तो क्या उसे अपने हक के, अपने विचारों के बारे में कहने का हक नहीं रह जाता? (आर अनुराधा)


स्त्री को अपनी बात कहने के लिए कोई इतिहास , कोई राजनीति , कोई शास्त्र जानने की ज़रूरत नही है ... वह खुद जहाँ है वहाँ जो महसूस करती है जो सोचती है जो कहती है जो लिखती है .....अपनी पीड़ा से या बहनापे या जब अपने मानवीय अधिकारों का दावा करती है , उनके लिए लड़ना चाहती है ,उन्हे छीनना चाहती है, पाना चाहती है उसके लिए कतई ज़रूरी नही कि आप उसे स्त्रीवादी मानें , स्त्रीवादी होने के लिए किसी विशेष योग्यता का प्रमाण पत्र भी माँगें !इससे यह भी सामने आता है कि स्त्री विमर्श को देखने का स्वस्थ नज़रिया ही अभी विकसित नही हो पाया है । और जब तक स्त्री विमर्श के लिए वैकल्पिक सौन्दर्य शास्त्र , बोध विकसित नही होगा तब तक ऐसी परीक्षाएँ रोज़ होंगी , प्रमाण पत्र माँगे जायेंगे ......और हम जानते हैं कि बदलाव के दौर मे हृदय परिवर्तन नही होते बल्कि चक्रवात आते हैं ।जो साथ नही बहते वे उखड़ते हैं !

Thursday, November 26, 2009

महिलाओं के सम्मान या गरिमा को कम करना उद्देश्य नहीं पर इन्हें भी तो जानिये

स्त्री-विमर्श से जुड़ी हुई एक पुस्तक पढ़ी थी जिसमें समूची पुस्तक को दो भागों में बाँटा गया था। उसमें से एक शीर्षक को नाम दिया गया था ‘हंगामा है क्यों बरपा थोड़ा सा जो जी लेते हैं।’ कुछ इसी तरह की बात हुई हमारी पिछली पोस्ट पर भारतीय स्वाधीनता से सम्बंधित कुछ महिलाओं के नामों के बारे में चर्चा कर ली तो हंगामा सा मच गया।

पोस्ट बाहियात है; आगे से ऐसी पोस्ट का सामूहिक बहिष्कार हो; ऐसे विचारों के लिए अलग से ब्लाग बनाने तक का सुझाव दिया गया; अलग से पोस्ट तक लिख डाली गई, क्या वाकई इतनी हंगामी पोस्ट थी? एक साहब ने तो अपनी पोस्ट के द्वारा हमारी नीयत पर सवाल उठा दिये।

यह बात एकदम सही है कि यह ब्लाग सामुदायिक ब्लाग है और सार्थक चर्चा करता है। हम भी इसी कारण से यहाँ आये थे। रही बात अपनी पोस्ट पर किसी तरह की माफी माँगने की तो किसी तरह की गलत बात नहीं कही है और न ही महिला को अपमानित किया है। इस दृष्टि से माफी माँगने का सवाल ही नहीं, हाँ यदि ब्लाग के सूत्रधार कहें तो अपने आपको बापस कर सकते हैं या फिर वो चाहें तो हमारी सहभागिता को समाप्त कर दें। हमें किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं।

रही बात हमारी समझ को लेकर तो एक बात स्पष्ट कर दें कि जो व्यक्ति नारी का सम्मान नहीं कर सकता उसे अपने मनुष्य कहलाने के बारे में सोचना होगा। महिलाओं की प्रशंसा में कुछ कह देना ही यदि स्त्री का सम्मान है तो हम उसे गलत मानते हैं। सम्मान, स्नेह दिल से उपजता है, प्रशंसा में दो-चार कविताएँ, कहानियाँ, आलेख लिख देने से नहीं।

जहाँ तक इस पोस्ट को यहाँ लगाने का हमारा मन्तव्य था तो बस इतना कि आज स्त्री-विमर्श को लेकर जिस तरह से पुरुष-विरोध का वातावरण निर्मित है, जिस तरह से एक सशक्त आन्दोलन कुछ उच्च वर्ग की महिलाओं के हाथों में सिमटकर रह गया है, उसको यह बताना था कि हमारे देश में ऐसी भी महिलाएँ हुईं हैं जिन्होंने महिलाओं की दशा को सुधारने का कार्य किया और आज उन्हें कितने लोग जानते हैं?

जहाँ तक बात है कि संघर्ष सभी के लिए चल रहा है तो क्या इस बात का कोई जवाब देगा (क्षमा करिएगा, सवाल नहीं पूछना है) जवाब नहीं, अपने मन में झाँक कर देखिए और अपने से पूछिए कि बाँदा की सम्पतपाल को जब नक्सली होने का आरोप लगाकर सताया जाने लगा तो कितनी नारीवादी समर्थक महिलाओं ने उसका साथ दिया?

किसी के ऊपर आरोप लगाना, बिना कुछ सोचे-समझे तोहमत लगा देना, बात की गम्भीरता को समझे बिना अपना निर्णय थोप देना आसान है। पोस्ट की मंशा को समझें या न समझें पर हमारी इस मंशा को समझें कि हमारा उद्देश्य नारी की महत्ता को कम करना नहीं था और न ही किसी महिला को अपमानित करने का।

रही बात आगे के लिए तो हमारा हमेशा से प्रयास रहा है कि सार्थक बहस हो। आज इतने सशक्त आन्दोलन के बाद भी, घर से बाहर निकलने की छूट के बाद भी, शिक्षा के समस्त साधन उपलब्ध होने के बाद भी लड़कियाँ पढ़ क्यों नहीं पा रहीं हैं? और एक वह समय था जब शिक्षा के साधन दुर्लभ थे और महिलाओं को घर से बाहर झाँकने भी नहीं दिया जाता था, ऐसे समय में भी महिलाएँ स्नातक स्तर की शिक्षा ग्रहण कर रहीं थीं। क्या बतायेगा कोई भी पहली महिला स्नातक का नाम? (फिर सवाल, फिर परीक्षा)

बहरहाल टिप्पणियों को देखकर अपने मन्तव्य को स्पष्ट करना जरूरी लगा। आगे ब्लाग सूत्रधार की मर्जी।

Monday, November 23, 2009

इन महिलाओं को भी जानतीं हैं नारीवादी महिलायें?


स्त्री-चेतना के विकास के लिए आज स्त्री-विमर्श को प्रमुख माना जा रहा है। स्त्री-विमर्श क्या है और भारतीय संदर्भों में इसकी क्या उपयोगिता, क्या आवश्यकता है इसे समझने की आवश्यकता है। स्त्री-विमर्श को संदर्भित रूप में देखा जाये तो यह पश्चिम से आयातित शब्द है जिसने वहाँ की महिलाओं को स्वतन्त्रता प्रदान की। पश्चिम में एक समय वह भी आया जबकि स्त्री-विमर्श से जुड़े कई लोगों ने अपने आपको नारीवादी आन्दोलन से बापस कर लिया।
भारतीय संदर्भों में जब भी स्त्री-विमर्श की चर्चा की जाती है तो वह तुलसीदास से शुरू होकर आज की किसी प्रमुख हस्ती के साथ समाप्त हो जाती है। जो नारीवादी स्त्रियाँ अपने आपको स्त्री-विमर्श का पुरोधा मानतीं हैं वे बात-बात पर महिलाओं को रोके जाने के उदाहरण दिया करतीं हैं।
यहाँ यह बताना ज्यादा दिलचस्प होगा कि यदि कोई महिला विकास नहीं कर पाती है तो उसके पीछे पुरुष की भेदभाव भरी नीति काम करती है और यदि किसी महिला ने विकास कर लिया तो यह उसकी अपनी प्रेरणा, अपनी चेतना, अपना संघर्ष कहा जायेगा। कुछ भी हो महिलाओं ने हमारे देश में प्राचीन काल से ही सम्मानजनक दर्जा पाया है, उनके काम भी अविस्मरणीय रहे हैं।
आज की पोस्ट के द्वारा हम कुछ नाम आपके सामने रख रहे है, कृपया बतायें कि ये कौन हैं? इनका नाम किस क्षेत्र में उल्लेखनीय है? कहीं ऐसा तो नहीं कि पुरुष मानसिकता के कारण ये हमेशा हाशिये पर रहीं और स्वयं महिलाओं ने भी इनके बारे में जानने का प्रयास नहीं किया?
आग्रह विशेष रूप से स्त्री-विमर्श की पुरोधा महिलाओं से, जो बात-बात पर झंडा लेकर पुरुष समाज के विरुद्ध निकल पड़तीं हैं कि कहीं इन महिलाओं को आप लोगों ने भी तो विस्मृत नहीं कर दिया है?
इन महिलाओं के नाम इस प्रकार हैं--

1) हंसा मेंहता
2) राजकुमारी अमृत कौर
3) सरोजनी नायडू
4) अम्मू स्वामीनाथन
5) दुर्गाबाई देशमुख
6) सुचेता कृपलानी
7) रेणुका रे
8) लीला रे
9) पूर्णिमा बैनर्जी
10) कमला चैधरी
11) मालती चैधरी
12) दक्षयानी वेलायुदान

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आपकी सुविधा के लिए बता दें कि ये नाम स्वतन्त्रता के समय के हैं। हो सकता है कि आधुनिक ललनाओं ने इनके नाम भी न सुन रखे हों? आखिर उनकी आदर्श महिलाओं में ये नाम नहीं फिल्मी ग्लैमर गल्र्स के नाम होंगे?
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चलिए खोजिए इनका योगदान, हम तो 25 तारीख को बता ही देंगे।

Saturday, October 24, 2009

"आज के नारीवादी रचनाकार देह शोषण से आगे नहीं बढ़ते"- ममता कालिया

ममता कालिया हिंदी साहत्य में जाना-माना हस्ताक्षर हैं। पिछले दिनों उनसे बेबाक बातचीत का मौका बना। वही बातचीत लगभग जस-की-तस यहां दे रही हूं।


प्र.- आजकल क्या लिखना-पढ़ना चल रहा है?

उ. मैं दो उपन्यास साथ-साथ लिख रही हूं। यह शुरू से ही मेरी आदत रही है, एक साथ दो किताबों पर काम करने की। दरअसल जब कॉलेज में रहती थी तो वहां पर एक पर काम चलता रहता था। फिर उसे घर उठा कर नहीं लाया जा सकता था। सो, घर पर क्या करूं- तो एक और कहानी-उपन्यास घर पर लिखा करती थी। (हँसकर)- आज-कल भी वही कर रही हूं। हिंदी में मेरा एक उपन्यास है ‘दौड़’, जिसका अंग्रेजी में ट्रांसक्रिएशन (ट्रांसलेशन नहीं) कर रही हूं, ‘द बिग बाज़ार’ के नाम से। साथ में एक और उपन्यास लिख रही हूं, जिसे फिलहाल ‘संस्कृति’ नाम दिया है।

प्र.- ‘संस्कृति’ के बारे में कुछ बताइए।

उ.- साहित्य और संस्कृति की आजकल ठेकेदारी हो गई है। किस लेखक को चढ़ाएं, किसे उतारें, किसे पुरस्कार दे-न दें, सब, कुछ लोग मिलकर तय कर लेते हैं। एक तरह का प्रायोजनवाद चल रहा है। साहित्य, संस्कृति और कला की दुनिया में भी बाजार ने जोर से दस्तक दी है। यह गंभीर बात है जिस पर हिंदी में ज्यादा सोचा नहीं गया है। पत्रकारों ने भले ही नोटिस किया हो लेकिन साहित्यकार ने इस पर गंभीरता से नहीं लिखा है कि कोई मठाधीश रूठ न जाए क्योंकि सभी की नजर किसी पुरस्कार, नियुक्ति, संस्तुति पर लगी रहती है। यही सब इस उपन्यास का मूल विषय है।

प्र.- हाल में जो कुछ पढ़ा हो!

उ.- ज्ञान प्रकाश विवेक का ‘आखेट’ पढ़ा। यह बहुत ही अच्छा लगा। इसके अलावा एक और किताब जिसके बारे में मैं कहते नहीं थकती- 1995 में आई बराक ओबामा की आत्मकथात्मक पुस्तक ‘द ड्रीम्स फ्रॉम माई फादर’। ओबामा को नोबेल पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई तो बहुत खुशी हुई। यह पुस्तक पढ़कर लगता है जैसे किसी गांधीवादी का लेखन है।

प्र.- नोबेल पुरस्कारों की बात निकली है तो- भारत में रबींद्रनाथ ठाकुर के बाद साहित्य के क्षेत्र में कोई नोबेल नहीं आया। क्या हमारा साहित्य उस स्तर तक नहीं पहुंच पाया या हम उसे वहां तक नहीं पहुंचा पाते?

उ.- हिंदी का लेखक बेचारा निहत्था, भोला-भाला होता है। उसे पता ही नहीं कि नोबेल के लिए पुस्तक कैसे भेजें। प्रकाशक को यह करना चाहिए, पर अपने लेखक के उत्थान में उसकी कोई रुचि नहीं है। किसी तरह 500 प्रतियां बिक जाएं बस। हिंदी की पुस्तक को विश्व परिदृष्य पर रखने के लिए प्रकाशकों ने कभी वैसी मेहनत की, जैसी लैटिन अमरीकी देशों के प्रकाशकों ने की? उन्होंने अपने यहां के साहित्य का पूरे संसार में वितरण करवाया। लेकिन हमारे यहां हिंदी में प्रकाशक यह जिम्मेदारी नहीं लेता।

प्र.- तो फिर लेखक खुद क्यों नहीं इसके लिए प्रयास करते, जैसा कि आपने कहा कि वे पुरस्कार आदि पाने के लिए करते हैं?

उ.- लेखक के पास साधन नहीं है, धन नहीं है और प्रकाशक पैसा खर्च नहीं करता। बुकर या नोबेल में किताब भेजने के लिए पैसा खर्च करना पड़ता है। इसीलिए किसी दिन पूंजिपति उधार की पुस्तक ‘लिखकर’ नोबेल के लिए भेज देंगे। एक दिन सभी पूंजिपति लेखक बन जाएं तो आश्चर्य नहीं। प्रकाशकों को नोबेल तक पहुंचने के सारे रास्ते पता हैं, पर वे कुछ करते नहीं हैं। विचार फैलाने या भारतीय प्रतिभा के मूल्यांकन की दृष्टि से नहीं, सिर्फ मुनाफे की नजर से वे लेखक और रचना को देखते हैं।

प्र.- विषयांतर करते हैं। आजकल महिलाएं जो कुछ लिख रही हैं...

उ.- मैं विषय-सीमा नहीं मानती कि महिलाएं कुछ खास विषयों पर ही लिख सकती हैं। लेकिन बाजार का दबाव है कि महिलाओं से खास तरह के लेखन/साहित्य की आशा की जाती है। वे भी घर से निकलती हैं, नौकरी करती हैं और हर तरह का काम करती हैं। बल्कि उसे स्थितियां अपने अनुकल बनाने के लिए दोहरी मेहनत करनी पड़ती है। लेकिन मेरा मानना है कि नैसर्गिक प्रतिभा के कारण स्त्री हमेशा बेहतर वर्कर होती है। महिलाओं ने अपनी चेतना से यह क्षमता विकसित की है कि हर काम को वे अपना पूरा समर्पण, निष्ठा देती हैं।

प्र.- स्त्री-विमर्श की शुरुआत अब हिंदी लेखन में भी हो गई है। वह भी एक स्वीकार्य विषय हो गया है।

उ.- मुश्किल ये है कि जो बातें स्त्री विमर्श में शामिल हो रही हैं वे कहानियों-साहित्य में नहीं आ रही हैं। दोनों गीत अलग-अलग सुरों में चल रहे हैं।

प्र.- लेकिन कई दशक पहले लिखे स्त्री-विमर्शात्मक साहित्य को तक फिर पूरा महत्व दिया जा रहा है, वे रचनाएं धूल झाड़ कर फिर छापी जा रही हैं। जैसे - 'सरला- एक विधवा की आत्मजीवनी' ।

उ. – हां, बिल्कुल। सरला- एक विधवा की आत्मजीवनी या एक अज्ञात हिंदू महिला...। तारा बाई शिंदे, पंडिता रमा बाई आदि ने बीसवीं सदी के शुरू में जो विषय उठाए थे, आज का नारी विमर्श उससे भटक गया है। उन्होंने अपने समय की विसंगतियों को लिखा। पर आज के नारीवादी रचनाकार देह शोषण से आगे नहीं बढ़ते। दूसरे किस्म का शारीरिक और मानसिक शोषण, देह शोशण से कम भयावह नहीं। पर उसे तवज्जो नहीं दी जा रही है।

प्र.-आपकी रचनाओं में भी महिला-जीवन के कई पहलू सामने आते हैं।

उ.- मेरी रचनाओं में नारी विमर्श थेगली की तरह नहीं आता बल्कि कहानी के साथ चलता है। वास्तविक स्त्री को जेहन में लाएं तो पाएंगे कि उसके जीवन में भी कभी खुशी तो कभी दुख है। वह सहज ही जीवन में इन सब क्षणों से गुजर रही है। वह हमेशा एक ही मनोभाव लेकर नहीं रहती, न ही घर में हमेशा नारीमुक्ति का झंडा उठाए रहती है। मैं मानती हूं कि जागरूक स्त्री अपने पास-परिवेश को बदलती और संस्कारित भी करती है।

Friday, October 16, 2009

लक्ष्मी जी को अब विश्राम करने दें
राजकिशोर


बहुत पहले नीरद सी. चौधरी की एक किताब – पैसेज टू इंग्लैंड - पढ़ी थी जिसमें उन्होंने इंग्लैंड की अपनी यात्रा के संस्मरण लिखे थे। उसका एक प्रसंग जब-तब मेरे जेहन को झकझोरता रहता है। चौधरी ने लिखा था कि वे जिस-जिस अंग्रेज के घर गए, उन्होंने यह खोजने की कोशिश की कि वे धन की किस देवी की पूजा करते हैं। लेकिन कहीं भी – कोने-अंतरे में भी – धन की किसी देवी की मूर्ति उन्हें दिखाई नहीं दी। नीरद बाबू आस्तिक थे या नास्तिक, यह मुझे नहीं मालूम। मुझे यकीन है कि अपनी इस खोज – या, खोज की विफलता – से वे भारतवासियों की लक्ष्मी पूजा की आलोचना करना जरूर चाह रहे थे। भारत को अध्यात्म – प्रधान देश माना जाता रहा है। आज भी बहुत-से लोग यह दावा करके प्रसन्न होते हैं। वास्तविकता यह है कि उत्तर भारत के हर घर में अन्य किसी देवी-देवता की मूर्ति रखी हो या नहीं, लक्ष्मी या लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति जरूर दिखाई पड़ जाती है। दीपावली तो लक्ष्मी पूजन का त्यौहार है ही।

उत्तर भारत के लोग बड़ी गंभीरता से लक्ष्मी पूजन करते हैं, पर अभी तक तो उत्तर भारतीयों को लक्ष्मी का प्रसाद मिला नहीं है। आर्थिक प्रगति की दौड़ में उत्तर भारत देश के बाकी हिस्सों से काफी पिछड़ गया है। इसके आसार दिखाई नहीं देते कि वह तेज रफ्तार से दौड़ कर वर्तमान गैप को पांच-दस साल में पूरा कर लेगा। उत्तर भारत के गरीब और विकल्पहीन लोग रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में जाते हैं और समय-समय पर अपमानित होते रहते हैं। ये सभी पुश्तैनी लक्ष्मी पूजक हैं। पर लक्ष्मी जी आंख उठा कर भी अपने इन उपासकों के दीन-हीन चेहरों को नहीं देखतीं। वक्त आ गया है कि समृद्धि पाने के लिए हम किसी खास देवी पर आश्रित न रहें तथा अन्य दिशाओं में सोचें।

तो क्या धन-संपत्ति की देवी लक्ष्मी की प्रामाणिकता में शक करने का समय आ गया है 9 कहीं ऐसा तो नहीं है कि वे वह नहीं हैं जो हम उन्हें समझते हैं 9 या, हमें लक्ष्मी की पूजा करना ही नहीं आता 9 यहां मैं आस्तिकता बनाम नास्तिकता का प्रश्न उठाना नहीं चाहता। लेकिन यह तो कोई भी देख सकता है कि जब स्वयं ईश्वर ही संदेह और अविश्वास के घेरे में है, तो उसके मातहत छोटे-बड़े देवी-देवताओं की क्या बिसात। अगर ईश्वर में आपकी आस्था है, तब भी आपके लिए देवी-देवताओं में यकीन करना या उनकी मूर्तियों की पूजा करना आवश्यक नहीं है। दयानंद सरस्वती, जिनका निधन दीपावली की शाम को हुआ था, परम आस्तिक थे, पर मूर्ति पूजा की व्यर्थता पर जोर देनेवालों में अग्रणी थे। इसलिए देवी लक्ष्मी को विदा करने और यह कबूल न हो तो उन्हें विश्राम देने का प्रस्ताव आस्तिकता के लोकप्रिय दायरे में भी किया जा सकता है।

यह आपत्ति विचारणीय है कि हम अपनी मूल सांस्कृतिक विशेषताओं के साथ समझौता कैसे कर सकते हैं 9 अपनी सांस्कृतिक विरासत को इतिहास की नदी में विसर्जित करने के बाद हम अपने को किस हक से भारतीय कह सकेंगे 9 पहली बात तो यह है कि देवी-देवताओं को मानना या न मानते हुए भी उनकी पूजा करना भारतीय संस्कृति का अनिवार्य अंग नहीं है। बहुत-से भारतीय, जैसे जैन और बौद्ध, देवी-देवताओं को माने बिना भी धर्म की साधना करते रहते हैं। मेरा खयाल है, आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन के समर्थकों को भी मूर्ति पूजक होने में असुविधा महसूस होती होगी। फिर दोहरी जिंदगी क्यों जिएं 9 दूसरी बात यह है कि दीपावली मुख्यतः उत्तर भारत का पर्व है। भारत के सभी अंचलों के लोग इस दिन त्यौहार नहीं मनाते, न ही लक्ष्मी पूजन करते हैं। इसलिए यह दावा करना ठीक नहीं कि लक्ष्मी पूजन का सिलसिला रुक गया, तो भारतीयता का क्या होगा 9

भारतीयता या हिन्दू धर्म की सच्ची चिंता उनके सभी प्रचलित रूपों को बनाए रखने की चिंता का पर्याय बना देने से यह संभावना ज्यादा है कि उनके जो रूप जड़ या अर्थहीन हो चुके हैं उन्हें भी ढोते रहा जाए और नए रूपों को विकसित न होने दिया जाए। संस्कृति हमारी चेतना का घर है। घर की तरह ही संस्कृति में भी नियमित रूप से झाड़ू-बुहारी होनी चाहिए। अगर जाति प्रथा या कन्या दान या दहेज या जनेऊ हिन्दू धर्म की अनिवार्य पहचान नहीं रहे, तो हम उसी तर्क से सत्यनारायण की कथा, लक्ष्मी पूजन आदि से भी मुक्त हो सकते हैं। इस समय लक्ष्मी के बजाय सरस्वती की पूजा का प्रचार-प्रसार करना आवश्यक है। सरस्वती की आराधना करने से सत्य ही नहीं, समृद्धि भी मिलेगी। हां, इन दिनों सरस्वती के नकली साधक ही समाज और बाजार पर हावी हैं। सरस्वती के असली साधकों का एक जरूरी कर्तव्य इन्हें अपदस्थ करना भी होगा। 000

शुभ दीपावली

सभी को दिवाली की शुभ कामनाएं ........

---नीलिमा गर्ग



Tuesday, October 13, 2009

उस जीवट महिला की हिम्मत और हौसलों को नमन


बीते दिनों रुखसाना की बहादुरी के किस्से सभी की जुबान पर रहे। वाकई हिम्मत की बात है। लगा कि देश से अभी लड़कियों में स्वाभिमान, वीरता जैसे गुण समाप्त नहीं हुए हैं। इस तरह के अन्य उदाहरणों की खोज में हम लगे भी रहे कि और भी कुछ मिले जिससे रुखसाना जैसी लड़कियों को और भी प्रोत्साहन मिल सके। यहाँ बुन्देलखण्ड में भी कुछ युवा लड़कियों के वीरतापूर्ण कारनामें सुनने को मिले। इनके बारे में फिलहाल बाद में।
आज इस पोस्ट के साथ एक छोटा सा वीडियो भी है जो खुद हमारी लापरवाही से पूरी तरह फिल्माया नहीं जा सका। कोई दो-तीन दिन पहले की बात होगी। फुर्सत के पलों में बैठे-बैठे टी0वी0 पर चैनल इधर-उधर कर रहे थे। इसी में सोनी चैनल पर रुक गये। इंटरटेनमेंट के लिए कुछ भी करेगा (शायद यही नाम था कार्यक्रम का) चल रहा था। एक लड़की आते दिखी जो वैसाखी से चल कर आ रही थी। मन में कौतूहल उठा कि देखें कि वैसाखी पर चलकर आती यह लड़की क्या विशेष करेगी।
दिमाग में था कि ये लड़की गाना वगैरह गायेगी। कार्यक्रम की एंकर ने बताया कि वह लड़की कराटे में ब्लैक बेल्ट है तो और भी जिज्ञासा जागी। लड़की आई, उसके लिए कुरसी मँगवाई गई, उस पर उसने बैठ कर बताया कि किसी बीमारी के कारण घुटने के ऊपर से उसका एक पैर काटना पड़ा। वह नृत्य भी कर लेती थी। पैर के कटने के बाद उसके पति ने उसे भरपूर सहयोग दिया और वह अपने नृत्य को बराबर जारी रख सकी।
और भी बहुत बताने के बाद उस लड़की ने बिना वैसाखी के, एक पैर के सहारे से नृत्य करना शुरू किया। उस लड़की की हिम्मत के आगे हम स्वयं वशीभूत होकर कार्यक्रम देखने लगे। अगले ही पल ख्याल आया कि ऐसे विशेष पलों को तो कैमरे में कैद करना चाहिए। जब तक हम कैमरा उठाते, फिल्म बनाते, तब तक बहुत सा हिस्सा निकल चुका था। इस कार्यक्रम में केवल एक मिनट मिलता है अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए। इसमें से कुछ सेकेंड निकल गये थे। जो बचे उन्हें हम फिल्मा सके वह आप भी देखिये और इस लड़की की हिम्मत की तारीफ कीजिये।
इसी तरह की लड़कियाँ आज भी देश की लड़कियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देतीं हैं।

Friday, October 2, 2009

सलाम रुखसाना !

पूजा प्रसाद

रुखसाना ने जो किया है, वो कितना अद्भूत कारनामा है!

रुखसाना ने अपने घर में घुस आए आतंकवादियों को उन्हीं की राइफल से भून डाला है। जम्मू कश्मीर के कौसर जिले में रहने वाली रुखसाना 18 साल की है।

रुखसाना के मामले में आज फिर से एक बात साबित हो गई। मैं हमेशा यह मानती रही हूं कि जिस लड़ाई को आप अपनी आखिरी लड़ाई मान कर लड़ते हैं, उसमें आपकी जीत होती ही है। मेरा मानना है कि लड़ाई जीतने के लिए नहीं लड़ी जानी चाहिए। न ही किसी को हराने के लिए लड़ी जानी चाहिए।
लड़ाई कोई एक मूल्य (या मूल्यों का समुच्चय) 'स्थापित'करने के लिए लड़ी जानी चाहिए। रुखसाना के केस में यह मूल्य जीवन था, जिसे मौत के ऊपर स्थापित किया जाना था। किए जाने की आखिरी कोशिश करना था।

एक बात और बांटना चाहती हूं। रुखसाना के केस में भी देखा। जब आप यह मान लेते हैं कि यह आपकी आखिरी लड़ाई है और इस लड़ाई का फैसला उस फैसले से बड़ा नहीं जो आप खुद ले चुके होते हैं, तो जीत आपकी ही होती है। हर चीज आपकी होती है। यह संभवत: गुरुमंत्र हो सकता है, किसी का भी।

रुखसाना ने आपबीती में जो बताया, उसके अनुसार, जब उसने देखा कि आतंकवादी उसके माता पिता को जोर जोर से मार रहे हैं और फिर उसे भी कुछ देरसबेर में मार ही दिया जाएगा, तब वह अपने बचे खुचे जीवन की आखिरी लड़ाई लड़ने के लिए चारपाई के नीचे से निकल कर आतंकवादियों के सामने आ खड़ीहुई थी। राइफल से पहले वह दो आतंकवादियों पर कुल्हाड़ी से वार कर चुकी थी।

लेकिन यहां एक बात और। रुखसाना की कहानी से एक बार फिर यह पुष्ट हुआ है कि आप हर लड़ाई को आखिरी मान कर नहीं लड़ पाते। ऐसा लगता है यह

संभव ही नहीं। आप चुनिंदा लड़ाईयां ही आखिरी लडा़ई मान कर लड़ पाते हैं। यह और बात है कि यह चुनिंदा लड़ाईयां कौन सी होती हैं, यह हम अचानक एक

दिन/एक क्षण/एक घंटे में तय कर लेते हैं।

वैसे 'चाहिए'शब्द बड़ा ही भाषणबाजी और आदर्शवादी टाइप हो जाता है। पर हम सब अपने जीवन में दो ड्राफ्ट्स के साथ जीते हैं। पहला, हमारा अपना बनाया हुआ। दूसरा, ईश्वर/परिस्थितियों का बनाया हुआ। यह -चाहिए- शब्द नॉन-सिचुएशनल ड्रॉफ्ट का हिस्सा है। यानी, अपने बनाए गए ड्रॉफ्ट का हिस्सा है। इस ड्रॉफ्ट के लिए कुछ चाहिए- टाइप चीजें जरूरी होती हैं, ऐसा लगता है।

रुखसाना के बारे में एक बात और पढ़ी। कि, वह अब काफी इनसिक्योर है और उसे लगता है कि उसके वर्तमान ठिकाने पर पुलिस आदि की सुरक्षा देने की बजाए सरकार और सुरक्षाबलों को चाहिए कि उन लोगों को कहीं दूसरी जगह भेज दिया जाए। अभी तक तो उसकी यह बात मानी नहीं गई है। आतंकवाद जब

वीवीआईपी के सुरक्षा चक्र को भेद डालता है तो रुखसाना चंद पुलिसवालों के बीच सुरक्षित होगी, इसकी उम्मीद बहुत कम है। समय बीतने के साथ सुरक्षा घेरा

बासी रोटी सा टूट कर झड़ने लगेगा। ऐसे में रुखसाना की उनका ठिकाना शिफ्ट करने की बात मानी क्यों नहीं जा रही है? क्या हमारी सरकारें और सुरक्षाबल इसी तरह से वीरता का सम्मान करते रहेंगे, कि उन्हें काफी हद तक उनके हाल पर छोड़ दिया जाए?

सुरक्षा मुहैया करवाना यदि खानापूर्ति करने की जरूरत है तो वह किए जाने की कोई जरूरत नहीं है। रुखसानाओं को खानापूर्तियों की जरूरत नहीं है।

"Tell your heart that the fear of suffering is worse than the suffering itself."

-POOJA PRASAD

"Lilavati's Daughters: The Women Scientists of India"

इंडियन अकेडमी ऑफ़ सायंस ने सिलसिलेवार तरीके से पिछली तीन पीढीयों की महिला वैज्ञानिकों के जीवन अनुभवों पर आधारित एक संकलन तैयार किया है "Lilavati's Daughters: The Women Scientists of India".

गुजर गयी
पीढी के बारे मे कई जाने-माने वैज्ञानिकों ने लिखा है, और जो अभी सेवामुक्त और सेवा मे लगे है, उन्होंने अपने अनुभवों को समेटा है. कई तरह के सवाल जहन मे है, और कई लोगो से सीधा-तिरछा सामना भी रहा है, इन पर फ़िर कभी। फिलहाल कुछ अनुभव अतिरेक के साथ भी पढने मे रुचिकर है...

Tuesday, September 29, 2009

मैं पूछूं तुमसे

मत रूठो मुझसे
मेरे स्वामी!
देखो, मैं बन सकती हूँ
तुम्हारी माँ,
मित्र तो हूँ ही मैं,
तुम मानो या नहीं।
वक्त पड़े अगर तो
मैं बन जाउंगी
तुम्हारी दासी भी,
पर मत कहो मुझसे
बनने के लिए
वेश्या तुम्हारी!
कि छटपटाती है
मेरी आत्मा
अदा करने मैं तुम्हे
ये कीमत
तुम्हारे दिए इस
रोटी, कपड़े और मकान की ।
हो सके तो
बना लो मुझे अपनी प्रेमिका,
करो मुझसे प्यार,
और मैं दे दूंगी
वो सब कुछ तुम्हे
जो भी है मेरे पास।
एक बात पूछूं मैं तुमसे?
आई थी मैं तुम्हारे पास,
छोड़ कर सब कुछ अपना,
घर और परिवार।
क्यों नहीं बन पाए
कभी तुम
पिता, भाई और
मित्र मेरे?

Saturday, September 26, 2009

भ्रूण हत्या बनाम नौ कन्याओं को भोजन ??

नवरात्र मातृ-शक्ति का प्रतीक है। एक तरफ इससे जुड़ी तमाम धार्मिक मान्यतायें हैं, वहीं अष्टमी के दिन नौ कन्याओं को भोजन कराकर इसे व्यवहारिक रूप भी दिया जाता है। लोग नौ कन्याओं को ढूढ़ने के लिए गलियों की खाक छान मारते हैं, पर यह कोई नहीं सोचता कि अन्य दिनों में लड़कियों के प्रति समाज का क्या व्यवहार होता है। आश्चर्य होता है कि यह वही समाज है जहाँ भ्रूण-हत्या, दहेज हत्या, बलात्कार जैसे मामले रोज सुनने को मिलते है पर नवरात्र की बेला पर लोग नौ कन्याओं का पेट भरकर, उनके चरण स्पर्श कर अपनी इतिश्री कर लेना चाहते हैं। आखिर यह दोहरापन क्यों? इसे समाज की संवेदनहीनता माना जाय या कुछ और? आज बेटियां धरा से आसमां तक परचम फहरा रही हैं, पर उनके जन्म के नाम पर ही समाज में लोग नाकभौं सिकोड़ने लगते हैं। यही नहीं लोग यह संवेदना भी जताने लगते हैं कि अगली बार बेटा ही होगा। इनमें महिलाएं भी शामिल होती हैं। वे स्वयं भूल जाती हैं कि वे स्वयं एक महिला हैं। आखिर यह दोहरापन किसके लिए ??

समाज बदल रहा है। अभी तक बेटियों द्वारा पिता की चिता को मुखाग्नि देने के वाकये सुनाई देते थे, हाल ही में पत्नी द्वारा पति की चिता को मुखाग्नि देने और बेटी द्वारा पितृ पक्ष में श्राद्ध कर पिता का पिण्डदान करने जैसे मामले भी प्रकाश में आये हैं। फिर पुरूषों को यह चिन्ता क्यों है कि उनकी मौत के बाद मुखाग्नि कौन देगा। अब तो ऐसा कोई बिन्दु बचता भी नहीं, जहां महिलाएं पुरूषों से पीछे हैं। फिर भी समाज उनकी शक्ति को क्यों नहीं पहचानता? समाज इस शक्ति की आराधना तो करता है पर वास्तविक जीवन में उसे वह दर्जा नहीं देना चाहता। ऐसे में नवरात्र पर नौ कन्याओं को भोजन मात्र कराकर क्या सभी के कर्तव्यों की इतिश्री हो गई ....???
आकांक्षा यादव

Thursday, September 24, 2009

बालिका दिवस -- २३ सितम्बर 2009


बालिका दिवस की सभी को बहुत बहुत बधाई .......

Wednesday, September 23, 2009

सूडानी स्त्रियों का संघर्ष

लड़ो तो ऐसे लड़ो
राजकिशोर

सूडान की युवा पत्रकार लुबना अहमद अल हुसेन को इस अजनवी हिन्दुस्तानी का सलाम। लुबना ने यह साबित कर दिया है कि साधारण-सी बातों को ले कर किस तरह इतिहास रचा जाता है। बेशक हमारे देश में औरतों के लिए पैंट पहनना साधारण-सी बात है, यद्यपि यहाँ भी कई प्रकार के समाज-विरोधी विचार तथा संगठन इसे एक असाधारण घटना बनाने पर तुले हुए हैं। लेकिन सूडान में औरतों का पैंट पहनना अपराध है। वहाँ के नैतिक कोतवाल इसे महिलाओं के लिए ‘अभद्र’ पोशाक मानते हैं। इस अपराध के लिए उन्हें अधिकतम चालीस कोड़े लगाए जा सकते हैं और एक सौ सूडानी डॉलर की जमानत लेनी पड़ सकती है।

सूडान में ईसाई भी रहते हैं और मुसलमान भी। ईसाइयों पर यह कानून लागू नहीं होता। पर मुस्लिम औरतों पर इस तरह के कई अभद्र कानूनों का शिकंजा है। 1989 में कट्टरपंथी उमर अल बशीर द्वारा तख्ता पलट के बाद मध्ययुगीन इस्लामी कानून लागू करने की रवायत शुरू हो गई थी। इसी के तहत 1991 में औरतो के लिए भद्रता के नियम बनाए गए। इन नियमों के तहत अब तक हजारों मुसलमान लड़कियों और औरतों को गिरफ्तार कर उन्हें कोड़े लगाए जा चुके हैं। हम सभी को सूडानी महिलाओं की बहादुरी का लोहा मानना चाहिए कि कोड़े खाने का खतरा उठा कर भी वे ‘क्या पहनें, क्या न पहनें’ के अपने मूल अधिकार से समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं।

चौंतीस साल की लुबना हुसेन, जिनके पति का देहांत हो चुका है, इन्हीं साहसी औरतों में हैं। उन्हें पिछली 3 जुलाई को सूडान की राजधानी खारतूम में बारह दूसरी स्त्रियों के साथ गिरफ्तार किया गया था। इन सभी का अपराध यह नहीं था कि वे एक रेस्त्रां में संगीत के कार्यक्रम का आनंद ले रही थीं। इस पर सूडान में कोई पाबंदी नहीं है। उनकी ढीठाई यह थी कि उस समय वे ट्राउजर पहने हुए थीं। उन सभी को गिरफ्तार कर स्थानीय थाने में ले जाया गया। कमी बस यह थी कि हथकड़ियाँ नहीं पहनाई गई थीं। थाने में ज्यादातर ने अपना अपराध मंजूर कर लिया। दल-दस कोड़े मार कर उन्हें घर भेज दिया गया। लुबना तथा कई और औरतें पैंट पहनने के अपने अधिकार पर अड़ी रहीं। सो उनका मामला अदालत के सुपुर्द कर दिया गया।

सूडान की पुलिस ने कोड़े मारने का भी अपना तरीका बनाया है। ये कोड़े सिर्फ मामूली चोट पहुँचाने के लिए नहीं मारे जाते, जैसे शैतान बच्चों को पहले बेंत से मारा जाता था। चेतावनी देने से अधिक कष्ट पहुंचाने का इरादा होता है। कोड़े बनाने के लिए प्लास्टिक की रस्सियों का इस्तेमाल होता है। जहाँ कोड़ा पड़ता है, वहाँ ऐसा जख्म बनता है जिसका दाग कभी नहीं मिटता। साफ है कि मामला न्यायिक कार्रवाई का नहीं, प्रतिहिंसा का है, जिसके पीछे मजा चथाने का भाव होता है – जींस की पैंट पहनी है, तो लो, यह भी भुगतो।

सजा से बचने के लिए लुबना हुसेन के पास एक कारगर कवच था। वे संयुक्त राष्ट्र के लिए काम कर रही थीं। सूडान के कानून में ऐसे व्यक्तियों पर संयुक्त राष्ट्र की इजाजात के बिना मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। इसी बिना पर जज ने लुबना से कहा कि हम आप पर मुकदमा चलाना नहीं चाहते, आप चाहें तो जा सकती हैं। पर चट्टानी इरादों की इस सख्त औरत के लिए सवाल सिद्धांत का था, सुविधा का नहीं। उसने कहा कि मुझ पर मुकदमा चलाया जाए, ताकि मैं अदालत में अपना पक्ष रख सकूँ। इसलिए मैं राष्ट्र संघ की नौकरी छोड़ रही हूँ। लुबना ने यह नौकरी छोड़ दी, तो मुकदमे की कार्रवाई फिर से शुरू हुई। समां यह था कि जिस दिन अदालत में विचार होना था, सैकड़ों महिलाएँ अदालत के बाहर जमा हो गईं और स्त्रियों के खिलाफ भेदभाव के खिलाफ नारे लगाने लगीं। इनमें से बहुतों ने पैंट पहन रखी थी। शोर-शराबा उपद्रव में न बदल जाए, इसलिए कार्रवाई को स्थगित करना पड़ा। अगली बार भी विरोध और प्रदर्शन के कारण कार्रवाई स्थगित करनी पड़ गई।

तमाम जिरह और बहस के बाद अदालत ने लुबना को अपराधकर्ता करार दिया और उन्हें 130 सूडानी डॉलर का जुर्माना भरने का हुक्म दिया। लुबना के लिए यह एक मामूली-सी रकम थी। पर सवाल सिद्धांत का था। उन्होंने अदालत को ठेंगा दिखाते हुए कहा कि मैं एक दमड़ी भी नहीं दूँगी। जज में थोड़ी भी इनसानियत होती, तो वह जुर्माने की रकम अपने पास से भर देता और कैदी को आजाद कर देता। सजा देना उसके लिए कानूनी मजबूरी हो सकती थी, पर व्यक्तिगत कर्तव्य तो यही था कि वह एक इनसान की बुनियादी आजादियों का समर्थन करता। लेकिन किसी फासिस्ट सत्ता द्वारा नियंत्रित समाज में जिसके पास जितनी ज्यादा ताकत होती है, वह उतना ही ज्यादा डरा हुआ होता है। जुर्माना न चुकाने के कारण लुबना को 7 सितंबर को जेल भेज दिया गया। रात वहीं कटी। अगले दिन एक अफसर आया और उसने लुबना को रिहा कर दिया। लुबना ने अपने सभी दोस्तों और परिजनों को जुर्माने की रकम न भरने के लिए कहा था, पर सूडानी पत्रकारों की यूनियन ने पैसा जमा करा दिया था।

लुबना हुसेन को अपनी रिहाई की कोई खुशी नहीं है। उनका कहना है, सात सौ से ज्यादा औरतें अभी भी जेल में सड़ रही हैं, क्योंकि उनकी ओर से जुर्माना भरने के लिए कोई नहीं है। जाहिर है, यह लड़ाई लुबना हुसेन की सिर्फ अपनी नहीं है। एक पत्रकार के रूप में उनकी अच्छी-खासी साख है। वे जानती हैं कि अगर वे अपने लिए विशेषाधिकार और सुविधा के द्वीप बनाना ठीक न समझें, तो उनकी अपनी नियति उन अन्य स्त्रियों की नियति से भिन्न नहीं हो सकती जिनके बारे में और जिनके लिए वे लिखती हैं। उनके सरोकारों की इस व्यापकता के कारण ही जब उन पर मुकदमा चल रहा था, यह मुद्दा एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया। वेबसाइटें खुल गईँ और ‘सूडानी महिलाओं के मानव अधिकारों की रक्षा करो’ की मुहिम ने जोर पकड़ लिया।

कुछ लोग कहेंगे, औरतें पैंट पहनें या न पहनें, यह भी कोई मुद्दा है 9 लुबना का कहना है – ‘पैंट तो मात्र एक प्रतीक है। मूल सवाल औरतों की स्वतंत्रता, स्वाभिमान और आत्मनिर्णय के अधिकार का है।’ हममें से कौन है, जिसकी जबान पर यह नहीं आएगा – हाँ, लुबना, इसमें क्या शक है ! हम जहाँ भी हैं, तुम्हारी लड़ाई के साथ हैं। 000

Wednesday, September 16, 2009

हम सब अचिन्हित शिकार है योनिक हिंसा के .

"बलात्कार का हर्जाना " और "सीढीयों पर मौत " को दो किश्तों की तरह देख रही हूँ और कहना चाहती हूँ, दोनों पोस्ट कुल मिलाकर एक एकहरी सोच जो हमारे इस अमानवीय समाज मे व्याप्त है उसी का विस्तार है, और उसी को नए तरह से शब्दजाल मे पिरोकर परोसने की कोशिश है, जिसे देखकर तनिक आश्चर्य होता है, बहुत नही!!! दोनों ,का मिलाकर लब्बोलुबाब ये है, " पीड़ीत अगर अपना बचाव न कर सका, और जिंदा बच गया तो ये उसका नैतिक पतन है, अगर उसने हर्जाना स्वीकार किया तो भी नैतिक पतन है। और सुझाव ये कि लड़कर मर जाओ। अगर इस तरह की दुर्घटना के बाद खुदा न खास्ता घर लौटना हुया तो वहाँ कोई सहानुभूती या फ़िर लड़ाई मे सहयोग की अपेक्षा न रखो। यही सब तो होता आया है, इसमे नया और मानवीय क्या है?

जो बात प्रतीश और संजय ने उठाई है, वों इस एकहरी सोच की सही काट है। बलात्कार की घटनाओं मे कमी स्त्रीयों के किसी भी तरह के आचरण करने से काबू मे नही आ सकती (चाहे वों बुर्का पहने, रात-बेरात घर से बहार न निकले, या फ़िर हथियारों से लैस होकर सड़क पर निकले)। ये एक सामाजिक समस्या है, और इसकी जड़े भी इसी व्यवस्था मे है।, चाहे अनचाहे स्वीकृति भी। और सबसे आसन तरीका ये है की दोष पीड़ीत पर मढ़ दिया जाय। और अपनी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से आसानी से मुह मोड़ लिया जाय।

बलात्कार के तमाम पहलू है जिन पर बहुत कुछ बोला-लिखा जाता है, जिसमे नर होरमोंस पर दोशोरोपन से लेकर, स्त्रियों का व्यवहार, वेश भूषा चपेट मे आती है। पर इसका एक महत्तवपूर्ण पक्ष ये है, कि हमारे समाज मे माता-पिता, नाते रिश्तेदार, और दोस्त, तीनो जिन्हें पीड़ीत का संबल बनाना चाहिए, वों उसका साथ छोड़ देते है। कम से कम इस अर्थ मे कि कानूनी लड़ाई लड़ना नही चाहते और समाज मे अपनी रुसवाई से डरते है। इसीलिये बलात्कार के आघात से कम और अपनो की कायरता और उपेक्षा से उपजी असहायता अक्सर पीड़ीत को आत्महत्या की तरफ़ धकेलती है। समाज, पास पड़ोस, और स्त्री के प्रति एक गहरा अमानवीय नजरिया कि बलात्कार की पीडीता, विधवा और तलाकशुदा स्त्री एक झूठी थाली है, न कि एक मनुष्य। योंशुचिता और उसके आधार पर स्त्री को हाशिये पर फेंक देने के लिए समाज जिम्मेदार है। जब तक ये स्थिती रहेगी, पीडीत कैसे सिर्फ़ अपने बूते और अपनी सोच के बूते इस समस्या का हल ढूँढ सकता है? इससे पहले कि बलात्कार की पीड़ीता ये मानने लगे कि ये एक मात्र दुर्घटना थी, उसके परिवार को, और वृहतर समाज को इस मूल्य को अपनाना पडेगा। बलात्कार स्त्री और उसके परिवार के लिए सामाजिक कलंक है, और जब तक सामाजिक सोच नही बदलेगी, खाली पीड़ीत की सोच बदलने की बात से क्या होगा?

धीरे-धीरे ही सही पर हमारे समाज मे बदलाव आए है, और प्रिदर्शनी मट्टू के पिता के जैसे पिता भी हमारे देश मे है, जिन्होंने बेटी की मौत के बाद भी न्याय के लिए संघर्ष किया, और अपराधी को सजा हुयी। भावरी देवी के पति भी है, जिन्होंने अपनी पत्नी का साथ दिया। मेरी नज़र मे यही एक अभूतपूर्ण पहल हमारे जनतंत्र मे हुयी है, जिसमे एक आम, बूढा पिता, और परिवारजन , एक गरीब ग्रामीण, अहिंसक तरीके से और जनतंत्र का इस्तेमाल करके न्याय पाने मे सक्षम रहे है। पर इन सफलताओं का सहरा सामाजिक भागीदारी को जाता है, केवल एक अकेले व्यक्ति और परिवार के लिए ये सब अपने बूते करना मुमकिन नही है।

क्या किसी को ये भ्रम है कि पीड़ीत व्यक्ति बलात्कार के लिए ख़ुद को दोषी मान सकता है?
जिस पर राजकिशोरजी और अनुराधा की बहस है कि स्त्री अपना शरीर पुरूष से छिपाती है, और शरीर पर परपुरुष के छू जाने मात्र से विचलित होती है, और इसी मे अपना शील गया समझती है। और अगर इस पर काबू पा ले तो बलात्कार की पीडा कम हो जायेगी। अगर ऐसा होता तो पश्चिमी देशो मे जहा काफी हद तक यौन शुचिता का भ्रम टूटा है, वहा बलात्कार की पीडीत स्त्रीयों और योन हिंसा को झेलने वाले बच्चों का दर्द कुछ कम होता। कम से कम इन देशो ने इतने गहरे जाकर, न सिर्फ़ बलात्कार, बल्कि सेक्सुअल हरासमेंट के क़ानून कई परतों मे बने है, जिनमे हाव-भाव, बॉडी लंग्वैज़, भाषिक हिंसा, तक तमाम आयामों को परिभाषित किया गया है।
योंशुचिता से छुटकारे के बावजूद मानसिक पीडा बहुत गहरे वहां भी है। और ये पीडा इसीलिये है की इंसान का अस्तित्व कुचला जाता है, एक असहायता के बोझ, और मनुष्य का सिर्फ़ एक वस्तु बन जाने का अहसास इससे गहरे जुडा है. दूसरा उदाहरण, पुरुषो के लिए समाज मे योन शुचिता के मानदंड स्त्री के जैसे नही है, पर फ़िर भी अगर "सोडोमी" का शिकार हुए बच्चे जो लिंग से पुरूष है, इसे सिर्फ़ शारिरीक दुर्घटना की तरह भूल जाते है? बलात्कार की रोशनी मे नही, बल्कि मनुष्यता की सम्पूर्णता की रौशनी मे इस तथ्य को खुलकर स्वीकार करने की ज़रूरत है की योनिकता और सेक्सुअल व्यवहार, और उससे जुड़े मानव अनुभव, हमारे मन, शरीर और समस्त व्यक्तित्व पर बहुत गहरा, और चौतरफा असर डालते हैऔर किसी भी तरह का अन्याय, जबरदस्ती, और निजता का उलंघन जो मनुष्य के बेहद निजी योनिक व्यवहार से जुड़े है, उनकी शिनाख्त इसी के तहत होनी चाहिएभले ही सामाजिक रूप से ये कितना ही, अवांछनीय विषय हो! और अगर ऐसी घटना से पीड़ीत को अपने काम मे हर्जा होता है, स्वास्थ्य मे समस्याए आती है, तो हर्जाना उस नुक्सान का ज़रूर मिलना चाहिए और ज्यादा से ज्यादा, और हरजाने के साथ साथ कडा कानूनी दंड मिलना चाहिए। या खुदा न खास्ता गर्भ और अनचाहे बच्चे पैदा हो जाए, तो उनके पालन की जिम्मेदारी भी पुरूष पर होनी चाहिए।

ये सिर्फ़ पुरुषो के दिमाग का फितूर है, कि स्त्री पुरूष स्पर्श से असहज हो जाती है, और ख़ुद को योनिकता के अर्थ मे अपवित्र मानती है। मैं फिलहाल किसी ऐसी स्त्री को नही जानती जिसका शरीर जाने अनजाने और मजबूरी मे हजारो पुरुषो के शरीर से टकराया हो। पर-पुरूष के रोज़-ब-रोज़ के स्पर्श की आज की स्त्री अभ्यस्त हो गयी है, और पहले भी हमारी दादी नानिया अभस्य्त रही है। कोई नई बात नही है। रोज़-रोज़ की बसों मे, हवाई जहाज़ की तंग सीटो मे भी, भीडभाड से भरे बाज़ारों मे, घरों मे सब जगह, नाते रिश्तेदारो और दोस्तों को गले लगाने मे भी। स्पर्श किसी एक तरह का नही होता, स्पर्श और स्पर्श मे फर्क है। आत्मीयता का, दोस्ती का स्पर्श, प्रेम का वांछनीय है, और भीड़ का तो आपकी इच्छा हो न हो , आपको भुगतना ही है, अगर आप "असुर्यस्पर्श्या" नही है तो। इन स्पर्शो की तुलना बलात्कार के या फ़िर योनिक हिंसा से उत्प्रेरित स्पर्शो से नही की जा सकती है। और अन्तर इन स्पर्शो मे सिर्फ़ इंटेंशन का है, शारीरिक एक्ट का नही!! शारीरिक से बहुत ज्यादा बलात्कार पहले एक अस्वस्थ, रोगी, और अपराधी मानस मे जन्म लेता है, और ऐसी परिस्थिति जब उसे कम से कम अवरोधों का सामना करना पड़े, शारिरीक रूप लेता है। इसीलिये, बलात्कार की घटनाओं से भी ज्यादा सर्वव्यापी वों अपराधी मानस है, जिसकी शिनाख्त बिना इस व्यवस्था और पारंपरिक सोच को समझे बिना नही की जा सकती है। और इसकी रोकथाम भी, सामाजिक सोच और स्त्री के प्रति समाज का नज़रिया बदलने के ज़रिये हो सकती है, और तत्कालीन उपाय क़ानून व्यवस्था को सक्षम बना कर और तमाम छोटे-बड़े हर तरह के बुनियादी स्पोर्ट सिस्टम को बना कर किए जा सकते है जो बलात्कार की राह मे लगातार रोड़ा खडा करते रहे।

बलात्कार से भी ज्यादा "योन शुचिता" और "बलात्कार का खौफ" हमारे समाज मे इतना व्याप्त है, की वों स्त्री और पुरूष दोनों से उनकी मनुष्यता छीन लेता हैऔर कुछ हद तक हम सब अप्रत्यक्ष रूप से उसका शिकार हो जाते हैस्त्री-पुरूष के सम्बन्ध विशुद्द रूप से यौनिक संबंधो के दायरे मे बंध जाते है, उनमे एक मनुष्य की तरह दोस्ती की, सहानुभूती की और कुछ हद तक एक स्वस्थ "कम्पीटीशन" की तमाम गुंजाईश ख़त्म हो जाती हैएक दूसरे से सीखने की संभावनाए ख़त्म हो जाती है, एक दूसरे के साथ खड़े होने की संभावनाए ख़त्म हो जाती है, और कही कही बहुत सी समस्याए जो सामूहिक भागीदारी से ही सुलझाई जा सकती है, उनका मार्ग अवरुद्ध हो जाता हैले देकर स्त्री और पुरूष अपना जीवन मनुष्य नाम के एक प्राणी का जीवन जीकर "अपने अपने लैंगिक कटघरों" मे बिताने को बाध्य है। स्त्रीयों का अच्छा स्वास्थ्य, और उनकी देह मे थोडा रफ-टफ पना, मार्शल आर्ट की ट्रेनिग आदि बलात्कार की समस्या का समाधान नही है, पर ये कुछ हद तक उनके भीतर एक मनुष्य होने का विश्वास पैदा कर सकता है, और अपनी परिस्थितियों के आंकलन को इम्प्रूव कर सकता है। और शायद कुछ हद तक, स्त्री पुरूष के बीच खड़ी लैंगिक कटघरों की दीवारों को ढहाने का काम कर सकती है।

Sunday, September 13, 2009

सीढ़ियों पर मौत

इज्जत बचाने की खातिर
राजकिशोर



‘बलात्कारी जब ऐन सामने हो और तुम उसे रोकने में असमर्थ हो, तो उसका विरोध मत करो, नहीं तो वह और खूँखार हो जाएगा। वह तुम्हारी जान भी ले सकता है।’ – आजकल लड़कियों को यही सलाह दी जा रही है। मेरी राय अलग है। इस मामले में मैं परंपरावादी मत से इत्तेफाक रखता हूँ कि चाहे जान चली जाए, पर जब तक होश है, बलात्कारी की मंशा पूरी न होने दो। जब पुरुषों को यह पता चल जाएगा कि वे किसी जीवित स्त्री से नहीं, उसके शव से ही बलात्संग कर सकते हैं, तो बलात्कार की संख्या निश्चित रूप से कम होने लगेगी। यही राय महात्मा गांधी की थी और उनके सोच के आधार पर ही मैंने अपना मत बनाया है।

ग्यारह सितंबर को जमुना पार दिल्ली के खजूरी खास के राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की भगदड़ में पाँच लड़कियों की मौत के हादसे के बाद मेरा यह मत और पुख्ता हुआ है। इन भगदड़ और इन मौतों की पृष्ठभूमि में और भी बहुत-से कारण होंगे ही। जिस बात को मैं यहाँ रेखांकित करना चाहता हूँ वह यह है कि लड़कियों को अपनी इज्जत बचाने के जो नुस्खे बताए जाते रहे हैं, वे बुरी तरह फेल हो चुके हैं और अब हमें लड़की की इज्जत को नए तरीके से परिभाषित करना चाहिए तथा इज्जत बचाने के नए तरीके भी खोजने चाहिए। ऐसा न होने के कारण ही उन पाँच लड़कियों की मौत हुई। वे तथा उनके साथ पढ़नेवाली लड़कियाँ दुराचारी लड़कों के खौफ से इतनी विक्षिप्त थीं कि उन्होंने जान पर खेल कर अपनी इज्जत बचाने की कोशिश की। काश, उन्हें जान देने का दूसरा तरीका भी बताया गया होता।

वे लड़के, जो मौका पाते ही लड़कियों से छेड़छाड़ करने लगे थे, निश्चय ही हिंसक होंगे। उनमें से कुछ के पास चाकू भी था। लेकिन लड़कियों के डर जाने के लिए शायद इतना ही काफी था कि वे लड़के हैं और उनके इरादे ठीक नहीं हैं। इस तरह की मुठभेड़ अकेले में हो, तब भी लड़की के लिए यह जाना हुआ होना चाहिए कि पाशविक बल के सामने उसे किस तरह पेश आना है। हैरत और तकलीफ की बात यह है कि स्कूल में उस समय लड़कियों की संख्या कम नहीं थी, लेकिन इस सामूहिकता के बावजूद छेड़ी जा रही लड़कियों में यह हिम्मत क्यों नहीं पैदा हुई कि वे बदमाशों को उचित जवाब दे सकें? अन्याय को सहन न करने का साहस दिखाने पर गुत्थमगुत्शी भी हो जाती, तो कोई हर्ज नहीं था। लेकिन लड़कियों को शरीर-कातर होने की सीख इस कदर घुट्टी में पिला दी गई है कि उन्हें लगा होगा कि प्रतिकार के परिणामस्वरूप पुरुष शरीर के स्पर्श का पाप उन्हें ढोना पड़ सकता है। घर लौटने पर उन्हें यही उलाहना सुनना पड़ेगा कि तुम उन बदमाशों से उलझने क्यों चली थीं – तुम्हें अपना दामन बचा कर वहाँ से चुपचाप खिसक लेना चाहिए था। लड़कियों के सिर पर हमेशा लटकनेवाली इसी अविवेकी डर की तलवार ने उन्हें कमजोर और कायर बना दिया होगा, जिसका मनहूस नतीजा एक पागल भगदड़ और पांच लड़कियों की मौत में निकला। जो डर कायर बना दे, उसे निकट के डस्टबिन में फेंक आना चाहिए। इज्जत की जो परिभाषा लड़कियों को अपने पर शर्मिंदा होना सिखाए, उस परिभाषा की शहर के सबसे बड़े मैदान में सामूहिक अंत्येष्टि कर देनी चाहिए।

पुरुष से सभ्य होने की माँग लाजिमी और अनिवार्य है। पुरुष की असभ्यता की भर्त्सना तब तक निरंतर होनी चाहिए जब तक उसका पासंग भी बचा रहता है। लेकिन दुनिया भर की स्त्रियाँ क्या तभी चैन की साँस ले सकेंगी जब दुनिया के सारे पुरुष यकीनन सभ्य हो जाएँगे? क्षमा करें, वह खूबसूरत सुबह कभी नहीं आएगी। शायद यह आदमी की फितरत में ही नहीं है। इसलिए स्त्रियों के लिए इज्जत से जीने के संघर्ष के उस दूसरे सिरे की भी इतनी ही फिक्र करना लाजिमी और अनिवार्य है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपनी रक्षा के लिए खुद भी जिम्मेदार होता है। व्यक्ति की इसी जिम्मेदारी को मान्यता देने के लिए हम सभी को आत्मरक्षा का अधिकार मिला हुआ है। कानून यह है कि अपनी रक्षा करने के लिए मुझे जितने भी लोगों की जान लेनी पड़े, मैं ले सकता हूँ। यह मेरे जीवन धारण करने के अधिकार के तहत आता है और इसके साथ कोई समझौता नहीं हो सकता।

जो बात जीवन के बारे में सही है, वही उन चीजों के बारे में भी जिन्हें मिला कर जीवन बनता है। अगर मुझे डरा-धमका कर किसी ने मेरा सामान छीन लिया, मुझे अपने घर से बेदखल कर दिया, मेरे साथ शारीरिक अतिक्रमण किया, तो मैं सिर्फ जिंदा रह कर क्या करूँगा? ऐसे जीने को धिक्कार है जिसमें स्वाभिमान न हो। स्त्रियों के लिए यह और भी ज्यादा सच है, क्योंकि उनके साथ शारीरिक अतिक्रमण का खतरा अकसर मौजूद होता है। ऐसी कठिन घड़ियों में आत्मरक्षा के अपने जैविक अधिकार की याद आनी ही चाहिए। इस अधिकार का इस्तेमाल करते हुए अगर जान भी चली जाए, तो खुशी-खुशी दे देनी चाहिए।

इस तरह, मामला सिर्फ बलात्कार या बेइज्जती से बचने-न बचने का नहीं रह जाता। यह अस्तित्व की स्वतंत्रता और स्वाभिमान का मामला हो जाता है। अतिक्रमण का सामना करने के मामले में हमें चूहा नहीं, शेर बनना सीखना पड़ेगा, नहीं तो हमारा अपमानित होते रहना निश्चित है। जरूरी है कि हर माँ-बाप अपने बेटे-बेटी को, बेटियों को तो जरूर ही, शुरू से यह प्रशिक्षण देते रहें कि अन्याय के सामने झुकना नहीं है, उसका विरोध और प्रतिकार करना है। अपनी ओर से न हिंसा करनी है न हिंसा को प्रोत्साहन देना है, पर जायज उद्देश्य के लिए हिंसा करने से डरना नहीं है। ऐसा अनुशासन और प्रशिक्षण ही सभ्यता को सचमुच सभ्य बना सकेगा। मेरी अपनी बेटी कभी ऐसे किसी हादसे का शिकार हो कर आँसू बहाते हुए घर लौटी, तो मैं उससे यही कहूँगा कि इससे अच्छा था कि बलात्कारी का प्रतिकार करते हुए तू अपनी जान दे देती। 000