Friday, January 30, 2009

कल्चर के नाम पर गुण्डागर्दी ही तो है


परसों विनीत ने मैंगलोर मे हुई बदतमीज़ी पर लेख लिखा "जिनके लिए स्त्री सिर्फ देवी है" । आज ही यूनिवर्सिटी मे आइसा (All India Students' Association) की ओर से इसके खिलाफ प्रदर्शन और नारेबाज़ी की गयी। कविता कृष्णन ने प्रखर वक्तव्य देते हुए कहा कि इस तरह के रवैये का विरोध हम सबको करना चाहिए । प्लैकार्ड्स पर लिखा था पितृसत्ता का विरोध और स्त्री अधिकारों की रक्षा ।मै हैरान थी कि सुनने के लिए भीड़ की तरह जुटे उन लड़कों -लड़कियों में कितने इन मुद्दों के प्रति सम्वेदनशील रहे होंगे ,जिन्हे मालूम होगा कि पितृसत्ता कहाँ कहाँ उनके भीतर तक बसी हुई है , समाज की अवचेतना मे है। जो भी हो , वे नारे लगा रहे थे, वे उत्साहित थे ,वे आक्रोश मे थे।वे शायद समझ पा रहे थे कि कल्चर के नाम पर यह सीधा सीधा गुंडागर्दी ही है जिसे बर्दाश्त नही किया जाना चाहिए।
बैजेज़ बेचकर फंड इकट्ठा करते घूमते प्यारे प्यारे से लड़के लड़कियाँ जो दिल्ली हाट जैसे स्थानों पर जागरूकता फैलाने के अभियान मे जुटे हैं वे निश्चित ही आश्वस्त करते हैं भले ही एन जी ओज़ एक नया पनप रहा व्यवसाय ही क्यों न हो पर ये बच्चे समाजिक सरोकारों को पहचानने रहे हैं यह संतोष है।
क्या हम समझ रहे हैं कि यह जो हुआ वह "छोटी सी घटना"(जैसाकि मुतालिख कह रहे हैं) नही थी एक भयानक बात थी। राम की सेना लड़कियों पर हाथ उठाते अपने संस्कृति भूल ही गयी थी।अगर आप अभिभावक होने के नाते अपनी संतानों को बान्ध कर नही रख सकते तो यह काम रामसेना करेगी इसमे तालिबान से तुलना की क्या बात है ? यह तो बहुत मामूली बात है।उन लड़कियों के साथ यही होना चाहिए था।


Wednesday, January 28, 2009

क्योंकि औरत हो जाना कोई महान काम नहीं है...

हम अभी-अभी गणतंत्र दिवस मना के चुके हैं। ऐसा पहली बार हुआ कि एक महिला ने हमारे गणतंत्र दिवस परेड की सलामी ली। स्वाभाविक ही था, क्योंकि हमारे देश को महिला राष्ट्रपति पहली बार ही मिली हैं। इस घटना से प्रेरित विवेक आसरी ने ये कविता भेजी है। इस पर आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार है।


दिल्ली के राजपथ पर
उस बड़ी सी तोप का मुंह
जब एक महिला प्रेज़िडंट की ओर झुका
तो वक्त रुका
और इतिहास तुरंत ले आया
अपनी पोथी
एक और नाम दर्ज करने के लिए।

कितना आसान है
एक महिला का नाम
इतिहास में दर्ज करना,
हर काम जिसे महान करार दिया गया है
औरत पहली बार ही तो करती है।
क्योंकि रोटी को हर बार गोल बना देना
कोई महान काम नहीं है
रोज सुबह
परिवार में सबसे पहले जगकर
नहाना, धोना, सफाई, बर्तन करने के बाद
सबके लिए नाश्ता बना देना
कोई महान काम नहीं है

बड़ी-बड़ी मशीनें चलाना
और चांद पर हो आना
महान काम हो सकता है
लेकिन
सबके कपड़े धोना, आयरन करना
बच्चों को स्कूल से लाना
सबकी पसंद का खाना बनाना
और सबके नखरे उठाते हुए
अलग-अलग खिलाना
कोई महान काम नहीं है।

मंत्री, प्रधानमंत्री, प्रेज़िडंट बनना
हवाई जहाज उड़ाना
बड़े-बड़े बैंकों को चलाना
औरत को महान बना सकता है,
लेकिन पाई-पाई जोड़कर घर बनाना
महान काम नहीं है।

एक औरत
जब दुनिया की बड़ी-बड़ी समस्याओं पर
भाषण देती है
नारे लगाती है
और मोर्चे चलाती है
तो महान हो जाती है
लेकिन पति की कड़वी से कड़वी बात को
चुपचाप सह जाना
अपनी इच्छाओं को दबा लेना
घर और बच्चों की खातिर
मुस्कुराते हुए
अंदर ही अंदर सुबकते जाना
कोई महान काम नहीं है।

जो लोग ऐश्वर्या को विश्वसुंदरी कहकर पुकारते हैं
वही लोग
जरा सा दुपट्टा खिसक जाने पर
अपनी बेटियों को जब दुत्कारते हैं
तो बताते हैं
कि महानता की परिभाषा
पुरुष अपनी खुशी के लिए रचता है
और इसमें
हर उस औरत को शामिल करने से बचता है
जो उसकी निजी संपत्ति है।

प्रेज़िडंट पाटिल
जब आप
एक औरत की तरह
सिर पर पल्ला लिए
गली-मोहल्लों में सबका दर्द बांटती
घूमती नजर आती हैं
तब इतिहास आपको पूछता तक नहीं

जब आप पुरुष की तरह
राजपथ पर सलामी उठाती हैं
तो महान हो जाती है?

यहां अच्छी मां,
अच्छी बेटी
अच्छी पत्नी
अच्छी बहन बनना
कोई बड़ी बात नहीं है
जब किसी वजह से
औरत सिर्फ औरत रह जाती है
तो बड़ी नहीं कहलाती है
हां, वही औरत
अगर पुरुष बन जाती है
तो महान कहलाती है।
क्योंकि
इस आदिम समाज में
पुरुष बनना महानता की पहचान है
सिर्फ औरत रह जाना
कोई महान काम नहीं है।
विवेक आसरी

Tuesday, January 27, 2009

जिनके लिए स्त्री सिर्फ देवी भर है


स्त्रियों के सम्मान में जैसे ही कोई कहता है- यत्र नारी पूजयन्ते, रमन्यते तत्र देवता, हम लगभग इत्मिनान हो लेते हैं। हमे लगता है कि एक स्त्री की इससे बेहतर स्थिति, दुनिया के किसी भी देश और वहां की संस्कृति में नहीं सकती। हमें अपने पूर्वजों की सोच और संस्कृति पर गर्व होता है,हम लगातार स्त्री को देवी के रुप में बनाए रखने के लिए प्रयासरत नजर आते हैं। अपनी संस्कृति को बचाने के नाम पर जो कुछ भी प्रयास चल रहे होते हैं,उन पर गौर करें तो उनमें से सत्तर से अस्सी फीसदी प्रयास नारी को देवी के तौर पर बनाए औऱ बचाए रखने के लिए किए जाते हैं। संस्कृति को सबसे बड़ा खतरा, स्त्री को देवी रुप से अपदस्थ किए जाने में ही साबित होता है। इसलिए संस्कृति और स्त्री का देवी रुप एक -दूसरे के पर्याय रुप में आते हैं।
संस्कृति को बचाने के क्रम में स्त्री, देवी रुप में कितनी बनी रह पाती है और फिर इसकी जरुरत भी क्या है, इस बहस में न भी जाएं तो एक सवाल तो जरुर उठता है कि क्या ऐसा करते हुए पुरुष देवता रह जाते हैं। इस तरह के सामाजिक-सांस्कृतिक मसलों पर बहस करते हुए इतनी हिम्मत हममे है कि हम चीजों को मिथको और उपमानों को देखने के बजाय एक स्वाभाविक प्रक्रिया के तौर पर देखने की कोशिश क्यों नहीं कर पाते। यदि हम ऐसा नहीं भी कर पाते हैं तो क्या हमने जिन मिथकों को गढ़ा है, उनके भीतर जो गुण औऱ स्वभाव भरे हैं, उसी के अनुसार मौजूदा परिस्थितियों का विश्लेषण कर सकें.

अव्वल तो हमें स्त्री को देवी मान इनने पर ही आपत्ति है, क्योंकि ऐसा करके स्त्रियों का भला होने के बजाय, पितृसत्तात्मक समाज की जड़े है मजबूत होती है। स्त्री को देवी के रुप में मानने का मतलब है उसे एक पुरुष एपरेटस के तौर पर स्थापित करना। खैर इस बहस पर बाद में। फिलहाल,इतना भर मान लें कि जो स्त्रियों की रक्षा करते हैं वो देवता के समान होते हैं औऱ स्त्री को देवी के रुप में स्थापित किए जाने से समाज में चारों तरफ देवता का वास होता है। इसे आप ऐसे भी कह सकते हैं कि स्त्री को देवी रुप में बनाए जाने के प्रयास में यह भी अनिवार्य है कि इस प्रयास में लगे पुरुष देवताओं की तरह व्यवहार करें।

(1)राम सेना के प्रमुख मुतालिक ने कहा कि हमारी संस्कृति में स्त्रियां नारी की तरह पूजी जाती है। अगर कानून इनकी रक्षा नहीं करती है तो हम हाथ पर हाथ धरे बैठे नहीं रह सकते,हम नागरिकों का कर्तव्य है कि अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए आगे आएं। मंगलूर पब में लड़कियों के साथ जो कुछ भी हुआ वो मंगलूर और कर्नाटक के लिए आम बात है, इसे जबरदस्ती नेशनल न्यूज बनाया जा रहा है।
- इ मत्तालिक, संस्थापक,रामसेनाःकर्नाटक
(रेडियो मिर्ची,12:26 बजे सुबह,27 जनवरी 08)
रेडियो मिर्ची के जॉकी अनंत औऱ सौरभ से ये पूछे जाने पर कि संस्कृति को बचाने का ठेका आपको किसने दे दिया, उस पर इ मत्तालिक ने अपना बयान दिया।)
(2) मंगलूर में लड़कियों के साथ जो कुछ भी हुआ, उसके लिए हम माफी मांगते हैं।(इ मुतालिक,टाइम्स नाउ रात 8ः35 अर्नव गोस्वामी से सवाल पूछे जाने पर दिया गया जबाब)
(3) मंगलूर में जो कुछ भी हुआ, उसमें राम सेना का कोई भी कार्यकर्ता नहीं था( वही, अर्नव के इस सवाल पर कि राम सेना के चालीस गुंड़ों ने क्या किया, मुतालिक का जबाब)
(4) विष्णु बैरागी said...
आपको बुरा लगे तो लगे। भई, जिस हिन्‍दुत्‍व पर हमें गर्व है वह तो ऐसा ही है, ऐसा ही रहेगा और आप चाहे जो कर लो, बदलेगा बिलकुल भी नहीं। आप सबकी औकात जग जाहिर है। आप क्‍या कर लोगे। लिख कर या फिर वक्‍तव्‍य जारी कर गालियां दे दोगे। दे दो। मैदानी सक्रिया का मुकाबला शब्‍दों से कभी हो नहीं सकता और शब्‍द-शूरों में इतनी हिम्‍मत नहीं कि मैदान में उतर आएं।
सो,आप गरियाते रहो। हिन्‍दुत्‍व को तो आना ही है। आकर ही रहेगा और आप सब ही उसकी पालकी ढोओगे। अभी भी ढो ही रहे हो भैया।
26 January, 2009 10:43 AM
(चिंतनः सुप्रतिम बनर्जी के ब्लॉग से साभार)
मुतालिक के तीन अलग-अलग बयानों और विष्णु बैरागी की टिप्पणी को नत्थी करके देखें तो कुछ बातें हमारे सामने है-
(1) संस्कृति की रक्षा करने का काम राम सेना जैसे संगठनों का है, कानून इस मामले में पूरी तरह नाकाम है।
(2) देश की स्त्री देवी के पद से अपदस्थ हो रही है, इसलिए इस तरह की कारवाई जरुरी है। अगर देश की स्त्री नारी के सांचे में फिट नहीं है तो उसके साथ कुछ भी किया जा सकता है और ये मामूली होगा।
(3) स्त्री को हर हाल में देवी रुप में ही होना होगा, उसे अपनी तरफ से जीने का कोई अधिकार नहीं है।
(4) स्त्री को नारी के तौर पर स्थापित करना हिन्दुत्व का हिस्सा है औऱ देश में हिन्दुत्व की संस्कृति का आना अनिवार्य है। इस मामले में हम जैसे लोगों के लिखने-पढ़ने से कुछ भी नहीं बदलने वाला है।
(5) मैगलूर में जिस तरह से संस्कृति को बचाने की कोशिश की गयी, वही हिन्दुत्व की संस्कृति है और हमें संस्कृति के इस रुप पर गर्व होनी चाहिए।
इस पूरे मामले में चाहे तो मुतालिक साहब से सवाल कर सकता है कि जब राम सेना के लोग शामिल ही नही थे तो फिर आप माफी किस बात की मांग रहे हैं। आप क्यों चाहते हैं कि स्त्रियां देवी रुप में ही रहे। वैरागी साहब से सीधा सवाल होगा कि मैगलूर की घटना पर आरएसएस जैसे हिन्दुवादी संगठन औऱ उसकी वैचारिक ताकत से चलनेवाली बीजेपी तक निंदा कर रहे हैं तो आप किस हैसियत से इसे जायज ठहरा रहे हैं। कहीं आप देश की जनता की हैसियत से तो नहीं कह रहे कि देश की जनता चाहती है कि स्त्री के बनाए मानदंड से जो भी भटके, उसके साथ मैगलूर जैसी कारवाई अनिवार्य है।...तो फिर क्या आप इस बात के लिए भी तैयार है कि कोई इस देश के बारे में कहे- यत्र नारी न पूज्यन्ते,रमन्यते अत्र दानवः। यहां अब राक्षस बसते हैं...सही फरमा रहे हैं न आप ?

Monday, January 26, 2009

ओढनी


ओढ़नी

मैट्रिक के इम्तिहान के बाद 
सीखी थी दुल्हन ने फुलकारी ! 
दहेज की चादरों पर 
मां ने कढ़वाये थे 
तरह तरह के बेल बूटे,
तकिए के खोलों पर ÷गुडलक' कढ़वाया था! 
कौन मां नहीं जानती, जी, जरूरत 
दुनिया में ÷गुडलक' की ! 
और उसके बाद? 
एक था राजा, एक थी रानी 
और एक थी ओढ़नी
लाल ओढ़नी फूलदार! 

और उसके बाद?
एक था राजा, एक थी रानी 
और एक खतम कहानी ! 
दुल्हन की कटी फटी पेशानी 
और ओढ़नी खूनमखून !
अपने वजूद की माटी से 
धोती थी रोज इसे दुल्हन 
और गोदी में बिछा कर सुखाती थी
सोचती सी यह चुपचाप
तार तार इस ओढ़नी से 
क्या वह कभी पोंछ पायेगी
खूंखार चेहरों की खूंखारिता 
और मैल दिलों का?
घर का न घाट का
उसका दुपट्टा 
लहराता था आसमानों पर 
÷गगन में गैब निसान उडै+' की धुन पर
आहिस्ता आहिस्ता !

कविता: अनामिका की
प्रेषिका : लावण्या 

Saturday, January 24, 2009

मैं अजन्मी (राष्ट्रीय बालिका दिवस पर विशेष)

(राष्ट्रीय बालिका दिवस : २४ जनवरी पर विशेष)
मैं अजन्मी
हूँ अंश तुम्हारा
फिर क्यों गैर बनाते हो
है मेरा क्या दोष
जो, ईश्वर की मर्जी झुठलाते हो

मै माँस-मज्जा का पिण्ड नहीं
दुर्गा, लक्ष्मी औ‘ भवानी हूँ
भावों के पुंज से रची
नित्य रचती सृजन कहानी हूँ

लड़की होना किसी पाप की
निशानी तो नहीं
फिर
मैं तो अभी अजन्मी हूँ
मत सहना मेरे लिए क्लेश
मत सहेजना मेरे लिए दहेज
मैं दिखा दूँगी
कि लड़कों से कमतर नहीं
माद्दा रखती हूँ
श्मशान घाट में भी अग्नि देने का

बस विनती मेरी है
मुझे दुनिया में आने तो दो !!

आकांक्षा

Thursday, January 22, 2009

शादी के लिए बाध्य की जाती है आज भी लड़कियाँ

"जो कुछ हुआ मै उससे बहुत आहत हुई,लेकिन मै फिर भी नही चाहती कि मेरे माता पिता इसके लिए कोई सज़ा भुगतें।मै ही उनकी इकलौती संतान हूँ और वो अब भी मेरे माता पिता हैं" हुमायरा अबेदिन कोई नासमझ बच्ची नही थी, अनपढ भी नही,अक्षम भी नही...लन्दन मे रहने वाली डॉक़्टर थी जिसे बांग्लादेश निवासी अभिभावकों ने बीमारी के बहाने से घर बुलाया और वहीं नज़रबन्द कर लिया,दबाव डाला एक मुस्लिम लड़के से शादी करने के लिए।अबेदिन किसी तरह लन्दन किसी मित्र को सन्देश भेजने मे सफल हुई और लड़की को माता पिता की कैद से लन्दन हाइइकोर्ट ने छुड़ाया।

ऐसा नही है कि लड़के तो हमारे समाज मे अपनी पसन्द से शादियाँ करते हैं ,कर पाते हैं। लेकिन चॉयस के अवसर उनके पास अपेक्षाकृत अधिक रहते हैं। बिलकुल इस फार्मूले के तहत कि वह पुरुष होने के कारण एक पोज़ीशन पर है। इसके अलावा वे जिस मानसिकता के साथ बड़े होते हैं उसमें वे मानने लग जाते हैं कि "गर्लफ्रेंड पत्नी नही हो सकती क्योंकि जो लड़की गर्लफ्रेंड बनने को तैयार हो गयी वह दृढ चरित्र की नही है" यह सोच लड़कियों को भी घोट कर पिलाई जाती है और आज भी शादी के बाद लड़कियाँ पति से अपने पिछले मित्र की बात छिपाती हैं।इसलिए "पसन्द" की शादी भी कितनी पसन्द की है यह एक अलग सवाल बनता है क्योंकि पसन्द के पैरामीटर्स तो बाहरी ताकते ही तय कर रही हैं न!दूसरी तरफ लड़कों के पालन पोषण मे उन्हें माचो मैन के आदर्श दिए जाते हैं और मज़बूती, दृढता को ही उनके पुरुषत्व का मापदण्ड माना जाता है इसलिए उनकी पसन्द एक दो तीन चार पाँच जितनी भी हों यह गौरव की बात है उनके लिए।वे परिवार के आगे नही झुकेंगे क्योंकि उन्हें ऐसा ही बनाया गया है। खैर,

बात उन समुदायों की हो रही है जहाँ शादियाँ दो व्यक्तियों की नही दो संस्कृतियों, दो समाजों, दो परिवारों की शादी होती है और आमतौर पर उसे स्वीकृति नही मिल पाती ,विरोध के अलावा ज़ोर ज़बरदस्ती या मत्युदण्ड भी सहना होता है।हिदू ब्वायफ्रेंड होने के कारण ही शायद अबेदिन को माता पिता की यह नज़रबन्दी और यातना सहनी पड़ी।अभिभावक अपने शासक और नियंत्रक वाली भूमिका के वशीभूत होकर यह भूल गए कि वे जिस पर इतनी ज़बरदस्ती कर रहे हैं वह 33 साल की स्त्री है जो आत्मनिर्भर है ,समझदार है। हुमायरा की बायो डेटा किसी तरह उसे हर तरह से सक्षम समर्थ सिद्ध करता है। मै सोचती हूँ ऐसे मे कम पढी लिखी , हमेशा सरपरस्ती मे रही पलीं, बाज़ार तक अम्मी या खाला के साए के बिना न गयी वह कैसे उस गलत बात का विरोध कर पाती होगी , जिसे मालूम ही नही कि उसके घर के दायरे से बाहर एक विशाल दुनिया है जिसमे मानव बसते हैं जिसमें मानवाधिकार , कानून , राज्य, मूलाधिकार जैसी बातें होती हैं आन्दोलन चलते हैं।
अबेदिन भी किसी तरह कमरे की नज़रबन्दी मे तकनीक के सहारे सन्देश भेजने मे सफल हो गयी।किसी छोटे कस्बे की मामूली डरी सहमी लड़की इस कैद मे से किसे पुकारती जहाँ उसका आस पड़ोस तक उसकी नज़रबन्दी में हिमायती रहा हो।

इस तरह की बाध्य करने वाली शादियाँ अब भी एशियाई समाजों मे प्रचलन मे हैं।भारत के गाँवों के किस्से अलग नही है।पालन पोषण मे पहले ही लड़कियों को कमज़ोर सेक्स बना दिया जाता है और अपनी मर्ज़ी करने पर वे धीरे धीरे मार पीट यातना के ज़रिए "ठीक" की जाती हैं या पागल ही बना दी जाती हैं और कुछ न हो पाए तो दरिया में डुबा दी जाती हैं इससे पहले के वे परिवार की इज़्ज़त ही डुबा दें ।

Margarette Driscoll लिखती हैं कि
Izzat – honour – is central to many Asian families’ sense of self-worth. A key element is modesty and obedience in their daughters.he Abedin case is interesting, she says, “because it shows that this does not just happen to the 15-year-old daughters of ignorant farmers – professional, middle-class thirty-somethings are vulnerable, too.
Daughters of Shame की लेखिका जसविन्दर संघेरा की कहानी भी इससे कुछ अलग नही है।हैरानी हुई कि विकिपीडिया तक के पास डॉटर्स ऑफ शेम या जसविन्दर के बारे मे कोई जानकारी नही है।यह पुस्तक ऐसी ही लड़कियों की कहानी कहती है जैसी अबेदिन के साथ घटित हुई।

मै महसूस करती हूँ कि लड़के और लड़कियाँ जब तक विवाह के बारे मे किसी बाहरी दबाव से प्रभावित हुए बिना अपनी समझ के अनुसार चलने की हिम्मत नही जुटाएंगे ज़रा भी बदलाव आने वाला नही हालांकि यह बात एक और पोस्ट की दरकार रखती है कि शादी चाहे पसन्द की हो या बाय फोर्स या अरेंज्ड , उसकी नियति अधिकांशत: उसी परिवार संरचना मे फँस जाना होती है जिसमें लोग एक हायरार्की मे रहते हैं और किसी एक का शोषण , एक को विशेषाधिकार मिलते है।

Monday, January 19, 2009

कब तक सहेंगे दहेजासुरों की प्रताड़ना

दहेज का रोग एक ऐसा रोग है जिसे समाज ने जब चाहा लड़की के गले में बांध दिया। फिर चाहे वह शादी के पहले हो या बाद में। दहेज के नाम पर लड़कियों को जिन्दा जला देना, उन्हें प्रताड़ित करना, उन पर दुनिया भर के लांछन लगाना, उनके परिवारजनों को अपमानित करना रोजमर्रा की चीजें हो गई हैं। दुर्भाग्यवश इसमें महिलाएं भी उतनी ही भागीदार होती हैं। जिन चीजों को बेटियों के नाम पर वे बर्दाश्त नहीं कर पाती हैं, वही बहू के मामले में लागू होने लगती हैं। ....... पर समाज में अब नारी प्रताड़ना सहते-सहते थक चुकी है और इन चीजों का जवाब भी देने लगी है। गोरखपुर के बड़हलगंज की रेनू त्रिपाठी के साथ ऐसा ही कुछ हुआ। दहेज को लेकर शादी के बाद से रेनू को उसके ससुराल वालों ने प्रताड़ित करना आरम्भ कर दिया और उसके ससुर ने उसे उसके पिता के घर पहुँचा दिया। साल भर तक रेनू ने इंतजार किया कि उसके ससुराल वालों को उसकी सुध आयेगी, पर उसका कोई हाल-चाल लेने तक नहीं पहुँचा। रिश्तेदारों की पंचायत भी दहेज लोभी ससुराल वालों को न समझा सकी। मायके में भी सभी लोग हताश हो चुके थे। अखिरकार रेनू ने इस उत्पीड़न के खिलाफ अपनी जंग स्वयं लड़ने की सोची और बकायदा बारात लेकर अपने ससुराल पहुँचने की ठानी। रेनू ने स्वयं इसके लिए बकायदा कार्ड छपवाया। अपने रिश्तेदार, परिचितों और गाँव वालों के अलावा बकायदा पुलिस के अधिकारियों को भी इसकी सूचना दी। यही नहीं रेनू ने सम्भ्रांत लोगों से बारात में शामिल होने की अपील भी की, ताकि वह अपने पति के घर में जगह पा सके। खैर, 17 जनवरी को बकायदा बारात लेकर ढोल-बाजे के साथ रेनू त्रिपाठी अपने ससुराल पहुँची और आत्मविश्वास के साथ ससुराल वालों के साथ रहना आरम्भ कर दिया। ससुराल वाले भौंचक्के हैं कि यह सब कैसे हो गया? इस जज्बे के बाद रेनू त्रिपाठी के साथ तमाम लोग उठ खड़े हुए हैं।........ अब इसे चाहे जज्बा कहें, चाहे नारी द्वारा खुद के हक की लड़ाई पर एक चीज तो तय है कि 21वीं सदी की नारी बदल रही है। अभी तक ऐसे हालात शहरों में सुनाई देते थे पर अब तो यह गूँज दूर तलक गाँवों से सुनाई देती है।
आकांक्षा

Friday, January 16, 2009

पर बात चलनी चाहिए

पिछले 6 दिन मे आई ये पोस्ट्स दिखाती हैं कि जेंडर अब ब्लॉग जगत की चर्चाओं का एक मुख्य हिस्सा है।दृष्टि क्या है ,विरोध या असहमति ,उपदेश या विमर्श यह भी देखा जाएगा। फिलहाल तो -

इस ब्लॉग पर न सही
उस ब्लॉग पर सही
हो कहीं भी
पर बात चलनी चाहिए!

नारी v/s नारी

मंतव्य शायद यह है कि विज्ञापन आदि मे जो अँग प्रदर्शन होता है उसमें दर असल स्त्री देह को हथियार बनाकर इस्तेमाल किया जाता है।एकाध पंक्ति में मंतव्य लीक से हटा है।लेकिन कुल मिलाकर मर्यादा और स्वाभिमान से इसे जोड़ दिया गया है।


अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी-स्त्री शोषण पर
पोस्ट की मुख्य चिंता है -
'राज्य महिला आयोग तो शोभा की वस्तु बन चुके हैं, महिला दिवस मनाकर, महिला थाने खोलकर सरकारें औपचारिकतायें पूरी करती रहती हैं, समाज अपनी चाल चलता रहता है, शोषण जारी रहता है. पता नहीं भारतीय समाज की मानसिकता में कब बदलाव आयेगा, कब व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन होगा और कब महिला के लिये भोग्या और शोषण की वस्तु होने से छुटकारा मिल पायेगा '

इच्छा जैसी बहुत सी लड़कियाँ हैं
टी वी धारावाहिक उतरन की बाल कलाकार स्पर्श का साक्षात्कार -
मैं और इच्छा एक-दूसरे के विपरीत हैं। हमारे बीच कोई समानता नहीं है। मैं अमीर परिवार की लड़की हूं। मैं मुंबई के अंबरनाथ स्थित केंद्रीय विद्यालय में कक्षा चार की छात्रा हूं। मुझे शतरंज खेलना अच्छा लगता है। इच्छा दूसरों की सहानुभूति पर जी रही है। हां, मासूमियत हम दोनों में एक जैसी है। मैंने अपने घर के पास इच्छा जैसी बहुत लड़कियों को देखा है। इस कारण मैं इच्छा का किरदार निभा पायी।

पत्नी की कमाई अच्छी या बेईमानी की ?
दोस्तों वाली बातों में ये जिदंगी की फू-फां क्यों आ जाती हैं?
"पत्नी कमाने लगे तो वो लोग कहते हैं बहू की कमाई खा रहा है आप बताइये जब परिवार पर आर्थिक संकट आए तो क्या वो लोग मदद करने आएंगे ? "

ये तो हमारे देश का आम नज़ारा है,महिलाएँ ध्यान दें

वैसे कैसा रहेगा अगर लिखा जाए-पुरुष इस पर ध्यान दें!
















औरत शालिनी की नज़र से - अतित के ब्लॉग पर इसे पढकर मुझे याद आती है वर्जीनिया वूल्फ की पुस्तक - ' अ रूम ऑफ वंज़ ओन 'मेंटल स्पेस के साथ साथ फिज़िकल स्पेस भी बहुत ज़रूरी है जिसे आप अपना कहें।

और जब कभी वो ढूंढ लेती है
अपना व्यक्तित्व, अपनी पहचान
बना लेती है
अपना कोई मकाम
इस पुरुष प्रधान समाज में
तो उसके अपने ही
प्रत्यंचा लेते हैं तान
चलाते हैं,
तीखे बचनों के कटु बान

दहेज म्रत्यु के मामले मे करार साबित करना ज़रूरी नही-सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीमकोर्ट ने व्यवस्था दी है कि दहेज मृत्यु के मामले में अभियोजन पक्ष को यह साबित करने की जरूरत नहीं है कि दूल्हे और दुल्हन के परिवारों के बीच दहेज के लिए कोई करार हुआ था। सुप्रीमकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी की व्याख्या करते हुए कहा कि अगर अदालत ऐसे करार पर जोर देने लगेगी तो किसी भी अपराधी के खिलाफ न तो मामला दायर किया जा सकता है और न ही उसे सजा दी जा सकती है।

बिकाऊ है बाढ पीड़ितों के बेटे
बाढ अकाल त्रासदी के समय दानव वेश्यावृत्ति के लिए बढिया स्थितियाँ ढूंढ लेते थे अब बच्चों के अंगों की तस्करी भी करने लगे। महाजनों ने ऐसे समय में दबाव बनाया है की वो अपनी जान बचाने के लिए अपने कलेजे के टुकडों का सौदा करने पर मजबूर हैं .

SMS भेज कर गहना को बचा लीजिए

गहना को माँ बनना चाहिए या नही ये तो बालिका वधु के निदेशक तय करेंगे लेकिन sms के जरिये जो परिणाम सामने आ रहे हैं उससे तो लगता है की देश की जनता नही चाहती है की गहना माँ बने।
अफ़सोस तब होता है जब sms भेजने वाले के पड़ोस में कोई गहना माँ बन जाती है और हम sms करते हैं मगर इस बात का की एक नाबालिग माँ बन गई है और उसकी मौत हो गई है और उसका पैदा बच्चा भी ख़त्म हो गया है।

दुनिया भर की लड़कियों के नाम
यकीन साहब की एक गज़ल

सोज़े-पिन्हाँ को बना ले साज़ लड़की!
बोल ! कुछ तो बोल बेआवाज़ लड़की!
अपनी कू़व्वत का नहीं अहसास तुझ को
कर ‘यक़ीन’ इस बात पर जाँबाज़ लड़की!



कुछ छूटा हो तो याद दिलाएँ !

Thursday, January 15, 2009

परीक्षण पोस्‍ट अनदेखा करें

तकनीकी जॉंच जारी है, यदि चोखेरबाली न दिख रहा हो तो कृपया पेज रीफ्रेश करें।

जॉंचा

Tuesday, January 13, 2009

मै कोसती हूँ आदिम स्त्री के चुनाव को

कोई लड़की अपने लिए दासता क्यों चुनती है आज़ादी क्यों नही ? वह संरक्षण क्यों चुनती है आत्मनिर्भरता क्यों नही ? वापस बात वही की वहीं आ गई। यह फ्री चॉयस मानते हैं तो यह भी मानना होगा कि कि कोई व्यक्ति जो पिट रहा है वह पिटना चुनता है।भई , यह तो हर दुबले आदमी को पता है कि वह किसी अपने से ताकतवर से मार खा जाएगा?फिर भी वह दूध मेवे खाकर बलवान नही होता? इसे फ्री चॉयस कहूँ क्या कमज़ोर रहने की?या सामाजिक विषमता कहूँ?और क्या इसलिए पुलिस को इसमें हस्तक्षेप नही करना चाहिए कि पिटना तो उस अमुक व्यक्ति ने खुद ही चुना है ?

लड़कियों को क्या करना चाहिए इस पोस्ट मे वह मेरा केन्द्रीय बिन्दु नही , उस पर तो सारी दुनिया स्वयम को भाषण देने लायक समझती है ....न ही मै शोषितों की पैरोकार हूँ , सोचने काबिल होने से हम सभी का फर्ज़ है कि आत्मालोचन करें। और मै सिर्फ हम-आप जैसे "समर्थ, सक्षम,काबिल,मज़बूत" लोगों से इतना भर विचार करने को कहती हूँ कि किसी शोषित के प्रति आप केवल इसलिए हृदयहीन नही हो सकते कि आप सक्षम हैं और यह आपका चुनाव है व किसी अन्य का चुनाव शोषित होना है।आपके सक्षम होने या अक्षम होने मे बहुत से दूसरे लोगों की भूमिका अवश्य है।सर उठा{}{ के दम्भ सहित नही कह सकते मै जो हूँ अपनी बदौलत हूँ ...और किसी का नही तो खुद को जन्मते ही मार न देने वाले , जिलाने और खिलाने -पढाने वाले माता पिता की भूमिका तो स्वीकरेंगे ही न !

मैं सीधा सीधा "फ्री चॉयस" या "पर्सनल चॉयस" की अवधारणा पर सवाल उठा रही हूँ। मुद्दा यही है अन्यत्र क्यों भटकाया जाए?

जैसे शादी करना फ्री चॉयस है, वैसे ही शादी न करना भी फ्री चॉयस होगी, वैसे ही लिविंग रिलेशन मे रहना भी फ्री चॉयस होगी ही ...तो फिर जब आपने ही चुनाव किया है तो सरकार से क्यों आप अपनी सुरक्षा के लिए कानून बनाने की गुहार लगाते हो? इसलिए कि सोशल सेट अप मे एक व्यक्ति फ्री चॉयस का मसला इतना आसान नही है। जो सक्षम है उसे किसी से गुहार नही लगानी पड़ती और शायद सभी जानते हैं कि सक्षम होने मे ताकतवर लोग हर तरह की ताकत का इस्तेमाल करते हैं।वे भी फ्री हैं!दस ताकतवरों द्वारा मिलकर एक उठती आवाज़ दबा देना मुश्किल काम नही है।आप लगाते रहें फ्री चॉयस की गुहार।

कौन ताकतवर नही होना चाहता ? है कोई ऐसा?

अगर आप इस मत से चलें कि सबको सक्षम बनना चाहिए , और जो न बन पाए उसे मर जाना चाहिए तो आप जंगल कानून की हिमायत कर रहे हैं ,तब आप कह रहे हैं कि - जो फिट है वही सर्वाइव करेगा , बाकी को खत्म हो जाना चाहिए , क्या ऐसा सोचने का आपको अधिकार इसलिए मिल गया है कि आप अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि ,शिक्षा ,प्रेरणा, अनुभव या अन्य किसी कारण से एक प्रभावी पोज़ीशन पर पहुँच गए हैं?यह एक प्रकार से - जिसकी लाठी, उसकी भैंस - जैसे सिद्धांत की तरफदारी करना नही है?
इस तर्क से सारा स्त्री विमर्श आज अभी यही समाप्त हो जाना चाहिए।क्योंकि यह तर्क पुरुष के शोषक होने को जस्टीफाई ही कर रहा है।अब तक पितृसत्ता के सभी दाँव पेंचो को जस्टीफाई करता है।समाज संरचना की नींव जिस दिन पड़ी थी उस दिन स्त्री से पूछा नही गया था कि तुम क्या चुनती हो , और अगर तब स्त्री अपने "चुनाव"{?) अगर इसे ही आप चुनाव कहें तो , के नतीजे जानती होती ,अनुमान कर सकती होती तो हमें यह पोस्ट लिखने की ज़रूरत ही न पड़ती।तो मै मानूंगी कि आदिम स्त्री का "बच्चा पैदा करना, घर पर ही रह उसकी देखभाल करना, सामाजिक जीवन और समपत्ति की देखभाल पुरुष के ज़िम्मे दे देना" एक भयानक गलत चुनाव था {फिर से, अगर आप चुनाव कहते हैं इसे} और आज मै उस स्त्री को कोस रही हूँ जिसने हम सब स्त्रियों के चुनाव की नियति को प्यार और संरक्षण तक सीमित कर दिया।

Monday, January 12, 2009

आपने अपने लिए क्या चुना है ? शोषित होना या शोषण करना?

सरिता ने शोषित होने का चुनाव किया था , इसलिए अगर वह अपनी जान खो बैठी है तो हमें उससे सहानुभूति तो होनी ही नही चाहिए और न ही इस स्थिति से कोई सवाल खड़ा होना चाहिए , न ही आक्रोश पैदा होना चाहिए।आखिर हम सब जो चुनते है वही तो हम पाते हैं। है न!

पिछली पोस्ट पर गार्गी दीक्षित ने ऐसा ही कमेंट किया कि मुझे सरिता से सहानुभूति नही है क्योंकि उसने शोषित होना ही अपने लिए चुना था।इसी तरह की बातें पहले भी बहुत बार यहाँ बहुत से लोगों ने कहीं हैं।

मेरी सारी की सारी परेशानी केवल इतनी है कि मै समझने मे असमर्थ हूँ कि सीमोन की यह उक्ति कि - स्त्री बनाई जाती है पैदा नही होती का मतलब समझते हुए , लड़कियों की हमारे समाज मे की जाने वाली सोशल ट्रेनिंग और स्थिति को देखते हुए भी हम उनके सन्दर्भ मे "चुनाव" के हक की बात ऐसे करते हैं जैसे हमारे देश मे सभी स्त्रियाँ अनिवार्यत: शिक्षित होती हैं,वे आत्मनिर्भर होती हैं{आर्थिक भावनात्मक सभी तरह},वे सड़क,गली,मोहल्ले,ऑफिस,घर तक मे सभी जगह स्वतंत्र व सुरक्षित होती हैं,उनपर घर की इज़्ज़त का टोकरा नही लदा रहता,उनपर शादी कर अभिभावकों को मुक्ति देने और पुत्र रत्न को जन्म कर सास ससुर को मुक्त करने का ठीकरा भी नही है।

क्या मैं आँकड़े गिनाऊँ कि हमारे देश मे कितनी लड़कियाँ स्कूल का मुँह तक नही देख पातीं, कितनी केवल कुछ कक्षाएँ पढ कर ड्रापॉउट की गिनती बढाती हैं और अपने छोटे भाई बहनो को सम्भालने के लिए घर पर ही रुकती हैं ,कितनी अच्छी पढाई लिखाई से इसलिए वंचित हैं कि माता-पिता गरीब हैं और अपने बुढापे के सहारे को ऊंची शिक्षा दिलाने मे ही अपने सारे सोर्स खर्च करना चाहते हैं, कितनी ऐसी है जो अच्छा पढ लिख कर कमाते हुए भी घर परिवार समाज के जड़ संस्कारों से मुक्त नही हो पायीं क्योंकि वे जानती ही नहीं कि वे दर असल एक षडयंत्र के तहत पाली पोसी गयी हैं और अब भी उसी ट्रेनिंग को आगे की पीढियों तक पहुँचा रही हैं। वे अब भी पूरी निष्ठा से अपनी गुलामी के प्रतीक त्योहारों को जोशोखरोश से मनाती हैं और अपनी बेटियों से मनवाती हैं।

अब अगर मैं "चुनाव" वाला फार्मूला अन्य शोषित तबकों पर लागू करके देखूँ तो मुझे लगता है "पर्सनल चॉयस " के समर्थक सहमत होंगे कि -
1. गरीबों ने गरीब होना चुना है{आखिर सबके पास कमाने के समान अवसर हैं}
2.मजदूर ने ठेकेदार और मालिक की लात सहना चुना है {विद्रोह कर दो,चाहे पुलिस ठेकेदारों से मिली हो और आस पास के ठेकेदार काम देना बन्द कर दें और बच्चे जो रोज़ सत्तू खा लेते हैं वह भी न मिले , और हाँ कमा नही सकते थे तो बच्चे पैदा ही क्यों किए , तुम्हारी चॉयस थी , अब मरो , हमें सहानुभूति नही}
3. कर्ज़ न दे पाने के कारण किसानो ने आत्महत्या करना चुना है
{किसने कहा था कर्ज़ लो, खेती बस की नही थी न करते शहर आकर पियन बन जाते,अब मरो , हमें क्या}
4. आदिवासियों ने शहरी सुविधाओं और तेज़ चाल से अछूता रहना चुना है{हम तो उन्हें आधुनिक बनान चाहते हैं वे ही अपनी जंगल ज़मीन के मोह से बन्धे हुए हैं और हमारे कोयले ,तेल सभी के खदान इस आदिवासियों की ज़मीन के नीचे दबे हैं क्या हम इनके लिए अपना विकास रोक दें}
5. जिसके घर चोरी हुई उसने चोरी करवाना चुना था{अलर्ट सिस्टम क्यों नही लगवाया घर मे , चोरी तो होगी ही, गार्ड रखना चाहिए थी , अब सोसायटी क्या करे , आप ही लापरवाह हो}
6. किसी ने ब्लू लाइन मे बस मे रोज़ाना का पीड़ादायक सफर करना चुना है{गाड़ी लो या ऑटो से जाओ वर्ना सड़ो ब्लू लाइन मे}
7.किसी ने छोटी छोटी ख्वाहिशों को रोज़ जज़्ब करना चुना है{बड़ी ख्वाहिश करो , बड़ा पाने के लिए कुछ भी करो}
8.किसी क्षीण काय ने बलवान आदमी से पिटना चुना है {आपकी गलती, कम क्यों खाया, भरपेट खाओ, दूध पियो , मेवे खाओ फिर देखो कैसे कोई थप्पड़ भी मारता है}
9.किसी ने लाइन मे सबसे पीछे खड़ा होना चुना है{आपकी गलती घर से जल्दी क्यों नही निकले, कोई तो आखिरी होगा ही , वही लूज़र है }
10.बलत्कृत होती युवती ने बलात्कृत होना चुना है {शीला दीक्षित जी के अनुसार भी-रात को अकेली घूमोगी तो यही होगा}
यह बिलकुल वैसा ही तर्क है जैसा नोयडा बलात्कार केस मे बलात्कारी युवकों के गाँव के मुखिया ने कहा कि - हमारे बच्चे निर्दोष हैं उन्होने ने ही उकसाया होगा। या कोई कह उठा कि लड़की के माँ बाप ने इतनी रात गए उसे बाहर रहने ही क्यों दिया था, यह तो होगा ही।
11. आदिम मनुष्य कच्चा माँस खाता था,शिकार करता था,नग्न रहता था तो यह उसकी चॉयस थी उसे किसने रोका था आग का आविष्कार करने से,कपड़ा पहनने से...



तो सिद्ध हुआ कि सारी बातें चूंकि पर्सनल चॉयस से घट रही हैं सो समाज मे कोई दोषी नही , किसी कानून व्यवस्था की ज़रूरत नही ,जो घट रहा है वह सब जायज़ है क्योंकि सभी कुछ सभी के चुनाव के हिसाब से उन्हें मिल रहा है।

इसलिए यह माना जाए कि , चोखेर बाली क्या चीज़ है ..किसी न्याय प्रणाली , सरकार , एन जी ओ , संस्था की हमें कोई ज़रूरत नही है। ZOO के जानवरों ने अपना प्राकृतिक घर छोड़ ताउम्र इस कैद मे तमाशा बन कर रहना खुद चुना है क्योंकि जानवर होना उन्होंने चुना है और इंसान होना हमनें।

मनुष्य अपने इतिहास से निर्मित हुआ है, इस प्रकार के तर्क वही व्यक्ति दे सकता है जो मनुष्य के वजूद मे से उसका सारा मानव इतिहास और सामाजिक विकास प्रक्रिया को काट कर अलग रख देता है।

क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि चॉयस या पसन्द या चुनाव हमेशा सक्षम, बलवान,समर्थ ,प्रतिष्ठित के सन्दर्भ मे ही अर्थवान होती है। जब आपकी जेब मे 1000 रु. हों तभी आपको चुनाव का हक है कि आपको सिनेमा मे सबसे पीछे की सीट लेनी है, कोने की लेनी है या बीच की।
जब जेब मे सिर्फ 100 रु की औकात हो तो चॉयस कोई मायने नही रखती।

Wednesday, January 7, 2009

यह छिपाने की नही बताने की बात है

सरिता की शादी को तीन माह भी नही हुए थे , वह अपने मायके आयी । उसकी सहेलियाँ मिलने आयीं तो उसके हाथों पर नीले निशान देख हैरान थीं । पूछने पर सरिता ने कहा -"कुछ नही, गिर गयी थी " और सहेलियाँ हिदायतें दे कर अपनी हँसी-ठिठोली मे लग गयीं।उधर माँ ने पूछा- "बेटी खुश है न?" तो सरिता ने आँखें झुकाकर जवाब दिया "हाँ, माँ आपने इतना अच्छा ससुराल जो ढूंढ दिया मेरे लिए अब आप बिट्टू की पढाई पूरी करवाओ , उसे कुछ बनाओ , अकेले सारा बोझ उठा उठा कर ,ज़माने से लड़ते लड़ते थक गयी हो "सरिता ससुराल चली गयी वापस, अपने आँसू पीकर। उसने नौकरी करना शुरु किया ।दफ्तर मे भी शरीर पर जब तब निशान देख लोग पूछते तो वह कह देती -गिर गयी , खाना बनाते जल गयी, चक्कर आ गया था वगैरह ...मानो उसे भय हो कि मुझे लाचार देख दुनिया भी मेरा फायदा उठाएगी ,घर की बात बाहर आने से वह अपमानित महसूस करेगी उन औरतों के सामने जो अपनी अनिवर्सरी पर पति द्वारा दिए गए डायमंड्स का प्रदर्शन करते हुए फूली नही समातीं ।

1 1/2 साल बाद वह एक बच्ची की माँ बनी। लेकिन 40 दिन भी पूरे किए बिना चल बसी।

माँ रोई , अपनी , अपनी बेटी की, नातिन की किस्मत को बहुत कोसा, नातिन को मनहूस कहकर ससुराल वालों ने उसे नानी को ही थमा दिया।

समय गुज़र रहा था लेकिन पिछली बार मिली एक सहेली से रहा न गया , वह पूछ बैठी कि कहीं सरिता सताई तो नही गयी थी?कहीं यह मृत्यु हत्या तो नहीं ?
कहीं दूर दूर तक कोई सबूत नही था।ऑफिस वाले , पड़ोसी, अपनी माँ , सहेलियाँ सबकी नज़रों मे वह खुश थी ,उसने कभी नही कहा कि उसे पीटा गया था , उसे अपमानित किया गया था, उसे गर्भावस्था मे तरह तरह के शारीरिक मानसिक कष्ट दिए गए ,कि आठवें महीने मे संकट आ जाने पर उसे अस्पताल मे भर्ती नही कराया गया था ,बच्चा जन्मने पर उसे व बच्ची को उपेक्षित छोड़ दिया गया था,कोसा गया था। उसने किसी सहेली को कभी फोन पर दुख की दास्तान नही सुनाई, किसी को चिट्ठी नही लिखी।
कोई सबूत न होने से सरिता की मौत एक दुखद घटना मान कर भुला दी गयी।

काश पहली बार ही उसने शोर मचा दिया होता जो उसके पड़ोसियों ने अक्सर सुना होता।
काश माँ ने उसे भावनात्मक दबावों मे पाला-पोसा न होता,शिक्षा के साथ आत्मनिर्भरता की सीख भी दी होती।
काश वह ससुराल के अपमान की बजाए स्वाभिमान के बारे मे सोचती।
और मरना ही चुना था तो कम से कम कभी सच्चाई बयाँ करती चिट्ठी लिखी होती , फोन ही कर दिया होता।
कह देना बहुत ज़रूरी है
चुपचाप पिटने-सहने वाली स्त्रियों को समझना होगा और हमें उन्हें यह हौसला देना होगा ।

Monday, January 5, 2009

और चन्द्रकला, ब्रेक के बीच तुम्हारा क़त्ल

उदास लड़कियाँ,
मोटी लड़कियाँ,
भैंगी लड़कियाँ,
छोटी लड़कियाँ,
काली लड़कियाँ,
चश्मे वाली लड़कियाँ,
सुड़क कर चाय पीती
छींकती खाँसती बीमार लड़कियाँ,
प्राइवेट पढ़ रही आर्ट की लड़कियाँ,
मुँहासों वाली सौ हज़ार लड़कियाँ,
दुमंजले झरोखों से झाँकती,
नज़र मिलते ही चेहरा ढाँपती लड़कियाँ,
मेंहदी से सफेद बाल रंगती
शॉल ओढ़े काँपती लड़कियाँ,
गोबर उठाती, उपले थापती
घास के गठ्ठर लेकर लौटती, हाँफती लड़कियाँ,
खचाखच बसों में सिमटकर नींबू चूसती खट्टी लड़कियाँ
दहलीजों पर गिट्टे खेलती मुल्तानी मिट्टी लड़कियाँ,
नुक्कड़ों की सीटी लड़कियाँ,
कतारों में लगी चींटी लड़कियाँ,
बच्चे पढ़ाती आँगनबाड़ी लड़कियाँ,
सलवार कमीज साड़ी लड़कियाँ,
सरकारी अस्पतालों की नर्स लड़कियाँ,
झाड़ती, पोंछा लगाती फ़र्श लड़कियाँ,
गाली देती लड़कियाँ
सिपाही लड़कियाँ,
कागज़ लड़कियाँ,
स्याही लड़कियाँ,
आत्मनिर्भर अकेली लड़कियाँ,
झुंड में पानी पीती सहेली लड़कियाँ,
सिन्धी, हरियाणवी, मारवाड़ी, मैथिली बोलती लड़कियाँ,
सहारनपुर, बलिया, संगरिया, छिंदवाड़ा की लड़कियाँ
न अख़बार में हैं,
न टीवी पर,
न सिनेमा में,
न किताब में,
न सिलेबस में,
न एटलस में,
न योजनाओं में,
न घोषणाओं में,
न उत्तेजनाओं में,
न कल्पनाओं में।

उफ!
सामने अब्बास मस्तान की एक फ़िल्म में
अपने वक्ष दिखाने को मरी जाती हैं
बिपाशा बसुएँ, समीरा रेड्डियाँ, कैटरीना कैफ़ें।
ताली पीट पीटकर हँसता है विजय माल्या।
भारत जनहित में जारी करता है
लम्पट पुरुष,
नंगी स्त्रियाँ
और चन्द्रकला, ब्रेक के बीच तुम्हारा क़त्ल!

Sunday, January 4, 2009

दो वृद्धाओं ने पिज्जा बेचकर बनाया वृद्धाश्रम

आज के दैनिक जागरण अख़बार में प्रकाशित एक रिपोर्ट ''पिज्जा बेचकर बनाया वृद्धाश्रम'' पढ़कर उन महिलाओं की जीवटता को सलाम करने का मन करता है जो इस उम्र में भी कुछ अलग हटकर कर रही हैं. इस समाचार को गौर से पढें और फिर गुनें ---

बेंगलूर की दो वृद्धाओं ने समाजसेवा के उद्देश्य से वृद्धाश्रम बनाने का सपना पाला और फिर पिज्जा बेचकर इसे सच भी कर दिखाया। पिज्जा दादी के नाम से मशहूर 73 वर्षीय पद्मा श्रीनिवासन और 75 वर्षीय जयलक्ष्मी श्रीनिवासन के जहन में वर्ष 2003 में एक वृद्धाश्रम बनाने का विचार आया, तो उन्होंने पिज्जा बेचकर इसका निर्माण करने का फैसला किया।
पद्मा ने बताया कि मैं हमेशा समाज में अपना योगदान देना चाहती हूं। हमारे समाज में वृद्ध सर्वाधिक उपेक्षित है, इसलिए मैं उनके लिए कुछ करना चाहती हूं। पद्मा ने इसके लिए पहले बेंगलूरु से 30 किलोमीटर दूर विजयनगर गांव में एक भूखंड खरीदा। एक औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान से वित्ता प्रबंधक के रूप में सेवानिवृत्ता पद्मा ने कहा कि भूखंड खरीदने के लिए मैंने अपने पास से 10 लाख रुपये खर्च किए।
वह आगे बताती है कि यह भूखंड 22,000 वर्ग फुट का है, लेकिन अब इस भूखंड पर वृद्धाश्रम का निर्माण करने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे। इस कार्य में 78 लाख रुपये की लागत आने वाली है। इसी दौरान मेरी बेटी सारसा वासुदेवन व मेरी मित्र जयलक्ष्मी ने इस काम हेतु पैसे जुटाने के लिए पिज्जा बनाकर बेचने का सुझाव दिया। इसके साथ ही पिज्जा का मेरा कारोबार शुरू हो गया। पिज्जा हेवेन' नामक पिज्जा की दुकान पद्मा की बेटी के गरेज में शुरू हो गई। जयलक्ष्मी ने कहा कि पिज्जा की आपूर्ति बेंगलूरु के आईटी कंपनियों में शुरू की गई। जल्द ही हमारा पिज्जा यहां के युवा आईटी कर्मचारियों का पसंदीदा बन गया। पिज्जा हेवेन में तैयार होने वाले पिज्जा की ज्यादातर खपत एचपी, आईबीएम, सिम्फोनी, एसेंचर व सन् माइक्रोसिस्टम्स जैसी शीर्ष बहुराष्ट्रीय कंपनियों में होती है।
जयलक्ष्मी मुस्कुराते हुए कहती है कि पिज्जा हेवेन की प्रगति भी हमें चकित करती है। पिज्जा हेवेन से प्रतिदिन लगभग 200 पिज्जा की बिक्री की जाती है। पिज्जा की कीमत 30 रुपये से 120 रुपये के बीच है। इस तरह, पिज्जा से होने वाली आय व शुभचिंतकों के आर्थिक सहयोग से वर्ष 2008 के जून महीने में 'विश्रांति' नामक वृद्धाश्रम बनकर तैयार हो गया। 'विश्रांति' में अभी 10 वृद्ध रहते है। इस संख्या में जल्द ही बढ़ोतरी होने वाली है।

स्त्री शिक्षा पर क्षण भर

राजकिशोर


प्रज्ञा पाठक को क्या आप जानते हैं? मैं भी नहीं जानता। पर उनकी तारीफ करना चाहता हूं कि उन्होंने अपने शोध कार्य के सिलसिले में एक ऐसी किताब का पता लगया है जिसे बेजोड़ छोड़ कर कुछ और नहीं कहा जा सकता। इस पुस्तक का नाम है: सरला : एक विधवा की आत्मजीवनी। सरला नाम की किसी महिला ने "एक दु:खिनीबाला के नाम से अपनी रामकहानी "स्त्री दर्पर्ण पत्रिका के जुलाई 1915 से मार्च 1916 तक के अंकों में लिखी थी। इसे पढ़ने और उस पत्रिका में छपी अन्य सामग्री का परिचय पाने के बाद मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि महिला पत्रकारिता के मामले में हमारा घोर पतन हुआ है। कहां वे वीरांगनाएं जो स्त्री जीवन के विविध मुद्दों को ज्वलंतता के साथ उठाती थीं और कहां आज की वनिताएं जिन्हें सिंगार-पटार और खाने-कपड़े की नवीनताओं से फुरसत नहीं है। यह पतन का प्रमाण नहीं, पतन का परिणाम है।
वैसे तो "एक विधवा की आत्मकथार् के कई सुंदर पहलू हैं, पर मैं यहां सिर्फ दो चीजों का जिक्र करना चाहता हूं। हाल में मैंने अनेक स्त्रीवादी लेख पढ़े हैं जिनमें स्त्री दुर्दशा के बेहद करुण चित्र खींचे गए हैं और पुरुषों को पानी पी-पी कर कोसा गया है। लेकिन कहीं भी वह बात नहीं देखी जो इस दु:खिनीबाला ने अपनी अम्मा के हवाले से बहुत ही सहज ढंग से कह दी है। अम्मा, बाबूजी और भाई मोहन के बीच स्त्रियों की समस्याओं पर चर्चा चल रही है। लेखिका पूछती है- "जो प्रथा (स्यापा) इतनी बुरी है, जिसके सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं उसे लोग तोड़ क्यों नहीं देते? क्या घरवालों में दया नहीं है या समाज की दृष्टि में वह अच्छा हैर्?
इस पर अम्मा कहती हैं- "नहीं-नहीं, बात यह नहीं है, सब लोग जानते हैं, समझते हैं, मन ही मन उसे घृणा की दृष्टि से भी देखते हैं किन्तु मनुष्यों में इतना नैतिक बल नहीं है कि एक बात को सरासर बेजा समझते हुए भी उसे छोड़ दें। साथ ही स्त्रियों में विद्या नहीं, बुद्धि नहीं। स्यापे को भी वे ईख्ारीय आज्ञा, धर्म और वेद समझती हैं। कितनी ही ऐसी हीन प्रथाएं हैं। समाज में तो क्या, तुमसे कहने में भी, जिनका नाम लेने तक में लज्जा में डूब जाती हूं। कितनी ही प्रथाएं तो ऐसी हैं कि यदि स्त्रियां पढ़-लिख जाएं तो उन्हें अपनी बहू-बेटियों से कहने में इतनी लज्जा आए कि उनका अनुसरण आप से आप बंद हो जाए। किसी शिक्षिता स्त्री को अपनी पुत्री या पुत्रवधू से कहने का साहस ही न होर्।
पुस्तक में अन्यत्र भी स्त्री शिक्षा के महत्व पर जोर दिया गया है। नि:संदेह शिक्षा सशक्तीकरण का एक सबल औजार है। इसीलिए अभी हाल तक स्त्रियों को शिक्षा से वंचित रखने की प्रथा थी। सवाल यह नहीं था कि शिक्षा पा कर स्त्री क्या करेगी, जैसा कि कहा जाता था, सवाल यह था कि शिक्षा पा कर स्त्री क्या नहीं करने लग जाएगी। शिक्षा अज्ञान के किले को तोड़ने के लिए सबसे कारगर हथौड़ा है। एक ओर पुरुष का विवाह करते समय इसका ध्यान रखा जाता था (आज भी रखा जाता है) कि स्त्री की उम्र उससे कम हो, ताकि पुरुष शारीरिक तौर पर उस पर हावी हो सके; दूसरी ओर स्त्री को शिक्षा से वंचित रखा जाता था, ताकि पुरुष मानसिक रूप से उस पर हावी हो सके। इस तरह स्त्री की दशा ऐसी कर दी गई थी कि वह पुरुष के सामने सिर न उठा सके। इसे ही आदर्श जोड़ी कहते थे।
आज उन्हीं स्त्रियों का वास्तविक सशक्तीकरण हो पा रहा है जिन्होंने शिक्षा के माध्यम से अज्ञान के केंचुल को उतार फेंका है। आश्चर्य है कि फिर भी स्त्रीवादियों की ओर से स्त्री शिक्षा के प्रसार के लिए कोई सशक्त आंदोलन नहीं है। राजधानी की औरतें संसद में स्त्रियों के लिए एक-तिहाई आरक्षण के लिए जितना जोर लगा रही हैं, स्त्री शिक्षा के प्रसार की ओर से वे उतनी ही उदासीन हैं। ऐसा लगता है कि जैसे पुरुष स्त्री शिक्षा से डरते थे, वैसे ही आज शिक्षित औरतें और अधिक स्त्रियों के शिक्षित हो जाने से डरती हैं। यह समझ में आना मुश्किल है कि अशिक्षित औरतों की फौज कौन-सी सांस्कृतिक क्रांति ला सकेगी।
दूसरी बात यह है कि जब तक समाज में अमीरी-गरीबी है, तब तक किसी के भी साथ न्याय नहीं हो सकता। सरला जो स्वप्न देखती है, उसमें एक व्याख्यानदाता कहता है- "राजनीति में देखिए, दुनिया प्रजातंत्र का नाम ले पागल हो रही है जबकि वास्तव में सब मनुष्यों के भाग्य का निपटारा एक थोड़े-से मनुष्यों का खेल हो रहा है। संपत्ति के क्षेत्र में देखिए, हजार गरीबों के बीच मुश्किल से एक अमीर होता है। किसी के पास करोड़ों रुपया है और किसी के तन पर एक फटा कपड़ा हैर्। यह धरती की दशा है। सरला द्वारा स्वप्न में देखे गए स्वर्ग की स्थिति क्या है- "यहां दुखी कोई दिखाई ही नहीं देता। गरीबी किस वस्तु का नाम है, वह है भी कुछ या नहीं, इसमें भी संदेह होता है। यहां स्त्री-पुरुष में कोई भेद नहीं है, यहां पुरुष सर्व सुखों का अधीख्ार नहीं है और न स्त्री अंत:पुराबद्धा दासी ही है। दोनों बराबर हैं। दोनों ही अपनी इच्छानुसार काम करते हैंर्।
यानी स्त्री मुक्ति के लिए शिक्षा ही नहीं चाहिए, आर्थिक और सामाजिक बराबरी भी चाहिए। स्त्रीवादी महिलाएं आर्थिक आत्मनिर्भरता की बात तो करती हैं, पर आर्थिक समानता की बात नहीं करतीं। जो वामपंथी महिलाएं आर्थिक बराबरी की बात करती हैं, वे शिक्षा के महत्व पर उतना जोर नहीं देतीं। इस विडंबना के अलावा एक पहेली और है। कायदे से शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि वह आर्थिक तथा सामाजिक बराबरी की चेतना पैदा करे। जो शिक्षित आदमी बराबरी की चेतना से वंचित है, वह पढ़ा-लिखा होने के बावजूद अहमक है। आज स्त्री-पुरुषों को जो शिक्षा दी जा रही है, उससे वे शिक्षित तो कहलाते हैं, पर अकसर चेतना-शून्य होते हैं। यही कारण है कि तथाकथित शिक्षित पुरुष भी स्त्रियों को गुलाम बनाए रखते हैं और तथाकथित शिक्षित (तथा कमाऊ) स्त्रियां भी पराधीनता का जीवन बिताती हैं। शिक्षा वह है, जो एक संस्कृत सूक्ति के अनुसार, मुक्त करे। दूसरी ओर, यह मुक्ति तब तक घटित नहीं हो सकती जब तक सबकी आर्थिक हैसियत बराबर न हो। हैरत की बात यह है कि जिस सत्य को एक कम पढ़ी-लिखी "दु:खिनीबालार् ने 1915 में ही समझ लिया था, वह आज की बीए, एमए, पीएचडी स्त्रियों की भी दिखाई नहीं पड़ता। अगर यह विकास है, तो पतन किसे कहते हैं?

Friday, January 2, 2009

२१वीं सदी की बेटी

जवानी की दहलीज पर
कदम रख चुकी बेटी को
माँ ने सिखाये उसके कर्तव्य
ठीक वैसे ही
जैसे सिखाया था उनकी माँ ने !

पर उन्हें क्या पता
ये इक्कीसवीं सदी की बेटी है
जो कर्तव्यों की गठरी ढोते-ढोते
अपने आँसुओं को
चुपचाप पीना नहीं जानती है !

वह उतनी ही सचेत है
अपने अधिकारों को लेकर
जानती है
स्वयं अपनी राह बनाना
और उस पर चलने के
मानदण्ड निर्धारित करना !!
आकांक्षा

Thursday, January 1, 2009

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ

आज ही जनसत्ता के सम्पादकीय पृष्ठ पर एक लेख देख रही थी।स्त्रियों की सुरक्षा को लेकर प्रशासन और समाज अब तक कोई ठोस कदम नही उठा पाया है।जब स्त्रियाँ बाहर निकलने तक मे सुरक्षित नहीं तो हमारे सत्ता तंत्र के लिए यह सोचने की बात है कि किस विकास की बात कर रहे हैं?साल 2005 , साल 2006,साल 2007 ,साल 2008 और अब साल 2009 स्त्री के विरुद्ध अपराधों के आंकड़ॆ बढ ही रहे हैं।


चोखेर बाली की शुरुआत को आगामी 4 फरवरी को एक साल पूरा होने जा रहा है, कोशिश करूंगी कि इस एक साल मे ब्लॉगजगत मे हुई चर्चाओं और विवादों को जो चोखेर बाली से जुड़ी हैं एक-दो पोस्ट मे समेट पाऊँ।

आप सभी को नए साल की बहुत शुभकामनाएँ !

समस्त चराचर के लिए यह वर्ष कल्याणकारी सिद्ध हो ,और स्वतंत्रता ,समानता , बन्धुत्व के पक्षधर हमारे सभी साथियों में स्त्री विमर्श को देखने-समझने के लिए एक खुली दृष्टि , नई दृष्टि विकसित हो ।