Friday, February 27, 2009

मां का जीवन

राजकिशोर

तीन दिन पहले हमसे एक भारी अपराध हुआ। घर की मरम्मत कर रहे एक कारीगर ने पुरानी खिड़की को तोड़ कर नीचे गिराया, तो एक कबूतर का घोंसला भी उजाड़ दिया। तिनकों का वह बेतरतीब समवाय फर्श पर आ गिरा जो उस कबूतर और उसके दो नवजात शिशुओं का घर था। खिड़की के एक टुकड़े पर दोनों शिशु, अपनी आसन्न नियति से अनजान, अपने पैर हिला-डुला रहे थे। अभी उनकी आंखें भी नहीं खुली थीं। पंखों में कोई जान नहीं थी। यह चार्ल्स डारविन का दौ सौवां जन्म दिन है, इसलिए मैंने अनुमान लगाया कि जैसे हम मनुष्यों के पूर्वजों ने कभी यह तय किया होगा कि सामने के दोनों पैरों का प्रयोग हाथों के रूप में करना चाहिए, वैसे ही पक्षियों के पुरखों ने कभी यह इच्छा की होगी कि सामने के दोनों पैरों का प्रयोग पंख के रूप में करना चाहिए। तय किया था या इच्छा की थी, यह कहना शायद ठीक नहीं है। यह तथा पशु-पक्षियों में इस तरह के अन्य परिवर्तन जीवन के विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया में ही हुए होंगे। मैंने इसके पहले पक्षियों के अंडे तो देखे थे, पर उनके नवजात शिशु नहीं। उस दिन देखा और मन में ये खयाल आए, तो यह बात भी याद आई कि देखना ही जानना है। पढ़ा है कि दर्शन शब्द की उत्पत्ति जिस धातु से हुई है, उसका अर्थ भी देखना ही है।

अपराध बोध की शुरुआत तब हुई जब हम यह सोचने लगे कि अब इन नवजात शिशुओं का क्या होगा। क्या ये जीवित रह पाएंगे? वे जिस अवस्था में थे, हम उनके लिए कुछ नहीं कर सकते थे। क्या ये भी विकास की बलि वेदी पर शहीद हो जाएंगे? हमने उनके घोंसले का जैसा-तैसा पुनर्निर्माण किया और कमरे से दूर हट कर इंतजार करने लगे कि शायद इनकी मां आए और इनकी देखभाल करने लगे। जब अंधेरा हो आया और वह नहीं लौटी, तो हम निराश होने लगे। तभी याद आया कि एक दूसरी खिड़की पर बनाए अपने घोंसले में एक दूसरी कबूतर ने अंडे दिए हुए हैं। पत्नी ने सुझाया कि इन बच्चों को उसी घोंसले में रख दिया जाए। शायद कोई सूरत निकल आए।

अगले दिन दोपहर को जो दृश्य दिखाई पड़ा, उससे हम अभिभूत हो गए। एक कबूतर उन दोनों बच्चों के मुंह बारी-बारी से अपने मुंह में डाल कर दुलार कर रही थी। यह दूश्य बेहद आनंददायक था। हममें से किसने युवा माताओं को अपने नवजात शिशुओं को दुलारते-चूमते-उठाते-बैठाते नहीं देखा होगा! उस वक्त स्त्री के चेहरे पर ही नहीं, पूरे अस्तित्व में आह्लाद की जो लहर दौड़ती रहती है, उसका कोई जोड़ नहीं है। यह वह विलक्षण सुख है जो कोई मां ही अनुभव कर सकती है। कबूतरों की मुद्राओं में इतनी बारीक अभिव्यक्तियां नहीं होतीं। क्या पता होती भी हैं, पर हम उन्हें पढ़ना नहीं जानते। सचमुच, हमारे अज्ञान की कोई सीमा नहीं है। हमारे आसपास कितना कुछ घटता रहता है, पर हम उससे अवगत नहीं हो पाते। अपने व्यक्तित्व की कैद दुनिया की सबसे बदतर कैद है। थोड़ी देर बाद हमने पाया कि कबूतर दोनों बच्चों पर बैठ कर उन्हें से रही है। दोनों अंडे भी पास ही पड़े हुए थे। शायद उनके खोल में पल रहे दो जीवन भी सुरक्षित निकल आएं। अब हमने चैन की सांस ली कि हम हत्यारे नहीं हैं।

वह बेचारी कबूतर दिन भर बैठी बच्चों के जीवन में ऊष्मा भरती रही। यह तय करना असंभव था कि उसने दिन भर कुछ खाया या नहीं। हो सकता है, बीच-बीच में कुछ देर के लिए घोंसले से बाहर निकल कर वह कुछ चारे का जुगाड़ कर लेती हो। हो सकता है उसका सामयिक प्रेमी ही कुछ ला कर वहां रख जाता हो। जिस बात ने मुझे सबसे अधिक परेशान किया, वह यह थी कि अगर यह मां कबूतर एक हफ्ते भी इन बच्चों (यह भी पता नहीं कि ये बच्चे उसी के थे या उसने उन्हें अनायास ही गोद ले लिया था) को सेती है, तो हम मनुष्यों की भाषा में उसके सात कार्य दिवस नष्ट हुए। अगर वह कहीं नौकरी करती होती, तो उसके सात दिन के पैसे कट जाते। इन सात दिनों तक वह ममता की कैद में अपने छोटे-से घोंसले तक सीमित रही और मुक्त आकाश में उड़ने तथा अठखेलियां करने से वंचित रही। इसका हरजाना कौन देगा? यह तो तय ही है कि कुछ दिनों के बाद बच्चे उड़ जाएंगे और अपनी अलग जिंदगी जीने लगेंगे। तब वे न तो अपनी मां को पहचानेंगे और न मां उन्हें पहचान सकेगी। एक स्त्री ने सृष्टि क्रम को आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका अदा की और किस्सा खत्म हो गया।

बताते हैं कि आदमी के बच्चे का बचपन दुनिया के सभी जीवों में सबसे लंबा होता है। उसका गर्भस्थ जीवन भी सबसे लंबा होता है। इस पूरी अवधि में उसकी मां को कठिन तपस्या करनी पड़ती है। उसका अपना जीवन स्थगित हो जाता है। आदमी का बच्चा ज्यादा देखरेख और सावधानी की भी मांग करता है। यह अधिकतर मां के जिम्मे ही आता है, हालांकि आजकल पति लोग भी कुछ सहयोग करने लगे हैं। जब संयुक्त परिवार का चलन था, तब मां को कुछ प्रतिदान मिल जाता था। आजकल बड़ा होते ही बच्चे फुर्र से उड़ जाते हैं। वे एक ही शहर में रहते हैं, तब भी मां-बाप से उनकी मुलाकात महीनों नहीं हो पाती। जिनके बच्चे परदेस चले जाते हैं, उनका बुढ़ापा निराश्रय और छायाहीन हो जाता है। ऐसी मां को शुरू में भी कष्ट सहना होता है और बाद में भी। मातृत्व की इतनी बड़ी कीमत चुकाना क्या कुछ ज्यादा नहीं है? अन्य पशु-पक्षियों की तुलना में मानव मां इतना त्याग क्यों करे? आंचल में दूध आंखों में पानी का पर्याय क्यों बने?

शायद इसीलिए पश्चिम की आधुनिक स्त्री मातृ्त्व की महिमा को ताक पर रख कर अपना जीवन जीने में कोताही नहीं करती। गर्भावस्था के आखिरी महीने ही उसकी गतिविधियों को सीमित करते हैं। गर्भ-मुक्त होते ही वह फिर पूर्ववत सक्रिय हो जाती है और बच्चे अकेले या बेबी सिटरों की निगरानी में पलते-बढ़ते हैं। बाद में बच्चों को व्यस्त रखने के लिए खिलौने के ढेर, टेलीविजन और वीडियो गेम दे दिए जाते हैं। हमारे महानगरों में भी यह चलन शुरू हो गया है। स्त्रियां माता का पुराना लंबा रोल निभाना नहीं चाहतीं। यह कैसे तय किया जाए कि मां की पुरानी भूमिका अच्छी थी या आज की भूमिका अच्छी है? पहली भूमिका में मां का जीवन त्याग-तपस्या से भरा होता है और दूसरी भूमिका के कारण दुनिया में ऐसे लोगों की तादाद बढ़ रही है जिन्होंने मां-बाप का प्यार जाना ही नहीं। जाहिर है, जिसे प्यार नहीं मिला, वह प्यार दे भी नहीं सकता। क्या कोई और रास्ता भी है, जिसमें मांओं को अपना जीवन स्थगित न करना पड़े और बच्चों को भी भरपूर प्यार मिल सके?

Thursday, February 26, 2009

प्यार और प्यास का फर्क

विवेक आसरी की एक और कविता, चोखेरबाली के लिए।


पति के बगल में सोई
अतृप्त मैं,
ख्वाबों से घबराती हूं।
हर ख्वाब की दहलीज पर
खड़ा रहता है
एक साया
अनजान
मुझे अपनी बाहों में समेटने को तैयार।

डर मुझे उस साये से नहीं
उन बाहों के आकर्षण से लगता है।
उस सफर से लगता है
जो दहलीज पार करते ही
शुरू हो जाता है
उस साये के पहलू में।
घबराहट मुझे
उस छद्म तृप्ति से होती है
जो बढ़ा देती है
अतृप्ति के अहसास को।

प्यार और प्यास का फर्क
सवाल बन जब खड़ा हो जाता है
हर करवट के साथ
पति और मेरे बीच का
अंतर बड़ा हो जाता है।

वो साया
मुझे मेरे मन का
गवाह क्यों लगता है?
और फिर सुबह जगकर
पति की आंखों में झांकना
गुनाह क्यों लगता है?
--

मानवी-उत्तरी अमेरिका मे बसी साउथ एशियन महिलाओं के लिए





" समानता और सब के लिये

एक सी न्याय व्यवस्था  "

न्याय से बड़ा कोई धर्म नही है
 भारत, नेपाल, बाँग्ला देश, लिंक और श्री लँका से उत्तर अमरीकी गणतंत्र मेँ आकर बसने वाली तमाम स्त्रियोँ को

" साउथ एशियन " कहा जाता है।और विदेशों मे जा बसीं महिलाएँ भी शारीरिक मानसिक प्रताड़ना की,घरेलू हिंसा की शिकार बनती हैं।अभी ज़्यादा समय नही हुआ है Provoked जैसी फिल्म बने जो इसी थीम पर आधारित है।

"मानवी" एक न्यु - जर्सी प्राँत मेँ स्थित सँस्था है जो नारी को सम्मान से , किसी भी आतँक शारीरिक प्रताडना से, मुक्त जीवन जीने के लिये, प्रोत्साहीत करती है और नारी तथा उनकी सँतान को इस अवस्था मेँ, सफल जीवन व्यतीत करने मेँ, हर सँभव प्रयास सहायता करती है -
इस संस्था का नियम है कि ऊपर बतलाये गये देशोँ मेँ से किसी भी धर्म का पालन करनेवाली स्त्रियोँ के साथ , एक समान व्यवहार किया जाता है -

कोई हिन्दु हो या ईसाई या मुस्लीम या पारसी या सीख या बौद्ध-

उससे कोई फर्क नहीँ पडता -

कुछ सेवाएँ जो मानवी सँस्था द्वारा स्त्रियोँ के लिये उपलब्ध करायी जातीँ हैँ उनमेँ हैँ

) कानूनी सलाह सहायता

) व्यक्तिगत सलाह तथा विश्लेषण

)डाक्टरी चिकित्सा उपलब्ध कराना

) सहायक मित्र मँडल

) सिफारीशेँ इत्यादी हैं

link देखिये


http://www.manavi.org/



-लावण्या

Saturday, February 21, 2009

स्त्री भाषा-पुरुष भाषा का भेद दर असल प्रजा की भाषा और सत्ता की भाषा का ही भेद है

विजय गौड़

चोखेर बाली ने रवीश जी के आलेख के बहाने भाषा की जो बहस छेड़ी है, रवीश जी के आलेख को ध्यान में रखकर कहूं तो वहां मूल रूप से एक भाषा के भीतर ही शब्द संयोजन और उसके भाषिक विन्यास का मामला है। भाषायी भिन्नता के सवाल पर मुझे तेलगू के कवि वरवर राव की वह टिप्पणी याद आ रही है जिसमें वे भाषा के दो रूपों का जिक्र करते हैं - एक सत्ता की भाषा और दूसरी जनता की भाषा। यानी यहां वे दो भाषाओं के समूल विभेद की बात करते हैं। भाषायी विभेद को वे एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से व्याख्यायित करते हैं। लिंगभेद की बजाय उत्पादन के यंत्रों पर कब्जा किए शासक वर्ग और उसके द्वारा शोषित जनता के आधार के पर उसका विश्लेषण करते हैं।
एक ही भाषा के भीतर उसके विन्यास के सवाल पर भाषाविद्ध नोम चॉमस्की सृजनात्मकता पर बल देते हैं। उनका मानना है सृजनात्मकता मन की क्षमता है, जो किन्हीं नियमों के अंतर्गत अब तक न सुनी गयी रचनाओं को भी पहचानता है और नये-नये वाक्यों का उत्पादन (निष्पादन) करता है। यानी निष्पादन की इस प्रक्रिया को कोई भी भाषा-भाषी बिना किसी लिंगभेद के ग्रहण करता है। स्वंय हिन्दी के भीतर ही देख सकते हैं कि किसी भी वस्तु के लिंग को निर्धारित करते हुए हिन्दी भाषी स्त्री हो चाहे पुरुष, कभी कोई गलती नहीं करते। एक स्त्री भी "बस जाती है" कहती है और एक पुरुष भी "ट्रक जाता है" कहता है। यहां बस और ट्रक के रूप्ा, आकार या गति के आधार पर नहीं बल्कि हिन्दी भाषा के भीतर मौजूद सामंतीय संस्कार, जो सिर झुका कर काम करने वाली स्त्री की तस्वीर हमारे सामने रखते हैं, वैसे ही सार्वजनिक रूप से सेवा के भाव के साथ कार्य में जुती बस को स्त्रीलिंग और उसी सामंतीय संस्कारों के चलते बलशाली से दिखते और अपनी मर्जी से संचालित होते भाव को लिए ट्रक को पुल्र्लिंग बना देते हैं। इस तरह से यदि देखना चाहें तो एक हद तक हिन्दी में वस्तुओं के लिंग निर्धारण की व्याख्या संभव हो सकती है। यद्यपि यह मुमिल नहीं है। अन्य भी और कई नियम हो सकते हैं जिन पर गम्भीरता से विचार करने वाले स्वत: पहुंच पाएं। यहां तो बस यह उल्लेखनीय है कि भविष्य में उत्पादित होने वाली किसी भी वस्तु जिसके अस्तीत्व की भी आज कल्पना संभव नहीं, के लिंग निर्धारण में किसी हिन्दी भाषी पुरुष और स्त्री में भी शायद ही मतभेद होे। अब सवाल यह है कि मीडिया की भाषा में, जो सनसनी और चौंकाऊपन दिखाई दे रहा है क्या उसके कारणों को रवीश जी की दृष्टि, जो इसे लिंगभेद के कारणों की उपज मानती है, से विश्लेषित किया जा सकता है ?
मेरी समझ में टी आर पी को बढ़ाने के लिए जो बाजारु किस्म के दबाव हैं, जिसके पीछे मुनाफा एक मात्र शर्त है, वही एक मूल बिन्दू हो सकता है जो इस प्रवृत्ति को विश्लेषित कर पाए। यहां स्त्री और पुरुष के बदल जाने पर शायद ही कोई बदलाव दिखे, ऐसी आशंका रखना चाहता हूं।
बाजार सनसनी पैदा करता है और सनसनी से भरी खबरें ही बाजार हो सकती हैं। बाजार की चमक-दमक में ही वो चुधियाट हो सकती है जो झूठे सपनो का संसार रच सकती है और उन सपने के पूरे न हो सकने के लिए किसी सनसनी भरी खबर में ही जनता की लामबंदी को रोकना संभव है। सनसनी भरी खबर ही ज्यादा दर्शक बटोरू भी हो सकती है। जितने ज्यादा दर्शक जिस रिपोर्ट के कारण मिले उतनी पौ बारह उस पत्रकार की जिसकी वह रिपोर्ट है। ऐसे ही सुरक्षित रह सकती है हमारी रोजी-रोटी, यह बात मीडिया का हर स्त्री-पुरुष जानता है। इसलिए उनका शाब्दिक संयोजन भी उसी प्रवृत्ति के चलते है जो बेशक दर्शक को ज्यादा देर तक भले ही न टिकाए रख पाए पर चौंका कर अपने पास तक तो ले आए। सिर्फ और सिर्फ टी आर चाहिए और उस टी आर पी के आधार पर ज्यादा से ज्यादा विज्ञापन। बल्कि मुनाफे की यह मानसिकता हमारे भीतर जब महत्वांकाक्षा के रूप में होती है तो ब्लाग पर उस एक क्लिक के लिए ही जो हमारी टी आर पी को बढ़ाने वाला होता है, क्या हमें सनसनीखेज शीर्षको की खोज में परेशान नहीं करता। महत्वाकांक्षा की इस प्रव्त्ति से संचालित स्त्री और पुरुष ब्लागरस में भी यहां कोई खास फर्क शायद ही दिखे।

Friday, February 20, 2009

स्त्री का कंटेंट पर कोई नियंत्रण नही है


कहने को स्त्री का दखल हर नए क्षेत्र मे है,जहाँ वह पढ लिख कर अपनी योग्यता के बलबूते पहुँच रही है।ऐसे मे जब रवीश ने जेन्डर के सवाल को पत्रकारिता के लेखन से जोड़ा तो लगभग यह सामने आया कि कंटेंट पर स्त्री का नियंत्रण नही है, डिसीज़न मेकिंग की बात तो दूर वह अपनी बात अपने शब्दों मे भी नही कह पा रही है ,एंकरिंग फिर भी सुलभ है जो किसी रैम्प पर किसी और के बनाए परिधानो की प्रदर्शनी के लिए किए जाने वाले कैट वॉक जैसा है।झलकती है तो केवल स्त्री की दर्शनीयता,कमनीयता ....उसकी योग्यता नही ...अपनी भाषा तक नही...वहाँ दर्ज ये कमेंट सोचने को विवश करते हैं-

SHASHI SINGH said...
कहीं ऐसा तो नहीं तो कि पुरुष प्रधान (?) न्यूज़ डेस्क पर बैठा कुंठित पत्रकार इस बात का बदला ले रहा है कि तमाम काबिलियत के बावजुद महिला नहीं होने की सज़ा के तौर पर उसे डेस्क के थैंकलेस जॉब की कोल्हू में जबरिया जोता जा रहा है?

February 14, 2009 10:10 PM
सुजाता said...
विचारोत्तेजक लेख ! स्त्री की भाषा भी उसकी अपनी नही है,यह केवल पत्रकारिता मे नही है,इसलिए सचेत होकर अपनी स्त्री भाषा स्त्री विमर्श की भाषा गढने का वक़्त है।उपमान मैले हो गए हैं।
स्त्री लिखेगी तो भी लिखवाने वाला जब तक पुरुष है या पुरुष की पोज़ीशन /ऑप्रेसर की स्थिति मे बनी स्त्री लिखवा रही है ,तो भी यही लिखा जाएगा।
दर असल यह पूरी की पूरी व्यवस्था की संरचना का मामला है जिसमें आधिकारिक तौर पर मस्क्यूलिनिटी को सर्वोच्चता प्राप्त है।आप नए स्ट्रक्चर खड़े कीजिए वहाँ भी यह जेंडर प्रॉबलम तुरत से खड़ी हो जाएगी।

February 14, 2009 10:58 PM

kiran said...
नमस्कार सर,
ये जेंडर प्रॉब्लम है या नहीं..ये नहीं कह सकती...हां इसमें दो राय नहीं कि टीवी में..खासकर हिन्दी मीडिया में गहरी सोच और संवेदनशील महिला पत्रकारों की कमी जरुर है...जो विषयों को समझते हुए..लिख रही हों...या जिन्हें लिखने का मौका दिया जा रहा हो...मैं एक छोटे चैनल में हूं..मगर खुश हूं कि मुझे लिखने का अवसर मिलता है..लेकिन यहां खालीपन बहुत बड़ा है.....

February 15, 2009 1:53 PM
kiran said...
इसके अलावा आज उन लोगों की भरमार है..जिनका लेखन सतही होने के बावजूद...वे सीनियरर्स की प्रशंसा के पात्र बनते हैं...एक हद तक ये भी कह सकते हैं कि आज सतही लेखन की ही मांग है...जो कम से कम..में फटाफट एक पैकेज लिख दें...जिसमें गहराई कम...लफ्फाज़ी ज्यादा हो....वैसे, मुझे खुशी है कि आपकी और हिन्दी टीवी मीडिया के कुछ और गिने चुने पत्रकारों ने हिन्दी की अस्मिता...उसकी गरिमा को कायम रखा है....जो मुझ जैसों के लिए प्रेरणा के स्त्रोत हैं..और हमें आगे बढ़ने का हौसला देते हैं.....आप ऐसे ही लिखते रहें..इन दिनों आपकी विशेष रिपोर्ट..बेमिसाल लग रही है..खासकर मीडिया पर आपका प्रहार बहुत भाया....

February 15, 2009 2:00 PM

Dipti said...


ये तो नहीं कहा जा सकता है कि महिलाओं की लेखनी उग्र नहीं होती है या नहीं हो सकती है। लेकिन, ये सच है कि महिलाओं को लिखने लायक बहुत कम लोग मानते हैं। मेरी पहली नौकरी में ही मुझे इस बात का सामना करना पड़ था। मुझे न तो राजनीति की ख़बर लिखने दी जाता थी और न ही क्राइम की। हां कही कोई भजन कीर्तन हुआ तो वो मेरी झोली में ज़रूर गिर जाता था।


February 16, 2009 2:48 PM

मनीषा पांडेय said...
I am 100 % agree Ravish. Striyon ke pas sachmuch apni bhasha nahi hai. Jo thoda bolati hai unki bhasha bhi khud ki nahi hoti. Apni svatv ke sath apni bhasha arzit karne ka sagharsh bhi abhi hona baki hai..

February 19, 2009 3:56 PM

neelima sukhija arora said...
रवीशजी, आपका यह पोस्ट थोड़ा देरी से पढ़ पाई, इसका अफसोस है, लेकिन यह अफसोस इतने सारे कमेंट्स पढ़कर अफसोस नहीं रहा। टीवी की आक्रामक भाषा और चाकू की तरह दिमाग में जख्म करती स्क्रिप्ट्स हम सभी को परेशान करते हैं, आपके एक प्रोफेसर मित्र ने इसका एक अलग सा विश्लेषण भी कर दिया, जो कहीं न कहीं जेंडर बहस भी खड़ी कर रहा था। और आपने उससे भी बेहतर ढंग से समझाया।
एंकर तो आपको बड़ी संख्या में महिलाएं या लड़कियां मिल जाएंगी लेकिन जब बात का‍पी लिखने की आती है या रिपोर्टिंग की आती है तब लड़कियां कहां खो जाती हैं।
बात बहुत सही भी है, ज्यादातर एंकर लड़कियां होंगी, इस बात पर हम सब का बस चलता भी तो कितना है, यह तो मालिक या मैनेजमेंट तय कर देता है कि एंकरों में कितनी स्त्रियां रहेंगी और कितने पुरुष।
रही कापी लिखने की बात,शायद लड़कियां कापी लिखतीं तो वो अलग ही तरह की होती। मेरा ख्याल है कि यह भाषा किसी सभ्य आदमी की हो ही नहीं सकती है कि घर में घुसकर मारो पाकिस्तान को। जब कोई सभ्य लड़का ही ऐसा भाषा को प्रयोग नहीं करता है तो लड़कियां से ऐसी आशा करना ही बेमानी है।
मैं भी प्रिंटर डेस्क पर ही काम करती हूं, वो भी अखबार में । जहां मैं लगभग हर रोज पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तालिबान, ओसामा बिन लादेन और अमेरिका पर स्टोरीज लिखती या रीराइट करती हूं। पर मुझे याद नहीं आता कि मैंने या मेरे साथियों ने कभी भी इतनी ओछी भाषा का प्रयोग किया हो। मेरा मानना है टीवी में भी यदि ज्यादातर लड़कियां स्क्रिप्ट्स लिखने लगें तो इतनी हल्की भाषा का प्रयोग तो नहीं ही होगा।
आपके कमेंट्स में भी लोगों ने मजेदार विश्लेषण लिखे हैं- मुंबई से किसी ने लिखा है ज्यादातर महिला पत्रकारों को भाषा से ज्यादा अपने मेकअप की चिंता होती है ... वो वही पढ़ती है, जो लिखा रहता है ..भाषा के मतलब से उन्हें क्या मतलब है .
शायद इन महोदय को यही पता नहीं है कि मेकअपस सिर्फ एंकर के लिए होता है, हर महिला पत्रकार एंकर नहीं होती है। भैया आईआईएमसी में आज भी मैक्सिमम लड़कियां टा‍प करती हैं आपको नहीं पता हो तो मैं बता दूं। जिस साल मैंने भी मा‍स का‍म किया था ज्यादातर लड़कियां टापर थीं। वहां पर स्टूडेंट्स का‍पी लिखने और रिपोर्टिंग करना ही सीखते हैं,अगर ये वहां का सच है तो आय एम सा‍री आप आइने की एक तरफ ही देख रहे हैं दूसरा हिस्सा भी देखिए।

February 19, 2009 4:01 PM

Wednesday, February 18, 2009

जाँच आरोपी की होती है,विक्टिम की नही -चरित्र पर वार से बचना चाहिए

कल के मुद्दे पर जवाब मांगने पर अविनाश जी का स्पष्टीकरण आया है ,यह अच्छा है।लेकिन इस जवाब के साथ साथ और बहुत कुछ है जो चला आया है।जैसा कि इस तरह के मुद्दे पर किसी भी आरोपी का बयान हो सकता है ,वैसा ही बयान यह भी है जिसमे विक्टिम के चरित्र को निशाना बनाया गया है। अविनाश जी ने कहा कि लड़की की जाँच कराई जाने चाहिए,किसी अनाम ने कहा मेडिकल परीक्षण होना चाहिए - ध्यान रहे कि लड़की इस केस मे विक्टिम है और जाँच आरोपी की होती है विक्टिम की नही,यह अलहदा बात है कि जाम्च के बाद आरोपी आरोप मुक्त हो जाए ,निर्दोष पाया जाए।


ध्यातव्य है कि यह मामला पत्रकारिता का नही विश्वविद्यालय का है, क्योंकि आरोपी वहाँ गेस्ट फेकल्टी था और विक्टिम छात्रा था। सो यह पुलिस का मामला नही है विश्वविद्यालय का मामला है जिसे ऑर्डिनेंस 15 D के अंतर्गत लिया जाता है। यह ऑर्डिनेंस विशाखा केस से निकल कर आया था क्योकि यह माना गया कि कार्यक्षेत्र पर होने वाले यौन उत्पीड़न के मामले क्रिमिनल कानूनों से प्रभावी तरीके से हल नही हो पा रहे थे। इसे सभी विश्वविद्यालय ऐसे मामलों मे मॉडल मानते हैं।इसी के आधार पर लड़की ने कुलपति से शिकायत की जिसकी पुष्टि होने के बाद ही समिति का गठन किया गया होगा। उसी समिति के सामने आरोपी अपने बयान और स्पष्टीकरण दे सकते हैं।

और अगर बात पुलिस की ही है तो यह रास्ता आरोपी के सामने भी खुला है कि वह अपने सम्मान की सुरक्षा के लिए थाने मे जाए।



चरित्र की डिटेल्स के साथ साथ उस लड़की का नाम भी बहुत से कमेंटस मे लिख दिया गया है, जो कि ऑर्डिनेंस 15D का सरासर उल्लंघन है।यदि समिति गठित हो गयी है तो वह अपना काम करेगी ही ,लेकिन अनाम कमेंट्स करने वालों से अनुरोध है कि यहाँ पर विक्टिम और आरोपी दोनो के ही विषय मे निजी और पारिवारिक जानकारियों का उल्लेख कर के माहौल दूषित न करें।

Tuesday, February 17, 2009

ब्लॉग जगत के बलात्कारी ब्वायज़

एक पुरानी पोस्ट

प्रासंगिक जानकर डाल  रही हूँ। अविनाश जी को चिंता रहती

थी कि 


चोखेरबालियाँ चुप क्यो है ? चोखेरबालियाँ चुप न थीं , न रहती हैं। लेकिन कोई उनके हलक मे उंगली डालकर 


अपनी  मनचाही बात उगलवाना चाहे यह सम्भव नही है।हम  स्त्री के सम्मान पर आघात का विरोध और निन्दा  


करते रहे हैं , करते रहेंगे॥  


खबर आई है और उसकी पुष्टि हो चुकी है सो ,अविनाश जी का कर्तव्य बनता है कि वे इसका जवाब दें। लड़की ने 


लिखित मे शिकायत की है और अविनाश जी नौकरी गँवा चुके हैं इसलिए अब चुप रहने का कोई फायदा नही है।


खोने को कुछ नही है सो सच बोलना चाहिए।

 




Monday, May 26, 2008

ब्लॉग जगत के बलात्कारी ब्वायज़

कल से कठपिंगल नामक एक नव ब्लॉगर जो कि बडे मठाधीश भी होते हैं बहुत परेशान हैं ! उन्होंने एक साथी बलात्कारी ब्लॉगर की अपराध की दास्तान हम सब को सुनाई और फिर जी भर यहाँ जांचने में तुल गए कि कौन उसपर कितना रिऎक्ट कर रहा है ! यश्वंत के बलात्कारी व्यक्तित्व की निंदा में चोखेरबाली समाज चांय चांय नहीं कर रहा वे इस बात से भी आहत हैं ! अविनाश ने कल बलात्कार की कथा को बहुत दम से बयान किया ! उन्होंने हमेशा की तरह अपनी पत्नी को घर पर ही रखा और ब्लॉग जगत के सबसे सेंसेटिव और ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते सब ब्लॉगरों को उनके नैतिक ड्यूटी के लिए उकसाया ! पर जैसा कि प्रमोद ने कहा यश्वंत पकडा गया क्योंकि वह फिजिकल एब्यूज़ कर बैठा था ! पर यहां के कई थानेदार मठाधीश जो कि समाज के हर मुद्दे पर सबसे तेज और संवेदनशील राय रखते हैं आजाद हैं और तबतक रहेंगे जबतक कि कोई फिजिकल एब्यूज न कर बैंठें !

ब्लॉग जगत के मोहल्ला की चारपाई पर बैठा एक ब्वाय बलात्कार की खबर दे रहा है दूसरा ब्वाय जेल से छूटा ही है ! चारपाई वाले ब्वाय की पत्नी घर के अंदर और बलात्कारी की पत्नी गांव में है ! अब बचीं ब्लॉग जगत की औरतें जिनके लिए मोहल्लापति ने नए संबोधन बनाना ,उनको उनके कर्तव्य बताना , उनके सम्मान और हित में बोलने वाले पुरुषों को पुरुष समाज का विभीषण बताना जैसी कई बातें इस ब्वाय ने बताईं हैं ! इसमें से एक ब्वाय स्त्री विमर्श जैसे कई विमर्शों की रिले रेस चलवाता है और चाहता है कि उसे हिंदी ब्लॉग जगत का सबसे बौद्दिक और समझदार ब्वाय समझा जाए ( क्योंकि वह बलात्कारी भी नहीं है ) जबकि दूसरे ब्वाय के द्वारा बलात्कार की खबर देता हुआ यहाँ चारपाई ब्वाय अपनी एक परिचित ब्लॉगर को " सनसनी गर्ल " दूसरी को छुटे सांड की तरह सींग चलाने वाली माताजी कहकर ही अपनी बात आगे बढा पाता है ! हमारे पास यश्वंत के बलात्कारी रूप के कोई फोटो नहीं हैं ( हो सकता है कोई ब्वाय जारी कर दे आजकल में ..) पर हमारे पास चारपाई ब्वाय का लिखा है

ScreenHunter_02 May. 25 13.15

आप कहें गे कहेंगे क्या अनूप तो कह ही रहे हैं कि नीलिमा ने ही उनको उकसाया है तो फिर यहाँ सब तो लाजमी है ! यश्वंत का भी क्या कसूर रहा होगा उस पीडिता ने भी उसको उकसाया होगा !अब चारपाई ब्वाय को उकसाया जाएगा तो वह किसी स्त्री को पहले तो भूखी सांड की तरह हर जगह दौडती ही कहेगा माताजी भी कह लेगा पर इससे ज्यादा मत उकसाओ ....! जाहिर है अपनी हदों को पार करने वाली औरत या आपकी गलती दिखाने वली औरत माताजी ही कलाऎगी क्योंकि वह सुकुमारी वाले काम कहां कर रही है ! विरोध के स्वर में बोलने वाली औरत को बूढी पके बाल वाली माताजी कहने से कितना चिढ सकती है वह ! वह जाकर शीशे में ध्यान से अपने को निहारने पहुंचेगी कि ऎसा मेरे चेहरे में क्या था कि मैं माताजी लगने लगी हूं , छुटी भूखी सांड की तरह लगती हूं .....बस वह उदास हो जाएगी चेहरे पर लेप मलेगी और अपने आप से वादा करेगी कि कल से किसी भी मर्द को ऎसे नहीं कहेगी और उनकी तारीफ के योग्य करम करेगी !

वैसे जब चारपाई ब्वाय एक बलात्कार की खबर देते हुए स्त्री के बारे में इन संबोधनों को कह रहा है तो उसके मन में यही न चल रहा होगा कि छुटी सांड सी दौडती फिरोगी तो यही सुनोगी ! और फिर कुछ भी फिजिकल या लैंग्वेज एब्यूज़ हो सकता है ! माई डियर तैयार रहा करो तुम्हारे साथ आगे कुछ भी हो सकता है ! वह सोचता होगा हमारी वाली को देखो घर में बंधी रहती है मजाल है उसके साथ कोई कुछ कर जाए ...!

ऎसे चारपाई ब्वाय को मसिजीवी पत्नीवादी ,प्रमोद सिंह भी "बदचलन " लगेगा ! दोनों ही अपनी पत्नी को बांधकर नहीं रख सके ! एक की भूखे सांड सी दौडती रहती है दूसरे की भाग जाती है ! हे चारपाई ब्वाय तुम नीलिमा को कठघरे में खडा करने के लिए जितने उतावले हो अगर उतने ही उलावले अपनी काठ की संवेदना को गलाने के लिए होते तो बात थी !

तुम तो पहुंचे गाल बजाते देखो साला पकडा गया बलात्कार ऎसे नहीं किया जाता साले को कितनी बार समझाया था ! जो करो ऎसे करो कि पकडे न जाओ ! बोधि जी को देखो बोला भी बाद में पलट भी गए बच गए ! मुझे देखो सनसनी गर्ल कहा था तुरंत मिटा दिया साथ ही यह कहने के ऎतराज में आई टिप्पणी भी मिटा दी ! एकदम साफ कोई सबूत नहीं ! पर भूखी सांड सी पीछे पडेगी तो आगे का कुछ नहीं कह सकता ! मैं कहता था न मैं बडा बाप हूं मुझसे सीखो ! स्त्री विमर्श भी करो स्त्री का एब्यूज़ भी करो ! तरीका मुझसे सीखो -मैंने कई बार कहा था ! तुम ठहरे कच्चे खिलाडी और जल्दबाज ..खैर भुगतो !

तो हे चारपाई ब्वाय हिंदी व्लॉग जगत की मुझ सी भूखे सांड सी बेवजह जगह -जगह दौडती औरत जिसमें तुमने अपनी माताजी का रूप देखा , पत्रकार स्‍मृति दुबे जिनमें तुम्हें सनसनी गर्ल ( कॉल गर्ल ,बार गर्ल ,पिन अप गर्ल ,सिज़्लिंग गर्ल जैसी ही कोई चीज़ .....जो तुम औरतों में देखते होंगे ..) प्रत्यक्षा , सुजाता मनीषा पांडे जैसी तमाम औरतें बस अब तुम्हारी चारपाई की ओर देख रही हैं ! चारपाई पकडे रहना बलात्कारी ब्वाय को तो हम  और कानून मिलकर देख ही लेंगे ,साथ की कामना करेंगे कि और कोई बलात्कारी ब्वाय उगने न पाए !  आमीन !