Tuesday, March 31, 2009

स्त्रियाँ -

अनामिका


पढा गया हमें
जैसे पढा जाता है कागज़
बच्चों की फटी कॉपीयों का
चनाजोरगरम के लिफाफे बनाने के पहले!
देखा गया हमको
जैसे कि कुफ्त हो उनींदे
देखी जाती है कलाए घड़ी
अल्ल्सुबह अलार्म बजने के बाद !

सुना गया हमको
यों ही उड़ते मन से
जैसे सुने जाते हैं फिल्मी गाने
सस्ते कैसेटों पर ठसाठस्स ठुंसी हुई बस में !

भोगा गया हमको
बहुत दूर के रिश्तेदारों के
दुख की तरह !


एक दिन हमने कहा
हम भी इंसान हैं-
हमें कायदे से पढो एक एक अक्षर
जैसे पढा होगा बी ए के बाद
नौकरी का पहला विज्ञापन !

देखो तो ऐसे
जैसे कि ठिठुरते हुए देखी जाती है
बहुत दूर जलती हुई आग !

सुनो हमें अनहद की तरह
और समझो जैसे समझी जाती है
नई-नई सीखी हुई भाषा !

इतना सुनना था कि अधर मे लटकती हुई
एक अदृश्य टहनी से
टिड्डियाँ उड़ीं और रंगीन अफवाहें
चींखती हुईं चीं चीं
'दुश्चरित्र महिलाएँ, दुश्चरित्र
महिलाएँ ' -
किन्हीं सरपरस्तों के दम पर फूली-फैली
अगरधत्त जंगली लताएँ !
खाती पीतीं सुख से ऊबी
और बेकार , बेचैन , आवारा महिलाओं का ही
शगल है ये कहानियाँ और कविताएँ *...
फिर ये इन्होंने थोड़े ही लिखीं हैं!'
{कनखियाँ , इशारे , फिर कनखी}
बाकी कहानी बस कनखी है।

हे परमपिताओं ,
परम पुरुषों -
बख्शो ,बख्शो ,अब हमें बख्शो !



* यहाँ कहानी,
कविता के साथ साथ 'ब्लॉग' भी पढ लिया जाए मेरी ओर से !!

Tuesday, March 24, 2009

हिंदुस्तानी महिलाओं की हालत पाकिस्तान से भी बुरी...

चमकते भारत में महिलाओं की हालत दिनों-दिन खराब होती जा रही है। इसका प्रमाण है विश्व बैंक की एक रिपोर्ट जिसके अनुसार भारत में महिलाओं की स्थिति पड़ोसी देशों पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका से भी बुरी है। भारत में हर एक लाख प्रसवों के दौरान 301 महिलाओं की मौत हो जाती है। पाकिस्तान मे ये आँकड़ा 276 है जबकि नेपाल में 281 और श्रीलंका में 258 है।

पूरी स्टोरी पढ़ने के लिए देशकाल.कॉम के इस लिंक पर जाएं।

Monday, March 23, 2009

स्त्री सशक्तिकरण में सबसे महत्वपूर्ण बात -ग्लैमर ,आत्मविश्वास और जागरूकता

समाचार चैनलों मे किसी महिला एंकर के बारे मे आपकी क्या राय बनती है?
आमतौर पर लोगों की क्या राय है इसे ही जानने के लिए मीडिया खबर द्वारा एक ऑनलाइन सर्वे कराया गया। इस सर्वे के नतीजों के हिसाब से -

सर्वे में 44.72% लोगों ने न्यूज़ चैनलों में स्त्रियों के चयन के आधार को अपीयरेंस माना। दूसरी तरफ चैनल के ब्रांड इमेज में महिला पत्रकारों के योगदान को 65.85% लोगों ने अपीयरेंस तक ही सीमित माना। जबकि शिफ्ट और वर्किंग आवर को स्त्री पत्रकारों को सबसे बड़ी समस्या माना गया। और इसके पक्ष में 37.40% लोगों ने वोट किया। 46.34% लोगों ने महिला पत्रकारों के लिहाज से एनडीटीवी इंडिया को सबसे बेहतर माना। चैनलों की स्त्रियों से समाज में सबसे ज्यादा किसका प्रसार होता है, सर्वे के इस सवाल का परिणाम अप्रत्याशित रहा और 44.72%लोगों ने यह माना कि चैनलों की स्त्रियों से समाज में महिला जागरूकता और आत्मविश्वास का प्रसार होता है।



जिन बातों को हाइलाइट किया गया है उनमे पहली बार मे मुझे भयंकर अंतर्विरोध प्रतीत होता है।(पर यह शायद अंतर्विरोधों का ही समय है , एक उत्तर आधुनिक समय) सर्वे के नतीजे साफ तौर पर कहते हैं कि अधिकांश लोग मानते हैं कि किसी न्यूज़ चैनल के प्रसार मे स्त्री एंकर की भूमिका केवल उसके अपीयरेंस से तय होती है और एंकर होने के लिए ग्लैमरस होना या महिला होना ही काफी है, वही उनके चयन का आधार है।
ऐसे मे आश्चर्य की बात यह है कि जब इन्ही लोगों से पूछा गया कि महिला एंकर समाज मे किस बात का प्रसार करती हैं(प्र.10) तो वे पहले नम्बर पर वोट करते हैं - आत्मविश्वास और जागरूकता को। और दूसरे नम्बर पर ग्लैमर का नाम आता है।आंकड़ों को इकट्ठा करने की अपेक्षा उनकी व्याख्या कर पाना मुश्किल काम है। एक निरा समाजशास्त्रीय काम !इसके लिए बहुत ज़रूरी है कि सबसे पहले यह जाना जाए कि इस सर्वे का "सैम्पल" क्व उसका साइज़ क्या है?वे कौन लोग थे जो वोट कर रहे थे?ज़ाहिर सी बात है कि इससे किसी नतीजे पर पहुँचने मे काफी अंतर आ जाता है।दूसरी बात - प्रश्न संख्या 8,9 व 12 सीधे सीधे स्वयम महिला एंकर की सोच से जुड़ॆ हैं और उन्ही का जवाब सही व्याख्या तक पहुँचने मे मदद कर सकता था।
फिर भी, इस नतीजे के मतलब तक पहुँचने की कोशिश करूँ तो प्रतीत होता है कि अधिकांश लोगों के लिए स्त्री सशक्तिकरण के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात है -ग्लैमर ,आत्मविश्वास और जागरूकता। इन्हें प्राथमिकता के क्रम मे ही लिखा है।)उल्लेखनीय है केवल आत्मविश्वास और जागरूकता से सफलता नही मिलती। यह वह सोच है जो आमतौर पर झलकती है।

सर्वे मे जो 12 सवाल पूछे गए थे वे हैं -

1. हिंदी के महिला न्यूज़ एंकरों में आप किसे सर्वश्रेष्ठ न्यूज़ एंकर मानते हैं ?
2. हिन्दी न्यूज चैनल की सबसे ग्लैमरस एंकर आप किसे मानते हैं?
3. आमतौर पर न्यूज चैनलों में स्त्रियों के चयन का आधार होता है..
4. किसी भी चैनल में सबसे ज्यादा महिला पत्रकार किस काम पर लगाए जाते हैं-
5. चैनल की ब्रांड इमेज में महिला पत्रकारों का योगदान किस स्तर पर माना जाता
6. मौजूदा हालत में स्त्री पत्रकारों की समस्या है-
7. स्त्रियों का मीडिया के प्रति बढ़ते रुझान की वजह है
8. ज्यादातर महिला पत्रकार किस फील्ड की रिपोर्टिंग पसंद करती है
9. महिला पत्रकारों के लिहाज से किस चैनल का महौल सबसे बेहतर है
10. चैनल की स्त्रियों से समाज में सबसे ज्यादा प्रसार होता है
11. महिला एंकरों से ऑडिएंस के जुड़ने की वजह होती है-
12. टीवी पत्रकार के तौर पर ज्यादातर स्त्रियां अपने को किस रुप में देखना पसंद करती हैं

Saturday, March 21, 2009

22 मार्च - विश्व जल दिवस

Care For Water Before It Becomes Rare
Again the summer season has come and demand for water is boosting up day by day. Water being one of the most essential necessity of life, becoming an increasing scarce resource, needs careful planning and management. Availability of safe quality drinking water is being reduced due to pollution from sewage and industrial waste. So water should be meticulously harnessed and carefully conserved. It should be economically used and safely disposed off after uses
----नीलिमा गर्ग

Friday, March 20, 2009

MEN ARE BACK - पर आखिर वो गए कहाँ थे ?

पुरुष जितना स्त्री के बारे मे कह सकते हैं , उतना खुद के विषय मे नही कह पाते और पुरुष के लिए पुरुष होना और साबित होना एक महत्वपूर्ण और जोखिम भरा काम है ऐसा मुझे महसूस हुआ है । खैर, रियल मैन या रियल वूमेन जैसा कुछ होना भी चाहिए क्या ? मेरे सामने अभी यही सवाल है जिसकी तलाश है!

पिछले एक दो साल से देख रही हूँ कि शाम के समय आस पास के पार्कों मे कुछ युवा पिता अपने 6 महीने से लेकर 5-6 साल तक के बच्चों को लेकर आते हैं, खेलते हैं,खिलाते हैं।हालांकि वहाँ बच्चों को लेकर आने वाली माताएँ फिर भी संख्या मे उनसे चार गुना होती हैं।तो भी यह देख अच्छा लगता है। एक और अजीब बात पिछले 3- 4 महीने मे मैने तीसरी बार देखी।साल डेढ साल के बच्चे को गोद मे बैठाकर पिता का ड्राइविंग करना।न काम रोका जा सकता है न ही बच्चे को!! मै सोचती हूँ बच्चों को लेकर ममत्व से भर उठना , उनकी देखभाल करना,पत्नी और बच्चों के लिए सम्वेदनशील होना,गृहस्थी के काम मे हाथ बंटाना -क्या यह सब आज के नए पुरुष (जो भले ही संख्या मे बहुत कम हैं)की नयी तस्वीर हैं?

यदि यह बदलते समय का पूर्व चिह्न है तो बहुत अच्छा है, लेकिन फिर भी एक चिंता लगातार बरकरार है।हम अब तक पारम्परिक तौर पर जिसे मर्द , पुरुष या रियल मैन मानते आ रहे हैं यह नयी छवि उससे मेल नही खाती क्योंकि इसमे स्त्रैण गुणों की मिलावट(?) है।फेमिनिन गुण क्या हैं, मस्क्यूलिन क्या हैं यदि हम इसे जानने का प्रयास करें तो एक बेहद खतरनाक बात सामने आती है।


शायद यह विज्ञापन उसमे कुछ मदद करे-





तो आम धारणा यह है कि रियल मैन वह होता है जो है -

बहादुर
ताकतवर
साहसी
निडर
लड़ाका / योद्धा
रौबदार
मुच्छड़
गर्वीला
अहंकारी
दम्भी
आत्मविश्वास से भरपूर
जिसे कोमलता ने छुआ भी न हो
अपनी बात मनवा सकने वाला
जो चाहे उसे पा सकने का माद्दा रखने वाला
गर्दन उठा कर सीना तान कर चलने वाला
जिसे देख लड़कियाँ दीवानी हो जाएँ ऐसे गठे शरीर वाला
कभी किसी के सामने न झुकने वाला
बड़े दिल वाला

दिक्कत अब शुरु होती है।जब आप मस्क्यूलिन गुणों के रूप मे इन्हें कहते हैं तो फेमिनिन या स्त्रैण गुणों के लिए क्या आपको इनके ठीक उलट चलना होता है?शायद यही माना जाता है।इस मानने के हिसाब से देखें तो फेमिनिन गुण हैं -

डरपोक
कमज़ोर/निर्बल
भयभीत/भीरू / कायर
युद्ध की बजाए आत्मसमर्पण
सबकी बात सुनने वाली
बहस न करने वाली
मृदुभाषिणी
झुक कर चलने वाली
संकोची
सेवा भाव , सहजता , कोमलता , विनम्रता से भरपूर
सबका सम्मान करने वाली
अपनी ख्वाहिशें दबा लेने वाली/ आत्मोत्सर्ग / बलिदान करने वाली
जिसे देख पुरुष पाने की इच्छा करे ऐसे रूप वाली
सर्वस्व समर्पण करने वाली
छोटी छोटी बातों मे उलझने वाली

दिक्कत यहाँ और भी बढती है।यह दिखाई दे रहा है कि स्त्रैण और मर्दाने गुणो में विपर्यय , कंट्रास्ट का सम्बन्ध है।इसलिए ये पूरक नही कहे जाएंगे बल्कि उलट कहे जाएंगे।यहाँ और भी दिक्कत है।हिम्मत के मुकाबले आप कोमलता को कैसे श्रेष्ठ गुण कह सकते हैं?इसी तरह गर्व के मुकाबले आप दबने-सिमटने को कैसे श्रेष्ठ मान सकते हैं?इसका मतलब है कि स्त्रैण गुण मर्दाने गुणों से हीन हैं? इसलिए स्त्रियाँ पुरुषों से हीन हैं?इसलिए स्त्री मे मर्दाने गुण हों तो वह "खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी " कहा जाएगा और पुरुष मे कोमल गुण हों तो उसके मर्द होने पर शंका जताई जाएगी?

इतना ही नहीं , ये सभी गुण - आप स्वीकारे या न स्वीकारें - समाज का तय किया हुआ मानक है , स्टैंडर्ड है और इस मानक से ज़रा भी विचलन हुआ कि व्यक्ति उपहास,उपेक्षा या विरोध का पात्र बन जाता है।लक्ष्मी बाई की बात जाने दें,साधारण स्त्री को आप बहस करता, तर्क वितर्क करते, मुखर होते,गाली देते देखते हैं तो असहज महसूस करते हैं, इसी मापदण्ड के अनुसार ही।

दर असल स्त्री पुरुष गुणों मे विपर्यय मानना ही गलत दृष्टि है, हमे स्वीकार करना चाहिए कि इन सभी गुणों का इधर से उधर आना जाना सम्भव है सामान्य है, इनका कम ज़्यादा होना भी स्वाभाविक , सामान्य बात है।स्त्री भी लड़ाका , योद्धा, अहंकारी, किसी के सामने न झुकने वाली है तो सामान्य है।पुरुष भी सम्वेदनशील,विनम्र,सबकी सुनने वाला,संकोची है तो यह सामान्य है।विरोध देखना हमारा दृष्टि दोष है।

लेकिन जो विज्ञापन हमने अभी देखा क्या वह बदलते हुए पुरुष की तस्वीर को धक्का नही पहुँचाता ? men are back ? माने पुरुष वापस आ गया है !! कौन सा पुरुष वापस आया है ? आखिर वह कहाँ चला गया था? कल की पोस्ट पर कोई अनाम इसी आशय का एक लिंक छोड़ गया था।लिंक काम का था।वहाँ का लेख इसी तरह की बातों पर विचार व्यक्त करता है।
क्या यह पुरुषों के लिए एक अस्मिता संकट आइडेंटिटी क्राइसेस की तरह देखा जाए? वे बदल रहे हैं लेकिन चिंतित हैं कि उनकी असली पहचान - एक माचो मैन की पहचान विलीन हो रही है।मेट्रोसेक्शुअल मैन इस पह्चान के संकट को और भी बढावा दे रहा है।मेट्रोसेक्शुअल वह पुरुष है जो फेमिनिन गुणों से परहेज़ नही करता।चाहे वह कान मे बाली धारण करना हो या लम्बे बाल रखना।सम्भवत: इसी संकट के चलते मेन आर बैक जैसे फ्रेज़ेज़ का इस्तेमाल विज्ञापन कम्पनियों को सटीक प्रतीत होता है।

दिल्ली पुलिस जब छेड़खानी सम्बन्धी विज्ञापन बीते सालों मे छाप रही थी तो वह भी ऐसे मर्दों को पुकार रही थी जो आकर छिड़ती हुई अबला की रक्षा करें।तस्वीर मे छेड़खाने करते कुछ युवक हैं और बाकी चुपचाप खड़े कुछ लोग और विज्ञापन कहता था कि - लगता है इनमे कोई मर्द नही है, वर्ना ऐसा नही होता।क्या यह चिन्ता वाजिब है कि असली मर्द लुप्त हो रहा है जबकि मर्दानगी का एक लक्षण-प्रकाश झा की फिल्म दिल दोस्ती वाला भी है और वह फल फूल रहा है और एक लक्षण साहस-बहादुरी,अपनी बात का पक्का होने वाला भी है जो घट रहा है।

ऐसे मे जबकि पुरुष भीतर माचो मैन नही रहा है लेकिन बाहर फिर भी वह वही "मर्द" दिखते रहने की चाहत लिए हुए है (ऐसे सिगरेट , ऐसी बाइक , ऐसी कार या कूल लुक्स या ऐब्स के सहारे जिन्हे पारम्परिक शब्दावली मे मैनली कहा जाएगा) तो ऐसे मे बदलता हुआ पुरुष क्या वाकई स्त्री के लिए सच्चा हमदर्द , सच्चा साथी ?क्या यह नया कनफ्यूज़्ड साथी स्त्री मुक्ति के मार्ग मे सच्चा हम सफर बन सकेगा?पत्नी उसके बराबर कमाती है इसलिए बच्चों को तैयार करना,उन्हें घुमाना-खेलाना-खिलाना, सब्ज़ी लाना उनकी मजबूरी है ; इसलिए उसके पुरुत्व की अभिव्यक्ति अन्य स्थानों पर यदा कदा होती है? या बेहतर पिता बनकर वे अपने लिए पुरुषत्व की नयी परिभाषा गढ रहे हैं?

Wednesday, March 18, 2009

असल मर्द की क्या परिभाषा है ?

पिछले दिनों आशा जोगलेकर जी ने एक पोस्ट लिखी स्त्री मुक्ति मे पुरुषों की भागीदारी"जिसमे पुरुष स्त्री मुक्ति मे कैसे सहयोग दे सकते हैं इस पर कुछ बिन्दु रखे गये थे।लेख आशा जी की जानकारी के मुताबिक मूलत: मराठी मे था और लेखक मिलिन्द च्वहाण थे।यद्यपि पोस्ट किन्ही अन्य कारणों से भी विवादित रही लेकिन मेरा ध्यान एक अन्य मुद्दे पर चला गया जिसे लिखने की मै बहुत दिन से सोच रही थी।यह ध्यानाकर्षण हुआ इस पोस्ट पर मुनीश जी की एक टिप्प्णी से--




अब मेरी जिज्ञासा है कि रियल मैन याने असली मर्द की क्या परिभाषा है यूँ मैने भी बहुत कुछ लिख रखा है पर क्या ही अच्छा हो कि आज हम आप सभी से सुनें कि दुनियावालों की नज़र मे असल मर्द कौन है!!

Tuesday, March 17, 2009

धर्म से टकराए बिना स्त्री मुक्ति सम्भव नही

स्वप्नदर्शी जी की पोस्ट के बाद धर्म और स्त्री की मुक्ति की बात एक रोचक अन्दाज़ मे आ गयी है।एक स्वस्थ बहस के तत्व इसमे देख सकती हूँ। 
मुद्दा है कि नास्तिक हो जाने से क्या होगा ? क्या इससे स्त्री को समाज मे उचित स्थान , मानवीय अधिकार और सुरक्षा मिल जाएगी?क्या वह इससे आज़ाद हो जाएगी?

स्त्री धर्म की व्याख्या करते करते और स्त्री को उसका धर्म सिखाते सिखाते युग बीत गए हैं, उसने सीख भी लिया -हिन्दू स्त्री का जीवन ऐसा हो , मुस्लिम हो तो स्त्री ऐसी होनी चाहिए , ईसाई हो तो स्त्री को ऐसा होना चाहिए.........धर्म और धर्म को बनाने वाला ईश्वर(पता नही कोई कैसे इस बात मे यकीन रख सकता है कि किसी धर्म को ईश्वर ने बनाया है, खैर) और उस धर्म को मानने वाले उसके बन्दे सब मिलकर स्त्री को पाठ पढाते आए हैं।कभी सिखाया गया कि पति परमेश्वर है, कभी सिखाया गया कि स्त्री को पुरुष की अनुगामिनी होना चाहिए , कभी सिखाया गया कि उसे पुरुष की परछाई होना चाहिए,पुरुष के बिना स्त्री के लिए स्वर्ग भी नरक समान है,सभी नाते सूर्य से भी बढकर ताप देने वाले हो जाते हैं........(अयोध्या काण्ड , रामचरितमानस) और इसलिए यदि वह विधवा है या अविवाहित है तो उसका जीना उसे खुद भी दुश्वार लगने लगे दुनिया को तो बाद मे लगे।पतिव्रत धर्म का पाठ जो अनुसूया सीता को पढाती है वह आज तक हिन्दू स्त्री को घोल घोल कर पिलाने की चेष्टा की जाती है(अरण्य काण्ड) अनुसूया कहती हैं - "पति प्रतिकूल जनम जँह जाई ।विधवा होई पाई तरुनाई" माने - जो अपने पति की बात नही मानती वह जहाँ भी जन्म लेती है भरी जवानी मे विधवा हो जाती है।माने जन्म जन्मांतर के डर भी स्त्री को दिखलाए जाते हैं, वह कभी किसी हाल मे पति के खिलाफ न चले रामचरितमानस का पाठ इसी लिए उसे कराया -समझाया जाता है।कीर्तन, मंडली,पाठ , जागरण सभी मे स्त्रियाँ ही बढ चढ कर भाग क्यों लेती हैं - धर्म सीखने की उन्हे ही सबसे ज़्यादा ज़रूरत है?क्योंकि वे दर असल इस योनि मे किसी पाप या दोष के कारण आई हैं ? यही कहता है न धर्म ?

अभी मार्च के हंस  मे शीबा असलम फहमी मुस्लिम धर्म के मुल्लाओं के हाथ मे आ जाने से उसके स्त्री विरोधी स्वरूप पर दुखी होकर लिखती हैं - "क्या इन्हें कभी यह खयाल नही आता कि जब एक गैर मुस्लिम औरत एक मुसलमान औरत पर तरस खाते हुए पूछती है कि- 'आपके इस्लाम मे तो औरतों को घर से बाहर निकलकर तालीम व तरक्की हासिल करने की मनाही है' तो उस बेचारी को कैसा लगता होगा? जब कोई यह पूछती है कि आपको तो हमेशा यह डर लगा रहता होगा कि अगर पति नाराज़ हो गया तो तलाक न देदे ,तो कैसा कोड़ा पड़ता होगा आत्मसम्मान पर?जब कोई यह पूछता है कि 'मुसलमान औरत होने के नाते आप तो पति की दूसरी, तीसरी,चौथी शादी के लिए ज़हनी तौर पर तैयार रहती होंगी? तो कैसा खून खौलता होगा हमारा! या जब कोई बड़ी सहानुभूतिपूर्वक कहता है कि 'आप लोगों मे तो पर्दे के कारण लड़कियों को पढाते लिखाते नही , ज़रा बड़ी हुई कि शादी कर दी, तो कितना कमतर महसूस करते हैं हम?'' और जब कोई अश्चर्य से पूछता है कि 'अरे, मुसलमान होकर आप इतनी पढे लिखी हैं और घर से बाहर रह सकती हैं तो फख्र नही अफसोस होता है कि इस्लाम की क्या छवि है सारी दुनिया में " आगे लिखते हैं "औद्योगिक क्रांति के बाद से ही जब सरी दुनिया नए ज्ञान विज्ञान और सामाजिक व्यव्स्था को अपना रही थी , तब जड़ मुल्लाओं ने कौम के लिए शुतुर्मुर्गी नीति तय कर दी........साथ ही साथ (वे) इस्लाम को स्त्री विरोधी बनाकर अधी आबादी को संशय,भय, बगावत की तरफ धकेल रहे हैं "'

मुझे बताइये कि ऐसे मे स्त्री के हाथ जब दुनिया ने धर्म की ज़ंजीरों से जकड़े हों तो वह अधर्मी हुए बिना अपना अस्तित्व कभी पा सकती है? 
जब ईश्वर के नाम पर उसे तरह तरह के भय और सज़ाओं के साए में पालतू बना कर रखा जाता हो तो क्या वह नास्तिक हुए बिना कभी अपनी स्वतंत्र पह्चान बना सकती है? 

शीबा अपने लेख मे लिखती हैं कि इस्लाम का शुरुआती स्वरूप ऐसा नही था ,उसे सातवीं शताब्दी के बाद पुरुषों ने ही 75 फ़िरक़ों मे बांट दिया , यानि इस्लाम की 75 व्याख्याएँ कर दी गयीं ,सबका अलग नज़रिया है अलग लॉ है , लेकिन एक 76 वीं नयी व्याख्या जो स्त्री करना चाहती है उसके विरोध मे ये सभी एकजुट हैं। 

रामचरितमानस  भी एक पुरुष द्वारा रची गयी और उसका पाठ हिन्दू घरोंमे जिस तरह से किया जाता है वह सिद्ध करता है कि स्त्री के लिए हिन्दू धर्म क्या स्थिति तय करता है। 
पंडिता रमा बाई (भारत की पहली महिला डॉक्टर आनन्दी बाई की रिश्तेदार । आनन्दी की मृत्यु विदेश मे डाक्टरी की पढाई के दौरान हिन्दू जीवन पद्धतियों का कड़ाई से पालन करने के कारण हुई)  अपनी पुस्तक "एक हिन्दू स्त्री का जीवन" मे उन अमानवीय स्थितियों का उल्लेख करती हैं जो हिन्दू घरों की स्त्रियों के लिए बनाई गयी थीं जो दर्शाती हैं कि -"इस संसार मे लड़की कुछ नही के बराबर है "
(पृ-47)

जहाँ तक सवाल है कि नास्तिक हो जाने से क्या इससे स्त्री को समाज मे उचित स्थान , मानवीय अधिकार और सुरक्षा मिल जाएगी?क्या वह इससे आज़ाद हो जाएगी?
हाँ , यह एक बेहद ज़रूरी कदम होगा , क्योंकि इससे स्त्री को मूर्ख बनाना आसान नही रह जाएगा , उसे भ्रमित नही किया का सकेगा , कम से कम वह खुद अपनी जड़ताओं , भयों और अन्धविश्वासों से मुक्त हो पाएगी , आत्मविशाव हासिल कर पाएगी , और यही मुक्ति की पहली शर्त होगी कि वह अपनी स्थिति का आलोचनात्मक अध्ययन कर सके , सवाल उठा सके ।हमें स्वीकार करना होगा कि धर्म समाज की मानव की बनाई हुई एक संरचना है जिसमे खामियाँ हैं और इसलिए उसकी पवित्रता मे आँख मून्द कर विश्वास नही किया जा सकता। अपनी अस्मिता के लिए धर्म से टकराए बिना उस पर सन्देह किए बिना  कोई रास्ता नही है।स्त्रियों उस पर सन्देह करो !

Sunday, March 15, 2009

स्त्री मुक्ती आंदोलन में पुरुषों की भागीदारी

अंतर राष्ठ्रीय महिला दिवस के निमित्त लोकसत्ता में श्री मिलिंद चव्हाण का एक लेख पढा । पढ कर लगा कि चोखेर बाली के पाठक शायद इसे पसंद करेंगे । हो सकता है कि यह जानकारी पुरुष पाठकों के लिये महत्वपूर्ण हो । लेख क्यूंकि मराठी में है इसीसे इसका अनुवाद ही प्रेषित है ।
भारत में ही नही अपितु संपूर्ण विश्व में पुरुष प्रधान समाज व्यवस्था है । इसी कारण जाने अनजाने पुरुषों को स्त्रियों की अपेक्षा ऊँचा और महत्वपूर्ण दर्जा दिया जाता है । सच में देखा जाय तो इस मानने का कोई आधार नही है ।
स्त्री और पुरुष के शरीर रचना का आधार लेकर, जो कि वास्तव में प्रजाति की निरंतरता बनाये रखने के लिये है, समाज में स्त्री तथा पुरुष ने किस तरह रहना, उठना, बैठना और चलना है इस बारे में तैयार किये गये नियम माने ही लिंग आधारित समाज व्यवस्था है । स्त्री पुरुष की वेष भूषा, केश भूषा, चलना, उठना, बैठना, बात करना, खेलना, यहां तक कि सोना, भी उनकी सामाजिक भूमिका के हिसाब से
तय है ।
अनेक घरों में आज भी पुरुष पहले खाना खाते हैं, इसलिये उन्हें ताजा, गरम, खाना भूख के समय जितना चाहिये उतनी मात्रा में उपलब्ध होता है। इसीलिये सुपोषण का अवसर पुरुषों तथा लडकों को स्त्रियों तथा लडकियों की अपेक्षा अधिक मिलता है । स्त्रियों के बाल लंबे होना चाहिये, वे वैसे ही सुंदर लगते हैं ये सामाजिक धारणा हमारे गांवों तथा शहर के काफी वर्गों मे आज भी प्रचलित है । इसमें स्त्री को क्या चाहिये उसे क्या सुविधा जनक है यह मुद्दा कहीं उठता ही नही ।
सुनामी संकट के समय बहुत सी स्त्रियाँ उनके लंबे बाल झाडियों मे फसने की वजह से काल कवलित हो गईं । उसी तरह साडी पेड पर चढने के लिये सर्वथा अनुपयुक्त होने से उनके लिये घातक सिध्द हुई । ये बातें स्त्री की अपनी मर्जी और सुविधा पर छोड देनी चाहिये ।
हमारी एक और सामाजिक धारणा है कि स्त्रियाँ स्वभावत: कोमल और सहनशील होती हैं हमारे समाज मन में पक्की बैठ गई है । कोई भी यह मानने को तैयार नही कि ये सामाजिक ज्यादा है और स्वाभाविक कम । लडकियों को उठते बैठते यह सिखाया जाता है कि उन्हें कैसा बर्ताव करना है या कैसा नही करना, यदि यह सब निसर्गत: होता तो उन्हें यह सब सिखाना नही पडता ।
स्त्रियों की यह भूमिका, पुरुष-प्रधान व्यवस्था चलती रहे इसीसे निर्माण की गई । इसी के चलते, स्त्रियों का आर्थिक पुरुषावलंबन, शारिरिक और मानसिक अस्वास्थ्य का शिकार होना, आत्मविश्वास का अभाव, स्वयं को एक कमतर इन्सान मानना, आदि उनके गुणविशेष बन गये । संविधान के अनुसार स्त्री फुरुषों को समान अधिकार हैं परंतु आज भी अनेक स्त्रियाँ इससे कोसों दूर है । स्त्रीमुक्ती आंदोलन, स्त्री शिक्षा, औद्योगिक क्रान्ति के वजह से स्त्री के इस भूमिका में बदलाव तो आया है फिर भी आज भी पुरुष प्रधानता इस उस रूप में अस्तित्व में तो है ही ।
आज भी
घर की मालमत्ता पुरुष के नाम होती है ।
घर के काम खाना बनाना, सफाई रखना, बच्चा सम्हालना मुख्यत: स्त्री के काम हैं ।
अधिकांश स्त्रियों को अपना जीवन साथी चुनने की स्वतंत्रता नही होती ।
उम्र, जाति, वैवाहिक स्थिति, आर्थिक स्तर, इससे पुरुष प्रधानता में थोडा फर्क तो आया है पर आज भी अधिकांश स्त्रियों को इसका सामना करना पड रहा है ।
कुछ बंधन इस व्यवस्था के चलते पुरुषों पर भी आते हैं जैसे कि
पुरुष का रोना या खुलकर भावना व्यक्त करना अच्छा नही माना जाता ।
पुरुष को कुटुंब का अर्थार्जन करने वाला कर्ता-पुरुष होना ही चाहिये यह अपेक्षा की जाती है ।
बहुत बार उन्हें अपनी मर्जी की शिक्षा की जगह जिसमें कमाई के साधन ज्यादा हों ऐसी शिक्षा या प्रशिक्षण लेना पडता है ।
परिवार में प्यार करने वाली माँ और अनुशासन रखने वाला पिता ऐसे विभाजन की वजह से प्रेम, वात्सल्य आदि व्यक्त करने पर भी बंधन आते हैं ।
पत्नी के साथ स्नेहपूर्ण बर्ताव करने की इच्छा होते हुए भी, जोरू का गुलाम आदि विशेषणों से बचने के लिये पुरुष ऐसा नही करते । उन्हे अपने पौरुष का बेअरिंग सतत मजबूत रखना पडता है ।
पिछले सौ वर्षो का लेखा जोखा लिया जाय तो स्त्रियों को इन्सान के रूप में मान्यता दिलाने के प्रयत्नों को काफी यश मिला है । फिर भी दहेज प्रथा, पारिवारिक हिंसा, बाल विवाह, अकेली स्त्री के प्रश्न आदि समस्यायें काफी तीव्र हैं ।
इस स्थिति में भी अनेक सुजान पुरुष समानता के लिये प्रयत्नशील हैं ।
अपने घरों मे हम स्त्री को समानता कैसे दिला सकते है ?
पति, पिता, पुत्र, भाई ऐसी अनेक भूमिका में रहते हुए पुरुष ये कर सकते है ।
- सबसे पहले मै एक इन्सान हूँ यह समझना, पुरुषत्व के भार के नीचे दब ना जाना । बेटा रोये , तो , ”क्या लडकियों की तरह रो रहे हो” जैसे वाक्यों का प्रयोग न करना ।
- अपनी पत्नी, मां तथा दोस्त को ना कहने का हक है यह समझना ।
- घर में महिला पुरुष सब एक साथ खाना खायें ऐसी व्यवस्था रखना ।
- बेटी को, बहू को उनकी पसंद का करिअर चुनने को प्रोत्साहित करना ।
- स्त्रियों के स्वास्थ्य की तरफ से उदासीन न होना वरन् उन्हे पोषक आहार तथा औषध उपचार मिले यह व्यवस्था करना ।
- घर के कामों मे भागीदारी करना ताकि स्त्रियों तथा लडकियों को मनोरंजन तथा विश्राम का समय मिल सके ।
- घर की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी के लिये स्त्रियों को प्रोत्साहित करना ।
- लडकियों को मैदानी खेल खेलने तथा मोटर साइकिल आदि वाहन चलाने तथा जूडो कराटे सीखने के लिये प्रेरित करना ।
- पारिवारिक हिंसा को रोकना ।
- स्त्रियों को कमतर बताने वाले या अपमानित करने वाले जोक्स, शब्द या गालियों का बहिष्कार करना ।
- घर जमीन, खेती के कागजों में पुरुष के साथ स्त्री का भी नाम डलवाना ।
- अपने आस पास बाल विवाह या दहेज के खिलाफ आवाज उठाना ।
तो आज से ही शुरु करें ?

मिलिंद चव्हाण

स्त्री मुक्ती का सवाल आस्था और विचारधारा से आगे का है.

स्त्री की आज़ादी का सवाल आस्तिकता और नास्तिकता से बहुत आगे का है। और ये व्यक्तिगत आस्था के फैसलों से अधिक एक सामाजिक आन्दोलन या सचेत सामाजिक भागीदारी से ही सम्भव हो पायेगा। स्त्री अगर नास्तिक है भी तो भी इससे समाज मे उसकी भागीदारी, या सुरक्षा या फ़िर सम्मान और जीविका के समान अवसर तो मिलने से रहे

मेरा आशय यहाँ पर ये कहना था की धर्म कोई पवित्र चीज़ नही है, एक सरंचना ही है। मनुष्य को पूरा अधिकार है उसे बदलने का, और अपनी समाज से उसमे संशोधन करने का भी। पर आशय ये भी है, जब तमाम तरह के सामाजिक संरचनाओं का जनवादीकरण किया जा सकता है, उन्हें आगे बढाया जा सकता है, तो क्या ये विकल्प धर्म के बारे मे भी रखना चाहिए? दूसरा तरीका ये भी है, की धर्म का सम्पूर्ण निषेध कर दिया जाय। परन्तु उससे जुड़े तमाम दूसरे पहलू है, और ज्ञान भी है, उसे निश्चित रूप से कूडे मे नही फेंका जा सकता है।

आज धर्म का जो स्वरुप है बहुतायत के लिए, अंध विश्वासों से घिरा हुआ, और साम्प्रदायिक भी, जो एक को दूसरे मनुष्य से नफरत करना सिखाता है और भी तमाम तरह की बुराईया लिए। या फ़िर धर्म के नाम पर जो स्वयम्भू ठेकेदार है, उनके फतवे, और धर्म का एक जो कुत्सित रूप उन्होंने बना लिया है, उससे पूरी तरह मेरी असहमति है। उसे छोड़ देने मे ही भलाई है। और इस कुत्सित रूप से जो विचलित न हो, जिसके मन मे पीडा न हो, मेरी नज़र मे वों थोडा कम मनुष्य है। और ऐसे तमाम नास्तिक सर आँखों पर।

थोडा इस तरह से भी देखा जा सकता है की धर्म बहुत से लोगो से सम्वाद कराने का प्लेटफोर्म देता है, और ज़रूरत के हिसाब से सर्वजन हिताय के लिए भी उसका इस्तेमाल हो सकता है। बुरे इस्तेमाल से तो सभी आहात है।
पर क्या उसके अच्छे इस्तेमाल के सारे दरवाजे बंद हो चुके है?
इसाई धर्म मे भी एक ज़माने मे बहस चली थी की क्या काले लोग इस लायक है की उन्हें धर्म की शिक्षा दी जाय ?
पर फ़िर वही मार्टिन लूथर किंग की तरह का एक काला पादरी, चर्च के भीतर ही मनुष्य मात्र की समानता के लिए इतना बड़ा आन्दोलन खडा कर लेता है। गांधी जी ने भी धर्म को टूल की तरह इस्तेमाल किया और पूरा हिन्दुस्तान उनके पीछे चल पडा। औरतों के लिए, दलितों के लिए, गांधी जी ने नए रास्ते खोले, सामाजिक रूप से निर्णायक भुमिका मे आने के।
मेरा आग्रह सिर्फ़ इतना है, की धर्म को भी अलग थलग न देखकर एक बनाती बिगड़ती सरंचना की तरह देखा जाय, और उसे भी समय काल और उसकी ऐतिहासिक यात्रा से अलग न देखा जाय। इसे एक सामाजिक प्रयोग की तरह देखा जाय। और निश्चित रूप से इस प्रयोग के कई ऐसे पहलू है जिनसे प्रेरणा ली जा सकती। बहुत कुछ उसमे, पवित्रता के भाव के बिना भी बचाए रखने लायक है।

जब एक तरह का विचार, या प्रतिबद्धता, सारे पुराने पर लकीर फेरकर शून्य की सतह से शुरू होती है तो वों फ़िर से गलतिया और बर्बरता को दोहराने के लिए भी अभिशप्त होती है। कई धाराओं का समांतर बहाव समाज के स्वास्थ्य के लिए अच्छा है। कभी-कभी मुझे लगता है की अगर अफगानिस्तान जैसी जगह पर जो एक जमाने मे बोद्ध साहित्य और शिक्षा का गढ़ था, सब कुछ एक ऐसी कट्टरता की भेट न चढ़ा होता की मूर्ती-पूजा के विरोध के नाम पर सभी कुछ ख़त्म होगया। अगर आज भी वों एक सहनशील धारा और उसके बिम्ब बचे होते, तो हालत कुछ और होती। इस्लाम के पहले का जो पैगन संस्कृति थी, अगर वों इतनी आक्रमकता से नस्ट न हुयी होती तो एक bouncing इफेक्ट समाज मे होता।

Saturday, March 14, 2009

क्या नास्तिक स्त्री हुयी तो आजाद हो जायेगी?

सुजाता की पोस्ट जिसका कन्क्लूजन था कि "बिना नास्तिक हुए स्त्री आजाद नही हो सकती" को थोडा सा आगे बढाना चाहती हूँ, उस बात को जो शुरू की थी. इसका एक सन्दर्भ ये भी निकलता है कि नास्तिक स्त्री हुयी तो आजाद हो जायेगी मेरा कहना फ़िर से वही है, कि धर्म कोई अलग-थलग चीज़ नही है, पूरी सामाजिक सरंचना का ही एक हिस्सा है। ये व्यक्तिगत स्तर से ज्यादा हमें एक समूह की तरह काबू मे रखता है। जिस तरह कि दूसरी सामाजिक संरचनाए है, जैसे क़ानून व्यवस्था, शिक्षा संस्थान, संस्कृति, फैशन, परिवार, विवाह, उसी तरह धर्म भी है, और ये सभी एक दूसरे से बुरी-भली जो भी कहो, तरह से उलझे पड़े है। एक सरंचना का निषेध किया जा सकता है, व्यक्तिगत स्तर पर, पर दूसरी संरचनाए सामने खड़ी है। वों भी सबल के लिए निर्बल को धकियाने की लाठी ही तो है। कम से कम धर्म के स्वरुप पर , इसकी ऐतिहासिक यात्रा पर हम कितना कुछ जानते है, और धार्मिक पूर्वाग्रहों की शिनाख्त आसान है। "अभी कितने ही भ्रम झूठे पड़ने वाले है", और उनकी शिनाख्त का भी कोई तरीका अभी तय नही है।
सवाल ये भी है कि क्या इन संरचनाओं को बिल्कुल ही तोड़ दिया जाय, जो हजारो साल के सोशल प्रयोगों की उपज है, या फ़िर समय के हिसाब से इनके नए और ज्यादा न्याय संगत रूपों की और अंतर्वस्तु की तलाश ज़रूरी है?

चीन मे हुए "सांस्कृतिक क्रांती की यादे अभी धुंधली नही हुयी है", और वों पीढी अभी जिंदा है, जो उस विरासत को बचा पाने का दुःख झेल रही है। हमारे यहाँ भी धर्म से जुडी एक पूरी की पूरी सांस्कृतिक विरासत है, कला है, संगीत है, योगशास्त्र है, गणित है, जो हिन्दुस्तान को पूरी दुनिया मे विशेष बनाती है। और साहित्य भी है, चाहे वों वेद है, रामायण है, या महाभारत है, वों धार्मिक मूल्य के अलावा भी राजनीतिक, और सांस्कृतिक महत्व की है।
इस भूखंड के लिखित अलिखित इतिहास, का सम्पूर्ण सही पर उस यात्रा के कुछ फूटनोट तो है ही।

धर्म और इश्वर को मानने मानने से आगे जाकर, धर्म का जो ऐतिहासिक रोल है, उस पर भी बहस हो जिस तरह से वेटिकन, और वेटिकन की छतो पर बनी माईकल अञ्जेलो की पेंटिग्स को धर्म से आगे जाकर कला की द्रिस्टी से भी देखा जा सकता है, उसी तरह से अपने और दुसरो के धर्मो के साथ , कला संस्कृति, और साहित्य का जो खजाना है, उसके साथ किस तरह का नाज़रिया हो, उस पर भी बात होनी चाहिए कला और संस्कृति भी सामजिक संरचनाए है, और इसमे भी मूलत: पुरूष का ही पक्ष ज्यादा दिखता है, पर बेहद महीन तरीके से यही दस्तावेज महत्त्वपूर्ण हो जाते है, जब वों स्त्री -शोषण के लिखित दस्तावेज बन जाते है, और बार-बार मनुष्य की चेतना पर नए तरह से आघात करते है, आगे बढ़ने के लिए। और यंहा उनका परपस बदल जाता है। बल्कि ठीक उलटा हो जाता है।

मेरी इच्छा है कि ये बहस सिर्फ़ आस्तिकता और नास्तिकता के बचकानेपन से बाहर निकले और एक बड़े धरातल पर आस्था, धर्म और जीवन मूल्यों की बहस बने।

धर्म का भी जो रूप आज हमारे सामने है, वों पहले इस तरह का नही था। त्योहारों का जो बाजारू रूप समाने है, शादी व्याह जो भयंकर जलसों मे बदल चुके है, उसका भी शहरीकरण, तकनीकी, और खर्च करने की क्षमता से, और भारत के एक बड़े हिस्से का गाँव से बेदखल होने, कृषक समाज की जड़ो से दूर होने से जितना रिश्ता है, उतना रिश्ता अब धर्म से नही बचा है। ये ज़रूर है, की ये सब धर्म के नाम पर चल रहा है। पर धर्म की और धार्मिक मान्यताओं की इस ऐतिहासिक यात्रा पर, बदलते स्वरुप पर भी बात होनी चाहिए।


अक्सर लोग धर्म की काट विज्ञान को और विज्ञान सम्मत दर्शन मे खोजते है। जिसके अपने फायदे है, और अपने नुक्सान है। विज्ञान ओब्जेक्टिविती के चलते, परमाणु बम बना सकता है, विनाश भी ला सकता, है, पर उस विनाश से बचने के लिए, जो मानवीव संवेदना है, मनुष्य मात्र के लिए सेवा का भाव है, उसे नही उपजाता। जिस तरह से धर्म का इस्तेमाल सत्ता, और राज्य ने इतिहास मे किया है, वही इस्तेमाल विज्ञान का भी हुया है, दूसरे समाजो को गुलाम बनाने के लिए, अपनी सत्ता को मजबूत करने के लिए।

धर्म और विज्ञान को लेकर मेरे अपने जीवन मे बड़ी कशमकश रही है। कभी एक सीधा सरल विश्वास था कि धर्म का विकल्प विज्ञान सम्मत दर्शन है। मेरे अपने जीवन के ज्यादातर फैसले इसी सोच के तहत आते है, पर इसकी सीमा रेखा का भी मुझे ज्ञान है। कभी कभी नयी उम्मीद और असंभव के सृजन के लिए, यथार्थ से ज्यादा कल्पना की डोर पकड़नी पड़ती है। यथार्थ को और वस्तुपरक ज्ञान को, जिसकी निश्चित काल से बंधी सीमा है, को लांघना पड़ता है, अंधे की तरह।

धर्म का जो सेवा भावः है उसके लिए सम्मान अभी भी मेरे दिल मे है। और जो आडम्बर है, साम्प्रदायिकता है, उसके लिए बेहद नफरत। धर्म का, धार्मिक मान्यताओं का, और सामाजिक मान्यताओं का भी, फैशन का, और प्रगतिशीलता का भी, लगातार मूल्यांकन ज़रूरी है। कसौटी पर बार बार, सर्वजन हिताय, और व्यक्तिगत आज़ादी , दोनों के पैमाने से। सर्वजन हिताय जहा सामजिक न्याय की कसौटी है, वही पर व्यक्तिगत आज़ादी, सर्जन और नयी संभावनाओ की। जहा भी इन दोनों के बीच सामजस्य नही है, वों समाज रोगी है। किसी भी एक कि दूसरे के कीमत पर अति, समाज के स्वास्थ्य के लिए और विकास के लिए बाधक हो जाती है.

Friday, March 13, 2009

नास्तिक हुए बिना स्त्री आज़ाद नही होगी

पिछले दिनों पूसा क्रषि संस्थान के प्रसार सम्भाग द्वारा जेंडर सेंसिटाइज़ेशन पर आयोजित 21 दिवसीय रिफ्रेशर कोर्स  मे एक दिन के लिए वक्ता के तौर पर जाने का अवसर मिला।अपने आप मे यह नया अनुभव था कि कृषि अनुसन्धान से जुड़े लोगों , रिसर्चर्स , अध्यापकों के बीच जिनकी आयु 20 से 55 से भीतर थी और जेंडर सम्वेदनशीलता जैसे मुद्दे से उनका कोई अकादमिक सम्बन्ध तो नही ही था।
2.30 घण्टे के वक्तव्य, स्लाइड्स , बात -चीत के बाद यह महसूस हुआ कि यह सब चोखेरबाली पर लिखी जाने वाली बातों और आने वाले टिप्पणियों से ज़्यादा अलग नही था।कृषि से जुड़ी महिलाओं और पुरुषों के बीच इन मुद्दों को उठाने से पूर्व बहुत ज़रूरी था कि सभी सदस्य स्वयम अपना जेंडर सम्वेदनशीलता और पूर्वाग्रहों के बारे मे जान पाते। 
लेकिन जेंडर मुद्दों पर बात करना बहुत आसान काम नही है।लगातार एक यह भय मौजूद रहता है कि आपको व्यवस्था विरोधी, परिवार विरोधी , परम्परा विरोधी , तोड़ू फोड़ू , विनाशक , सन्हारक मान लिया जाएगा।

पूरे सेशन के दौरान स्त्रियों से हामी मिली और पुरुषों ने लगातार प्रश्न पर प्रश्न किए , मुझे महसूस हुआ कि स्त्रियों के सवाल वाकई पुरुषों के सवाल ज़्यादा हैं।अच्छा लगा यह जानकर कि वे (इनमे 35 से 55 की बीच की आयु के पुरुष थे)
उत्सुक थे,सुनने को तैयार थे ,आवश्यकता पड़ने पर तर्क-वितर्क भी कर रहे थे और अंतत: सब्से बुज़ुर्ग पुरुष साथी यह बोलते हुए निकले कि - हमें बहुत सी नयी बातें जानने का मौका मिला, हमने ऐसे कभी सोचा नही था, अब सोचेंगे।
शायद यह बहुत सकारात्मक था। लेकिन सेशन के बाद मेरा ध्यान उन महोदय की बातों पर केन्द्रित हो गया था जिनकी मुझसे सबसे अधिक असहमति थी और मेरी उनसे।मैने कहा कि उम्मीद करून्गी कि अगली बार मिलने पर हमारी असहमतियाँ कुछ कम हो गयीं हों।
उनका पहला ही प्रश्न था कि -समाधान बतलाइए।
और समाधान भी खुद ही दे रहे थे -कि यदि हम सभी धर्म के रास्ते चलें तो कोई समस्या नही आएगी। 
दर असल वे बार बार मुझे वहाँ ले जाना चाह रहे थे जहाँ बात करके मै आगे बढ आती थी। मै बार बार सिद्ध कर चुकी थी कि धर्म लैंगिक भेद भावों को मज़बूत करने का टूल रहा है और वे बार बार उसे जेन्दर सम्वेदनशीलता का टूल साबित करने पर तुले थे।ये दोनो विपरीत बातें थीं।उनका कहना था कि ईश्वर/खुदा  ने आदम को बनाया , लेकिन जब वह अकेला और उदास हो गया तो उसका मन बहलाने ले लिए हव्वा को भेजा। 
यह वह मान्यता थी जिसके जड़ीभूत हो जाने के बाद किसी बात को समझने की गुंजाइश नही बचती।ईश्वर मे इस कदर  अन्ध विशवास करने वाला कोई भी व्यक्ति जेंडर सम्वेदनशील नही हो सकता, स्त्री-पुरुष बराबरी की बात समझ नही सकता, स्त्री के समानाधिकारों को समर्थन नही दे सकता।इसके लिए बेहद ज़रूरी है कि वह अपनी सोच को वैज्ञानिक बनाए, यह विशवास करना सीखे कि सृष्टि विकास का परिणाम है न कि किसी खुदा या ईशवर ने उसे बनाया है।स्त्री पुरुष के लिए नियम किसी ईशवर ने नही बनाए।धर्म का काम शोषण को सहायता देना है क्योकि धर्म इस बात मे यकीन रखता है कि जो आपके साथ होता है वह पूर्व जन्मों का फल है।क्या स्त्री बन ना और शोषित होना पूर्व जन्मों का फल हैं? क्या यह सज़ा है? यदि धर्म की मानें तो , हाँ ! और फिर सज़ा को भुगतना और चुप चाप महान लोगों (पुरुषों) की सेवा करते जाना स्त्री का धर्म है - भला हो बुरा हो जैसा भी हो...........
हमे मानना होगा कि धर्म स्त्री के खिलाफ एक हथियार की तरह इस्तेमाल होता आया है। वह ऐस टूल है जिसके सहारे हम स्त्री की स्थिति को उसकी नियति, उसकी किस्मत के हवाले करते आए है,जिसके सहारे हम बलवानों के हितों की सुरक्षा को सुनिश्चित करते चले आए हैं।
ठीक इसी तर्ज़ पर दलित / हरिजन भी धर्म के नाम पर शोषित हुए , सताए गए,वाचिक मानसिक,शारीरिक हिंसा का शिकार हुए.....अब तक जिसके प्रमाण गाँवों ,दूर दराज़ इलाकों .............शायद कभी कभी इंटरनेट पर भी मिल जाते हैं।
ऐसे मे जब कोई  व्यक्ति स्त्री हो और उस पर भी दलित हो तो ......उसकी स्थिति दोहरी मार पड़ने जैसी हो जाती है। प्रेमचन्द् की कहानियाँ बताती हैं कि ग्रामीण जीवन मे दलित की स्त्री को कोई भी अपने साथ सोने को मजबूर कर सकता था।आज हालात ज़्यादा बदले नही हैं। आज भी दलित स्त्री को  सरे आम नंगा करके घुमाया जा सकता है और तमाशा देखने वाली तालियाँ पीटते हैं।
क्या वाकई हम धर्म के आसरे स्त्री को उसकी अस्मिता पा सकने का दावा कर सकते हैं? क्या धर्म स्त्री की पर निर्भरता और दोयम स्थिति को ही बढावा नही देता? रक्शा बन्धन , करवा चौथ , अहोई ......किसी न किसी रूप मे पुरुष पर स्त्री की निर्भरता बनाए रखने के टूल नही बने रहे? 
धर्म की जकड़ से बाहर निकले बिना स्त्री अपनी अस्मिता का दावा नही कर सकती।वह आत्मविश्वास नही पा सकती, अपना वजूद नही पा सकती।वह आज़ाद नही हो सकती, धर्म मे विशवास हमेशा उसके पैरों मे बेड़ियाँ डालेगा।इसलिए अगर कहा जाए कि नास्तिक हुए बिना स्त्री आज़ाद नही होगी, अपनी अस्मिता नही पा सकती तो आपको अतिशयोक्ति लग सकती है, पर मैने यही म हसूस किया है।यह और बात है कि धर्म से टकराने पर महिला कुछ सज्ज्न उसे कुलक्षणी की संज्ञा दे देंगे पर चोखेरबाली हुए बिना आँख की किरकिरी बने बिना  और नयनतारा होकर स्त्री कभी आज़ाद नही होगी।नयनतारा बनने का रास्ता धर्म से होकर जाता है और अपनी पहचान का रास्ता चोखेरबाली या गाली .....जो भी हो से मिलता है .../विडमबना सही , सच है !!

Monday, March 9, 2009

मेरे आस-पास की औरतें


मेरे आस-पास की औरतें 
अब बदल रहीं हैं,
औरतपन बरक़रार रखते हुए भी,
अपना अलग इतिहास लिख रहीं हैं,
मेरे आस-पास की औरतें 
अब बेटियों को अपनी,
उतरन की विरासत सोंपने की बजाय
नया लिबास गढ़ते हुए 
उसकी आंखों में 
अपने सपने भर रहीं हैं,
मेरे आस-पास की औरतें 
जो काली परछाइयों सी
दीवारों पर लटकी थीं,
अब दिन के उजाले में 
वजूद का अहसास दिला रहीं हैं,
मेरे आस-पास की औरतें 
बड़ी पापड़ सुखाते हुए,
रगड़ रगड़ कढ़ाई चमकाते हुए,
सजती निखरती हुई,
आईने में ख़ुद को देख इतरा रहीं हैं,
मेरे आस-पास की औरतें 
इतना सब होते हुए भी
हर बारिश के बाद 
परम्पराओं की संदूकची से 
संस्कारों के पुराने कपड़े निकाल
धूप दिखा रहीं हैं ।

आरसी ब्लॉग से साभार

Sunday, March 8, 2009

आजादी के आन्दोलन में भी अग्रणी रही नारी (अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर)

स्वतंत्रता और स्वाधीनता प्राणिमात्र का जन्मसिद्ध अधिकार है। इसी से आत्मसम्मान और आत्मउत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। भारतीय राष्ट्रीयता को दीर्घावधि तक विदेशी शासन और सत्ता की कुटिल-उपनिवेशवादी नीतियों के चलते परतंत्रता का दंश झेलने को मजबूर होना पड़ा था और जब इस क्रूरतम कृत्यों से भरी अपमानजनक स्थिति की चरम सीमा हो गई तब जनमानस उद्वेलित हो उठा था। अपनी राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक पराधीनता से मुक्ति के लिए सन् 1857 से सन् 1947 तक दीर्घावधि क्रान्ति यज्ञ की बलिवेदी पर अनेक राष्ट्रभक्तों ने तन-मन जीवन अर्पित कर दिया था। क्रान्ति की ज्वाला सिर्फ पुरुषों को ही नहीं आकृष्ट करती बल्कि वीरांगनाओं को भी उसी आवेग से आकृष्ट करती है। भारत में सदैव नारी को श्रद्धा की देवी माना गया है, पर यही नारी जरूरत पड़ने पर चंडी बनने से परहेज नहीं करती। ‘स्त्रियों की दुनिया घर के भीतर है, “शासन-सूत्र का सहज स्वामी तो पुरूष ही है‘ अथवा ‘“शासन व समर से स्त्रियों का सरोकार नहीं‘ जैसी तमाम पुरूषवादी स्थापनाओं को ध्वस्त करती इन वीरांगनाओं के ज़िक्र के बिना 1857 से 1947 तक की स्वाधीनता की दास्तान अधूरी है, जिन्होंने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिया। इन वीरांगनाओं में से अधिकतर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे किसी रजवाड़े में पैदा नहीं हुईं बल्कि अपनी योग्यता की बदौलत उच्चतर मुकाम तक पहुँचीं।

1857 की क्रान्ति की अनुगूँज में दो वीरांगनाओं का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इनमें लखनऊ और झांसी में क्रान्ति का नेतृत्व करने वाली बेगम हजरत महल और रानी लक्ष्मीबाई शामिल हैं। ऐसा नहीं है कि 1857 से पूर्व वीरांगनाओं ने अपना जौहर नहीं दिखाया। 1824 में कित्तूर (कर्नाटक) की रानी चेनम्मा ने अंगेजों को मार भगाने के लिए ’फिरंगियों भारत छोड़ो’ की ध्वनि गुंजित की थी और रणचण्डी का रूप धर कर अपने अदम्य साहस व फौलादी संकल्प की बदौलत अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये थे। कहते हैं कि मृत्यु से पूर्व रानी चेनम्मा काशीवास करना चाहती थीं पर उनकी यह चाह पूरी न हो सकी थी। यह संयोग ही था कि रानी चेनम्मा की मौत के 6 साल बाद काशी में ही लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ। इतिहास के पन्नों में अंग्रेजों से लोहा लेने वाली प्रथम वीरांगना रानी चेनम्मा को ही माना जाता है।

कम ही लोगों को पता होगा कि बैरकपुर में मंगलपाण्डे को चर्बी वाले कारतूसों के बारे में सर्वप्रथम मातादीन ने बताया और मातादीन को इसकी जानकारी उसकी पत्नी लाजो ने दी। वस्तुत: लाजो अंग्रेज अफसरों के यहाँ काम करती थी, जहाँ उसे यह सुराग मिला कि अंग्रेज गाय की चर्बी वाले कारतूस इस्तेमाल करने जा रहे हैं। इसी प्रकार 9 मई 1857 को मेरठ में विद्रोह करने पर 85 भारतीय सिपाहियों को हथकड़ी-बेड़ियाँ पहनाकर जेल भेज दिया गया तो अन्य सिपाही जब उस शाम को घूमने निकले तो मेरठ शहर की स्त्रियों ने उन पर ताने कसे। मुरादाबाद के तत्कालीन जिला जज जे0सी0 विल्सन ने इस घटना का वर्णन करते हुये लिखा है कि- ‘‘महिलाओं ने कहा कि- छि:! तुम्हारे भाई जेलखाने में हैं और तुम यहाँ बाजार में मक्खियाँ मार रहे हो। तुम्हारे जीने पर धिक्कार है।’’ इतना सुनते ही सिपाही जोश में आ गये और अगले ही दिन 10 मई को जेलखाना तोड़कर सभी कैदी सिपाहियों को छुड़ा लिया और उसी रात्रि क्रान्ति का बिगुल बजाते दिल्ली की ओर प्रस्थान कर गये, जहाँ से 1857 की क्रान्ति की ज्वाला चारों दिशाओं में फैल गई।

लखनऊ में 1857 की क्रान्ति का नेतृत्व बेगम हजरत महल ने किया। अपने नाबालिग पुत्र बिरजिस कादर को गद्दी पर बिठाकर उन्होंने अंग्रेजी सेना का स्वयं मुकाबला किया। उनमें संगठन की अभूतपूर्व क्षमता थी और इसी कारण अवध के जमींदार, किसान और सैनिक उनके नेतृत्व में आगे बढ़ते रहे। आलमबाग की लड़ाई के दौरान अपने जांबाज सिपाहियों की उन्होंने भरपूर हौसला आफजाई की और हाथी पर सवार होकर अपने सैनिकों के साथ दिन-रात युद्ध करती रहीं। लखनऊ में पराजय के बाद वह अवध के देहातों मे चली गयीं और वहाँ भी क्रान्ति की चिंगारी सुलगायी। घुड़सवारी व हथियार चलाने में माहिर झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरता और शौर्य के किस्से तो जन-जन में सुने जा सकते हैं। नवम्बर 1835 को बनारस में मोरोपंत तांबे के घर जन्मी लक्ष्मीबाई का बचपन नाना साहब के साथ कानपुर के बिठूर में बीता। 1855 में अपने पति राजा गंगाधरराव की मौत के पश्चात् उन्होंने झाँसी का शासन सँभाला पर अंग्रेजों ने उन्हें और उनके दत्तक पुत्र को शासक मानने से इन्कार कर दिया। घुड़सवारी व हथियार चलाने में माहिर रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी में ब्रिटिश सेना को कड़ी टक्कर दी और बाद में तात्या टोपे की मदद से ग्वालियर पर भी कब्जा किया। उनकी मौत पर जनरल ह्यूगरोज ने कहा था कि- ‘‘यहाँ वह औरत सोयी हुयी है, जो विद्रोहियों में एकमात्र मर्द थी।’’ मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर की बेगम जीनत महल ने दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में स्वातंत्र्य योद्धाओं को संगठित किया और देशप्रेम का परिचय दिया। 1857 की क्रान्ति का नेतृत्व करने हेतु बहादुर शाह जफर को प्रोत्साहित करने वाली बेगम जीनत महल ने ललकारते हुए कहा था कि- ’’यह समय गजलें कह कर दिल बहलाने का नहीं है। बिठूर से नाना साहब का पैगाम लेकर देशभक्त सैनिक आए हैं। आज सारे हिन्दुस्तान की आँखें दिल्ली की ओर व आप पर लगी हैं। खानदान-ए-मुगलिया का खून हिन्द को गुलाम होने देगा तो इतिहास उसे कभी माफ़ नहीं करेगा।’’ बाद में बेगम जीनत महल भी बहादुर शाह जफर के साथ ही बर्मा चली गयीं। इसी प्रकार दिल्ली के शहजादे फिरोज शाह की बेगम तुकलाई सुलतान जमानी बेगम को जब दिल्ली में क्रान्ति की सूचना मिली तो उन्होंने ऐशोआराम का जीवन जीने की बजाय युद्ध शिविरों में रहना पसन्द किया और वहीं से सैनिको को रसद पहुँचाने तथा घायल सैनिको की सेवा-सुश्रुषा का प्रबन्ध अपने हाथो में ले लिया। अंग्रेजी हुकूमत इनसे इतनी भयभीत हो गयी थी कि कालान्तर में उन्हें घर में नजरबन्द कर उन पर बम्बई छोड़ने और दिल्ली प्रवेश करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।

बेगम हजरत महल और रानी लक्ष्मीबाई द्वारा गठित सैनिक दल में तमाम महिलायें शामिल थीं। लखनऊ में बेगम हजरत महल द्वारा गठित महिला सैनिक दल का नेतृत्व रहीमी के हाथों में था, जिसने फौजी भेष अपनाकर तमाम महिलाओं को तोप व बन्दूक चलाना सिखाया। रहीमी की अगुवाई में इन महिलाओं ने अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया। लखनऊ की तवायफ हैदरीबाई के यहाँ तमाम अंग्रेज अफसर आते थे और कई बार क्रान्तिकारियों के खिलाफ योजनाओं पर बात किया करते थे। हैदरीबाई ने पेशे से परे अपनी देशभक्ति का परिचय देते हुये इन महत्वपूर्ण सूचनाओं को क्रान्तिकारियों तक पहुँचाया और बाद में वह भी रहीमी के सैनिक दल में शामिल हो गयी। ऐसी ही एक वीरांगना ऊदा देवी भी हुयीं, जिनके पति चिनहट की लड़ाई में शहीद हो गये थे। ऐसा माना जाता है कि डब्ल्यू.गार्डन अलक्जेंडर एवं तत्पश्चात क्रिस्टोफर हिबर्ट ने अपनी पुस्तक ‘द ग्रेट म्यूटिनी’ में सिकन्दरबाग के किले पर हमले के दौरान जिस वीरांगना के साहस का वर्णन किया है, वह ऊदा देवी ही थीं। ऊदा देवी ने पीपल के घने पेड़ पर छिपकर लगभग 32 अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया। अंग्रेज असमंजस में पड़ गये और जब हलचल होने पर कैप्टन वेल्स ने पेड़ पर गोली चलायी तो ऊपर से एक मानवाकृति गिरी। नीचे गिरने से उसकी लाल जैकेट का ऊपरी हिस्सा खुल गया, जिससे पता चला कि वह महिला है। उस महिला का साहस देख कैप्टन वेल्स की आँखे नम हो गयीं और उसने कहा कि यदि मुझे पता होता कि यह महिला है तो मैं कभी गोली नहीं चलाता। ऊदा देवी का जिक्र अमृतलाल नागर ने अपनी कृति ‘गदर के फूल’ में बाकायदा किया है। इसी तरह की एक वीरांगना आशा देवी थीं, जिन्होंने 8 मई 1857 को अंग्रेजी सेना का सामना करते हुये शहादत पायी। आशा देवी का साथ देने वाली वीरांगनाओं में रनवीरी वाल्मीकि, शोभा देवी, वाल्मीकि महावीरी देवी, सहेजा वाल्मीकि, नामकौर, राजकौर, हबीबा गुर्जरी देवी, भगवानी देवी, भगवती देवी, इन्द्रकौर, कुशल देवी और रहीमी गुर्जरी इत्यादि शामिल थीं। ये वीरांगनायें अंग्रेजी सेना के साथ लड़ते हुये शहीद हो गयीं।

बेगम हजरत महल के बाद अवध के मुक्ति संग्राम में जिस दूसरी वीरांगना ने प्रमुखता से भाग लिया, वे थीं गोण्डा से 40 किलोमीटर दूर स्थित तुलसीपुर रियासत की रानी राजेश्वरी देवी। राजेश्वरी देवी ने होपग्राण्ट के सैनिक दस्तों से जमकर मुकाबला लिया। अवध की बेगम आलिया ने भी अपने अद्भुत कारनामों से अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी। बेगम आलिया 1857 के एक वर्ष पूर्व से ही अपनी सेना में शामिल महिलाओं को शस्त्रकला का प्रशिक्षण देकर सम्भावित क्रान्ति की योजनाओं को मूर्तरूप देने में संलग्न हो गयी थीं। अपने महिला गुप्तचर के गुप्त भेदों के माध्यम से बेगम आलिया ने समय-समय पर ब्रिटिश सैनिकों से युद्ध किया और कई बार अवध से उन्हें भगाया। इसी प्रकार अवध के सलोन जिले में सिमरपहा के तालुकदार वसंत सिंह बैस की पत्नी और बाराबंकी के मिर्ज़ापुर रियासत की रानी तलमुंद कोइर भी इस संग्राम में सक्रिय रहीं। अवध के सलोन जिले में भदरी की तालुकदार ठकुराइन सन्नाथ कोइर ने विद्रोही नाजिम फजल अजीम को अपने कुछ सैनिक व तोपें, तो मनियारपुर की सोगरा बीबी ने अपने 400 सैनिक और दो तोपें सुल्तानपुर के नाजिम और प्रमुख विद्रोही नेता मेंहदी हसन को दी। इन सभी ने बिना इस बात की परवाह किये हुये कि उनके इस सहयोग का अंजाम क्या होगा, क्रान्तिकारियों को पूरी सहायता दी।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने महिलाओं की एक अलग टुकड़ी ‘दुर्गा दल’ बनायी थी। इसका नेतृत्व कुश्ती, घुड़सवारी और धनुर्विद्या में माहिर झलकारीबाई के हाथों में था। झलकारीबाई ने कसम उठायी थी कि जब तक झांसी स्वतंत्र नहीं होगी, न ही मैं श्रृंगार करूंगी और न ही सिन्दूर लगाऊँगी। अंग्रेजों ने जब झांसी का किला घेरा तो झलकारीबाई जोशो-खरोश के साथ लड़ी। चूँकि उसका चेहरा और कद-काठी रानी लक्ष्मीबाई से काफी मिलता-जुलता था, सो जब उसने रानी लक्ष्मीबाई को घिरते देखा तो उन्हें महल से बाहर निकल जाने को कहा और स्वयं घायल सिहंनी की तरह अंग्रेजों पर टूट पड़ी और शहीद हो गयीं। झलकारीबाई का जिक्र मराठी पुरोहित विष्णुराव गोडसे की कृति ‘माझा प्रवास’ में भी मिलता है। रानी लक्ष्मीबाई की सेना में जनाना फौजी इंचार्ज मोतीबाई और रानी के साथ चौबीस घंटे छाया की तरह रहनेवाली सुन्दर-मुन्दर और काशीबाई सहित जूही व दुर्गाबाई भी दुर्गा-दल की ही सैनिक थीं। इन सभी ने अपनी जान की बाजी लगाकर भी रानी लक्ष्मीबाई पर आंच नहीं आने दी और अन्तोगत्वा वीरगति को प्राप्त हुयीं।

कानपुर 1857 की क्रान्ति का प्रमुख गवाह रहा है। पेशे से तवायफ अजीजनबाई ने यहाँ क्रान्तिकारियों की संगत में 1857 की क्रान्ति में लौ जलायी। 1 जून 1857 को जब कानपुर में नाना साहब के नेतृत्व में तात्या टोपे, अजीमुल्ला खान, बालासाहब, सूबेदार टीका सिंह व शमसुद्दीन खान क्रान्ति की योजना बना रहे थे तो उनके साथ उस बैठक में अजीजनबाई भी थीं। इन क्रान्तिकारियों की प्रेरणा से अजीजन ने मस्तानी टोली के नाम से 400 वेश्याओं की एक टोली बनायी जो मर्दाना भेष में रहती थीं। एक तरफ ये अंग्रेजों से अपने हुस्न के दम पर राज उगलवातीं, वहीं नौजवानों को क्रान्ति में भाग लेने के लिये प्रेरित करतीं। सतीचौरा घाट से बचकर बीबीघर में रखी गयी 125 अंग्रेज महिलाओं व बच्चों की रखवाली का कार्य अजीजनबाई की टोली के ही जिम्मे था। बिठूर के युद्ध में पराजित होने पर नाना साहब और तात्या टोपे तो पलायन कर गये लेकिन अजीजन पकड़ी गयी। युद्धबंदी के रूप में उसे जनरल हैवलाक के समक्ष प्रस्तुत किया गया। जनरल हैवलाक उसके सौन्दर्य पर रीझे हुए बिना न रह सका और प्रस्ताव रखा कि यदि वह अपनी गलतियों को स्वीकार कर क्षमा माँग ले तो उसे माफ कर दिया जायेगा। पर अजीजन ने एक वीरांगना की भाँति उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया और पलट कर कहा कि माफी तो अंग्रेजों को माँगनी चाहिए, जिन्होंने इतने जुल्म ढाये। इतने पर आग बबूला हो हैवलाक ने अजीजन को गोली मारने के आदेश दे दिये। क्षण भर में ही अजीजन का अंग-प्रत्यंग धरती माँ की गोद में सो गया। इतिहास में दर्ज़ है कि-‘‘बगावत की सजा हँस कर सह ली अजीजन ने, लहू देकर वतन को।’’ कानपुर के स्वाधीनता संग्राम में मस्तानीबाई की भूमिका भी कम नहीं है। बाजीराव पेशवा के लश्कर के साथ ही मस्तानीबाई बिठूर आई थी। अप्रतिम सौन्दर्य की मलिका मस्तानीबाई अंग्रेजों का मनोरंजन करने के बहाने उनसे खुफिया जानकारी हासिल कर पेशवा को देती थी। नाना साहब की मुँहबोली बेटी मैनावती भी देशभक्ति से भरपूर थी। जब नाना साहब बिठूर से पलायन कर गये तो मैनावती यहीं रह गयी। जब अंग्रेज नाना साहब का पता पूछने पहुँचे तो मौके पर 17 वर्षीया मैनावती ही मिली। नाना साहब का पता न बताने पर अंग्रेजों ने मैनावती को आग में जिन्दा ही जला दिया।

ऐसी ही न जाने कितनी दास्तानें हैं, जहाँ वीरांगनाओं ने अपने साहस व जीवट के दम पर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये। मध्यप्रदेश में रामगढ़ की रानी अवन्तीबाई ने 1857 के संग्राम के दौरान अंग्रेजों का प्रतिकार किया और घिर जाने पर आत्मसमर्पण करने की बजाय स्वयं को खत्म कर लिया। मध्य प्रदेश में ही जैतपुर की रानी ने अपनी रियासत की स्वतंत्रता की घोषणा कर दतिया के क्रान्तिकारियों को लेकर अंग्रेजी सेना से मोर्चा लिया। तेजपुर की रानी भी इस संग्राम में जैतपुर की रानी की सहयोगी बनकर लड़ीं। मुजफ्फरनगर के मुंडभर की महावीरी देवी ने 1857 के संग्राम में 22 महिलाओं के साथ मिलकर अंग्रेजों पर हमला किया। अनूप शहर की चौहान रानी ने घोड़े पर सवार होकर हाथों में तलवार लिये अंग्रेजों से युद्ध किया और अनूप शहर के थाने पर लगे यूनियन जैक को उतार कर वीरांगना चौहान रानी ने हरा राष्ट्रीय झंडा फहरा दिया। इतिहास गवाह है कि 1857 की क्रान्ति के दौरान दिल्ली के आस-पास के गाँवों की लगभग 255 महिलाओं को मुजफ्फरनगर में गोली से उड़ा दिया गया था।

1857 के बाद अनवरत चले स्वतंत्रता आन्दोलन में भी महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया। 1905 के बंग-भंग आन्दोलन में पहली बार महिलाओं ने खुलकर सार्वजनिक रूप से भाग लिया था। स्वामी श्रद्धानन्द की पुत्री वेद कुमारी और आज्ञावती ने इस आन्दोलन के दौरान महिलाओं को संगठित किया और विदेशी कपड़ो की होली जलाई। कालान्तर में 1930 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान वेद कुमारी की पुत्री सत्यवती ने भी सक्रिय भूमिका निभायी। सत्यवती ने 1928 में साइमन कमीशन के दिल्ली आगमन पर काले झण्डों से उसका विरोध किया था। 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान ही अरुणा आसफ अली तेजी से उभरीं और इस दौरान अकेले दिल्ली से 1600 महिलाओं ने गिरफ्तारी दी। गाँधी इरविन समझौते के बाद जहाँ अन्य आन्दोलनकारी नेता जेल से रिहा कर दिये गये थे वहीं अरुणा आसफ अली को बहुत दबाव पर बाद में छोड़ा गया। सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान जब सभी बड़े नेता गिरफ्तार कर लिये गये, तो कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता एक महिला नेली सेनगुप्त ने की। क्रान्तिकारी आन्दोलन में भी महिलाओं ने भागीदारी की। 1912-14 में बिहार में जतरा भगत ने जनजातियों को लेकर टाना आन्दोलन चलाया। उनकी गिरफ्तारी के बाद उसी गाँव की महिला देवमनियां उरांइन ने इस आन्दोलन की बागडोर सँभाली। 1931-32 के कोल आन्दोलन में भी आदिवासी महिलाओं ने सक्रिय भूमिका निभायी थी। स्वाधीनता की लड़ाई में बिरसा मुण्डा के सेनापति गया मुण्डा की पत्नी ‘माकी’ बच्चे को गोद में लेकर फरसा-बलुआ से अंग्रेजों से अन्त तक लड़ती रहीं। 1930-32 में मणिपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व नागा रानी गुइंदाल्यू ने किया। इनसे भयभीत अंग्रेजों ने इनकी गिरफ्तारी पर पुरस्कार की घोषणा की और कर माफ करने के आश्वासन भी दिये। 1930 में बंगाल में सूर्यसेन के नेतृत्व में हुये चटगाँव विद्रोह में युवा महिलाओं ने पहली बार क्रान्तिकारी आन्दोलनों में स्वयं भाग लिया। ये क्रान्तिकारी महिलायें क्रान्तिकारियों को शरण देने, संदेश पहुँचाने और हथियारों की रक्षा करने से लेकर बन्दूक चलाने तक में माहिर थीं। इन्हीं में से एक प्रीतिलता वाडेयर ने एक यूरोपीय क्लब पर हमला किया और कैद से बचने हेतु आत्महत्या कर ली। कल्पनादत्त को सूर्यसेन के साथ ही गिरफ्तार कर 1933 में आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी और 5 साल के लिये अण्डमान की काल कोठरी में कैद कर दिया गया। दिसम्बर 1931 में कोमिल्ला की दो स्कूली छात्राओं- शान्ति घोष और सुनीति चौधरी ने जिला कलेक्टर को दिनदहाड़े गोली मार दी जिस पर उन्हें काला पानी की सजा हुई तो 6 फरवरी 1932 को बीना दास ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में उपाधि ग्रहण करने के समय गवर्नर पर बहुत नजदीक से गोली चलाकर अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी। सुहासिनी अली तथा रेणुसेन ने भी अपनी क्रान्तिकारी गतिविधियों से 1930-34 के मध्य बंगाल में धूम मचा दी थी।

चन्द्रशेखर आजाद के अनुरोध पर ‘दि फिलासाफी आफ बम’ दस्तावेज तैयार करने वाले क्रान्तिकारी भगवतीचरण वोहरा की पत्नी ‘दुर्गा भाभी’ नाम से मशहूर दुर्गा देवी बोहरा ने भगत सिंह को लाहौर जिले से छुड़ाने का प्रयास किया। 1928 में जब अंग्रेज अफसर साण्डर्स को मारने के बाद भगत सिंह व राजगुरु लाहौर से कलकत्ता के लिए निकले, तो कोई उन्हें पहचान न सके इसलिए दुर्गा भाभी की सलाह पर एक सुनियोजित रणनीति के तहत भगत सिंह पति, दुर्गा भाभी उनकी पत्नी और राजगुरु नौकर बनकर वहाँ से निकल लिये। 1927 में लाला लाजपतराय की मौत का बदला लेने के लिये लाहौर में बुलायी गई बैठक की अध्यक्षता दुर्गा भाभी ने की। बैठक में अंग्रेज पुलिस अधीक्षक जे0ए0 स्काट को मारने का जिम्मा वे खुद लेना चाहती थीं, पर संगठन ने उन्हें यह जिम्मेदारी नहीं दी। बम्बई के गवर्नर हेली को मारने की योजना में टेलर नामक एक अंग्रेज अफसर घायल हो गया, जिसपर गोली दुर्गा भाभी ने ही चलायी थी। इस केस में उनके विरुद्ध वारण्ट भी जारी हुआ और दो वर्ष से ज्यादा समय तक फरार रहने के बाद 12 सितम्बर 1931 को दुर्गा भाभी लाहौर में गिरफ्तार कर ली गयीं। क्रान्तिकारी आन्दोलन के दौरान सुशीला दीदी ने भी प्रमुख भूमिका निभायी और काकोरी काण्ड के कैदियों के मुकदमे की पैरवी के लिए अपनी स्वर्गीय माँ द्वारा शादी की खातिर रखा 10 तोला सोना उठाकर दान में दिया। यही नहीं उन्होंने क्रान्तिकारियों का केस लड़ने हेतु ‘मेवाड़पति’ नामक नाटक खेलकर चन्दा भी इकट्ठा किया। 1930 के सविनय अविज्ञा आन्दोलन में ‘इन्दुमति‘ के छद्म नाम से सुशीला दीदी ने भाग लिया और गिरफ्तार हुयीं। इसी प्रकार हसरत मोहानी को जब जेल की सजा मिली तो उनके कुछ दोस्तों ने जेल की चक्की पीसने के बजाय उनसे माफी मांगकर छूटने की सलाह दी। इसकी जानकारी जब बेगम हसरत मोहानी को हुई तो उन्होंने पति की जमकर हौसला आफजाई की और दोस्तों को नसीहत भी दी। मर्दाना वेष धारण कर उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में खुलकर भाग लिया और बाल गंगाधर तिलक के गरम दल में शामिल होने पर गिरफ़्तार कर जेल भेज दी गयी, जहाँ उन्होंने चक्की भी पीसी। यही नहीं महिला मताधिकार को लेकर 1917 में सरोजिनी नायडू के नेतृत्व में वायसराय से मिलने गये प्रतिनिधिमण्डल में वह भी शामिल थीं।

1925 में कानपुर में हुये कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता कर ‘भारत कोकिला’ के नाम से मशहूर सरोजिनी नायडू को कांग्रेस की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष बनने का गौरव प्राप्त हुआ। सरोजिनी नायडू ने भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास में कई पृष्ठ जोड़े। कमला देवी चट्टोपाध्याय ने 1921 में असहयोग आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। इन्होंने बर्लिन में अन्तर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व कर तिरंगा झंडा फहराया। 1921 के दौर में अली बन्धुओं की माँ बाई अमन ने भी लाहौर से निकल तमाम महत्वपूर्ण नगरों का दौरा किया और जगह-जगह हिन्दू-मुस्लिम एकता का संदेश फैलाया। सितम्बर 1922 में बाई अमन ने शिमला दौरे के समय वहाँ की फैशनपरस्त महिलाओं को खादी पहनने की प्रेरणा दी। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में भी महिलाओं ने प्रमुख भूमिका निभायी। अरुणा आसफ अली व सुचेता कृपलानी ने अन्य आन्दोलनकारियों के साथ भूमिगत होकर आन्दोलन को आगे बढ़ाया तो ऊषा मेहता ने इस दौर में भूमिगत रहकर कांग्रेस-रेडियो से प्रसारण किया। अरुणा आसफ अली को तो 1942 में उनकी सक्रयि भूमिका के कारण ‘दैनिक ट्रिब्यून’ ने ‘1942 की रानी झाँसी’ नाम दिया। अरुणा आसफ अली ‘नमक कानून तोड़ो आन्दोलन’ के दौरान भी जेल गयीं। 1942 के आन्दोलन के दौरान ही दिल्ली में ‘गर्ल गाइड‘ की 24 लड़कियाँ अपनी पोशाक पर विदेशी चिन्ह धारण करने तथा यूनियन जैक फहराने से इनकार करने के कारण अंग्रेजी हुकूमत द्वारा गिरफ्तार हुईं और उनकी बेदर्दी से पिटाई की गयी। इसी आन्दोलन के दौरान तमलुक की 73 वर्षीया किसान विधवा मातंगिनी हाजरा ने गोली लग जाने के बावजूद राष्ट्रीय ध्वज को अन्त तक ऊँचा रखा।

महिलाओं ने परोक्ष रूप से भी स्वतंत्रता संघर्ष में प्रभावी भूमिका निभा रहे लोगों को सराहा। सरदार वल्लभ भाई पटेल को ‘सरदार’ की उपाधि बारदोली सत्याग्रह के दौरान वहाँ की महिलाओं ने ही दी। महात्मा गाँधी को स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान उनकी पत्नी कस्तूरबा गाँधी ने पूरा समर्थन दिया। उनकी नियमित सेवा व अनुशासन के कारण ही महात्मा गाँधी आजीवन अपने लम्बे उपवासों और विदेशी चिकित्सा के पूर्ण निषेध के बावजूद स्वस्थ रहे। अपने व्यक्तिगत हितों को उन्होंने राष्ट्र की खातिर तिलांजलि दे दी। भारत छोड़ो आन्दोलन प्रस्ताव पारित होने के बाद महात्मा गाँधी को आगा खाँ पैलेस (पूना) में कैद कर लिया गया। कस्तूरबा गाँधी भी उनके साथ जेल गयीं। डा0 सुशीला नैयर, जो कि गाँधी जी की निजी डाक्टर भी थीं, भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान 1942-44 तक महात्मा गाँधी के साथ जेल में रहीं।

इन्दिरा गाँधी ने 6 अप्रैल 1930 को बच्चों को लेकर ‘वानर सेना’ का गठन किया, जिसने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अपना अद्भुत योगदान दिया। यह सेना स्वतंत्रता सेनानियों को सूचना देने और सूचना लेने का कार्य करती व हर प्रकार से उनकी मदद करती। विजयलक्ष्मी पण्डित भी गाँधी जी से प्रभावित होकर जंग-ए-आजादी में कूद पड़ीं। वह हर आन्दोलन में आगे रहतीं, जेल जातीं, रिहा होतीं, और फिर आन्दोलन में जुट जातीं। 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ के सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन में विजयलक्ष्मी पण्डित ने भारत का प्रतिनिधित्व भी किया। सुभाषचन्द्र बोस की ‘‘आरजी हुकूमते आजाद हिन्द सरकार’’ में महिला विभाग की मंत्री तथा आजाद हिन्द फौज की रानी झांसी रेजीमेण्ट की कमाडिंग आफिसर रहीं कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने आजादी में प्रमुख भूमिका निभायी। सुभाषचन्द्र बोस के आहवान पर उन्होंने सरकारी डाक्टर की नौकरी छोड़ दी। कैप्टन सहगल के साथ आजाद हिन्द फौज की रानी झांसी रेजीमेण्ट में लेफ्टिनेण्ट रहीं ले0 मानवती आर्या ने भी सक्रिय भूमिका निभायी। अभी भी ये दोनों सेनानी कानपुर में तमाम रचनात्मक गतिविधियों में सक्रिय हैं।

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की गूँज भारत के बाहर भी सुनायी दी। विदेशों में रह रही तमाम महिलाओं ने भारतीय संस्कृति से प्रभावित होकर भारत व अन्य देशों में स्वतंत्रता आन्दोलन की अलख जगायी। लन्दन में जन्मीं एनीबेसेन्ट ने ‘न्यू इण्डिया’ और ‘कामन वील’ पत्रों का सम्पादन करते हुये आयरलैण्ड के ‘स्वराज्य लीग’ की तर्ज़ पर सितम्बर 1916 में ‘भारतीय स्वराज्य लीग’ (होमरूल लीग) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य स्वशासन स्थापित करना था। एनीबेसेन्ट को कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष होने का गौरव भी प्राप्त है। एनीबेसेन्ट ने ही 1898 में बनारस में सेन्ट्रल हिन्दू कालेज की नींव रखी, जिसे 1916 में महामना मदनमोहन मालवीय ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के रूप में विकसित किया। भारतीय मूल की फ्रांसीसी नागरिक मैडम भीकाजी कामा ने लन्दन, जर्मनी तथा अमेरिका का भ्रमण कर भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में माहौल बनाया। उनके द्वारा पेरिस से प्रकाशित ‘वन्देमातरम्’ पत्र प्रवासी भारतीयों में काफी लोकप्रिय हुआ। 1909 में जर्मनी के स्टटगार्ट में हुयी अन्तर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस में मैडम भीकाजी कामा ने कहा कि - ‘‘भारत में ब्रिटिश शासन जारी रहना मानवता के नाम पर कलंक है। एक महान देश भारत के हितों को इससे भारी क्षति पहुँच रही है।’’ उन्होंने लोगों से भारत को दासता से मुक्ति दिलाने में सहयोग की अपील की और भारतवासियों का आह्वान किया कि - ‘‘आगे बढ़ो, हम हिन्दुस्तानी हैं और हिन्दुस्तान हिन्दुस्तानियों का है।’’ यही नहीं मैडम भीकाजी कामा ने इस कांफ्रेंस में ‘वन्देमातरम्’ अंकित भारतीय ध्वज फहरा कर अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी। मैडम भीकाजी कामा लन्दन में दादाभाई नौरोजी की प्राइवेट सेक्रेटरी भी रहीं। आयरलैंड की मूल निवासी और स्वामी विवेकानन्द की शिष्या मारग्रेट नोबुल (भगिनी निवेदिता) ने भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में तमाम मौकों पर अपनी सक्रियता दिखायी। कलकत्ता विश्वविद्यालय में 11 फरवरी 1905 को आयोजित दीक्षान्त समारोह में वायसराय लार्ड कर्ज़न द्वारा भारतीय युवकों के प्रति अपमानजनक शब्दों का उपयोग करने पर भगिनी निवेदिता ने खड़े होकर निर्भीकता के साथ प्रतिकार किया। इंग्लैण्ड के ब्रिटिश नौसेना के एडमिरल की पुत्री मैडेलिन ने भी गाँधी जी से प्रभावित होकर भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया। ‘मीरा बहन’ के नाम से मशहूर मैडेलिन भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान महात्मा गाँधी के साथ आगा खाँ महल में कैद रहीं। मीरा बहन ने अमेरिका व ब्रिटेन में भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में माहौल बनाया। मीरा बहन के साथ-साथ ब्रिटिश महिला म्यूरियल लिस्टर भी गाँधी जी से प्रभावित होकर भारत आयीं और अपने देश इंग्लैण्ड में भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास किया। द्वितीय गोलमेज कांफ्रेन्स के दौरान गाँधी जी इंग्लैण्ड में म्यूरियल लिस्टर द्वारा स्थापित ‘किंग्सवे हाल’ में ही ठहरे थे। इस दौरान म्यूरियल लिस्टर ने गाँधी जी के सम्मान में एक भव्य समारोह भी आयोजित किया था।

इन वीरांगनाओं के अनन्य राष्ट्रप्रेम, अदम्य साहस, अटूट प्रतिबद्धता और उनमें से कइयों का गौरवमयी बलिदान भारतीय इतिहास की एक जीवन्त दास्तां है। हो सकता है उनमें से कइयों को इतिहास ने विस्मृत कर दिया हो, पर लोक चेतना में वे अभी भी मौजूद हैं। ये वीरांगनायें प्रेरणा स्रोत के रूप में राष्ट्रीय चेतना की संवाहक हैं और स्वतंत्रता संग्राम में इनका योगदान अमूल्य एवं अतुलनीय है।
आकांक्षा

अब आजीवन कारावास की सजा भोगेंगे ये कामान्ध गुरु !

घुघूती बासूती

महिला दिवस पर......

पाटन में गुरु के चोले में घूमते थे बलात्कारी ! अब आजीवन कारावास की सजा भोगेंगे ये गुरु !


यदि अमानुषिकता की, गुरु के नाम को कलंकित करने की कोई प्रतिस्पर्धा हो तो पाटन के टीचर्स ट्रेनिंग इन्स्टीट्यूट के ये छह अध्यापक सबको मात देते हुए गर्व (शायद उन्हें गर्व ही था ) से यह स्पर्धा जीत सकते हैं। दुर्भाग्य से यह लज्जाजनक घटना मेरे राज्य में किसी एक अध्यापक के किन्हीं कमजोर क्षणों की कहानी नहीं है। न ही एक अपराधी की एक विरले अपराध की कहानी। यहाँ तो दाल में कुछ काला नहीं सारी की सारी दाल काली ही नहीं, दुर्गंधयुक्त थी। और यह एक दिन नहीं परोसी गई, बार बार परोसी गई। इसे निगलने का दुर्भाग्य था अध्यापिका बनने के सपने सजाए छात्रा किशोरियों का। 


सोचिए, कौन माता पिता अपनी बेटियों को केवल बारहवीं पढ़ाकर अध्यापिका बनाना चाहेंगे ? अधिकतर लोग कम से कम स्नातक करवाकर ही अध्यापन की ट्रेनिंग देना चाहेंगे। ये कोई समाज के प्रतिष्ठित, धनवान लोग तो शायद नहीं होंगे। साधारण लोग व अधिकतर ये वे लोग होंगे जो गरीबी से बाहर निकलने की ईमानदार व सम्मानित राह खोजते होंगे। बहुत से दलित या पिछड़ी जातियों के भी होंगे। सरकारी कॉलेज, फीस शायद न या नाम मात्र की (गुजरात में सरकारी संस्थानों में फीस नाम मात्र की है और लड़कियों के लिए नहीं ही है।), छात्रावास की बहुत कम खर्चे में समुचित व्यवस्था, कल के सुनहरे सपने, जब अनपढ़ माता पिता भी गर्व से कह सकते कि उनकी बेटी अध्यापिका है। बहुत सी छात्राओं के लिए उनकीअध्यापिकाएँ ही रोल मॉडेल रही होंगी। शायद बहुत सी के लिए जीवन में सबसे सम्मानित व पढ़ी लिखी व्यक्ति उनकी अध्यापिका ही रही होगी।


चमकती आँखों मे भविष्य के सुनहरे स्वप्न लिए ये किशोरियाँ पाटन के DIET-PTC ( District Institute of education and Training BTC ट्रेनिंग की तरह) के छात्रावास में दो वर्ष के लिए पढ़ने के लिए गईं होंगी। उन्होंने स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि जिन अध्यापकों के कन्धों पर इन्हें अध्यापिका बनाने का भार है और जिनके संरक्षण में रहकर वे ट्रेनिंग लेने आई हैं वे उन्हें सैक्स ट्रेनिंग देने को लालायित हैं। ये कामान्ध अध्यापक, एक नहीं, दो नहीं, पूरे छह, इन्हें अपनी छात्राएँ कम व अपनी वासना का खिलौना अधिक मानते रहे। समाचार पत्रों में ५ फरवरी २००८ से इस विषय में लज्जाजनक समाचार आते रहे हैं।


बहुत से शिक्षाविद् यह मानते हैं कि केवल वार्षिक परीक्षा छात्रों की क्षमता का सही आंकलन नहीं करती। वर्ष भर छात्रों के द्वारा कक्षा में की गई मेहनत, गृहकार्य, कक्षा में प्रतिदिन दिए गए उत्तर व टेस्ट में लिए गए अंक आदि छात्र का बेहतर आंकलन करते हैं। इसकी अपेक्षा वार्षिक परीक्षा में कोई भी कक्षा में अनुपस्थित रहने वाला,सोने वाला या ऊधमी छात्र भी अन्तिम दिनों में घोटा लगाकर या नकल करके अच्छे अंक पा सकता है। इसीलिए बहुत से संस्थानों में आंतरिक मूल्यांकन का प्रावधान रखा जाता है। इसका दुरुपयोग अपने प्रिय छात्र को अधिक अंक देने के लिए किया जा सकता है यह तो कल्पना की जा सकती है। किन्तु छात्राओं के साथ बलात्कार, यौन उत्पीड़न के लिए किया जा सकता है यह तो किसी ने दुःस्वप्न में भी नहीं सोचा होगा। यहाँ आंतरिक मूल्यांकन ५ या १०% ना होकर ४५ % थी। यह इतनी अधिक है कि छात्राओं को अच्छे अंक देने का प्रलोभन और उससे प्राप्त होने वालीसरकारी प्राइमरी स्कूल में नौकरी का प्रलोभन या खराब अंक देने का भय दिखाकर अध्यापक अपनी मनमानी करते रहे और किसी को भी पता नहीं चला। यहाँ अध्यापकों ने घिनौनेपन की सारी सीमाएँ पार करते हुए जो किया वह देख तो शायद पॉर्न निर्माता भी दाँतों तले उँगली दबा लें।


यहाँ छात्राओं को कूट शब्द सिखाए जाते थे और सलाह दी जाती थी कि ये शब्द वे अपनी वरिष्ठ छात्राओं से सीखें। प्रत्येक कूट शब्द जैसे, चाय, कॉफी, भोजन, ओ के, TLM ( Teaching Learning Material) का कोई विशेष अर्थ होता था जिसका वे कक्षा में बेबाकी से उपयोग करते रहते थे। विज्ञान का अध्यापक कक्षा में कहता था कि कुछ TLM(अन्तः वस्त्र ) दिखाओ तो मैं तुम्हें अच्छे अंक दूँगा। छात्राओं को चाय, कॉफी,ओ के व भोजन (जिनका यह अर्थ बिल्कुल नहीं था ) का निमन्त्रण अधिक अंक पाने के लिए दिया जाता था। वहाँ कम्प्यूटर कक्ष इनकी विलासिता व अमानवीय ढंग से यातना देने का केन्द्र बना हुआ था। जाँच के दौरान कम्प्यूटरों में प्रचुर मात्रा में पॉर्न सामग्री जो छात्राओं को दिखाई जाती थी मिली।


इन अध्यापकों का भाँडाफोड़ तब हुआ जब एक १९ वर्षीया, शायद तब १८ वर्षीया छात्रा बार बार बेहोश होने लगी। यह छात्रा गरीब, दलित, भूमिहीन कृषि मजदूर की पांच संतानों में से एक थी। ९ नवम्बर २००८ से इस छात्रा का चार बार छह अध्यापकों द्वारा सामूहिक बलात्कार हुआ था। उसे धमकाया जाता था कि उनकी बात न मानने पर उसे अनुत्तीर्ण कर दिया जाएगा। उसकी मानसिक व शारीरिक बुरी हालत के कारण उसकी सहपाठिनों को उसके बलात्कार की बात उससे पता चली। ३१ जनवरी को छात्राओं ने अपने अध्यापकों के विरुद्ध लिखित शिकायत कॉलेज अधिकारियों को दी। ४ फरवरी को एक छात्रा ने फोन करके अपने तथा बहुत से अन्य अभिभावकों को कॉलेज बुलाया। जब उन्हें सारी बात पता चली तो उन्होंने अध्यापकों की जमकर पिटाई की और उन्हें पुलिस को सौंप दिया। ५ फरवरी को यह समाचार समाचार पत्रों में आया।


यह केस एक विशेष फास्ट ट्रैक सेशन कोर्ट में ले जाया गया। यहाँ गवाही देते समय व वकील द्वारा क्रॉस एक्ज़ामिनेशन के दौरान यह छात्रा दो बार बेहोश हो गई। चार्जशीट में ३७ छात्राओं के बयान भी हैं। ६ मार्च २००९ यानि लगभग १३ महीने में माननीया सुश्री न्यायाधीश एस सी श्रीवास्तव ने इन छह अध्यापकों को आजीवन कारावास की सजा व १०,००० रुपए पीड़िता को देने का आदेश दिया।


यह न्याय पीड़िता के शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक घावों को भर नहीं सकता परन्तु देश में न्याय है व साहस से अपनी लड़ाई लड़ने से और कुछ नहीं तो वहशियों को दंडित करसलाखों के पीछे पहुँचाया जा सकता है, यह सांत्वना और विश्वास तो देता ही है। अब कम से कम यह आशा तो की जा सकती है कि हमारी बच्चियों का शोषण करने वालों में से जैसे छह को अपनी सही जगह पर पहुँचाया गया वैसे ही ऐसे अन्य अपराधियों को भी पहुँचाया जाएगा।


इस पूरे प्रकरण में सबसे अधिक दिल दहला देने वाली घृणित बात जो है वह यह है कि इन वहशियों ने छात्राओं पर अपने नियन्त्रण का दुरुपयोग कर अपने अध्यापक जैसे सम्मानित पद व छात्राओं व समाज के विश्वास का भी बलात्कार किया। एक लड़की या स्त्री सड़क पर चलते हुए अपने पर होने वाले हमले के प्रति संशकित व जागरुक रहती है। जब यह हमला घर में पिता, भाई, संरक्षक या विद्यालय में अध्यापक ही जिनपर उसका अटूट विश्वास होता है, कर दें तो वह कैसे बच सकती है? ऐसे में यह केवल स्त्री का ही नहीं, विश्वास व समाज की नींव का ही नृशंस बलात्कार है। शायद ये आततायी हत्यारों से भी गए गुजरे हैं।


क्या कोई उस असहाय किशोरी की मनोदशा की कल्पना कर सकता है? कैसे वह तिल तिलकर प्रतिदिन अन्दर ही अन्दर थोड़ा थोड़ा मरती होगी। कैसे वह अगले दिन उनकी कक्षा में जाने का साहस जुटा पाती होगी। जिस अध्यापन को उसने अपने जीवन का लक्ष्य बनाया था उसी में इतनी क्रूरता व गंदगी देख उसके हृदय पर क्या बीतती होगी।


प्रश्न अनेक हैं। क्या छात्राओं के कॉलेज में कुछ अध्यापिकाएँ नहीं होनी चाहिएँ थीं? क्या हमारे प्रदेश में अध्यापिकाओं की कमी है? यदि है तो देश के अन्य भागों से उनकी नियुक्ति करना क्या असंभव था? क्या हमारी बच्चियों को आदमखोरों के हवाले इतनी सुगमता से किया जा सकता है?


यह लेख एक वर्ष पहले भी लिखा जा सकता था परन्तु सबकुछ इतना अविश्वनीय था और मैं अपराध सिद्ध होने की प्रतीक्षा कर रही थी। अभी भी यही कामना है कि कोई निर्दोष दोषी ना सिद्ध हुआ हो। किन्तु इतनी छात्राओं ने उनके विरुद्ध गवाही दी है। कम्प्यूटर में सबूत मिले हैं। फिर भी अपनी तरफ से समाचार पत्रों द्वारा दिए गए तथ्यों के आधार पर यह लेख लिखा है। यदि कोई गल्ती हुई हो तो अनजाने में ही हुई है, जानबूझकर या नमक मिर्च लगाने के उद्देश्य से नहीं। 


माता पिता से विनती करती हूँ कि अपनी बच्ची/ बच्चे को सिखाएँ कि कोई भी स्पर्श या बात यदि उन्हें असहज करे तो वे उसका विरोध करें व माता पिता को बताएँ। छोटी हरकतों से ही ऐसी प्रवृत्ति के लोग बड़ी हरकतों पर उतर आते हैं। उन्हें आरम्भ में ही रोकने व उनसे प्रश्न करने से उनकी हिम्मत शायद इतना आगे बढ़ने की न हो पाए। किसी पर भी इतना विश्वास न करें कि वह उनका अनुचित लाभ उठा सके। आज न तो लड़कियाँ सुरक्षित हैं न छोटे लड़के।


आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर पीड़िता व अन्य छात्राओं को बधाई व शुभकामनाएँ! भविष्य में भी वे ऐसे ही साहस के साथ अन्याय के विरुद्ध लड़ें व अच्छी अध्यापिकाएँ सिद्ध हों यही कामना करती हूँ।


----यह लेख घुघुती बासूती से साभार 

अंतराष्ट्रीय महिला दिवस - खुशी मनाएँ या गम

  

राजकिशोर 

सामाजिक मामलों में खुशी और गम का अद्भुत मिलान होता है। पंद्रह अगस्त औरछब्बीस जनवरी की तरह अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस भी एक मुट्ठी में खुशी और दूसरी मुट्ठी में गम लेकर आता है। अगस्त और जनवरी के पर्व हमारे पुरखों के संघर्ष की यादगार बन कर आते हैं और हमें स्वाधीनता संघर्ष के मूल्यों और आदर्शों की याद दिलाते हैं। वह समय इतना दूर भी नहीं था कि उसकी अनुगूंजें हमें झंकृत न कर दें। देश में अभी भी ऐसे हजारों लोग जीवित हैं जिन्होंने इस संघर्ष में हिस्सा लिया था और अपना बहुत कुछ गंवाया था। यही वजह है कि स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर देश की उपलब्धियों का मूल्यांकन करते समय हमारा मन उदास हो जाता है। हमें लगता है कि हमारे साथ धोखा हुआ है और इन दोनों दिवसों पर होनेवाले समारोह बिलकुल रस्मी हैं। 

क्या अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का चरित्र भी कुछ ऐसा ही है? जब राष्ट्र संघ ने हर साल 8 मार्च को विख्ा महिला दिवस के रूप में मनाने का निर्णय किया, तब तक दुनिया भर में स्त्री चेतना का संघर्ष एक निर्णायक दौर तक पहुंच चुका था। लेकिन इस संघर्ष को पश्चिमी देशों में जैसी सफलता और मान्यता मिली, वह विश्व के अन्य भूखंडों में रहनेवाली आधी आबादी को नहीं मिल सकी। जहां तक हमारे अपने देश का सवाल है, हमने अपने संविधान में स्त्रियों को पुरुषों के बराबर जगह देने में जरा भी कृपणता नहीं की। हमारा संविधान बनानेवालों ने उन परिस्थितियों में जितना आदर्श संविधान बनाना संभव था, उसकी पूरी कोशिश की। उस विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उन महानुभावों की थी, जिन पर इस दस्तावेज को लागू करने की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी थी। था। यह काम कितना हुआ और कितना नहीं हुआ, यह हमारे सामने है। किसी भी देश के सांस्कृतिक विकास को आंकने का यह एक विश्वसनीय पैमाना हो सकता है कि वहां स्त्रियों की हालत कैसी है। इस मामले में हम भारतीय अपने आप पर बहुत ज्यादा इतरा नहीं सकते।

यही कारण है कि भारत में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस स्त्रियों का कोप दिवस बन जाता है। वे तरह-तरह के तथ्य और आंकड़े जुटा कर यह साबित करती हैं कि देखो, आज भी हमारे साथ कितना अन्याय हो रहा है। इस दिन हर मुखर स्त्री समाज के विरुद्ध अपने एफआईआर को फिर से लिखती है और उसमें नई घटनाएं जोड़ती है। महिला दिवस पर गाना-बजाना कम होता है और दुखड़ा ज्यादा रोया जाता है। यह स्वाभाविक भी है। साल भर में हम जितनी समस्यओं से फारिग होते हैं, उससे ज्यादा नई समस्याएं पैदा हो जाती हैं। इसलिए भारत में नारी संघर्ष के कम से कम दो चेहरे हैं। एक चेहरा मध्यवर्गीय महिलाओं का है, जिसकी मुख्य मांग आजादी की है। वह अपने शरीर को लेकर, अपनी आत्मा को लेकर और अपनी पारिवारिक तथा सामाजिक भूमिका को लेकर बहुत ही सचेत हैं और अपने सारे अधिकार हासिल करना चाहती है। दूसरा चेहरा ग्रामीण महिलाओं या शहर में रहनेवाली गरीब महिलाओं का है। उनके लिए स्वतंत्रता से ज्यादा मूल्य दैनंदिन जीवन की सुविधाओं का है। उन्हें देह की आजादी से ज्यादा प्यारी है कई किलोमीटर दूर से पानी लाने और ढिबरी या लालटेन की मद्धिम रोशनी में चूल्हा-चौका करने के बोझ से आजादी।

वे मूर्ख या पागल हैं जो इन दोनों आजादियों को एक-दूसरे के विकल्प के रूप में देखते हैं। जीवन में इस तरह का बंटवारा नहीं होता और न चलता है। यही कारण है कि भारत में महिला आंदोलन तेज नहीं हो पा रहा है। ऐसा लगता है जैसे स्त्रियों के दो अलग-अलग लोक हैं और उनके बीच कोई संवाद नहीं है। मध्यवर्गीय औरत अपने लिए जिन स्वतंत्रताओं की मांग करती हैं, वे सभी स्वतंत्रताएं गरीब औरतों को भी चाहिए और उन्हें भी तुरंत चाहिए - कल या परसों नहीं। लेकिन इन स्वतंत्रताओं का उपभोग एक ऐसे ढांचे में ही किया जा सकता है जिसमें मूलभूत भौतिक स्वतंत्रताएं सभी को हासिल हों। सच तो यह है कि आर्थिक सुरक्षा की चिंता भारत की मध्यवर्गीय महिलाओं के लिए भी उतना ही बड़ा मुद्दा है जितना निर्धन महिलाओं के लिए। कोई औरत नौकरी करने जाती है, महज इससे यह अनुमान नहीं कर लेना चाहिए कि उसे आर्थिक सुरक्षा प्राप्त हो गई है। असली सवाल यह है कि वह जो पैसा कमा रही है, उसे खर्च करने का अधिकार किसके पास है। हमारे परिवारों में अभी भी लोकतंत्र नहीं है। लोकतांत्रिक माहौल बनाए बिना परिवार में या समाज में किसी भी वर्ग के वास्तविक अधिकारों की रक्षा नहीं की जा सकती।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर शहरों में और मीडिया में तरह-तरह के रंगारंग आयोजन होते हैं तथा धरना-प्रर्दानों का तांता लग जाता है, लेकिन कोई भी समूह अपने शहर की वेश्या टोलियों में जा कर उन औरतों को मुक्त कराने के बारे में नहीं सोचता जो शोषण और दमन की सबसे बुरी शिकार हैं? यहां शहरी और ग्रामीण को कोई भेद नहीं रह जाता। ये औरतें पेशा तो शहरों में करती हैं, पर भगाई और उठाई गांवों और कस्बों से जाती हैं। यह औरतों का तीसरा वर्ग है, जिसके प्रति औरतों के बाकी दोनों वर्गों में पूर्ण उदासीनता देखी जाती है।

इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर एक प्रयोग किया जाना चाहिए। पुरुषों को, पितृसत्तात्मकता को और व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करने के बजाय महिला समूह अपनी अभी तक की गतिविधियों पर विचार करें और अपने विश्वासों का वस्तुपरक परीक्षण करें। सिर्फ मांगने से जो मिलता है, वह अकसर सांकेतिक होता है, वास्तविक नहीं। इसी तरह, मांग रखनेवालों को तभी कुछ हासिल होता है जब उनमें कुछ दम हो। सवाल है यह दम कैसे हासिल किया जाए। इसके लिए साफ समझ, आत्मीय सामूहिकता और संघर्ष का ठोस कार्यक्रम होना चाहिए।

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आज के दिन हिन्दी ब्लॉग जगत मे महिला दिवस सम्बन्धी विविध पोस्ट -

आज महिला दिवस पर हत्या,बलात्कार के विरुद्ध धरना 

पुरुष की घबराहट का प्रतीक है महिला

महिला दिवस पर महिलाओं की भारतीय क्रिकेट टीम का तोहफा

नारी आखिर क्या?महिला दिवस से पूर्व चर्चा 
और इन्तज़ार है
सीता सेना के गेटवे ऑफ इंडिया पर आज के प्रदर्शन का।

Saturday, March 7, 2009

रूढ़ियों की जकड़बन्दी तोड़ती नारियाँ (अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की पूर्व संध्या पर)

इनकी शक्लो-सूरत और हैसियत पर मत जाईये। ये न तो फेमिनिस्ट के रूप में नारी आन्दोलनों से जुड़ी हैं और न पश्चिमी देशों की उन नारियों की तरह है जो स्वतंत्रता के नाम पर अपनी छाती उघाड़कर प्रदर्शन करती हैं। न ही इनके साथ किसी बड़े घराने या काॅरपोरेट जगत या राजनैतिक दल का नाम जुड़ा हुआ है और न ही ये कोई बड़े-बड़े दावे करती हैं। ये वो महिलायें हैं जो हमारे पास-पड़ोस की और हमारे बीच की हैं, जिनसे हम न जाने कितने बार रूबरू हुए होंगे पर हमंे उनकी खासियत का पता ही नहीं। एक लम्बे समय से धर्मशास्त्रों और रूढ़ियों के नाम पर इन्हें यही बताया जाता रहा कि फला काम तुम्हारे लिए वर्जित है और यदि तुम ऐसा करने का प्रयास करोगी तो तुम्हारे ऊपर अपशकुन व ईश्वरीय प्रकोप का खतरा मंडरायेगा। पर ये औरों से अलग हैं क्योंकि वर्जनाओं को तोड़कर एक अलग लीक बनाना ही इनकी खासियत है। पाश्चात्य सभ्यता के समर्थक कुछ लोगों को नारी स्वतंत्रता का रास्ता दैहिक वर्जनाओं को तोड़ने और उन्मुुक्तता में दिखा। नतीजन, गली-गली में कुकुरमुत्तों की तरह सौंदर्य प्रतियोगिताओं के आयोजन, माॅडल बनने की होड,़ फिल्मों में काम पाने हेतु सर्वस्व न्यौछावर कर देने वालों की बढती भीड़ .... पर समाज का यह वर्ग ऐसा है जो अभी भी सिर से पांव तक पूरे कपड़े पहने अपनी बौद्धिकता और जीवटता के दम पर समाज की रूढ़िगत वर्जनाओं को तोड़ने का साहस रखता है।

कर्मकाण्डों के लिये विख्यात बनारस की लड़कियों ने तमाम रूढ़िगत वर्जनाओं और परम्पराओं को बहुत पीछे धकेल कर कुछ नये मानदण्ड स्थापित किये हैं। कर्मकाण्ड का सबसे प्रमुख तत्व पुरोहिती है और पांडित्य में बनारस का कोई सानी नहीं। प्राचीन काल से ही यहाँ के पंडितों ने दुनिया भर में अपनी धाक जमाई है। प्राचीन काल में गार्गी ने यह प्रथा तोड़ी थी, पर अब पुरूष पुरोहितों की इस परम्परा को बनारस की लड़कियों ने तोड़ दिया है। तुलसीपुर स्थित पाणिनी कन्या महाविद्यालय से शास्त्री की परीक्षा उतीर्ण कई लड़कियाँ अब लोगों के विवाह करवा रही हैं और यह जरूरी नहीं कि वे ब्राह्मण ही हों। महाविद्यालय की आचार्या नंदिता शास्त्री बड़े गर्व से बताती हैं कि विवाह कराने के लिये उनकी छात्राओं को बनारस ही नहीं वरन् दूर-दूर से लोग आमंत्रित कर रहे हैं। हैदराबाद में बसी यहाँ की पूर्व छात्रा मैत्रेयी को वैदिक रीति से विवाह कराने के लिए अमेरिका तक से आमंत्रण आ चुके हैं। जब इन छात्राओं ने आरम्भ में यह कार्य आरम्भ किया तो इनका विरोध करने के लिए परम्परागत पंडितांे ने वर व कन्या पक्ष को शास्त्रों से उद्धरण देकर काफी भड़काया पर अब वही पंडित इन लड़कियों का लोहा मानने लगे हैं। कारण- मंत्रों का शुद्ध उच्चारण, उसकी सम्यक व्याख्या और वैवाहिक संस्कार की सभी रस्मों का पालन करवाने में लड़कियाँ परम्परागत पंडितों से कहीं आगे हैं। आम तौर पर कम पढ़े-लिखे पंडित विवाहों में शुद्ध मंत्र का उच्चारण तक नहीं कर पाते। अब ये छात्रायंे विवाह ही नहीं शांति यज्ञ, गृह प्रवेश, मंुडन, नामकरण और यज्ञोपवीत भी करा रही हंै। ऐसा नहीं है कि यह क्रांतिकारी बदलाव सिर्फ बनारस तक ही सीमित है वरन् देश के अन्य भागों में भी इस बदलाव को महसूस किया जाने लगा है। इलाहाबाद की स्वर्गीया गुलाबबाई त्रिपाठी ने भी इस क्षेत्र में अलख जगायी थी तो मात्र 30 साल की उम्र में कानपुर विद्या मंदिर डिग्री काॅलेज की प्राचार्या बनी डाॅ0 आशारानी राय वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच पुरोहिती का कार्य करती हैं। औद्योगिक महानगर कानपुर में उन्होंने जब छात्राओं को सार्वजनिक रूप से वेद पाठ आरम्भ कराया तो व्यापक विरोध भी झेलना पड़ा। यहाँ तक कि एक शंकराचार्य ने इसे वेद विरूद्ध तक घोषित कर दिया। पर आशारानी ने हार नहीं मानी और नतीजन आज उनकी तमाम छात्रायें कर्मकाण्ड कराने लगी हैं। डाॅ0 आशारानी राय ने डिग्री काॅलेज में बी0ए0 की छात्राओं के लिये व्यवसायिक संस्कृत वेद पाठ्यक्रम भी यू0जी0सी0 से मान्य कराया। हरदोई स्थित आर्य कन्या इण्टर काॅलेज से सेवानिवृत्त होकर सामाजिक कार्यों से जुड़ी सुधा भी वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच पुरोहिती का कार्य करती हैं।हरिद्वार में कनखल स्थिति माँ योग शक्ति धाम की अधिष्ठाता माँ योग शक्ति ने अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल की साध्वी माँ ज्योतिषानन्दन को जगद्गुरू शंकराचार्य के समकक्ष पार्वत्याचार्य की उपाधि से अलंकृत किया तो गुस्साये साधु सन्तों ने किसी महिला को यह उपाधि देने के विरोध में जमकर हंगामा किया।

सिर्फ घरेलू कर्मकाण्डों तक ही क्यों, माता-पिता के अंतिम संस्कार से लेकर तर्पण और पितरों के श्राद्ध तक करने का साहस भी इन लड़कियों ने किया है, जिसे महिलाओं के लिए सर्वथा निषिद्ध माना जाता रहा है। संयोग से इसकी शुरूआत भी कर्मकाण्डों के लिये विख्यात बनारस से ही हुई। इस दिशा में सुनीति गाडगिल ने अलख जगाई जिन्होंने विवाह, पूजा, यज्ञ आदि करवाने में ही भूमिका नहीं निभाई वरन् श्राद्ध कर्म भी करवाकर मिसाल कायम की। बनारस के ही पाण्डेयपुर क्षेत्र की निवासी तनू उर्फ वन्दना जायसवाल, मंडुवाडीह की लक्ष्मीणा देवी, नगर निगम के सफाईकर्मी रहे गोलगड्ढा निवासी मुन्ना की विधवा बीदा देवी और भेलूपुर की महिला चित्रकार और विदेश में कला की प्रोफेसर रहीं डाॅ0 अलका मुखर्जी ने परिवार में किसी अन्य पुरूष सदस्य के न रहने पर अपनी माँ, पिता और पति का अंतिम संस्कार धार्मिक क्रियाओं के बीच विधिवत सम्पन्न किया। वन्दना जायसवाल ने घंट इत्यादि बाँधकर नित्य घाट पर अपनी माँ का तर्पण भी किया। अब तो इस सामाजिक बदलाव की बयार का असर देश के अन्य भागों में भी दिखाई पड़ने लगा। तभी तो कानपुर की डाॅ0 आशारानी राय और हरदोई की सुधा महिलाओं के लिए सर्वथा निषिद्ध श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार सम्पन्न कराने से नहीं हिचकतीं। अपने पिता और श्वसुर का अंतिम संस्कार भी स्वयं उन्होंने ही सम्पन्न किया। यही नहीं कुछेक समय पहले तक प्रयाग के रसूलाबाद घाट पर महाराजिन बुआ नामक महिला श्मशानघाट में वैदिक रीति से अंतिम संस्कार सम्पन्न कराती थीं। राजस्थान के भीलवाड़ा में एक 72 वर्षीया विधवा की मृत्यु पर उसकी सात बेटियों ने मिलकर अर्थी को कंधा दिया तथा अंतिम संस्कार के लिये चिता को मुखाग्नि दी और पिण्डदान किया। परिवार में बेटों के न होने पर लोगों ने बड़े दामाद से मुखाग्नि दिलवाने का प्रयास किया पर सातों बेटियों ने कहा कि- ‘‘उनकी माँ ने बेटा न पैदा होने पर बेटियों को ही बेटों की तरह पाला तथा किसी भी तरह की कमी नहीं होने दी।’’ हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले की दलित महिला प्रेमी देवी ने तो अपने पति की अर्थी को बेटों को कन्धा तक नहीं लगाने दिया और अर्थी को कंधा देने की जिद करने पर उन्हें धक्के मारकर घर से निकाल दिया। उसने कहा कि मेरे पति के जिन्दा होने पर इन बेटों ने कभी हमारी सेवा नहीं की और न ही रोजमर्रा के खर्च के लिये कोई इन्तजाम किया और ऐसे में पति का निर्देश था कि- ‘‘इन अवारा कलयुगी बेटों को मेरी अर्थी में कंधा न लगाने दिया जाये।’’ अंततः अर्थी को दोनों बहुओं व पड़ोस की दो अन्य औरतों ने कंधा दिया और मुखाग्नि उसके चार पोतों ने दी। धार्मिक मान्यताओं पर विश्वास करें तो अंतिम संस्कार कोई भी सम्पन्न करा सकता है किन्तु अदृश्य की उत्पत्ति का अधिकार शास्त्रों में पुत्र और पौत्र के अलावा राजा व ब्राह्मण को ही होता है। भले ही धर्म के पुरोधा मानंे कि शवदाह के बाद का काम ब्राह्मण ही करेगा वरना आत्मा भटकेगी और अगले जन्म में शरीर का अंग-प्रत्यंग भी ठीक-ठाक नहीं होगा पर इन महिलाओं की मानें तो यह पुरूष प्रधान पितृसतात्मक समाज की सोच है जो सारे पुण्य अकेले ही लूटना चाहता है। हिमाचल प्रदेश की घटना समाज के सामने यह भी सवाल खड़ा करती है कि अपने माँ-बाप की देखरेख न करने वाले बेटों को धार्मिक मान्यताओं के नाम पर माँ-बाप की अर्थी में कंधा देने का क्या नैतिक अधिकार है? निश्चिततः उस निरक्षर दलित महिला ने इसी बहाने माँ-बाप के प्रति संतानों को दायित्व बोध का पाठ भी पढ़ाया।

याद कीजिये ‘बीबी हो तो ऐसी’ फिल्म में नायिका रेखा का घोड़ी पर सवार होकर दूल्हे के द्वार बारात ले जाना। इस फिल्मी कथानक को भी लड़कियों ने हकीकत में बदल दिया। संयोग से इसकी शुरूआत भी कर्मकाण्डों के लिये विख्यात बनारस से ही हुई यानी भोलेनाथ की नगरी में गंगा एक बार फिर उल्टी बही। इस सब के पीछे कश्यप फिल्म एण्ड टेलीविजन रिसर्च इन्स्टीट्यूट के निदेशक डा0 डी0एल0कश्यप की प्रमुख भूमिका रही, जिन्होंने अपने तीन बेटों और दो बेटियों के हाथ बनारस के घमहापुर गाँव में एक साथ एक ही मण्डप में पीले किये। अभी तक दहेजलोलुप दूल्हों को लड़कियों द्वारा विवाह मण्डप से बाहर निकालने या शराबी दूल्हे के साथ विवाह करने से इन्कार करने जैसे उदाहरण ही सामने आये हैं पर परम्पराओं को दरकिनार करते हुए डा0 कश्यप के तीनों बेटों से विवाह करने उनकी दुल्हनें घोड़ी पर सवार होकर मय बारात उनके दरवाजे आयीं जहाँ दूल्हे के पिता ने बहुओं की आगवानी की तथा उन्हें घोड़ी से उतारकर उनका पाँव पूजा। जबकि परम्परा है कि लड़की का पिता दूल्हे का पाँव पूजता है। प्रतीकात्मक द्वारपूजा के बाद दुल्हनों को मंच पर महाराजा कुर्सी पर बिठाया गया और फिर दूल्हे राजा मंच पर आये। लड़की वालों की ओर से निभाये जाने वाले सभी रस्मोरिवाज लड़कों के पिता ने पूरे किये। इस विवाह में न तो कोई मंत्र पढ़ा गया और न ही सात फेरों के साथ कसमें खायी गयीं, अपितु सिर्फ जयमाल व सिन्दूरदान हुआ। इसी प्रकार जयपुर में कानून की छात्रा रही दो जुड़वा बहनें अपनी शादी के अवसर पर निकाली जानेवाली ‘बिन्दौरी’ में घोड़ी पर सवार होकर निकलीं। उनका मानना था कि- ‘‘यह क्रांतिकारी कदम दर्शाता है कि हमारे समाज में लड़के-लड़कियों में कोई भेद-भाव नहीं है।’’ उ0प्र0 के जौनपुर में जब शादी पश्चात एक लम्बे समय तक पति अपनी विवाहिता को लेने नहीं पहुँचे तो कुछेक लड़कियाँ खुद ही बारात (गौना) लेकर पतियों के दरवाजे पहुँच गयीं।

सामान्यतः शादी योग्य लड़कियांे के लिये लड़के ढूँढ़ने का काम पुरूष वर्ग का माना जाता रहा है पर लखनऊ के अमीनाबाद में रहने वाली नीलम पाण्डे 1996 से इस कार्य को सहजता के साथ कर रही हैं और अब तक उन्होंने सैकड़ों शादियाँ करवाई हैं। नीलम बेबाक रूप में स्वीकारती हैं कि- ‘‘वर्तमान परिवेश में शादी को लेकर सबसे बड़ी समस्या यह है कि दस काबिल लड़कियों पर मुश्किल से एक लड़का ढूँढ़ने पर मिलता है।’’ शायद यही कारण है कि तमाम लड़कियों ने अब अयोग्य वरों को शादी के मण्डप से बाहर निकालना आरम्भ कर दिया है। दुल्हन के वेश में सजी-धजी बैठी ये लड़कियाँ किसी ऐसे व्यक्ति को जीवन साथी के रूप में नहीं चाहती, जो उनको व उनके परिवार को प्रतिष्ठाजनक स्थान न दे सके या दहेज की आड़ में धनलोलुपता का शिकार हो। अब तो कुछ ऐसे भी मामले सामने आ रहे हैं, जहाँ लड़की ने कलयुग में स्वयंवर रचा कर वर चुनने की आजादी ली हो। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के घुमका गाँव में 8 जुलाई 2008 को एक लड़की अन्नपूर्णा ने स्वयंवर द्वारा अपना पति चुना। 8वीं पास 22 वर्षीया अन्नपूर्णा द्वारा स्वयंवर रचा कर वर चुनने की योजना का शुरू में समाज में काफी विरोध हुआ लेकिन समाज की परवाह किए बिना वह अपने रास्ते चलती रही। आखिरकार समाज भी साथ हो गया। स्वयंवर के प्रचार के लिए बाकायदा इलाके में पोस्टर लगाए गए और पास-पड़ोस के गाँवों में डुग्गी और लाउडस्पीकर के जरिए भी लोगों को इसकी जानकारी दी गई थी। स्वयंवर में शामिल होने वाले युवाओं की अधिकतम उम्र 26 साल तय की गई थी। अन्नपूर्णा से विवाह के इच्छुक लोगों को उसके पाँच धार्मिक सवालों का जवाब देना था। हल्बा आदिवासी समुदाय के युवकों को ही इसमें शामिल होने की अनुमति थी। स्वयंवर में केवल तीन युवक ही शामिल हुए। इनमें मात्र 12वीं पास और पेशे से किसान घनाराम नामक व्यक्ति ने स्वयंवर में पूछे सभी पाँच सवालों के सही जवाब दिये और अन्नपूर्णा ने इस व्यक्ति को जीवन साथी के रूप में चुना।

वक्त के साथ पुरानी परम्परायें टूटती हैं और नयी परम्परायें स्थापित होती हैं। आंध्रप्रदेश का तिरूपति बालाजी मंदिर पूरे विश्व में विख्यात है और हर दिन यहाँ बेशुमार लोग भगवान बालाजी कोे अपने केश अर्पित करने आते हैं। इनमें अच्छी खासी तादाद महिलाओं की होती है और एक लम्बे समय से मंदिर में महिला मुण्डनकर्मियों को बिठाने की माँग उठती रही है। 31 मार्च 2005 को एक लम्बे संघर्ष बाद नाईनों को यहाँ नियुक्त करने का फैसला किया गया। इसके बाद तो इस निर्णय को भी धार्मिक आस्थाओं से जोड़कर देखा जाने लगा और तर्क दिया गया कि- ‘‘प्रतीकात्मक रूप से स्त्रियाँ देवी लक्ष्मी की प्रतिनिधि हैं इसलिए उन्हें मुण्डन कर्म नहीं करना चाहिए क्योंकि यह कृत्य उनकी दरिद्रता को दर्शाता है।’’ पर नाईनों ने हार नहीं मानी और तर्क दिया कि इस कार्य से उन्हें रोजगार मिलेगा और उनकी दरिद्रता व गरीबी दूर हो सकेगी। यही नहीं कर्म के आधार पर पुरूष नाईयों से अपने को कमतर नहीं आंकने वाली इन महिलाओं ने यह भी कहा कि उनसे बाल उतरवाने वाली महिलायें अपने को ज्यादा सहज महसूस कर सकेंगी।

राजस्थान सदैव से सामंती समाज माना जाता रहा है पर उस सामंती समाज की विधवाओं ने उन अमानवीय सामाजिक रूढ़ियों को दुत्कारने का साहस दिखाया है, जहाँ सती प्रथा जैसी बुराईयों के महिमामण्डन के जरिये विधवाओं से जीने का हक तक छीना जाता रहा है। यह वही राजस्थान है जहाँ 1987 में देवराला सती काण्ड के दौरान सती रूपकँवर के चबूतरे पर चूड़ियाँ और सिन्दूर चढ़ाने की स्त्रियों में होड़ सी मची थी। अब उसी राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में ‘एकल नारी शक्ति संगठन’ के नेतृत्व में वैधव्य जीवन जी रही हजारों स्त्रियों ने उन साज-श्रंृगारों का इस्तेमाल करना आरम्भ कर दिया है जो विधवा होते ही समाज उनसे छीन लेता है। हाथों में मंेहदी, कलाईयों में रंग-बिरंगी चूड़ियाँ, माथे पर बिंदिया और खूबसूरत परिधानों के साथ ये विधवायें मांगलिक कार्यों में भी बढ़-चढ़ कर अपनी सहभागिता दर्ज करा रही हैं।

मुस्लिम समुदाय में जहाँ काजी का काम पुरूष के बूते का ही माना जाता रहा है, एक नारी ने पुरूषों का वर्चस्व तोड़ दिया है। पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर जिले के गाँव नंदीग्राम की काजी शबनम आरा बेगम इस देश की पहली महिला काजी हैं। शबनम के काजी बनने की कहानी भी कम रोचक नहीं। अपने काजी पिता की सातवीं बेटी शबनम ने पिता के लकवाग्रस्त हो जाने पर निकाह कराने में उनकी मदद करना आरम्भ किया। शरीयत का अच्छी तरह इल्म हो जाने पर पिता जी ने उसे नायब काजी बना दिया। सन् 2003 में पिता जी की मौत के बाद शबनम ने अपने पैरों पर खड़े होने हेतु काजी बनने का रास्ता चुना और संयोग से काजी के रूप में उनका पंजीयन भी हो गया। पर काजी बनने के बाद शबनम की असली दिक्कतें आरम्भ हुयीं। अंततः धमकियों और मुकदमों के बीच शबनम अपने को काजी पद के योग्य साबित करने में सफल हुयीं।

21वीं सदी में जब महिलायें, पुरूषों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं, ऐसे में सामाजिक व धार्मिक रूढ़ियों की आड़ में उन्हें गौण स्थान देना जागरूक महिलाओं के गले नीचे नहीं उतर रहा है। यही कारण है कि ऐसी रूढ़िगत मान्यताओं और परम्पराओं के विरूद्ध उन्हीं क्षेत्रों से सामाजिक बदलाव की बयार चली है, जिन्हें इन रूढ़िगत कर्मकाण्डों का गढ़ माना जाता रहा है। इस सामाजिक बदलाव का कारण जहाँ महिलाओं में आई जागरूकता है, जिसके चलते महिलायें अपने को दोयम नहीं मानतीं और कैरियर के साथ-साथ सामाजिक परम्पराओं के क्षेत्र में भी बराबरी का हक चाहती हैं। वर्षों से रस्मो-रिवाज के दरवाजों के पीछे शर्मायी -सकुचायी सी खड़ी महिलाओं की छवि अब सजग और आत्मविश्वासी व्यक्तित्व में तब्दील हो चुकी है। आधुनिक महिलायें इस तर्क को बेबाकी से खारिज करतीं हैं कि पुण्य कमाने के क्षेत्र में ईश्वर ने पुरूषों को ज्यादा अधिकार दिये हैं। ऐसे तर्कों को वे पुरूष प्रधान पितृसतात्मक समाज की सोच मात्र मानती है। उनके लिये सवाल अब परम्पराओं का ही नहीं वरन् उनके कसौटी पर खरे उतरने का भी है। मात्र किसी धार्मिक गं्रथ के उद्धरणों के आधार पर नारी शक्ति को दबाया नहीं जा सकता। अब ये महिलायें पूछने लगी हैं कि पुण्य के कामों के समय हाथ पर बाँधा जाने वाला कलावा लड़कों के दायें और लड़कियों के बायें हाथ पर क्यों बाँधा जाता है, क्यों नहीं दोनों के एक ही हाथ पर बाँध दिया जाता है? यदि पूजा-पाठ या पुण्य के कार्य कराने के लिए जनेऊ धारण करना शास्त्रों में जरूरी माना गया है तो पुरोहित का कार्य करने वाली महिला जनेऊ क्यों नहीं धारण कर सकती? योग्यता चाहे वह पुरूष की हो अथवा महिला की- बराबर ही कही जायेगी। धर्म या परम्परा की आड़ में अतार्किक आधार पर स्त्रियों को तमाम सुविधाओं से वंचित करने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। कोई महिला यदि किसी क्षेत्र में जाना चाहती है तो मात्र इसलिए कि वह एक महिला है, उसको उस क्षेत्र में जाने से नहीं रोका जा सकता। आखिर अपनी पसन्द का क्षेत्र चुनने का सभी को अधिकार है। प्रख्यात ज्योतिषी के0ए0दुबे पद्मेश जैसे विद्वान भी इन छात्राओं के कदम से उत्साहित दिखते हैं और इससे प्रेरित होकर अपना उत्तराधिकारी किसी नारी को ही बनाना चाहते हैं। फर्क मात्र इतना है कि आजादी के दौर में भी कुछ महापुरूषों ने इन रूढ़िगत सामाजिक मान्यताओं के विरूद्ध आवाज उठायी थी पर अब महिलायें सिर्फ आवाज ही नहीं उठा रही हैं वरन् इन रूढ़िगत मान्यताओं को पीछे ढकेलकर नये मानदण्ड भी स्थापित कर रही हैं।
कृष्ण कुमार यादव