Thursday, April 30, 2009

बाबा दादी की आगे की कहानी

जो बीत गई -शकुन्तला दूबे की आत्मकथा

बाबा की ज़िद के चलते छोटी दादी दुल्हन बन कर ससुराल गईं। मँझली दादी उन पर सास बन कर शासन करने लगीं। मँझली दादी अपनी बहन को सौत बना कर अपने घर में ले तो आई थीं पर उन्होंने अपना पति छीनने के लिए मन से उसे कभी क्षमा नहीं किया। बहन के लिये लाड़-प्यार तो था, लेकिन सौतिया-डाह की फाँस कहीं कहीं दिल में चुभती रहती थी। वह हमेशा इस चिंता में रहती थीं कि पति और छोटी बहन के बीच कहीं अधिक अंतरंगता हो जाए और वह स्वयं हाशिये पर धकेल दी जाएं। कोशिश करतीं कि छोटी बहन पति के सामने कम-से-कम पड़े। वह अक्सर छोटी बहन को डाँटती-फटकारतीं, सतातीं। दुखी छोटी दादी में इतना साहस नहीं था कि वह किसी से अपनी व्यथा- कथा कह सकतीं।

एक बार किसी बात पर नाराज़ होकर मँझली दादी ने छोटी दादी को कमरे में बन्द करके बाहर से ताला लगा दिया और तीन दिन तक दिन-दिन भर बन्द रखा। छोटी दादी रोकर रह गईं पर बडी़ बहन को दया नहीं आई। उन दिनों बाबा सिर्फ़ खाने के समय घर के अंदर आते थे। आज के जैसा चलन नहीं था कि मर्द-औरत सब दिन भर घर में - जा रहे हैं। एक दिन उन्होंने पूछ ही लिया,

बाबू की मौसी कहाँ हैं? दो-तीन दिन से दिखाई नहीं दीं?”

होंगी यहीं कहीं,” मँझली दादी ने उत्तर दिया।

पास ही एक पुरानी नौकरानी खडी़ थी जो कुछ मुँहफट थी। वह बोली,

दिखाई कैसे देंगी? तीन दिन से कमरे में कैद हैं, ताले में बन्द। ढोर-डंगर के साथ भी ऐसा सुलूक नहीं किया जाता। छोटे मुँह बडी़ बात कर रही हूँ, पर बर्दाश्त नहीं हुआ तो बोल पड़ी।

बाबा खाना छोड़ कर खड़े हो गए। कड़क कर पत्नी से कहा,

चलो, ताला खोलो।''

मँझली दादी ने ताला खोल दिया। छोटी दादी का पहले से रो-रो कर बुरा हाल थ। सामने पति को देखा तो सिसक-सिसक कर रोने लगीं। माँ- बाप से छीन कर जिसे हठ कर के ले आए थे, उसकी दुर्दशा देख कर बाबा सन्न रह गए। उन्होंने तुरन्त निर्णय लिया कि दोनों पत्नियों की गृहस्थी अलग कर दी जाए। मकान के ऊपर की मंजि़ल में छोटी दादी का और निचली वाली में मँझली दादी का घर बना दिया गया और आदेश दे दिया गया कि ऊपर वाली बहू नीचे आएं, नीचे वाली ऊपर जाएं।

अब तो छोटी दादी बिल्कुल अकेली हो गईं। जो दीदी प्यार का आश्वासन देकर इस घर में लाई थीं, वह एकदम पराई हो गई थीं। नन्हे भान्जे को गोद में खिलाने का सुख भी हाथ से जाता रहा। दादी उसी से तो अपना दुख-सुख कहती थीं, भले ही वह कुछ समझता हो।

एक दिन छोटी दादी ऊपर की खिड़की से अपनी दीदी के आँगन में झाँक रही थीं। मँझली दादी आँगन में लगे बेल के पेड़ के नीचे खडी़ थीं। अचानक उनकी निगाह ऊपर खिड़की पर बैठी छोटी दादी पर पडी़। शायद बड़ी बहन का दिल घड़ी भर को पसीज गया। उन्होंने छोटी से कहा,

छोटी, मेरे सिर में बहुत जुएँ हो गई हैं। दरवाजा खोल दो तो मैं ऊपर जाऊँ। तुम मेरी जुएँ निकाल देना।

इतने दिनों बाद बहन के प्यार भरे शब्द सुन कर दादी निहाल हो गईं। उन्हें याद नहीं रहा कि इस बहन ने उन्हें किस-किस तरह प्रताड़ित किया था। फ़िर भी उन्होंने डरते हुए कहा कि पति गुस्सा करेंगे।

नहीं करेंगे,” बड़ी बहन ने आश्वस्त किया। प्यार और अपनेपन की भूखी दादी ने दरवाजा खोल कर बड़ी बहन को ऊपर बुला लिया। उनकी गोद से लेकर नन्हे बाबू को खूब प्यार किया। फ़िर बहन के जुएँ निकालने बैठ गईं। इत्तफ़ाक से उसी समय बाबा घर में गए। उनकी आज्ञा का उल्लंघन हुआ है, यह देख कर उनका खून खौल उठा। पति का रौद्र रूप देख कर मँझली दादी जल्दी से बच्चे को उठा कर नीचे उतर गईं। छोटी दादी कहाँ जातीं? उन्हें तो पति का कोपभाजन बनना ही था। बाबा ने आव देखा ताव, चट-चट कई तमाचे दादी के गालों पर जड़ दिये। पीठ पर ऐसे घूँसे मारे कि आहत दादी ज़मीन पर गिर पड़ीं। बहनों के बीच की डोर उस दिन हमेशा के लिए टूट गई। एक घर में रह कर भी जीवन भर वे अजनबियों की तरह रहीं।

क्या ज़िंदगी थी मेरी दादी की। माँ- बाप की दुलारी बेटी थीं, उनकी गोद छिन गई। बहन के प्यार का सहारा था, वह भी जाता रहा। बहुत बड़े जागीरदार से ब्याही गयी थीं, पर ज़बान तक नहीं खोल सकती थीं। पिंजरे में बन्द पंछी की तरह पंख फड़फडा़ कर रह जाना ही उनकी नियति थी।

एक दिन अचानक दो साल के बच्चे को छोड़ कर मँझली दादी स्वर्ग सिधार गईं। बाबा की अनुमति पाकर विषादग्रस्त छोटी दादी बड़ी बहन के अंतिम दर्शन के लिये नीचे आईं। बहन के निर्जीव पड़े शरीर को पकड़ कर बहुत रोईं, पर बहन तो अपनी दुख और प्रताड़ना भरी ज़िंदगी से बहुत दूर जा चुकी थी। बाबा ने बच्चे को दादी को थमा कर कहा,

अब इसकी माँ, मौसी सब तुम्हीं हो। इसका ख्याल रखना।

दादी ने बच्चे को सीने से लगा लिया।

कालांतर में दादी चार सन्तानों की माँ बनीं- सबसे बडी़ पुत्री, फ़िर तीन पुत्र। कुछ समय बाद फ़िर बाबा के मन में संसार से विरक्ति जागी। उन्होंने तय किया कि वह प्रयाग जा कर गंगा के किनारे साधना करेंगे। दादी सरयूबाग में अकेले कैसे रहतीं? वह बच्चों सहित प्रयाग में ही झूँसी की पाठशाला के ऊपर बने घर में रहने लगीं। बाबा ने एक छोटा सा कमरा पाठशाला से कुछ दूर अपनी पूजा-स्थली के रूप में बनवाया जिसे वह अपनी कु्टी कहते थे। वहाँ किसी को भी जाने की अनुमति नहीं थी, दादी को तो बिलकुल भी नहीं। बाबा का भोजन घर पर ही होता था, दिन भर में बस उतना ही समय वह परिवार के साथ बिताते थे।

जब बाबा-दादी की बेटी नौ वर्ष की थी तो वह बीमार पड़ी। बाबा निर्लिप्त थे, दादी ही नौकरों को भेज कर बेटी के लिये वैद्य, जडी़-बूटी आदि का इन्तज़ाम कर रही थीं। दवा से कोई फ़ायदा नहीं हो रहा था। एक दिन बच्ची बेहोश हो गई। दादी घबरा कर बाबा के पास पहुँचीं। बाबा ने अप्रसन्न होकर कहा,

मैंने मना किया था तुम्हें यहाँ आने के लिये?”

बिटिया बेहोश हो गई है, एक बार चल कर देख लीजिये,” दादी बोलीं।

तुम चलो, मैं आता हूँ,” बाबा ने कहा।

जब तक बाबा पूजा पूरी करके घर पहुँचे, सब समाप्त हो चुका था। बेटी इस दुनिया से विदा ले चुकी थी। लोगों ने देखा कि बाबा जैसे कठोर, निर्मोही इन्सान की आँखों से उस दिन आँसू झर रहे थे।

बाबा के कुल ग्यारह पुत्र थे- सात पुत्र बडी़ दादी से, एक पुत्र मँझली दादी से और तीन मेरी छोटी दादी से। ग्यारह भाइयों में सबसे बड़े का नाम था पंडित बद्री नारायण चौधरी 'प्रेमघन' वे हिन्दी के प्रसिद्ध कवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के समकालीन थे और उनके अच्छे मित्र भी। वे स्वयं भी अपने समय के प्रसिद्ध कवियों मे गिने जाते थे।

मँझली दादी का एक ही बेटा था जिसका पालन पोषण मेरी छोटी दादी ने किया था। मेरी छोटी दादी के तीन लड़के थे, बड़े ताऊजी, मँझले ताऊजी और सबसे छोटे, मेरे पिताजी, जिन्हें हम सारे भाई-बहन चाचाजी कहा करते थे।

दो अलग-अलग घरों मे पले-बढ़े होने के बावज़ूद सभी ग्यारह भाइयों में अच्छे सम्बन्ध थे और सब एक दूसरे के दुख-सुख में शामिल होते थे। दादी बताती थीं कि जब उनके बच्चे छोटे थे, तब भी बडी़ दादी के बेटे दादी से मिलने आया करते थे और अपने छोटे भाइयों को गोद में खिलाते थे। मेरी दादी को वे लोग छोटकी माई कह कर पुकारते थे। सौतेली माँ और भाइयों के लिये उनके मन में कोई दुर्भाव नहीं था। छोटी दादी के दो बड़े बेटों की शादियों में, जो कि झूँसी से हुई थीं, बडी़ दादी के सातों बेटे सम्मिलित हुए थे।

बाबा लगभग पूरा समय प्रयाग में रहने लगे थे। वह केवल कार्तिक मास में सरयू नहाने अयोध्या जाते थे। एक बार कार्तिक पूर्णिमा का स्नान करने जाते समय उन्होंने एक सुन्दर कन्या को देखा जो अपने परिवार के साथ स्नान के लिये आई जा रही थी। बाबा को लगा कि यह कन्या उनके सबसे छोटे अविवाहित बेटे से विवाह के लिये योग्य है। बाबा ने अपने आदमियों को भेज कर पता लगवाया कि कन्या कौन है, किस परिवार से सम्बन्धित है, वे लोग कहाँ के रहने वाले है, आदि। पता चला कि वह बलिया के मिश्रा परिवार की है और उसके पिता दरोगा हैं। बाबा ने दरोगाजी को बुलाने के लिये आदमी भेजा। दरोगा घबरा गये। बाबा का बहुत रुतबा था। इतना बड़ा आदमी मुझे क्यों बुला रहा है, उन्होंने सोचा। वहाँ जाने पर बाबा ने उनका स्वागत किया और उन्हें अपने पास कुर्सी पर बैठाया। दरोगाजी संकुचित भाव से बैठे। बाबा ने कहा,

मिश्राजी, मैं आपको समधी बनाना चाहता हूँ। मुझे आपकी बेटी का हाथ अपने सबसे छोटे बेटे के लिये चाहिये।"

उपाध्यायजी, आप सब तरह से मुझसे बड़े हैं। मैं सरकार का एक अदना-सा मुलाज़िम हूँ और आप एक तालुकेदार। मेरे आपके बीच बहुत अंतर है। मैं आपके बराबर कैसे खडा़ हो सकता हूँ?” मिश्राजी बोले।

सम्बन्ध व्यक्ति से होता है, उसकी हैसियत से नहीं। आपको कोई चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है। हमें आपकी बेटी पसन्द है और हमें सिर्फ़ आपकी बेटी चाहिये, और कुछ नहीं। अगर आपको स्वीकार हो तो हम विवाह की तैयारी करें?” बाबा बोले। दरोगाजी की प्रसन्नता का ठिकाना रहा।

तुरन्त पंडित बुलाये गये, लग्न देखी गयी और शादी की तारीख तय हो गई। और इस तरह मेरी माँ मेरे पिता की दुल्हन बन कर हमारे सरयूबाग वाले घर में गईं।

बाबा का मन परिवार से हट कर सन्यास की ओर खिंचता जा रहा था। इसी मनःस्थिति में एक दिन उन्होंने वकील को बुला कर अपनी सारी जायदाद मंदिर के नाम लिख दी। यह बात जब उनके पुत्रों को पता चली तो वे लोग बाबा से मिले और उनसे अपना फ़ैसला बदलने का आग्रह किया। बाबा सदा के ज़िद्दी थे, वह अपने हठ पर अटल रहे। हार कर बेटों ने पिता के खिलाफ़ कचहरी में मुकदमा दायर किया। मुकदमे के दौरान कचहरी से बाबा के लिये सम्मन आया। बाबा ने जाने से इन्कार कर दिया। कहा,

मैं सन्यासी हूँ। संसार का त्याग कर चुका हूँ। मैं कचहरी में नहीं जाऊँगा।"

अंततः कचहरी के जज, वकील, क्लर्क, वादी सभी झूँसी की पाठशाला आये और वहीं कचहरी लगी। बाबा मुकदमा हार गये इस आधार पर कि जायदाद उनकी अपनी अर्जित की हुई नहीं थी। विरासत में मिली सम्पत्ति का उपभोग करने का उनका हक था, उसे अपनी इच्छा से बाँटने या दान देने का नहीं। यह अधिकार अपनी कमाई हुई संपत्ति पर ही मिलता है। बाबा को अदालत का फ़ैसला मानना पड़ा।

बाबा लम्बी आयु पाकर दिवंगत हुए। उनके बाद उनकी सम्पत्ति उनके ग्यारह बेटों में बराबर-बराबर बाँट दी गई। बाबा के महाप्रयाण के बाद दादी सरयूबाग चली आईं और उन्होंने अपना शेष जीवन वहीं बिताया। हाँ, हर माघ महीने में वह प्रयाग जाया करती थीं। पाठशाला वाले घर मे रह कर कल्पवास करतीं और गंगा स्नान को जातीं। कार्तिक में सरयू स्नान और माघ में गंगा स्नान का सिलसिला उनके जीवन भर चला।

कई बार सोचती हूँ कि मेरी दादी का जीवन कितना कठिन था, कितना अन्याय उनके साथ हुआ। पति ने पहले तो ज़बर्दस्ती शादी करके उन्हें अपनी बहन की सौत बनने पर मजबूर किया, फ़िर बहन से अलग कर दिया और आखिर में सन्यास ले लिया। भगवान ने भी उन्हें बहुत दुख दिया। उनके जीवन काल में ही उनके चार बच्चों में से तीन को छीन लिया। फिर भी उनके मन में कोई कड़वाहट नहीं थी। उन्होंने उन सब को क्षमा कर दिया था जिनके कारण उन्होंने इतने कष्ट झेले थे। जिस दिन दादी का देहांत हुआ मैं उनके पास अकेली ही थी। साथ में एक नौकर और एक शिवरानी नाम की नौकरानी थे, बस। घर के बाकी सब लोग मँझली ताई के लड़के के तिलक समारोह में शामिल होने गाँव गए थे। दादी जाना नहीं चाहती थीं और हमेशा की तरह मैं उनके साथ रुक गई थी। मैं तब कोई बारह साल की थी और साथ की प्राइमरी पाठशाला में पढ़ती थी। जब मैं स्कूल जाने लगी तो दादी ने बताया कि उनके सीने में दर्द हो रहा है। मैंने उनसे पूछा "क्या मैं स्कूल जाऊँ?”

" नहीं, तुम स्कूल जाओ, अभी ठीक हो जाएगा। शिवरानी है मेरे पास," उन्होंने कहा।जब मैं शाम को स्कूल से लौटी तो मैंने पाया कि दादी की तबियत बहुत ज्यादा खराब थी। उनके गले से कुछ अजीब-सी आवाज़ निकल रही थी। मैं घबरा गई। मैंने जल्दी से जा कर पाठशाला में गुरूजी को खबर दी, वहाँ से सब लोग तुरंत ऊपर आए। दादी उस समय देख रही थीं पर वह बोल नहीं पा रही थीं। उनकी आँखों से आँसू गिर रहे थे। गुरूजी समझ गए कि दादी का अंत समय नज़दीक है। उस समय आसन्न-मृत्यु वाले मनुष्य को खुले स्धान में धरती पर लिटा दिया जाता था। इसलिए वह लोग दादी को बिस्तर सहित उठा कर आँगन में ले गए। आँगन में आते ही दादी के प्राण- पखेरू उड़ गए। दूसरे दिन चाचाजी दोपहर बाद तक अयोध्या पहुँच पाए। फिर शवयात्रा शुरू हुई। अर्थी के पीछे लंबा जुलूस था, गाँव के लोग, पाठशाला के अध्यापक और सारे विद्यार्थी। यह मृत्यु से मेरा पहला सामना था। जिनके साथ मैं हमेशा रही, वही दादी मुझे छोड़ कर इस दुनिया से चली गईं। आना-जाना तो इस संसार का शाश्वत नियम है, पर दादी के इस महाप्रयाण का मुझ पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। मुझे लगा कि मैं जैसे बिल्कुल निराश्रित हो गई हूँ। रात होने पर मुझे दादी का होना बहुत खलता। मुझे समझ में ही नहीं आता कि मैं दादी के बिना कहाँ सोऊँगी और कैसे सोऊँगी। क्यों चली गईं मेरी दादी? मैंने तो कोई ऐसा काम भी नहीं किया था कि वह मुझसे नाराज़ हो जाएं। वे तो मुझे अपने पास लिटा कर इतनी सारी बातें सुनाया करती थीं, मुझे इतना प्यार करती थीं, कहती थीं कि मेरा भाग्य बहुत अच्छा होगा। फिर भी दादी चली गईं। क्या यही अच्छा भाग्य था मेरा?