Monday, June 29, 2009

आओ उतारें दिमाग के जाले..

सूरत, पालमपुर, दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, छतरपुर....ये शहरों के नाम नहीं हैं। इन नामों से दर्द रिसता है आजकल। एक...दो...तीन...चार...पांच...सिलसिला जारी है. ईव टीजिंग, रेप, मर्डर... जिंदा जला देना, मारकर फेंक देना. एक ख़ौफ खत्म नहीं होता, एक का दर्द थमता नहीं कि दूसरी घटना तैयार. जिस देश में हर 27 मिनट में एक महिला रेप विक्टिम हो उस देश की स्त्रियों की सुरक्षा के बारे में आसानी से सोचा जा सकता है.

अब मुद्दे को $जरा पलटकर देखते हैं। लड़कियों का आकाश काफी बड़ा हो रहा है। लड़कियों को ढेर सारी आजादी मिल रही है. हर क्षेत्र में उनका वर्चस्व बढ़ता जा रहा है. हर परीक्षा में वे बाजी मार रही हैं. इससे बेहतर और भला क्या होगा?

एक बार फिर मामले का रुख़ पलटते हैं और देखते हैं समाज की प्रतिक्रिया - लड़कियों के साथ होने वाली घटनाओं के लिए वे खुद जिम्मेदार हैं. क्योंकि
- वे बेवक्त घर के बाहर घूमती हैं.
- ऐसी नौकरियों का चुनाव करती हैं जो उनके स्त्रीत्व के खिलाफ हैं.
- उनके कपड़े, रहन-सहन, रंग-ढंग सब उनके साथ होने वाली घटनाओं के लिए जि़म्मेदार हैं.
- वे खुद अपने खिलाफ माहौल तैयार करती हैं। मसलन, कहीं वे छोटे कपड़े पहनती हैं, कहीं वे ड्राइवर के साथ रात में अकेले निकल जाती हैं। कभी वे किसी के साथ हंसकर बातें करके उसे आमंत्रित करती हैं. यानी दोष उनका ही है, उनके साथ होने वाली दुर्घटनाओं के लिए.

यह आज का सच है. स्त्रियों की आ$जादी भी, हर पल होने वाली घटनाएं भी और उन घटनाओं पर आने वाली प्रतिक्रियायें भी. आज देश के हालात वो नहीं हैं, जो दस बरस पहले, बीस बरस या पचास बरस पहले थे. आज हालात बहुत बदल चुके हैं. सामाजिक स्तर से लेकर आर्थिक स्तर तक में परिवर्तन आया है. शिक्षा के स्तर में सुधार आया है. गर्ल एजुकेशन का प्रतिशत काफी बढ़ा है. प्रति व्यक्ति आय में खासी वृद्धि हुई है. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बा$जार की निगाहें हम पर लगी हुई हैं. कानूनों की स्थिति बेहतर हुई है. दहेज, संपत्ति का अधिकार, तलाक, लिव इन रिलेशनशिप जैसे कानूनों ने समाज को खुला न$जरिया दिया है जीने का, सोचने का. फिर भी...
जी हां, फिर भी क्या सचमुच न$जरिया खुला है? कम से कम मुझे तो ऐसा नहीं लगता. अगर ऐसा होता तो महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों के आंकड़े लगातार बढ़ न रहे होते. रेप केसेस की बढ़ी हुई संख्या सारी प्रगतिशीलता की चुगली करने के लिए काफी है. सड़कों पर निकलने वाली हर लड़की के कटु अनुभव प्रगतिशीलता की दुशाला तार-तार करने के लिए काफी हैं. कॉलेज कैम्पस में बढ़ती अभद्रता, अश्लीलता और गुंडागर्दी को रोकने के लिए लड़कियों के कपड़ों पर पाबंदी लगाने जैसे तुगलकी फरमान सारी आधुनिकताओं की असलियत सामने लाने के लिए काफी हैं.
स्त्रियों के साथ घटने वाली इन घटनाओं के बाद के बारे में की जाने वाली चर्चाएं भी काफी दहलाने वाली होती हैं. वे भी किसी अपराध से कम नहीं होती. आमतौर पर हर घटना के बाद कहीं न कहीं से स्त्री को ही कम$जोर सिद्ध करने की कोशिश की जाने लगती है.
अरे, वो तो थी ही ऐसी. उसके साथ यही होना था. भला बताइये, ऐसे कपड़े पहनकर घूमेंगी तो क्या होगा?
देर रात तक घूमेंगी (भले ही ऑफिस के काम से) तो और क्या होगा? ऐसे न जाने कितने अभद्र किस्म के दिल को चीरकर रख देने कमेंट्स हमारे बहुत आसपास से आते हैं. यानी पढ़े-लिखे समाज से. क्या पढऩा-लिखना सिर्फ डिग्रियां हासिल करना होता है?
दिमाग के जाले साफ हो सकें ऐसी कोई किताब कभी लिखी जायेगी क्या?
कब तक कोट, पैंट, टाई पहनकर सोलहवीं शताब्दी की सोच में जीता रहेगा यह समाज. क्या सचमुच कपड़ों में, व्यवहार में अश्लीलता होती है. कब तक अपनी कुंठाओं का ठीकरा स्त्रियों के सिर फोड़ा जाता रहेगा. सारी परंपराएं, नैतिकताएं, संस्कार, धर्म-कर्म, समाज की जिम्मेदारी स्त्रियों के सर पर कब तक लादी जाती रहेंगी?
$जरा पूछिये उनसे कि रेप या ईव टीजिंग का शिकार होने वाली लड़कियों में से कितनी जीन्स वालियां होती हैं और कितनी साड़ी या सूट वालियां। मूर्खतापूर्ण तर्कों के पीछे कब तक असली सवालों को छिपाया जाता रहेगा. आखिर कब तक?
-प्रतिभा कटियार.
( २९ जून को i-next में प्रकाशित )

Tuesday, June 23, 2009

बद चलन लड़की

अभी जून के हंस मे पुन्नी सिंह की एक लघुकथा पढ रही थी।पढने के बाद सोचा कि क्यों न इसे चोखेरबाली पर पोस्ट किया जाए।लेकिन टाइप करने को लेकर आलस हो आया।किसी और का लिखा टाइप करना बहुत मुश्किल लगता है। खैर , इसे आलस समझिए या चतुराई मुझे इसका दूसरा तरीका तुरंत मिल गया।शुरुआत की पहली लाइन और आखिरी लाइन टाइप कर देने भर से ही कहानी पूरी हो रही थी मुझे ऐसा प्रतीत हुआ।सो बीच के 60-70 शंब्द हटा देने पर वह कहानी है -

लड़की अपनी तरह से जीना चाहती थी .

और लोगों ने उसका नाम रख दिया- बदचलन लड़की !


Thursday, June 18, 2009

द्वि लिंगी समाज संरचना मे समलैंगिकों का सगर्व उद्घोष - दिल्ली 28 जून

मुझे हैरानी नही होगी अगर आप यह कहें कि हमारी युवा पीढी गेय प्राइड परेड को आजकल के फैशन का एक एक्स्प्रेशन मानती हो।गेय , लेस्बियन होना ट्रेंडी होना हो।फिर भी , बहुत सी ऐसी अस्मिताएँ हैं जो अपनी सेक्सुअल ओरियंटेशन को लेकर या तो हीनता बोध मे जीती हैं या हमेशा दुविधा मे पड़ी रहती हैं क्योकि यह दुनिया तो केवल दो लिंगो के लिए बनी है - स्त्री लिंग और पुल्लिंग ।अपनी लैंगिक अस्मिता के प्रति मनुष्य कितना सजग है इस पर बात बहुत लम्बी चलाई जा सकती है।मर्दानगी होना , मर्दानगी न होना...नपुंसकता ..बांझपन ....समलैंगिकता ....तृतीय लिंग होना ........समाज के हाशिए पर पटक देता है। इस बाइनरी संरचना से बाहर निकलना उतना ही मुश्किल है जितना इसके बीच रहना अपनी अस्पष्ट लैंगिक पहचान के साथ।
मेरा कतई इरादा नही कि मै इन दो विषयों को मिलाऊँ और स्त्री आन्दोलन को गेय -लेस्बियन या समलैंगिक अधिकारों की लड़ाई से जोड दूँ । पर आप मानें या न मानें ..... ऐसी हर अस्मिता जिसे मुख्यधारा से हमेशा उपेक्षा मिली है वह उपेक्षा के एक अदृश्य सूत्र से जुड़ जाती हैं।
फिलहाल दिल्ली अपनी दूसरी गेय प्राइड परेड के लिए तैयार हो रही है। उसके आयोजक उसे इस बार और भी नए रंग देने मे जुटे हैं।ऐसे मे स्पष्ट रूप से खुद को स्त्री पुरुष की परिभाषा मे सहज महसूस करना एकदम से आहत होता है और महसूस होता है कि लैंगिक अस्मिता {सेक्सुअल आइडेंटिटी } का क्या महत्व है ? हम जिस हिकारत से हिजड़ों को अपने समाज मे देखते आए हैं और अब भी देखते ही हैं ....क्या वे हिजड़े भी इस द्वी लिंगी सामाजिक संरचना मे हाशिए पर नही हैं? इस तरह की परेड मे क्या वे जन्म पर बधाइयाँ गाने वाले , सिग्नल पर भीख मांगने वाले भी शामिल होते होंगे? इस बार हम ज़रूर देखना चाहेंगे।
लैंगिक पहचान की यह समस्या किस तरह देखी जाए जबकि यह भी दिखाई दे जाता है कि कुछ मुद्दे एक खास राजनीतिक टोन लिए हैं या किसी प्रभाव के तहत एक खास वर्ग{ जिनकी मूल चिंता कभी रोज़ी रोटी की न रही हो} के बीच शौकिया भी पनप जाते हैं ।जिस खास तबके मे बलात्कारी पति के कसूर स्वीकार कर लेने पर भी पत्नी उसे निर्दोष मान रही हो मानो यह उनके लिए यह कोई अप्रूव्ड किस्म का व्यवहार हो।


इस मुद्दे मे पेंच बहुत है। एक सवाल यह भी कि गेय - ट्रांसजेंडर - लेसबियन होना अपने आप मे किन्ही ढांचों , संरचनाओं को अस्वीकारना है तो फिर शादी जैसी संरचना के लिए क्या बेचैनी होनी चाहिए?अक्सर खबर सुनती हूँ दो लड़कीयाँ आपस मे शादी करना चाहती हैं या दो पुरुष मिलकर बच्चा गोद लेना चाहते हैं ।

क्या हम वाकई कोई कमेंट करने से पहले इस मनोविज्ञान को समझने की कोशिश करते हैं ?

ऐसे मे हम इस गे प्राइड परेड को किस तरह देखेंगे ?

Tuesday, June 16, 2009

ईव-टीजिंग और ड्रेस कोड

कालेज लाइफ का नाम सुनते ही न जाने कितने सपने आँखों में तैर आते हैं। तमाम बंदिशों से परे वो उन्मुक्त सपने, उनको साकार करने की तमन्नायें, दोस्तों के बीच जुदा अंदाज, फैशन-ब्रांडिंग और लाइफ स्टाइल की बदलती परिभाषायें....और भी न जाने क्या-क्या। कालेज लाइफ में मन अनायास ही गुनगुना उठता है- आज मैं ऊपर, आसमां नीचे।

पर ऐसे माहौल में यदि शुरूआत ही बंदिशों से हो तो मन कसमसा उठता है। दिलोदिमाग में ख्याल उठने लगता है कि क्या जींस हमारी संस्कृति के विपरीत है। क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर है कि मात्र जींस-टाप पहन लेने से वो प्रभावित होने लगती है? क्या जींस न पहनने भर से लड़कियां ईव-टीजिंग की पीड़ा से निजात पा लेंगीं। दरअसल कानपुर के कई नामी-गिरामी कालेजों ने सत्र प्रारम्भ होने से पहले ही छात्राओं को उनके ड्रेस कोड के बारे में बकायदा प्रास्पेक्टस में ही फरमान जारी किया है कि वे जींस और टाप पहन कर कालेज न आयें। इसके पीछे निहितार्थ यह है कि अक्सर लड़कियाँ तंग कपड़ों में कालेज आती हैं और नतीजन ईव-टीजिंग को बढ़ावा मिलता है। स्पष्ट है कि कालेजों में मारल पुलिसिंग की भूमिका निभाते हुए प्रबंधन ईव-टीजिंग का सारा दोष लड़कियों पर मढ़ देता है। अतः यह लड़कियों की जिम्मेदारी है कि वे अपने को दरिंदों की निगाहों से बचाएं।

आज के आधुनिकतावादी एवं उपभोक्तावादी दौर में जहाँ हमारी चेतना को बाजार नियंत्रित कर रहा हो, वहाँ इस प्रकार की बंदिशें सलाह कम फरमान ज्यादा लगते हैं। समाज क्यों नहीं स्वीकारता कि किसी तरह के प्रतिबंध की बजाय बेहतर यह होगा कि अच्छे-बुरे का फैसला इन छात्राओं पर ही छोड़ा जाय और इन्हें सही-गलत की पहचान करना सिखाया जाय। दुर्भाग्य से कालेज लाइफ में प्रवेश के समय ही इन लड़कियों के दिलोदिमाग में उनके पहनावे को लेकर इतनी दहशत भर दी जा रही है कि वे पलटकर पूछती हैं-’’ड्रेस कोड उनके लिए ही क्यों ? लड़के और अध्यापक भी तो फैशनेबल कपड़ों में कालेज आते हैं, उन पर यह प्रतिबंध क्यों नहीं?‘‘ यही नहीं तमाम कालेजों ने तो टाइट फिटिंग वाले सलवार सूट एवं अध्यापिकाओं को स्लीवलेस ब्लाउज पहनने पर प्रतिबंध लगा दिया है। शायद यहीं कहीं लड़कियों-महिलाओं को अहसास कराया जाता है कि वे अभी भी पितृसत्तात्मक समाज में रह रही हैं। देश में सत्ता शीर्ष पर भले ही एक महिला विराजमान हो, संसद की स्पीकर एक महिला हो, सरकार के नियंत्रण की चाबी एक महिला के हाथ में हो, यहाँ तक कि उ0 प्र0 में एक महिला मुख्यमंत्री है, पर इन सबसे बेपरवाह पितृसत्तात्मक समाज अपनी मानसिकता से नहीं उबर पाता।

सवाल अभी भी अपनी जगह है। क्या जींस-टाप ईव-टीजिंग का कारण हैं ? यदि ऐसा है तो माना जाना चाहिए कि पारंपरिक परिधानों से सुसज्जित महिलाएं ज्यादा सुरक्षित हैं। पर दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं है। ग्रामीण अंचलों में छेड़खानी व बलात्कार की घटनाएं तो किसी पहनावे के कारण नहीं होतीं बल्कि अक्सर इनके पीछे पुरुषवादी एवं जातिवादी मानसिकता छुपी होती है। बहुचर्चित भंवरी देवी बलात्कार भला किसे नहीं याद होगा ? हाल ही में दिल्ली की एक संस्था ’साक्षी’ ने जब ऐसे प्रकरणों की तह में जाने के लिए बलात्कार के दर्ज मुकदमों के पिछले 40 वर्षों का रिकार्ड खंगाला तो पाया कि बलात्कार से शिकार हुई 70प्रतिशत महिलाएं पारंपरिक पोशाक पहनीं थीं।

स्पष्ट है कि मारल-पुलिसिंग के नाम पर नैतिकता का समस्त ठीकरा लड़कियों-महिलाओं के सिर पर थोप दिया जाता है। समाज उनकी मानसिकता को विचारों से नहीं कपड़ों से तौलता है। कई बार तो सुनने को भी मिलता है कि लड़कियां अपने पहनावे से ईव-टीजिंग को आमंत्रण देती हैं। मानों लड़कियां सेक्स आब्जेक्ट हों। क्या समाज के पहरुये अपनी अंतरात्मा से पूछकर बतायेंगे कि उनकी अपनी बहन-बेटियाँ जींस-टाप में होती हैं तो उनका नजरिया क्या होता है और जींस-टाप में चल रही अन्य लड़की को देखकर क्या सोचते हैं। यह नजरिया ही समाज की प्रगतिशीलता को निर्धारित करता है। जरूरत है कि समाज अपना नजरिया बदले न कि तालिबानी फरमानों द्वारा लड़कियों की चेतना को नियंत्रित करने का प्रयास करें। तभी एक स्वस्थ मानसिकता वाले स्वस्थ समाज का निर्माण संभव है।
आकांक्षा

Sunday, June 14, 2009

शब्दों के ज़रिए एक स्त्री विमर्श यह भी...

भा रत में श्री, श्रीमान और श्रीमती शब्दों का सामाजिक शिष्टाचार में बड़ा महत्व है। आमतौर श्री, श्रीमान शब्द पुरुषों के साथ लगाया जाता है और श्रीमती महिलाओं के साथ। इसमें पेच यह है कि श्री और श्रीमान जैसे विशेषण तो वयस्क किन्तु अविवाहित पुरुषों के साथ भी प्रयोग कर लिए जाते हैं, किंतु श्रीमती शब्द सिर्फ विवाहिता स्त्रियों के साथ ही इस्तेमाल करने की परम्परा है। अविवाहिता के साथ सुश्री शब्द लगाने का प्रचलन है।
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समस्त संसार को आश्रय प्रदान करनेवाली “श्री” के साथ रहने के कारण भगवान विष्णु को श्रीमान कहा गया है। इसलिए वे श्रीपति हुए। इसीलिए श्रीमत् हुए।
हां परम्परा शब्द का इस्तेमाल हमने इसलिए किया है क्योंकि श्रीमती शब्द में कहीं से भी यह संकेत नहीं है कि विवाहिता ही श्रीमती है। संस्कृत के “श्री” शब्द की विराटता में सबकुछ समाया हुआ है मगर पुरुषवादी समाज ने श्रीमती का न सिर्फ आविष्कार किया बल्कि विवाहिता स्त्रियों पर लाद कर उन्हें “श्रीहीन”कर दिया। संस्कृत के “श्री” शब्द का अर्थ होता है लक्ष्मी, समृद्धि, सम्पत्ति, धन, ऐश्वर्य आदि। सत्ता, राज्य, सम्मान, गौरव, महिमा, सद्गुण, श्रेष्ठता, बुद्धि आदि भाव भी इसमें समाहित हैं। धर्म, अर्थ, काम भी इसमें शामिल हैं। वनस्पति जगत, जीव जगत इसमें वास करते हैं। अर्थात समूचा परिवेश श्रीमय है। भगवान विष्णु को श्रीमान या श्रीमत् की सज्ञा भी दी जाती है। गौरतलब है कि “श्री” स्त्रीवाची शब्द है। उपरोक्त जितने भी गुणों की महिमा “श्री” में है, उससे जाहिर है कि सारा संसार “श्री” में ही आश्रय लेता है। अर्थात समस्त संसार को आश्रय प्रदान करनेवाली “श्री” के साथ रहने के कारण भगवान विष्णु को श्रीमान कहा गया है। इसलिए वे श्रीपति हुए। इसीलिए श्रीमत् हुए। भावार्थ यही है कि ईश्वर कण-कण में व्याप्त हैं।
प्रश्न यह है कि जब “श्री” के होने से भगवान विष्णु श्रीमान या श्रीमत हुए तो फिर श्रीमती की क्या ज़रूरत है? “श्री” से बने श्रीमत् का अर्थ हुआ ऐश्वर्यवान, धनवान, प्रतिष्ठित, सुंदर, विष्णु, कुबेर, शिव आदि। यह सब इनके पास पत्नी के होने से है। पुरुषवादी समाज ने श्रीमत् का स्त्रीवाची भी बना डाला और श्रीमान प्रथम स्थान पर विराजमान हो गए और श्रीमती पिछड़ गईं। समाज यह भूल गया कि “श्री” की वजह से ही विष्णु श्रीमत हुए। संस्कृत में एक प्रत्यय है वत् जिसमें स्वामित्व का भाव है। इसमें अक्सर अनुस्वार लगाय जाता
...क्या किसी वयस्क के नाम के साथ श्रीमान, श्री, श्रीमंत या श्रीयुत लगाने से यह साफ हो जाता है कि उसकी वैवाहिक स्थिति क्या है...
है जैसे बलवंत। इसी तरह श्रीमत् भी श्रीमंत हो जाता है। हिन्दी में यह वंत स्वामित्व के भाव में वान बनकर सामने आता है जैसे बलवान, शीलवान आदि। स्पष्ट है कि विष्णु श्रीवान हैं इसलिए श्रीमान हैं।
मारी आदि संस्कृति मातृसत्तात्मक थी। उसमें सृष्टि को स्त्रीवाची माना गया है, उसे ही समृद्धि का स्रोत माना गया है। वह वसुधा है, वह पृथ्वी है। वह हिरण्यगर्भा है। लक्ष्मी के योग के बिना विष्णु श्रीमान हो नहीं सकते, श्रीपति कहला नहीं सकते। स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं। “श्री” और श्रीमान शब्द अत्यंत प्राचीन हैं। इनमें मातृसत्तात्मक समाज का स्पष्ट संकेत है। विष्णु सहस्रनाम के विद्वान टीकाकार पाण्डुरंग राव के अनुसार समस्त सृष्टि में स्त्री और पुरुष का योग है। श्रीमान नाम में परा प्रकृति और परमपुरुष का योग है। मगर इससे “श्री” की महत्ता कम नहीं हो जाती। आज विवाहिता स्त्री की पहचान श्रीमती से जोड़ी जाती है उसके पीछे संकुचित दृष्टि है। विद्वान लोग तर्क देते हैं कि श्रीमान की अर्धांगिनी श्रीमती ही तो कहलाएंगी। विडम्बना है कि श्रीमानजी यह भूल रहे हैं कि वे खुद श्रीयुत होने पर ही श्रीमान कहलाने के अधिकारी हुए हैं।
श्री तो स्वयंभू है। “श्री” का जन्म संस्कृत की श्रि धातु से हुआ है जिसमें धारण करना और शरण लेना जैसे भाव हैं। जाहिर है समूची सृष्टि के मूल में स्त्री शक्ति ही है जो सबकुछ धारण करती है। इसीलिए उसे “श्री” कहा गया अर्थात जिसमें सब आश्रय पाए,

... किसी भी स्त्री को सिर्फ श्रीमान नहीं कहा जा सकता। इसके अलावा “श्री” और “सुश्री” में कोई गड़बड़ी नहीं है। मांग के सिंदूर की तरह किसी स्त्री के नामोल्लेख में उसकी वैवाहिक स्थिति जानना इतना ज़रूरी क्यों है?...man_beer_woman_267195

जिसके गर्भ से सब जन्मे हों। सर्वस्व जिसका हो। अब ऐसी “श्री” के सहचर श्रीमान कहलाएं तो समझ में आता है मगर जिस “श्री” की वजह से वे श्रीमान हैं, वह स्वयं श्रीमती बन जाए, यह बात समझ नहीं आती। तुर्रा यह की बाद में पुरुष ने “श्री” विशेषण पर भी अधिकार जमा लिया। अक्लमंद सफाई देते हैं कि यह तो श्रीमान का संक्षिप्त रूप है। तब श्रीमती का संक्षिप्त रूप भी “श्री” ही हुआ। ऐसे में स्त्रियों को भी अपने नाम के साथ “श्री” लगाना शुरु करना चाहिए, क्योंकि वे ही इसकी अधिकारिणी हैं क्योंकि श्री ही स्त्री है और इसलिए उसे लक्ष्मी कहा जाता है। पत्नी या भार्या के रूप में तो वह गृहलक्ष्मी बाद में बनती है, पहले कन्यारूप में भी वह लक्ष्मी ही है।
धर कुछ दशकों से कुमारिकाओं या अविवाहिता स्त्रियों के नाम के साथ सुश्री शब्द का प्रयोग शुरू हुआ है। अखबारों में गलती से भी कोई साथी किसी महिला की वैवाहिक स्थिति ज्ञात न होने पर उसके नाम के साथ सुश्री शब्द लगाना चाहता है तो वरिष्ठ साथी तत्काल रौब दिखाते हैं- मरवाएगा क्या? शादीशुदा निकली तो? हालांकि भारत में श्रीमती और सुश्री जैसे संबोधनो-विशेषणों से वैवाहिक स्थिति का पता आसानी से चलता है और इस रूप में ये सुविधाजनक भी हैं किन्तु इनके पीछे की सच्चाई जानना भी ज़रूरी है। किसी भी स्त्री को सिर्फ श्रीमान नहीं कहा जा सकता। इसके अलावा “श्री” और “सुश्री” में कोई गड़बड़ी नहीं है। मांग के सिंदूर की तरह किसी स्त्री के नामोल्लेख में उसकी वैवाहिक स्थिति जानना इतना ज़रूरी क्यों है? जब कि किसी प्रौढ़ या वयस्क पुरुष के नामोल्लेख में श्रीमान, श्रीयुत, श्रीमंत या श्री आदि कुछ भी लगाइये तब भी यह पता लगाना असंभव है कि मान्यवर की वैवाहिक स्थिति क्या है। किसे धोखा दे चुके हैं, किसे जला चुके हैं, किसे भगा चुके हैं, किससे बलात्कार कर चुके हैं....कुछ भी तो पता नहीं चलता। फिर श्रीमती के लिए आग्रह क्यों ?
रीब बीस वर्ष पहले गायत्री परिवार की तत्कालीन प्रमुख आचार्य श्रीराम शर्मा की पत्नी भगवतीदेवी शर्मा जयपुर आईं थीं। मुझे उनसे मिलने का अवसर मिला। अपनी अखबारी रिपोर्ट में मैनें हर बार उनका उल्लेख श्री माताजी के तौर पर ही किया। इसे मैने बहुत साधारण समझा मगर बाद में मुझे ज्ञात हुआ कि मेरे ऐसा लिखने से वे प्रसन्न थीं जबकि अन्य समाचार पत्रों में श्रीमती शब्द का प्रयोग भी बहुधा हुआ।

Saturday, June 13, 2009

औरत का आना मना है

एक और औरत हाथ मे साबुन लिए उल्लास की पराकाष्ठा पर है

गदे वाली कुसी पर बैठ एक और औरत कामुक निगाहो से ताक रही है

इशतहार से खुली छातियो वाली औरत मुझे देखती मुसकराती है

एक औरत फोन का डायल घुमा रही है और मै सोचता हूँ वह मेरा ही नंबर मिला रही है

माँ छः घंटो बस की यात्रा कर आई है

माँ मुझसे मिल नही सकती, होस्टल मे रात को औरत का आना मना है।

लाल्टू

Wednesday, June 10, 2009

स्त्रियाँ आ गयीं तो पुरुषों का क्या होगा, वे तो ज़हर ही खा लेंगे

50 प्रतिशत बनाम 33 प्रतिशत


राजकिशोर

राष्ट्रपति जी ने संसद को संबोधित करते हुए अपनी सरकार का जो पहले सौ दिनों का कार्यक्रम पेश किया, उसमें महिलाओं को दिए जानेवाले आरक्षण से संबंधित दो महत्वपूर्ण घोषणाएं हैं। एक घोषणा यह है कि पंचायतों और नगरपालिकाओं की निर्वाचित सीटों पर महिलाओं का आरक्षण 33 प्रतिशत से बढ़ कर 50 प्रतिशत किया जाएगा और इसके लिए संविधान में आरक्षण किया जाएगा। इस घोषणा के समर्थन में कहा गया है कि महिलाओं को वर्ग, जाति तथा महिला होने के कारण अनेक अवसरों से वंचित रहना पड़ता है, इसलिए पंचायतों तथा शहरी स्थानीय निकायों में आरक्षण को बढ़ाने से और अधिक महिलाएं सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश कर सकेंगी। दूसरी घोषणा का संबंध राज्य विधानमंडलों और संसद में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान करनेवाले विधेयक को शीघ्र पारित कराने से है। आश्चर्य की बात यह है कि दूसरी घोषणा पर तुरंत विवाद शुरू हो गया, पर पहली घोषणा के बारे में कोई चर्चा ही नहीं है। इससे हम समझ सकते हैं कि सत्ता के वास्तविक केंद्र कहां हैं। पंचायत और नगरपालिका के स्तर पर क्या होता है, इससे हमारे सांसदों और पार्टी सरदारों को कोई मतलब नहीं है। उनकी चिंता सिर्फ यह है कि राज्य और केंद्र की सत्ता के दायरे में छेड़छाड़ नहीं होना चाहिए। यह ‘गांव तुम्हारा राज्य हमारा’ किस्म की मनोवृत्ति है। जब तक यह मनोवृत्ति कायम है, स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक शासन के मजबूत होने की कोई संभावना नहीं है।
जब 1992 में स्थानीय स्वशासन के संस्थानों में महिलाओं को सभी सीटों और पदों पर 33 प्रतिशत आरक्षण देने का संवैधानिक कानून बनाया गया था, उस वक्त भी यह एक क्रांतिकारी कार्यक्रम था। लेकिन इस बात को समझा गया लगभग दो दशक बाद जब महिलाओं की एक-तिहाई उपस्थिति के कारण पंचायतों के सत्ता ढांचे में परिवर्तन स्पष्ट दिखाई पड़ने लगा। असल में शुरू में पंचायतों के पास शक्ति, सत्ता या संसाधन कुछ भी नहीं था। इसलिए यह बात खबर न बन सकी कि करीब दस लाख महिलाएं पंचायतों के विभिन्न स्तरों पर स्थान ग्रहण करने जा रही हैं। देश में पहली बार ऐसा कानून बना था जो महिलाओं को गांव के सार्वजनिक जीवन में प्रवेश का अधिकार देता था। न केवल अधिकार देता था, बल्कि इसे अनिवार्य बना चुका था। शताब्दियों से महिलाओं का जिस तरह घरूकरण किया हुआ था, उसे देखते हुए यह उम्मीद करना यथार्थपरक नहीं था कि महिलाएं अचानक बड़े पैमाने पर सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करेंगी। जब यह संवैधानिक कानून पारित होने की प्रक्रिया में था, तब बहुतों ने यह सवाल किया भी कि इतनी महिला उम्मीदवार आएंगी कहां से?
बेशक अब तक भी सब कुछ ठीकठाक नहीं है। बहुत सारी महिला पंचायत सदस्यों ने गांव के जीवन पर अपनी कार्यनिष्ठा की स्पष्ट छाप छोड़ी है। उनके नाम नक्षत्र की तरह जगमगा रहे हैं। उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार और सम्मान भी मिले हैं। पर अभी भी सब कुछ ठीकठाक नहीं है। आरक्षण के कारण जो महिलाएं चुन कर पंचायतों में आई हैं, उनमें से अनेक पर अभी भी पितृसत्ता की गहरी छाया है। इन पंचायत सदस्यों के पति या अन्य परिवारी जन ही पंचायत में असली भूमिका निभाते हैं और जहां बताया जाता है वहां महिलाएं सही कर देती हैं या अंगूठे का निशान लगा देती हैं। इसी प्रक्रिया में पंचपति, सरपंचपति, प्रधानपति आदि संबोधन सामने आए हैं। दूसरी ओर, अनुसूचित जातियों और जनजातियों की जो महिलाएं चुन कर पंचायतों में आई हैं, उन्हें पंचायत के वर्तमान सत्ता ढांचे में उनका प्राप्य नहीं दिया जाता। कहीं उन्हें जमीन पर बैठने को मजबूर किया जाता है, कहीं उनकी बात नहीं सुनी जाती और कहीं-कहीं तो उन्हें पंचायत की बैठक में बुलाया भी नहीं जाता। यानी राजनीति और कानून ने महिलाओं को सत्ता में जो हिस्सेदारी बख्शी है, समाज उसे मान्यता देने के लिए अभी भी तैयार नहीं है। ध्यान देने की बात है कि यह मुख्यत: उत्तर भारत की हकीकत है। दक्षिण भारत के मानस में महिला नेतृत्व को स्वीकार करने के स्तर पर कोई हिचकिचाहट नहीं है। जाहिर है कि उत्तर भारत का समाज महिलाओं को उनका हक देने के मामले में अभी भी काफी पुराणपंथी है।
लेकिन इससे क्या होता है? महान फ्रेंच लेखक और विचारक विक्टर ह्रूगो की यह उक्ति मशहूर है कि जिस विचार का समय आ गया है, उसे रोका नहीं जा सकता। स्त्री-पुरुष समानता का विचार आधुनिक सभ्यता के मूल में है। इसलिए सत्ता में स्त्रियों की हिस्सेदारी को देर-सबेर स्वीकार तो करना ही होगा। चूंकि दक्षिण भारत में यह स्वीकार भाव सामाजिक प्रगति के परिणामस्वरूप आया है, इसलिए केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक की पंचायतों में महिलाओं की हिस्सेदारी अपने आप 50 प्रतिशत या इससे ऊपर तक चली गई है। इसके विपरीत बिहार सरकार ने इस रेडिकल लक्ष्य को प्राप्त किया एक नया कानून बना कर, जिसमें पंचायतों में मछलियों को 50 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान था। बिहार के बाद हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि कई राज्यों ने 50:50 के इस विचार को अपनाया और अब केंद्र सरकार पूरे देश के लिए यह कानून बनाने जा रही है। इसका हम सभी को खुश हो कर स्वागत करना चाहिए। इस संदर्भ में यह याद रखने लायक बात है कि बहुत-सी महिलाओं ने कहा है कि अगर आरक्षण न होता, तो हम पंचायत में चुन कर कभी नहीं आ सकती थीं। आक्षण के इस महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सवाल यह है कि जो काम पंचायत और नगरपालिका के स्तर पर इतनी आसानी से संपन्न हो गया और सामाजिक प्रतिरोध के बावजूद कम से कम कागज पर तो अमल हो ही रहा है, वही काम विधानमंडल और संसद के स्तर पर क्यों नहीं संपन्न हो पा रहा है? देवगौड़ा के बाद से हर सरकार महिला आरक्षण विधेयक को पारित कराने का वादा करती है, पर यह हो नहीं पाता। मनमोहन सिंह की सरकार ने इस बार अपने को प्रतिबद्ध किया है कि वह महिला आरक्षण विधेयक को शीघ्र पारित कराने के लिए कदम उठाएगी। यह काम पहले सौ दिनों के भीतर पूरा करने का इरादा भी जाहिर किया गया गया है। आश्चर्य की बात यह है कि जो काम वह इस बार सौ दिनों में करने का इरादा रखती है, वही काम वह पिछले पांच साल में भी क्यों नहीं पूरा कर सकी। यहां तक कि पांच वर्ष की इस लंबी अवधि के दौरान इस मुद्दे पर राजनीतिक सर्वसम्मति बनाने की दिशा में भी कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया। दिलचस्प यह है कि यह विधेयक जब पहली बार संसद में पेश किया गया था, उस वक्त जो राजनीतिकार इसका विरोध कर रहे थे, वह इस बार भी विरोध कर रहे हैं। स्पष्ट है कि अगर इन्हें मनाना संभव नहीं है, तो इनके विरोध की उपेक्षा करते हुए ही इस विधेयक को पारित कराना होगा। क्या ऐसा हो पाएगा? क्या इसके लिए मनमोहन सिंह की सरकार तैयार है?
इस बार एक विचित्र स्थिति पैदा हो गई है। राष्ट्रपति महिला हैं, लोक सभा अध्यक्ष महिला हैं, सत्तारूढ़ दल की अध्यक्ष महिला हैं। फिर भी महिला आरक्षण विधेयक का पारित होना मुश्किल लग रहा है। वैसे, इन महिलाओं में सोनिया गांधी की सत्ता ही वास्तविक है और सोनिया गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष बनना महज एक संयोग है। अगर राजीव गांधी आज जीवित होते, तो वही कांग्रेस अध्यक्ष होते। उम्मीद की जाती है कि राहुल गांधी जल्द ही राजनीतिक उत्तराधिकार का यह पारिवारिक पद संभाल लेंगे। तब सोनिया गांधी की सत्ता प्रतीकात्मक हो जाएगी, उसी तरह जैसे राष्ट्रपति और लोक सभा अध्यक्ष की सत्ता प्रतीकात्मक है। इसका मतलब यह है कि भारत के राजनीति मंडल को सत्ता के बहुत निम्न स्तर, यानी पंचायत और नगरपालिका के स्तर पर, महिलाओं को 50 प्रतिशत तक भागीदार बनाने में कोई दिक्कत नहीं है, सत्ता के उच्च स्तर पर महिलाओं को प्रतीकात्मक सत्ता देने में कोई हिचकिचाहट नहीं है, पर सत्ता के उच्च स्तर पर महिलाओं को मात्र 33 प्रतिशत आरक्षण देने में उसकी जान निकली जा रही है।
पिछड़ावादी राजनीतिकारों का पुराना तर्क है कि यदि विधानमंडल में महिलाओं को आरक्षण दिया जाता है, तो इन आरक्षित सीटो में पिछड़ा जाति की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण अलग से मिलना चाहिए। सतही तौर पर यह तर्क ठीक लगता है, पर सवाल यह है कि सारी मांग सरकार से ही क्यों? पिछड़ी जातियों के पुरुष अपने स्त्री समाज को सार्वजनिक जीवन में आगे क्यों नहीं बढ़ाना चाहते? आज सभी विधानमंडलों और संसद में पिछड़ी जातियों के पुरुषों का बोलबाला है। इसके लिए तो किसी आरक्षण की जरूरत नहीं हुई। फिर महिलाओं के मामले में दोहरा मानदंड क्यों? क्या यहां भी पंचपति, सरपंचपति और प्रधानपति की चाहत मुखर हो रही है? यह देख कर अच्छा नहीं लगा कि महिला आरक्षण के समर्थन में सीपीएम की वृंदा करात और भाजपा की सुषमा स्वराज एक दूसरे का हाथ थामे फोटो खिंचवा रही हैं। क्या स्त्री एकता विचाराधारा से ऊपर की चीज है? फिर भी यह पिछड़ावादी द्वंद्वात्मकता से कुछ बेहतर है। दो घोर परस्पर विरोधी दलों में आखिर एक गंभीर मुद्दे पर एकता दिखाई दे रही है, तो उम्मीद की जा सकती है कि आज नहीं तो कल महिला प्रतिनिधियों को राज्य और केंद्र के स्तर पर आरक्षण मिल कर रहेगा।

समाज मे महिलाओं के रूप भी बदले हैं

पिछले दिनों अपनी यात्रा के समय एक लड़की से मुलाकात हुई जिसने समाज में स्त्रियों को लेकर चल रही स्थिति पर अपनी बेबाक राय प्रस्तुत की। यह संयोग ही था कि हम दोनों एक ट्रेन में मिले, हालांकि आपस में हम लोग अपरिचित नहीं थे। पहले भी दो-तीन कार्यक्रमों में उससे मुलाकात हो चुकी थी।
किसी भी विषय पर बेधड़क होकर, बिना संकोच के बोलना उसकी आदत में शुमार है। महिलाओं, परिवार, विवाह, सेक्स, शादी आदि सहित तमाम सारे विषयों पर वह बेबाकी से अपनी राय प्रकट करती रहती है। विशेष बात यह है कि उस लड़की की माता के काफी साल पूर्व गुजर जाने के बाद उसने स्वयं अपने आपको सँवारा और अपने परिवार को भी सहारा दिया। हालाँकि उसके पिता ने भी सौतेली माता के भय से दूसरी शादी नहीं की और अपना सारा ध्यान अपने परिवार की देखरेख में लगाया।
उस लड़की ने स्वयं समाज में दहेज के कष्ट को भोगा और अपनी शादीशुदा जिन्दगी को मात्र 17 माह के बाद ही तलाक के माध्यम से समाप्त कर दिया।
अपने स्त्री-विमर्श पर चल रहे एक शोधकार्य के कारण लगा कि सफर की बातचीत में हमारे काम लायक भी कुछ बातें प्राप्त हो जायेंगी। इधर-उधर की कई सारी बातों के साथ-साथ अभी हाल में हुई उस घटना की चर्चा भी हुई जिसमें एक पुत्री द्वारा अपनी माँ की हत्या अपने प्रेम सम्बन्धों में बाधक बनने के कारण कर दी गई।
इस पोस्ट का सार भी यही है कि उस लड़की ने बड़ी ही साफगोई दिखाते हुए कहा कि अब समाज उस स्थिति में आ गया है जहाँ काम के अच्छे-बुरे का आकलन कम होता है। इस बात का आकलन ज्यादा होता है कि काम को किसी लड़के ने किया या फिर किसी लड़की ने। क्या इस घटना की चर्चा होती यदि अपनी माँ की हत्या एक लड़के ने की होती?
उसका आगे स्पष्ट कहना था कि समाज से अब परिवारवाद की अवधारणा का क्षरण हमारी सोच के संकुचित होने के कारण होता जा रहा है। शादी का उद्देश्य किसी समय में संतानोत्पत्ति और शारीरिक संतुष्टि रहा करता था पर अब इसे भी एक औपचारिकता के नाते पूरा किया जा रहा है। शायद ही कोई लड़का-लड़की होगा जो शादी पूर्व सेक्स को नहीं कर चुका होगा। शादी के बाद भी पति-पत्नी को दूसरे के साथ शारीरिक संतुष्टि पूर्ण करते देखा जाता है। तब शादी का तात्पर्य सेक्स के लिए कहाँ रह गया? रही बात संतानोत्पत्ति की तो ज्यादातर युगल अपनी आपाधापी वाली जिन्दगी में उस समय बच्चे की चाह करते हैं जबकि वे अपने कैरियर से पूर्णतः संतुष्ट हो जाते हैं।
आज किसी भी लड़की के लिए पति-बच्चों से ज्यादा अहमियत उसका कैरियर रखता है, ऐसे में किसे फुर्सत है कि बच्चा पैदा करता फिरे?
और भी बहुत सी बातें हुईं, लगा कि आज महिला समाज पूरी तरह बदल सा गया है या बस ऊपरी तौर पर ही बदला बदला सा नजर आ रहा है? एक ओर हमारे इस परिचित जैसी लड़कियाँ हैं जो स्वच्छन्द रूप से अपना जीवन बिता रही हैं, खुले आम अपने पुरुष मित्र के साथ रह रहीं हैं। दूसरी ओर ऐसी भी लड़कियाँ हैं जो सारा समय परिवा को, पति को खुश करने में ही गुजार देतीं हैं।
एक ओर इस जैसीं युवतियाँ हैं जो पति के रुतबे को सहन न कर तलाक के द्वारा अलग रह कर अपना हित स्वयं सिद्ध कर रहीं हैं। दूसरी ओर वे स्त्रियाँ हैं जो पति के दबदबे तले सारा जीवन उसे परमेश्वर मान कर ही बिता देतीं हैं।
एक ओर यह लड़की है जो विवाह पूर्व और विवाह पश्चात शारीरिक सम्बन्धों को गलत नहीं मानती और दूसरी ओर समाज में इस तरह की घटनाओं के होने पर महिला को ही दोषी ठहराया जाता है।
सफर तो समाप्त हुआ पर बहुत सारे सवाल इस मुलाकात ने छोड़ दिये। लगा कि समाज वाकई बदल गया है। लगा कि समाज वाकई अब सेक्स पर ही आधारित होता जा रहा है, चाहे वह लड़के के लिए हो या फिर लड़की के लिए। लगा कि अब लड़कियाँ भी समाज को बदलने का माद्दा रख रहीं हैं। क्या सही है क्या गलत अब ये समाज सुधारकों पर..............।

Sunday, June 7, 2009

महिला सांसद पुरुषों से अधिक शिक्षित

भारतीय महिला सांसद अपने पुरुष सहकर्मियों की तुलना में अधिक शिक्षित है और उनके चुनाव में विजयी होने की संभावना भी पुरुषों से अधिक है। एक नए अध्ययन के अनुसार पुरुषों की तुलना अधिक महिला सांसद परास्नातक डिग्रीधारी है।

संसदीय शोध को समर्पित एक गैर लाभकारी संस्था 'पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च' के अध्ययन के अनुसार 15वीं लोकसभा की 59 महिला सांसदों में 32 प्रतिशत परास्नातक और शोध डिग्रीधारी है, जबकि पुरुष सांसदों में यह प्रतिशत 30 है। चुनाव में उम्मीदवार बनी 10 प्रतिशत महिलाएं विजयी हुई, वहीं केवल छह प्रतिशत पुरुष प्रत्याशी ही जीतने में सफल हुए।

अध्ययन के अनुसार, इस बार लोकसभा में सबसे अधिक महिलाएं है और 545 सदस्यों में उनका प्रतिशत 11 है। राज्यसभा में 10 प्रतिशत और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या सात प्रतिशत है।

सबसे अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 29 प्रतिशत महिला सांसदों की संख्या 40 वर्ष के कम है। यह प्रतिशत पिछली लोकसभा से काफी बेहतर है, जिसमें 17 प्रतिशत महिला सांसद 40 वर्ष से कम उम्र की थीं। सभी 59 महिला सांसदों की औसत उम्र 47 वर्ष है, जो पुरुष सांसदों की औसत आयु 54 वर्ष से काफी कम है। किसी भी महिला सांसद की उम्र 70 वर्ष से अधिक नहीं है, जबकि सात पुरुष सांसद 70 साल से अधिक उम्र के है।

पीआरएस के अनुसार 40 से 60 वर्ष के आयु समूह के बीच की महिला सांसदों का प्रतिशत इस बार काफी कम हुआ है। वर्ष 2004 में इस समूह की महिला सांसदों का प्रतिशत 73 था जो इस बार घटकर केवल 57 प्रतिशत रह गया। परंतु जहां 14 वीं लोकसभा में 60 वर्ष से अधिक की महिला सांसदों का प्रतिशत 9.8 था वहीं इस बार यह बढ़कर 13.8 प्रतिशत हो गया है। (साभार: जागरण)

आकांक्षा यादव
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