Friday, July 31, 2009

बेटियाँ

चाहते हैं बेटों को, जनम जाती हैं बेटियाँ,
बोते हैं बेटों की फसल, उग आती हैं बेटियाँ

नाम देते हैं बेटों को, नाम करती हैं बेटियाँ
आराम
देते हैं बेटों को, काम करती हैं बेटियाँ

भंवर में छोड़ देते हैं बेटे, किनारा देती हैं बेटियाँ
सलाह- राय देते हैं बेटे, सहारा देती हैं बेटियाँ

ज़िन्दगी भर करो बेटों को, अहसान मानती हैं बेटियाँ
माँ बाप की हर मजबूरी को पहचानती हैं बेटियाँ

धक्का देती है ज़िन्दगी,तो थाम लेती हैं बेटियाँ
दूर हों या पास, माँ बाप का नाम लेती हैं बेटियाँ

बोझ उठा कर भी बोझ कहलाती हैं बेटियाँ
खामोशी से दुख सारे सह जाती हैं बेटियाँ

ज़ुल्म और अन्याय ये कब तक सहेंगी बेटियाँ?
आँखों की ओट आखिर, कब तक रहेंगी बेटियाँ?

Tuesday, July 28, 2009

लड़की जो बड़ी हो गई है

अर्चना सिन्हा


लड़की जो बड़ी हो गई है

घबरा कर खींच दिया उसने

खिड़की का परदा,

गली से गुजरते एक लड़के ने

बजाई थी सीटी

उसे देख कर।

बचा कर माँ की नजर

उसने चुपके से देखा आईना

और संवार लिए अपने बाल।

* * *

लड़की जो बड़ी हो गई है,

डाल दी है उसने

दूध की सारी मलाई

अपने भाई के ग्लास में

और रख दी है

अपने हिस्से की सारी गुझिया

उसके लिए।

कुछ दिन और

माँ निश्चिंत रहेगी

भाई के नाश्ते की फ़िक्र से।

* * *

लड़की जो बड़ी हो गई है,

सिलवा लिया है उसने

माँ की साड़ी का लहंगा

इस बार के त्यौहार में,

ले आई है

अपने कपड़ों के पैसों से

पिता के जूते और

भाई की एक जींस

और पोंछ कर हथेलियों से

माँ की आंखों में

उतर आए आंसुओं को

मुस्कुरा रही है

उसके गले में बाहें डाल कर।

* * *

लड़की जो बड़ी हो गई है

देखने लगी है सपने

बादलों के पार बने एक महल का

महल के दरवाजे पर खड़े

एक सजीले राजकुमार का,

और अनजाने में ही

अपने होठों पर उतर आई

मुस्कराहट से चौंक कर

देखने लगती है चारों ओर,

और देख कर

माँ के चहरे पर

चिंता की लकीरों को

सहम जाती है अन्दर से।

* * *

लड़की जो बड़ी हो गई है

पढ़ ली है उसने

पिता के चहरे पर छाई

विवशता की लकीरें,

देखी है

माँ की आंखों की कातरता,

निकाल कर अपनी किताब से

एक सूखे गुलाब को,

फेंक नहीं पायी है,

रख दिया है उसे

किताबों की आलमारी में

पीछे कहीं छुपा कर।

पहन कर साड़ी

उठा ली है हाथों में

चाय की ट्रे

और मन-मन भर के पाँव रखती

जा रही है

बाहर वाले कमरे की तरफ़।

लड़की जो बड़ी हो गई है!

Friday, July 24, 2009

उफ़!!!यह तो हद है....

दर्द का कोई जहब नहीं है।जख्मों का कोई देश नहीं होता. सिसकियों को विभाजन की कोई रेखाएं बांट नहीं सकतीं.यही कारण है कि दूर देश की स्त्री कीतकलीफ को किसी भी देश की स्त्री को भी बखूबी समझ सकती है. सिमोन ने जो लिखा वो हमें हमारा ही सच लगा. मिलेना की तकलीफों से जुडऩा अपनी तकलीफों से जुडऩा था.

बात किसी भी देश की हो, किसी भी जहब की लेकिन तकलीफ एक जैसी। आंख से बहने वाले आंसुओं का नमक भी वही और उठने वाला चीत्कार भी वही।क्या इसे समझ पाना भी कोई मुश्किल बात है। इन दिनों ईरान की महिलाओं को लेकर काफी कुछ लिखा पढ़ा, सोचा जा रहा है. नेडा की हत्या के बाद यहसिलसिला और भी तेज हो चला है. नेडा की मौत को एक आंदोलन को तेज करने के रूप में भी देखा गया.

आज एक खबर पर जर पड़ी कि ईरान में कुंआरी लड़कियों को फांसी देने से पहले उनके साथ रेप किया जाता है। चूंकि ईरान में कुंआरी लड़कियों को फांसी नहींदी जा सकती इसलिए फांसी की सजा पाई लड़कियों को पहले इस सजा से गुजरना पड़ता है।

इक्कीसवीं सदी में ऐसी खबरों से गुजरना भी किसी प्रताडऩा से कम नहीं हैं. दु:खद यह भी है कि इस खबर को लेकर कुछ मजहब परस्तों का ऐतराज भी आगया. ऐतराज तो ऐसी सजाओं के खिलाफ होना था, खबरों के खिलाफ क्यों? मुंह बंद कर देने से दर्द छुप तो सकता है कम तो नहीं हो जाता. अब तक यही तोहुआ है मुंह बंद करके दर्द को छुपाया गया. कहा गया सब ठीक है. कराहों को मुस्कुराहटों के पीछे धकेल दिया गया और कहा गया सब कुछ ठीक चल रहा है जी.

-प्रतिभा कटियार

(मूल खबर हेतु नीचे लिंक पर क्लिक करें)

http://www.inext.co.in/epaper/Default.aspx?edate=7/24/2009&editioncode=2&pageno=10