Monday, August 31, 2009

"सती प्रथा हमारी परंपरा"

सुप्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी से रविवार डॉट कॉम के लिए आलोक प्रकाश पुतुल ने उनके पसंदीदा विषय क्रिकेट से लेकर जातिप्रथा और भारतीय सभ्यता तक कई विषयों पर बातचीत की। स्वाभाविक है, इसमें राजस्थान में घटित देवराला सती की घटना पर जनसत्ता अखबार में छपे उनके चर्चित संपादकीय पर भी बात हुई। आज से कोई 22 साल पहले 1987 में हुए देवराला सती कांड के समर्थन में छपा यह संपादकीय लंबे समय तक चर्चा में रहा। तब प्रभाष जोशी जनसत्ता के संपादक थे।

संपादकीय का एक अंश है-

‘जो लोग इस जन्म को ही आदि और अंत मानते हैं और अपने व्यक्तिगत भोग में ही सबसे बड़ा सुख देखते हैं उन्हें सती प्रथा कभी समझ में नहीं आएगी। यह उस समाज से निकली है जो मृत्यु को जीवन का सर्वथा अंत नहीं मानता, बल्कि उसे एक जीवन से दूसरे जीवन की और बढ़ने का माध्यम समझता है। ऐसा समाज ही सती प्रथा के उचित होने पर कोई सार्थक बहस कर सकता है। उसी हिसाब से अब सती प्रथा पर विचार होना चाहिए। मगर यह अधिकार उन लोगों को नहीं है जो भारत के आम लोगों की आस्था और मान्यताओं को समझते नहीं हैं। ऐसे लोग कोई फैसला देंगे तो उसका वैसे ही धज्जियां उड़ेंगी जैसे राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले की दिवराला में उड़ी (दिवराला की सती- संपादकीय जनसत्ता)।’

रविवार डॉट कॉम में छपी इस ताजा बातचीत को पढ़ कर ताज्जुब होता है कि इन दो दशकों में, भारतीय समाज अपनी संरचना और सोच में इतना बदला है, पर प्रभाष जोशी की सोच वहीं ठहरी हुई लगती है। सती पर पछा गया सवाल और उस पर जवाब आप भी पढ़िए और गुनिए।

प्रश्न- मुझको आपका एक बहुचर्चित लेख याद आता है सती प्रथा वाला...

प्रभाष जोशी- मैं यह मानता हूं कि सती प्रथा के प्रति जो कानूनी रवैया है, वो अंग्रेजों का चलाया हुआ है। अपने यहां सती पति की चिता पर जल के मरने को कभी नहीं माना गया। सबसे बड़ी सती कौन है आपके यहां? सीता। सीता आदमी के लिए मरी नहीं। दूसरी सबसे बड़ी कौन है आपके यहां ? पार्वती। वो खुद जल गई लेकिन पति का जो गौरव है, सम्मान है वो बनाने के लिए। उसके लिए। सावित्री। सावित्री सबसे बड़ी सती मानी जाती है। सावित्री वो है, जिसने अपने पति को जिंदा किया, मृत पति को जिंदा किया।

सती अपनी परंपरा में सत्व से जुड़ी हुई चीज है. मेरा सत्व, मेरा निजत्व जो है, उसका मैं एसर्ट करूं। अब वो अगर पतित होकर... बंगाल में जवान लड़कियों की क्योंकि आदमी कम होते थे, लड़कियां ज्यादा होती थीं, इसलिए ब्याह देने की परंपरा हुई। इसलिए कि वो रहेगी तो बंटवारा होगा संपत्ति में। इसलिए वह घर में रहे। जाट लोग तो चादर डाल देते हैं, घर से जाने नहीं देते। अपने यहां कुछ जगहों पर उसको सती कर देते हैं।

आप अपने देश की एक प्रथा को, अपने देश की पंरपरा में देखेंगे या अंग्रेजों की नजर से देखेंगे, मेरा झगड़ा यह है। मेरा मूल झगड़ा ये है।

Sunday, August 30, 2009

प्रेम की विडंबनाएँ

एकनिष्ठता का सवाल
राजकिशोर


जैसे उत्तर भारत के समाज को समझने के लिए प्रेमचंद को बार-बार पढ़ने की जरूरत है, वैसे ही स्त्री-पुरुष संबंध के यथार्थ पर विचार करने के लिए शरत चंद्र को बार-बार पढ़ना चाहिए। हाल ही में शरत बाबू का अंतिम उपन्यास शेष प्रश्न पढ़ने का अवसर मिला, तो मेरे दिमाग में तूफान-सा आ गया। स्त्री-पुरुष संबंध का शायद ही कोई आयाम हो जिस पर इस विचार-प्रधान, पर अत्यंत पठनीय उपन्यास में कुछ न कुछ नहीं कहा गया हो। और, जो भी कहा गया है, वह इतना ठोस है कि आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है जितना 1931 में, जब यह पहली बार प्रकाशित हुआ था। हैरत होती है कि हिन्दी की स्त्रीवादी लेखिकाएँ शरत चंद्र को उद्धृत क्यों नहीं करतीं। क्या इसलिए कि वे स्त्री नहीं, पुरुष थे ?

जिस एक बिन्दु पर शरत चंद्र की स्थापना सबसे ज्यादा उत्तेजक है, वह है एकनिष्ठता का मुद्दा। लगभग सारी संस्कृतियाँ स्त्री-पुरुष संबंधों में एकनिष्ठता की कायल रही हैं। ईसाई समाजों ने तो इसे कानून की शक्ल भी दे दी, जिसका अनुकरण दूसरे समाज कर रहे हैं। बहरहाल, एकविवाह प्रणाली और एकनिष्ठता में फर्क है। एकविवाह प्रणाली एक समय में एक ही संबंध की पक्षधर है। लेकिन इसमें एक संबंध के टूट जाने पर नया संबंध करने पर रोक नहीं है। इस तरह, कोई स्त्री या पुरुष, हर विवाह में वफादारी निभाते हुए भी, एक के बाद एक असंख्य विवाह कर सकता है। इसीलिए इसे क्रमिक बहुविवाह कहा जाता है। एकनिष्ठता कुछ अलग ही चीज है। इसका सहोदर शब्द है, अनन्यता। कोई स्त्री या पुरुष जब अपने प्रेम पात्र के साथ इतनी शिद्दत से बँध जाए कि न केवल उसके जीवन काल में, बल्कि उसके गुजर जाने के बाद भी कोई अन्य पुरुष या स्त्री उसे आकर्षित न कर सके, तो इस भाव स्थिति को अनन्यता कहा जाएगा। यही एकनिष्ठता है। आज भी इसे एक महान गुण माना जाता है और ऐसे व्यक्तियों की पूजा होती है।

हैरत की बात यह है कि शेष प्रश्न की नायिका कमल, जो लेखक की बौद्धिक प्रतिनिधि है, एकनिष्ठता के मूल्य को चुनौती देती है। उसकी नजर में, यह एक तथ्यहीन, विचारहीन, मूर्खतापूर्ण, जड़ परंपरा का अवशेष है जिसे प्लेग के चूहे की तरह तुरंत घर से बाहर फेंक देना चाहिए। यह प्रसंग उठता है शेष प्रश्न के एक प्रमुख पात्र आशुतोष गुप्त की अपनी मृत पत्नी के प्रति एकनिष्ठता की तीव्र भावना से। जब कमल यह घोषित करती है कि नर-नारी के प्रेम व्यापार में अनन्यता को मैं न आदर्श मानती हूं और न ही इसे अतिरिक्त महत्व देती हूँ, तो वयोवृद्ध आशु बाबू विचलित हो जाते हैं। वे कमल से कहते हैं, ‘कमल, तुम मेरे एक प्रश्न का उत्तर दो। मैं पाप-पुण्य की बात नहीं करता, फिर भी सत्य यह है कि मेरे लिए मणि की माँ के स्थान पर किसी दूसरी स्त्री को अपनाने की सोचना तक संभव नहीं।’ कमल का उत्तर चौंकानेवाला है। वह कहती है, इसका कारण यह है कि आप बूढ़े हो गए हैं।

आशु बाबू बूढ़े हो चुके हैं ? हाँ, वे आज बूढ़े जरूर हैं, पर उस समय तो वे बूढ़े नहीं थे, जब उनकी हृदयेश्वरी चल बसी थी। कमल का कहना है कि दरअसल, वे उस समय भी तन से भले ही बूढ़े न रहे हों, मन से पक्के बूढ़े थे। कमल की नजर में बुढ़ापे की परिभाषा यह है : ‘मेरी दृष्टि में ‘सामने की ओर न देख पाना ही मन का बुढ़ापा है। हारे-थके मन द्वारा भविष्य के सुखों, आशाओं, और आकांक्षाओं की उपेक्षा करके अतीत में रमने को, कुछ पाने की इच्छा न रखने को, वर्तमान को एकदम नकारने को और भविष्य को निरर्थक समझने को मैं मन का बुढ़ापा मानती हूँ। अतीत को सब कुछ समझना, भोगे हुए सुख-दुखों की स्मृति को ही अमूल्य पूँजी मान कर उसके सहारे शेष जीवन जीना ही मन का बुढ़ापा है। ’ उपन्यास के आखिरी पन्ने तक आशु बाबू अपने बारे में इस विश्लेषण से सहमत नहीं हो पाते। कमल से उनके अंतिम शब्द ये हैं : ‘कमल, तुम मणि की माँ के प्रति मेरे आज तक चल रहे अविच्छिन्न बंधन को मोह का नाम दोगी, इसे मेरी दुर्बलता का नाम दे कर मेरा उपहास करोगी, किन्तु जिस दिन यह मोह जाता रहेगा, उस दिन मनुष्य का और भी बहुत कुछ नष्ट हो जाएगा। इस मोह को भी तपस्या का फल समझना, बेटी। ’

ऐसा लगता है कि खुद शरत चंद्र एकनिष्ठता की पहली को सुलझा नहीं सके थे। यह आदर्श उन्हें उलझन में डालता था तो कहीं से मोहित भी करता था। शेष प्रश्न में दो अनन्य प्रेमी युगल अपना पार्टनर बदल लेते हैं। लेकिन आशु बाबू के अदम्य प्रेम का दीपक पूरी पुस्तक में जलता रहता है। कमल के लिए यह कितना ही अस्वाभाविक हो, आशु बाबू के लिए यही स्वाभाविक है। जब उसका पुराना साथी शिवनाथ उसे छोड़ देता है और दूसरी स्त्री को अपना लेता है, तो वह दुखी होती है, पर सती होना उसे कबूल नहीं है। वह अपने हृदय की खाली जगह एक अन्य पुरुष से भर लेती है।

इस मंथन से निष्कर्ष यह निकलता दिखाई देता है कि किसी से एकनिष्ठता की माँग करना नैतिक नहीं है। प्रेम पैदा होता है, तो मर भी सकता है। लेकिन अगर किसी ने एकनिष्ठता का जीवन चुना है, तो उसे बौड़म या ठहरा हुआ क्यों मान लिया जाए? सबको अपना जीवन अपने तरीके से जीने का अधिकार है। एक तरीका किसी को ठीक लगता है, तो इससे दूसरा तरीका अपने आप बुरा नहीं हो जाता। 000

Friday, August 28, 2009

नारी सशक्तीकरण की दिशा में एक मिसाल

नारी सशक्तीकरण की दिशा में अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति की बदौलत अमेरिका देवी व तिलिया देवी ने चमत्कारिक काम कर विश्व पटल पर सुर्खियां पा ली हैं। इसके लिए दोनों को काफी संघर्ष करना पड़ा, लेकिन वे हार नहीं मानी। तभी तो दोनों वर्ष 2004 में नेयॉन फाउंडेशन द्वारा वुमन ऑफ सब्सेंटस अवार्ड से सम्मानित और 2005 में नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया। इन दिनों वे महादलितों को शिक्षा सहित अन्य क्षेत्रों में जागरूक करने में जुटी हैं। झझारपुर अनुमंडल केलखनौर प्रखंड के खैरी गाव की मुसहर जाति की तिलिया देवी व सोहराय गाव की अमेरिका देवी को 07 जुलाई 2005 को नोबल पुरस्कार के लिए नामित किया गया था। तिलिया ने अपने गाव खैरी सहित लखनौर, बलिया, लेलिननगर, कमलदाहा मुसहरी, बेलौचा, निर्मला, उमरी आदि मुसहरी व अमेरिका ने अपने गाव सोहराय सहित मदनपुर खतवेटोल, गोट सोहराय सहित आसपास की मुसहर जातियों के घर-घर जाकर उन्हें जागरूक करना शुरू कर दिया। अमेरिका देवी ने कहा कि 360 परिवार वाले सोहराय गाव में 18 महिलाओं का स्वयं सहायता समूह बनाकर करीब 360 महिलाओं को हस्ताक्षर करना सिखाया। अब ये अंगूठा छाप के कलंक से मुक्त हो गयी हैं। इन्हें आर्थिक रूप से बैंकों से जोड़ कर मजबूत भी किया गया है। इसी तरह तिलिया देवी ने भी 48 स्वयं सहायता समूहों का गठन कराकर 700 महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बना दिया है। नारी सशक्तीकरण की दिशा अब नगरों से गांवों की ओर भी चल पड़ी है.
साभार : जागरण

आकांक्षा यादव

नो वर्क नो सैलरी - नो सेक्स नो फूड !क्यों ?

स्त्री को उसकी सही औकात{उनके हिसाब से 'पाँव की जूती' जो कॉलेज के दिनों मे अपने सहपाठी को कहते सुना था} बताने मे कट्टर पितृसत्तावादी ,मर्दवादी समाज कभी पीछे नही हटे इसका गवाह है हमारा इतिहास।कभी उसे डायन बता कर खौलते तेल मे डाल दिया जाता है ,कभी ज़लील किया जाताहै,बलत्क्रत किया जाता है।विडम्बना है कि यह उन एशियाई समाजों मे अधिक होता है जो खुद को नैतिकतावादी मानते हैं , संस्कृति की रक्षा के लिए जान लड़ा देते हैं।{पर क्या सच मे नैतिक हैं ? संस्कारवान हैं?}शोध साफ दिखाते हैं कि दुनिया के बाकी सभी हिस्सों से कहीं अधिक वेश्यावृत्ति एशिआई देशों मे है।दिक्कत यह है कि अफगानिस्तान , पाकिस्तान जैसे देशों के बारे मे क्या कहा जाए जो धर्म के नाम पर स्त्री की गर्दन पर तलवार की नोक का पहरा बिठाए रखते हैं।विरोध तो दर्ज करना ही होगा।




घर , घरवालियां और सेक्स


नीलिमा


पिछले दिनों अफगानिस्तान में घोषित नए कानून के द्वारा मानवीयता की सारी हदें पार कर दी गईं ! इसके मुताबिक अपनी पत्नी द्वारा सेक्स से वंचित पति उसे खाना देने से इंकार कर सकता है ! इसके अनुसार पत्नी को चार दिन में कमसे कम एक बार अपने पति की शारीरिक इच्छा की पूर्ति करनी होगी ! इससे विवाह की परिधि में पत्नी से बलात्कार को कानूनी मान्यता दी गई ! इसे घोषित करने वाले अफगान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई का समर्थन अफगान के रुढिवादी संगठनों ने किया जिनके बल पर चुनावी राजनीति का निकृष्टतम दांव खेला गया ! इस कानून का पश्चिमी नेताओं और अफगानी स्त्री संगठनों नेविरोध और निंदा की !

नो वर्क नो सैलरी - नो सेक्स नो फूड ! अफगानी समाज में स्त्री की पारिवार में स्थिति कामगार की तरह है ! जिसका काम पति की शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना और उसके बच्चों को पालना मात्र है ! उसके एवज में पति उसे खाना और रहने की जगह देकर इस घरेलू कामगार के प्रति अपने कर्तव्य की इतिश्री करता है !

अफगान समाज तो बहुत सभ्य निकला ! उसने विवाह ,परिवार, स्त्री की बराबरी से जुडी कई वैश्विक समस्याओं को इतने सहज तरीके से सुलटा दिया ! इसने विश्व को समझा दिया कि कि सभ्य समाज में स्त्री और पुरुष के संबंध तो कबीलाई ही रहेंगे ! कितनी भी कवायदें आप कर लें कितना भी आप विमर्श कर लें ! स्त्री का जन्म एक घरेलू मजदूर के रूप में हुआ है इस सच से मुंह नहीं मोड सकते !

दिहाडी मजदूरी को हम आज तक नहीं खत्म कर सके ! मजदूर संगठन बनते टूटते रहते हैं पर मजदूरों की बेबसी बनी रहती है ! स्त्री के साथ भी यही स्थिति है ! अफगान हमसे ज़्यादा दो टूक है ! उसने बराबरी , हकों और सम्मान के सारे भ्रमों को तोडते हुए जो बात साफ साफ कही विश्व के बडे - बडे स्ट्रेट फार्वर्ड समाज नहीं कह पाए !

दरअसल स्त्री की देह तो एक कॉलोनी मात्र है ! जिसका इसपर कब्ज़ा है वही उसका मालिक है ! अपने श्रम से औपनिवेशिक ताकतों की इच्छाओं की पूर्ति करते जाना और बदले में भोजन ताकि जीवित रहा जा सके और अगले दिन की बेगारी के लिए तैयार रहा जा सके !

अगर ज़्यादा कडवा सच पचा पाएं तो - स्त्री की योनि एक कॉलोनी मात्र है ! जिसके शोषण की एवज में स्त्री जीवित रहने की हकदार होती है ! प्रतिबंधित समाज इस सच को कहने में नहीं झिझकते ! खुले समाजों में शब्दों की चाशनी , विचारों और विमर्शों की तहों में यह धारणा लिपटी रह जाती है !

स्त्री का अस्तित्व राजनीति के लिए बहुत बढिया पैंतरा है ! सभ्य कहे जाने वाले समाजों में स्त्री की मुक्ति और बंद समाजों में उसकी दासता के एलान के बल पर राजनीतिक ताकतें सत्ता का खेल खेलतीं हैं ! स्त्री की गुलामी और आज़ादी दोनों का राजनीतिक इस्तेमाल सबसे भारी दांव होता है ! स्त्री विमर्श की बडी लेखिका मृणाल पांडे मानतीं हैं कि स्त्री- आंदोलनों को राजनीतिक पार्टियां अपने फायदें में ऎप्रोप्रिएट कर लेतीं हैं ! ऎसे में स्त्री के पारिवारिक - सामाजिक अधिकार और बराबरी एक ऎसा समीकरण होता है जिसका जितना उलझाव होगा उतना ही फायदा पुरुष समाज का होगा !

घर की चौखट में सुरक्षित दिखने वाली स्त्री उसके भीतर कितने शोषण और समझौतों के बावजूद ही रह पा रही है इसका अंदाज़ा शायद उन विवाहिताओं बनाम पीडिताओं को भी नहीं होता ! स्नेह , कर्तव्य ,आदर्श ,नैतिकता, प्रेम ..जैसे कई छलावों में लिपटा सच यही है कि विवाह स्त्री के लिए एक समझौता और करार है ! क्या विवाह एक यौन पशु के लिए चारे और सुविधा का इंतज़ाम है जिसके जरिए वह सत्ताधीश कहलाता है और उसका वंश भी आगे बढता रहता है ?

मार्ग्रेट श्राइनर का उपन्यास - घर , घरवालियां और सेक्स पढकर समाज की मुख्य बुनियाद विवाह और परिवार पर ही अनेक शक पैदा होते है ! स्त्री और पुरुष के संबध विवाह के बाहर और भीतर दोनों ही जगह शोषक - शोषित और मालिक - मजदूर के हैं ! सामाजिक विकास के चरणों में कबीलाई समाज की मूल प्रवृत्तियां बदल नहीं पाईं

Thursday, August 27, 2009

स्त्री की हँसी से ज़्यादा है उसके के आँसुओ का मोल?

इसलिए रुलाया जाता है उसे पाने को मोती ?क्या है यह लोककथा कोई जिसे गढ लेता है मानव मन जब पा नही पाता कोई पार ,'क्यों है ऐसा'

उसकी समझ से परे होता है।और कला के जामे में बह पड़ती है वेदना सवाल खड़े करती हुई !



A tale of two princesses -


Once there was a princess,who wept pearls,

And once there was a princess

who laughed flowers. both died, I heard.

One of weeping

And the other of laughter.

But not because one's eyes went dry

Or the other forgot how to laugh.

One died of suffocation

Entombed in pearls.The other choked

On a surfeit of flowers.


The pearls were sold for a fortune, I heard.

But the wilted flowers brought no gain at all.

Since then,I have heard

A womans tears have become

Far more precious than her laughter!


- Deepa Agarwal


Deepa Agarwal writes consistently good poetry ,which stands against women's marginalisation and articulates with rare artistry the desire ,pain,frustration and indignation of the womenfolk in a patriarchal society with its oppressive values.formerly she was teaching in Delhi University.

Wednesday, August 26, 2009

नही पिता !

नीला प्रसाद

जितना आप सोचते हैं

उतना आसान नहीं है

एक पेड़ को मनचाहा आकार देना

या अपनी बेटी को गढ़ना..

वह एक नन्हा सा बिरवा

जिसे आपने उगाया

आपकी आंखों के सामने बढ़ती है

और धीरे धीरे फैलती हुई

एक आकार लेना शुरू करती है

कि आप अपने आदर्शों, मान्यताओं, तरीकों

और परंपराओं की कुल्हाड़ी ले

बड़ी उतावली से उसे छीलना छांटना

शुरू कर देते हैं

कि कहीं वह फैल न जाए

आपके अनचाहे आकार में

बिना इस चिंता के

कि इस प्रक्रिया में वह आपसे

मन से बहुत दूर न चली जाए

आप भूलते हैं

कि हर बार

जैसे ही उसे छीलकर

काट कर उसकी टहनियां

आप अलग हटते हैं

अपना काम खत्म जान

वह एक बार फिर से जनमना शुरू करती है

अंदर ही अंदर

अबकी बार कम फैलाते हुए

अपनी विद्रोही टहनियां बाहर

पर जड़ें ज्यादा अंदर जमाते हुए

आप चाहते हैं कि वह ठीक वैसे ही बढ़े

जैसे आपका सपना है

पर आप भूलते हैं

कि उतना आसान नहीं है

प्रकृति को मुट्ठी में बंद कर

उगने उमगने से रोकना

या एक टहनी को

आसमान की ओर मुंह कर

अलग अलग दिशाओं में फैल

छांहदार वृक्ष बनने से टोकना..

नहीं पिता

उतना आसान नहीं है

अपनी बेटी को मनचाहे रूप में गढ़ना!!

.........


कवयित्री का परिचय, बकलमखुद -

  • जन्म और शिक्षा रांची में.
  • आजीविका के लिए अफसरी.फिलहाल कोल इण्डिया लिमिटेड में कार्मिक प्रबंधक.
  • 16 की उम्र से राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं, अखबारों, आकाशवाणी रांची और बाद में रांची दूरदर्शन से जुड़ी रही
  • जनसत्ता,कथादेश ,इरावती मे कई लेख व कहानियाँ प्रकाशित
  • अब नेट की दुनिया से भी जुड़ने और पहले कहानी संग्रह के लिए प्रकाशक तलाशने का इरादा.

जीना ऐसे भी

राजकिशोर
सौदामिनी को मैं तब से जानता हूं जब उसने बीए भी नहीं किया था। वह कोई कठिन कविता या निबंध का अर्थ समझने के लिए हमारे घर आती थी। उसकी आंखों में एक खास किस्म की चमक थी। वह चमक दूर से ही कहती थी कि यह लड़की बहुत आगे जाएगी। एक बार निराला की एक भक्ति-कविता पढ़ कर सौदामिनी ने पूछा था, इस जमाने में भी ऐसी कविताएं क्यों लिखी जाती हैं। लिखी जाती हैं, तो स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई क्यों जाती है? शिक्षा विभाग के अधिकारी ऐसे बौड़म मूल्य हमारे जीवन में क्यों भरना चाहते हैं? अपना जीवन तो हमें ही चलाना है। इसमें प्रभु क्या कर लेंगे? मैंने उसे बताया कि निराला जी वेदांती थे। इसलिए वे ऐसी कविताएं लिखते थे। सौदामिनी ने कहा, ‘सर, मैं निराला जी का सम्मान करती हूं। उनकी बहुत-सी कविताएं मुझे पसंद हैं। पर वेदांत ? नो। यह एक फाल्स विचारधारा है। आत्मा-परमात्मा का जमाना चला गया। अब हम खुद अपने ईश्वर हैं। लेकिन क्लास में इस बात की और इशारा तक नहीं किया जाता। साहित्य के हमारे शिक्षक भी खुद वेदांती नहीं हैं। कम से कम उनकी जीवन चर्या में तो वेदांत की कोई झलक हमें दिखाई नहीं देती। पर यह भक्ति वाली कविता वे इस तरह पढ़ाते हैं जैसे पूरी क्लास को वेदांती बना कर छोड़ेंगे।’ सौदामिनी से बीच-बीच में संपर्क होता रहा। कभी-कभी उसका फोन भी आ जाता था। उसके बारे में मेरे पास आखिरी समाचार यह था कि वह किसी विश्वविद्यालय में पढ़ा रही है। वही सौदामिनी पिछले हफ्ते हमारे घर आई, तो उसका स्वस्थ भरा-पूरा शरीर देख कर आंखें जुड़ा गर्इं। वह मेरे लिए कुछ नई पुस्तकें भी लाई थी। हालचाल जानने के बाद मैंने पूछा, अपने पतिदेव को साथ नहीं लाई? वे क्या करते हैं? सौदामिनी ने बताया, ‘वे एक विज्ञापन कंपनी चलाती हैं। आज वे भी मेरा साथ आने वाली थीं, पर अचानक एक जरूरी मीटिंग आ जाने से सुबह ही निकल गर्इं।’ वह बड़ी गंभीरता से बोल रही थी, पर जाहिर था कि वह भीतर ही भीतर अपनी हंसी रोक रही है। मैं भी विस्मित हुआ, ‘क्या? तुम दोनों लेस्बियन तो नहीं हो?’ सौदामिनी ने अपनी आवाज में कोई रंग लाए बिना कहा, ‘ मैं जानती थी कि आप यह सवाल जरूर पूछेंगे। सभी पूछते हैं। नहीं, हम लेस्बियन नहीं हैं।’ मैंने स्पष्ट किया, ‘दरअसल, दो स्त्रियों के साथ-साथ रहने और परिवार जैसा बसाने से मन में पहला सवाल यही आता है। मेरे अपने शब्दकोश में लेस्बियन होना गाली नहीं है। इसलिए तुम्हें मेरे सवाल से नाराज नही होना चाहिए। यह एक असाधारण बात जरूर है, इसलिए पूछ बैठा।’ सौदामिनी ने शांत स्वर में, लेकिन कुछ तुर्शी के साथ कहा, ‘हां, यह असाधारण बात है। साधारण बात यह है कि पत्नी बनने के बाद स्त्री पति की गुलाम हो जाए। पति की अतार्किक बात न मानने पर पिटती रहे। साधारण बात यह है कि पत्नी पति के सचिव की तरह काम करे और अपने कैरियर की चिंता न करे। पति के रिसर्च करने में सहायक बने और खुद लिखना-पढ़ना छोड़ दे। मैंने दो विवाह किए, दोनों का निचोड़ यही है।’ उसकी पीड़ा ने मुझे विचलित कर दिया। मैंने जानना चाहा, ‘तुम्हारे पति की कहानी भी कुछ ऐसी ही है क्या?’ सौदामिनी – ‘सर, कहानी सभी की एक जैसी ही है। कोई-कोई जाहिर कर देती है, ज्यादातर इस उम्मीद में चुप रहती हैं कि आगे शायद आगे बेहतर दिन आएंगे। यह उम्मीद उनके बूढ़ी हो जाने तक बनी रहती है। लेकिन आप हमें पति-पत्नी तो न कहें। पति और पत्नी शब्दों के उच्चारण में हैसियत का जो फर्क तरंगित होता है, वह हमें मंजूर नहीं है। हम बराबरी की हैसियत से साथ हैं। हममें न कोई पति है, न कोई पत्नी है। या तो हम दोनों पति हैं या हम दोनों पत्नियां हैं। परिवार में वर्ग विभाजन को हमने खत्म कर दिया है।’ सौदामिनी ने अपनी जीवन साथी श्वेता के बारे में जो कुछ बताया, वह भी कम विचलित करने वाला नहीं था। श्वेता ने एक फ्रेंच लड़के से शादी की थी। उन्हें एक बच्चा भी हुआ। बच्चा होने के बाद ही उसका पति इधर-उधर मुंह मारने लगा। जब बात बहुत आगे बढ़ गई, तो एक दिन पति को बैठा कर श्वेता ने उससे बातचीत की। इस पर वह उखड़ गया। कहने लगा कि तुम इंडियन्स बहुत दकियानूस हो। यह मेरी पर्सनल लाइफ है, इससे तुम्हें क्या मतलब? तुम भी चाहो तो मल्टिपुल रिलेशन्स बनाओ, मैं बिलकुल एतराज नहीं करूंगा। श्वेता ने कहा, रिलेशन तो हो। मैं तुम्हारी तरह फ्लर्ट नहीं कर सकती। उसने कहा, फ्लर्टेशन इज द स्पाइस ऑफ लाइफ (फ्लर्ट करना जिंदगी को मसालेदार बनाए रखता है)। श्वेता ने जवाब दिना, जिंदगी मेरे लिए मसाला नहीं है। इसके बाद दोनों में तनातनी रहने लगी। आखीर में तलाक हो गया। सौदामिनी ने बताया, ‘अब श्वेता और उसका लड़का तथा मैं साथ-साथ रहते हैं। फ्लैट भी हम दोनों ने पैसा मिला कर खरीदा है।’ मुझे अफसोस हुआ, ‘गलती उस नालायक फ्रेंच की थी, नतीजा भुगत रहा है बच्चा। उसके सिर पर पिता का साया नहीं है।’ सौदामिनी फिर तुनक गई, ‘एक पुरुष और एक स्त्री के स्थान पर दो स्त्रियों का साया क्या कुछ कम है? उसके दो-दो माएं हैं। वह हमारे प्यार-दुलार से बहुत खुश रहता है। और, स्त्री-पुरुष की तरह दो पुरुष या दो स्त्रियां घरबार क्यों नहीं बसा सकते? इसके लिए होमो या लेस्बियन होना जरूरी क्यों है?’ सौदामिनी ने अपनी बात थोड़ी और स्पष्ट की, ‘अब आप शायद यह पूछना चाह रहे होंगे कि क्या श्वेता को या मुझे पुरुष की जरूरत महसूस नहीं होती? होती है, तमाम कटु अनुभवों के बावजूद होती है। हमें जो पुरुष मिले, वे एक ही ढर्रे के थे, इससे यह साबित नहीं होता कि सब पुरुष एक ही जैसे होते हैं। लेकिन हम अभी इंतजार करना चाहते हैं। कोई मन लायक आदमी मिला तो देखेंगे। हां, यह तय है कि उससे विवाह नहीं करेंगे। हमारा संबंध मित्रता तक सीमित रहेगा। पर इसका गलत अर्थ न लिया जाए। मित्रता अपने आपमें एक असीमित संबंध है। हो सकता है, आगे चल कर मैं मां बनना भी चाहूं। पर यह मैं अपने दम पर करूंगी। अपने बच्चे के जैविक पिता को किसी बंधन में नहीं डालूंगी। वह मेरा दोस्त ही रहेगा, मेरा पति नहीं हो जाएगा। क्यों, इसमें कुछ गलत तो नहीं है?’ मेरे मुंह से निकला -- ‘बिलकुल नहीं’। पर मैंने पाया कि मेरे हामी भरने में मेरी आत्मा का पूरा बल नहीं था। मैंने अपने आपसे सवाल किया, भीतर ही भीतर क्या मैं भी औरों जितना ही दकियानूस हूं? 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Tuesday, August 25, 2009

बेटी के जन्म पर जश्न



हो सकता है कि चित्र में दिया गया समाचार स्पष्ट रूप से पढ़ने में न आ रहा हो किन्तु उसका शीर्षक तो स्पष्ट है। हो सकता है कि बहुतों के लिए यह आश्चर्य का भी विषय हो किन्तु यह सत्य है। होना भी चाहिए क्योंकि....कारण सभी को स्पष्ट हैं।
यह पोस्ट बस यह बताने के लिए आज के इस दौर में जहाँ एक पुत्र के लिए कई कई बेटियों की बलि गर्भ में या फिर जिन्दा में दे दी जाती हो वहाँ इस तरह की बिरादरी भी है जो बेटी के जन्म पर उत्सव मनाते हैं और पुत्र के होने पर समूची बस्ती में चूल्हा नहीं जलाया जाता है।
खास बात यह भी है कि लड़की का हाथ माँगने के लिए लड़के वाले अच्छी खासी रकम ही नहीं देते वरन बिरादरी के खानपान का भी खर्चा उठाते हैं।
महिलायें घर का काम करने के साथ साथ परिवार के भरण पोषण के लिए धन का इंतजाम करना होता है। यह समुदाय भीख माँग कर अपना गुजारा करता है। इस समुदाय के पुरूष बच्चों को, मवेशियों को सँभलने का काम करते हैं।
फैजाबाद जनपद में इस समुदाय के लोगों की संख्या चार हजार के आसपास है। अनुसूचित जाति समुदाय के ये लोग बेटी को लक्ष्मी मान कर उसके जन्म पर प्रसन्न होते हैं पर सरकारी योजनाओं को इन पर प्रसन्न होने की फुर्सत नहीं। ये लोग अभी भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं।
बहरहाल इस समुदाय के लोग पुत्री के जन्म पर खुशियाँ मना कर आज के तथाकथित आधुनिक समाज के मुँह पर एक तमाचा ही जड़ते हैं। क्या हमारे समाज के पुत्र मोह में फँसे लोग इस ओर ध्यान देंगे?
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विशेष --- यह समाचार अमर उजाला दिनांक 25 अगस्त 2009 के अंक में प्रकाशित किया गया है।

Thursday, August 20, 2009

मंगलेश डबराल की कविता- अगले दिन

मंगलेश डबराल मेरे पसंदीदा कवियों मे से है। उनकी एक कविता, उनके काव्य संकलन "पहाड़ पर लालटेन" से साभार.

अगले दिन

पहले उसकी सिहरती हुयी पीठ देखी
फ़िर दिखा चेहरा
पीठ जैसा ही निर्विर्कार
कितने सारे चहरे लांघकर आया हुआ
वह चेहरा जिस पर दो आँखे थी
सिर्फ़ देखती हुयी, कुछ न चाहती हुयी।

वह अकेली थी उस रात
वह कही जा रही थी अपना बचपन छोड़ कर
कितने सारे लोगो द्वारा आतंकित
कितने सारे लोगो द्वारा सम्मोहित
कितने सारे लोगो की तनी हुयी आँखों के नीचे
कितनी झुकी है उसकी आँखे
की वह देख नही पाती अपनी और आती मृत्यू

हर चीज़ के आख़िरी सिरे तक
वे उसके पीछे जायेंगे
जहा से एक सुरंग शुरू होती है
सुरंग मे कई पेडों मे से एक पेड़ तले
बैठा होता है उसका परिवार
माँ-बाप, भाई बहन
और पोटलिया जिनमे भविष्य बंद है
सापों की तरह

वों सारा कुछ सोच कर रखेंगे
पहले से दया, पहले से प्रेम
पहले से तैयार थरथराते हाथ
वे उसे पा लेंगे बिना परिवार के
बिना बचपन के, बिना भविष्य के
और खींच ले जायेंगे एक जगह

कोई नही जान पायेगा किस जगह
डराते मंत्रमुग्ध करते
अगले दिन उसके भीतर
मिलेंगे कितने झडे पत्ते
अगले दिन मिलेगी खुरो की छाप
अगले दिन अपनी देह लगेगी बेकार
आत्मा हो जायेगी असमर्थ
कितने कीचड कितने खून से भरी
रात होगी उसके भीतर अगले दिन

Tuesday, August 18, 2009

सरनेम की महिमा

पिछले दिनों एक मित्र बेहद परेशान से हाल में मेरे पास आईं. उसे मदद के रूप में मेरी सलाह चाहिए थी. सलाह देना यूं तो सबसे बढिय़ा काम है लेकिन अगर आपकी सलाह से किसी का जीवन राह बदलने वाला हो तो इस काम से गुरुतर कोई काम नहीं हो सकता. बहरहाल, उन्हें मैं क्या सलाह दूं या यह असमंजस अब तक मुझे बेचैन किये है.

मेरी मित्र पेशे से डॉक्टर है. उसने अपनी मर्जी से अंतर्जातीय विवाह किया है. उसके पति भी डॉक्टर हैं. शादी के पांच बरस बाद उसके पति जिस बात पर तलाक देना चाहते हैं वह है उसका सरनेम. उस लड़की ने शादी के बाद अपना सरनेम नहीं बदला. इसके कई कारण थे लेकिन मेरे लिए इतना ही काफी था कि वह नहीं चाहती थी सरनेम बदलना और उसने नहीं बदला. इस बारे में दोनों के बीच शादी से पहले ही बात हो चुकी थी. फिर आज क्या हुआ कि सरनेम जैसे मुद्दे पर एक परिवार टूटने को है. चूंकि मेरा उसके पति से भी ठीकठाक संवाद है सो मैंने उससे बात करनी चाही कि इत्ती सी बात...वह बात पूरी होने से पहले ही भड़क गया. इत्ती सी बात नहीं है यह... वह फफक पड़ा. इत्ती सी बात नहीं है. मुझे बहुत बुरा लगता है. सोसायटी में मैं बेहद कमजोर, हीन और गिरा हुआ महसूस करता हूं. जो औरत मेरी पहचान को नहीं अपना सकती वो मेरी पत्नी है. मेरे दोस्त भी दबी जुबान में मेरा मजाक उड़ाते हैं. घुट रहा हूं मैं पिछले पाँच सालों से. ऐसा लगता है मेरे व्यक्तित्व को तहस-नहस कर रहा है इसका नाम. मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता.

सरनेम....कितना महत्वपूर्ण है यह. हमारी पितृसत्ता की यही व्यवस्था है कि एक स्त्री को अपने पति (परमेश्वर) की हर चीज को अपना लेना है. सिरे से. मिसेज वर्मा, मिसेज अवस्थी या मिसेज रस्तोगी वगैरह बनकर सबसे पहले अपनी पहचान गुमा दो. फिर अपना रहन-सहन, खान-पान, आदतें, रीति-रिवाज, रिश्ते-नाते सब कुछ. हासिल फिर भी सिर्फ कुछ रुसवाइयां, कुछ तल्खियां.

क्या करना चाहिए मेरी मित्र को. उसे सरनेम चेंज कर लेना चाहिए क्या? अगर इतनी सी बात से किसी का रिश्ता बच जाए तो इससे बेहतर भला हो भी क्या हो सकता है. वैसे भी हर रिश्ते में थोड़ा बहुत एडजेस्टमेंट तो करना ही पड़ता है. यह सलाह मेरे ज़ेहन में साफ तौर पर उभरी लेकिन जाने क्यों कुछ बातों ने जबान पर गांठें लगा रखी हैं. और अपनी सलाह को लेकर मैं खुद फिक्रमंद हूं. मसलन,
क्या सरनेम चेंज करने भर से उनका रिश्ता संवर जायेगा?
क्या इसके बाद कोई परीक्षा नहीं देनी होगी उसे?
क्या इसके पहले उसने कोई और परीक्षा नहीं दी है?
किस-किस मोड़ पर साबित करनी होगी अपनी वफादारी और समर्पण?
जिन्होंने सरनेम ही क्या पूरा व्यक्तित्व ही बदल लिए हैं, क्या उनकी $िजंदगी में सब सामान्य है?
यह कौन सी शर्त है रिश्तों को सामान्य रखने की कि तुम तो खुद को भुला दो लेकिन हमसे कोई उम्मीद न रखना?
यह कौन सा समाज है जो अहंकार की टंगड़ी लगाकर रिश्तों को चोट पहुंचा रहा है?
मैं क्या सलाह दूं असमंजस जारी है....
- प्रतिभा कटियार

Thursday, August 13, 2009

सूअर फ्लू के बहाने : मारक दवा?

मुझे अक्सर घर से फ़ोन आते है, स्वाइन फ्लू से बचने के लिए, उससे ये अहसास होता है कि भय या तो बहुत ब्यापक है या फ़िर मीडीया के ज़रिये अतिरंजना करके फैलाया गया.
"स्वाइन फ्लू" सर्दी जुकाम वाले वायरस "influenza वायरस" का ही एक नया strain H1N1 है, और इसके symptoms भी काफी कुछ सर्दी जुखाम वाले ही है। पहले ये अनुमान था कि ये स्ट्रेन सूअर से मनुष्य मे संकर्मित हुआ है, और इसी के चलते ये नाम पडा। ये स्ट्रेन दो या तीन तरह के अलग-अलग वायरस से मिलकर बना है। कुछ उसी तरह जैसे दो साल पहले बर्ड -फ्लू वाला स्ट्रेन आया था। ये कोई अभी की घटना नही है। एक जानवर से दूसरे मे अक्सर बीमारियों का संक्रमण होता है, और जानवरों से मनुष्य या इसके विपरीत के भी कई उदाहरण है। एक उदाहरण तपेदिक यानी टी. बी. , भी है जो पशुपालन के नतीजे के तौर पर मनुष्य ने गाय-भैसों से पायी है। दूसरी बीमारी एड्स है जो एक तरह के बंदरो से मनुष्य मे संकर्मित है।

स्वाइन फ्लू ,ये एक नया strain है, और हमारा शरीर अभी इसे ठीक से पहचानता नही है, इसीलिये प्रतिरोध की क्षमता बढ़ते हुए आपेक्षाकृत थोडा ज्यादा समय लगेगा। इस वायरस की पहचान आसानी से की जा सकती है, क्योकि जीनोम सीकेकुएंस हो चुका है, पर शायद रेडी-गो टाइप की किट्स का बाज़ार मे पर्याप्त मात्रा मे होने मे कुछ समय लगेगा। टेस्ट होना और इलाज़ होने मे अन्तर है। अगर स्वाइन फ्लू का टेस्ट positive भी है, फ़िर भी अन्य वायरस से होने वाले सर्दी जुखाम की तरह कोई मारक इलाज़ इसका सम्भव नही है। वायरस से जनित बिमारियों के लिए मशहूर है "की बिना इलाज़ सात दिन, इलाज़ करके एक हफ्ते का समय" फ्लू को ठीक होने मे लगता है।
फ्लू के लिए सबसे कम नुकसानदेह इलाज़ फ्लू वैक्सीन है, जो कोई दवा नही बल्की हमारी प्रतिरोध क्षमता को बढाने का एक तरीका है, अन्य सभी टीको की तरह।
हालाकि पिछले १० साल मैंने हर साल फ्लू वैक्सीन ली है, और हर सीज़न मे फ्लू के एक से अधिक बार हुआ है। फ्लू का टीका वास्तव मे फ्लू बचाने मे कितना कारगर हुया है, ये यकीन के साथ अपने अनुभव से मैं नही कह सकती। सिर्फ़ इतना हुया है, कि शायद symptoms थोड़े कम तीव्र हुए हो। ७ दिन की बजाय ५ दिन मे फ्लू ठीक हो गया हो। जिस तरह से बैक्टीरीया जनित बीमारियों से बचाव वैक्सीन से हो जाता है, वायरस के ऊपर वैक्सीन या टीका ज्यादा असर करता नही इसका प्रमुख कारण ये है कि वायरस अतिसूक्ष्म जीनोम वाले और बड़ी जल्दी-जल्दी बदलने की क्षमता रखते है। इतनी की ६ महीने मे एक वायरस के १० नए strain बन सकते है, और एक वैक्सीन को बनने मे भी कम से कम ३-४ महीने लगते है। जो मूल वायरस को लेकर वैक्सीन बनायी जाती है, अगले सीजन तक वों इतना बदल चुका होता है, कि वैक्सीन पूरी कारगर नही होती। आज सायंस इतनी तरक्की की है, हजारो की संख्या मे वायरस के जीनोम की सीकुएंस हमारे पास है, और पहले के मुकाबले कुछ हद तक ये अनुमान लगाया जा सकता है कि अगले सीजन मे कौन सा strain होगा। और कुछ इसी आधार पर हर साल के लिए नयी फ्लू वैक्सीन बनती है। पर ये अनुमान १००% सही नही होता, और अलग-अलग मौसम और भोगोलिक परिस्थितियों मे अलग-अलग strains होंगे और कोई एक टीका काम नही करेगा। इस फ्लू का भी सबसे सक्षम इलाज़ मनुष्य के अपने भीतर की प्रतिरोधक क्षमता ही है। इसीलिये संतुलित भोजन, व्यायाम , साफ़-सफाई, हँसना, और तनाव मुक्त होना जैसी मामूली चीजे सबसे ज्यादा कारगर होंगी।
1। मुह पर रूमाल रखकर खांसे,
2. इधर-उधर थूके,
3. बार साबुन से हाथ धोये,
4. और बीमार हो तो कम से कम लोगो से मिले।
5. खूब पानी पिए, और
6. अपने को ज्यादा नही थकाए तो ये संभावना सब के लिए थोड़ी से घट जायेगी।

जिसे भी बता सके, उससे कहे की बहुत डरने की ज़रूरत नही है, कुछ सावधानी बरते!
फ्लू के बारे मे अधिक जानकारी के लिए यहाँ देखे.

दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष ये है कि अकेले अपने दम पर, अपनी जेब की दम पर इसका मुकाबिला करना सम्भव नही है
खासतौर पर बाज़ार और मुनाफे के सरोकारों मे लगा मीडीया इस सच को कभी सामने नही लाएगा. ये एक संक्रमित बीमारी है, और अमीर-गरीब, स्त्री पुरूष, काले-गोरे का भेद नही करेगी। १०० करोड़ जनसँख्या वाले देश मे व्यक्तिगत हाईजीन अगर एक चौथाई तबका फोलो भी करे तब भी ख़ुद को बचा नही पायेगा। अपने-अपने द्वीप मे हम नही रहते, और इसीलिये, अपने और अपनो को बचाने की इस मुहीम का सबसे कारगर हिस्सा, मास्क खरीदने, फ्लू के मंहगे टेस्ट के पीछे भागने की बजाय पुब्लिक हायजीन को ठीक करने मे हमारा थोडा -बहुत योगदान , सहयोग हो सकता है। और ये एक आदमी के बूते की बात नही है, बल्की कई लोगो का मिलाजुला अपने-अपने स्तर पर प्रयास हो सकता है। इतिहास की महामारियों, जिनमे प्लेग काफी कुविख्यात है, का सबसे बड़ा प्रतिरोध पब्लिक स्पेस मे लोगो की सामूहिक भागीदारी के जरिये साफ़-सफाई का ही रहा है।

आज़ादी की लड़ाई के साथ सामाजिक सारोकार की और आमजन की भागीदारी एक और मुहीम महात्मा गांधी ने चलाई थी। वों थी सफाई अभियान। पढ़े-लिखे, छात्र और नागरिको को शहरी और सार्वजानिक स्थलों की सफाई मे भागीदार बनाना। गरीब बस्तियों मे शिक्षा और स्वास्थ्य संबन्धी जानकारी इसका प्रचार करना, शिक्षा और सूचना को समाज के कमजोर हिस्सों तक पहुचना और सबके लिए सार्वजनिक जीवन को बेहतर बनाने के लिए इसका इस्तेमाल करना।
मात्र साठ सालो मे उस परम्परा के बिम्ब भी आज़ाद भारत मे नयी पीढी के पास नही है। सामजिक सारोकार का सारा ठेका हमने NGOs को दे दिया है, और ख़ुद अपने-अपने दब्डो मे सिमटते चले गए है।

आज़ादी की पूर्वसंध्या पर जब देश मे बहुत से लोग स्वाइन फ्लू के आतंक से घिरे है, अपनी जेबों मे अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को तलाश रहे है, और बाज़ार कुछ असली नकली मास्क और तमाम तरह की चीजों को बेचने मे लगा है, और मीडीया का काम सिर्फ़ सनसनी फैलाना भर है, मुझे लगता है की ब्लॉग जैसे सीमित मंच से ही सही, अपनी इस भूली-बिसरी परम्पराये जो आजादी के आन्दोलन के साथ शुरू हुयी थी, को याद करने का ये सटीक समय है। इस अवसर पर एक दूसरे को शुभकामनाये दे और एक दूसरे की राजनैतिक, सामाजिक आज़ादी की और स्वास्थ्य की कामना करे ? और इसे बरकरार रखने के लिए कुछ प्रयास करे!

Wednesday, August 12, 2009

वन्देमातरम की स्वर लहरियाँ बिखेरतीं 6 सगी मुस्लिम बहनें

पिछले दिनों मुस्लिमों द्वारा वन्देमातरम् न गाने के दारूउलम के फतवे पर निगाह गई तो उसी के साथ ऐसे लोगों पर भी समाज में निगाह गई जो इस वन्देमातरम् को धर्म से परे देखते और सोचते हैं। मशहूर शायर मुनव्वर राना ने तो ऐसे फतवों की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए यहाँ तक कह दिया कि वन्देमातरम् गीत गाने से अगर इस्लाम खतरे में पड़ सकता है तो इसका मतलब हुआ कि इस्लाम बहुत कमजोर मजहब है। प्रसिद्ध शायर अंसार कंबरी तो अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं-मस्जिद में पुजारी हो और मंदिर में नमाजी/हो किस तरह यह फेरबदल, सोच रहा हूँ। ए.आर. रहमान तक ने वन्देमातरम् गीत गाकर देश की शान में इजाफा किया है। ऐसे में स्वयं मुस्लिम बुद्धिजीवी ही ऐसे फतवे की व्यवहारिकता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता ए.जेड. कलीम जायसी कहते है कि इस्लाम में सिर्फ अल्लाह की इबादत का हुक्म है, मगर यह भी कहा गया है कि माँ के पैरों के नीचे जन्नत होती है। चूंकि कुरान में मातृभूमि को माँ के तुल्य कहा गया है, इसलिये हम उसकी महानता को नकार नहीं सकते और न ही उसके प्रति मोहब्बत में कमी कर सकते हैं। भारत हमारा मादरेवतन है, इसलिये हर मुसलमान को इसका पूरा सम्मान करना चाहिये।

वन्देमातरम् से एक संदर्भ याद आया। हाल ही में मेरे पति कृष्ण कुमार यादव के जीवन पर जारी पुस्तक ‘‘बढ़ते चरण शिखर की ओर‘‘ के पद्मश्री गिरिराज किशोर द्वारा लोकार्पण अवसर पर छः सगी मुस्लिम बहनों ने वंदेमातरम्, सरफरोशी की तमन्ना जैसे राष्ट्रभक्ति गीतों का शमां बाँध दिया। कानपुर की इन छः सगी मुस्लिम बहनों ने वन्देमातरम् एवं तमाम राष्ट्रभक्ति गीतों द्वारा क्रान्ति की इस ज्वाला को सदैव प्रज्जवलित किये रहने की कसम उठाई है। राष्ट्रीय एकता, अखण्डता, बन्धुत्व एवं सामाजिक-साम्प्रदायिक सद्भाव से ओत-प्रोत ये लड़कियाँ तमाम कार्यक्रमों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराती हैं। वह 1857 की 150वीं वर्षगांठ पर नानाराव पार्क में शहीदों की याद में दीप प्रज्जवलित कर वंदेमातरम् का उद्घोष हो, गणेश शंकर विद्यार्थी व अब्दुल हमीद खांन की जयंती हो, वीरांगना लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस हो, माधवराव सिन्धिया मेमोरियल अवार्ड समारोह हो या राष्ट्रीय एकता से जुड़ा अन्य कोई अनुष्ठान हो। इनके नाम नाज मदनी, मुमताज अनवरी, फिरोज अनवरी, अफरोज अनवरी, मैहरोज अनवरी व शैहरोज अनवरी हैं। इनमें से तीन बहनें- नाज मदनी, मुमताज अनवरी व फिरोज अनवरी वकालत पेशे से जुड़ी हैं। एडवोकेट पिता गजनफरी अली सैफी की ये बेटियाँ अपने इस कार्य को खुदा की इबादत के रूप में ही देखती हैं। 17 सितम्बर 2006 को कानपुर बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित हिन्दी सप्ताह समारोह में प्रथम बार वंदेमातरम का उद्घोष करने वाली इन बहनों ने 24 दिसम्बर 2006 को मानस संगम के समारोह में पं0 बद्री नारायण तिवारी की प्रेरणा से पहली बार भव्य रूप में वंदेमातरम गायन प्रस्तुत कर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। मानस संगम के कार्यक्रम में जहाँ तमाम राजनेता, अधिकारीगण, न्यायाधीश, साहित्यकार, कलाकार उपस्थित होते हैं, वहीं तमाम विदेशी विद्वान भी इस गरिमामयी कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।

तिरंगे कपड़ों में लिपटी ये बहनें जब ओज के साथ एक स्वर में राष्ट्रभक्ति गीतों की स्वर लहरियाँ बिखेरती हैं, तो लोग सम्मान में स्वतः अपनी जगह पर खड़े हो जाते हैं। श्रीप्रकाश जायसवाल, डा0 गिरिजा व्यास, रेणुका चैधरी, राजबब्बर जैसे नेताओं के अलावा इन बहनों ने राहुल गाँधी के समक्ष भी वंदेमातरम् गायन कर प्रशंसा बटोरी। 13 जनवरी 2007 को जब एक कार्यक्रम में इन बहनों ने राष्ट्रभक्ति गीतों की फिजा बिखेरी तो राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा डा0 गिरिजा व्यास ने भारत की इन बेटियों को गले लगा लिया। 25 नवम्बर 2007 को कानुपर में आयोजित राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में इन्हें ‘‘संस्कृति गौरव‘‘ सम्मान से विभूषित किया गया। 19 अक्टूबर 2008 को ‘‘सामाजिक समरसता महासंगमन‘‘ में कांग्रेस के महासचिव एवं यूथ आईकान राहुल गाँधी के समक्ष जब इन बहनों ने अपनी अनुपम प्रस्तुति दी तो वे भी इनकी प्रशंसा करने से अपने को रोक न सके। वन्देमातरम् जैसे गीत का उद्घोष कुछ लोग भले ही इस्लाम धर्म के सिद्वान्तों के विपरीत बतायें पर इन बहनों का कहना है कि हमारा उद्देश्य भारत की एकता, अखण्डता एवं सामाजिक सद्भाव की परम्परा को कायम रखने का संदेश देना है। वे बेबाकी के साथ कहती हैं कि देश को आजादी दिलाने के लिए हिन्दू-मुस्लिम क्रान्तिकारियों ने एक स्वर में वंदेमातरम् का उद्घोष कर अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया तो हम भला इन गीतों द्वारा उस सूत्र को जोड़ने का प्रयास क्यों नहीं कर सकते हैं। राष्ट्रीय एकता एवं समरसता की भावना से परिपूर्ण ये बहनें वंदेमातरम् एवं अन्य राष्ट्रभक्ति गीतों द्वारा लोगों को एक सूत्र में जोड़ने की जो कोशिश कर रही हैं, वह प्रशंसनीय व अतुलनीय है। क्या ऐसे मुद्दों को फतवों से जोड़ना उचित है, आप भी सोचें-विचारें !!
(चित्र में- वन्देमातरम का गान करती 6 सगी मुस्लिम अनवरी बहनें)

आकांक्षा यादव

Tuesday, August 11, 2009

क्षमता

शोभना चौरे जी ने यह कविता चोखेरबाली के लिए भेजी है। आप पढें व टिप्पणी दें !


वो जन्म से ही
मेरे साथ थी
जन्मते ही रोई
तो कहने लगे
गजब की है?
इसके रोने की क्षमता |

माँ की गोदी से
बाहर आ जाती
ऐसी थी मेरे हाथ पैर
मारने की
अपूर्व क्षमता |

घंटो दूध न मिलने पर
माँ के काम में कभी
बाधक न बनी
मेरी भूखे रहने की
अपूर्व क्षमता |

नन्हा भाई आया
तो पिता के भेदभाव
पूर्ण व्यवहार से
कभी आहत नही हुई
मेरे प्यार करने की
अपूर्व क्षमता|

मेरे सांवलेपन को
कभी भी हरा न कर पाई
मेरे गुणवान होने की
अपूर्व क्षमता

ससुराल में फिरकनी
कि तरह
धूमकर काम करते हुए भी
तानो कि बौछार से नही हारी
मुस्कुराने कि मेरी
अपूर्व क्षमता |

कहने को एक रथ के
दो पहिये है हम
पर रथ को अकेले ही
खीच लेने की
अपूर्व है मेरी क्षमता |

पति को न जाने कौनसे ?
गम में शराब पीने कि
लत हो गई
पर मुझमे है , हर गम
को पीने कि
अपूर्व क्षमता |

पिता ने नाम दिया
पति ने भी नाम ही दिया
पर इस नाम को
सार्थक करने की है
मेरी ही अपूर्व क्षमता |









Monday, August 10, 2009

अब महिला भारवाहिकाएं भी

कुछ दिन पहले भारतीय रेलवे के इलाहाबाद केन्द्र ने कुलियों (भारवाहकों ) की भर्ती के लिए विज्ञापन दिया था। इस स्थान की भर्ती के लिये पहली बार महिलाओं ने आवेदन किया। कुल सत्ताइस महिलाओं ने आवेदन किया था। उनकी परीक्षा ली गई जिसमें उन्हें सिर पर पच्चीस किलो का वज़न उठा कर दो सौ मीटर चलना था। पुरुषों को यह दूरी तीन मिनट में तय करनी थी और महिलाओं को चार मिनट के अंदर। सत्ताइस महिलाओं में उन्नीस ऐसा करने में सफल रहीं।

बृंदा कारत का कहना है कि इसमें आश्चर्य की क्या बात है। महिलाएं सदा से भारी बोझ सिर पर ढोती आई हैं। राजस्थान में वे मीलों पानी के घड़े सिए और कमर पर लादे चलती हैं। फ़िर उन्हें इस नौकरी के अवसर से वंचित क्यों रखा जाए। ज्ञातव्य है कि कुली के काम के लिये महिला आवेदनकर्ताओं में से कई पढ़ी लिखी हैं, उनमें एक तो इतिहास की परास्नातक भी है।

किरन बेदी का कहना है कि भारी बोझ को किसी से भी सिर पर उठवाना अमानवीय है और सभी कुलियों को ट्राली मुहय्या कराई जानी चाहिये। गुजरात के भावनगर स्टेशन पर सदा से ( लगभग सत्तर वर्ष से, जब वह स्टेशन बना था) महिलाएं कुली का काम करती आई हैं। वहाँ के छ्ब्बीस कुलियों में बाईस महिलाएं हैं। वे यात्रियों का सामान ट्राली पर ढोती हैं।

Saturday, August 8, 2009

लिंग समता के मायने

सृष्टि के आरम्भ से ही नर व नारी एक दूसरे के पूरक रहे हैं। यह बात इस तथ्य से बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि यदि नर व नारी दोनों में से कोई भी एक न हुआ होता तो सृष्टि की रचना ही सम्भव न थी। कुछेक अपवादों को छोड़कर विश्व में लगभग हर प्रकार के जीव-जन्तुओं में दोनों रूप नर-मादा विद्यमान हैं. समाज में यह किवदन्ती प्रचलित है कि भगवान भी अर्द्धनारीश्वर हैं अर्थात उनका आधा हिस्सा नर का है और दूसरा नारी का। यह एक तथ्य है कि पुरूष व नारी के बिना सृष्टि का अस्तित्व सम्भव नहीं, दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं किन्तु इसके बावजूद भी पुरूष व नारी के बीच समाज विभिन्न रूपों में भेद-भाव करता है। जिसकी प्रतिक्रियास्वरूप “लिंग समता” अवधारणा का उद्भव हुआ अर्थात “लिंग के आधार पर भेदभाव या असमानता का अभाव”।

जैविक आधार पर देखें तो स्त्री-पुरूष की संरचना समान नहीं है। उनकी शारीरिक-मानसिक शक्ति में असमानता है तो बोलने के तरीके में भी । इन सब के चलते इन दोनों में और भी कई भेद दृष्टिगत होते हैं। इसी आधार पर कुछ विचारकों का मानना है कि -“स्त्री-पुरूष असमता का कारण सर्वथा जैविक है।” अरस्तू ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि - “स्त्रियाँ कुछ निश्चित गुणों के अभाव के कारण स्त्रियाँ हैं” तो संत थॉमस ने स्त्रियों को “अपूर्ण पुरूष” की संज्ञा दी। पर जैविक आधार मात्र को स्वीकार करके हम स्त्री के गरिमामय व्यक्तित्व की अवहेलना कर रहे हैं। प्रकृति द्वारा स्त्री-पुरूष की शारीरिक संरचना में भिन्नता का कारण इस सृष्टि को कायम रखना था । अतः शारीरिक व बौद्धिक दृष्टि से सबको समान बनाना कोरी कल्पना मात्र है। अगर हम स्त्रियों को इस पैमाने पर देखते हैं तो इस तथ्य की अवहेलना करना भी उचित नहीं होगा कि हर पुरूष भी शारीरिक व बौद्धिक दृष्टि के आधार पर समान नहीं होता। अतः इस सच्चाई को स्वीकार करके चलना पडे़गा कि जैविक दृष्टि से इस जगत में भेद व्याप्त है और इस अर्थ में लिंग भेद समाप्त नहीं किया जा सकता।

इसमें कोई शक नहीं कि लिंग-समता को बौद्धिक स्तर पर कोई भी खण्डित नहीं कर सकता। नर-नारी सृष्टि रूपी परिवार के दो पहिये हैं। तमाम देशों ने संविधान के माध्यम से इसे आदर्श रूप में प्रस्तुत किया है पर जरूरत है कि नारी अपने हकों हेतु स्वयं आगे आये। मात्र नारी आन्दोलनों द्वारा पुरुषों के विरुद्ध प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण व्यक्त करने से कुछ नहीं होगा। पुरूषों को भी यह धारणा त्यागनी होगी कि नारी को बराबरी का अधिकार दे दिया गया तो हमारा वर्चस्व समाप्त हो जायेगा। उन्हें यह समझना होगा कि यदि नारियाँ बराबर की भागीदार बनीं तो उन पर पड़ने वाले तमाम अतिरिक्त बोझ समाप्त हो जायेंगे और वे तनावमुक्त होकर जी सकेंगे। यह नर-नारी समता का एक सुसंगत एवं आदर्श रूप होगा ।
कृष्ण कुमार यादव

Wednesday, August 5, 2009

क्या आज भी जरूरत है रक्षा करने वाले भाइयों की!?

आज रक्षा बंधन है। बहनें भाइयों को राखियां बांध रही हैं। सुबह से ही यह सिलसिला शुरू हो जाता है। इसीलिए कोई 10 बजे जब मैं निकली तो सड़कें रोज के मुकाबले काफी खाली-खाली सी थीं। एक लाल बत्ती पर मेरी नज़र बगल वाली गेहुंए रंग की एक लंबी गाड़ी पर पड़ी, जिसे एक बुजुर्ग महिला- कम से कम 70-75 साल की- चला रहीं थीं। मुझे हमेशा अच्छा लगता है ऐसे नजारे देखना कि औरत मोटर गाड़ी चलाए और पुरुष बगल में बैठे। मुझे समझ में आती है कि स्टीयरिंग व्हील पर बैठी औरत की ताकत। उसके हाथ में ताकत है- स्टीयरिंग के जरिए गाड़ी को मैनिपुलेट करने की, जाहे जहां ले जाने की, अपने काबू में रखने की! और साथ बैठे लोग हमेशा निर्भर-से लगते हैं।

तो उस दिन देखा उन बुज़ुर्ग महिला को जो लाल बत्ती पर रुकी कार के स्टीयरिंग व्हील पर थी और लगातार बातें किए जा रही थी, मुस्कुराती जा रही थी। बीच-बीच में कनखियों से बगल में नजर डाल लेतीं। ट्रैफिक और बत्ती पर उनका पूरा ध्यान था।

बगल की सीट पर उनसे भी ज्यादा बुजुर्ग बैठे थे, जिनके चेहरे पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दिख रही थी। उनकी नजर सिर्फ लाल बत्ती वाले खंबे पर टिकी थी। एकाध मिनट तक मैं यह दिलचस्प दृष्य देखती रही। फिर बत्ती हरी हो गई। मैने उनकी गाड़ी को पहले जाने दिया। इसमें मेरा स्वार्थ भी था। उस सुंदर दृष्य को थोड़ी देर और देख पाने का लालच था।

पर जैसे ही गाड़ी कुछेक फुट आगे बढ़ी, उस दृष्य में कुछ और दिलचस्प चरित्र जुड़ गए। कार में पीछे वाली सीट पर, जिसे मैं अब तक देख नहीं पाई थी, दो युवक बैठे थे और वह महिला संभवतः उन्हीं से बातें कर रही थी। उन दो युवा, सक्षम पुरुषों के रहते उस महिला का खुद, पूरे आत्मविश्वास से कार चलाना!

रक्षा बंधन जरूर एक मीठा त्यौहार है, भाई-बहन के मिलने का, गिलों-शिकवों, मान-मनौवल, प्यार-मनुहार का। लेकिन सोचिए तो भला- क्या ऐसी महिलाओं को जरूरत है रक्षा करने वाले भाइयों की?

अटूट विश्वास का बन्धन है राखी

भारतीय परम्परा में विश्वास का बन्धन ही मूल है और रक्षाबन्धन इसी अटूट विश्वास के बन्धन की अभिव्यक्ति है। रक्षा-सूत्र के रूप में राखी बाँधकर सिर्फ रक्षा का वचन ही नहीं दिया जाता वरन् प्रेम, समर्पण, निष्ठा व संकल्प के जरिए यह पर्व हृदयों को बाँधने का भी वचन देता है। श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला रक्षाबन्धन भारतीय सभ्यता का एक प्रमुख त्यौहार है, जिस दिन बहनें अपनी रक्षा के लिए भाईयों की कलाई में राखी बाँधती हंै। गीता में कहा गया है कि जब संसार में नैतिक मूल्यों में कमी आने लगती है, तब ज्योर्तिलिंगम भगवान शिव प्रजापति ब्रह्मा द्वारा धरती पर पवित्र धागे भेजते हैं, जिन्हें बहनें मंगलकामना करते हुए भाइयों को बाँधती हैं और भगवान शिव उन्हें नकारात्मक विचारों से दूर रखते हुए दुख और पीड़ा से निजात दिलाते हैं।

पहले रक्षाबन्धन पर्व सिर्फ बहन-भाई के रिश्तों तक ही सीमित नहीं था, अपितु आपत्ति आने पर अपनी रक्षा के लिए अथवा किसी की आयु और आरोग्य की वृद्धि के लिये किसी को भी रक्षा-सूत्र (राखी) बांधा या भेजा जा सकता था। लोक परम्परा में रक्षाबन्धन के दिन परिवार के पुरोहित द्वारा राजाओं और अपने यजमानों के घर जाकर सभी सदस्यों की कलाई पर मौली बाँधकर तिलक लगाने की परम्परा रही है। पुरोहित द्वारा दरवाजों, खिड़कियों, तथा नये बर्तनों पर भी पवित्र धागा बाँधा जाता है और तिलक लगाया जाता है। यही नहीं बहन-भानजों द्वारा एवं गुरूओं द्वारा शिष्यों को रक्षा सूत्र बाँधने की भी परम्परा रही है। इतिहास गवाह है कि सिंकदर और पोरस ने युद्ध से पूर्व रक्षा-सूत्र की अदला-बदली की थी। युद्ध के दौरान पोरस ने जब सिकंदर पर घातक प्रहार हेतु अपना हाथ उठाया तो रक्षा-सूत्र को देखकर उसके हाथ रूक गए और वह बंदी बना लिया गया। सिकंदर ने भी पोरस के रक्षा-सूत्र की लाज रखते हुए और एक योद्धा की तरह व्यवहार करते हुए उसका राज्य वापस लौटा दिया। राखी ने स्वतंत्रता-आन्दोलन में भी प्रमुख भूमिका निभाई। कई बहनों ने अपने भाईयों की कलाई पर राखी बाँधकर देश की लाज रखने का वचन लिया। 1905 में बंग-भंग आंदोलन की शुरूआत लोगों द्वारा एक-दूसरे को रक्षा-सूत्र बाँधकर हुयी।

रक्षाबन्धन का उल्लेख पुराणों में मिलता है जिसके अनुसार असुरों के हाथ देवताओं की पराजय पश्चात अपनी रक्षा के निमित्त सभी देवता इंद्र के नेतृत्व में गुरू वृहस्पति के पास पहुँचे तो इन्द्र ने दुखी होकर कहा- ‘‘अच्छा होगा कि अब मैं अपना जीवन समाप्त कर दूँ।’’ इन्द्र के इस नैराश्य भाव को सुनकर गुरू वृहस्पति के दिशा-निर्देश पर रक्षा-विधान हेतु इंद्राणी ने श्रावण पूर्णिमा के दिन इन्द्र सहित समस्त देवताओं की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधा और अंततः इंद्र ने युद्ध में विजय पाई। एक अन्य मान्यतानुसार राजा बालि को दिये गये वचनानुसार भगवान विष्णु बैकुण्ठ छोड़कर बालि के राज्य की रक्षा के लिये चले गये। तब लक्ष्मी जी ने ब्राह्मणी का रूप धारण कर श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बालि की कलाई पर पवित्र धागा बाँधा और उसके लिए मंगलकामना की। इससे प्रभावित हो राजा बालि ने लक्ष्मी जी को अपनी बहन मानते हुए उसकी रक्षा की कसम खायी। तत्पश्चात देवी लक्ष्मी अपने असली रूप में प्रकट हो गयीं और उनके कहने से बालि ने भगवान इन्द्र से बैकुण्ठ वापस लौटने की विनती की। महाभारत काल में भगवान कृष्ण के हाथ में एक बार चोट लगने व फिर खून की धारा फूट पड़ने पर द्रौपदी ने तत्काल अपनी कंचुकी का किनारा फाड़कर भगवान कृष्ण के घाव पर बाँध दिया। कालांतर में दुःशासन द्वारा द्रौपदी-हरण के प्रयास को विफल कर उन्होंने इस रक्षा-सूत्र की लाज बचायी। इसी प्रकार जब मुगल समा्रट हुमायूँ चितौड़ पर आक्रमण करने बढ़ा तो राणा सांगा की विधवा कर्मवती ने हुमायूँ को राखी भेजकर अपनी रक्षा का वचन लिया। हुमायँू ने इसे स्वीकार करके चितौड़ पर आक्रमण का ख़्याल दिल से निकाल दिया और कालांतर में राखी की लाज निभाने के लिए चितौड़ की रक्षा हेतु गुजरात के बादशाह से भी युद्ध किया। ऐसे ही न जाने कितने विश्वास के धागों से जुड़ा हुआ है राखी का पर्व।

देश के विभिन्न अंचलों में राखी पर्व को भाई-बहन के त्यौहार के अलावा भी भिन्न-भिन्न तरीकों से मनाया जाता है। मुम्बई के कई समुद्री इलाकों में इसे नारियल-पूर्णिमा या कोकोनट-फुलमून के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन विशेष रूप से समुद्र देवता पर नारियल चढ़ाकर उपासना की जाती है और नारियल की तीन आँखों को शिव के तीन नेत्रों की उपमा दी जाती है। बुन्देलखण्ड में राखी को कजरी-पूर्णिमा या कजरी-नवमी भी कहा जाता है। इस दिन कटोरे में जौ व धान बोया जाता है तथा सात दिन तक पानी देते हुए माँ भगवती की वन्दना की जाती है। उत्तरांचल के चम्पावत जिले के देवीधूरा में राखी-पर्व पर बाराही देवी को प्रसन्न करने के लिए पाषाणकाल से ही पत्थर युद्ध का आयोजन किया जाता रहा है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘बग्वाल’ कहते हैं। सबसे आश्चर्यजनक तो यह है कि इस युद्ध में आज तक कोई भी गम्भीर रूप से घायल नहीं हुआ और न ही किसी की मृत्यु हुई। इस युद्ध में घायल होने वाला योद्धा सर्वाधिक भाग्यवान माना जाता है एवं युद्ध समाप्ति पश्चात पुरोहित पीले वस्त्र धारण कर रणक्षेत्र में आकर योद्धाओं पर पुष्प व अक्षत् की वर्षा कर आर्शीवाद देते हैं। इसके बाद युद्ध बन्द हो जाता है और योद्धाओं का मिलन समारोह होता है।

कोस-कोस पर बदले भाषा, कोस-कोस पर बदले बोली-वाले भारतीय समाज में रक्षाबन्धन सिर्फ भाई-बहन के रिश्तों तक ही सीमित नहीं वरन् हर रिश्ते की बुनियाद है। यहाँ त्यौहार सिर्फ एक अनुष्ठान मात्र नहीं, वरन् इनके साथ सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक तारतम्य, सभ्यताओं की खोज एवं अपने अतीत से जुडे़ रहने का सुखद अहसास भी जुड़ा होता है। रक्षाबन्धन हमारे सामाजिक परिवेश एवं मानवीय रिश्तों का अंग है। आज जरुरत है कि आडम्बरता की बजाय इस त्यौहार के पीछे छुपे हुए संस्कारों और जीवन मूल्यों को अहमियत दी जाए तभी व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र सभी का कल्याण सम्भव होगा।
आकांक्षा यादव