Tuesday, August 18, 2009

सरनेम की महिमा

पिछले दिनों एक मित्र बेहद परेशान से हाल में मेरे पास आईं. उसे मदद के रूप में मेरी सलाह चाहिए थी. सलाह देना यूं तो सबसे बढिय़ा काम है लेकिन अगर आपकी सलाह से किसी का जीवन राह बदलने वाला हो तो इस काम से गुरुतर कोई काम नहीं हो सकता. बहरहाल, उन्हें मैं क्या सलाह दूं या यह असमंजस अब तक मुझे बेचैन किये है.

मेरी मित्र पेशे से डॉक्टर है. उसने अपनी मर्जी से अंतर्जातीय विवाह किया है. उसके पति भी डॉक्टर हैं. शादी के पांच बरस बाद उसके पति जिस बात पर तलाक देना चाहते हैं वह है उसका सरनेम. उस लड़की ने शादी के बाद अपना सरनेम नहीं बदला. इसके कई कारण थे लेकिन मेरे लिए इतना ही काफी था कि वह नहीं चाहती थी सरनेम बदलना और उसने नहीं बदला. इस बारे में दोनों के बीच शादी से पहले ही बात हो चुकी थी. फिर आज क्या हुआ कि सरनेम जैसे मुद्दे पर एक परिवार टूटने को है. चूंकि मेरा उसके पति से भी ठीकठाक संवाद है सो मैंने उससे बात करनी चाही कि इत्ती सी बात...वह बात पूरी होने से पहले ही भड़क गया. इत्ती सी बात नहीं है यह... वह फफक पड़ा. इत्ती सी बात नहीं है. मुझे बहुत बुरा लगता है. सोसायटी में मैं बेहद कमजोर, हीन और गिरा हुआ महसूस करता हूं. जो औरत मेरी पहचान को नहीं अपना सकती वो मेरी पत्नी है. मेरे दोस्त भी दबी जुबान में मेरा मजाक उड़ाते हैं. घुट रहा हूं मैं पिछले पाँच सालों से. ऐसा लगता है मेरे व्यक्तित्व को तहस-नहस कर रहा है इसका नाम. मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता.

सरनेम....कितना महत्वपूर्ण है यह. हमारी पितृसत्ता की यही व्यवस्था है कि एक स्त्री को अपने पति (परमेश्वर) की हर चीज को अपना लेना है. सिरे से. मिसेज वर्मा, मिसेज अवस्थी या मिसेज रस्तोगी वगैरह बनकर सबसे पहले अपनी पहचान गुमा दो. फिर अपना रहन-सहन, खान-पान, आदतें, रीति-रिवाज, रिश्ते-नाते सब कुछ. हासिल फिर भी सिर्फ कुछ रुसवाइयां, कुछ तल्खियां.

क्या करना चाहिए मेरी मित्र को. उसे सरनेम चेंज कर लेना चाहिए क्या? अगर इतनी सी बात से किसी का रिश्ता बच जाए तो इससे बेहतर भला हो भी क्या हो सकता है. वैसे भी हर रिश्ते में थोड़ा बहुत एडजेस्टमेंट तो करना ही पड़ता है. यह सलाह मेरे ज़ेहन में साफ तौर पर उभरी लेकिन जाने क्यों कुछ बातों ने जबान पर गांठें लगा रखी हैं. और अपनी सलाह को लेकर मैं खुद फिक्रमंद हूं. मसलन,
क्या सरनेम चेंज करने भर से उनका रिश्ता संवर जायेगा?
क्या इसके बाद कोई परीक्षा नहीं देनी होगी उसे?
क्या इसके पहले उसने कोई और परीक्षा नहीं दी है?
किस-किस मोड़ पर साबित करनी होगी अपनी वफादारी और समर्पण?
जिन्होंने सरनेम ही क्या पूरा व्यक्तित्व ही बदल लिए हैं, क्या उनकी $िजंदगी में सब सामान्य है?
यह कौन सी शर्त है रिश्तों को सामान्य रखने की कि तुम तो खुद को भुला दो लेकिन हमसे कोई उम्मीद न रखना?
यह कौन सा समाज है जो अहंकार की टंगड़ी लगाकर रिश्तों को चोट पहुंचा रहा है?
मैं क्या सलाह दूं असमंजस जारी है....
- प्रतिभा कटियार

24 comments:

Rachna Singh said...

marriage means submergence of identites not just the surnames
this couple doesnt deserve to remain married

आर. अनुराधा said...

"सोसायटी में मैं बेहद कमजोर, हीन और गिरा हुआ महसूस करता हूं. जो औरत मेरी पहचान को नहीं अपना सकती वो मेरी पत्नी है. मेरे दोस्त भी दबी जुबान में मेरा मजाक उड़ाते हैं. घुट रहा हूं मैं पिछले पाँच सालों से. ऐसा लगता है मेरे व्यक्तित्व को तहस-नहस कर रहा है इसका नाम. मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता."

ये चंद लाइने आइना हैं उस पुरुष की सोच का, जिसे समाज की प्रतिक्रिया ज्यादा महत्वपूर्ण लगती है, अपने परिवार के बने रहने से भी ज्यादा। ऐसे आदमी से क्या निबाहना जो सिर्फ अपने पुष्तैनी (पुरुषवादिता के) रिवाज निभाने यानी उपनाम देने को उतावला है, जिद पर अड़ा है जबकि इस बारे में शादी से पहले तय भी हो चुका है। यह उस व्यक्ति की अपनी सोच है, मुझे शक है कि सचमुच ऐसा कठिन समय उन्हें देखना पड़ रहा है, (इमोशनली), सिर्फ इस लिए कि पत्नी अपना पहला नाम रख रही है, उनके पारिवारिक नाम में कुद को डुबो नहीं दे रही है। हद है।
दूसरे, बिफरने-भड़कने जैसी इमोशनल ब्लैकमेल की हरकतों के आगे औरतें, सब समझते हुए भी हमेशा आत्मसमर्पण करती रही हैं।

क्या परिवार को बचाना सिर्फ उस महिला की जिम्मेदारी है, जिसने कोई फैसला किया और सब कुछ साफ शादी के पहले बता भी दिया। अब उस पुरुष को भी तो थोड़ा संवेदनशील होना चाहिए और समझना चाहिए कि उसकी इज्जत पहले घर में हो, तभी समाज में होगी।

और, कोई मुझे बताए, जिन औरतों ने शादी के बाद अपने सरनेम नहीं बदले, (मैं भी उनमें एक हूं) तो क्या उनके पतियों की फजीहत हुई, समाज में मखौल बना और अब तक बनाया जा रहा है? यह सब इमोशनल ब्लैकमेल के, महिला पर हावी होने के तरीके हैं। हो सकता है, मैं बहुत रूखा लिख रही हूं, पर ऐसी पिद्दी बातों से परिवार टूट रहे हैं, तो ऐसे परिवारों को परिवार नहीं कहा जा सकता।

sanjaygrover said...

मेरे माता-पिता ने कहीं भी टीका-टिप्पणी करने को मना किया है।

Prafull said...

Over Emotionalism of the husband is foolish. He must come up like a man & not a poor victim of his so called society!

Neeraj Rohilla said...

I can't believe that it is such a big deal for husband. If he is upset on such a petty issue, God knows what can come next?

They both need really good counseling and communication to save their marriage otherwise it won't work out.

Rachna has said it right that this couple doesn't deserve to remain married. However, counseling and more communication and trust can also resolve their problems.

I think elders in their family may also intervene.

Zindagi tere saath said...

baat badi sanjeeda hai, sath hi kuchh sawal bhi paida karti hai.
Jise pane ke liye sab kuchh chhor diya. Jinki chhahat me khud ko bhula diya, use problem hai bhi to sirf sirname se. Apne bilkul sahi likha hai ki jin logon ne sirname kya poori personality hi change kar dali unko kya mila. Sawal sirname badlane ka nahi sawal soch badlane ka hai.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

I agree with RACHNA ...

SIRNAME -- may be , we should CHANGE it to

LADIESNAME ?

SIR = because the word SIR
has a smell of a

PATRIARCH ....

OR
follow American way ...& choose
LAST NAME ....that we like.

सुशीला पुरी said...

bahut jaruri mudde pa kalam chalai hai pratibha! bilkul bhi jaruri nhi hai sarnem badalna.....yah nhi kah sakte ki sarnem badal kar unka jiwan sundar ho jayega.

NP said...

पति की दलील बिल्कुल पंगु है. उसकी कुंठा के बीज कहीं और हैं. जब विवाह के पहले ही इस पर बात हो चुकी थी तो अब यह विवाह तोड़ने का मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है?एक सफल,सबल पत्नी अक्सर एक अहंवादी पति के लिए एक बर्दाश्त बाहर चुनौती होती है जिसे वह अपनी कुंठाओं के चलते इमोशनली टॉर्चर करने लगता है.वह चाहता है कि पत्नी बाहर जितनी भी सफल हो, अतत: उसका वर्चस्व माने, उसकी छाया में रहे.
मैं भी अंतर्जातीय विवाह करके सरनेम नहीं बदलने वालों में ही हूं. पति को कोई परेशानी नहीं पर ससुराल की शादियों के निमंत्रण पत्र में मेरा नाम पति के सरनेम के साथ छपता है. मुझे ऑफिस और अन्य जगहों पर कई बार एक्सप्लानेशन देना पड़ता है कि मैं पति का सरनेम क्यों नहीं लगाती.. पर बहस या बातचीत के बाद इतनी कड़वाहट नहीं होती कि लगे कि यह इतना बड़ा मुद्दा है कि इससे विवाह टूट सकता है.
पति सरनेम बदलने की जिद की बजाय अपना दिल दिमाग टटोले और काउंसिलर की मदद ले- यही बेहतर होगा.
नीला प्रसाद

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

"क्या सरनेम चेंज करने भर से उनका रिश्ता संवर जायेगा?"
कभी नहीं. जो बचकाने लोग सरनेम जैसी तुच्छ बात पर अड़ सकते हैं उनके हर दिन में हजारों दूसरी ऐसी बातें होंगी जो इस शादी को तोड़ ही देंगी. ऐसे अहंकारी स्त्री-पुरुष शादी जैसी जिम्मेदारी के लिए बिलकुल नालायक हैं. संत कबीर के शब्दों में:
ये तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहीं
सीस उतारे भुई धरे तब बैठे घर माहीं

स्वप्नदर्शी said...

aur jaane kitane bharam jhooThe honge!!

सोनू said...

लावण्याजी, उपनाम को अंग्रेज़ी में surname कहते हैं ना कि sirname। sur- उपसर्ग में आगे, बाद में, ऊपर होने का भाव है। उदाहरण के तौर पर-- surtax, surrealism, suname, surpass वग़ैरा। इससे पितृसत्ता की कोई गंध नहीं आती है।

अर्कजेश *Arkjesh* said...

जब शादी से पहले बात हो गई थी , तो उस पर अमल करना चाहिए |
यह वायदा खिलाफी है |

shashisinghal said...

प्रतिभाजी ,आपने बहुत ज्वलंत मुद्दा उठाया है। इस समाज में पुरुष वर्ग स्वयं को भले ही कितना खुले विचारों का कह ले , मगर आज भी वह पुरानी सदी के दकियानूसी विचारों की गिरफ्त से बाहर नहीं निकल पाया है । हां , वह खुले दिमाग का है जरूर किंतु बाहरी दुनिया के लिए । जब अपने घर की बात आती है तो उसे साडी में लिपटी और पति की हर बात को सर झुका कर मानने वाली अनपढ नहीं किंतु अनपढ सरीखी बीबी की दर्कार होती है । जबकि घर से बाहर वह एड्वांस लडकी मैं अपनी बीबी को तलाशता है या कहिए कि उसे वही लडकी सबसे अच्छी लगती है । आज के पुरुष दोहरी चाल चलते नजर आते हैं , एक ओर तो उन्हें कमाऊ बीबी की तलाश रहती है , वहीं दूसरी ओर वे बीबी का किसी भी पर पुरुष से बोलना - हंसना जरा भी पसंद नहीं करते ।
अब चूंकि बात उठी है पत्नी द्वारा शादी के बाद सरनेम न बदलने पर परिवार के टूटने की , मतलब या तो पत्नी सरनेम बदले अन्यथा पतिदेव नाराज होकर तलाक दे देंगे । यानि पतिदेव को इसमे अप्ना अहं और अपना अस्तित्व नजर आता है उसकी नजरो में पत्नी की कोई अहमियत नहीं ।मैं पूछती हूं कि आखिर पतियों को यह हक किसने दिया है ? क्या किसी मैरिज एक्ट में ेसा लिखा गया है ? जबकि मेरि समझ से शादी के बंधन मे बंधते समय पति - पत्नी दोनोसे एक - दूसरे का ख्याल रखने सबंधी सात वचन लिए जाते हैं नाकि पति दवारा पत्नी पर अपनी मनमानियां थोपने के ।
दरअसल सदियों से पुरुष्वादी मानसिकता ही अपना एकछत्र राज करती आई है जिसने कदम - कदम पर स्त्रियों को नीचा दिखाने तथा अपने प्रभुत्व मे जकड कर रखा है । आज भले ही समय ने करवट ले ली है और स्त्रियों ने सदियों से चली आ रही पुरुषवादी मानसिकता पर काफी हदतक अंकुश लगाया है लेकिन फिर भी आए दिन पुरुषों की ओछी मानसिकता के दर्शन होते ही रहते हैं ।
मैं कहती हूं कि यदि पत्नी को शादी के बाद सरनेम बदलने से कुछ प्फर्क न पडता हो तो सरनेम बदलने में कोई हर्ज नही । लेकिन हां , कईबार नौकरीपेशा पत्नी को सरनेम बदलना बहुत मुश्किल हो जाता है उसे तमाम कागजाती कार्यवाहियों से दो - चार होना पडता है एसी परिस्तिथियों में पति को पत्नी का साथ देना चाहिए ना कि सरनेम को अपनी मूंछ का सवाल बनाए । यदि जो पति अपनी पत्नी की इस पीडा को न समझे और अपनी बात पर डटा रहे तो ऎसे पति को सबक सिखाना भी बहुत जरूरी है । अतः अमुक बहन अपनी आवश्यकता को जांचे और उचित कदम उठाने से न घबराएं ।
शशि सिंघल

sushant jha said...

इस समस्या का एक अतिवादी हल ये हो सकता है कि सरकार किसी नौकरी, स्कूल कालेज या किसी भी सरकारी कागजात में सरनेम वालों को घुसने न दे। इसके अलावा चुनाव पहचान पत्र या एकीकृत नागरिकता पत्र(जो अभी बनने वाली है) में सरनेंम वालों को इंट्री न मिले। देखिए फिर कैसे सरनेम गधे के सिर से सींग की तरह गायब होता है।
लेकिन सवाल है कि क्या इतने भर पुरुष मानसिकता बदल जाएगी? ये तो कागजों की बात है। अंदर जो सरनेम बैठा हुआ है उसका क्या होगा?

Surender Dalal . said...

आम को खास व खास को आम बना देने की अद्भूत कला हॆ इस चोखेर बाली के लेखकों में। बीर-मर्द की इस नोक-झोक को इसकी मूलसामग्री-"पध्दार्थ" स्वाभाव की रोशनी में भी देखने की जरुरत हॆ।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

इस जमाने में सरनेम का महत्व गौण होता जा रहा है और व्यक्ति अपने कुल, खानदान, गोत्र, वंशावली, भौगोलिक क्षेत्र, उत्पत्ति के मूल स्थान के बजाय अपने निजी व्यक्तित्व की गुणवत्ता के आधार पर पहचाना जाता है। लेकिन यह स्थिति उन्नत समाजों में ही आयी है। हमारे देश में अभी भी पारम्परिक सोच के लोग बहुत बड़ी मात्रा में पाये जाते हैं जो सदियों पुरानी मान्यताओं और सामाजिक रीतियों-कुरीतियों के मकड़जाल से बाहर नहीं आ पा रहे हैं।

सरनेम का प्रयोजन तो किसी व्यक्ति की पहचान को आसान बनाने के लिए किया जाता होगा। पुराने जमाने में जब हमारा समाज विभिन्न जाति वर्गों में बँटना शुरू हुआ होगा और समाजार्थिक तत्वों के विविध प्रकारों का सीधा सम्बन्ध इन विशिष्ट जाति सूचक या वंशावली सूचक विशेषणों से जुड़ गया होगा तब नाम के साथ इन विशिष्टियों वाले शब्दों का प्रयोग व्यक्ति के बारे में अतिरिक्त जानकारी देने के प्रयोजन से किया जाता होगा। सामाजिक ढाँचे में व्यक्ति की प्रास्थिति की सूचना देने वाले ये शब्द निश्चित ही बहुत उपयोगी रहे होंगे और इसीलिए इनका प्रयोग हमारे संस्कारों के साथ जुड़ गया होगा।

इक्कीसवी सदी में जब समाज में सभी व्यक्तियों की मौलिक समानता का मूल्य पोषित किया जा रहा है तब इन असमानता को प्रदर्शित करने वाले शब्दों का प्रयोग बेमानी हो गया है। लेकिन आदत तो धीरे-धीरे जाएगी। खासकर जो आदत हमारे संस्कारों का हिस्सा बन चुकी हो। आज भी जब हम किसी अपरिचित से मिलते हैं तो दस मिनट की बातचीत के बाद हमारी जिज्ञासा उसकी जाति, कुल, गोत्र, खानदान, शिक्षा इत्यादि जिसे हम ‘बैकग्राउण्ड’ कहते हैं वह जानने की हो जाती है। कुछ लोग तो बेतकल्लुफ़ होकर सरनेम पूछ ही पड़ते हैं। जाति पूछना अब भले ही अच्छा नहीं माना जाता हो लेकिन मन ही मन जाति जानने की फिराक में प्रायः सभी रहते हैं।

इस पृष्ठभूमि में विवाह के बाद लड़की द्वारा अपने मायके का सरनेम त्याग कर ससुराल का सरनेम धारण करने का कारण सिर्फ़ यह रहा होगा कि सामाजिक रूप से उसकी पहचान अब ससुराल वालों के खानदान के साथ की जाय न कि मायके वालों के साथ। भारत वर्ष में पितृसत्तात्मक व्यवस्था प्रायः आदिकाल से ही रही है। पारम्परिक रुप से लड़की यौवन प्राप्त करने के बाद अपने माता-पिता और भाई-बहन से अलग होकर अपने पति के साथ रहने के लिए ससुराल चली जाती और उसी परिवार का अंग बन जाती है। इसी परिवर्तन की सूचना उसके सरनेम से भी हो जाती जो मायके के परिवार से बदलकर ससुराल के परिवार की सूचना देने लगता। इसप्रकार सरनेम का प्रयोजन व्यक्ति के नाम के साथ उसके परिचय में थोड़ा और इजाफ़ा करने मात्र का ही है। यदि कोई इससे अपनी अस्मिता को जोड़कर मानसिक रोगी जैसा व्यवहार करने लगता है तो इसे एक विडम्बना ही कहा जा सकता है।

अब हमें अपनी पहचान बताने के लिए अपनी शिक्षा-दीक्षा और अन्य व्यक्तिनिष्ठ योग्यताओं की सूची (resume) की जरूरत पड़ती है न कि सरनेम की। कहीं-कहीं तो यह सरनेम जी का जंजाल बन जाता है। एक बोझ जैसा। आपका बॉस यदि घटिया सोच का है और आप एक ऐसी जाति विशेष से सम्बन्ध रखते हैं जो उसे बहुत प्रिय नहीं है तो आपका सरनेम आपके लिए कठिनाई पैदा कर सकता है।

अतः रचना जी की बात पूरी तरह दुरुस्त है कि जो पति-पत्नी अपने आपसी सम्बन्धों को इतने उथले स्तर पर लाकर चला रहें हैं उन्हें अलग हो जाना ही बेहतर है। पति-पत्नी का रिश्ता एक दूसरे की पहचान को एकाकार करने वाला होना चाहिए जो परस्पर विश्वास और सम्मान की भावना से मजबूत होता है। यदि इस तुच्छ मुद्दे पर उनका अहं इस क़दर टकरा रहा है तो वे इस रिश्ते के हकदार नहीं है।

इस कहानी में एक बात स्पष्ट नहीं की गयी है-पत्नी द्वारा अपना सरनेम नहीं बदलने का क्या आधार रखा गया है। सरनेम के साथ इतना भावनात्मक सम्बन्ध हो जाना भी ठीक नहीं लगता। पति महोदय तो यह मूर्खता कर ही रहे हैं। इन दोनो को कुछ बड़े मसलों पर ध्यान देना चाहिए। मेरा अनुमान है कि यह परिवार बहुत डगमग चबूतरे पर खड़ा है।

सुजाता said...

किसी स्त्री को यह पूरा अधिकार है कि वह अपनी पह्चान बनाए रखे।उसका निर्णय है कि वह पति का सरनेम लगाए या पिता का। पति को इस इच्छा व निर्णय का सम्मान करना चाहिए।

साथ ही ध्यान दिलाना चाहूंगी कि विवाह पूर्व का सरनेम भी उसी पितृसत्ता का प्रतीक है जिसकी बात पति के सरनेम के सन्दर्भ मे उठती है। वह भी "पिता" का ही सरनेम है, माता का नही।इसलिए स्त्री के लिए सरनेम मात्र की ही समस्या पितृसता की अधीनता से जुड़ी है।


पिता के सरनाम को महत्व देने का एक ही कारण हो सकता है कि बड़े होने तक आपकी पह्चान के साथ वह नाम जुड़ चुका होता है जिसे शादी के साथ बदलना , पह्चान के बदल देने जैसा है।

अन्यथा पितृसत्ता का तर्क तो विवाह् पूर्व के सरनेम पर ज्यों का त्यों लागू होता है।
शायद सरनेम का पूर्णत: त्याग इसका हल हो !हालांकि वह भी पहचान को पुनर्स्थापित करने के संघर्ष को जन्म देगा। उससे भी पहले स्त्री अपनी पह्चान के प्रति सचेत तो हो !!इस दृष्टि से कह नही सकती कि प्रतिभा जी की मित्र इन बातों को किस नज़रिए से देखती हैं।

नन्हीं लेखिका - Rashmi Swaroop said...

...कितनी छोटी छोटी बातें, वस्तुतः तो बस एक नाम का त्याग... पर गहराई में जाएँ तो अपनी पहचान का बलिदान... और इसके पीछे छिपी इस व्यवस्था की 'औरत को दोयम दर्जे का बनाये रखने की' कितनी बड़ी ''साजिश''!?
बेशक बहुत ही छोटी बात है न सरनेम ? लेकिन सिर्फ स्त्री के लिए ही न! अगर नहीं तो फिर इस छोटी सी बात को पुरुषः ही क्यूँ नहीं अपनी जिद छोड़ कर क्यूँ नहीं सुलझा सकते? स्त्रियों ने तो हमेशा ही अपने परिवारों के लिए बहुत कुछ किया है... क्या पति इतना भी नहीं कर सकेंगे ? अगर नहीं मुझे नहीं लगता वे पति कहलाने का हक रखते हैं. और देखिये तो ज़रा 'इमोशनल अत्याचार' !
तरस खाएं, शर्मिंदा हों या दर्ज कराएँ अपना विद्रोह ?

रचना त्रिपाठी said...

यदि विवाह अन्तर्जातीय हुआ था तो जाहिर है कि इन्होंने प्यार को शादी में बदला था। फिर प्यार किया तो डरना क्या ? अरे मूर्ख शादी से पहले अकल घास चरने चली गयी थी। या अब जाकर नींद से जगे हो। प्यार का भूत पाँच साल बाद उतर गया?

मैं तो कहूँगी कि जिसका पति इतना कमजोर हो जो छोटी सी बात को दरकिनार नही कर पा रहा हो तो वह पति कहलाने के लायक ही नही है।

पति तो ऐसा होना चाहिये जो हिम्मतवाला हो, पत्नी को प्रेयसी बनाकर रखे। फिर आपने तो प्यार किया है, आपको हर वक्त यही कहना चाहिये कि प्यार किया तो डरना क्या! आँधी आये तूफान आये आपको सबसे लड़ने के लिये तैयार रहना चाहिये यह तो सिर्फ एक मामूली सरनेम है जी। समाज वाले क्या-कहेंगे इसका अन्दाज तो आपको तब भी रहा होगा जब आपने एक विजातीय से शादी रचायी होगी और इस शर्त पर कि वह अपना सरनेम नहीं बदलेगी। फिर ऐसा क्या हो गया जो तलाक की नौबत आ गयी? जाने कितने सपने दिखाया होगा उस महिला को शादी से पहले।

Amit said...

वैसे तो सुना था कि औरतों को वोह मर्द पसंद आते हैं जो अपने अनुभाव खुल कर प्रकट करते हैं, लेकिन इस उदाहरण और टिप्पणियों से लगता है कि जो सिद्वांत में सत्य है, वह अभ्यास में इतना सत्य नहीं है.

या फिर सिर्फ वही अनुभाव प्रकट करने चाहिए जो औरतों को अच्छे लगें. :-)

वैसे अगर शादी से पहले इस बात का समझौता हो गया था कि नाम नहीं बदला जाएगा, तो उस समझौते पर अटल रहना चाहिए. शायद पति को इस बात की भनक नहीं थी कि उसकी पत्नी के नाम ना बदलने से शादी के बाद उसको (पति को) फर्क पड़ेगा. पति को सिद्वांत और अभ्यास के बीच की दूरी का अंदाज़ नहीं था, या इस मुद्दे पर इतना विचार नहीं किया जब इश्क फरमा रहे थे.

सुलभ [Sulabh] said...

यहाँ मुद्दे दो है.
१. कहानी में पति-पत्नी सरनेम समस्या.
२. लेखिका का स्त्री पहचान सम्बंधित वैचारिक सन्देश.

समाधान शायद ऐसा हो सकता
१. पति अपने वायदे पर कायम रहे और सम्बन्ध को बचाए. अपनी संतान को भी कोई जातिसूचक सरनेम न दे. (चूँकि आपने अंतरजातीय और प्रेम विवाह किया है तो इसे जीवन पर्यंत निभायें) वैसे भी सरनेम कोई मुद्दा नहीं है. सिर्फ कानूनी दस्तवेजो में "जाति उल्लेख" आवश्यक है.

२. माता पिता द्वारा स्त्री को विवाह पूर्व कोई सरनेम न दिया जाये और विवाह पश्चात पति द्वारा उनकी (पत्नी के) मर्जी के बगैर सरनेम जोड़ा न जाये. परन्तु क्या पिता अपने पुत्रो के साथ ऐसा करेंगे? यदि ऐसा होने लगे तो मजा आ जायेगा. हमारा समूचा सामाजिक जातिगत ढांचा विलीन हो जायेगा.

विजय त्रिपाठी जी ने सदैव मूल और वैज्ञानिक बातें कही है. पारंपरिक समाज को जबरन बदलने की जरुरत क्या है और बदलाव आयेगा तो धीरे धीरे ही. समय तो लगेगा न. (वैसे भी हमारे जैसे कई हिन्दू परिवारों में विवाह पश्चात स्त्री के नाम में केवल "देवी" लग जाता है. न पति का नाम आता है और न ही पिता का. पत्नी भी सिर्फ अपने स्त्री धर्म को ही महत्व देती है. कभी कोई विवाद नहीं होता. )

एक शेर याद आ रहा है - इस दौर-ए-तरक्की के अंदाज निराले हैं. जेहन में अँधेरे और सड़कों पे उजाले हैं.

- सुलभ

diery said...

संजय श्रीवास्तव की टिप्पणी..........
आपकी मित्र को क्या करना चाहिए ये तो मुझको नहीं मालूम। जहां तक मुझे महसूस हुआ कि आपकी मित्र के पतिदेव कहीं न कहीं से जबरदस्त कांम्पलैक्स से ग्रस्त हैं। पत्नी के सरनेम नहीं बदलने से उन्हें हीनता का बोध हो रहा है। पत्नी की इंडिपेंडेंड इमेज उनके लिए मुश्किल पैदा कर रही है। आज वो तमाम लोगों की तमाम बातों की परवाह कर रहे हैं, कमजोर और लाचार हो गये हैं, खुद को शर्म से दबा महसूस कर रहे हैं। मुझे समझ में नहीं आ रहा कि पांच साल इन सज्जन में इतनी मजबूती कैसे आ गई कि उन्होंने तमाम विरोधों और हवा के बहाव के खिलाफ खड़े होकर प्रेमविवाह रचाया। ईगो का कहीं अंत नहीं होता..आज वो सरनेम (हालांकि ये कोई इतना बड़ा मुद्दा लगता नहीं) बदलने की बात को अपने ईगो से जोड़ चुके हैं। कल को न जाने कितनी ही और बातों को ईगो से, प्रतिष्ठा से जोड़ते चले जाएंगे। मुझे ये सज्जन काफी कमजोर किस्म के इंसान लगते हैं। उनके तथाकथित ईगो ने उनका और काम तमाम कर दिया है।
वैसे मुझे अब इस बात का उत्सुकतापूर्ण इंतजार है कि आपकी सलाह क्या होगी और आपकी मित्र क्या करगी।

Unknown said...

काश ऐसा बदलाव भी देखने को मिले जहाँ अंतरजातीय विवाह मे पति अपने बच्चों को माॅ का उपनाम दे। क्या ऐसा कभी संभव हो पाएगा ...