Tuesday, September 29, 2009

मैं पूछूं तुमसे

मत रूठो मुझसे
मेरे स्वामी!
देखो, मैं बन सकती हूँ
तुम्हारी माँ,
मित्र तो हूँ ही मैं,
तुम मानो या नहीं।
वक्त पड़े अगर तो
मैं बन जाउंगी
तुम्हारी दासी भी,
पर मत कहो मुझसे
बनने के लिए
वेश्या तुम्हारी!
कि छटपटाती है
मेरी आत्मा
अदा करने मैं तुम्हे
ये कीमत
तुम्हारे दिए इस
रोटी, कपड़े और मकान की ।
हो सके तो
बना लो मुझे अपनी प्रेमिका,
करो मुझसे प्यार,
और मैं दे दूंगी
वो सब कुछ तुम्हे
जो भी है मेरे पास।
एक बात पूछूं मैं तुमसे?
आई थी मैं तुम्हारे पास,
छोड़ कर सब कुछ अपना,
घर और परिवार।
क्यों नहीं बन पाए
कभी तुम
पिता, भाई और
मित्र मेरे?

Saturday, September 26, 2009

भ्रूण हत्या बनाम नौ कन्याओं को भोजन ??

नवरात्र मातृ-शक्ति का प्रतीक है। एक तरफ इससे जुड़ी तमाम धार्मिक मान्यतायें हैं, वहीं अष्टमी के दिन नौ कन्याओं को भोजन कराकर इसे व्यवहारिक रूप भी दिया जाता है। लोग नौ कन्याओं को ढूढ़ने के लिए गलियों की खाक छान मारते हैं, पर यह कोई नहीं सोचता कि अन्य दिनों में लड़कियों के प्रति समाज का क्या व्यवहार होता है। आश्चर्य होता है कि यह वही समाज है जहाँ भ्रूण-हत्या, दहेज हत्या, बलात्कार जैसे मामले रोज सुनने को मिलते है पर नवरात्र की बेला पर लोग नौ कन्याओं का पेट भरकर, उनके चरण स्पर्श कर अपनी इतिश्री कर लेना चाहते हैं। आखिर यह दोहरापन क्यों? इसे समाज की संवेदनहीनता माना जाय या कुछ और? आज बेटियां धरा से आसमां तक परचम फहरा रही हैं, पर उनके जन्म के नाम पर ही समाज में लोग नाकभौं सिकोड़ने लगते हैं। यही नहीं लोग यह संवेदना भी जताने लगते हैं कि अगली बार बेटा ही होगा। इनमें महिलाएं भी शामिल होती हैं। वे स्वयं भूल जाती हैं कि वे स्वयं एक महिला हैं। आखिर यह दोहरापन किसके लिए ??

समाज बदल रहा है। अभी तक बेटियों द्वारा पिता की चिता को मुखाग्नि देने के वाकये सुनाई देते थे, हाल ही में पत्नी द्वारा पति की चिता को मुखाग्नि देने और बेटी द्वारा पितृ पक्ष में श्राद्ध कर पिता का पिण्डदान करने जैसे मामले भी प्रकाश में आये हैं। फिर पुरूषों को यह चिन्ता क्यों है कि उनकी मौत के बाद मुखाग्नि कौन देगा। अब तो ऐसा कोई बिन्दु बचता भी नहीं, जहां महिलाएं पुरूषों से पीछे हैं। फिर भी समाज उनकी शक्ति को क्यों नहीं पहचानता? समाज इस शक्ति की आराधना तो करता है पर वास्तविक जीवन में उसे वह दर्जा नहीं देना चाहता। ऐसे में नवरात्र पर नौ कन्याओं को भोजन मात्र कराकर क्या सभी के कर्तव्यों की इतिश्री हो गई ....???
आकांक्षा यादव

Thursday, September 24, 2009

बालिका दिवस -- २३ सितम्बर 2009


बालिका दिवस की सभी को बहुत बहुत बधाई .......

Wednesday, September 23, 2009

सूडानी स्त्रियों का संघर्ष

लड़ो तो ऐसे लड़ो
राजकिशोर

सूडान की युवा पत्रकार लुबना अहमद अल हुसेन को इस अजनवी हिन्दुस्तानी का सलाम। लुबना ने यह साबित कर दिया है कि साधारण-सी बातों को ले कर किस तरह इतिहास रचा जाता है। बेशक हमारे देश में औरतों के लिए पैंट पहनना साधारण-सी बात है, यद्यपि यहाँ भी कई प्रकार के समाज-विरोधी विचार तथा संगठन इसे एक असाधारण घटना बनाने पर तुले हुए हैं। लेकिन सूडान में औरतों का पैंट पहनना अपराध है। वहाँ के नैतिक कोतवाल इसे महिलाओं के लिए ‘अभद्र’ पोशाक मानते हैं। इस अपराध के लिए उन्हें अधिकतम चालीस कोड़े लगाए जा सकते हैं और एक सौ सूडानी डॉलर की जमानत लेनी पड़ सकती है।

सूडान में ईसाई भी रहते हैं और मुसलमान भी। ईसाइयों पर यह कानून लागू नहीं होता। पर मुस्लिम औरतों पर इस तरह के कई अभद्र कानूनों का शिकंजा है। 1989 में कट्टरपंथी उमर अल बशीर द्वारा तख्ता पलट के बाद मध्ययुगीन इस्लामी कानून लागू करने की रवायत शुरू हो गई थी। इसी के तहत 1991 में औरतो के लिए भद्रता के नियम बनाए गए। इन नियमों के तहत अब तक हजारों मुसलमान लड़कियों और औरतों को गिरफ्तार कर उन्हें कोड़े लगाए जा चुके हैं। हम सभी को सूडानी महिलाओं की बहादुरी का लोहा मानना चाहिए कि कोड़े खाने का खतरा उठा कर भी वे ‘क्या पहनें, क्या न पहनें’ के अपने मूल अधिकार से समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं।

चौंतीस साल की लुबना हुसेन, जिनके पति का देहांत हो चुका है, इन्हीं साहसी औरतों में हैं। उन्हें पिछली 3 जुलाई को सूडान की राजधानी खारतूम में बारह दूसरी स्त्रियों के साथ गिरफ्तार किया गया था। इन सभी का अपराध यह नहीं था कि वे एक रेस्त्रां में संगीत के कार्यक्रम का आनंद ले रही थीं। इस पर सूडान में कोई पाबंदी नहीं है। उनकी ढीठाई यह थी कि उस समय वे ट्राउजर पहने हुए थीं। उन सभी को गिरफ्तार कर स्थानीय थाने में ले जाया गया। कमी बस यह थी कि हथकड़ियाँ नहीं पहनाई गई थीं। थाने में ज्यादातर ने अपना अपराध मंजूर कर लिया। दल-दस कोड़े मार कर उन्हें घर भेज दिया गया। लुबना तथा कई और औरतें पैंट पहनने के अपने अधिकार पर अड़ी रहीं। सो उनका मामला अदालत के सुपुर्द कर दिया गया।

सूडान की पुलिस ने कोड़े मारने का भी अपना तरीका बनाया है। ये कोड़े सिर्फ मामूली चोट पहुँचाने के लिए नहीं मारे जाते, जैसे शैतान बच्चों को पहले बेंत से मारा जाता था। चेतावनी देने से अधिक कष्ट पहुंचाने का इरादा होता है। कोड़े बनाने के लिए प्लास्टिक की रस्सियों का इस्तेमाल होता है। जहाँ कोड़ा पड़ता है, वहाँ ऐसा जख्म बनता है जिसका दाग कभी नहीं मिटता। साफ है कि मामला न्यायिक कार्रवाई का नहीं, प्रतिहिंसा का है, जिसके पीछे मजा चथाने का भाव होता है – जींस की पैंट पहनी है, तो लो, यह भी भुगतो।

सजा से बचने के लिए लुबना हुसेन के पास एक कारगर कवच था। वे संयुक्त राष्ट्र के लिए काम कर रही थीं। सूडान के कानून में ऐसे व्यक्तियों पर संयुक्त राष्ट्र की इजाजात के बिना मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। इसी बिना पर जज ने लुबना से कहा कि हम आप पर मुकदमा चलाना नहीं चाहते, आप चाहें तो जा सकती हैं। पर चट्टानी इरादों की इस सख्त औरत के लिए सवाल सिद्धांत का था, सुविधा का नहीं। उसने कहा कि मुझ पर मुकदमा चलाया जाए, ताकि मैं अदालत में अपना पक्ष रख सकूँ। इसलिए मैं राष्ट्र संघ की नौकरी छोड़ रही हूँ। लुबना ने यह नौकरी छोड़ दी, तो मुकदमे की कार्रवाई फिर से शुरू हुई। समां यह था कि जिस दिन अदालत में विचार होना था, सैकड़ों महिलाएँ अदालत के बाहर जमा हो गईं और स्त्रियों के खिलाफ भेदभाव के खिलाफ नारे लगाने लगीं। इनमें से बहुतों ने पैंट पहन रखी थी। शोर-शराबा उपद्रव में न बदल जाए, इसलिए कार्रवाई को स्थगित करना पड़ा। अगली बार भी विरोध और प्रदर्शन के कारण कार्रवाई स्थगित करनी पड़ गई।

तमाम जिरह और बहस के बाद अदालत ने लुबना को अपराधकर्ता करार दिया और उन्हें 130 सूडानी डॉलर का जुर्माना भरने का हुक्म दिया। लुबना के लिए यह एक मामूली-सी रकम थी। पर सवाल सिद्धांत का था। उन्होंने अदालत को ठेंगा दिखाते हुए कहा कि मैं एक दमड़ी भी नहीं दूँगी। जज में थोड़ी भी इनसानियत होती, तो वह जुर्माने की रकम अपने पास से भर देता और कैदी को आजाद कर देता। सजा देना उसके लिए कानूनी मजबूरी हो सकती थी, पर व्यक्तिगत कर्तव्य तो यही था कि वह एक इनसान की बुनियादी आजादियों का समर्थन करता। लेकिन किसी फासिस्ट सत्ता द्वारा नियंत्रित समाज में जिसके पास जितनी ज्यादा ताकत होती है, वह उतना ही ज्यादा डरा हुआ होता है। जुर्माना न चुकाने के कारण लुबना को 7 सितंबर को जेल भेज दिया गया। रात वहीं कटी। अगले दिन एक अफसर आया और उसने लुबना को रिहा कर दिया। लुबना ने अपने सभी दोस्तों और परिजनों को जुर्माने की रकम न भरने के लिए कहा था, पर सूडानी पत्रकारों की यूनियन ने पैसा जमा करा दिया था।

लुबना हुसेन को अपनी रिहाई की कोई खुशी नहीं है। उनका कहना है, सात सौ से ज्यादा औरतें अभी भी जेल में सड़ रही हैं, क्योंकि उनकी ओर से जुर्माना भरने के लिए कोई नहीं है। जाहिर है, यह लड़ाई लुबना हुसेन की सिर्फ अपनी नहीं है। एक पत्रकार के रूप में उनकी अच्छी-खासी साख है। वे जानती हैं कि अगर वे अपने लिए विशेषाधिकार और सुविधा के द्वीप बनाना ठीक न समझें, तो उनकी अपनी नियति उन अन्य स्त्रियों की नियति से भिन्न नहीं हो सकती जिनके बारे में और जिनके लिए वे लिखती हैं। उनके सरोकारों की इस व्यापकता के कारण ही जब उन पर मुकदमा चल रहा था, यह मुद्दा एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया। वेबसाइटें खुल गईँ और ‘सूडानी महिलाओं के मानव अधिकारों की रक्षा करो’ की मुहिम ने जोर पकड़ लिया।

कुछ लोग कहेंगे, औरतें पैंट पहनें या न पहनें, यह भी कोई मुद्दा है 9 लुबना का कहना है – ‘पैंट तो मात्र एक प्रतीक है। मूल सवाल औरतों की स्वतंत्रता, स्वाभिमान और आत्मनिर्णय के अधिकार का है।’ हममें से कौन है, जिसकी जबान पर यह नहीं आएगा – हाँ, लुबना, इसमें क्या शक है ! हम जहाँ भी हैं, तुम्हारी लड़ाई के साथ हैं। 000

Wednesday, September 16, 2009

हम सब अचिन्हित शिकार है योनिक हिंसा के .

"बलात्कार का हर्जाना " और "सीढीयों पर मौत " को दो किश्तों की तरह देख रही हूँ और कहना चाहती हूँ, दोनों पोस्ट कुल मिलाकर एक एकहरी सोच जो हमारे इस अमानवीय समाज मे व्याप्त है उसी का विस्तार है, और उसी को नए तरह से शब्दजाल मे पिरोकर परोसने की कोशिश है, जिसे देखकर तनिक आश्चर्य होता है, बहुत नही!!! दोनों ,का मिलाकर लब्बोलुबाब ये है, " पीड़ीत अगर अपना बचाव न कर सका, और जिंदा बच गया तो ये उसका नैतिक पतन है, अगर उसने हर्जाना स्वीकार किया तो भी नैतिक पतन है। और सुझाव ये कि लड़कर मर जाओ। अगर इस तरह की दुर्घटना के बाद खुदा न खास्ता घर लौटना हुया तो वहाँ कोई सहानुभूती या फ़िर लड़ाई मे सहयोग की अपेक्षा न रखो। यही सब तो होता आया है, इसमे नया और मानवीय क्या है?

जो बात प्रतीश और संजय ने उठाई है, वों इस एकहरी सोच की सही काट है। बलात्कार की घटनाओं मे कमी स्त्रीयों के किसी भी तरह के आचरण करने से काबू मे नही आ सकती (चाहे वों बुर्का पहने, रात-बेरात घर से बहार न निकले, या फ़िर हथियारों से लैस होकर सड़क पर निकले)। ये एक सामाजिक समस्या है, और इसकी जड़े भी इसी व्यवस्था मे है।, चाहे अनचाहे स्वीकृति भी। और सबसे आसन तरीका ये है की दोष पीड़ीत पर मढ़ दिया जाय। और अपनी अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से आसानी से मुह मोड़ लिया जाय।

बलात्कार के तमाम पहलू है जिन पर बहुत कुछ बोला-लिखा जाता है, जिसमे नर होरमोंस पर दोशोरोपन से लेकर, स्त्रियों का व्यवहार, वेश भूषा चपेट मे आती है। पर इसका एक महत्तवपूर्ण पक्ष ये है, कि हमारे समाज मे माता-पिता, नाते रिश्तेदार, और दोस्त, तीनो जिन्हें पीड़ीत का संबल बनाना चाहिए, वों उसका साथ छोड़ देते है। कम से कम इस अर्थ मे कि कानूनी लड़ाई लड़ना नही चाहते और समाज मे अपनी रुसवाई से डरते है। इसीलिये बलात्कार के आघात से कम और अपनो की कायरता और उपेक्षा से उपजी असहायता अक्सर पीड़ीत को आत्महत्या की तरफ़ धकेलती है। समाज, पास पड़ोस, और स्त्री के प्रति एक गहरा अमानवीय नजरिया कि बलात्कार की पीडीता, विधवा और तलाकशुदा स्त्री एक झूठी थाली है, न कि एक मनुष्य। योंशुचिता और उसके आधार पर स्त्री को हाशिये पर फेंक देने के लिए समाज जिम्मेदार है। जब तक ये स्थिती रहेगी, पीडीत कैसे सिर्फ़ अपने बूते और अपनी सोच के बूते इस समस्या का हल ढूँढ सकता है? इससे पहले कि बलात्कार की पीड़ीता ये मानने लगे कि ये एक मात्र दुर्घटना थी, उसके परिवार को, और वृहतर समाज को इस मूल्य को अपनाना पडेगा। बलात्कार स्त्री और उसके परिवार के लिए सामाजिक कलंक है, और जब तक सामाजिक सोच नही बदलेगी, खाली पीड़ीत की सोच बदलने की बात से क्या होगा?

धीरे-धीरे ही सही पर हमारे समाज मे बदलाव आए है, और प्रिदर्शनी मट्टू के पिता के जैसे पिता भी हमारे देश मे है, जिन्होंने बेटी की मौत के बाद भी न्याय के लिए संघर्ष किया, और अपराधी को सजा हुयी। भावरी देवी के पति भी है, जिन्होंने अपनी पत्नी का साथ दिया। मेरी नज़र मे यही एक अभूतपूर्ण पहल हमारे जनतंत्र मे हुयी है, जिसमे एक आम, बूढा पिता, और परिवारजन , एक गरीब ग्रामीण, अहिंसक तरीके से और जनतंत्र का इस्तेमाल करके न्याय पाने मे सक्षम रहे है। पर इन सफलताओं का सहरा सामाजिक भागीदारी को जाता है, केवल एक अकेले व्यक्ति और परिवार के लिए ये सब अपने बूते करना मुमकिन नही है।

क्या किसी को ये भ्रम है कि पीड़ीत व्यक्ति बलात्कार के लिए ख़ुद को दोषी मान सकता है?
जिस पर राजकिशोरजी और अनुराधा की बहस है कि स्त्री अपना शरीर पुरूष से छिपाती है, और शरीर पर परपुरुष के छू जाने मात्र से विचलित होती है, और इसी मे अपना शील गया समझती है। और अगर इस पर काबू पा ले तो बलात्कार की पीडा कम हो जायेगी। अगर ऐसा होता तो पश्चिमी देशो मे जहा काफी हद तक यौन शुचिता का भ्रम टूटा है, वहा बलात्कार की पीडीत स्त्रीयों और योन हिंसा को झेलने वाले बच्चों का दर्द कुछ कम होता। कम से कम इन देशो ने इतने गहरे जाकर, न सिर्फ़ बलात्कार, बल्कि सेक्सुअल हरासमेंट के क़ानून कई परतों मे बने है, जिनमे हाव-भाव, बॉडी लंग्वैज़, भाषिक हिंसा, तक तमाम आयामों को परिभाषित किया गया है।
योंशुचिता से छुटकारे के बावजूद मानसिक पीडा बहुत गहरे वहां भी है। और ये पीडा इसीलिये है की इंसान का अस्तित्व कुचला जाता है, एक असहायता के बोझ, और मनुष्य का सिर्फ़ एक वस्तु बन जाने का अहसास इससे गहरे जुडा है. दूसरा उदाहरण, पुरुषो के लिए समाज मे योन शुचिता के मानदंड स्त्री के जैसे नही है, पर फ़िर भी अगर "सोडोमी" का शिकार हुए बच्चे जो लिंग से पुरूष है, इसे सिर्फ़ शारिरीक दुर्घटना की तरह भूल जाते है? बलात्कार की रोशनी मे नही, बल्कि मनुष्यता की सम्पूर्णता की रौशनी मे इस तथ्य को खुलकर स्वीकार करने की ज़रूरत है की योनिकता और सेक्सुअल व्यवहार, और उससे जुड़े मानव अनुभव, हमारे मन, शरीर और समस्त व्यक्तित्व पर बहुत गहरा, और चौतरफा असर डालते हैऔर किसी भी तरह का अन्याय, जबरदस्ती, और निजता का उलंघन जो मनुष्य के बेहद निजी योनिक व्यवहार से जुड़े है, उनकी शिनाख्त इसी के तहत होनी चाहिएभले ही सामाजिक रूप से ये कितना ही, अवांछनीय विषय हो! और अगर ऐसी घटना से पीड़ीत को अपने काम मे हर्जा होता है, स्वास्थ्य मे समस्याए आती है, तो हर्जाना उस नुक्सान का ज़रूर मिलना चाहिए और ज्यादा से ज्यादा, और हरजाने के साथ साथ कडा कानूनी दंड मिलना चाहिए। या खुदा न खास्ता गर्भ और अनचाहे बच्चे पैदा हो जाए, तो उनके पालन की जिम्मेदारी भी पुरूष पर होनी चाहिए।

ये सिर्फ़ पुरुषो के दिमाग का फितूर है, कि स्त्री पुरूष स्पर्श से असहज हो जाती है, और ख़ुद को योनिकता के अर्थ मे अपवित्र मानती है। मैं फिलहाल किसी ऐसी स्त्री को नही जानती जिसका शरीर जाने अनजाने और मजबूरी मे हजारो पुरुषो के शरीर से टकराया हो। पर-पुरूष के रोज़-ब-रोज़ के स्पर्श की आज की स्त्री अभ्यस्त हो गयी है, और पहले भी हमारी दादी नानिया अभस्य्त रही है। कोई नई बात नही है। रोज़-रोज़ की बसों मे, हवाई जहाज़ की तंग सीटो मे भी, भीडभाड से भरे बाज़ारों मे, घरों मे सब जगह, नाते रिश्तेदारो और दोस्तों को गले लगाने मे भी। स्पर्श किसी एक तरह का नही होता, स्पर्श और स्पर्श मे फर्क है। आत्मीयता का, दोस्ती का स्पर्श, प्रेम का वांछनीय है, और भीड़ का तो आपकी इच्छा हो न हो , आपको भुगतना ही है, अगर आप "असुर्यस्पर्श्या" नही है तो। इन स्पर्शो की तुलना बलात्कार के या फ़िर योनिक हिंसा से उत्प्रेरित स्पर्शो से नही की जा सकती है। और अन्तर इन स्पर्शो मे सिर्फ़ इंटेंशन का है, शारीरिक एक्ट का नही!! शारीरिक से बहुत ज्यादा बलात्कार पहले एक अस्वस्थ, रोगी, और अपराधी मानस मे जन्म लेता है, और ऐसी परिस्थिति जब उसे कम से कम अवरोधों का सामना करना पड़े, शारिरीक रूप लेता है। इसीलिये, बलात्कार की घटनाओं से भी ज्यादा सर्वव्यापी वों अपराधी मानस है, जिसकी शिनाख्त बिना इस व्यवस्था और पारंपरिक सोच को समझे बिना नही की जा सकती है। और इसकी रोकथाम भी, सामाजिक सोच और स्त्री के प्रति समाज का नज़रिया बदलने के ज़रिये हो सकती है, और तत्कालीन उपाय क़ानून व्यवस्था को सक्षम बना कर और तमाम छोटे-बड़े हर तरह के बुनियादी स्पोर्ट सिस्टम को बना कर किए जा सकते है जो बलात्कार की राह मे लगातार रोड़ा खडा करते रहे।

बलात्कार से भी ज्यादा "योन शुचिता" और "बलात्कार का खौफ" हमारे समाज मे इतना व्याप्त है, की वों स्त्री और पुरूष दोनों से उनकी मनुष्यता छीन लेता हैऔर कुछ हद तक हम सब अप्रत्यक्ष रूप से उसका शिकार हो जाते हैस्त्री-पुरूष के सम्बन्ध विशुद्द रूप से यौनिक संबंधो के दायरे मे बंध जाते है, उनमे एक मनुष्य की तरह दोस्ती की, सहानुभूती की और कुछ हद तक एक स्वस्थ "कम्पीटीशन" की तमाम गुंजाईश ख़त्म हो जाती हैएक दूसरे से सीखने की संभावनाए ख़त्म हो जाती है, एक दूसरे के साथ खड़े होने की संभावनाए ख़त्म हो जाती है, और कही कही बहुत सी समस्याए जो सामूहिक भागीदारी से ही सुलझाई जा सकती है, उनका मार्ग अवरुद्ध हो जाता हैले देकर स्त्री और पुरूष अपना जीवन मनुष्य नाम के एक प्राणी का जीवन जीकर "अपने अपने लैंगिक कटघरों" मे बिताने को बाध्य है। स्त्रीयों का अच्छा स्वास्थ्य, और उनकी देह मे थोडा रफ-टफ पना, मार्शल आर्ट की ट्रेनिग आदि बलात्कार की समस्या का समाधान नही है, पर ये कुछ हद तक उनके भीतर एक मनुष्य होने का विश्वास पैदा कर सकता है, और अपनी परिस्थितियों के आंकलन को इम्प्रूव कर सकता है। और शायद कुछ हद तक, स्त्री पुरूष के बीच खड़ी लैंगिक कटघरों की दीवारों को ढहाने का काम कर सकती है।

Sunday, September 13, 2009

सीढ़ियों पर मौत

इज्जत बचाने की खातिर
राजकिशोर



‘बलात्कारी जब ऐन सामने हो और तुम उसे रोकने में असमर्थ हो, तो उसका विरोध मत करो, नहीं तो वह और खूँखार हो जाएगा। वह तुम्हारी जान भी ले सकता है।’ – आजकल लड़कियों को यही सलाह दी जा रही है। मेरी राय अलग है। इस मामले में मैं परंपरावादी मत से इत्तेफाक रखता हूँ कि चाहे जान चली जाए, पर जब तक होश है, बलात्कारी की मंशा पूरी न होने दो। जब पुरुषों को यह पता चल जाएगा कि वे किसी जीवित स्त्री से नहीं, उसके शव से ही बलात्संग कर सकते हैं, तो बलात्कार की संख्या निश्चित रूप से कम होने लगेगी। यही राय महात्मा गांधी की थी और उनके सोच के आधार पर ही मैंने अपना मत बनाया है।

ग्यारह सितंबर को जमुना पार दिल्ली के खजूरी खास के राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की भगदड़ में पाँच लड़कियों की मौत के हादसे के बाद मेरा यह मत और पुख्ता हुआ है। इन भगदड़ और इन मौतों की पृष्ठभूमि में और भी बहुत-से कारण होंगे ही। जिस बात को मैं यहाँ रेखांकित करना चाहता हूँ वह यह है कि लड़कियों को अपनी इज्जत बचाने के जो नुस्खे बताए जाते रहे हैं, वे बुरी तरह फेल हो चुके हैं और अब हमें लड़की की इज्जत को नए तरीके से परिभाषित करना चाहिए तथा इज्जत बचाने के नए तरीके भी खोजने चाहिए। ऐसा न होने के कारण ही उन पाँच लड़कियों की मौत हुई। वे तथा उनके साथ पढ़नेवाली लड़कियाँ दुराचारी लड़कों के खौफ से इतनी विक्षिप्त थीं कि उन्होंने जान पर खेल कर अपनी इज्जत बचाने की कोशिश की। काश, उन्हें जान देने का दूसरा तरीका भी बताया गया होता।

वे लड़के, जो मौका पाते ही लड़कियों से छेड़छाड़ करने लगे थे, निश्चय ही हिंसक होंगे। उनमें से कुछ के पास चाकू भी था। लेकिन लड़कियों के डर जाने के लिए शायद इतना ही काफी था कि वे लड़के हैं और उनके इरादे ठीक नहीं हैं। इस तरह की मुठभेड़ अकेले में हो, तब भी लड़की के लिए यह जाना हुआ होना चाहिए कि पाशविक बल के सामने उसे किस तरह पेश आना है। हैरत और तकलीफ की बात यह है कि स्कूल में उस समय लड़कियों की संख्या कम नहीं थी, लेकिन इस सामूहिकता के बावजूद छेड़ी जा रही लड़कियों में यह हिम्मत क्यों नहीं पैदा हुई कि वे बदमाशों को उचित जवाब दे सकें? अन्याय को सहन न करने का साहस दिखाने पर गुत्थमगुत्शी भी हो जाती, तो कोई हर्ज नहीं था। लेकिन लड़कियों को शरीर-कातर होने की सीख इस कदर घुट्टी में पिला दी गई है कि उन्हें लगा होगा कि प्रतिकार के परिणामस्वरूप पुरुष शरीर के स्पर्श का पाप उन्हें ढोना पड़ सकता है। घर लौटने पर उन्हें यही उलाहना सुनना पड़ेगा कि तुम उन बदमाशों से उलझने क्यों चली थीं – तुम्हें अपना दामन बचा कर वहाँ से चुपचाप खिसक लेना चाहिए था। लड़कियों के सिर पर हमेशा लटकनेवाली इसी अविवेकी डर की तलवार ने उन्हें कमजोर और कायर बना दिया होगा, जिसका मनहूस नतीजा एक पागल भगदड़ और पांच लड़कियों की मौत में निकला। जो डर कायर बना दे, उसे निकट के डस्टबिन में फेंक आना चाहिए। इज्जत की जो परिभाषा लड़कियों को अपने पर शर्मिंदा होना सिखाए, उस परिभाषा की शहर के सबसे बड़े मैदान में सामूहिक अंत्येष्टि कर देनी चाहिए।

पुरुष से सभ्य होने की माँग लाजिमी और अनिवार्य है। पुरुष की असभ्यता की भर्त्सना तब तक निरंतर होनी चाहिए जब तक उसका पासंग भी बचा रहता है। लेकिन दुनिया भर की स्त्रियाँ क्या तभी चैन की साँस ले सकेंगी जब दुनिया के सारे पुरुष यकीनन सभ्य हो जाएँगे? क्षमा करें, वह खूबसूरत सुबह कभी नहीं आएगी। शायद यह आदमी की फितरत में ही नहीं है। इसलिए स्त्रियों के लिए इज्जत से जीने के संघर्ष के उस दूसरे सिरे की भी इतनी ही फिक्र करना लाजिमी और अनिवार्य है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपनी रक्षा के लिए खुद भी जिम्मेदार होता है। व्यक्ति की इसी जिम्मेदारी को मान्यता देने के लिए हम सभी को आत्मरक्षा का अधिकार मिला हुआ है। कानून यह है कि अपनी रक्षा करने के लिए मुझे जितने भी लोगों की जान लेनी पड़े, मैं ले सकता हूँ। यह मेरे जीवन धारण करने के अधिकार के तहत आता है और इसके साथ कोई समझौता नहीं हो सकता।

जो बात जीवन के बारे में सही है, वही उन चीजों के बारे में भी जिन्हें मिला कर जीवन बनता है। अगर मुझे डरा-धमका कर किसी ने मेरा सामान छीन लिया, मुझे अपने घर से बेदखल कर दिया, मेरे साथ शारीरिक अतिक्रमण किया, तो मैं सिर्फ जिंदा रह कर क्या करूँगा? ऐसे जीने को धिक्कार है जिसमें स्वाभिमान न हो। स्त्रियों के लिए यह और भी ज्यादा सच है, क्योंकि उनके साथ शारीरिक अतिक्रमण का खतरा अकसर मौजूद होता है। ऐसी कठिन घड़ियों में आत्मरक्षा के अपने जैविक अधिकार की याद आनी ही चाहिए। इस अधिकार का इस्तेमाल करते हुए अगर जान भी चली जाए, तो खुशी-खुशी दे देनी चाहिए।

इस तरह, मामला सिर्फ बलात्कार या बेइज्जती से बचने-न बचने का नहीं रह जाता। यह अस्तित्व की स्वतंत्रता और स्वाभिमान का मामला हो जाता है। अतिक्रमण का सामना करने के मामले में हमें चूहा नहीं, शेर बनना सीखना पड़ेगा, नहीं तो हमारा अपमानित होते रहना निश्चित है। जरूरी है कि हर माँ-बाप अपने बेटे-बेटी को, बेटियों को तो जरूर ही, शुरू से यह प्रशिक्षण देते रहें कि अन्याय के सामने झुकना नहीं है, उसका विरोध और प्रतिकार करना है। अपनी ओर से न हिंसा करनी है न हिंसा को प्रोत्साहन देना है, पर जायज उद्देश्य के लिए हिंसा करने से डरना नहीं है। ऐसा अनुशासन और प्रशिक्षण ही सभ्यता को सचमुच सभ्य बना सकेगा। मेरी अपनी बेटी कभी ऐसे किसी हादसे का शिकार हो कर आँसू बहाते हुए घर लौटी, तो मैं उससे यही कहूँगा कि इससे अच्छा था कि बलात्कारी का प्रतिकार करते हुए तू अपनी जान दे देती। 000

Friday, September 11, 2009

कहानी नहीं सच

सुनने में यह कहानी लग सकती है लेकिन है यह सौ फीसदी सच। नाम-वाम भी पहचान छुपाने के लिए बदले नहीं गये हैं।
उसका नाम अर्चना है। उम्र 26 साल। शादी को आठ साल होने को हैं। एक सात साल की बेटी है। पति का नाम अमित कुशवाहा।
अर्चना अपनी मासूम सी खूबसूरत सी बच्ची के साथ जब अखबार के दफ्तर में दाखिल हुई तो उत्सुकता बस बच्ची को प्यार करने की हुई। लेकिन ज्यों-ज्यों अर्चना की जिंदगी के पन्ने खुलने शुरू हुए मेरी निगाहें सिर्फ उस नन्ही बच्ची मल्लिका पर टिकी थीं कि कैसे वह मां का आंचल थामे सब कुछ सुन, देख समझ रही है। अर्चना की शादी आठ साल पहले हुई। वह गांव की गरीब लड़की है। पांच बहनें। पिता किसान। कानपुर के अमित का रिश्ता पहुंचा। अमित उस वक्त होटल ताज (लखनऊ) में काम करता था. पिता ने कुछ बीघा खेत बेचा और बेटी की शादी अच्छे घर में कर दी. साल भर के अंदर ही अच्छे घर की हकीकत अर्चना को दिखने लगी. पति की पहले ही दो शादियां हो चुकी थीं. दोनों बार तलाक लिया जा चुका था. पहले तलाक के मामले में महाशय पति तिहाड़ जेल की हवा भी खा चुके थे. लेकिन उन्हें बार-बार शादी करने की आदत है. गांव की लड़की चुपचाप पड़ी रहेगी और उसकी बाकी कारगुजारियों पर बोलेगी नहीं यही सोचकर उसे लाया गया था. अर्चना एक बच्ची की मां बनने वाली थी तब उसने कुछ बातों का विरोध किया. इन गलत बातों में मारपीट, आधी रात को घर से बाहर निकाल देना, सर फोड़ देना, प्रेगनेंसी के दौरान पेट पर मारना, भूखा रखना, कमरे में बंद करके रखना आदि शामिल था. दरअसल, पति मूलत: चरित्रहीन है.
जैसे-तैसे अर्चना कानपुर का घर छोड़कर लखनऊ आ जाती है। यहां भी अमित का घर है. वह वहीं रहकर बेटी को पढ़ाती है. अर्चना खुद सिर्फ इंटर पास है. दो बार तलाक के मामलों में घिर चुका अमित अब शातिर हो चुका है. उसने पत्नी से कहा, सात साल बीतने दो तब बताऊंगा. उसे डाउरी एक्ट का इल्म है. कानूनी दांवपेंच वह जानता है. एक साल से पत्नी के साथ नहीं रह रहा है. बेटी की फीस सीधे स्कूल में जमा करवाता रहा है जो अब बंद है. एरिया की पुलिस उसके शिकंजे में है. नौकरी उसने छोड़ दी है ताकि कम से कम मुआवजा देना पड़े.
वैसे महाशय की तैयारी एक्सपार्टी डिवोर्स की थी. खबर मीडिया में आने से केस बदल तो गया है लेकिन उसका असली रूप सामने आ चुका है. वह चौथी शादी की तैयारी में है. अमित का कहना है कि अगर अर्चनाचुपचाप मुंह बंद करके रहे, उसकी और उसकी मां की सारी बातें मानें, घर से बाहर बिना पूछे कदम भी न रखे, घर में हमेशा घूंघट में रहे, पति से कोई पूछताछ न करे, उसकी हर बात माने, सारे रीति-रिवाजों का पालन करे तो वो अर्चना को साथ रखने के बारे में सोच सकता है। ऐसा कहते वक्त अमित की आंखों का दंभ और उसकी बेटी मल्लिका की मासूमियत दोनों मेरे सामने थे।
यह इक्कीसवीं सदी का सच है। किस कानून से बदलेंगी मानसिकताएं?
- प्रतिभा कटियार

Sunday, September 6, 2009

"जिसके पास स्मृतियाँ हैं, सपने हैं, वह अपने लिए समय और स्थान तलाश ही लेता है..."

आज के समय में नारवादी साहित्यकारों में प्रमुख हस्ताक्षर अनामिका की कविता स्त्रियां, ओढ़नी, और मौसयां आदि हम इस ब्लॉग पर पहले भी ले चुके हैं। पिछले दिनों उनसे एक छोटी सी बातचीत हुई जिसे वाणी प्रकाशन की पत्रिका के ताजा अंक में 'पुस्तक संसार' कॉलम में छापा गया है। इस बातचीत को यहां फिर दिया जा रहा है।

कवि तथा कथाकार अनामिका से आर. अनुराधा की बातचीत


प्रश्न: क्या आपको भी लगता है कि आज मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच नई पीढ़ी साहित्य से कटती जा रही है?

अनामिका: हाल ही की बात करें तो कई पत्रिकाओं के युवा विशेषांक आए हैं। भारतीय ज्ञानपीठ ने कस्बों-गाँवों के युवा लेखकों के लिए एक कारगर योजना शुरू की है, जिसमें उनकी पांडुलिपियों का निष्पक्ष मूल्यांकन होता है और श्रेष्ठ कृतियाँ पुरस्कृत और प्रकाशित होती हैं। इसमें भी युवा पूरे उत्साह से शामिल हो रहे हैं।

इसके अलावा युवा, खासकर युवतियां, रोजगार में व्यस्तता आदि के बावजूद साहित्य सृजन में लगे हैं। दरअसल जिसके पास स्मृतियाँ हैं, सपने हैं, वह अपने लिए समय और स्थान की तलाश कर ही लेता है.. जिस तरह पीपल का कोमल सा पौधा सीमेंट की परत फोड़ कर भी उपजता है, बढ़ता है। युवा अनेक लघु पत्रिकाएँ निकाल रहे हैं जो दरअसल सीमेंट फोड़ कर अपने लिए जगह बना रही हैं। यह बहुत बड़ी बात है। जो भी कंप्यूटर तक पहुँच रखता है, वह वहां भी अपने विचारों के लिए जगह तैयार कर ले रहा है। ब्लॉग, एसएमएस कविताएं, ई-मेल, फेसबुक पर टिप्पणियाँ...। टेलीविजन के लिए लेखन में भी बड़ा बदलाव घटित करने की क्षमता है, लेकिन अभी तक ऐसा हो नहीं पाया है।

लिखना यानी प्रतिरोध। निजी या सामूहिक प्रतिरोध के जरिए वैकल्पिक समाज के हक में जो संयुक्त प्रस्ताव बनाना साहित्य का काम है, वह ये लघु पत्रिकाएँ और दूसरे नए माध्यम कर रहे हैं। हालाँकि हर नन्ही गिलगरी अपनी मूँछों में दबा कर एक-एक तिनका लिए जा रही है, फिर भी यह सब तरफ हो रहा है। यह कहना गलत होगा कि युवा पीढ़ी साहित्य से कटती जा रही है।

प्रश्न: किन क्षेत्रों में साहित्य का विस्तार हो रहा है?

अनामिका: विमर्शात्मक लेखन आज के समय की विशेषता है - स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श। स्त्री विमर्श एक महीन लड़ाई है, जो दो नस्लों, जातियों, देशों-राज्यों की लड़ाइयों से अलग है, क्योंकि इसमें एक का स्थानापन्न दूसरा नहीं होता, बल्कि इसमें समानता का तर्क काम करता है। यह पीढ़ियों के संघर्ष से मिलता-जुलता है, जिसमें प्रीति-घृणा साथ चलते है। इसका प्रतिबिंब साहित्य में कई स्तरों पर देखने को मिलता है।

इस सिलसिले में आत्मकथाएँ महत्वपूर्ण दस्तावेज होती हैं जो निजी जीवन के जोड़-घटाव के साथ-साथ उस समय के समाज का भी खाका खींचती हैं। मन्नू भंडारी की आत्मकथा 'एक कहानी यह भी' में इमरजेंसी के वक्त का जिक्र है। प्रभा खेतान की ‘अन्या से अनन्या' में पश्चिम बंगाल में कामगार आंदोलन की बात है तो मैत्रेयी पुष्पा की ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ में छोटे कस्बे से बड़े शहर आने वाली लड़की की व्यथा है कि किस तरह समाज में ऊचा दर्जा पाने वाले साहित्यकार-संपादक उन्हें सहज शिकार मानते हैं और किस तरह इस माहौल में लड़की की देह ही उसका आलेख बन जाती है। चंद्रकिरण सौनरेक्सा की आत्मकथा में चुप्पी ही सब कुछ कहती है और वही इस कृति की सुंदरता है। उसमें घरेलू औरत की जिंदगी की परतें धीरे-धीरे खुलती हैं जो उनके संघर्षों से परिचय करवाती है, साथ ही उनका सामना करने के तरीके भी बताती है। बिना आत्म-दया के, बिना आत्म-महिमामंडन के सहजता से अपने बारे में कहना वाकई कठिन है और ऐसा इन आत्मकथाओं ने किया है। ये सभी अपने-अपने समय का इतिहास हैं। ये लघु स्तर पर काम करके विशाल स्तर पर परिवर्तन घटित करने में सक्षम हैं।

प्रश्न: इनका असर?

अनामिका: आज पुरुष साहित्यकार सेंसिटाइज्ड हैं जो खाना अच्छा न बनने पर थाली उठा कर नहीं फेक देते। वे घर-बार सँभालते हैं, बच्चा उठाते हैं। उनकी भाषा और लहजा मुलायम है। पहले के पुरुष साहित्यकारों की भाषा-लहजे में परिपक्वता नहीं थी। उनके साहित्य की ऊपरी सतहों को कुरेदें तो निचली पर्तों में वही पुरुष विद्यमान होता था। पर अब के साहित्यकारों की भाषा अलग है। साहित्यकार समाज के सबसे सेंसिटाइज्ट सदस्य माने जाते हैं, और यह आज के रचनाकारों में दिखता है। दलित प्रश्न पर भी वे ज्यादा संवेदनशील हैं, सचेत हुए हैं और समझते हैं कि अब साथ चलने का समय है।

प्रश्न: और किन हिस्सों में और काम करने की जरूरत है?

अनामिका: सबसे ज्यादा कमी अखरती है, खुली गोष्ठियों की। इस तरह की परंपरा डालनी चाहिए जहाँ लोगों को विमर्श-बहस का मंच मिले और जिनका उद्देश्य बिना किसी दुर्मंशा के सिर्फ और सिर्फ जुड़ना हो। भाषण मालाओं की जगह संवाद मालाएँ हों जहां पब्लिक एजेंडा पर बात हो। छोटे मंच, लघु पत्रिकाएँ मिल कर चलें। सस्ती किताबों की मुहिम भी शुरू होनी चाहिए।

हिंदी साहित्य के साथ ही जुड़ा हुआ है भारतीय अंग्रेजी साहित्य। आज के बच्चों से दस साहित्यकारों के नाम पूछे गए तो उन्होंने टैगोर और प्रेमचंद के अलावा सभी अंग्रेजी साहित्यकारों के नाम बताए। चेतन भगत, विक्रम सेठ और अरुंधति राय जैसे नामों से आगे वे नहीं जानते। अंग्रेजी अखबारों, पेज-3-टेलीविजन के नायकों और पुरस्कार-अलंकृतों को ही वे साहित्यकार के रूप में जानते हैं, जिन्होंने पॉप, कॉफीटेबल किताबें लिखी हों। इसीलिए जरूरी हो गया है अलाव पर बैठक, अनौपचारिक खुली चर्चाओं के मंच बनें।

साहित्यकारों को अपनी भगिनी कलाओं से भी संबंध रखना चाहिए। मूर्तिकार, नर्तक, चित्रकार सभी मिल कर ही वैकल्पिक समाज की रचना कर सकते हैं।

प्रश्न: क्या आज का साहित्य एक वैकल्पिक समाज का खाका बनाने में अपना योगदान कर पा रहा है?

अनामिका: साहित्य मूल्य-विस्तार का अपना काम ठीक से नहीं कर पा रहा है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि लोकप्रिय माध्यम यानी मीडिया में इसका दखल नहीं हो पा रहा है। हालाँकि उसमें भी कई स्तरों पर छोटी-छोटी कोशिशें हो रही हैं। फिल्मों में प्रतिदिन के जीवन के बिंबों में बात कही जाती है। टेलीविजन पर कोई बड़ा बदलाव घटित नहीं हुआ है हालाँकि सार्थक लेखन वहाँ भी है। अगर लोगों का सोच सिकुड़ रहा है, सपनों की सरहदें छोटी पड़ रही हैं तो इसका दोष सपनों के सौदागरों को ही जाएगा, क्योकि सपने जगाना, स्मृतियाँ जिलाना साहित्य का काम है।

Tuesday, September 1, 2009

एकनिष्ठा का सवाल, शरत और आज की स्त्री

एकनिष्ठा, अनन्यता पर स्त्री-पुरूष के सन्दर्भ मे राजकिशोर जी ने पिछले लेख मे शरतचंद्र के बहाने कुछ सवाल उठाये है, उन सवालों पर कुछ यथासंभव कच्चे-पके जबाब की तरह इस पोस्ट को देखा जाय।

"स्त्री-पुरुष संबंध का शायद ही कोई आयाम हो जिस पर इस विचार-प्रधान, पर अत्यंत पठनीय उपन्यास में कुछ न कुछ नहीं कहा गया हो। और, जो भी कहा गया है, वह इतना ठोस है कि आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है जितना 1931 में, जब यह पहली बार प्रकाशित हुआ था। हैरत होती है कि हिन्दी की स्त्रीवादी लेखिकाएँ शरत चंद्र को उद्धृत क्यों नहीं करतीं। क्या इसलिए कि वे स्त्री नहीं, पुरुष थे ?"
शरतचन्द्र की आज हमारे लिए प्रासंगिकता
ये आग्रह भारतीय समाज मे बहुत गहरे बैठा हुया है, कि शरत स्त्री मनोविज्ञान की कुंजी दे गए है और वही पर सारी उलझनों का आदि और अंत है। शायद इसीलिये राज किशोर जी भी कह गए ॥
"जैसे उत्तर भारत के समाज को समझने के लिए प्रेमचंद को बार-बार पढ़ने की जरूरत है, वैसे ही स्त्री-पुरुष संबंध के यथार्थ पर विचार करने के लिए शरत चंद्र को बार-बार पढ़ना चाहिए।"

शरत को पढा ज़रूर जाना चाहिए, पर आज के स्त्री-पुरूष सम्बन्ध बहुमुखी हो चुके है, शरत चन्द्र के समय का यथार्थ हमारा भूतकाल है, हमारा वर्तमान नही है, और हमारे भविष्य की दिशा का निर्णायक भी नही है। शरत की आज के समय मैं कितनी प्रासंगिकता है, उसके लिए एक कसौटी ये हो सकती है कि ये समझा जाय कि पिचले १०० सालो मे हमारे समाज और औरत की स्थिति मे कितना बदलाव आ चुका है। अगर ये बदलाव अभूतपूर्व है तो शरतचंद्र की दी हुयी १०० साल पुरानी कुंजी नही चल सकती है। उसका सिर्फ़ इतना काम रह गया है, कि हमारी-सामजिक /ऐतिहासिक यात्रा के एक पड़ाव की पड़ताल उससे हो सकती है। उनके समाज मे स्त्रीयों के एक बहुत छोटे तबके, संभ्रांत स्त्री को शिक्षा और बौद्धिक विलास मात्र के ही अवसर थे और ये नए अवसर थे, स्त्री चारदीवारी के भीतर पति-पिता के सरक्षण मे अक्षरज्ञान सीख रही थी, और भद्र बंगाली पुरूष के लिए एक कोतुहल भरा आकर्षण कि अरे स्त्री भी ऐसा सोच सकती है? उनकी समझ का कोई सामाजिक/आर्थिक मूल्य नही था। इसीलिये वों कटघरे मे छटपटाती आत्माए है, जिन पर लेखक और पुरूष लगातार अपने फैसले देते है। स्त्री का ये सीमित पर्यावरण ही है जो स्त्रीयों की समूची सोच और शरत बाबू के पूरे उपन्यास का आधार सिर्फ़ स्त्री पुरूष के संबंधो पर ही "एक अंधेरे बंद कमरे" मे घूमता है।
स्त्री के सारे प्रश्नों और समूची प्रतिभा और जीवन का निचोड़ सिर्फ़ अगर प्रेम संबंधो के विश्लेषण ही रह जाय तो ये सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि इस परिवेश मे स्त्री का अपना स्वायत्त अस्तित्व नही, जो भी है, वों सिर्फ़ पुरूष के इर्द-गिर्द है।

पिछले १०० साल मे आज़ादी मिल चुकी है, और स्त्री घर की चारदीवारी से बहार निकल कर सामाजिक और राजनैतिक जीवन मे ख़ुद को स्थापित कर चुकी है. स्त्री पुरूष मे बीच व्यक्तिगत प्रेम संबंधो से आगे बहुत से नए सम्बन्ध भी जुड़ गए है, मित्रवत, सहकर्मियों, प्रतिद्वंदियों, भीड़ से रोज-ब-रोज का exposure,, जो शरत के समाज मे नही थे हमारे समाज मे आज स्त्री के लिए अपार सम्भावनाये है। और शरत की नायिका के बजाय आज स्त्री के प्रश्न अनेक है। प्रेम सम्बन्ध स्त्री जीवन का केन्द्र बिन्दु न होकर एक निजी डोमेन है. इसीलिए शरत की आज हमारे लिए प्रासंगिकता सिर्फ़ एक समय काल मे स्त्री के सवालों को समझने के माध्यम भर की है वर्तमान और भविष्य का आयाम नही उनकी रचनात्मकता और उस समयकाल मे स्त्री को समझने के उनके ज़ज्बे को भी सलाम है, पर उनके आगे पूरी-तरह नतमस्तक हो कर ये स्वीकारना की स्त्री के सारे महत्वपूर्ण सवाल यही खत्म हो गए है, मेरे लिए सम्भव नही है। इसे २१वी सदी मे होने के व्यक्तिगत घमंड, या फ़िर शरत को कूडे पर फेक देने का विचार भी न माने ऐसा मेरा आग्रह है।उनकी जगह कोई स्त्री लेखिका होती तो उसका भी यही हश्र होता पुरूष लेखन से स्त्रियों का कोई बैर नही है।

"शरत आज होते तो क्या लिखते?"
सवाल ये होना चाहिए कि स्त्री के आज के सवाल क्या है?

कोई भी समकालीन लेखक-लेखिका आज स्त्री के सामाजिक संघर्षो के बारे मे, नयी चुनौती के बारे मे लिखेंगे, पुरूष सत्ता को चुनौती उनकी सिर्फ़, पौराणिक कथाओं के बूते नही बल्कि जनवादी आधार पर, सामाजिक न्याय की जमीन पर खडे होकर दी जायेगी. बाकी की दीन-दुनिया से संवाद और इसी की रोशनी मे स्त्री-पुरूष के रिश्ते का भी संवाद आज का सच है । आज शरत होते तो बहुत सम्भव है की, एकनिष्ठा के संवाद की जगह "रसोई संवाद होता" , परिवार को जनतांत्रिक बनाने का संवाद होता।

-दूसरा प्रश्न एकनिष्ठा को वों भी विधुर/विधवा के लिए एक नैतिक मूल्य की तरह मानने और मानने का या आग्रह का है
मेरी नज़र मे शादी-शुदा लोगो के लिए एक निष्ठा इस रिश्ते(सिविल contract) की इमानदारी है। पर आपकी परिभाषा ये है ....

"एकनिष्ठता कुछ अलग ही चीज है। इसका सहोदर शब्द है, अनन्यता। कोई स्त्री या पुरुष जब अपने प्रेम पात्र के साथ इतनी शिद्दत से बँध जाए कि न केवल उसके जीवन काल में, बल्कि उसके गुजर जाने के बाद भी कोई अन्य पुरुष या स्त्री उसे आकर्षित न कर सके, तो इस भाव स्थिति को अनन्यता कहा जाएगा। यही एकनिष्ठता है। आज भी इसे एक महान गुण माना जाता है और ऐसे व्यक्तियों की पूजा होती है।"

ये एकनिष्ठा का मूल्य सदियों से भारतीय स्त्री के ऊपर "नैतिकता " का पाठ पढा कर थोपा गया है, जिसकी क्रूरतम अभिव्यक्ति "सती-प्रथा" और "सती-पूजन" मे जाकर होती हैस्त्री को एक पुरूष की "सर्वाधिकार" सम्पति जीवन-पर्यंत और मृत्यु के बाद भी हमारी सामाजिक और कानूनी व्यवस्था ने बना कर रखा हैपुरूष के लिए सिर्फ़ शरत बाबू ने अपने उटोपियां ग्रस्त उपन्न्यासो चरित्रहीन के "उपेन्द्र बाबू" और शेष प्रश्न के "आशु बाबु" के लिए सृजित किया है, और इसका महिमा मंडन भी एक तरह सेउसी रोमांटिसिज्म की छाया आपके इस लेख पर भी हैजब किसी व्यहवार के साथ मूल्य और नैतिकता का आग्रह जैसे शब्द जुड़ते है, तो चाहे -अनचाहे , वृहतर समाज के लिए इसे एक मानक की तरह स्वीकृति की इच्छा छिपी रहती है

राज किशोर जी २१वी सदी मे भी इस एकनिस्ठा पर सवाल उठाने से हैरत मे है!!! और लिखते है॥

"हैरत की बात यह है कि शेष प्रश्न की नायिका कमल, जो लेखक की बौद्धिक प्रतिनिधि है, एकनिष्ठता के मूल्य को चुनौती देती है।"

किसी भी संवेदनशील इंसान के लिए, इसमे हैरत मे पड़ने की कोई वजह नही है, और इसीलिये एकनिष्ठता को प्रिय मूल्य की तरह सहेजने की भी ज़रूरत नही है. इसे एक व्यक्तिगत फैसला मानना ज़रूरी है, और ऐसे लोगो की पूजा की कोई आवश्यकता नही हैकमल या किसी और की तरह इन्हे बुड्डा या मृत मानना जरूरी नही है। विधुर, तलाकशुदा के लिए ये एक नैतिक मूल्य से ज्यादा "चोयस" का मामला ज़रूर है, क्योंकि नए रिश्ते बनाने मे बहुत ऊर्जा लगती है, समय लगता है, और इतना आसान शायद हर व्यक्ति के लिए नही होता। हो सकता है कुछ लोग अपनी इस ऊर्जा का कही और इस्तेमाल करना चाहते हो। इसीलिये कम से कम आज के दौर मे इस पर एक रोमांटिसिज्म का वैसा आवरण नही है, जैसे शरत ने अपने समय मे किया है, कि ये एक नैतिक मूल्य है।

पुनश्च: वों कौन से कारण है की ब्लॉग जगत के पुरूष लेखक इस बात का रोना रोते है, की स्त्रीया ये नही लिखती? इसका प्रतिरोध नही करती? अमुक का समर्थन नही करती? फला लेखक को कोट नही करती? क्या स्त्री को मानसिक रूप से वयस्क मानने की रिवायत नही है यह्ना? हर वक़्त कोई "अभिवाहक " चाहिए ? जो निर्देश देता रहे, की ये किया? वों हुया? और ये क्यों न हुआ का समाधान और उत्तर भी ख़ुद ही देता फिरे? स्त्रियों के उत्तर की प्रतीक्षा भी न करे?
बलात्कार का हरजाना
राजकिशोर


बलात्कार के हरजाने पर श्रीमती रीता बहुगुणा जोशी और सुश्री मायावती के बीच जो कर्कश विवाद हुआ, वह चाहे कितना ही दुर्भाग्यपूर्ण हो, पर एक वास्तविक मुद्दे को सामने लाता है। कैसे? यह स्पष्ट करने के लिए मैं एक छोटी-सी कहानी सुनाना चाहता हूं। संभव है, यह एक लतीफा ही हो, पर है बहुत मानीखेज। एक अमीर आदमी ने किसी व्यक्ति पर जूता चला दिया था। उस पर अदालत में मुकदमा चला। जज ने जूता फेंकने वाले पर सौ रुपए का जुर्माना किया। इस पर उस अमीर आदमी ने अदालत में दो सौ रुपए जमा कर दिए और शिकायतकर्ता को वहीं खड़े-खड़े एक जूता और रसीद किया। फर्ज कीजिए कि जज ने अगर उसे हफ्ते भर जेल की सजा सुनाई होती, तब भी क्या उस धनी व्यक्ति ने शिकायतकर्ता को एक और जूता लगाया होता और अदालत से प्रार्थना की होती कि अब आप मुझे दो हफ्ते की जेल दे दीजिए?

हमारे देश में बलात्कार, सामूहिक हत्या, दुर्घटना आदि के बाद सरकार द्वारा रुपया बांटने की जो नई परंपरा शुरू हुई है, वह गरीब या दुर्घटनाग्रस्त लोगों में पैसे बांट कर अपना अपराधबोध कम करने और पीड़ितों के कष्ट को कम करने का तावीज बन कर रह गया है। दिल्ली में सिखों की सामूहिक हत्या के बाद भी पीड़ित परिवारवालों के लिए कुछ सुविधाओं की घोषणा की गई थी। लेकिन इससे उनके मन की आग शांत नहीं हुई है। हर साल उनकी ओर से जुलूस-धरने का आयोजन होता है कि हमें न्याय दो। पैसा देना न्याय नहीं है। यह आंसू पोंछना भी नहीं है। यह किसी की जुबान को खामोश करने के लिए उसे चांदी के जूते से मारना है।

पैसा लेना भी न्याय नहीं है। इंडियन पीनल कोड की बहुत-सी धाराओं में लिखा हुआ है कि इस अपराध के लिए कारावास या जुर्माना या दोमों से दंडित किया जाएगा। यहां तक कि बलात्कार, हत्या करने की चेष्टा, राष्ट्रीय अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले लांछन, पूजा स्थल पर किए गए अपराध, मानहानि, अश्लील कार्य और गाने तथा ऐसे दर्जनों अपराधों के लिए भी कैद के अलावा या उसके साथ-साथ जुर्माने का भी प्रावधान है। यह कानून सन 1860 में बनाया गया था। इस पर सामंती न्याय प्रणाली की मनहूस छाया है। सामंती दौर में राजा जिससे कुपित हो जाता था, उसकी सारी संपत्ति जब्त कर लेता था, ताकि वह दर-दर का भिखारी हो जाए। ब्रिटिश भारत में और स्वतंत्र भारत में दंडित व्यक्ति से धन छीनने पर यह सामंती आग्रह बना रहा। अरे भाई, किसी ने अपराध किया है तो उसे सजा दो, उसके पैसे क्यों छीन रहे हो? राजाओं और सामंतों का पैसे के लिए लालच समझ में आता है। लूटपाट करने के लिए वे कहां से कहां पहुंच जाते थे। उपनिवेशवादियों ने भी ऐसा ही किया। पर स्वतंत्र और लोकतांत्रिक भारत अपराधी से पैसे क्यों वसूल करता है?

जुर्माना लेने के पीछे जो भावना है, वही भावना आर्थिक हरजाना देने के पीछे है। किसी कारवाले ने धक्का दे कर मुझे गिरा दिया और फिर मेरी मुट्ठी में पांच सौ रुपए रख कर चल दिया। क्या इसे ही इनसाफ कहते हैं? ज्यादा संभावना यह है कि अदालत भी कारवाले को यही सजा देगी। यह कुछ ऐसी ही बात है कि एक भाई किसी लड़की के साथ बलात्कार करे और दूसरा भाई उसकी मुट्टी में कुछ नोट रखने के लिए वहां पहुंच जाए। यह शर्म की बात है कि अनुसूचित जातियों से संबंधित एक कानून में अनेक अपराधों के लिए सरकार द्वारा पैसा देने का प्रावधान है। यह गरीबी का अपमान है। कोई भी स्वाभिमानी आदमी ऐसे रुपए को छूना भी पसंद नहीं करेगा। जो रुपया दुनिया में अधिकांश अपराधों का जन्मदाता है, उसे ही अपराध-मुक्ति का औजार कैसे बनाया जा सकता है? हरजाना देने का मुद्दा तब बनता है जब अपराध के परिणामस्वरूप पीड़ित पक्ष की कमाने की क्षमता प्रभावित हो रही है। किसी व्यक्ति की हत्या हो जाने के बाद उसकी पत्नी, बच्चों तथा अन्य प्रभावित परिवारियों को आर्थिक सुरक्षा देना न्याय व्यवस्था तथा राज्य व्यवस्था दोनों का कर्तव्य है। दूसरी ओर, बलात्कार की वेदना और उससे जुड़े कलंक का कोई हरजाना नहीं हो सकता।

पुस्तकालय में किताब देर से लौटाना, देर से दफ्तर आना, गलत जगह गाड़ी पार्क कर देना – ऐसी छोटी-मोटी गड़बड़ियों के लिए जुर्माना ठीक है। इसका लक्ष्य होता है ऐसी चीजों को निरुत्साहित करना। लेकिन जिस हरकत से किसी को या सभी को नुकसान पहुंचता है या नुकसान पहुंच सकता है, उसके लिए तो कारावास ही उचित दंड है। दिल्ली में कानून द्वारा निर्धारित स्पीड से ज्यादा तेज गाड़ी चलाने की सजा पांच सौ रुपए या ऐसा ही कुछ है। यह न्याय व्यवस्था सड़क पर चलनेवालों का अपमान है। जिस कृत्य से एक की या कइयों की जान जा सकती है, उसके लिए तो कुछ दिनों के लिए जेल की मेहमानी ही उचित पुरस्कार है। जब बलात्कार या ऐसे किसी अपराध अथवा दुर्घटना के लिए सरकार पीड़ितों में पैसा बांटती है, तो वह दरअसल अपने पर ही जुर्माना ठोंकती है। कायदे से सराकार को अपने को दंड़ित करना चाहिए यानी जिस सरकारी कर्मचारी की गफलत से ऐसा हुआ है, उसके खिलाफ मुकदमा चलाना चाहिए। यह एक मुश्किल काम है, क्योंकि हर सरकार अपने कर्मचारियों का बचाव करने की कोशिश करती है। इससे आसान है जनता के खजाने से थोड़ी रकम निकाल कर पीड़ित को दे देना। यह रकम अगर मंत्रियों और अफसरों की जेब से वसूल की जाती, तब भी कोई बात थी। 000