Saturday, October 24, 2009

"आज के नारीवादी रचनाकार देह शोषण से आगे नहीं बढ़ते"- ममता कालिया

ममता कालिया हिंदी साहत्य में जाना-माना हस्ताक्षर हैं। पिछले दिनों उनसे बेबाक बातचीत का मौका बना। वही बातचीत लगभग जस-की-तस यहां दे रही हूं।


प्र.- आजकल क्या लिखना-पढ़ना चल रहा है?

उ. मैं दो उपन्यास साथ-साथ लिख रही हूं। यह शुरू से ही मेरी आदत रही है, एक साथ दो किताबों पर काम करने की। दरअसल जब कॉलेज में रहती थी तो वहां पर एक पर काम चलता रहता था। फिर उसे घर उठा कर नहीं लाया जा सकता था। सो, घर पर क्या करूं- तो एक और कहानी-उपन्यास घर पर लिखा करती थी। (हँसकर)- आज-कल भी वही कर रही हूं। हिंदी में मेरा एक उपन्यास है ‘दौड़’, जिसका अंग्रेजी में ट्रांसक्रिएशन (ट्रांसलेशन नहीं) कर रही हूं, ‘द बिग बाज़ार’ के नाम से। साथ में एक और उपन्यास लिख रही हूं, जिसे फिलहाल ‘संस्कृति’ नाम दिया है।

प्र.- ‘संस्कृति’ के बारे में कुछ बताइए।

उ.- साहित्य और संस्कृति की आजकल ठेकेदारी हो गई है। किस लेखक को चढ़ाएं, किसे उतारें, किसे पुरस्कार दे-न दें, सब, कुछ लोग मिलकर तय कर लेते हैं। एक तरह का प्रायोजनवाद चल रहा है। साहित्य, संस्कृति और कला की दुनिया में भी बाजार ने जोर से दस्तक दी है। यह गंभीर बात है जिस पर हिंदी में ज्यादा सोचा नहीं गया है। पत्रकारों ने भले ही नोटिस किया हो लेकिन साहित्यकार ने इस पर गंभीरता से नहीं लिखा है कि कोई मठाधीश रूठ न जाए क्योंकि सभी की नजर किसी पुरस्कार, नियुक्ति, संस्तुति पर लगी रहती है। यही सब इस उपन्यास का मूल विषय है।

प्र.- हाल में जो कुछ पढ़ा हो!

उ.- ज्ञान प्रकाश विवेक का ‘आखेट’ पढ़ा। यह बहुत ही अच्छा लगा। इसके अलावा एक और किताब जिसके बारे में मैं कहते नहीं थकती- 1995 में आई बराक ओबामा की आत्मकथात्मक पुस्तक ‘द ड्रीम्स फ्रॉम माई फादर’। ओबामा को नोबेल पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई तो बहुत खुशी हुई। यह पुस्तक पढ़कर लगता है जैसे किसी गांधीवादी का लेखन है।

प्र.- नोबेल पुरस्कारों की बात निकली है तो- भारत में रबींद्रनाथ ठाकुर के बाद साहित्य के क्षेत्र में कोई नोबेल नहीं आया। क्या हमारा साहित्य उस स्तर तक नहीं पहुंच पाया या हम उसे वहां तक नहीं पहुंचा पाते?

उ.- हिंदी का लेखक बेचारा निहत्था, भोला-भाला होता है। उसे पता ही नहीं कि नोबेल के लिए पुस्तक कैसे भेजें। प्रकाशक को यह करना चाहिए, पर अपने लेखक के उत्थान में उसकी कोई रुचि नहीं है। किसी तरह 500 प्रतियां बिक जाएं बस। हिंदी की पुस्तक को विश्व परिदृष्य पर रखने के लिए प्रकाशकों ने कभी वैसी मेहनत की, जैसी लैटिन अमरीकी देशों के प्रकाशकों ने की? उन्होंने अपने यहां के साहित्य का पूरे संसार में वितरण करवाया। लेकिन हमारे यहां हिंदी में प्रकाशक यह जिम्मेदारी नहीं लेता।

प्र.- तो फिर लेखक खुद क्यों नहीं इसके लिए प्रयास करते, जैसा कि आपने कहा कि वे पुरस्कार आदि पाने के लिए करते हैं?

उ.- लेखक के पास साधन नहीं है, धन नहीं है और प्रकाशक पैसा खर्च नहीं करता। बुकर या नोबेल में किताब भेजने के लिए पैसा खर्च करना पड़ता है। इसीलिए किसी दिन पूंजिपति उधार की पुस्तक ‘लिखकर’ नोबेल के लिए भेज देंगे। एक दिन सभी पूंजिपति लेखक बन जाएं तो आश्चर्य नहीं। प्रकाशकों को नोबेल तक पहुंचने के सारे रास्ते पता हैं, पर वे कुछ करते नहीं हैं। विचार फैलाने या भारतीय प्रतिभा के मूल्यांकन की दृष्टि से नहीं, सिर्फ मुनाफे की नजर से वे लेखक और रचना को देखते हैं।

प्र.- विषयांतर करते हैं। आजकल महिलाएं जो कुछ लिख रही हैं...

उ.- मैं विषय-सीमा नहीं मानती कि महिलाएं कुछ खास विषयों पर ही लिख सकती हैं। लेकिन बाजार का दबाव है कि महिलाओं से खास तरह के लेखन/साहित्य की आशा की जाती है। वे भी घर से निकलती हैं, नौकरी करती हैं और हर तरह का काम करती हैं। बल्कि उसे स्थितियां अपने अनुकल बनाने के लिए दोहरी मेहनत करनी पड़ती है। लेकिन मेरा मानना है कि नैसर्गिक प्रतिभा के कारण स्त्री हमेशा बेहतर वर्कर होती है। महिलाओं ने अपनी चेतना से यह क्षमता विकसित की है कि हर काम को वे अपना पूरा समर्पण, निष्ठा देती हैं।

प्र.- स्त्री-विमर्श की शुरुआत अब हिंदी लेखन में भी हो गई है। वह भी एक स्वीकार्य विषय हो गया है।

उ.- मुश्किल ये है कि जो बातें स्त्री विमर्श में शामिल हो रही हैं वे कहानियों-साहित्य में नहीं आ रही हैं। दोनों गीत अलग-अलग सुरों में चल रहे हैं।

प्र.- लेकिन कई दशक पहले लिखे स्त्री-विमर्शात्मक साहित्य को तक फिर पूरा महत्व दिया जा रहा है, वे रचनाएं धूल झाड़ कर फिर छापी जा रही हैं। जैसे - 'सरला- एक विधवा की आत्मजीवनी' ।

उ. – हां, बिल्कुल। सरला- एक विधवा की आत्मजीवनी या एक अज्ञात हिंदू महिला...। तारा बाई शिंदे, पंडिता रमा बाई आदि ने बीसवीं सदी के शुरू में जो विषय उठाए थे, आज का नारी विमर्श उससे भटक गया है। उन्होंने अपने समय की विसंगतियों को लिखा। पर आज के नारीवादी रचनाकार देह शोषण से आगे नहीं बढ़ते। दूसरे किस्म का शारीरिक और मानसिक शोषण, देह शोशण से कम भयावह नहीं। पर उसे तवज्जो नहीं दी जा रही है।

प्र.-आपकी रचनाओं में भी महिला-जीवन के कई पहलू सामने आते हैं।

उ.- मेरी रचनाओं में नारी विमर्श थेगली की तरह नहीं आता बल्कि कहानी के साथ चलता है। वास्तविक स्त्री को जेहन में लाएं तो पाएंगे कि उसके जीवन में भी कभी खुशी तो कभी दुख है। वह सहज ही जीवन में इन सब क्षणों से गुजर रही है। वह हमेशा एक ही मनोभाव लेकर नहीं रहती, न ही घर में हमेशा नारीमुक्ति का झंडा उठाए रहती है। मैं मानती हूं कि जागरूक स्त्री अपने पास-परिवेश को बदलती और संस्कारित भी करती है।

Friday, October 16, 2009

लक्ष्मी जी को अब विश्राम करने दें
राजकिशोर


बहुत पहले नीरद सी. चौधरी की एक किताब – पैसेज टू इंग्लैंड - पढ़ी थी जिसमें उन्होंने इंग्लैंड की अपनी यात्रा के संस्मरण लिखे थे। उसका एक प्रसंग जब-तब मेरे जेहन को झकझोरता रहता है। चौधरी ने लिखा था कि वे जिस-जिस अंग्रेज के घर गए, उन्होंने यह खोजने की कोशिश की कि वे धन की किस देवी की पूजा करते हैं। लेकिन कहीं भी – कोने-अंतरे में भी – धन की किसी देवी की मूर्ति उन्हें दिखाई नहीं दी। नीरद बाबू आस्तिक थे या नास्तिक, यह मुझे नहीं मालूम। मुझे यकीन है कि अपनी इस खोज – या, खोज की विफलता – से वे भारतवासियों की लक्ष्मी पूजा की आलोचना करना जरूर चाह रहे थे। भारत को अध्यात्म – प्रधान देश माना जाता रहा है। आज भी बहुत-से लोग यह दावा करके प्रसन्न होते हैं। वास्तविकता यह है कि उत्तर भारत के हर घर में अन्य किसी देवी-देवता की मूर्ति रखी हो या नहीं, लक्ष्मी या लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति जरूर दिखाई पड़ जाती है। दीपावली तो लक्ष्मी पूजन का त्यौहार है ही।

उत्तर भारत के लोग बड़ी गंभीरता से लक्ष्मी पूजन करते हैं, पर अभी तक तो उत्तर भारतीयों को लक्ष्मी का प्रसाद मिला नहीं है। आर्थिक प्रगति की दौड़ में उत्तर भारत देश के बाकी हिस्सों से काफी पिछड़ गया है। इसके आसार दिखाई नहीं देते कि वह तेज रफ्तार से दौड़ कर वर्तमान गैप को पांच-दस साल में पूरा कर लेगा। उत्तर भारत के गरीब और विकल्पहीन लोग रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में जाते हैं और समय-समय पर अपमानित होते रहते हैं। ये सभी पुश्तैनी लक्ष्मी पूजक हैं। पर लक्ष्मी जी आंख उठा कर भी अपने इन उपासकों के दीन-हीन चेहरों को नहीं देखतीं। वक्त आ गया है कि समृद्धि पाने के लिए हम किसी खास देवी पर आश्रित न रहें तथा अन्य दिशाओं में सोचें।

तो क्या धन-संपत्ति की देवी लक्ष्मी की प्रामाणिकता में शक करने का समय आ गया है 9 कहीं ऐसा तो नहीं है कि वे वह नहीं हैं जो हम उन्हें समझते हैं 9 या, हमें लक्ष्मी की पूजा करना ही नहीं आता 9 यहां मैं आस्तिकता बनाम नास्तिकता का प्रश्न उठाना नहीं चाहता। लेकिन यह तो कोई भी देख सकता है कि जब स्वयं ईश्वर ही संदेह और अविश्वास के घेरे में है, तो उसके मातहत छोटे-बड़े देवी-देवताओं की क्या बिसात। अगर ईश्वर में आपकी आस्था है, तब भी आपके लिए देवी-देवताओं में यकीन करना या उनकी मूर्तियों की पूजा करना आवश्यक नहीं है। दयानंद सरस्वती, जिनका निधन दीपावली की शाम को हुआ था, परम आस्तिक थे, पर मूर्ति पूजा की व्यर्थता पर जोर देनेवालों में अग्रणी थे। इसलिए देवी लक्ष्मी को विदा करने और यह कबूल न हो तो उन्हें विश्राम देने का प्रस्ताव आस्तिकता के लोकप्रिय दायरे में भी किया जा सकता है।

यह आपत्ति विचारणीय है कि हम अपनी मूल सांस्कृतिक विशेषताओं के साथ समझौता कैसे कर सकते हैं 9 अपनी सांस्कृतिक विरासत को इतिहास की नदी में विसर्जित करने के बाद हम अपने को किस हक से भारतीय कह सकेंगे 9 पहली बात तो यह है कि देवी-देवताओं को मानना या न मानते हुए भी उनकी पूजा करना भारतीय संस्कृति का अनिवार्य अंग नहीं है। बहुत-से भारतीय, जैसे जैन और बौद्ध, देवी-देवताओं को माने बिना भी धर्म की साधना करते रहते हैं। मेरा खयाल है, आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन के समर्थकों को भी मूर्ति पूजक होने में असुविधा महसूस होती होगी। फिर दोहरी जिंदगी क्यों जिएं 9 दूसरी बात यह है कि दीपावली मुख्यतः उत्तर भारत का पर्व है। भारत के सभी अंचलों के लोग इस दिन त्यौहार नहीं मनाते, न ही लक्ष्मी पूजन करते हैं। इसलिए यह दावा करना ठीक नहीं कि लक्ष्मी पूजन का सिलसिला रुक गया, तो भारतीयता का क्या होगा 9

भारतीयता या हिन्दू धर्म की सच्ची चिंता उनके सभी प्रचलित रूपों को बनाए रखने की चिंता का पर्याय बना देने से यह संभावना ज्यादा है कि उनके जो रूप जड़ या अर्थहीन हो चुके हैं उन्हें भी ढोते रहा जाए और नए रूपों को विकसित न होने दिया जाए। संस्कृति हमारी चेतना का घर है। घर की तरह ही संस्कृति में भी नियमित रूप से झाड़ू-बुहारी होनी चाहिए। अगर जाति प्रथा या कन्या दान या दहेज या जनेऊ हिन्दू धर्म की अनिवार्य पहचान नहीं रहे, तो हम उसी तर्क से सत्यनारायण की कथा, लक्ष्मी पूजन आदि से भी मुक्त हो सकते हैं। इस समय लक्ष्मी के बजाय सरस्वती की पूजा का प्रचार-प्रसार करना आवश्यक है। सरस्वती की आराधना करने से सत्य ही नहीं, समृद्धि भी मिलेगी। हां, इन दिनों सरस्वती के नकली साधक ही समाज और बाजार पर हावी हैं। सरस्वती के असली साधकों का एक जरूरी कर्तव्य इन्हें अपदस्थ करना भी होगा। 000

शुभ दीपावली

सभी को दिवाली की शुभ कामनाएं ........

---नीलिमा गर्ग



Tuesday, October 13, 2009

उस जीवट महिला की हिम्मत और हौसलों को नमन


बीते दिनों रुखसाना की बहादुरी के किस्से सभी की जुबान पर रहे। वाकई हिम्मत की बात है। लगा कि देश से अभी लड़कियों में स्वाभिमान, वीरता जैसे गुण समाप्त नहीं हुए हैं। इस तरह के अन्य उदाहरणों की खोज में हम लगे भी रहे कि और भी कुछ मिले जिससे रुखसाना जैसी लड़कियों को और भी प्रोत्साहन मिल सके। यहाँ बुन्देलखण्ड में भी कुछ युवा लड़कियों के वीरतापूर्ण कारनामें सुनने को मिले। इनके बारे में फिलहाल बाद में।
आज इस पोस्ट के साथ एक छोटा सा वीडियो भी है जो खुद हमारी लापरवाही से पूरी तरह फिल्माया नहीं जा सका। कोई दो-तीन दिन पहले की बात होगी। फुर्सत के पलों में बैठे-बैठे टी0वी0 पर चैनल इधर-उधर कर रहे थे। इसी में सोनी चैनल पर रुक गये। इंटरटेनमेंट के लिए कुछ भी करेगा (शायद यही नाम था कार्यक्रम का) चल रहा था। एक लड़की आते दिखी जो वैसाखी से चल कर आ रही थी। मन में कौतूहल उठा कि देखें कि वैसाखी पर चलकर आती यह लड़की क्या विशेष करेगी।
दिमाग में था कि ये लड़की गाना वगैरह गायेगी। कार्यक्रम की एंकर ने बताया कि वह लड़की कराटे में ब्लैक बेल्ट है तो और भी जिज्ञासा जागी। लड़की आई, उसके लिए कुरसी मँगवाई गई, उस पर उसने बैठ कर बताया कि किसी बीमारी के कारण घुटने के ऊपर से उसका एक पैर काटना पड़ा। वह नृत्य भी कर लेती थी। पैर के कटने के बाद उसके पति ने उसे भरपूर सहयोग दिया और वह अपने नृत्य को बराबर जारी रख सकी।
और भी बहुत बताने के बाद उस लड़की ने बिना वैसाखी के, एक पैर के सहारे से नृत्य करना शुरू किया। उस लड़की की हिम्मत के आगे हम स्वयं वशीभूत होकर कार्यक्रम देखने लगे। अगले ही पल ख्याल आया कि ऐसे विशेष पलों को तो कैमरे में कैद करना चाहिए। जब तक हम कैमरा उठाते, फिल्म बनाते, तब तक बहुत सा हिस्सा निकल चुका था। इस कार्यक्रम में केवल एक मिनट मिलता है अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए। इसमें से कुछ सेकेंड निकल गये थे। जो बचे उन्हें हम फिल्मा सके वह आप भी देखिये और इस लड़की की हिम्मत की तारीफ कीजिये।
इसी तरह की लड़कियाँ आज भी देश की लड़कियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा देतीं हैं।

Friday, October 2, 2009

सलाम रुखसाना !

पूजा प्रसाद

रुखसाना ने जो किया है, वो कितना अद्भूत कारनामा है!

रुखसाना ने अपने घर में घुस आए आतंकवादियों को उन्हीं की राइफल से भून डाला है। जम्मू कश्मीर के कौसर जिले में रहने वाली रुखसाना 18 साल की है।

रुखसाना के मामले में आज फिर से एक बात साबित हो गई। मैं हमेशा यह मानती रही हूं कि जिस लड़ाई को आप अपनी आखिरी लड़ाई मान कर लड़ते हैं, उसमें आपकी जीत होती ही है। मेरा मानना है कि लड़ाई जीतने के लिए नहीं लड़ी जानी चाहिए। न ही किसी को हराने के लिए लड़ी जानी चाहिए।
लड़ाई कोई एक मूल्य (या मूल्यों का समुच्चय) 'स्थापित'करने के लिए लड़ी जानी चाहिए। रुखसाना के केस में यह मूल्य जीवन था, जिसे मौत के ऊपर स्थापित किया जाना था। किए जाने की आखिरी कोशिश करना था।

एक बात और बांटना चाहती हूं। रुखसाना के केस में भी देखा। जब आप यह मान लेते हैं कि यह आपकी आखिरी लड़ाई है और इस लड़ाई का फैसला उस फैसले से बड़ा नहीं जो आप खुद ले चुके होते हैं, तो जीत आपकी ही होती है। हर चीज आपकी होती है। यह संभवत: गुरुमंत्र हो सकता है, किसी का भी।

रुखसाना ने आपबीती में जो बताया, उसके अनुसार, जब उसने देखा कि आतंकवादी उसके माता पिता को जोर जोर से मार रहे हैं और फिर उसे भी कुछ देरसबेर में मार ही दिया जाएगा, तब वह अपने बचे खुचे जीवन की आखिरी लड़ाई लड़ने के लिए चारपाई के नीचे से निकल कर आतंकवादियों के सामने आ खड़ीहुई थी। राइफल से पहले वह दो आतंकवादियों पर कुल्हाड़ी से वार कर चुकी थी।

लेकिन यहां एक बात और। रुखसाना की कहानी से एक बार फिर यह पुष्ट हुआ है कि आप हर लड़ाई को आखिरी मान कर नहीं लड़ पाते। ऐसा लगता है यह

संभव ही नहीं। आप चुनिंदा लड़ाईयां ही आखिरी लडा़ई मान कर लड़ पाते हैं। यह और बात है कि यह चुनिंदा लड़ाईयां कौन सी होती हैं, यह हम अचानक एक

दिन/एक क्षण/एक घंटे में तय कर लेते हैं।

वैसे 'चाहिए'शब्द बड़ा ही भाषणबाजी और आदर्शवादी टाइप हो जाता है। पर हम सब अपने जीवन में दो ड्राफ्ट्स के साथ जीते हैं। पहला, हमारा अपना बनाया हुआ। दूसरा, ईश्वर/परिस्थितियों का बनाया हुआ। यह -चाहिए- शब्द नॉन-सिचुएशनल ड्रॉफ्ट का हिस्सा है। यानी, अपने बनाए गए ड्रॉफ्ट का हिस्सा है। इस ड्रॉफ्ट के लिए कुछ चाहिए- टाइप चीजें जरूरी होती हैं, ऐसा लगता है।

रुखसाना के बारे में एक बात और पढ़ी। कि, वह अब काफी इनसिक्योर है और उसे लगता है कि उसके वर्तमान ठिकाने पर पुलिस आदि की सुरक्षा देने की बजाए सरकार और सुरक्षाबलों को चाहिए कि उन लोगों को कहीं दूसरी जगह भेज दिया जाए। अभी तक तो उसकी यह बात मानी नहीं गई है। आतंकवाद जब

वीवीआईपी के सुरक्षा चक्र को भेद डालता है तो रुखसाना चंद पुलिसवालों के बीच सुरक्षित होगी, इसकी उम्मीद बहुत कम है। समय बीतने के साथ सुरक्षा घेरा

बासी रोटी सा टूट कर झड़ने लगेगा। ऐसे में रुखसाना की उनका ठिकाना शिफ्ट करने की बात मानी क्यों नहीं जा रही है? क्या हमारी सरकारें और सुरक्षाबल इसी तरह से वीरता का सम्मान करते रहेंगे, कि उन्हें काफी हद तक उनके हाल पर छोड़ दिया जाए?

सुरक्षा मुहैया करवाना यदि खानापूर्ति करने की जरूरत है तो वह किए जाने की कोई जरूरत नहीं है। रुखसानाओं को खानापूर्तियों की जरूरत नहीं है।

"Tell your heart that the fear of suffering is worse than the suffering itself."

-POOJA PRASAD

"Lilavati's Daughters: The Women Scientists of India"

इंडियन अकेडमी ऑफ़ सायंस ने सिलसिलेवार तरीके से पिछली तीन पीढीयों की महिला वैज्ञानिकों के जीवन अनुभवों पर आधारित एक संकलन तैयार किया है "Lilavati's Daughters: The Women Scientists of India".

गुजर गयी
पीढी के बारे मे कई जाने-माने वैज्ञानिकों ने लिखा है, और जो अभी सेवामुक्त और सेवा मे लगे है, उन्होंने अपने अनुभवों को समेटा है. कई तरह के सवाल जहन मे है, और कई लोगो से सीधा-तिरछा सामना भी रहा है, इन पर फ़िर कभी। फिलहाल कुछ अनुभव अतिरेक के साथ भी पढने मे रुचिकर है...