Sunday, November 29, 2009

"लोकगीत में स्त्री" विषयक राष्ट्रीय सेमीनार में नहीं दिया जा सका एक सम्बोधन - शिरीष कुमार मौर्य

नंदा राजजात का एक दृश्य


देवियो और सज्जनो !
हिंदी की राष्ट्रव्यापी गोष्ठियों से गदगद इस समय में
मैं आप सबको अभिवादन करता हूँ !

मैं कहीं चूक भी सकता हूँ इसलिए पहले ही माफ़ी की दरकार करता हूँ

चूँकि बड़े-बड़े विद्वजनों को मैंने बोलते या बोलने का अभिनय करते देखा और सुना है इसलिए जानता हूँ कि गोष्ठियों में
इस तरह की `एंटीसिपेट्री बेल´ का विशेष प्रावधान होता है

हमारे बेहद ऊबड़खाबड़ प्रदेश
और उसके इस महान कठिन परिवेश के लोकगीतों में आखिर कहाँ है स्त्री
यह खोजने हम और आप आए हैं
उत्तराखंड की
समतल
सपाट
चपटी समझ वाली राजधानी में
जहाँ शराब और भूमाफियों का राज है
राजनीति है
विधानसभा है

मैं आपसे ही पूछता हूँ इस धन्य-धन्य वातावरण में
जंगल से घास काटकर आती
थक जाती
ढलानों पर सुस्ताती
और तब अपनी बेहद गोपन आवाज़ में
लोकगीत सरीखा कुछ गाती आपकी वो प्रतिनिधि औरत
आखिर कहाँ हैं ....

मेरा यह कहना गोष्ठी के सफल संचालन में कुछ ख़लल डाल सकता है
पर कवि हूँ मैं यह कहना मेरी ज़िम्मेदारी है
गीत को छोड़िए पहले लोक को खोजिए हमारे बदहाल होते गाँवों में
बीमार उपेक्षित बूढ़ों में -
उम्र के अंतिम मोड़ पर प्रेत की तरह गाँव के ढहते घर की हिफाजत करने को
अकेली छोड़ दी गई बूढ़ी औरतों में

आपके शहर की शाहराहों पर दम तोड़ते शब्दों में कहाँ पर खड़ा है यह शब्द - लोक
बिग बाज़ार में बिकती चीज़ों में कहाँ पर पड़ा है यह शब्द - लोक

चलिए
बचे हुए लोक को
एक परिभाषा दीजिए

क्या कहेंगे आप देहरादून में रहते हुए
उसके बारे में ...
कौन बचाता है उसे जब हम-आप विमर्श कर रहे होते हैं
ऐसे ही किसी सभागार में बैठ कर

बालों में सरसों का तेल डालकर रिबन बाँध स्कूल जाती एक किशोरी बचाती है उसे
घुघुती से न बोलने की गुहार लगाती एक विरहिणी बचाती है उसे जिसका पति फौज में है और ससुराल में प्यार नहीं
धीरे-धीरे धूमिल होते, बाज़ार में बदलते कौथीग भी बचाते हैं उसे किसी हद तक
गाँव की बटिया पर बीड़ी पीते एक आवार छोकरे की किंचित प्रदूषित आत्मा भी बचाती है उसे

कोई बचाए पर हम नहीं बचाते उसे
देवियो और सज्जनो !

बुरा न मानें तो कहूँगा कि हमें तो जुगाली तक करनी नहीं आती
हम अपने भीतर के ज्ञान को भी नहीं पचा पाते

और कितना भी छुपाना चाहें छुपा नहीं पाते अपना अज्ञान

तो ज्ञान और अज्ञान की इस संधि पर मुझे माफ़ करें
देवियो और सज्जनो !
मैं अधिक कुछ बोल पाने में तो समर्थ हूँ
पर आप सबकी भावनाओं को समझ पाने में असमर्थ

इस बार जब गाँव जाऊँगा
तो आप सबको याद रखूँगा
याद रखूँगा हमारी इस असफल बौद्धिक चवर्णा और विमर्श को
हमारी विराट आयोजकीय शक्ति को याद रखूँगा

इस सबसे बढ़कर वहाँ
जब जाऊँगा जँड़दा देवी के कौथीग* में
मैं याद रखूँगा अपनी शर्म को
जो मुझे अभी `लोकगीत में स्त्री´ विषयक सेमीनार के इस पोडियम पर
खड़े होकर आयी है
और यक़ीन करें मेरे साथ सैकड़ो किलोमीटर दूर जंगल में घास काट रही
एक बूढ़ी औरत भी शर्मायी है

हालाँकि
यह किसी भी तरह की अकादमिक जानकारी नहीं है
तब भी अगर जानना चाहे कोई
तो धीरे से बता दूँ उसे
कि लोकगीतों के भीतर और बाहर वह मेरी विधवा ताई है!

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*पौड़ी गढ़वाल में एक लोकदेवी, जिनके मन्दिर पर हर साल मेला लगता है। गढ़वाली में मेले को कौथीग कहते हैं।

Friday, November 27, 2009

ईडियट की स्पेलिंग भी जानती है ?

यूँ तो जितने कमेंट्स सेंगर जी की पिछली पोस्ट पर आए और अफलातून जी की पोस्ट पर आए उन्हे पढ लेने के बाद कुछ कहने की ज़रूरत रह नही जाती। चोखेरबाली की वर्षगाँठ के अवसर पर जब मधु किश्वर ने कहा कि पुरुषों को भी साथ लीजिए इसे जनाना डब्बा मत बनाइए तो राजकिशोर जी की कही यह बात याद आती है कि - आप पुरुषों को शामिल कीजिए , पर अभी उनपर विश्वास मत कीजिए!और यह मै आपके कान मे कहना चाहता हूँ , वे सुनेंगे तो मुझे छोड़ेंगे नही , हालाँकि यही सच है।
नही जानती कि इनमे से कौन बात पूरी तरह अमल मे लानी होगी, पर ये दो बातें विरोधी नही हैं !
खैर , मै एक उदाहरण से बात शुरु करती हूँ ।
बचपन मे सहेलियों के बीच यह खूब होता था कि लड़ाई-भिड़ाई में एक दूसरे को ईडियट या शट अप कह दिया तो भुनी हुई दूसरी सहेली झट कहती थी -हुँह ! ईडियट की स्पेलिंग भी जानती है ?
गोल गोल घुमाऊंगी नही बात को। चोखेरबाली स्त्री मुक्ति की झण्डा बरदारों की राजनीतिक पार्टी नही है। जिस राजनीतिक विचरधारा पर पार्टी चलाते हो उसके पुरोधाओं की पुस्तक भी पढी है या पूंजी के दास हो केवल ?
अब तक ऐसी स्त्रीवादी पार्टी नही बनी है सो यह सवाल नही उठता है ।बार बार यह बताने की ज़रूरतनही कि देखो , मै पहली महिला जिसने फलाँ फलाँ किया उसे जानती हूँ , भीखाई जी कामा हंसा मेंहता,राजकुमारी अमृत कौर,सरोजनी नायडू,अम्मू स्वामीनाथन, दुर्गाबाई देशमुख
सुचेता कृपलानी
के बारे मे पढा है मैने या वर्जीनिया वूल्फ ,उमा चक्रवर्ती , निवेदिता मेनन को पढा है ....इससे मुझे हक है कि मै अपने मन की बात लिखूँ !
जिन नारीवादियों का आह्वान किया गया है वे इस ब्लॉग पर कहीं नही हैं और जहाँ कहीं भी वे हैं ...वहाँ भी उनसे यह पूछना नारीवाद को सरासर न समझना ही माना जाएगा।

इस प्रकार तो आप न सिर्फ़ सामयिक नारीवादी लेखिकाओं - कार्यकर्ताओं के प्रति विद्वेषपूर्ण दिखते हैं अपितु इन महान स्त्रीवादी सामाजिक परिवर्तन की पुरोधाओं के प्रति भी अपमानजनक प्रतीत होते हैं। चूंकि मौजूदा पीढ़ी में इनकी बाबत सूचना न होने के पीछे भी पुरुष सत्ता्त्मक समाज का योगदान कहा जा सकता है ।(अफलातून)

यह ठीक उसी प्रकार का आरोप है कि -

नारीवादी स्त्रियों में आपसी एकता और परस्पर एकता की भावना नहीं होती !
औरत ही औरत की दुश्मन होती है !

सारी फेमेनिस्ट औरतें तर्क विमुख होती हैं !

फेमेनिज़्म एक पश्चिमी दर्शन है ! कोकाकोला की तरह झागदार और लुभावना आयात भर है!

नारी संगठन बस नारेबाज़ी और गोष्ठियों का आयोजन भर करते हैं !गावों में इनकी कोई रुचि नहीं !

मध्यवर्गीय कामकाजी औरतें घर से बाहर कामकाज के लिए नहीं मटरगश्ती के लिए निकलती हैं !

पारिवारिक शोषण की शिकायत करने वाली स्त्रियां ऎडजस्ट करना नहीं जानती !(नीलिमा)

और यह निश्चित तौर पर कह जा सकता है कि इस तरह के आरोप पुरुषों द्वारा भयाक्रांत होकर दिए जाते हैं।ठीक वैसे ही जब बचपन मे सहेलियाँ ईडियट सुनकर भुनभुना जाती थीं और कुछ न सूझने पर कहती थीं - तुझे स्पेलिंग भी पता है ईडियट की ?

आप स्त्री-विमर्श के स्वर को मजबूत नहीं कर सकते,मत कीजिए। लेकिन उसी की जमीन पर खड़े होकर उसी के खिलाफ अनर्गल बातें करें,ये हमें बर्दाश्त नहीं। (विनीत)
.
हमें क्या, कुछ साबित करना है और क्यूँ??....सरोजनी नायडू, को हाशिये पर कहना तो उनके अपमान जैसा है....
.हम आसपास ही रोज ऐसे उदाहरण देखते हैं जो झंडा लेकर नहीं चलती पर रोज किस जद्दोजहद से अपने अस्तित्व की लड़ाई लडती हैं.उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा नहीं लिया इसलिए उनकी रोज की अग्निपरीक्षा कहीं से कमतर नहीं है.(रश्मि रविजा)

अगर कोई महिला अगर इस या उस सूची की महिलाओं को नहीं जानती तो क्या उसे अपने हक के, अपने विचारों के बारे में कहने का हक नहीं रह जाता? (आर अनुराधा)


स्त्री को अपनी बात कहने के लिए कोई इतिहास , कोई राजनीति , कोई शास्त्र जानने की ज़रूरत नही है ... वह खुद जहाँ है वहाँ जो महसूस करती है जो सोचती है जो कहती है जो लिखती है .....अपनी पीड़ा से या बहनापे या जब अपने मानवीय अधिकारों का दावा करती है , उनके लिए लड़ना चाहती है ,उन्हे छीनना चाहती है, पाना चाहती है उसके लिए कतई ज़रूरी नही कि आप उसे स्त्रीवादी मानें , स्त्रीवादी होने के लिए किसी विशेष योग्यता का प्रमाण पत्र भी माँगें !इससे यह भी सामने आता है कि स्त्री विमर्श को देखने का स्वस्थ नज़रिया ही अभी विकसित नही हो पाया है । और जब तक स्त्री विमर्श के लिए वैकल्पिक सौन्दर्य शास्त्र , बोध विकसित नही होगा तब तक ऐसी परीक्षाएँ रोज़ होंगी , प्रमाण पत्र माँगे जायेंगे ......और हम जानते हैं कि बदलाव के दौर मे हृदय परिवर्तन नही होते बल्कि चक्रवात आते हैं ।जो साथ नही बहते वे उखड़ते हैं !

Thursday, November 26, 2009

महिलाओं के सम्मान या गरिमा को कम करना उद्देश्य नहीं पर इन्हें भी तो जानिये

स्त्री-विमर्श से जुड़ी हुई एक पुस्तक पढ़ी थी जिसमें समूची पुस्तक को दो भागों में बाँटा गया था। उसमें से एक शीर्षक को नाम दिया गया था ‘हंगामा है क्यों बरपा थोड़ा सा जो जी लेते हैं।’ कुछ इसी तरह की बात हुई हमारी पिछली पोस्ट पर भारतीय स्वाधीनता से सम्बंधित कुछ महिलाओं के नामों के बारे में चर्चा कर ली तो हंगामा सा मच गया।

पोस्ट बाहियात है; आगे से ऐसी पोस्ट का सामूहिक बहिष्कार हो; ऐसे विचारों के लिए अलग से ब्लाग बनाने तक का सुझाव दिया गया; अलग से पोस्ट तक लिख डाली गई, क्या वाकई इतनी हंगामी पोस्ट थी? एक साहब ने तो अपनी पोस्ट के द्वारा हमारी नीयत पर सवाल उठा दिये।

यह बात एकदम सही है कि यह ब्लाग सामुदायिक ब्लाग है और सार्थक चर्चा करता है। हम भी इसी कारण से यहाँ आये थे। रही बात अपनी पोस्ट पर किसी तरह की माफी माँगने की तो किसी तरह की गलत बात नहीं कही है और न ही महिला को अपमानित किया है। इस दृष्टि से माफी माँगने का सवाल ही नहीं, हाँ यदि ब्लाग के सूत्रधार कहें तो अपने आपको बापस कर सकते हैं या फिर वो चाहें तो हमारी सहभागिता को समाप्त कर दें। हमें किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं।

रही बात हमारी समझ को लेकर तो एक बात स्पष्ट कर दें कि जो व्यक्ति नारी का सम्मान नहीं कर सकता उसे अपने मनुष्य कहलाने के बारे में सोचना होगा। महिलाओं की प्रशंसा में कुछ कह देना ही यदि स्त्री का सम्मान है तो हम उसे गलत मानते हैं। सम्मान, स्नेह दिल से उपजता है, प्रशंसा में दो-चार कविताएँ, कहानियाँ, आलेख लिख देने से नहीं।

जहाँ तक इस पोस्ट को यहाँ लगाने का हमारा मन्तव्य था तो बस इतना कि आज स्त्री-विमर्श को लेकर जिस तरह से पुरुष-विरोध का वातावरण निर्मित है, जिस तरह से एक सशक्त आन्दोलन कुछ उच्च वर्ग की महिलाओं के हाथों में सिमटकर रह गया है, उसको यह बताना था कि हमारे देश में ऐसी भी महिलाएँ हुईं हैं जिन्होंने महिलाओं की दशा को सुधारने का कार्य किया और आज उन्हें कितने लोग जानते हैं?

जहाँ तक बात है कि संघर्ष सभी के लिए चल रहा है तो क्या इस बात का कोई जवाब देगा (क्षमा करिएगा, सवाल नहीं पूछना है) जवाब नहीं, अपने मन में झाँक कर देखिए और अपने से पूछिए कि बाँदा की सम्पतपाल को जब नक्सली होने का आरोप लगाकर सताया जाने लगा तो कितनी नारीवादी समर्थक महिलाओं ने उसका साथ दिया?

किसी के ऊपर आरोप लगाना, बिना कुछ सोचे-समझे तोहमत लगा देना, बात की गम्भीरता को समझे बिना अपना निर्णय थोप देना आसान है। पोस्ट की मंशा को समझें या न समझें पर हमारी इस मंशा को समझें कि हमारा उद्देश्य नारी की महत्ता को कम करना नहीं था और न ही किसी महिला को अपमानित करने का।

रही बात आगे के लिए तो हमारा हमेशा से प्रयास रहा है कि सार्थक बहस हो। आज इतने सशक्त आन्दोलन के बाद भी, घर से बाहर निकलने की छूट के बाद भी, शिक्षा के समस्त साधन उपलब्ध होने के बाद भी लड़कियाँ पढ़ क्यों नहीं पा रहीं हैं? और एक वह समय था जब शिक्षा के साधन दुर्लभ थे और महिलाओं को घर से बाहर झाँकने भी नहीं दिया जाता था, ऐसे समय में भी महिलाएँ स्नातक स्तर की शिक्षा ग्रहण कर रहीं थीं। क्या बतायेगा कोई भी पहली महिला स्नातक का नाम? (फिर सवाल, फिर परीक्षा)

बहरहाल टिप्पणियों को देखकर अपने मन्तव्य को स्पष्ट करना जरूरी लगा। आगे ब्लाग सूत्रधार की मर्जी।

Monday, November 23, 2009

इन महिलाओं को भी जानतीं हैं नारीवादी महिलायें?


स्त्री-चेतना के विकास के लिए आज स्त्री-विमर्श को प्रमुख माना जा रहा है। स्त्री-विमर्श क्या है और भारतीय संदर्भों में इसकी क्या उपयोगिता, क्या आवश्यकता है इसे समझने की आवश्यकता है। स्त्री-विमर्श को संदर्भित रूप में देखा जाये तो यह पश्चिम से आयातित शब्द है जिसने वहाँ की महिलाओं को स्वतन्त्रता प्रदान की। पश्चिम में एक समय वह भी आया जबकि स्त्री-विमर्श से जुड़े कई लोगों ने अपने आपको नारीवादी आन्दोलन से बापस कर लिया।
भारतीय संदर्भों में जब भी स्त्री-विमर्श की चर्चा की जाती है तो वह तुलसीदास से शुरू होकर आज की किसी प्रमुख हस्ती के साथ समाप्त हो जाती है। जो नारीवादी स्त्रियाँ अपने आपको स्त्री-विमर्श का पुरोधा मानतीं हैं वे बात-बात पर महिलाओं को रोके जाने के उदाहरण दिया करतीं हैं।
यहाँ यह बताना ज्यादा दिलचस्प होगा कि यदि कोई महिला विकास नहीं कर पाती है तो उसके पीछे पुरुष की भेदभाव भरी नीति काम करती है और यदि किसी महिला ने विकास कर लिया तो यह उसकी अपनी प्रेरणा, अपनी चेतना, अपना संघर्ष कहा जायेगा। कुछ भी हो महिलाओं ने हमारे देश में प्राचीन काल से ही सम्मानजनक दर्जा पाया है, उनके काम भी अविस्मरणीय रहे हैं।
आज की पोस्ट के द्वारा हम कुछ नाम आपके सामने रख रहे है, कृपया बतायें कि ये कौन हैं? इनका नाम किस क्षेत्र में उल्लेखनीय है? कहीं ऐसा तो नहीं कि पुरुष मानसिकता के कारण ये हमेशा हाशिये पर रहीं और स्वयं महिलाओं ने भी इनके बारे में जानने का प्रयास नहीं किया?
आग्रह विशेष रूप से स्त्री-विमर्श की पुरोधा महिलाओं से, जो बात-बात पर झंडा लेकर पुरुष समाज के विरुद्ध निकल पड़तीं हैं कि कहीं इन महिलाओं को आप लोगों ने भी तो विस्मृत नहीं कर दिया है?
इन महिलाओं के नाम इस प्रकार हैं--

1) हंसा मेंहता
2) राजकुमारी अमृत कौर
3) सरोजनी नायडू
4) अम्मू स्वामीनाथन
5) दुर्गाबाई देशमुख
6) सुचेता कृपलानी
7) रेणुका रे
8) लीला रे
9) पूर्णिमा बैनर्जी
10) कमला चैधरी
11) मालती चैधरी
12) दक्षयानी वेलायुदान

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आपकी सुविधा के लिए बता दें कि ये नाम स्वतन्त्रता के समय के हैं। हो सकता है कि आधुनिक ललनाओं ने इनके नाम भी न सुन रखे हों? आखिर उनकी आदर्श महिलाओं में ये नाम नहीं फिल्मी ग्लैमर गल्र्स के नाम होंगे?
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चलिए खोजिए इनका योगदान, हम तो 25 तारीख को बता ही देंगे।