Monday, December 28, 2009

गलती कोई भी करे तुम माफी मांग लेना और सब ठीक हो जायेगा

प्रतिभा कटियार

बचपन में देखी गई फिल्मों में से मुझे कुछ ही याद हैं. उनमें से एक फिल्म मासूम भी है. मासूम फिल्म बचपन में देखे गये के हिसाब से तो लकड़ी की काठी के लिए याद होनी चाहिए लेकिन जाने क्यों जेहन में शबाना आजमी की वो तस्वीर चस्पा है जब उसे नसीर की जिंदगी की दूसरी औरत के बारे में पता चलता है. वो शबाना की खामोशी...और दु:खी, गुस्से में भरी, तड़पती ढेरों सवाल लिए खड़ी आंखें...उन आंखों में ऐसी मार थी कि उन्हें याद करके अब तक रोएं खड़े हो जाते हैं. खैर, फिल्म सबने देखी होगी और यह भी कि नसीर किस तरह माफी मांगता है शबाना से, किस तरह शर्मिंदा है अपने किए पर और शबाना उसे लगभग माफ कर ही देती है.

इसके बाद कई सारी फिल्मों में पुरुषों की गलतियां और उनके माफी मांगने के किस्से सामने आते रहे. समय के साथ स्त्रियों के उन्हें माफ करने या न करने के या कितना माफ करना है आदि के बारे में राय बदलती रही. वैसे कई फिल्मों में बल्कि ज्यादातर में पुरुष अपनी गलतियों के लिए माफी नहीं भी मांगते हैं बल्कि अपनी गलतियों को कुछ इस तरह जस्टीफाई करते हैं कि उसकी गल्ती के लिए औरत ही जिम्मेदार है, लेकिन आज बात माफी मांगने वाले पुरुषों की ही.

इसी माफी मांगने वाले फिल्मी पुरुषों की कड़ी में पिछले दिनों फिल्म 'पा' का एक पुरुष भी शामिल हो गया. पुरुष यानी फिल्म का नायक अमोल अत्रे. अमोल और विद्या का प्रेम संबंध बिना किसी फॉमर्ल कमिटमेंट के एक बच्चे की परिणिति का कारण बनता है. अमोल बच्चा नहीं चाहता, इन फैक्ट शादी भी नहीं करना चाहता. देश की सेवा करना चाहता है. करता भी है. उसे पता भी नहीं है कि उसका कोई बच्चा है, वह इस इंप्रेशन में है कि उसका बच्चा विद्या ने अबॉर्ट कर दिया है. लेकिन तेरह साल बाद जब ऑरो के रूप में उसे अपनी संतान का पता चलता है तो अमोल (अभिषेक) तुरंत अपनी पिछली से पिछली गलती को समझ जाता है. उसे एक्सेप्ट कर लेता है और पूरे देश के सामने एक रियलिटी शो में विद्या से माफी मांगता है और बच्चे को अपनाता भी है. अमोल एमपी है, उसका शानदार पॉलिटिकल करियर है. फिर भी वह माफी मांगता है इन चीजों की परवाह किये बगैर. विद्या का गुस्सा इस सबसे शांत नहीं होता. वह उसे माफ भी नहीं करती. वह अमोल के गले की हिचकी नहीं बनना चाहती.

कहां गए माफी मांगने वाले पुरुष

मेरे दिमाग में इस दौरान एक बात घूमती रही कि असल जिंदगी में इस तरह से माफी मांगने वाले पुरुष कहां गायब हैं. हां, गलतियां करने वाले पुरुषों की संख्या लगातार बढ़ रही है. लेकिन जैसे-जैसे वे समझदार हो रहे हैं, उनकी तार्किक शक्ति बढ़ रही है. अपनी चीजों को जस्टीफाई करने के तर्क भी. यथार्थ में माफी मांगने वाले पुरुष नदारद हैं. रिश्तों में माफी का बड़ा महत्व होता है. कोई भी माफी मांगने से छोटा नहीं होता. यह गुरुमंत्र जब मांएं अपनी बेटियों को दे रही होती हैं, तब उन्हें नहीं पता होता कि इसकी ध्वनि कुछ इस तरह जा रही है कि गलती कोई भी करे तुम माफी मांग लेना और सब ठीक हो जायेगा. ऐसा होता भी रहा है. इसी मंत्र ने परिवारों की बुनियाद को मजबूत बनाये रखा. दूसरों की गलतियों का इल्जाम अपने सर लेकर, खुद ही माफी मांगने के बावजूद, पिटने के बावजूद रिश्ता बचाने की जद्दोजेहद में औरतों ने अपने वजूद से ही लगभग किनारा कर लिया है. आत्म सम्मान वाली औरतें पुरुषों को लुभाती हैं, लेकिन वे घर की औरतें नहीं होतीं.

आखिर क्यों है ऐसा? दुनिया बदल रही है. समझदारियां भी बढ़ रही हैं. रिश्तों में स्पेस, डेमोक्रेसी जैसे शब्दों ने भी अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है. लेकिन यहीं कुछ गड़बड़ा रहा है. वो माफियां जो पुरुषों की जानिब से आनी थीं, उनका स्पेस खाली पड़ा है. स्त्रियों को उनका स्पेस मिले न मिले लेकिन माफियों का वो स्पेस रिश्तों के दरमियान लगातार बढ़ रहा है. जीवन फिल्म नहीं होता. जीवन में पुरुषों के पास माफी से बड़ा अहंकार होता है. जिसे पालने-पोसने में ही वे पुरुषत्व मानते हैं. जहां समझदारियां थोड़ी ज्यादा व्यापक हैं वहां माफियां आ तो जाती हैं लेकिन कुछ इस रूप में कि वे भी किसी सजा से कम नहीं होतीं. क्या इतना मुश्किल होता है पुरुषों का माफी मांगना. रिश्तों को संभाल लेने की सारी जिम्मेदारी स्त्रियों के मत्थे मढ़कर कब तक परिवारों के सुरक्षित रहने की खैर मनायी जा सकती है.


Friday, December 25, 2009

उत्सव बना झमेला

खुशी अफसोस में बदल गई

मेरे छोटे भाई की शादी तय हो गई थी। 12 फरवरी को शादी और 14 को रिसेप्सन ओ भी बिना लड़की देखे। कि शादी ही तो करनी है। लड़की से करनी है देखना क्या । मुख्य आधार था लड़की का एक सुघड़ भाभी से तुलना। मेरे भाई ने कहा जब लड़की उन भाभी की तरह है तो मैं कर लूँगा। लड़की एमएससी कर के रिसर्च कर रही है और हायर स्टडी के लिए अमेरिका जा रही है। लड़की फरवरी में अमेरिका जा रही है। दोनों की आपस में बात भी शुरू हो गई थी। जिसमें मेरे भाई ने कहा कि तुम अपना केरियर देखो। फिर भी माँ ने कहा कि तुम लड़की एक बार देख लो। शादी के पहले। शायद माँ के मन ने कुछ भाप लिया था। लड़की अपने भाई और पिता के साथ नोयडा आई और मेरा भाई हैदराबाद से आया अपनी भावी पत्नी को देखने।

मुझे छोड़ कर सभी थे। लेकिन जब मेरे भाई ने लड़की को देखा तो जिन भाभी से उस लड़की की तुलना की गई थी वो उसमें दूर-दूर तक नहीं दिखीं। इतना ही नहीं लड़की के कपड़े अस्त-व्यस्त थे साफ नहीं थे। नए नहीं थे। कुछ भी ऐसा नहीं लग रहा था कि वे लोग लड़की को दिखाने आए हैं। यही नहीं लड़की समेत वे सारे लोग बड़े रिजिड और अड़ियल दिखे। भाई फिर खूब उत्साहित था। सज-धज कर तैयार था आखिर उस लड़की से मिलने जा रहा था जो उसके सपनों से जुड़ रही थी।

मिल कर वह बात-व्यवहार और रंग-ढंग से कपड़े-लत्ते से दुखी हुआ। फिर भी भैया के कहने पर वह शादी के लिए मान गया। कि लड़की को देख कर मना नहीं करते। बात सही दिशा में थोड़ी देर चली तो मामला वेन्यू पर आ कर फिर अटक गया। भाई चाहता था कि शादी इलाहाबाद से हो। लेकिन वे लोग लखनऊ से शादी करने पर अड़े रहे। फिर भी मेरे बड़े भाई ने कहा कि सोच लीजिए अगर इलाहाबाद से हो तो अच्छा रहेगा। हम फिर बात कर लेंगे। अगले दिन लड़की के भाई का फोन आया कि शादी लखनऊ से ही होगी और रिसेप्सन भी यहीं से होगा। उनका यह रवैया भाई को ठीक न लगा। हमारी ओर से इलाहाबाद में शादी करने के अलावा और कोई माँग न थी। इस पर वे लोग असहज रूप से पेश आ रहे थे। जिस बात को बड़ी प्यार से मनवाया जा सकता था उस पर वे लोग कुछ ढ़ीठ की तरह डट गए।

और इस के बाद भाई ने शादी से इनकार कर दिया। माँ अभी भी यह चाहती है कि यही शादी हो जाए। उधर से लड़की मेरे भाई को फोन करने लगी। पूरे प्रकरण से परेशान भाई में पहले तो फोन लेने की हिम्मत न रही। फिर उसने बात किया तो लड़की ने पूछा कि क्या गलती हुई। मेरे भाई ने कहा कि मेरी और आपकी शादी लगता है नहीं लिखी है। आपको और अच्छे जीवन साथी मिलेंगे। यह मेरी दुआ है।

अपने इस निर्णय से भाई और मेरा पूरा घर दुखी है। ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी लड़की को देखने के बाद किसी और कारण से शादी से न करना पड़ा है। हम यह सोच कर परेशान हैं कि आखिर लड़की वालों को कैसा लग रहा होगा।

बाद में सोचने समझने पर समझ में आया कि बिचौलिए हड़बड़ी में थे। उन्होंने दोनों तरफ के लोगों को भरम में रखा। जिसका परिणाम यह निकला कि एक लड़की और एक लड़का बे वजह परेशान हो रहे हैं। दोनों अनायास ही एक दूसरे की नजर से गिर गए हैं। वे लोग अभी भी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि शादी क्यों टूटी। और इधर सो कोई उन्हें साफ-साफ यह नहीं कह पा रहा कि उनके अड़ियल बर्ताव से मामला बिगड़ रहा है। जब मैंने भाई से कहा कि तुम्हें लखनऊ बारात लेकर चलने में क्या दिक्कत है। तो वह बोला कि दिक्कत कुछ भी नहीं। बस उनके बोल बचन अच्छे नहीं लगे।

भाई की दुविधा यह है कि जो लड़की फोटो में बहुत अच्छी दिख रही थी वह सामने से इतनी उलट क्यों है। जो ल़ड़की फोन पर इतनी सहज और मीठी थी वह सामने से इतनी उलझी और कठोर क्यों थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि उनके यहाँ कोई आपसी संकट रहा हो। जिसके कारण लड़की को कोई उलझन रही हो। जो भी रहा हो। खामखा का एक संभावित उत्सव झमेले में बदल गया। 12 और 14 फरवरी 2010 मेरे भाई और उस लड़की के लिए एक मनहूस तारीख की तरह दर्ज हो गए हैं। बिचौलिए पति-पत्नी वहीं आपस में भिड़ गए कि मैंने कहा था तैने कहा था। लेकिन अभी इससे क्या। दोनों पक्षों की फजीहत हो रही है।

Wednesday, December 23, 2009

महिला सशक्तिकरण

२२/१२/०९ को उमा संस्था द्वारा महिला सशक्तिकरण पर भाषण प्रतियोगिता आयोजित कि गई अनेक स्कूलों कि छात्राओं ने बढ़कर हिस्सा लिया और अपने विचार प्रस्तुत किये महिलाओं कि जमीनी हकीकत पर भी विचार किया गया .......

Tuesday, December 22, 2009

छात्रावास की सीमा लांघती लड़कियां

कुछ समय (साल कहें) पहले ‘आजकल’ पत्रिका में एक कविता पढ़ी थी, जिसका सार यह था कि छात्रावास की लड़कियों के लिए ऊंची मजबूत दीवारें उठा दो वरना किसी असभ्य राहगीर के मन में चलते-चलते मूत्र-त्याग त्याग की इच्छा जागेगी। अजीब लगता है यह विचार लेकिन था। उसके जवाब में मुझे जो सूझा, लगभग पंक्ति-दर-पंक्ति, वह बहुत दिनों तक कॉपी के एक पन्ने के साथ नत्थी होकर यहां-वहां भटकता रहा था, कभी मिलता, कभी लापता होता। अब मिला है तो सोचा इधर लगा दूं। यह ब्लॉग कोई साहित्य का संग्राहक होने का दावा तो नहीं करता इसलिए उससे कुछ कमतर माल भी खप ही जाएगा। वैसे भी यहां शिल्प से ज्यादा विचार महत्वपूर्ण है। फिर भी अगर पसंद न आए तो लताड़/आलोचना सुनने के लिए प्रस्तुत हूं ही।– अनुराधा

ढहा दो वो दीवारें जो

रोकती हैं बाहर की हवा को

पकी ईंटों की वो कठोर दीवारें

जिन्हें भेदकर अंदर नहीं जा सकती

ठंडी और गुदगुदी हवा

जब लड़कियां आती हैं, सहेलियों से साथ ढहा देने पुरानी दीवारों को

न रोके उन्हें कोई

दीवारों को तोड़ने दो तब तक

जब तक सड़क इतनी आम न हो जाए

टूटी दीवारों का सिलसिला इतना आम न हो जाए

कि हर असभ्य राहगीर अघा जाए

उनसे, और चलते-चलते मूत्र-त्याग की उसकी

इच्छा ही मर जाए

Thursday, December 17, 2009

अब निडर हूं

पिछले एक साल से लगातार संघर्ष चलता रहा । मां ने आैर मैंने कहां कहां धक्के नहीं खाये ।बहुत ने हौसला बढा़या, यहां जिन साथियों ने हिम्मत दी उससे भी बल मिला । बीच में कुछ से सुनना कि यह कलयुग है, इंसाफ की उम्मीद न करो, कभी निराश भी करता था। लेकिन मुझे तो यह भी लगातार लगता रहा कि हर सुबह मेरे लिए नई उम्मीद व सहारा लिए आ रही है । बस लगी रही । अपने को नए रूप में खडे़ करने की कोशिश भी साथ ही शुरू कर दी । नए पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स में दाखिला लिया ।आज तो महसूस होता है, साथ देने वाले, आगे बढ़ाने वाले निराशा करने वालों से कहीं ज्यादा थे । तभी अपनी कहानी का सुखांत, आज लिख पा रही हूं । ससुराल वालों से न्याय ने मुझे मुक्ति दिला ही दी । अब उम्मीद है । छह महीने बाद कोर्स पूरा कर मैं बढि़या रोज़गार भी पा ही लूंगी । एक सम्मानित महिला की तरह बाकी जीवन जी सकूंगी ।

'अब डर कैसा' की पहली कड़ी इस लिंक पर और दूसरी कड़ी इस लिंक पर देखें।

एक पुरातन आखेट-कथा

(नए वक्त की एक घटना को याद करते)

तुम्हारे नीचे पूरी धरती बिछी थी
जिसे तुमने रौंदा
वह सिर्फ़ स्त्री नहीं थी
एक समूचा संसार था फूलों और तितलियों से भरा
रिश्तों और संभावनाओं से सजा

जो घुट गयी तुम्हारे हाथों तले
सिर्फ़ एक चीख़ नहीं थी
आर्तनाद था
समूची सृष्टि का

हर बार जो उघड़ा परत दर परत
सिर्फ शरीर नहीं था
इतिहास था
शरीर मात्र का

जिसे तुमने छोड़ा
जाते हुए वापस अपने अभियान से
ज़मीन पर
घास के खुले हुए गट्ठर -सा
उसकी जु़बान पर तुम्हारे थूक का नहीं
उससे उफनती घृणा का स्वाद था

वही स्वाद है
अब मेरी भी ज़ुबान पर !

(ये एक पुरानी कविता है - ९६ के ज़माने की !)

Wednesday, December 16, 2009

एक बेटे की चाहत में उन्नीस बेटियों का जन्म


घटना उत्तर प्रदेश के महोबा की है। यह घटना 8 दिसम्बर 2009 के अमर उजाला में पढ़ने को मिली। समाचार था कि उन्नीस बेटियों के बाद बेटे की मुराद पूरी हुई। समझ नहीं आया कि ऐसे समाचार पर रोया जाये या कि खुश हुआ जाये?
रोना इस कारण से कि

  • आदमी एक बेटे की चाहत में बेटियों को पैदा करते-करते जनसंख्या में वृद्धि करता जाता है।
  • आदमी बेटियों को अभी भी बेटों से कम करके आँक रहा है।
  • एक बेटे के लिए उन्नीस बेटियों का जन्म और एक स्त्री के शरीर पर एक प्रकार का अत्याचार।

खुश होने का मन इस कारण कर रहा था कि

  • कुछ स्त्रोतों से ज्ञात हुआ कि उस व्यक्ति ने किसी भी बच्चे के गर्भ में आने पर उल्ट्रासाउंड करवा कर लिंग का पता नहीं किया।
  • किसी भी कन्या भ्रूण की हत्या करने का प्रयास नहीं किया।
  • किसी भी बेटी को मारने का प्रयास नहीं किया।

समाचार के अनुसार पनवाड़ी के ग्राम स्योड़ी के चतुर्भुज अहिरवार का विवाह 1985 में लालकुँवर के साथ हुआ था। शादी के दो वर्ष बाद से लेकर अभी तक उसने कुल 20 बच्चों को जन्म दिया। पहली उन्नीस बेटियों में से आठ की मृत्यु हो चुकी है।
बच्चियों के भरण-पोषण के लिए चतुर्भुज ने गाँव छोड़ कर दिल्ली में ढेरा जमा लिया था और वहीं से प्रतिमाह बच्चियों की परवरिश के लिए पैसे भेजता रहता था।
बड़ी बेटी का किसी तरह विवाह करने के बाद भी बेटे की चाहत कम नहीं हुई। परिणामतः बीसवें बच्चे के रूप में उन्हें बेटा प्राप्त हुआ।
सामुदायिक केन्द्र में बेटे के जन्म देने के बाद लालकुँवर को जननी सुरक्षा योजना के अन्तर्गत 1400 रुपये का चेक भी दिया गया।
इस पोस्ट का उद्देश्य समाचार देना नहीं वरन् यह है कि ऐसी घटनाओं पर क्या किया जाये?
खुश हुआ जाये कि किसी भी रूप में इन दम्पत्ति ने कन्याओं की हत्या नहीं की या फिर दुःखी हुआ जाये कि विकास की राह पर चलने के बाद भी बेटे की चाहत बिलकुल कम नहीं हुई है?
कुछ भी हो यह तो स्पष्ट है कि उन्नीस में से शेष बची ग्यारह बेटियों के सामने अभाव तो रहता ही होगा और अपनी शारीरिक विकास की राह में अवरोध तो पाती ही होंगी। शिक्षा, भोजन, वस्त्र, चिकित्सा आदि का संकट तो रहता ही होगा। इन सबसे बचने का उपाय क्या होगा? यही दुःख होने की बात है।

Tuesday, December 15, 2009

क्या करेगी औरत

अब क्या करेगी औरत?
साठ वर्ष की उम्र में
आदेश मिला है उसे
निकल जाने का घर से।
नहीं, वो यह नहीं कह सकती
कि, क्यों निकले वो?
घर तो उसका भी है!
वह जानती है
इस वाक्य के खोखले पन को।
घबरा कर
उसकी दहाड़ती आवाज से
निकल गई है
दरवाजे से बाहर।
खड़ी है अंधेरे को घूरती।
कहाँ जाय ?
उम्र ख़त्म हो चुकी नौकरी की,
थक चुके हैं
हाथ - पांव,
मजदूरी भी नहीं कर सकेगी।
शिथिल पड़ चुकी है देह,
अब इस योग्य भी नहीं रह गई
कि कर सके वेश्यावृति भी।
एक बार फाटो माँ धरती,
समाने को खड़ी है
एक और सीता
तुम्हारे अन्दर!
लेकिन उसे पता है
नहीं होना है ऐसा।
उसे लौटना होगा
इन्हीं चार दीवारों
और छत के अन्दर ,
जिसे समाज कहता है
उसका घर।
प्रतीक्षा में बैठी है
शायद खोल कर किवाड़
वही कह दे
अन्दर आने के लिए।
रह जाए उसका
थोड़ा सम्मान।
हांलाकि वह जानती है
यह सिर्फ़ एक दुराशा है।
उसे तो बतानी है उसे
उसकी ओउकात।
तो क्या वह ख़ुद ही
खटखटा ले
बंद दरवाजे को?
हिम्मत नहीं जुटा पा रही है।
क्या होगा
अगर उसने नहीं खोला तब?
फैलने लगा है
सुबह का उजाला।
थोड़ी ही देर में
खुलने लगेंगे
पड़ोसियों के दरवाजे।
बचा ले उनकी निगाह में
अपनी इज्जत!
पलट गई वह।
उढ़का हुआ है दरवाजा
बंद नहीं किया गया था।
उसे भी पता था
लौट आयेगी वह।
वह भी जानती है
उसे भी कहाँ मिलेगी
तन के कपडे और
पेट के खाने पर
दिन-रात खटने वाली
ऐसी विश्वस्त परिचारिका?
घसीटती हुई पैरों को
बचाती हुई हर आहट
चली आई है रसोई में।
चुक गई सारी ताकत,
बिखर गई फर्श पर।
बह चले आखों से
अपमान और हताशा!
ठूंस कर मुंह में आँचल,
बेध रही है अपना ही कलेजा
अपनी चीखों से।
हे भगवान,
कितनी जरुरत है
ख़ुद के कमाए हुए
पैसों की!

Sunday, December 13, 2009

‘पा’ की औरतें और जमाने की हिचकियां

यह लेख आज,13 दिसंबर 2009 के राष्ट्रीय सहारा के संपादकीय पृष्ठ पर छपा है। वहां भी पढ़ा जा सकता है।

‘पा’ एक असामान्य फिल्म है। इसका अलग होना सिर्फ इस मायने में नहीं है कि इसमें एक अजीब सी बीमारी प्रोजेरिया के शिकार एक बच्चे को दिखाया गया है जो १२ साल की उम्र में साठ साल का या उससे भी बड़ा दिखता है और उसके शरीर के बढ़ने की रफ्तार जानलेवा होने की हद तक तेज है। अमिताभ बच्चन के नए अवतार ऑरो की भी काफी चर्चा है। लेकिन ‘पा’ की चर्चा इसके अलावा भी कुछ और कारणों से होनी चाहिए। दरअसल ये फिल्म परंपरा की कुछ पुरानी जकड़नों को बेहद निर्ममता के साथ ध्वस्त करती है। ‘पा’ फिल्म मजबूत महिला किरदारों की वजह से भी याद रखी जानी चाहिए। ये बाप-बेटे की नहीं मां-बेटे की कहानी है जिसमें पापा साइड रोल में है।


‘पा’ फिल्म की लीड करेक्टर विद्या कोई सामान्य लड़की नहीं है। विद्या की मां अरुधति नाग, जिसे ऑरो दादी की जगह मस्ती में 'बम' कहता है, भी सामान्य मां नहीं है। विद्या का जब अमोल (अभिषेक बच्चन) से शारीरिक संबंध बनता है तो वो जानती है कि इसका क्या नतीजा हो सकता है। आखिर वो मेडिकल की स्टूडेंट है। अमोल उसे अबॉर्शन यानी गर्भपात कराने की सलाह देता है। ये एक स्वार्थी-कैरयरिस्ट पुरुष की बेहद स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।

इस मोड़ पर विद्या और उसकी मां आम भारतीय परंपरागत लड़की और मां से अलग नजर आती है। परंपरा के बोझ से आजाद, विदेशी यूनिवर्सिटी में पढ़ रही विद्या अपना फैसला खुद लेने का साहस दिखाती है और बच्चा पैदा करने या ना करने के बारे में फैसला लेने की प्रक्रिया से पिता अमोल को अलग कर देती है। विद्या की मां भी आम भारतीय माताओं की तरह लड़की के बिगड़ जाने और पेट में बच्चा ठहर जाने को लेकर रोने पीटने नहीं लगती बल्कि मजबूती से यही पूछती है कि तुम्हें बच्चा चाहिए या नहीं। आखिरकार जब विद्या कहती है कि वो गर्भपात नहीं कराएगी तो विद्या की मां के चेहरे पर परेशानी की जगह एक आत्मविश्वास नजर आता है और एक तरह से अपनी बेटी के बोल्ड फैसले पर वो गर्व की मुद्रा में दिखती हैं।

भारतीय शहरों में भी बिनब्याही मां बनना अनहोनी बात ही है। फिल्मों में यदा कदा बिनब्याही मां का चरित्र आता है लेकिन बिना शादी के बच्चा पैदा करने के बेटी के फैसले पर संतोष व्यक्त करने वाली मां का किरदार किसी हिंदी फिल्म में ये कदाचित पहली बार आया है। विद्या की मां उस समय विधवा हो गईं थीं जब विद्या की उम्र सिर्फ दो साल थी। अकेले बच्चा पालने की तकलीफ का उन्हें एहसास है। फिर भी वो बेटी के फैसले से असहमत नहीं होतीं। बच्चे को पिता का नाम मिल जाए इसकी चिंता उन्हें है। लेकिन यहां पर उनकी बेटी विद्या इस बेहद मजबूती से जमे विचार की धज्जियां उड़ाती नजर आती हैं।

यहां तक कि विद्या अमोल को इस बात का हक देने के लिए तैयार नहीं हैं कि वो ऑरो को अपना बेटा कहे। वो बेहद सख्ती से कहती है कि तुमने अपने स्पर्म यानी शुक्राणु मेरे शरीर में डाल दिए, इतने भर से तुम्हें पिता होने का हक नहीं मिल जाएगा। स्त्री-पुरुष संबंधों का ये नया धरातल है। संबंधों की व्याख्या करने का पुरुष विशेषाधिकार यहां आकर टूटता है। आम तौर पर फिल्मों में महिलाएं ऐसे मामलों में बेटे या बेटी को पिता का नाम दिलाने के लिए संघर्ष करती दिखती हैं। लेकिन यहां एक मां है जो इससे बेपरवाह है और बेपरवाह ही नहीं है, इस विचार का ही वो विरोध करती हैं कि ऐसे पिता को पिता कहा जाए, जिसने पिता होने की कोई जिम्मेदारी ही नहीं निभाई। पिता होने को वो सेक्स के नतीजे यानी एक बायोलॉजिकल प्रक्रिया से बड़ा तथ्य मानती हैं और इसकी घोषणा भी करती हैं।

पा’ की औरतें जानती हैं कि उनका बोल्ड होना जमाने के लिए मुसीबत की वजह हैं। वो जानती हैं कि इस वजह से जमाने का गला सूखने लगता है और समाज को हिचकियां आने लगती हैं। लेकिन इस वजह से वो समझौता नहीं करतीं। वो समझौता करती भी हैं तो इसकी वजह परंपरा को मानने की मजबूरी नहीं हैं। जब ऑरो मृत्यु के करीब होता है और चाहता है कि उसकी मां और उसके पिता भी राउंड-राउंड घूमें जैसा कि शादी में होता है तो विद्या खुद ही पहल करती हैं और अमोल का हाथ पकड़कर ऑरो के बेड के चक्कर लगाती हैं। ये उसका अपना फैसला है, ये बेटे की इच्छा को पूरा करने की उसकी मजबूरी है।

स्त्री पात्रों का मजबूत चित्रण ‘पा’ फिल्म की एक बड़ी विशेषता है। सवाल ये है कि क्या इस मामले में ये फिल्म भारत के जमीनी यथार्थ से दूर है? इस सवाल का जवाब देते समय हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि भारतीय समाज कई लेयर्स यानी स्तरों में जी रहा है। समाज के एक हिस्से में सामंती जकड़न अब काफी हद तक टूट चुकी है। इस फिल्म की नायिकाएं उच्च मध्यवर्गीय महानगरीय परिवेश की हैं। विद्या की विदेश में हुई शिक्षा ने भी उसे लिबरेट किया है। ऐसे में उसके लिए अपने बारे में वैसे फैसले करने की स्वतंत्रता हासिल है जिसके लिए आम भारतीय लड़की सोच भी नहीं पाती।

फिल्मों में किसी विचार का आना इस बात का सबूत तो नहीं हो सकता कि समाज उस विचार को मानने और अपनाने के लिए तैयार है। मुमकिन है कि फिल्मकार को लगता है कि इस विचार का समय आ गया है और हो सकता है कि वो समय से काफी आगे चल रहा है। फंतासी और यथार्थ के बीच अक्सर काफी दूरी होती है। इसलिए ‘पा’ की महिलाओं के विचारों को समाज में कितनी स्वीकृति मिलेगी ये कह पाना अभी आसान नहीं है। लेकिन एक विचार के तौर पर ये बात आ गई है, ये तो ‘पा’ ने दिखा दिया है। इसकी वजह से समाज को आने वाली हिचकियों के कुछ संकेत तो फिल्मों में भी हैं और बाकी कुछ हिचकियों की हम कल्पना कर सकते हैं।

लड़कियों के उच्च शिक्षा क्षेत्र में आने और आर्थिक रूप से उनके स्वतंत्र होने के बाद भारतीय परिवार अब पहले जैसे तो नहीं रह सकते। शहरीकरण और कैप्सूल फैमिली के यथार्थ बन जाने से भी बहुत कुछ बदल गया है। विवाह संस्था, एकनिष्ठता, पुरुष वर्चस्व जैसी कई अवधारणाएं अब संकट में हैं। बदलाव की आहट चौतरफा है। इस बदलाव के कुछ नमूने ये फिल्म दिखा गई है।

Thursday, December 10, 2009

बेटियों ने किया पिता का अन्तिम संस्कार



उत्तर प्रदेश के छोटे से जनपद जालौन में लड़कियों द्वारा ऐतिहासिक कदम उठाया गया। पुत्र के न होने की दशा में पुत्रियों ने अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया साथ ही मुखग्नि भी दी।
प्रदेश में बुन्देलखण्ड क्षेत्र को हमेशा से पिछड़ा सिद्ध करने की साजिश होती रही है। ऐसे में इस क्षेत्र में इस प्रकार की घटना यह दर्शाती है कि इस क्षेत्र के लोग यदि अपनी परम्पराओं और संस्कार का निर्वहन करना जानते हैं तो वे रूढ़ियों को तोड़ने में भी विश्वास रखते हैं।
इस घटना में विशेष बात यह रही कि सभी ने लड़कियों के इस कार्य की सराहना की। किसी के द्वारा भी विरोध के स्वर सुनाई नहीं दिये।
वाकई ऐसी लड़कियाँ मिसाल हैं। शाबास...........


(यह घटना दिनांक 10 दिसम्बर 2009 के अमर उजाला, बुन्देलखण्ड संस्कारण में प्रकाशित की गई है।)

Monday, December 7, 2009

डीयू में सेक्शुअल हरासमेंट के खिलाफ पिंक लिटरेचर कैंपेन

दिल्ली विश्वविद्यालय की तरफ कोई निकले तो रैगिंग, धूम्रपान और ईव टीजिंग के खिलाफ पोस्टर जगह-जगह मिल जाएंगे। मेरा आम तौर पर उस तरफ जाना नहीं होता है। पर पिछले दिनों किसी काम से कैंपस में जाने का मौका मिला तो नजर वहां लगे टंगे पोस्टरों पर स्वाभाविक रूप से गई।

हाल के दिनों में दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू में महिला छात्रों या रिसर्चरों के खिलाफ सेक्शुअल हरासमेंट के कई मामले चर्चा में आए। उनकी जांच के लिए कमिटियों के बनने की भी चर्चाएं हुईं। डीयू के एक मामले में प्रोफेसर को बचाने की चौतरफा कोशिश के बाद भी उसे बर्खास्त होने से बचाया नहीं जा सका। इसी तरह जेएनयू जैसे वैचारिक रूप से विकसित और मुक्त माहौल में भी एक मामले में हाल के दिनों में एक प्रोफेसर को निलंबित कर दिया गया है।

लेकिन इतना कतई नाकाफी है। ऐसे दो-चार मामलों के बारे में हम जान पाते हैं, पर सेक्शुअल हरासमेंट के बाकी कई मामले दबे ही रह जाते हैं। ऐसे कई मामले तो वरिष्ठ छात्रों, शोधार्थियों और शिक्षकों तक के साथ हुए है। शिकायत के बाद कमिटियां वगैरह बना दी जाती हैं, पर इसके बावजूद उन मामलों पर कोई कार्रवाई नहीं होती। समय के साथ सब धुंधला होता जाता है और मामले अतीत के गर्त में खो जाते हैं।

इन बकाया मामलों की भी खोज-खबर लेने के लिए जिम्मेदार लोगों की नींद तोड़ने और हालात में बदलाव लाने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय में पिछले दिनों ऑपरेशन पिंक लिटरेचर शुरू किया गया। इससे पहले यहां हुए एक छोटे से सर्वे से यह बात सामने आई थी कि ज्यादातर पीड़ित शिकायत के लिए बने विशेष प्रकोष्ठ या कमिटी से बात करने या वहां शिकायत दर्ज कराने की बजाए अपने मित्रों और परिवार के लोगों से मदद मांगते हैं। कैंपस में हरासमेंट की घटनाओं को रोकने के लिए कोई छह साल पहले डीयू में आर्डिनेंस 15 डी बनाया गया था। लेकिन इसके बारे में भी कैंपस में जागरूकता कम है।

इन सब मसलों पर कैंपस में लोगों को सेंसिटाइज़ करने के लिए डीयू के कुछ छात्रों और शिक्षकों ने यह अभियान शुरू किया है और यह सभी के लिए खुला है, जो भी इससे जुड़ना चाहे।

हर महिला और पुरुष को एक इंसान के तौर पर देखने और उसकी मानवीय अस्मिता और गरिमा की इज्जत करने के बारे में संवेदनशील बनाए जाने की सख्त जरूरत है। अगर यह सीख कम उम्र में ही लोगों को मिले तो वे वह युवा होने पर इन मूल्यों को भी समझेंगे और उनका सम्मान करेंगे। इसके अलावा पीड़ित महिलाओं को पता हो कि अगर उनके साथ ऐसा कोई दुर्व्यवहार हो तो उन्हें इसके खिलाफ कहां शिकायत करे। डीयू की यह पहल स्वागत के लायक है।