Sunday, December 13, 2009

‘पा’ की औरतें और जमाने की हिचकियां

यह लेख आज,13 दिसंबर 2009 के राष्ट्रीय सहारा के संपादकीय पृष्ठ पर छपा है। वहां भी पढ़ा जा सकता है।

‘पा’ एक असामान्य फिल्म है। इसका अलग होना सिर्फ इस मायने में नहीं है कि इसमें एक अजीब सी बीमारी प्रोजेरिया के शिकार एक बच्चे को दिखाया गया है जो १२ साल की उम्र में साठ साल का या उससे भी बड़ा दिखता है और उसके शरीर के बढ़ने की रफ्तार जानलेवा होने की हद तक तेज है। अमिताभ बच्चन के नए अवतार ऑरो की भी काफी चर्चा है। लेकिन ‘पा’ की चर्चा इसके अलावा भी कुछ और कारणों से होनी चाहिए। दरअसल ये फिल्म परंपरा की कुछ पुरानी जकड़नों को बेहद निर्ममता के साथ ध्वस्त करती है। ‘पा’ फिल्म मजबूत महिला किरदारों की वजह से भी याद रखी जानी चाहिए। ये बाप-बेटे की नहीं मां-बेटे की कहानी है जिसमें पापा साइड रोल में है।


‘पा’ फिल्म की लीड करेक्टर विद्या कोई सामान्य लड़की नहीं है। विद्या की मां अरुधति नाग, जिसे ऑरो दादी की जगह मस्ती में 'बम' कहता है, भी सामान्य मां नहीं है। विद्या का जब अमोल (अभिषेक बच्चन) से शारीरिक संबंध बनता है तो वो जानती है कि इसका क्या नतीजा हो सकता है। आखिर वो मेडिकल की स्टूडेंट है। अमोल उसे अबॉर्शन यानी गर्भपात कराने की सलाह देता है। ये एक स्वार्थी-कैरयरिस्ट पुरुष की बेहद स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।

इस मोड़ पर विद्या और उसकी मां आम भारतीय परंपरागत लड़की और मां से अलग नजर आती है। परंपरा के बोझ से आजाद, विदेशी यूनिवर्सिटी में पढ़ रही विद्या अपना फैसला खुद लेने का साहस दिखाती है और बच्चा पैदा करने या ना करने के बारे में फैसला लेने की प्रक्रिया से पिता अमोल को अलग कर देती है। विद्या की मां भी आम भारतीय माताओं की तरह लड़की के बिगड़ जाने और पेट में बच्चा ठहर जाने को लेकर रोने पीटने नहीं लगती बल्कि मजबूती से यही पूछती है कि तुम्हें बच्चा चाहिए या नहीं। आखिरकार जब विद्या कहती है कि वो गर्भपात नहीं कराएगी तो विद्या की मां के चेहरे पर परेशानी की जगह एक आत्मविश्वास नजर आता है और एक तरह से अपनी बेटी के बोल्ड फैसले पर वो गर्व की मुद्रा में दिखती हैं।

भारतीय शहरों में भी बिनब्याही मां बनना अनहोनी बात ही है। फिल्मों में यदा कदा बिनब्याही मां का चरित्र आता है लेकिन बिना शादी के बच्चा पैदा करने के बेटी के फैसले पर संतोष व्यक्त करने वाली मां का किरदार किसी हिंदी फिल्म में ये कदाचित पहली बार आया है। विद्या की मां उस समय विधवा हो गईं थीं जब विद्या की उम्र सिर्फ दो साल थी। अकेले बच्चा पालने की तकलीफ का उन्हें एहसास है। फिर भी वो बेटी के फैसले से असहमत नहीं होतीं। बच्चे को पिता का नाम मिल जाए इसकी चिंता उन्हें है। लेकिन यहां पर उनकी बेटी विद्या इस बेहद मजबूती से जमे विचार की धज्जियां उड़ाती नजर आती हैं।

यहां तक कि विद्या अमोल को इस बात का हक देने के लिए तैयार नहीं हैं कि वो ऑरो को अपना बेटा कहे। वो बेहद सख्ती से कहती है कि तुमने अपने स्पर्म यानी शुक्राणु मेरे शरीर में डाल दिए, इतने भर से तुम्हें पिता होने का हक नहीं मिल जाएगा। स्त्री-पुरुष संबंधों का ये नया धरातल है। संबंधों की व्याख्या करने का पुरुष विशेषाधिकार यहां आकर टूटता है। आम तौर पर फिल्मों में महिलाएं ऐसे मामलों में बेटे या बेटी को पिता का नाम दिलाने के लिए संघर्ष करती दिखती हैं। लेकिन यहां एक मां है जो इससे बेपरवाह है और बेपरवाह ही नहीं है, इस विचार का ही वो विरोध करती हैं कि ऐसे पिता को पिता कहा जाए, जिसने पिता होने की कोई जिम्मेदारी ही नहीं निभाई। पिता होने को वो सेक्स के नतीजे यानी एक बायोलॉजिकल प्रक्रिया से बड़ा तथ्य मानती हैं और इसकी घोषणा भी करती हैं।

पा’ की औरतें जानती हैं कि उनका बोल्ड होना जमाने के लिए मुसीबत की वजह हैं। वो जानती हैं कि इस वजह से जमाने का गला सूखने लगता है और समाज को हिचकियां आने लगती हैं। लेकिन इस वजह से वो समझौता नहीं करतीं। वो समझौता करती भी हैं तो इसकी वजह परंपरा को मानने की मजबूरी नहीं हैं। जब ऑरो मृत्यु के करीब होता है और चाहता है कि उसकी मां और उसके पिता भी राउंड-राउंड घूमें जैसा कि शादी में होता है तो विद्या खुद ही पहल करती हैं और अमोल का हाथ पकड़कर ऑरो के बेड के चक्कर लगाती हैं। ये उसका अपना फैसला है, ये बेटे की इच्छा को पूरा करने की उसकी मजबूरी है।

स्त्री पात्रों का मजबूत चित्रण ‘पा’ फिल्म की एक बड़ी विशेषता है। सवाल ये है कि क्या इस मामले में ये फिल्म भारत के जमीनी यथार्थ से दूर है? इस सवाल का जवाब देते समय हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि भारतीय समाज कई लेयर्स यानी स्तरों में जी रहा है। समाज के एक हिस्से में सामंती जकड़न अब काफी हद तक टूट चुकी है। इस फिल्म की नायिकाएं उच्च मध्यवर्गीय महानगरीय परिवेश की हैं। विद्या की विदेश में हुई शिक्षा ने भी उसे लिबरेट किया है। ऐसे में उसके लिए अपने बारे में वैसे फैसले करने की स्वतंत्रता हासिल है जिसके लिए आम भारतीय लड़की सोच भी नहीं पाती।

फिल्मों में किसी विचार का आना इस बात का सबूत तो नहीं हो सकता कि समाज उस विचार को मानने और अपनाने के लिए तैयार है। मुमकिन है कि फिल्मकार को लगता है कि इस विचार का समय आ गया है और हो सकता है कि वो समय से काफी आगे चल रहा है। फंतासी और यथार्थ के बीच अक्सर काफी दूरी होती है। इसलिए ‘पा’ की महिलाओं के विचारों को समाज में कितनी स्वीकृति मिलेगी ये कह पाना अभी आसान नहीं है। लेकिन एक विचार के तौर पर ये बात आ गई है, ये तो ‘पा’ ने दिखा दिया है। इसकी वजह से समाज को आने वाली हिचकियों के कुछ संकेत तो फिल्मों में भी हैं और बाकी कुछ हिचकियों की हम कल्पना कर सकते हैं।

लड़कियों के उच्च शिक्षा क्षेत्र में आने और आर्थिक रूप से उनके स्वतंत्र होने के बाद भारतीय परिवार अब पहले जैसे तो नहीं रह सकते। शहरीकरण और कैप्सूल फैमिली के यथार्थ बन जाने से भी बहुत कुछ बदल गया है। विवाह संस्था, एकनिष्ठता, पुरुष वर्चस्व जैसी कई अवधारणाएं अब संकट में हैं। बदलाव की आहट चौतरफा है। इस बदलाव के कुछ नमूने ये फिल्म दिखा गई है।

17 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

पुरुष वर्चस्व को तो एक दिन नष्ट होना ही है। पुरुष का वर्चस्व न रहने पर पिता का स्थान कहाँ होगा यह तो भविष्य ही तय करेगा।

Bhawna Pandey said...

..haan ab to purush ki upyogita par bhi vigyaniyon ne sawaal uthane shuru kar diye hain!!!

Ashish (Ashu) said...

nice..thanks for this post

आर. अनुराधा said...

@ दिनेशराय द्विवेदी -
पुरुष की भूमिका समाप्त नहीं हो जाएगी बल्कि पुनर्परिभाषित होगी। उसे भी समाज-परिवार के लिए खुद को उपयोगी साबित करके दिखाना पड़ेगा। "तुमने अपने स्पर्म मुझे दिए, इतने भर से तुम्हें पिता होने का हक नहीं मिल जाएगा।" इस एक वाक्य में कई बातें हैं-

1)पुरुष सिर्फ पुरुष होने भर से अपने को दावेदार न मानें। पुरुष होना भर किसी के समाज के लिए उपयोगी हो जाने का पर्याप्त कारण नहीं है।
2) पुरुष को पिता का हक पाने के लिए बच्चा पालने की जिम्मेदारी में भी बराबर भागीदार बनना पड़ेगा।
3) सिर्फ पिता का नाम बच्चे को दिलाने के लिए जो मानसिक मशक्कत महिला/समाज करता था, वह कतई जरूरी नहीं है। सिर्फ एक नाम पा लेने भर से किसी के जीवन में कोई बदलाव नहीं आ जाता, जब लोग खुद भी यह समझने लगेंगे तो समाज की कई मौजूदा अतार्किक मुश्किलें आसान हो जाएंगी।

Anonymous said...

ना जाने क्यूँ अनुराधा कभी कभी लगता हैं एक सामान्य सी प्रक्रिया को क्युकी एक महिला करती हैं हम असमान्य बना कर महिला को असमान्य बनाते हैं । अगर हर कार्य को हम नोर्मल मान कर चाहेली तो शायद इतनी लड़ाई ही ना रहे । स्त्री और पुरूष दो इकाई हैं और रहेगे इनको जबरदस्ती से पूरक मान लेना केवल और केवल इस लिये क्युकी प्रजनन की प्रक्रिया के लिये दोनों आवश्यक हैं अपने आप मे एक विसंगति हैं । पूरक शब्द मानसिक जुड़ाव से होना चाहिये था । और पूरक मे दोनों को पूरा होना था एक दूसरे से पर यहाँ तो पुरूष को पूरा माना जाता हैं और स्त्री को तभी पूरा मानते हैं जब वो किसी पुरूष की पत्नी और किसी की माँ बन जाए ।
क्यूँ हम बार बार स्त्री के हर कार्य के प्रति एक ऐसा भाव रखते हैं जैसे उसको ये नहीं करना था किया तो वो महान हैं । क्यूँ नहीं नारी का किया हर कार्य एक नोर्मल कार्य माना जाए और आगे बढ़ा जाए ।

Pratibha Katiyar said...

अनुराधा जी, कायल हो गये हम तो आपके ऑब्जर्वेशन के. फिल्म मैंने अब तक देखी नहीं लेकिन अब $जरूर देखनी होगी. सचमुच, जब स्त्रियां खुद पर भरोसा करने लगेंगी तब पुरुषों को अपने अस्तित्व को रीडिफाइन करना ही होगा. इसकी शिद्दत से $जरूरत भी है. इस बात को पुरुषों के प्रति किसी दुराव के रूप में या उनकी उपस्थिति पर किसी किस्म के संकट के रूप में देखे जाने की $जरूरत नहीं है. $जरूरत है इस बात की कि उनका सिर्फ होना काफी नहीं है. उन्हें अपने होने का हक अदा करना भी सीखना होगा.

सुनीता शानू said...

एक सार्थक पोस्ट जो कई प्रश्नो का उत्तर भी देती है, मगर उलझा भी देती है,कि समाज किस ओर बढ़ रहा है,समाज का निर्माण अगर तेरा-मेरी और झगड़े में रहेगा तो सब कुछ तितर-बितर हो जायेगा,कैसा व्यवसाय है यह जिसमें शारीरिक रिश्ता हो गया और न समर्पण रहा न प्यार,आने वाली नस्ल क्या मागेंगी एक-दूसरे से,जरा सी नोक-झोंक हुई और कहा जायेगा कि तुने मुझे सिर्फ़ स्पर्म दिये हैं समझे तूं मेरे बच्चे का पिता नही आने वाले समय में बच्चों को क्या शिक्षा दें,समझ नही पा रही हूँ, पुरूष लगता है इंक वाला वो पैन हो गये जो यूज एण्ड थ्रो किया जाता है, पिता तो छोडिये माँ शब्द भी लुप्त ही हो जायेगा। विवाह,परिवार, सब बिखर जायेगा और रह जायेगा बस रिश्तों का बाजार जहाँ बोली लगाई जायेगी कि माँ बनना है आगे आये। कौन पिता बनने का दायित्व निभायेगा बताये और संतान के नाम के साथ अपना नाम जोड़े। बकवास है ऎसी लड़ाई।

समयचक्र said...

बहुत सटीक समीक्षा की है ..... आभार

आर. अनुराधा said...

@ तोसे लागे नैना-
"पुरूष लगता है इंक वाला वो पैन हो गये जो यूज एण्ड थ्रो किया जाता है, पिता तो छोडिये माँ शब्द भी लुप्त ही हो जायेगा।"
आप इतने निराश-हताश क्यों हैं? क्या पुरुष की भूमिका सिर्फ पिता या पति की है? सिर्फ बच्चे पैदा करने के लिए 'स्पर्म देने' और अपने बच्चे को सरनेम देने की है? और समाज में इसकी जरूरत खत्म होते ही पुरुषों की जरूरत भी खत्म हो जाएगी? अगर ऐसा है तो अब महिलाओं की तरह पुरुष भी लड़ लेंगे कि हमारी भूमिका को सीमित करके देखा जाता है। :-)

वैसे अगर आज के पुरुष अपने को सिर्फ इसी भूमिका में देख कर संतुष्ट हैं तो समझिए उनके कठिन दिन शुरू होने को हैं। और अगर नहीं, तो फिर चिंता की क्या बात है? उम्मीद करें कि भविष्य में एक उन्नत समाज के विकसित मनुष्यों की तरह हरेक को बराबर का दर्जा देते हुए सबके लिए इच्छा और क्षमतानुसार भूमिकाएं तय होंगी। क्या हम तैयार हैं उस समय के लिए?

तरुण गुप्ता said...

achchhee smeeksha to nahi keh sakta lekin haan. aapne apni baat bahut achchhe se rakhi hai. apki post achchhee lagi.

विनय (Viney) said...

बेहतरीन लेख अनुराधा जी!

Sun said...

Hi Friend.. This is Vijay here.. Ur doing a good job.. Shall we exchange links...

आनंद said...

विद्या को अपने इस निश्‍चय के बारे में एक बार अमोल को बताना अवश्‍य चाहिए था। सिर्फ इस नाते कि बच्‍चा गिराने की सलाह देने की पहल अमोल ने की, उसकी निंदा करना ठीक नहीं है... यूँ तो विद्या के विचार भी ढुल मुल हो रहे थे। फाइनल फैसला तो माँ के सपोर्ट से ही किया।

बात 'पा' की है। इसमें मैं अमोल के कैरेक्‍टर को जस्‍टीफाई कर रहा हूँ। इसमें कहीं भी अमोल गलत नहीं है। उसे अपनी जिम्‍मेदारी निभाने का कम से कम एक मौका अवश्‍य दिया जाना चाहिए था।

हाँ, इस पूरे प्रसंग में विद्या की माँ का कैरेक्‍टर उभर कर आया है।

- आनंद

mukti said...

हाँ, इस फ़िल्म में मुझे भी माँ का कैरेक्टर बहुत ही अच्छा लगा और विद्या बालन का भी. आपने बहुत ही अच्छी तरह से फ़िल्म को समीक्षित किया है. प्रशंसनीय !

प्रज्ञा पांडेय said...

अनुराधाजी पा फिल्म हमने भी देखी . फिल्म बेहद पसंद आई .. आपने बहुत सुंदर लेख लिख डाला . . पा की स्त्रियाँ भविष्य की स्त्रियाँ हैं .. आज की नयी पीढ़ी जिसके पास अपने पांव पर खड़े होने का आत्म विश्वास है वे ऐसे ही निर्णय लेनेवाली हैं ..उन्हें अपनी सत्ता मालूम है ..जब उनके पास शक्ति और सामर्थ्य ज्यादा है तो निर्णय लेने भर की ही बात तो बच गयी थी जिसके लिए आत्म बल चाहिए आज की नयी पीढ़ी .काफी हद तक आत्म बल युक्त है.. हम बहुत आशान्वित हैं . .पुरुष को प्रकृति ने शासन करने के लिए कभी नहीं बनाया वह तो सिर्फ शक्ति प्रदर्शन करता है और हम नाहक उससे डर जाते हैं .. वो कहता है की हम तुम्हें खा जायेंगे ... जिस दिन हम कह देंगे की खा जाओ .. उसी दिन उसकी असमर्थता की जानकारी हमें हों जाएगी ..ऐसे निर्णय ही स्त्रियों को लेने होंगे .. पा में राजनीतिज्ञ का चरित्र भी बहुत प्रभावशाली है .. वह एक इमानदार आदमी है यह भी पा की विशेषता है.

pranava priyadarshee said...

badhiya vishleshann, film ka bhee aur us bahaane samaj me purushon ki badalti bhoomika kee bhee. aabhaar.

उन्मुक्ति said...

बढिया विश्लेषण । आैरत के फैसलों के पीछे कई कारण होते । पा के महिला किरदार की तरह हमारे समाज की लड़कियां भी अपने फैसलों के पीछे के तर्क कब पेश करने की हिम्मत जुटा पाएंगी आैर अडिग रहेंगी । उत्तरप्रदेश व देश के कई कस्बों जिलों में तो स्वतंत्र निर्णय लेना तो दूर, उसके बारे में सोच तक भी पैदा नहीं हो सकी, आशा है इस तरह की फिल्में व बातें कुछ फर्क तो पैदा करेंगी।