Wednesday, December 16, 2009

एक बेटे की चाहत में उन्नीस बेटियों का जन्म


घटना उत्तर प्रदेश के महोबा की है। यह घटना 8 दिसम्बर 2009 के अमर उजाला में पढ़ने को मिली। समाचार था कि उन्नीस बेटियों के बाद बेटे की मुराद पूरी हुई। समझ नहीं आया कि ऐसे समाचार पर रोया जाये या कि खुश हुआ जाये?
रोना इस कारण से कि

  • आदमी एक बेटे की चाहत में बेटियों को पैदा करते-करते जनसंख्या में वृद्धि करता जाता है।
  • आदमी बेटियों को अभी भी बेटों से कम करके आँक रहा है।
  • एक बेटे के लिए उन्नीस बेटियों का जन्म और एक स्त्री के शरीर पर एक प्रकार का अत्याचार।

खुश होने का मन इस कारण कर रहा था कि

  • कुछ स्त्रोतों से ज्ञात हुआ कि उस व्यक्ति ने किसी भी बच्चे के गर्भ में आने पर उल्ट्रासाउंड करवा कर लिंग का पता नहीं किया।
  • किसी भी कन्या भ्रूण की हत्या करने का प्रयास नहीं किया।
  • किसी भी बेटी को मारने का प्रयास नहीं किया।

समाचार के अनुसार पनवाड़ी के ग्राम स्योड़ी के चतुर्भुज अहिरवार का विवाह 1985 में लालकुँवर के साथ हुआ था। शादी के दो वर्ष बाद से लेकर अभी तक उसने कुल 20 बच्चों को जन्म दिया। पहली उन्नीस बेटियों में से आठ की मृत्यु हो चुकी है।
बच्चियों के भरण-पोषण के लिए चतुर्भुज ने गाँव छोड़ कर दिल्ली में ढेरा जमा लिया था और वहीं से प्रतिमाह बच्चियों की परवरिश के लिए पैसे भेजता रहता था।
बड़ी बेटी का किसी तरह विवाह करने के बाद भी बेटे की चाहत कम नहीं हुई। परिणामतः बीसवें बच्चे के रूप में उन्हें बेटा प्राप्त हुआ।
सामुदायिक केन्द्र में बेटे के जन्म देने के बाद लालकुँवर को जननी सुरक्षा योजना के अन्तर्गत 1400 रुपये का चेक भी दिया गया।
इस पोस्ट का उद्देश्य समाचार देना नहीं वरन् यह है कि ऐसी घटनाओं पर क्या किया जाये?
खुश हुआ जाये कि किसी भी रूप में इन दम्पत्ति ने कन्याओं की हत्या नहीं की या फिर दुःखी हुआ जाये कि विकास की राह पर चलने के बाद भी बेटे की चाहत बिलकुल कम नहीं हुई है?
कुछ भी हो यह तो स्पष्ट है कि उन्नीस में से शेष बची ग्यारह बेटियों के सामने अभाव तो रहता ही होगा और अपनी शारीरिक विकास की राह में अवरोध तो पाती ही होंगी। शिक्षा, भोजन, वस्त्र, चिकित्सा आदि का संकट तो रहता ही होगा। इन सबसे बचने का उपाय क्या होगा? यही दुःख होने की बात है।

8 comments:

अजय कुमार झा said...

डा. साहब ये कोई पहली घटना नहीं है और दुख की बात है कि ग्रामीण क्षेत्रों में तो ये अभी भी बदस्तूर जारी है ...हां उन्नीस न सही नौ ही सही मगर चल तो रहा ही है ।सबसे बडा सवाल है कि आखिर ये मानसिकता कब बदलेगी और कैसे बदलेगी । हम देश में कितनी ही कल्पना चावला, किरन बेदी पैदा कर लें मगर इस मानसिकता पर कहां फ़र्क पडता दिखता है । इसका सिर्फ़ एक ही उपाय है शिक्षा ।जब तक मां शिक्षित नहीं होगी किसी भी परिवार समाज से किसी बदलाव की उम्मीद बेमानी है । और मुझे नहीं लगता कि चाहे आपने अल्ट्रा साउंड वाली क्षणिक खुशी की बात की हो मगर है तो ये दुखद बात ही ॥

Dipti said...

कम से कम बेटा हो गया नहीं तो वो महिला ना जाने कब तक यूँ ही बच्चा मशीन बनी रहती।

मनोज कुमार said...

आपका आलेख बहुत अच्छा लगा। श्री झा से पूरी तरह सहमत हूं। पर कभी-कभी लगता है इस समस्या से पढ़-लिखा वर्ग भी अछूता नहीं है। अभी कुछ दिनों पहले NDTV पर एक समाचार आ रहा था। एक डाक्टर पति ने अपनी डाक्टर पत्नी का धोखे से भ्रूण परीक्षण करवा दिया और जब पता चना कि कन्या भ्रूण है तो उसने पत्नी पर गर्भपात के लिए अनुचित दबाव डालना शुरु किया। डाक्टर पत्नी को अपनी कन्या की रक्षा के लिए पति से अलग हो जाना पड़ा। अब इस पढ़े-लिखे पुरुष मानसिकता का क्या कहें।

Dr. Zakir Ali Rajnish said...

सिर्फ एक ही शब्द कहा जा सकता है शर्मनाक और शर्मनाक।
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छोटी सी गल्ती जो बडे़-बडे़ ब्लॉगर करते हैं।
क्या अंतरिक्ष में झण्डे गाड़ेगा इसरो का यह मिशन?

शिरीष कुमार मौर्य said...

महोबा में ही दांतों के एक नामचीन डाक्टर हैं. उन्होंने बेटे के लिए पत्नी को सात बार माँ बनाया- बड़ी बेटी का विवाह हो गया-१९९८ में, तब तक छह बेटियां थीं. . सातवीं बार स्थित ये हुई कि स्थानीय सरकारी अस्पताल में उनकी बड़ी बेटी और पत्नी प्रसूति के लिए एक साथ दाखिल हुए. बेटी ने तो बेटे को जन्म दिया पर उन्हें फिर से हुई एक बेटी. इसे कहते हैं पोएटिक जस्टिस ! बाद की कथा मैं नहीं जानता पर इस समाचार के चतुर्भुज अहिरवार के बरक्स ये डाक्टर साहब एक पढ़े लिखे व्यक्ति हैं.......

सुशील छौक्कर said...

हम चाहे कितनी ही तरक्की कर लें पर आज भी पुरानी सोच पर चलते हुए नजर आते है। मेरे आस पास कई परिवार जिन्होंने लड़के की चाह में परिवार को बढाया और आर्थिक रुप से कमजोर होते गए। एक परिवार को एक बडे घर को बेचकर एक छोटा मकान लेना पडा। और तो और आज भी लोग लड़के की चाह में पता नही कहाँ कहाँ धक्के खाते फिरते रहते है।

डॉ .अनुराग said...

शिरीष जी के कथन के बाद कहने को कुछ नहीं बचता .

Ashok Kumar pandey said...

सच में आज मुझे अपने और किरन के उस डिसीजन पर गर्व हो रहा है कि वेरा के बाद हमने कोई और संतान पैदा नहीं करनी है।