Monday, November 15, 2010

भारत की प्रथम महिला बैरिस्टर कार्नेलिया सोराबजी

15 नवम्बर की तिथि नारी-सशक्तीकरण की दिशा में काफी मायने रखती है। 15 नवम्बर 1866 को ही भारत की पहली महिला बैरिस्टर कार्नेलिया सोराबजी का जन्म हुआ था. नासिक में जन्मीं कार्नेलिया 1892 में नागरिक कानून की पढ़ाई के लिए विदेश गयीं और 1894 में भारत लौटीं. उस समय समाज में महिलाएं मुखर नहीं थीं और न ही महिलाओं को वकालत का अधिकार था. पर कार्नेलिया तो एक जुनून का नाम था. अपनी प्रतिभा की बदौलत उन्होंने महिलाओं को कानूनी परामर्श देना आरंभ किया और महिलाओं के लिए वकालत का पेशा खोलने की माँग उठाई. अंतत: 1907 के बाद कार्नेलिया को बंगाल, बिहार, उड़ीसा और असम की अदालतों में सहायक महिला वकील का पद दिया गया. एक लम्बी जद्दोजहद के बाद 1924 में महिलाओं को वकालत से रोकने वाले कानून को शिथिल कर उनके लिए भी यह पेशा खोल दिया गया....1929 में कार्नेलिया हाईकोर्ट की वरिष्ठ वकील के तौर पर सेवानिवृत्त हुयीं पर उसके बाद महिलाओं में इतनी जागृति आ चुकी थी कि वे वकालत को एक पेशे के तौर पर अपनाकर अपनी आवाज मुखर करने लगी थीं. यद्यपि 1954 में कार्नेलिया का देहावसान हो गया, पर आज भी उनका नाम वकालत जैसे जटिल और प्रतिष्ठित पेशे में महिलाओं की बुनियाद है. कार्नेलिया सोराबजी की जन्म-तिथि पर उन्हें शत-शत नमन !!

Sunday, October 31, 2010

अरुंधती राय की विच हंटिंग

आज हालोवीन है, विच हंटिंग के विरोध का भी एक सिम्बोलिक दिन.  अरुंधती राय ने  कश्मीर  के सवाल को पब्लिक डोमेन में लाने की जो कोशिश की है, पता नहीं कश्मीर को लेकर संजीदा संवेदनशीलता कितनो में जागी है, पर अरुंधती कि विच हंटिंग जबरदस्त तरीके से शुरू हो गयी है. अरुंधती को गोली मारने से लेकर, उनके बलात्कार तक की कामना लोग अपनी टिप्पणियों में बेहद बेशर्मी से छोड़ रहे है. सार्वजानिक जीवन में, विरोध की असहमति की कितनी जगह है?शोमा चौधरी का एक ये लेख है,  लंबा है, पर उम्मीद है कि आप में से कुछ लोग इसे पढ़ लेंगे. दूसरा अरुंधती का इंटरव्यू है, उन सब सवालों को लेकर, जिनसे कई लोगो के मन बेचैन है.  अरुंधती के बारे में सही राय बनाने से पहले इससे भी कुछ मदद मिलेगी.

मेरी अरुंधती से कई मामलों में असहमति के बावजूद, उनकी अभिव्यक्ति की आज़ादी के पक्ष में ही मेरी राय है.
कश्मीर का मुद्दा सिर्फ इतने तक सीमित नहीं है कि लोगो को आज़ादी का हक होना चाहिए, अलहदा होने के लिए, या कोई बड़ी मुसलमान आबादी पड़ोसी देश में मिल जाय. फिर खुश रहेगी या फिर सैनिक शासन में खुश रहेगी. उसके बहु आयाम है, और सिर्फ हिन्दुस्तान पाकिस्तान ही नहीं है, ग्लोबल राजनीती के बड़े तार भी होंगे, और आतंकवाद के भी है. सामरिक दृष्टी से भी भारत के लिए कश्मीर का महत्तव है. और इन सबके मद्दे नज़र संजीदा तरीके से लोगो के लिए कोई पालिसी होनी चाहिए, मुख्यधारा में उनके मिलने के प्रयास होने चाहिए. ये जो देश है इसका विकास इस तरह का है कि सभी सीमावर्ती राज्य, दूर दराज़ के देहात, और सबसे गरीब लोग इसकी परिधि के बाहर है, और जनतंत्र के पास उन्हें देने के लिए सैनिक शासन से बेहतर कुछ होना चाहिए.

कश्मीर के अलगाव का मुद्ददा जटिल है, पर उसका सही हल राजनितिक ही होना चाहिए, या उसकी जमीन बनने के संजीदा प्रयास होने चाहिए. अरुंधती से असहमति के बाद भी, उनकी आवाज़ , विरोध और असहमति की आवाज, एक स्वस्थ जनतंत्र के लिए ज़रूरी है. अरुंधती की जुमलेबाजी भी अगर लोगों को 60 साल की लम्बी चुप्पी के बाद कश्मीर के राजनैतिक समाधान की तरफ सक्रिय करती है तो ये पोजिटिव बात होगी. इतना तो निश्चित है कि पुराने जोड़तोड़ के फैसले, राजनैतिक अवसरवाद, और सैनिक शासन का फोर्मुला बर्बादी और आतंकवाद ही लाया है. संजीदे पन से जब हिन्दुस्तान के नागरिक सोचेंगे, तभी जो सरकार है, नीती नियंता है, किसी संजीदा दिशा में जायेंगे.  रास्ट्रवाद की छतरी के नीचे अरुंधती की बैशिंग से समाधान नहीं निकलने वाले है.

Wednesday, October 20, 2010

खेल में भी अब हिंदुस्तानी महिलाओं की बारी

इस बार के राष्ट्रमंडल खेलों में क्या खास रहा- भारत में होने और भ्रष्टाचार तथा अव्यवस्था-असुविधा का बोलबाला होने के अलावा?

इस बार भारतीय महिला खिलाड़ियों ने यहां झंडे गाड़ दिए। सानिया-सायना से परे कुश्ती, दौड़, डिस्कस थ्रो, तीरंदाजी...हर खेल में भारतीय महिलाओं का प्रदर्शन सराहनीय रहा। और सबसे दिलचस्प बात यह रही कि ये खिलाड़ी कोई महानगरों के नहीं थे, बल्कि देश भर के छोटे शहरों-कस्बों से आए थे। उनमें कई शादीशुदा, बाल-बच्चेदार भी थीं, जिनके पतियों-परिवारों ने भी प्रोत्साहन दिया।

क्या इसे समाज की मानसिकता में सकारात्मक बदलाव की निशानी न माना जाए!!

CWG 2010: Indian woman rule the show
                                   छात्राओं को निःशुल्क कराटे प्रशिक्षण

                                                          तेनशनकान   स्कूल कराटे डू एसोसिएशन ने "लड़कियों जागो" अभियान के अंतर्गत निःशुल्क कराटे प्रशिक्षण का आयोजन किया है. शिवाजी नगर के शिवाजी भवन में आयोजित प्रशिक्षण शिविर में सैकड़ों छात्राओं और महिलाओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा  लिया. संस्था के सचिव विजय कुमार के मुताबिक राह चलती छात्राओं और महिलाओं के आत्म रक्षार्थ इस शिविर का आयोजन किया गया  है और इसमें मोबाईल फ़ोन पर आने वाली ब्लैंक काल डायवर्ट और रिकार्डिंग सिस्टम की भी जानकारी दी गयी है. संस्था इस शिविर को हर रविवार ३० दिसंबर तक लगाएगी.


                      ये कानपुर के दैनिक जागरण की एक खबर मात्र है लेकिन ये सिर्फ पीछे के प्रष्ट पर दी गयी छोटी सी खबर नहीं बल्कि एक रोशनी की किरण है, जो मशाल बन कर उभरनी चाहिए. आज सिर्फ नारी जाति के नाम से जन्म लेने वाली हर बच्ची , किशोरी, युवा और महिलाएं सभी कुछ लोगों की विकृत मानसिकता का शिकार बन रही हैं. छेड़छाड़ से लेकर आगे अस्मिता के सवाल तक कुछ भी शेष नहीं रह गया है. इसमें कोई उम्र का बंधन नहीं और न इसके लिए शिक्षा और व्यवसाय कोई मायने रखता है. चाहे शिक्षक , डॉक्टर , मैनेजर, रिक्शाचालक, वैन चालाक कोई भी हो सकता है. अब लड़कियों को अपने स्तर पर अपनी सुरक्षा का इंतजाम खुद ही करना पड़ेगा. ये सिर्फ एक संस्था द्वारा नहीं बल्कि ऐसे अभियान में मार्शल आर्ट को शामिल करके स्कूलों  में अनिवार्य किया जाना चाहिए. इस नारी जाती को अपनी सुरक्षा खुद ही करनी होगी . ये शिक्षा उसको सिर्फ शोहदों से ही बचने के लिए नहीं बल्कि उनकी इज्जत और दहेज़ हत्या जैसे मामलों में अपनी सुरक्षा करने सक्षम बना सकती हैं . कम से कम वह लड़कर अपनी रक्षा तो कर ही सकती है. 
                     इसके लिए किसी संस्था और सरकार का मुँह क्यों देखे? अगर हम सक्षम हैं तो उनको उसी जगह अपनी सक्षमता से अवगत करा कर उत्तर देना चाहिए. इसके लिए पहल स्कूल स्तर पर हो तो अधिक अच्छा है क्योंकि हर बाला स्कूल तो जरूर ही जाती है. जो नहीं जाती हैं , उनके लिए कुछ और सोचा जा सकता है. ऐसे ही स्वयंसेवी संस्थाएं उनको थोड़े समय का प्रशिक्षण देने का शिविर लगा सकती हैं .

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क्या चोखेर बाली ब्लॉग बंद कर दिया गया है. अगर नहीं तो हम इसके प्रति इतनी उपेक्षा क्यों बरत रहे हैं? इसमें मैं भी शामिल हूँ. लेकिन अब नहीं रहूंगी. अगर ये पोस्ट गयी तो फिर लिखती हूँ. क्योंकि पिछले दिन एक पोस्ट प्रकाशित दिखी लेकिन चोखेर बाली पर नहीं थी.

Sunday, August 15, 2010

भारतीय वीरांगनाओं की ये शौर्य-गाथाएं !

स्वतंत्रता और स्वाधीनता प्राणिमात्र का जन्मसिद्ध अधिकार है। इसी से आत्मसम्मान और आत्मउत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। भारतीय राष्ट्रीयता को दीर्घावधि तक विदेशी शासन और सत्ता की कुटिल-उपनिवेशवादी नीतियों के चलते परतंत्रता का दंश झेलने को मजबूर होना पड़ा था और जब इस क्रूरतम कृत्यों से भरी अपमानजनक स्थिति की चरम सीमा हो गई तब जनमानस उद्वेलित हो उठा था। अपनी राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक पराधीनता से मुक्ति के लिए सन् 1857 से सन् 1947 तक दीर्घावधि क्रान्ति यज्ञ की बलिवेदी पर अनेक राष्ट्रभक्तों ने तन-मन जीवन अर्पित कर दिया था। क्रान्ति की ज्वाला सिर्फ पुरुषों को ही नहीं आकृष्ट करती बल्कि वीरांगनाओं को भी उसी आवेग से आकृष्ट करती है। भारत में सदैव नारी को श्रद्धा की देवी माना गया है, पर यही नारी जरूरत पड़ने पर चंडी बनने से परहेज नहीं करती। ‘स्त्रियों की दुनिया घर के भीतर है, “शासन-सूत्र का सहज स्वामी तो पुरूष ही है‘ अथवा ‘“शासन व समर से स्त्रियों का सरोकार नहीं‘ जैसी तमाम पुरूषवादी स्थापनाओं को ध्वस्त करती इन वीरांगनाओं के ज़िक्र के बिना 1857 से 1947 तक की स्वाधीनता की दास्तान अधूरी है, जिन्होंने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिया। इन वीरांगनाओं में से अधिकतर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे किसी रजवाड़े में पैदा नहीं हुईं बल्कि अपनी योग्यता की बदौलत उच्चतर मुकाम तक पहुँचीं।

1857 की क्रान्ति की अनुगूँज में दो वीरांगनाओं का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। इनमें लखनऊ और झांसी में क्रान्ति का नेतृत्व करने वाली बेगम हजरत महल और रानी लक्ष्मीबाई शामिल हैं। ऐसा नहीं है कि 1857 से पूर्व वीरांगनाओं ने अपना जौहर नहीं दिखाया। 1824 में कित्तूर (कर्नाटक) की रानी चेनम्मा ने अंगेजों को मार भगाने के लिए ’फिरंगियों भारत छोड़ो’ की ध्वनि गुंजित की थी और रणचण्डी का रूप धर कर अपने अदम्य साहस व फौलादी संकल्प की बदौलत अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये थे। कहते हैं कि मृत्यु से पूर्व रानी चेनम्मा काशीवास करना चाहती थीं पर उनकी यह चाह पूरी न हो सकी थी। यह संयोग ही था कि रानी चेनम्मा की मौत के 6 साल बाद काशी में ही लक्ष्मीबाई का जन्म हुआ। इतिहास के पन्नों में अंग्रेजों से लोहा लेने वाली प्रथम वीरांगना रानी चेनम्मा को ही माना जाता है।

कम ही लोगों को पता होगा कि बैरकपुर में मंगलपाण्डे को चर्बी वाले कारतूसों के बारे में सर्वप्रथम मातादीन ने बताया और मातादीन को इसकी जानकारी उसकी पत्नी लाजो ने दी। वस्तुत: लाजो अंग्रेज अफसरों के यहाँ काम करती थी, जहाँ उसे यह सुराग मिला कि अंग्रेज गाय की चर्बी वाले कारतूस इस्तेमाल करने जा रहे हैं। इसी प्रकार 9 मई 1857 को मेरठ में विद्रोह करने पर 85 भारतीय सिपाहियों को हथकड़ी-बेड़ियाँ पहनाकर जेल भेज दिया गया तो अन्य सिपाही जब उस शाम को घूमने निकले तो मेरठ शहर की स्त्रियों ने उन पर ताने कसे। मुरादाबाद के तत्कालीन जिला जज जे0सी0 विल्सन ने इस घटना का वर्णन करते हुये लिखा है कि- ‘‘महिलाओं ने कहा कि- छि:! तुम्हारे भाई जेलखाने में हैं और तुम यहाँ बाजार में मक्खियाँ मार रहे हो। तुम्हारे जीने पर धिक्कार है।’’ इतना सुनते ही सिपाही जोश में आ गये और अगले ही दिन 10 मई को जेलखाना तोड़कर सभी कैदी सिपाहियों को छुड़ा लिया और उसी रात्रि क्रान्ति का बिगुल बजाते दिल्ली की ओर प्रस्थान कर गये, जहाँ से 1857 की क्रान्ति की ज्वाला चारों दिशाओं में फैल गई।

लखनऊ में 1857 की क्रान्ति का नेतृत्व बेगम हजरत महल ने किया। अपने नाबालिग पुत्र बिरजिस कादर को गद्दी पर बिठाकर उन्होंने अंग्रेजी सेना का स्वयं मुकाबला किया। उनमें संगठन की अभूतपूर्व क्षमता थी और इसी कारण अवध के जमींदार, किसान और सैनिक उनके नेतृत्व में आगे बढ़ते रहे। आलमबाग की लड़ाई के दौरान अपने जांबाज सिपाहियों की उन्होंने भरपूर हौसला आफजाई की और हाथी पर सवार होकर अपने सैनिकों के साथ दिन-रात युद्ध करती रहीं। लखनऊ में पराजय के बाद वह अवध के देहातों मे चली गयीं और वहाँ भी क्रान्ति की चिंगारी सुलगायी। घुड़सवारी व हथियार चलाने में माहिर झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरता और शौर्य के किस्से तो जन-जन में सुने जा सकते हैं। नवम्बर 1835 को बनारस में मोरोपंत तांबे के घर जन्मी लक्ष्मीबाई का बचपन नाना साहब के साथ कानपुर के बिठूर में बीता। 1855 में अपने पति राजा गंगाधरराव की मौत के पश्चात् उन्होंने झाँसी का शासन सँभाला पर अंग्रेजों ने उन्हें और उनके दत्तक पुत्र को शासक मानने से इन्कार कर दिया। घुड़सवारी व हथियार चलाने में माहिर रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी में ब्रिटिश सेना को कड़ी टक्कर दी और बाद में तात्या टोपे की मदद से ग्वालियर पर भी कब्जा किया। उनकी मौत पर जनरल ह्यूगरोज ने कहा था कि- ‘‘यहाँ वह औरत सोयी हुयी है, जो विद्रोहियों में एकमात्र मर्द थी।’’ मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर की बेगम जीनत महल ने दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में स्वातंत्र्य योद्धाओं को संगठित किया और देशप्रेम का परिचय दिया। 1857 की क्रान्ति का नेतृत्व करने हेतु बहादुर शाह जफर को प्रोत्साहित करने वाली बेगम जीनत महल ने ललकारते हुए कहा था कि- ’’यह समय गजलें कह कर दिल बहलाने का नहीं है। बिठूर से नाना साहब का पैगाम लेकर देशभक्त सैनिक आए हैं। आज सारे हिन्दुस्तान की आँखें दिल्ली की ओर व आप पर लगी हैं। खानदान-ए-मुगलिया का खून हिन्द को गुलाम होने देगा तो इतिहास उसे कभी माफ़ नहीं करेगा।’’ बाद में बेगम जीनत महल भी बहादुर शाह जफर के साथ ही बर्मा चली गयीं। इसी प्रकार दिल्ली के शहजादे फिरोज शाह की बेगम तुकलाई सुलतान जमानी बेगम को जब दिल्ली में क्रान्ति की सूचना मिली तो उन्होंने ऐशोआराम का जीवन जीने की बजाय युद्ध शिविरों में रहना पसन्द किया और वहीं से सैनिको को रसद पहुँचाने तथा घायल सैनिको की सेवा-सुश्रुषा का प्रबन्ध अपने हाथो में ले लिया। अंग्रेजी हुकूमत इनसे इतनी भयभीत हो गयी थी कि कालान्तर में उन्हें घर में नजरबन्द कर उन पर बम्बई छोड़ने और दिल्ली प्रवेश करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।

बेगम हजरत महल और रानी लक्ष्मीबाई द्वारा गठित सैनिक दल में तमाम महिलायें शामिल थीं। लखनऊ में बेगम हजरत महल द्वारा गठित महिला सैनिक दल का नेतृत्व रहीमी के हाथों में था, जिसने फौजी भेष अपनाकर तमाम महिलाओं को तोप व बन्दूक चलाना सिखाया। रहीमी की अगुवाई में इन महिलाओं ने अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया। लखनऊ की तवायफ हैदरीबाई के यहाँ तमाम अंग्रेज अफसर आते थे और कई बार क्रान्तिकारियों के खिलाफ योजनाओं पर बात किया करते थे। हैदरीबाई ने पेशे से परे अपनी देशभक्ति का परिचय देते हुये इन महत्वपूर्ण सूचनाओं को क्रान्तिकारियों तक पहुँचाया और बाद में वह भी रहीमी के सैनिक दल में शामिल हो गयी। ऐसी ही एक वीरांगना ऊदा देवी भी हुयीं, जिनके पति चिनहट की लड़ाई में शहीद हो गये थे। ऐसा माना जाता है कि डब्ल्यू.गार्डन अलक्जेंडर एवं तत्पश्चात क्रिस्टोफर हिबर्ट ने अपनी पुस्तक ‘द ग्रेट म्यूटिनी’ में सिकन्दरबाग के किले पर हमले के दौरान जिस वीरांगना के साहस का वर्णन किया है, वह ऊदा देवी ही थीं। ऊदा देवी ने पीपल के घने पेड़ पर छिपकर लगभग 32 अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया। अंग्रेज असमंजस में पड़ गये और जब हलचल होने पर कैप्टन वेल्स ने पेड़ पर गोली चलायी तो ऊपर से एक मानवाकृति गिरी। नीचे गिरने से उसकी लाल जैकेट का ऊपरी हिस्सा खुल गया, जिससे पता चला कि वह महिला है। उस महिला का साहस देख कैप्टन वेल्स की आँखे नम हो गयीं और उसने कहा कि यदि मुझे पता होता कि यह महिला है तो मैं कभी गोली नहीं चलाता। ऊदा देवी का जिक्र अमृतलाल नागर ने अपनी कृति ‘गदर के फूल’ में बाकायदा किया है। इसी तरह की एक वीरांगना आशा देवी थीं, जिन्होंने 8 मई 1857 को अंग्रेजी सेना का सामना करते हुये शहादत पायी। आशा देवी का साथ देने वाली वीरांगनाओं में रनवीरी वाल्मीकि, शोभा देवी, वाल्मीकि महावीरी देवी, सहेजा वाल्मीकि, नामकौर, राजकौर, हबीबा गुर्जरी देवी, भगवानी देवी, भगवती देवी, इन्द्रकौर, कुशल देवी और रहीमी गुर्जरी इत्यादि शामिल थीं। ये वीरांगनायें अंग्रेजी सेना के साथ लड़ते हुये शहीद हो गयीं।

बेगम हजरत महल के बाद अवध के मुक्ति संग्राम में जिस दूसरी वीरांगना ने प्रमुखता से भाग लिया, वे थीं गोण्डा से 40 किलोमीटर दूर स्थित तुलसीपुर रियासत की रानी राजेश्वरी देवी। राजेश्वरी देवी ने होपग्राण्ट के सैनिक दस्तों से जमकर मुकाबला लिया। अवध की बेगम आलिया ने भी अपने अद्भुत कारनामों से अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी। बेगम आलिया 1857 के एक वर्ष पूर्व से ही अपनी सेना में शामिल महिलाओं को शस्त्रकला का प्रशिक्षण देकर सम्भावित क्रान्ति की योजनाओं को मूर्तरूप देने में संलग्न हो गयी थीं। अपने महिला गुप्तचर के गुप्त भेदों के माध्यम से बेगम आलिया ने समय-समय पर ब्रिटिश सैनिकों से युद्ध किया और कई बार अवध से उन्हें भगाया। इसी प्रकार अवध के सलोन जिले में सिमरपहा के तालुकदार वसंत सिंह बैस की पत्नी और बाराबंकी के मिर्ज़ापुर रियासत की रानी तलमुंद कोइर भी इस संग्राम में सक्रिय रहीं। अवध के सलोन जिले में भदरी की तालुकदार ठकुराइन सन्नाथ कोइर ने विद्रोही नाजिम फजल अजीम को अपने कुछ सैनिक व तोपें, तो मनियारपुर की सोगरा बीबी ने अपने 400 सैनिक और दो तोपें सुल्तानपुर के नाजिम और प्रमुख विद्रोही नेता मेंहदी हसन को दी। इन सभी ने बिना इस बात की परवाह किये हुये कि उनके इस सहयोग का अंजाम क्या होगा, क्रान्तिकारियों को पूरी सहायता दी।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने महिलाओं की एक अलग टुकड़ी ‘दुर्गा दल’ बनायी थी। इसका नेतृत्व कुश्ती, घुड़सवारी और धनुर्विद्या में माहिर झलकारीबाई के हाथों में था। झलकारीबाई ने कसम उठायी थी कि जब तक झांसी स्वतंत्र नहीं होगी, न ही मैं श्रृंगार करूंगी और न ही सिन्दूर लगाऊँगी। अंग्रेजों ने जब झांसी का किला घेरा तो झलकारीबाई जोशो-खरोश के साथ लड़ी। चूँकि उसका चेहरा और कद-काठी रानी लक्ष्मीबाई से काफी मिलता-जुलता था, सो जब उसने रानी लक्ष्मीबाई को घिरते देखा तो उन्हें महल से बाहर निकल जाने को कहा और स्वयं घायल सिहंनी की तरह अंग्रेजों पर टूट पड़ी और शहीद हो गयीं। झलकारीबाई का जिक्र मराठी पुरोहित विष्णुराव गोडसे की कृति ‘माझा प्रवास’ में भी मिलता है। रानी लक्ष्मीबाई की सेना में जनाना फौजी इंचार्ज मोतीबाई और रानी के साथ चौबीस घंटे छाया की तरह रहनेवाली सुन्दर-मुन्दर और काशीबाई सहित जूही व दुर्गाबाई भी दुर्गा-दल की ही सैनिक थीं। इन सभी ने अपनी जान की बाजी लगाकर भी रानी लक्ष्मीबाई पर आंच नहीं आने दी और अन्तोगत्वा वीरगति को प्राप्त हुयीं।

कानपुर 1857 की क्रान्ति का प्रमुख गवाह रहा है। पेशे से तवायफ अजीजनबाई ने यहाँ क्रान्तिकारियों की संगत में 1857 की क्रान्ति में लौ जलायी। 1 जून 1857 को जब कानपुर में नाना साहब के नेतृत्व में तात्या टोपे, अजीमुल्ला खान, बालासाहब, सूबेदार टीका सिंह व शमसुद्दीन खान क्रान्ति की योजना बना रहे थे तो उनके साथ उस बैठक में अजीजनबाई भी थीं। इन क्रान्तिकारियों की प्रेरणा से अजीजन ने मस्तानी टोली के नाम से 400 वेश्याओं की एक टोली बनायी जो मर्दाना भेष में रहती थीं। एक तरफ ये अंग्रेजों से अपने हुस्न के दम पर राज उगलवातीं, वहीं नौजवानों को क्रान्ति में भाग लेने के लिये प्रेरित करतीं। सतीचौरा घाट से बचकर बीबीघर में रखी गयी 125 अंग्रेज महिलाओं व बच्चों की रखवाली का कार्य अजीजनबाई की टोली के ही जिम्मे था। बिठूर के युद्ध में पराजित होने पर नाना साहब और तात्या टोपे तो पलायन कर गये लेकिन अजीजन पकड़ी गयी। युद्धबंदी के रूप में उसे जनरल हैवलाक के समक्ष प्रस्तुत किया गया। जनरल हैवलाक उसके सौन्दर्य पर रीझे हुए बिना न रह सका और प्रस्ताव रखा कि यदि वह अपनी गलतियों को स्वीकार कर क्षमा माँग ले तो उसे माफ कर दिया जायेगा। पर अजीजन ने एक वीरांगना की भाँति उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया और पलट कर कहा कि माफी तो अंग्रेजों को माँगनी चाहिए, जिन्होंने इतने जुल्म ढाये। इतने पर आग बबूला हो हैवलाक ने अजीजन को गोली मारने के आदेश दे दिये। क्षण भर में ही अजीजन का अंग-प्रत्यंग धरती माँ की गोद में सो गया। इतिहास में दर्ज़ है कि-‘‘बगावत की सजा हँस कर सह ली अजीजन ने, लहू देकर वतन को।’’ कानपुर के स्वाधीनता संग्राम में मस्तानीबाई की भूमिका भी कम नहीं है। बाजीराव पेशवा के लश्कर के साथ ही मस्तानीबाई बिठूर आई थी। अप्रतिम सौन्दर्य की मलिका मस्तानीबाई अंग्रेजों का मनोरंजन करने के बहाने उनसे खुफिया जानकारी हासिल कर पेशवा को देती थी। नाना साहब की मुँहबोली बेटी मैनावती भी देशभक्ति से भरपूर थी। जब नाना साहब बिठूर से पलायन कर गये तो मैनावती यहीं रह गयी। जब अंग्रेज नाना साहब का पता पूछने पहुँचे तो मौके पर 17 वर्षीया मैनावती ही मिली। नाना साहब का पता न बताने पर अंग्रेजों ने मैनावती को आग में जिन्दा ही जला दिया।

ऐसी ही न जाने कितनी दास्तानें हैं, जहाँ वीरांगनाओं ने अपने साहस व जीवट के दम पर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये। मध्यप्रदेश में रामगढ़ की रानी अवन्तीबाई ने 1857 के संग्राम के दौरान अंग्रेजों का प्रतिकार किया और घिर जाने पर आत्मसमर्पण करने की बजाय स्वयं को खत्म कर लिया। मध्य प्रदेश में ही जैतपुर की रानी ने अपनी रियासत की स्वतंत्रता की घोषणा कर दतिया के क्रान्तिकारियों को लेकर अंग्रेजी सेना से मोर्चा लिया। तेजपुर की रानी भी इस संग्राम में जैतपुर की रानी की सहयोगी बनकर लड़ीं। मुजफ्फरनगर के मुंडभर की महावीरी देवी ने 1857 के संग्राम में 22 महिलाओं के साथ मिलकर अंग्रेजों पर हमला किया। अनूप शहर की चौहान रानी ने घोड़े पर सवार होकर हाथों में तलवार लिये अंग्रेजों से युद्ध किया और अनूप शहर के थाने पर लगे यूनियन जैक को उतार कर वीरांगना चौहान रानी ने हरा राष्ट्रीय झंडा फहरा दिया। इतिहास गवाह है कि 1857 की क्रान्ति के दौरान दिल्ली के आस-पास के गाँवों की लगभग 255 महिलाओं को मुजफ्फरनगर में गोली से उड़ा दिया गया था।

1857 के बाद अनवरत चले स्वतंत्रता आन्दोलन में भी महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया। 1905 के बंग-भंग आन्दोलन में पहली बार महिलाओं ने खुलकर सार्वजनिक रूप से भाग लिया था। स्वामी श्रद्धानन्द की पुत्री वेद कुमारी और आज्ञावती ने इस आन्दोलन के दौरान महिलाओं को संगठित किया और विदेशी कपड़ो की होली जलाई। कालान्तर में 1930 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान वेद कुमारी की पुत्री सत्यवती ने भी सक्रिय भूमिका निभायी। सत्यवती ने 1928 में साइमन कमीशन के दिल्ली आगमन पर काले झण्डों से उसका विरोध किया था। 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान ही अरुणा आसफ अली तेजी से उभरीं और इस दौरान अकेले दिल्ली से 1600 महिलाओं ने गिरफ्तारी दी। गाँधी इरविन समझौते के बाद जहाँ अन्य आन्दोलनकारी नेता जेल से रिहा कर दिये गये थे वहीं अरुणा आसफ अली को बहुत दबाव पर बाद में छोड़ा गया। सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान जब सभी बड़े नेता गिरफ्तार कर लिये गये, तो कलकत्ता के कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता एक महिला नेली सेनगुप्त ने की। क्रान्तिकारी आन्दोलन में भी महिलाओं ने भागीदारी की। 1912-14 में बिहार में जतरा भगत ने जनजातियों को लेकर टाना आन्दोलन चलाया। उनकी गिरफ्तारी के बाद उसी गाँव की महिला देवमनियां उरांइन ने इस आन्दोलन की बागडोर सँभाली। 1931-32 के कोल आन्दोलन में भी आदिवासी महिलाओं ने सक्रिय भूमिका निभायी थी। स्वाधीनता की लड़ाई में बिरसा मुण्डा के सेनापति गया मुण्डा की पत्नी ‘माकी’ बच्चे को गोद में लेकर फरसा-बलुआ से अंग्रेजों से अन्त तक लड़ती रहीं। 1930-32 में मणिपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व नागा रानी गुइंदाल्यू ने किया। इनसे भयभीत अंग्रेजों ने इनकी गिरफ्तारी पर पुरस्कार की घोषणा की और कर माफ करने के आश्वासन भी दिये। 1930 में बंगाल में सूर्यसेन के नेतृत्व में हुये चटगाँव विद्रोह में युवा महिलाओं ने पहली बार क्रान्तिकारी आन्दोलनों में स्वयं भाग लिया। ये क्रान्तिकारी महिलायें क्रान्तिकारियों को शरण देने, संदेश पहुँचाने और हथियारों की रक्षा करने से लेकर बन्दूक चलाने तक में माहिर थीं। इन्हीं में से एक प्रीतिलता वाडेयर ने एक यूरोपीय क्लब पर हमला किया और कैद से बचने हेतु आत्महत्या कर ली। कल्पनादत्त को सूर्यसेन के साथ ही गिरफ्तार कर 1933 में आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी और 5 साल के लिये अण्डमान की काल कोठरी में कैद कर दिया गया। दिसम्बर 1931 में कोमिल्ला की दो स्कूली छात्राओं- शान्ति घोष और सुनीति चौधरी ने जिला कलेक्टर को दिनदहाड़े गोली मार दी जिस पर उन्हें काला पानी की सजा हुई तो 6 फरवरी 1932 को बीना दास ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में उपाधि ग्रहण करने के समय गवर्नर पर बहुत नजदीक से गोली चलाकर अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी। सुहासिनी अली तथा रेणुसेन ने भी अपनी क्रान्तिकारी गतिविधियों से 1930-34 के मध्य बंगाल में धूम मचा दी थी।

चन्द्रशेखर आजाद के अनुरोध पर ‘दि फिलासाफी आफ बम’ दस्तावेज तैयार करने वाले क्रान्तिकारी भगवतीचरण वोहरा की पत्नी ‘दुर्गा भाभी’ नाम से मशहूर दुर्गा देवी बोहरा ने भगत सिंह को लाहौर जिले से छुड़ाने का प्रयास किया। 1928 में जब अंग्रेज अफसर साण्डर्स को मारने के बाद भगत सिंह व राजगुरु लाहौर से कलकत्ता के लिए निकले, तो कोई उन्हें पहचान न सके इसलिए दुर्गा भाभी की सलाह पर एक सुनियोजित रणनीति के तहत भगत सिंह पति, दुर्गा भाभी उनकी पत्नी और राजगुरु नौकर बनकर वहाँ से निकल लिये। 1927 में लाला लाजपतराय की मौत का बदला लेने के लिये लाहौर में बुलायी गई बैठक की अध्यक्षता दुर्गा भाभी ने की। बैठक में अंग्रेज पुलिस अधीक्षक जे0ए0 स्काट को मारने का जिम्मा वे खुद लेना चाहती थीं, पर संगठन ने उन्हें यह जिम्मेदारी नहीं दी। बम्बई के गवर्नर हेली को मारने की योजना में टेलर नामक एक अंग्रेज अफसर घायल हो गया, जिसपर गोली दुर्गा भाभी ने ही चलायी थी। इस केस में उनके विरुद्ध वारण्ट भी जारी हुआ और दो वर्ष से ज्यादा समय तक फरार रहने के बाद 12 सितम्बर 1931 को दुर्गा भाभी लाहौर में गिरफ्तार कर ली गयीं। क्रान्तिकारी आन्दोलन के दौरान सुशीला दीदी ने भी प्रमुख भूमिका निभायी और काकोरी काण्ड के कैदियों के मुकदमे की पैरवी के लिए अपनी स्वर्गीय माँ द्वारा शादी की खातिर रखा 10 तोला सोना उठाकर दान में दिया। यही नहीं उन्होंने क्रान्तिकारियों का केस लड़ने हेतु ‘मेवाड़पति’ नामक नाटक खेलकर चन्दा भी इकट्ठा किया। 1930 के सविनय अविज्ञा आन्दोलन में ‘इन्दुमति‘ के छद्म नाम से सुशीला दीदी ने भाग लिया और गिरफ्तार हुयीं। इसी प्रकार हसरत मोहानी को जब जेल की सजा मिली तो उनके कुछ दोस्तों ने जेल की चक्की पीसने के बजाय उनसे माफी मांगकर छूटने की सलाह दी। इसकी जानकारी जब बेगम हसरत मोहानी को हुई तो उन्होंने पति की जमकर हौसला आफजाई की और दोस्तों को नसीहत भी दी। मर्दाना वेष धारण कर उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में खुलकर भाग लिया और बाल गंगाधर तिलक के गरम दल में शामिल होने पर गिरफ़्तार कर जेल भेज दी गयी, जहाँ उन्होंने चक्की भी पीसी। यही नहीं महिला मताधिकार को लेकर 1917 में सरोजिनी नायडू के नेतृत्व में वायसराय से मिलने गये प्रतिनिधिमण्डल में वह भी शामिल थीं।

1925 में कानपुर में हुये कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता कर ‘भारत कोकिला’ के नाम से मशहूर सरोजिनी नायडू को कांग्रेस की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष बनने का गौरव प्राप्त हुआ। सरोजिनी नायडू ने भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास में कई पृष्ठ जोड़े। कमला देवी चट्टोपाध्याय ने 1921 में असहयोग आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। इन्होंने बर्लिन में अन्तर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व कर तिरंगा झंडा फहराया। 1921 के दौर में अली बन्धुओं की माँ बाई अमन ने भी लाहौर से निकल तमाम महत्वपूर्ण नगरों का दौरा किया और जगह-जगह हिन्दू-मुस्लिम एकता का संदेश फैलाया। सितम्बर 1922 में बाई अमन ने शिमला दौरे के समय वहाँ की फैशनपरस्त महिलाओं को खादी पहनने की प्रेरणा दी। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में भी महिलाओं ने प्रमुख भूमिका निभायी। अरुणा आसफ अली व सुचेता कृपलानी ने अन्य आन्दोलनकारियों के साथ भूमिगत होकर आन्दोलन को आगे बढ़ाया तो ऊषा मेहता ने इस दौर में भूमिगत रहकर कांग्रेस-रेडियो से प्रसारण किया। अरुणा आसफ अली को तो 1942 में उनकी सक्रयि भूमिका के कारण ‘दैनिक ट्रिब्यून’ ने ‘1942 की रानी झाँसी’ नाम दिया। अरुणा आसफ अली ‘नमक कानून तोड़ो आन्दोलन’ के दौरान भी जेल गयीं। 1942 के आन्दोलन के दौरान ही दिल्ली में ‘गर्ल गाइड‘ की 24 लड़कियाँ अपनी पोशाक पर विदेशी चिन्ह धारण करने तथा यूनियन जैक फहराने से इनकार करने के कारण अंग्रेजी हुकूमत द्वारा गिरफ्तार हुईं और उनकी बेदर्दी से पिटाई की गयी। इसी आन्दोलन के दौरान तमलुक की 73 वर्षीया किसान विधवा मातंगिनी हाजरा ने गोली लग जाने के बावजूद राष्ट्रीय ध्वज को अन्त तक ऊँचा रखा।

महिलाओं ने परोक्ष रूप से भी स्वतंत्रता संघर्ष में प्रभावी भूमिका निभा रहे लोगों को सराहा। सरदार वल्लभ भाई पटेल को ‘सरदार’ की उपाधि बारदोली सत्याग्रह के दौरान वहाँ की महिलाओं ने ही दी। महात्मा गाँधी को स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान उनकी पत्नी कस्तूरबा गाँधी ने पूरा समर्थन दिया। उनकी नियमित सेवा व अनुशासन के कारण ही महात्मा गाँधी आजीवन अपने लम्बे उपवासों और विदेशी चिकित्सा के पूर्ण निषेध के बावजूद स्वस्थ रहे। अपने व्यक्तिगत हितों को उन्होंने राष्ट्र की खातिर तिलांजलि दे दी। भारत छोड़ो आन्दोलन प्रस्ताव पारित होने के बाद महात्मा गाँधी को आगा खाँ पैलेस (पूना) में कैद कर लिया गया। कस्तूरबा गाँधी भी उनके साथ जेल गयीं। डा0 सुशीला नैयर, जो कि गाँधी जी की निजी डाक्टर भी थीं, भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान 1942-44 तक महात्मा गाँधी के साथ जेल में रहीं।

इन्दिरा गाँधी ने 6 अप्रैल 1930 को बच्चों को लेकर ‘वानर सेना’ का गठन किया, जिसने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अपना अद्भुत योगदान दिया। यह सेना स्वतंत्रता सेनानियों को सूचना देने और सूचना लेने का कार्य करती व हर प्रकार से उनकी मदद करती। विजयलक्ष्मी पण्डित भी गाँधी जी से प्रभावित होकर जंग-ए-आजादी में कूद पड़ीं। वह हर आन्दोलन में आगे रहतीं, जेल जातीं, रिहा होतीं, और फिर आन्दोलन में जुट जातीं। 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ के सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन में विजयलक्ष्मी पण्डित ने भारत का प्रतिनिधित्व भी किया। सुभाषचन्द्र बोस की ‘‘आरजी हुकूमते आजाद हिन्द सरकार’’ में महिला विभाग की मंत्री तथा आजाद हिन्द फौज की रानी झांसी रेजीमेण्ट की कमाडिंग आफिसर रहीं कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने आजादी में प्रमुख भूमिका निभायी। सुभाषचन्द्र बोस के आहवान पर उन्होंने सरकारी डाक्टर की नौकरी छोड़ दी। कैप्टन सहगल के साथ आजाद हिन्द फौज की रानी झांसी रेजीमेण्ट में लेफ्टिनेण्ट रहीं ले0 मानवती आर्या ने भी सक्रिय भूमिका निभायी। अभी भी ये दोनों सेनानी कानपुर में तमाम रचनात्मक गतिविधियों में सक्रिय हैं।

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की गूँज भारत के बाहर भी सुनायी दी। विदेशों में रह रही तमाम महिलाओं ने भारतीय संस्कृति से प्रभावित होकर भारत व अन्य देशों में स्वतंत्रता आन्दोलन की अलख जगायी। लन्दन में जन्मीं एनीबेसेन्ट ने ‘न्यू इण्डिया’ और ‘कामन वील’ पत्रों का सम्पादन करते हुये आयरलैण्ड के ‘स्वराज्य लीग’ की तर्ज़ पर सितम्बर 1916 में ‘भारतीय स्वराज्य लीग’ (होमरूल लीग) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य स्वशासन स्थापित करना था। एनीबेसेन्ट को कांग्रेस की प्रथम महिला अध्यक्ष होने का गौरव भी प्राप्त है। एनीबेसेन्ट ने ही 1898 में बनारस में सेन्ट्रल हिन्दू कालेज की नींव रखी, जिसे 1916 में महामना मदनमोहन मालवीय ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के रूप में विकसित किया। भारतीय मूल की फ्रांसीसी नागरिक मैडम भीकाजी कामा ने लन्दन, जर्मनी तथा अमेरिका का भ्रमण कर भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में माहौल बनाया। उनके द्वारा पेरिस से प्रकाशित ‘वन्देमातरम्’ पत्र प्रवासी भारतीयों में काफी लोकप्रिय हुआ। 1909 में जर्मनी के स्टटगार्ट में हुयी अन्तर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस में मैडम भीकाजी कामा ने कहा कि - ‘‘भारत में ब्रिटिश शासन जारी रहना मानवता के नाम पर कलंक है। एक महान देश भारत के हितों को इससे भारी क्षति पहुँच रही है।’’ उन्होंने लोगों से भारत को दासता से मुक्ति दिलाने में सहयोग की अपील की और भारतवासियों का आह्वान किया कि - ‘‘आगे बढ़ो, हम हिन्दुस्तानी हैं और हिन्दुस्तान हिन्दुस्तानियों का है।’’ यही नहीं मैडम भीकाजी कामा ने इस कांफ्रेंस में ‘वन्देमातरम्’ अंकित भारतीय ध्वज फहरा कर अंग्रेजों को कड़ी चुनौती दी। मैडम भीकाजी कामा लन्दन में दादाभाई नौरोजी की प्राइवेट सेक्रेटरी भी रहीं। आयरलैंड की मूल निवासी और स्वामी विवेकानन्द की शिष्या मारग्रेट नोबुल (भगिनी निवेदिता) ने भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में तमाम मौकों पर अपनी सक्रियता दिखायी। कलकत्ता विश्वविद्यालय में 11 फरवरी 1905 को आयोजित दीक्षान्त समारोह में वायसराय लार्ड कर्ज़न द्वारा भारतीय युवकों के प्रति अपमानजनक शब्दों का उपयोग करने पर भगिनी निवेदिता ने खड़े होकर निर्भीकता के साथ प्रतिकार किया। इंग्लैण्ड के ब्रिटिश नौसेना के एडमिरल की पुत्री मैडेलिन ने भी गाँधी जी से प्रभावित होकर भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया। ‘मीरा बहन’ के नाम से मशहूर मैडेलिन भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान महात्मा गाँधी के साथ आगा खाँ महल में कैद रहीं। मीरा बहन ने अमेरिका व ब्रिटेन में भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में माहौल बनाया। मीरा बहन के साथ-साथ ब्रिटिश महिला म्यूरियल लिस्टर भी गाँधी जी से प्रभावित होकर भारत आयीं और अपने देश इंग्लैण्ड में भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में माहौल बनाने का प्रयास किया। द्वितीय गोलमेज कांफ्रेन्स के दौरान गाँधी जी इंग्लैण्ड में म्यूरियल लिस्टर द्वारा स्थापित ‘किंग्सवे हाल’ में ही ठहरे थे। इस दौरान म्यूरियल लिस्टर ने गाँधी जी के सम्मान में एक भव्य समारोह भी आयोजित किया था।

इन वीरांगनाओं के अनन्य राष्ट्रप्रेम, अदम्य साहस, अटूट प्रतिबद्धता और उनमें से कइयों का गौरवमयी बलिदान भारतीय इतिहास की एक जीवन्त दास्तां है। हो सकता है उनमें से कइयों को इतिहास ने विस्मृत कर दिया हो, पर लोक चेतना में वे अभी भी मौजूद हैं। ये वीरांगनायें प्रेरणा स्रोत के रूप में राष्ट्रीय चेतना की संवाहक हैं और स्वतंत्रता संग्राम में इनका योगदान अमूल्य एवं अतुलनीय है।

Monday, August 9, 2010

बेवफा और छिनाल औरतें

जब स्त्री की बात हो तो सामान्य और समान के मापदण्ड अचानक से बदल जाते हैं।अपने मनुष्य होने के अहसास और स्त्री 'बनने' की प्रक्रिया का विश्लेषण करना शुरु करे तो स्त्री और स्त्री आन्दोलनो पर हमले और भी तीखे और तेज़ हो जाते है। कहीं और क्यों जाएँ , हमने ब्लॉग पर ही देखा है। .....वालियाँ आ जाएंगी या, उछलने वाली औरतें , में रेड लाइट एरिया खोलने वाली औरतें ......भ्रष्ट औरतें .....जाने क्या क्या सम्बोधन चोखेर् बाली ने अपनी शुरुआत से ही सुने हैं।अचरज नही होता कि भला से भला , पढा लिखा ,समझदार दिखने वाला पुरुष भी आज की स्त्री के बदलते तेवरों से आक्रांत महसूस करता है और असंतुलित होकर कैसी भी गाली दे जाता है।
इसलिए राय साहब ने जो कहा उसमे भी अचरज नही । ज़रूरी केवल यह है कि राय साहेब को याद दिलाया जाए कि कम से कम पब्लिकली बोलते हुए अपनी भाषा और विचारों को एक लोकतांत्रिक बाना पहनाना सीखें ।संस्कार तो शायद हम ऐसेकई राय साहबों के नही बदल पाएंगे ,ये तो सदियों के प्रशिक़्क्षण के बाद मिले हैं उन्हें , जाते जाते सदियाँ ही लगेंगी पर ज़बान पर तो नियंत्रण रखना ही होगा उन्हें अपने निजी समय व स्पेस मे वे स्त्री को क्या क्या और किस वजह से कहते हैं इस पर शायद किसी की रोक नही।जिसे प्रभु जोशी वी एन राय की नीयत की नही भाषा की असावधानी बता रहे हैं उन्हें भी यह समझना होगा कि भाषा और विचार मे कभी द्वैत होता है यह मानना धोखा है , अनाड़ीपन है।भाषिक विकास के साथ साथ वैचारिक विकास भी होता है।इसलिए मानना होगा कि ऐसी भाषा प्रयोग करने वाले का वैचारिक विकास भी अभी नही हुआ है।भाषा के संस्कार , व्यवहार (या कहें नियंत्रण ) की उन जैसे पढे लिखे कुलपति से पूरी उम्मीद थी यह बात गलत नही है और इसलिए राह चलते किसी लफंगे के मुँह से यही बात सुनकर हम बवाल न मचाते।
भाषा मे छिपी स्त्री के प्रति यह हिंसा न केवल स्त्री की स्वतंत्रता को चुनौती है बल्कि यह अपने पतित होने , बेशर्म होने , अलोकतांत्रिक होने ,सामंती होने का सगर्व उद्घोष भी है।यह चुनौती है हर उस स्त्री को जो स्वयम को मनुष्य समझती है , अभिव्यक्त कर सकती है ,विचार-विश्लेषण करती है ,व्यवस्था पर टिप्पणी करती है जो अपनी रायशुमारी चाहती है .....जो अपनी तरह से जीना चाहती है और इसलिए बदचलन करार दी जाती है। स्त्रियाँ जब तक पितृसत्ता के बस मे रहती है उसके लिए करणीय-अकरणीय के दायरे घर-समाज के पुरुष खींचते हैं।जब वह खुद सोचती समझती है और अपने दायरे खुद बनाती है तो इसे सराहने के बजाए बहुत आसानी से कह दिया जाता है कि वह छिनाल है।
अपने एक हालिया लेख मे मैत्रेयी पुष्पा पूछती हैं कि क्या वी एन राय ने लेखिकाओं से माफी मांगी है, क्या उन्हे अपनी गलती का एहसास हुआ है, क्या वे अपने किए पर शर्मिन्दा हैं?
मै हैरान हूँ । कम से कम मैत्रेयी जी को राय साहेब से ऐसी उम्मीद नही रखनी चाहिए थी कि वे शर्मिन्दा होते।यह अपनी गलती मानने , शर्मिन्दा होने का प्रश्न नही है । एक प्रबुद्ध स्त्री समुदाय के प्रति बेखौफ , साहसी अन्दाज़ मे गाली देते हुए राय साहेब से आप शर्मिन्दा होने की उम्मीद नही कर सकते। यह तो रगों मे जो दौड़ता है वही ज़बान से फूट पड़ता है वाला मसला है।इतनी छीछालेदर के बाद उन्होंने अकेले मे गम गलत करते हुए कितनी गालियाँ लेखिकाओं को दी होंगी मै कल्पना कर सकती हूँ।झूठ ही शर्मिन्दा न हों , बस खुद को काबू मे रखें इतनी ही उम्मीद मुझे है।सदियों की सत्ता उखड़ती देख कर कोई भी बौखला सकता है, प्रलाप कर सकता है।शर्मिन्दा होकर विभूतियों की निर्मिति बदल जाएगी यह सोचना दिवास्वप्न ही है ।जब तक समाज की ही निर्मिति नही बदल जाएंगी तब तक ऐसी भाषा का प्रयोक्ता भी नही बदलेगा और लक्ष्य भी !

Monday, July 12, 2010

किसी भी वक्त घर से निकलना मेरा मानवाधिकार है

जानी-मानी फोटोजर्नलिस्ट सर्वेश ने अपने एक टीवी इंटरव्यू में जोरदार टिप्पणी की।

टीवी ऐंकर का आम-सा सवाल था कि एक महिला होने के नाते इस प्रोफेशन में कोई अड़चन नहीं आती जब उन्हें रात-बिरात अनजानी-अजीब सी जगहों पर भी कवरेज के लिए जाना पड़ता है?

इस पर सर्वेश ने कहा कि रात में भी अकेले काम पर निकलना पड़े तो डर उन्हें बिल्कुल नहीं लगता। सर्वेश के आगे के तर्क लाजवाब कर देने वाले थे- "यह डर वास्तव में समाज-परिवार जबर्दस्ती स्त्री के मन में भरता है। किसी भी वक्त घर जाना या घर से निकलना, कहीं भी जाना हर व्यक्ति का मानवाधिकार है। विना तकनीकी वजह के किसी के लिए ये पाबंदियां मजबूरी में या जबर्दस्ती सोची या लागू की जाती हैं तो यह उसके मानवाधिकार पर चोट है।"

“बलात्कारी के डर से घर से मत निकलो, ऐसा कहने की बजाए बलात्कारी को क्यों नहीं रोका जाता कि तुम बलात्कार न करो?!”


नेट से चुराई हुई सर्वेश की खींची एक तसवीर।



बाकी उनके ब्लॉग सर्वेश फोटोवाली पर पहुंचकर जाना जा सकता है कि उनका कैमरा कहां तक पहुंचा है।

Tuesday, July 6, 2010

धोनी की शादी के मायने

बिलकुल नयी सूचना है, धोनी ने रविवार को अपनी बचपन कि दोस्त साक्षी रावत से विवाह कर लिया। इसके पहले उनके ढेर सारे प्रेम प्रसंग चर्चा में रहे । मुख्य रूप से 'दीपिका पादुकोण' और हाल फिलहाल 'आसिन' से। हमेशा ही ऐसा लगता रहा कि धोनी किसी चर्चित चेहरे से ही विवाह करेंगे लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत। धोनी ने चुनी एक बिलकुल नामालूम सी लड़की। शायद - एक 'हाउस वाइफ'। क्यों? क्या यह फिर से एक बार पुरुषों की "हीन भावना" का मामला है?

प्रेम करने - या फिर कहें मस्ती मारने- तक ऐसी लड़की चलती है जो चर्चित हों। इससे उनकी अहंकार भावना तुष्ट होती रही कि देखो इतनी खूबसूरत और इतनी मशहूर, हज़ारो लाखों की स्वप्न सुंदरी मुझपर मर रही है। लेकिन जब विवाह करने का समय आया तो उन्हें एक घरेलू सी लड़की ही जंची। जिसे कोई नहीं जानता था। निश्चित रूप से किसी फिल्म अभिनेत्री कि अपेक्षा एक 'अनाघ्रात पुष्प' एक 'असूर्यपश्या'। स्पष्ट है कि आजकल किसी फिल्म अभिनेत्री के शरीर का अधिकांश हिस्सा नुमाया ही रहता है- तो मित्रों कि दबी हँसी का खतरा रहता - और मशहूर रहने के कारण भविष्य में थोड़ी बहुत बहुत टकराव की भी आशंका रहती। जाहिर है धोनी ने संभवतः दोनों ही आशकाओं से मुक्ति पा ली है॥

Friday, June 11, 2010

तलाक की राह आसान

सुना है तलाक अब आसान हो जायेंगे. तलाक आज के दौर की जरूरत बन चुके हैं, सो अदालत को लगता है कि उसकी राह की अड़चनों को भी कम किया जाना चाहिए. अदालत को यह भी लगता है कि इससे जिंदगी कुछ आसान हो जायेगी. ऐसा हो भी सकता है. आखिर हर पल बूंद-बूंद रिसते हुए रिश्तों से निजात पाने में बुराई ही क्या है.

सुनने में कुछ अजीब लग सकता है, (नहीं भी लग सकता है) कि पिछले बरस मैंने जिंदगी में पहली बार एक डिवोर्स पार्टी में शिरकत की थी. तलाक आपसी रजामंदी से हुआ था, सो वर-वधू ने अपने कुछ निकट दोस्तों को बुलाकर खुशी-खुशी एक-दूसरे से अलग होने की इत्तला दी थी. मौका थोड़ा अजीब था लेकिन उस छोटी सी पार्टी का माहौल बहुत ही सुलझा हुआ. दोनों को देखकर बिलकुल भी बेचारगी का अनुभव नहीं हो रहा था. उन दोनों का कहना यही था कि हमें जल्दी ही समझ में आ गया कि हम एक-दूसरे के लिए नहीं बने हैं और हमने एक-दूसरे को समझने में भूल की है. रोज-रोज एक-दूसरे से उलझने और फ्रस्टेशन निकालने से बेहतर है राजी-खुशी अलग हुआ जाए और जिंदगी को बेहतर ढंग से जिया जाए.

उनका तलाक शादी के दो साल बाद फाइल हुआ था और उन्हें तलाक मिलने में 3 साल लगे. वकीलों के मुताबिक उन्हें तलाक जल्दी मिल गया. ऐसे मामलों के बारे में सोचती हूं तो लगता है कि अच्छा ही है कि तलाक की प्रक्रिया आसान हुई. बंधनों से आजाद होना जितना आसान होगा, उतना ही ठीक होगा. लेकिन सवाल यह है कि क्या इस सहूलियत का इकतरफा इस्तेमाल नहीं किया जायेगा. दूसरे विवाह के इच्छुक पति अब आसानी से पहली पत्नी से मुक्ति पा सकेंगे. हमारे यहां कानूनों का ठीक-ठीक फायदा उठाने के मामले में स्त्रियां कितना पीछे हैं, यह किसी से छुपा नहीं है. हर वो कानून जो स्त्रियों के हित के न$जरिये से आता है न जाने कब और कैसे उनके ही खिलाफ खड़ा होने लगता है. कानूनों के मिसयूज की दुहाई देकर समाज उन कानूनों के खिलाफ खड़ा होने लगता है. उदाहरण के लिए डाउरी एक्ट 498 ए को देखा जा सकता है.

सवाल यह है कि क्या हम कानूनों का सही-सही उपयोग करने के लिए भी तैयार नहीं हैं या इन कानूनों में ही कुछ अधूरापन है. लिवइन रिलेशन वाले मामले में अभी कानूनी पेच चल ही रहे हैं कि कितनी वैधानिकता मिलेगी, कब कोई रिश्ता प्रेम की दहलीज लांघकर शोषण की दहलीज में शामिल हो जायेगा. क्या होगा लिवइन रिलेशन से जन्मे बच्चों का, वगैरह. डोमेस्टिक वायलेंस कानून का कितना यूज हो पा रहा है हम जानते ही हैं. हाल ही में आये एक सर्वे में साफ हुआ कि किस तरह महिलाएं पति की मार को उनका हक और प्रेम मानती हैं. ऐसी हालत में कितना कारगर है डोमेस्टिक वायलेंस लॉ. फैमिली कोर्ट की हमारी एक साथी ने बताया कि महिलाएं डरती हैं कि अगर पति, सास या ससुर के खिलाफ डोमेस्टिक वायलेंस का सहारा लिया तो बाद में उनका क्या होगा. कानून हर वक्त तो उनके साथ खड़ा न होगा, जबकि उसे रहना उन्हीं लोगों के बीच है.

बहुत सारे कानूनों से जुड़े बहुत सारे सवाल हैं. लेकिन इन सब सवालों से बड़ा है ये सवाल कि रिश्तों में कानूनों के दखल की जरूरत किस कारण से आई. और अगर आ भी गई है तो उसका इंटरफियरेंस कितना हो, इसे कौन तय करेगा. कानून रिश्तों को सहूलियत देने के लिए बनते हैं लेकिन उस सहूलियत को कितना लिया जा रहा है. इसके पहले कि कानून स्त्रियों के हमसफर बनें, उनके मिसयूज के मामले सामने आने लगते हैं. स्त्रियों के हाथ खाली के खाली. दूसरे, मिसयूज वाले मामलों को इतना हाईलाइट किया जाता है कि लगता है कि सारे कानूनों ने स्त्रियों को आजादी देकर समाज का सर्वनाश कर दिया है. अब भी स्त्रियों को, हर तबके की स्त्रियों को अपने लिए बने कानूनों के बारे में जानने की जरूरत है, उनके महत्व को समझने की जरूरत है और उनका वक्त आने पर सही इस्तेमाल करने की जरूरत भी है.

तलाक बुरी बात नहीं है. लेकिन तलाक कोई खेल भी नहीं है. अदालत का यह फैसला आया तो इसीलिए है कि रिश्तों के नासूर को झेल रहे लोगों को राहत की सांस मिले, देखते हैं क्या होता है.

Wednesday, May 26, 2010

विरोध के "हथियार' - ब्लॉग,फेसबुक ,इंटरनेट .......

मनीषा

शिकागो की जैन मैकराइट ने ईरानी धर्म गुरु का विरोध शुरू करके फेसबुक पर अपनी तरह का आंदोलन ही चला दिया है। इस धर्माधिकारी ने कहा था कि औरतों के उघड़े बदन को देखकर ईश्वर नाराज हो जाता है और इससे जलजले आते हैं। इसका विरोध छुटपुट रूप में कई जगह दिखा। विद्रोही किस्म की औरतों ने इसके विरोध में ब्लॉग भी लिखे पर जैन की मानसिक रूप से झकझोरने वाली राय को हफ्ते भर में दो लाख सपोर्टर मिले। यह देखकर सीएनएन, बीबीसी, फॉक्स सब हैरान हैं। "बूब क्वेक' के नाम से चलाये जा रहे इस विरोध पर दुनिया भर में गर्मागर्म कमेंट्स औरतों के उग्र तेवर से परंपरावादियों की बोलती बन्द करवाते जा रहे हैं। रियल बूब क्वेक (8 पोस्ट), गो टॉपलेस (24), द बूबक्वेक (71), डिबंकिंग इरानियन क्लरिक नॉनसेंस (71), द टØथ अबाउट ईरान (36), च्वाइस ऑफ सेंसरशिप (56), इस्लाम विल लूज(246), व्हाट एग्जेक्टली बूब क्वेक (50 पोस्ट) बताने के लिए काफी हैं कि पुरातन पंथ पर झाड़ू फेरने वाली फौज को रोकना आसान नहीं है। सामाजिक क्रांति का इससे बहतर कोई उदाहरण नहीं हो सकता। दुनिया भर की औरतें "बहनापे' को लेकर केवल संवेदनशील ही नहीं हो रही हैं, वे यह भी दिखा दे रही हैं कि औरतों के नाम पर होने वाले सम्मेलनों की बजाय मानसिक रूप से एक होने का असर ज्यादा होता है। "बूब क्वेक' को पसंद बताने वालों की संख्या एक लाख से ऊपर नजर आना कोई हंसी-खेल नहीं है। यह शुद्ध रूप से दकियानूस विचारधारा का विरोध है, जिसे कोई राजनैतिक रंग नहीं दिया जा सकता।

वह समय आ चुका है, जो खुलकर कह रहा है कि औरतों के कटावों और उभारों पर वारी जाने वाली दुनिया में पर्दे के लिए कोई जगह नहीं है। उत्तरी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका की तमाम पारंपरिक संस्कृतियों में आज भी टॉपलेस को बुरा नहीं माना जाता। दुनिया भर की तमाम संस्कृतियों में पूजी जाने वाली देवियों को टॉपलेस ही माना गया है, उनको देखकर किसी ईश्वर प्रेमी के दिमाग की नसें नहीं फटीं। ना ही ऐसा कोई जलजला आया, जिसने दुनिया तबाह कर डाली हो। उन्नीसवीं सदी में यूरोप में संभ्रांत घरों की औरतें अपने सौंदर्य का प्रदर्शन करने के लिए घुटनों से नीचे और सीने को खुला ही रखती थी, क्योंकि तब यह स्टेटस सिंबल हुआ करता था। स्विम सूट और बिकनी पहनने वाली लड़कियों को तो जाने ही दीजिए पर अपने यहां पारंपरिक लिबासों, मसलन साड़ी, कुर्ता-सलवार और कमीज पहनने वाली अधेड़ और बूढ़ी औरतों को खुली छाती में देखा जाता है। जिसे झीनी ओढ़नी या पल्लू से ढांपा गया होता है। थुलथुल टाइप की कोई भी बूढ़ी अपने विशाल वक्ष को छिपाने के प्रयास करती नजर नहीं आती, इनके बड़े और ढीले गलों से लगभग आधे वक्ष बाहर ही दिखते हैं, जिनको देखकर घृणित मानसिकता वाला ही कोई घिनौनी बात सोच सकता है।

सीधे कहूं तो सेक्स अपील और नग्नता देखने वाले की नजरों से ज्यादा मानसिकता में होती है। खुले समाज में तो विरोध प्रदर्शन करने वाली औरतें टॉपलेस होकर अपनी बात कहने का अद्भुत तरीका अपनाती हैं। जिसमें "टॉप फ्रीडम' टाइप के सोशल मूवमेंट भी शामिल हैं। बीच, स्विमिंग पूल, पार्कों जैसी सार्वजनिक जगहों पर ये बराबरी का अधिकार मांगने के लिए ऊपर के कपड़े खोलकर विरोध जताती हैं। सितंबर 2007 में स्वीडन में "बारा ब्रास्ट' (बेयर ब्रोस्ट) के नाम पर आंदोलन किया था। इनको उन जगहों पर खुली छाती के साथ घूमने की इजाजत चाहिए थी, जहां मर्द ऐसे ही घूम सकते हैं। मध्य पूर्व में अकेले इज्राइल ही ऐसी जगह है, जहां औरतें चाहें तो उघड़ी छाती के साथ घूम सकती हैं। हालांकि तेल अवीव जैसे कुछ बीचों पर भी औरतें उन्मुक्त भ्रमण करना पसन्द करती हैं। कुछ विदुषियां इसको "टॉप फ्री' कहने पर अड़ी हुई हैं। जिस वक्त इस्लाम की सलामती मानने वाले धर्म गुरू औरतों के खुले कपड़ों को कोस रहे थे, ठीक उसी समय फ्रांस के राष्ट्रपति ने बुर्के पर रोक लगाकर क्रांतिकारी कदम उठा दिया। औरतों को परदों में लपेटे रहने वाली मानसिकता पर चोट करने का मुफीद समय है, जिस पर दुनिया की तमाम औरतें एकजुट हो चुकी हैं। (देखें ब्लॉग चर्चित स्टार सुचित्रा कृष्णमूर्ति का) यह सच है कि परदे को एकदम से खोलकर बाहर आने का साहस करना केवल सामाजिक ही नहीं मानसिक आंदोलन भी है। खुद को बेपरदा करने को तैयार होना भी मामूली काम नहीं है।

खासकर उन औरतों के लिए जिनकी कई पीढ़ियां पूरा मुंह ढक कर ही बाहर निकली हैं। क्रांति की घुट्टी जबरन नहीं पिलाई जा सकती, लेकिन यह सच है कि अब और कुचला नहीं जा सकता। औरतों को खुलेपन में मजा आ रहा है। वे दिमागी रूप से बराबरी करने को आमादा हैं। भीतर से उठने वाली अपनी आवाज को वे दबाने को तैयार नहीं हैं। उनके साहस को दबाने का प्रयास करने वाले परिवार अब जान भी नहीं सकते कि उनकी बिटिया का ब्लॉग क्या कह रहा है, या किस सोशल साइट पर उसका कितना समर्थन है। सड़कों पर आंदोलन या बहस-मुबाहिसों के नाम पर बाहर निकलने की पाबंदी से भले ही दकियानूस उसे रोक ले रहा था पर मानसिक गुलामी से तो उसने खुद को मुक्त ही कर लिया है।

साभार - राष्ट्रीय सहारा , आधी दुनिया ,26 मई 2010

सुचित्रा कृष्णमूर्ति की उल्लिखित पोस्ट 'बूब्स एण्ड बम्स 'का हिन्दी अनुवाद यहाँ पढें ।

Monday, May 17, 2010

एक काल्पनिक पत्र निरुपमा का, मां के नाम

युवा पत्रकार अनुपमा की पत्र शैली में यह प्रतिक्रिया निरुपमा हत्याकांड से जुड़े पहलुओं को समझने की कोशिश करती है। मोहल्ला लाइव पर प्रकाशित यह मां के नाम बेटी निरुपमा का काल्पनिक पत्र मन को छूने के साथ ही, वो सारे सवाल भी उठाता है, जो निरुपमा की स्थिति में पड़ने वाला या उसकी हालत को समझने वाला कोई भी समझदार व्यक्ति सहज ही करता।- अनुराधा

मेरी प्यारी मां,
तुझे बहुत-बहुत-बहुत सारा प्यार!
मां, परसों मदर्स डे था न। मुझे यहां स्वर्गलोक में जरा भी अच्छाप नहीं लग रहा था मां। सोचा क्योंो न पापा की चिट्ठी का जवाब लिखूं, जो दुनिया से विदा होने के पहले उन्होंने मुझे लिखी थी। लेकिन तू तो जानती है न मां कि मैं पापा से ज्या,दा बातें नहीं कह पाती। जो कहना होता है, तुमसे ही कहती हूं। तो मदर्स डे के दिन अपने अजन्मे बच्चेी के साथ दिन भर यूं ही तुझे याद करती रही और कुछ-कुछ लिखने की कोशिश करती रही।

मां, मुझे अच्छा नहीं लग रहा कि तू मेरे कारण परेशान है और फजीहत झेल रही है लेकिन मैं अब कुछ कर भी तो नहीं सकती न! बहुत दूर हूं मां। अगर करने की स्थिति में होती, तो तुम्हें कष्ट न होने देती। ऐसे भी तुझे पता है न कि मैं अपनी मां पर जान छिड़कती हूं, उसे कितना प्यार करती हूं, यह शब्दोंक में बयां नहीं कर सकती। तू ही बता न कि अगर मैं मां-पापा से प्या,र न करती और भरोसे का कत्ल करना चाहती तो क्यों सिर्फ यह पूछने के लिए दिल्ली से कोडरमा जाती कि क्या् मैं प्रिभयांशु से शादी करूं। मां उसके साथ पति-पत्नी के रिश्ते के बीच जितने भी तरह के भाव होते हैं, उन सभी भावों से तो गुजर ही चुकी थी न, सिर्फ एक सामाजिक मान्यता मिलनी बाकी थी।

मां, प्रिभयांशु के साथ मैं एक दोस्त या प्रेमिका की तरह नहीं बल्कि हमसफर की तरह ही रह रही थी। और फिर मुझे आपलोगों के भरोसे का कत्ल करना होता तो मैं अपनी अन्य सहेलियों की तरह कोर्ट में शादी करने के बाद बताती कि मैंने शादी कर ली। तब आपलोगों की मजबूरी होती मां कि अपनी सहमति की मुहर लगाएं। लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। मैं दो वर्षों के प्या र पर जीवन देने वाली मां और पालन करने वाले पिता के प्यार को हल्का नहीं करना चाहती थी। उसका मान कम नहीं करना चाहती थी।

यह भरोसा था मुझे मां कि जब आपलोगों ने झुमरी तिलैया से मुझे पढ़ाई करने के लिए दिल्ली् भेजा है, अखबारी दुनिया में नौकरी करने की छूट दी है तो फिर अपने तरीके से, अपनी पसंद के लड़के के साथ जिंदगी भी गुजारने देंगे। मैं कानूनन सब करने में सक्षम थी मां, लेकिन मैं कानून से ज्यादा आपलोगों की कद्र करती थी। आपलोगों पर भरोसा करती थी। इसलिए सहमति की मुहर लगाने कोडरमा पहुंची थी। और सुनो न मां, अब तो दो-दो जिंदगियां बरबाद हो ही चुकी हैं। मैं और मेरी संतान ने दुनिया से अलग कर लिया है खुद को। अब प्रियभांशु को भी बरबाद करने के लिए दांव-पेंच क्यों चले जा रहे हैं मां।

मां, क्या- मैं बेवकूफ थी, जो मुझे पता नहीं चल सका था कि मेरे गर्भ में उसका बच्चा पल रहा है? मैं अबॉर्शन करा सकती थी न, लेकिन मैंने नहीं करवाया। मैं और कई उपाय भी अपना सकती थी लेकिन नहीं अपनाये। इसलिए कि मैं प्रिभयांशु को मन से चाहती थी, तो तन देने में भी नहीं हिचकी। मां उसने कोई बलात्कार नहीं किया और न ही संबंध बनाने के बाद मुझे बंधक बनाकर रखा कि नहीं तुझे बच्चे को जन्म देना ही होगा। यह सब मेरी सहमति से ही हुआ होगा न मां, तो उसे क्यों फंसाने पर आमादा है पुलिस। जरा इस बात पर भी सोचना तुम।

हां मां, अब यहां स्वर्गलोक में आ चुकी हूं तो यहां कोई भागदौड़ नहीं। फुर्सत ही फुर्सत है। ऐसी फुर्सत कि वक्त काटे नहीं कट रहा। धरती की तरह जीवन की बहुरंगी झलक नहीं है यहां, जीवन एकाकी और एकरस है। लिखने की आदत भी पड़ गयी है, तो सोच रही हूं कि आज पापा के उस आखिरी खत का जवाब भी दे दूं। पापा से कहना वो मेरे जवाब को मेरी हिमाकत न समझें बल्‍कि एक विनम्र निवेदन समझेंगे।

उन्होंने अपने पत्र में सनातन धर्म का हवाला दिया है। अब यहां स्वर्गलोक में जब फुर्सत है तो सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों से भी परिचित हो रही हूं। सनातन धर्म के बारे में पापा शायद ज्यादा जानते होंगे मां लेकिन मैं अब सोच रही हूं कि मैंने भी तो उसी धर्म के अनुरूप ही काम किया न। मां, सनातन धर्म ने तो प्रेम पर कभी पाबंदी नहीं लगायी और न ही जातीय बंधन इसमें कभी हावी रहा। देखो ना मां, कृष्णन की ही बात कर करो। जगतपालक विष्णुग के अवतार कृष्ण । प्रेम की ऐसी प्रतिमूर्ति बने कि रुक्‍मिणी को भूल लोग उन्हें राधा के संग ही पूजने लगे। घर-घर में तो पूजते हैं लोग राधा-कृष्ण को। फिर राधा-कृष्ण की तरह रहने की छूट क्यों नहीं देते अपनी बेटियों को? क्याण राधा-कृष्ण सिर्फ पूजे जाने के लिए हैं? जीवन में उतारे जाने के लिए नहीं? और यदि जीवन में जो चीजें नहीं उतारी जा सकतीं, उसे वर्जना के दायरे में रखा जाना चाहिए न मां। मां अपने कोडरमा वाले घर में भी राधा-कृष्ण की तस्वीर है, हटा देना उसे सदा-सदा के लिए।

हां मां, पापा से कहना कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की तस्वीर भी फेंक दें, वह भी सनातन धर्म की कसौटी पर पूजे जाने लायक नहीं हैं। याद हैं मां, बचपन से एक भजन मैं सुना करती थी – बाग में जो गयी थी जनक नंदिनी, चारों अंखियां लड़ी की लड़ी रह गयीं। राम देखे सिया और सिया राम को। चारों अंखियां लड़ी की लड़ी रह गयीं… फिर भाव समझाते थे प्रवचनी बाबा कि शिवधनुष तोड़ने से पहले का नजारा है यह। सीता जी फूल तोड़ने बाग में गयी थीं, राम से नैन लड़े तो दोनों एक दूसरे पर मोहित हो गये। जानती हो मां, इस भजन को याद आने के बाद मैं यह सोच रही हूं कि राम ने भी तो अपने पिता की मर्जी से सीता से शादी की नहीं थी। वह तो गये थे अपने गुरू के साथ ताड़का से रक्षा के लिए लेकिन जब नजरें सीता से मिलीं तो चले गये शिवधनुष तोड़ने। क्या राम को यह नहीं पता था कि धनुष तोड़ने का मतलब होगा शादी कर लेना। फिर क्यों नहीं एक बार उन्होंने अपने पिता दशरथ से यह अनुमति ली। दशरथ को तो बाद में पता चला न मां कि जनक की बेटी से उनका बेटा शादी करने जा रहा है। तो मां, क्या गुरु के जानने से काम चल जाता है। मेरे भी गुरू तो जानते ही थे न। दिल्ली में रहनेवाले सभी गुरु और मित्र इस बात के जानते थे कि मैं प्रिभयांशु से शादी करने जा रही हूं। फिर भी मैंने गुरु के बजाय आपलोगों की सहमति लेना जरूरी समझा। राम की तस्वीमर हटा देना मां उन्होंने भी अपने पिता से पूछे बिना अपना ब्यागह तय कर लिया था।

मां, पिताजी को माता कुंती की भी याद दिलाना न। सनातनी कुंती की। उन्हें तो कोई कभी कुल्टा नहीं कहता। उन्हें आदर्श क्योंस माना जाता है जबकि उन्होंने छह पुत्रों का जन्म पांच अलग-अलग पुरुषों से संबंध बनाकर दिया। और मां कर्ण वह तो विवाह से पहले ही उनके गर्भ से आये थे न। यह तो सनातनी पौराणिक इतिहास ही कहता है न मां। फिर कुंती को कुल्टाप क्यों नहीं कहते पापा। पापा की कसौटी पर तो तो वह चरित्रहीन ही कही जानी चाहिए।

और द्रौपदी, मां। कोई द्रौपदी को दोष क्योंप नहीं देता। अच्छात जरा ये बताओ तो मां कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, कोई एक स्त्री पांच-पांच पुरुषों के साथ कैसे रह सकती है। लेकिन वो रहती थी और उसे कोई दोष नहीं देता। पापा को कहना कि वह द्रौपदी को भी अच्छीद औरतों की श्रेणी में न रखा करें। एक बात कहूं मां, पापा ने शुरुआती दिनों में ही एक गलती कर दी थी। मुझे धर्म प्रवचन की बातें बताकर। उन्होंने ही एक बार बताया था कि इस जगत में ब्रह्मा की पूजा क्यों नहीं होती क्योंकि ब्रह्मा ने अपनी ही मानस पुत्री से शादी कर ली थी। छि: कितने गंदे थे न ब्रह्मा।

और मां, रामचंद्र के वंशजों में तो किसी की तस्वीकर घर में नहीं रखना, क्योंककि तुम्हें भी तो पापा ने बताया ही होगा कि धर्म अध्यात्म और सनातनी इतिहास के क्रम में भागीरथी कैसे दुनिया में आये थे। दो महिलाओं के आपसी संबंध से उत्पन्न हुए थे न मां वो। यानी लेस्बियनिज्म की देन थे। बताओ तो सही, भला नैतिक रूप से कहां आये थे वो? मैं भी गंदी थी मां। अनैतिक। इन लोगों की तरह ही अनैतिक। मैं कुतर्क नहीं कर रही और न ही अपने पक्ष में कोई दलील ही दे रही हूं मां। यह सब मन में बातें आयीं तो सोचा तुमसे कह दूं। खैर, एक बात कहूं मां, मुझसे तू चाहे जिंदगी भर नफरत करना, घृणा करना, लेकिन अब छोड़ दो न प्रिभयांशु को। उसने कुछ नहीं किया जबरदस्ती मेरे साथ। मैं बच्चीफ नहीं थी मां और न ही अनपढ़-गंवार थी। सब मेरी रजामंदी से ही हुआ होगा न मां।

और हां मां, मुझे फिर से धरती पर भेजने की तैयारी चल रही है। मेरे बच्चे को भी फिर से दुनिया में भेजा जाएगा। मैंने तो सोच लिया है कि इस बार अपने नाम के आगे पीछे कोई टाइटल नहीं लगाऊंगी। सीधे-सीधे नाम लिखूंगी। कोई पाठक, तिवारी, यादव, सिंह नहीं। सीधे-सीधे सिर्फ नाम। जैसे कि दशरथ, राम, कृष्ण… इन सबकी तरह। इनके नामों के साथ कहां लिखा हुआ मिलता है कि दशरथ सिंह, राम सिंह, कृष्णी यादव। मां मैं फिर आ रही हूं। इस बार फिर प्याार करुंगी। अपने तरीके से जीने की कोशिश करुंगी। फिर मारी जाऊंगी तो भी परवाह नहीं। पर एक ख्वाफहिश है मां, ईश्वर से मेरे लिए दुआ मांगना कि इस बार किसी अनपढ़ के यहां जन्म लूं… जो ज्यादा ज्ञान रखता हो। जो सनातनी हो लेकिन व्यावहारिक सनातनी, सैद्धांतिक नहीं। जो कम से कम अपने संतान को अपने तरीके से जीने की आजादी दे।

बस मां! अभी इतना ही । शेष फिर कभी। तुम अपना ख्याल रखना मां और पापा का भी। भाई-मामा को प्रणाम कहना। जल्दी ही मिलती हूं मां। नाम बदला हो सकता है लेकिन तू गौर करती रहना… तुम मुझे पहचान ही लोगी।

तुम्हारी बेटी
निरुपमा

(अनुपमा। झारखंड की चर्चित पत्रकार। प्रभात खबर में लंबे समय तक जुड़ाव के बाद स्वतंत्र रूप से रूरल रिपोर्टिंग। महिला और मानवाधिकार के सवालों पर लगातार सजग। देशाटन में दिलचस्पी‍। प्रभात खबर के लिए ब्लॉगिंग पर नियमित स्तंभ लेखन।)

-साभारः मोहल्ला लाइव

Friday, May 14, 2010

एक जादुई गोली के पचास साल

राजकिशोर

उस गर्भनिरोधक गोली को, जिसे अंग्रेजी की दुनिया में पिल कहते हैं, आधिकारिक मान्यता मिले हुए पचास साल हो गए। यह अवसर खुशी मनाने का है। स्त्री स्वतंत्रता के पक्षधरों को कुछ खास खुशी होनी चाहिए, क्योंकि पिल ने स्त्री समुदाय को एक बहुत बड़ी प्राकृतिक जंजीर से मुक्ति दी है। अगर पिल न होता, तो यौन क्रांति भी न होती। यौन क्रांति न होती, तो स्त्री स्वतंत्रता के आयाम भी बहुत सीमित रह जाते।

बेशक यह जादुई गोली उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितना पेनिसिलिन का आविष्कार, जिसने चिकित्सा के क्षेत्र में एक चमत्कार का काम किया। पिल का महत्व एसपिरिन या पैरासिटामोल जितना भी नहीं है। लेकिन ये दवाएं हैं। पिल कोई दवा नहीं है। वैसे गर्भनिरोधक गोली का आविष्कार भी स्त्रियों में बांझपन का इलाज खोजने की प्रक्रिया में हुआ था। आज भी पिल का प्रयोग कई स्त्री रोगों का इलाज करने के लिए होता है, लेकिन अधिकतर मामलों में यह गर्भनिरोधक की तरह ही प्रयुक्त होता है और गर्भाधान कोई बीमारी नहीं है। लेकिन अनिच्छित गर्भाधान एक बहुत बड़ी समस्या जरूर है, जिसके कुफल स्त्री को ही भुगतने पड़ते हैं। कहा जा सकता है कि उसके लिए तो यह बीमारियों की बीमारी है। पिल ने उन्हें सुरक्षित और स्वतंत्र जीवन जीने का अवसर प्रदान किया है। इस मायने में यह छोटी-सी गोली जितनी जादुई है, उतनी ही क्रांतिकारी भी।

गर्भाधान की जिम्मेदारी सौंप कर प्रकृति ने स्त्रियों के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है। पुरुष के हिस्से सिर्फ आनंद और स्त्री के हिस्से आनंद के साथ-साथ एक बड़ी और लंबी जिम्मेदारी। इसी आधार पर अनेक स्त्रीवादी विचारकों का मत है कि स्त्री का शरीर तंत्र ही उसका सबसे बड़ा शत्रु है। रेडिकल मार्क्सवादी विचारक शुलामिथ फायरस्टोन मानती थीं कि जब तक स्त्री को गर्भाशय से मुक्ति नहीं मिलती, तब तक उसकी वास्तविक मुक्ति संभव नहीं है। गर्भाशय स्त्रियों को कई तरीकों से बाधित और कंडीशन करता है। यह उसके व्यक्तित्व को ही बदल देता है।

अनिच्छित गर्भाधान से छुटकारा पाने का प्रयास शायद उतना ही पुराना है जितना मानव संस्कृति का इतिहास। गर्भाधान न हो और हो जाए तो उससे छुटकारा पाया जा सके, इसके लिए अनेक तरीके खोजे जाते रहे। उनमें से कोई भी तरीका संतोषजनक नहीं था। कुछ तरीके तो ऐसे थे जिनसे स्त्री की जान पर बन आती थी। उस बेचारी को इज्जत और परिवार के सुख-चैन के लिए इस कठोर अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ता था। दुर्भाग्यवश आज भी दुनिया के बहुत बड़े इलाके में यह अग्निपरीक्षा जारी है। इन इलाकों में हमारा अपना देश भी शामिल है। हर साल हजारों या क्या पता लाखों स्त्रियां अनचाहे गर्भ से मुक्ति पाने की प्रक्रिया में भयावह यंत्रणा सहती हैं और उनमें से अनेक तो जान से भी हाथ धो बैठती हैं। स्पष्ट है कि मानव स्वाधीनता के औजार अभी भी कुछ खास देशों और एक खास वर्ग तक सीमित हैं। पिल भी ऐसा ही एक औजार है।

कुछ लोगों का मानना है कि पिल (और कंडोम) ने यौन अराजकता को बढ़ावा दिया है। अगर पिल न होता, तो स्त्रियां और पुरुष मर्यादा में रहते। पिल के कारण गर्भ निरोध की युक्ति इतनी आसान और इतनी कम खर्चीली हो गई है कि किसी को भी लंबे समय के रिश्तों में दिलचस्पी नहीं रही। मनुष्य पशुओं की तरह आचरण करने लगे हैं। व्यभिचारी स्त्री-पुरुषों की बन आई है। उन्हें अपने कर्म के परिणाम की चिंता नहीं रही, क्योंकि पिल है न।

यह आलोचना पूरी तरह निस्सार नहीं है, लेकिन इतना खतरा तो किसी भी नए आविष्कार के साथ जुड़ा हुआ होता है। सवाल यह है कि जब तक पिल बाजार में नहीं आया था, क्या दुनिया में व्यभिचार नहीं था ? या, यौन उच्छृंखलता नहीं थी? अपनी विवाहिता को साल-दर-साल गर्भवती करते जाना पुरुष सत्ता की यौन उच्छृंखलता नहीं थी तो क्या था? पिल का सबसे अहम योगदान यह है कि यह स्त्री को अपने शरीर पर नियंत्रण प्रदान करता है और इस तरह उसे स्वाधीन बनाता है। लेकिन यह कहना गलत है कि सिर्फ पिल ने स्त्री को स्वतंत्रता दी। सच यह है कि स्वतंत्रता का वातावरण और पिल, दोनों लगभग साथ-साथ आए। इसे सामाजिक विकास और वैज्ञानिक विकास का युग्म कहा जा सकता है। दोनों का ही ज्ञान और चेतना के प्रसार से गहरा संबंध है। ज्ञान की पुरानी अवस्था में न तो पिल की खोज की जा सकती थी और न चेतना की पुरानी अवस्था में इसका प्रयोग उतना व्यापक हो सकता था जितना आज है।

सवाल यह भी है कि स्वतंत्रता का दुरुपयोग किसे कहेंगे? स्त्री के संदर्भ में क्या पुरुष अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग हजारों वर्षों से नहीं करता आया है? लेकिन पिल ने अगर इन पचास वर्षों में स्त्री को यह चुनने की आजादी दी है कि जब वह चाहे, तभी गर्भाधान हो और औरत इसका लाभ उठाती है, तो किस तर्क से इसे स्वतंत्रता का दुरुपयोग कहा जा सकता है? वस्तुत: जिस यौन अराजकता की बात की जाती है, वह पिल की नहीं, वर्तमान उपभोक्ता संस्कृति की देन है। हां, पिल ने जिस एक महत्वपूर्ण सत्य से हमारा साक्षात्कार कराया है, वह यह है कि यौन समागम कोई उतनी बड़ी घटना नहीं है जितना इसे बना दिया गया है। यह वैसा ही एक मानव व्यवहार है जैसा खाना, पीना या चलना-फिरना। पिल का शुक्रिया कि उसकी मदद से हम एक बहुत बड़े मिथक से मुक्त हो पाए हैं, जिसने मानव जीवन को नरक बना रखा था।

यह शिकायत जरूर वाजिब है कि सत्ता और अर्थव्यवस्था की संरचना ने पिल तक औरतों की पहुंच को सीमित कर रखा है। यह इस बात का प्रमाण है कि गुलामी की कौन-सी बेड़ियां अभी तक मानव समाज के विकास को निरुद्ध किए हुए हैं। दूसरी ओर, पिल ने केवल स्त्री को ही नहीं, उसके साथी पुरुष को भी मुक्त किया है, जो इस बात का एक और प्रमाण है कि स्त्री मुक्ति और पुरुष मुक्ति दोनों साथ-साथ चलते हैं।

Sunday, May 9, 2010

मदर्स डे के बहाने

ये जानते हुये भी कि जीवन रचने की अनूठी शक्ती सिर्फ औरत के हिस्से आयी है, और पालन पोषण की जिम्मेदारी भी. फिर भी औरत की कोख पर उसका अधिकार नहीं है, स्त्री का माँ रूप सिर्फ एक ख़ास सन्दर्भ में ही स्वीकार्य है, बाकी वों लगातार स्त्री के लिए अपमान और बंधन और पीड़ा का सबब है. निरुपमा के बहाने अविवाहित मात्र्तव पर खासी बहस जारी है. विवाहित महिलाए भी कभी सामाजिक दबाव में बच्चे जनने को, एक ख़ास लिंग का बच्चा जनने और न जनने को, गर्भपात से लेकर कई तरह के संत्रास से रोज गुजरती ही है. इसीलिए मात्रत्व को स्त्री के सिर्फ व्यक्तिगत प्रश्न देखने के बजाय इसे स्त्री के स्वास्थ्य, अस्मिता, और उसके वृहद् सामाजिक भूमिका से जोड़ कर देखने की ज़रुरत है. स्त्री के स्वास्थ्य, सेक्सुअलिटी पर पितृसत्ताक, नजरिया बहुत लम्बे समय तक रहेगा, स्त्री का सामाजिक अनुकूलन भी नित नए रूप में सामने आयेगा. अलग-अलग समाजो की फांस और अपनी ख़ास तरह की अनूठी जीवन रचने की जो शक्ती स्त्री के पास है, उसको समझते हुये, ही स्त्री उनसे कई स्तरों पर तैयारी से उलझती रहे, और सशक्त बने, सक्रिय तरीके से किसी स्तर पर सामाजिक चेतना को कुछ आगे धकेले. इन सबके बीच स्त्री तभी पार पा सकती है जब उसके पास आधुनिक नजरिया हो कि किस तरह स्त्री अपने शरीर, अपनी इच्छाओं, को देखे समझे ( Our Bodies, Ourselves: A New Edition for a New Era, Boston Women's Health Book Collective). स्त्री शिक्षित हो, अपने बारे में. मात्र्तव उसके लिए दुर्घटना न बने, माता बनने और माँ न बनने के जो पारिवारिक और सामाजिक दबाव स्त्री पर लगातार बने रहते है, उनसे पार पाए. मातृत्व का चयन स्त्री का हो और वों बच्चे और माँ के जीवन का उत्सव हो. आज गर्भ-निरोधक पिल्स को मान्यता मिले ५० साल हुये है. और निसंदेह इन ५० सालों में स्त्री को सिर्फ अनचाहे मात्रत्व से ही मुक्ती नहीं मिली है, उसे समाज में अपने लिए जगह बनाने के अवसर मिले है, और परिवार और समाज पर बढ़ती जनसंख्या का दबाव भी कम हुया है.आज पिल्स की ५०वी सालगिरह भी है

सायंस और तकनीकी के समाधान हमारी साझी सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया के ही हिस्से है, सिर्फ यही अकेले समाधान नहीं है. सायंस के समाधान भी देर सबेर शोषक और सबल का हथियार बन जाते है और शोषण के दूसरे रूप उनका इस्तेमाल करने में आगे रहते है.

समाज बदलने की दिशा में और स्त्री को एक सम्पूर्ण मानव की गरिमा मिलने तक स्त्री की अपने बारे में और अपने समाज के बारे में एक सचेत राजनैतिक शिक्षा की ज़रुरत लगातार बनी रहेगी. इस मायने में स्त्रीत्व की लड़ाई सिर्फ भारतीय समाज में ही नहीं है, अलग-अलग तरह से दूसरे समाजो में भी है. जिन समाजो में अविवाहित मात्र्तव कुछ हद तक स्वीकृत है, और सायंस, तकनीकी और तकनीकी जानकारी का अभाव नहीं है, वहाँ भी स्त्रीत्व की यात्रा सरल और सुखद नहीं है. अमरीकी समाज में एक बड़ी होती लड़की अपनी इस यात्रा को किस तरह से देखती है, नोमी वूल्फ की ये किताब कुछ कठिन सवालों से रूबरू होती है. ये सवाल कुछ दूसरी तरह से भारतीय समाज में लड़की के बड़े होने और स्त्रीत्व की यात्रा के बहुत नजदीक ही है। सामाजिक अनुकूलन की प्रक्रिया को समझते हुये स्त्री का सचेत रूप से अपने स्त्रीपन से उलझे बगैर काम नहीं चलता.

विवाह,जाति-प्रथा और यौन शुचिता आदि पर बहुसंख्यक समाज के जो विचार है उन्हें इतने सालों बाद भी लोहिया जी की तरह बार-बार कटघरे में खड़े किये जाने की ज़रुरत है. कम से कम स्त्री का माँ बनना या न बनना, विवाह के भीतर या बाहर बनना सिर्फ उसकी ही मर्जी होनी चाहिए. . सवाल लेकिन सिर्फ माँ बनने और नहीं बनने का नहीं है, सवाल ये है कि क्या स्त्री एक सम्पूर्ण मनुष्य है? या उसका शरीर और उसकी योनिकता का मालिक कोई दूसरा है? पिता, पुरुष या समाज? और जब तक ये सवाल नहीं सुलझाया जाएगा, स्त्री को एक सम्पूर्ण मनुष्य की गरिमा नहीं मिल सकती.

सवाल तो हैं ही, निरुपमा के लिए भी और प्रियभांशु के लिए भी

- प्रणव प्रियदर्शी

(निरुपमा मसले पर मेरी पिछली पोस्ट निरुपमा के बहाने अब एक बार अपने भीतर झांकें, प्लीज़! पर प्रणव प्रियदर्शी ने यह लंबी टिप्पणी मेल के जरिए मुझे भेजी। इसे एक नई पोस्ट की तरह लगाना ज्यादा सुविधाजनक रहेगा, यह मान कर इसे यहां दे रही हूं। प्रणव चोखेर बाली के नियमित पाठक, टिप्पणीकार और लेखक भी हैं।- अनुराधा)

अनुराधा, तुम्हारी पिछली पोस्ट धर्म पर नहीं है, फिर भी चूंकि तुमने शुरू में उसका उल्लेख कर दिया है, इसलिए मैं भी यह कहना चाहता हूं कि सिर्फ औरतों के लिए नहीं, धर्म ने उन सबको छलने में सत्तारूढ़ तबकों का साथ दिया है… लगातार… जो आज वंचित, पीड़ित, शोषित तबकों के रूप में नजर आते हैं।

दूसरी बात ( यह भी तुम्हारी इस पोस्ट की मुख्य बात नहीं है, पर है केंद्रीय महत्व की) जो तुमने स्त्रियों के लिए कही है कि कब तक हम पुरुषों से मुखातिब रहेंगे? यह बात भी स्त्रियों समेत सभी वंचित तबकों के लिए सच है कि जिन्हें हम अपना विरोधी मानते हैं उन्हें ही संबोधित करते हुए अपनी उम्र गुजार देते हैं। अनुरोध करते हुए, अपील करते हुए, ज्ञापन देते हुए और सांकेतिक विरोध करते हुए भी हम उन्हें ही संबोधित करते रहते हैं। इस उम्मीद में कि शायद वह अपना रास्ता थोड़ा बहुत बदल लें और हमें चैन मिले। यह नहीं सोचते कि अपनी दुर्गति के लिए किसी और से ज्यादा हम खुद जिम्मेदार हैं, दूसरे हमें फॉर ग्रांटेड तभी लेते हैं जब हम इसकी गुंजाइश छोड़ते हैं। दूसरे अगर हम पर ज्यादती करते हैं तो उसके लिए उनसे ज्यादा हम जिम्मेदार होते हैं क्योंकि हम उस ज्यादती को बदार्श्त कर रहे होते हैं। इस हिसाब से दूसरों के मुखातिब होने के बजाय खुद को संबोधित करना ज्यादा जरूरी है क्योंकि तौर-तरीके बदलने की जरूरत दूसरों से ज्यादा उन तबकों को है जो खुद को पीडि़त, दमित, शोषित मानते हैं।

अपेक्षाकृत कम प्रासंगिक पर ज्यादा जरूरी इन दो बातों के बाद मैं तुम्हारी पोस्ट के मुख्य बिंदुओं पर आता हूं। निरुपमा से जो कुछ पूछने की तुम सोच रही हो, वह बिल्कुल सटीक है, पर काफी नहीं। हालांकि मैं न तो निरुपमा को व्यक्तिगत तौर पर जानता था और न ही प्रियभांशु को जानता हूं । इस मामले की मेरी जानकारी भी अखबारी रिपोर्टों तक सीमित है।

इसीलिए इन दोनों के रिश्तों पर मेरा टिप्पणी करना निजता के दायरे का उल्लंघन भी हो सकता है। सभी संबंधित पक्षों से अग्रिम माफी मांगते हुए मैं कहना चाहूंगा कि मेरी बातों को उन दोनों के सच के रूप में न लेकर ऐसे किसी भी मामले में मेरे नजरिए या मेरे सोचने के ढंग के रूप में लें।

इस निवेदन के बाद मैं कहूंगा कि मेरे हिसाब से निरुपमा ने अपने शरीर के बारे में ही नहीं, जीवन के बारे में भी, रिश्तों को समझने में भी, जीवन साथी के चयन में भी घोर लापरवाही बरती। अगर यह सच नहीं है तो फिर यही कहना होगा कि उसमें सही फैसला करने की शक्ति ही नहीं थी।

अगर सचमुच अपने किसी साथी से असुरक्षित यौन संबंध के चलते प्रेग्नंट होने के तीन महीने बाद भी वह साथी को यह बात नहीं बता पाती है तो उस रिश्ते की अर्थहीनता का इससे बड़ा सबूत दूसरा नहीं हो सकता। अगर वह साथी पता होते हुए भी अपनी खाल बचाने के लिए पता होने की बात छिपा रहा है तो फिर उसे साथी कहना ही बेकार है। उस स्थिति में इस पर कुछ और कहने-सुनने की जरूरत ही नहीं बचती।

मुझे अचरज इस बात पर भी हुआ कि निरुपमा की मौत (हत्या) के बाद भी कुछ समय तक प्रियभांशु मीडिया में आने से बचता रहा, क्योंकि वह सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा है और शायद उसे उसके कुछ दोस्तों ने सलाह दी कि इस केस में सामने आने से उसका करियर प्रभावित हो सकता है। पता नहीं, यह बात कितनी सच है, लेकिन अगर इसमें जरा सी भी सच्चाई है तो निरुपमा और प्रियभांशु के रिश्तों को इससे बड़ी गाली कुछ और नहीं हो सकती।

हत्या भूल जाएं अगर निरुपमा की मौत भी मान लें तो भी यह असहज मौत तो थी ही, उसके बाद अगर प्रियभांशु यह सोचते हैं कि अब जो होना था वह हो चुका, अब तो अपने बारे में सोचें तो वह रिश्तों को किस स्तर पर जीते हैं, यह बात स्वतः सिद्ध है।

यहां मेरा मकसद बड़ी-बड़ी बातें करना नहीं, सिर्फ यह बताना है कि रिश्तों को दूसरे स्तर पर जीने के भी उदाहरण अपने इसी समकालीन समाज में हमारे सामने बिखरे पड़े हैं।

जेसिका लाल की बहन सबरीना लाल भी इसी दुनिया, इसी जमाने में हमारे ही बीच रहती है, जिसने बहन की हत्या के बाद उस लड़ाई को पूरी निष्ठा के साथ अंजाम तक पहुंचाया। नीतीश कटारा की मां नीलम कटारा भी ऐसी ही महिला है। अगर कोई इन्हें खून का रिश्ता मान कर खारिज करना चाहे तो उसके लिए रुचिका गिरहोत्रा की दोस्त आराधना को याद करना चाहिए। डीजीपी राठौर ने जब रुचिका के साथ बदमाशी की थी तब (आराधना) भी १३-१४ साल की ही थी। तीन साल बाद रुचिका ने खुदकुशी कर ली, पर आराधना ने यह नहीं सोचा कि अब अपने भविष्य का खयाल किया जाए। बीस साल तक वह लगभग हारी हुई यह लड़ाई लडती रही और आखिर डीजीपी राठौर को सजा दिलवाई। बेशक, आराधना के माता- पिता और पति भी अभिनंदन के पात्र हैं, लेकिन आराधना इस पूरे प्रकरण में केंद्रीय पात्र बन कर उभरती है।

अब हम-आप चाहें तो इस पर भी माथा पच्ची कर सकते हैं (और हमें करनी भी चाहिए) कि समकालीन समाज से अनायास लिए इन तीनों उदाहरणों में मिसाल बनकर उभरने वाली तीनों पात्र महिलाएं ही क्यों है?

Tuesday, May 4, 2010

निरुपमा के बहाने अब एक बार अपने भीतर झांकें, प्लीज़!

स्त्री का कोई धर्म नहीं होता और धर्म ने उसके लिए सिर्फ बेड़ियां बनाईं हैं, और धर्म के ठेकेदार और पितृसत्ता के चौकीदार हाथ मे हाथ मिलाए सत्ता की सीढियाँ चढते हैं और मिल बाँट कर 'धर्म विमुख औरतों' को सबक सिखाते हैं, और....सब मंजूर, सब सही। पर हम कब तक पुरुषों से मुखातिब रहेंगे? क्या अब समय नहीं आया कि एक बार अपनी तरफ नजरें घुमाएं, अपने भीतर देखें। एक बार!

निरुपमा का मामला लें तो इससे ज्यादा नृशंस, अमानवीय कुछ हो नहीं सकता था कि एक पढ़े-लिखे शहरी परिवार के लोग अपनी ही पाली-पोसी बेटी को मार दें चाहे किसी कारण से हो। गांवों में सामाजिक दबाव और मजबूरी, जकड़न ज्यादा होती है। पर शहर के लोग भी अपनी मानसिक जकड़न से नहीं निकल पाए हैं।

लेकिन निरुपमा अपनी मौत के पहले की स्थिति में किसी भी दिन मुझे मिलती तो कुछ स्वाभाविक सवाल मेरे मन में हैं जो मैं उससे करती। अपनी शादी का फैसला खुद करना और उस पर अड़ने की हिम्मत रखना वाकई साहस का काम है। पर बिन ब्याही मां बनना उसका ‘फैसला’ कतई नहीं था, यह मेरा सोचना है। और उसकी इस स्थिति का गुणगान आज उसकी हिम्मत बताकर किया जा रहा है, पर उसके जीते जी सब उसे क्या सलाहें देते? हम जो पुरुषों पर लगातार दोष धरती हैं, खूब तर्क-वितर्क करती हैं, मौके पर खुद क्या करती हैं, और किसी को ऐसे मौकों पर कोई सहारा, दिलासा दे भी पाती हैं?

मैं क्रांतिकारी नहीं हूं। मैं उससे सबसे पहले पूछती कि ये क्या हाल बना लिया? क्या अपना इतना भी ख्याल नहीं? क्या तुम सचमुच, जानबूझ कर बिन ब्याही मां बनना चाहती हो, ऐसे सामाजिक माहौल में? और मुझे लगता है कि वह इससे इनकार करती कि उसने चाह कर यह हालात अपने लिए बनाए हैं। यह उसकी हिम्मत नहीं, कायरता थी।

एक तो, वह पढ़-लिख कर भी खुद अपने शरीर के बारे में कुछ नहीं जानती। वह चाहती है, पर नहीं जानती कि इसका क्या करे? इस शरीर का सम्मान किस तरह करे। दुनिया भर की खबरें, लेख उसने पढ़े, एडिट किए, पर उसे इतना भी नहीं पता था कि अपने को इस हालत तक पहुंचाने से रोकने के कई तरीके हैं, और सब सहज और जायज है। वह दिल्ली शहर में आर्थिक रूप से आत्म निर्भर, अपने रोज के फैसले खुद करने वाली आज़ाद लड़की थी। और वह उसका प्रेमी भी, जो कि कोई अनपढ़ गंवार नहीं था और उसे इतनी अंतरंगता से जानता था, जो कभी उसकी हालत जान नहीं पाया तो क्या इस आशंका के बारे में सोच कर उसे आगाह भी नहीं कर पाया?

अच्छा, माना कि वह खुद इतनी हिम्मत नहीं रखती थी, डर गई थी, तो फिर स्वाभाविक था कि अपने उस साथी पर तो इतना भरोसा करती और उसे अपनी इस हालत के बारे में बताती तो सही। उसने क्यों ऐसा नहीं किया, वह भी कन्फर्म होने के कोई पांच हफ्ते तक भी? क्या उसे उस पर भरोसा नहीं था? क्या वह उसे ‘परेशान’ नहीं करना चाहती थी? अगर यह भी नहीं करना था तो फिर अफसोस तो नहीं करते रहना था कि इस समय जिंदगी सबसे बुरे दौर से गुजर रही है-

(NIrupama Pathak on Facebook: Deplorable, disgusting,disgrace ful, distructible, diminishing, dam it, deteriorating are the few derogatory words that I want to associate with my life at this juncture. March 26 at 12:00 am 2010- यह लगभग वही समय होगा जब उसे अपने गर्भवती होने का पता चला होगा)

कुछ तो करना था निरुपमा, कुछ तो!

अब निरुपमा नहीं है, पर हम अपने शरीरों का क्या कर रहे है? हममें से कितने हैं जिन्हें इच्छाओं और सपनों का तो छोड़ ही दे, यह भी पता है कि देह का कौन सा दर्द मीठा है, बर्दाश्त करने लायक है और कौनसा कड़वा-कसैला?

Monday, May 3, 2010

बलात्कार के मामले में सबूत के तौर पर पीड़िता का बयान काफी है

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि बलात्कार के मामले में, खास तौर पर अगर पीड़ित निरक्षर है तो उसके बयान को पूरी तरह माना जाए। आरोपी को दोशी करार देने के लिए पीड़ित के बयानों की सत्यता की जांच करने की जरूरत नहीं है। साथ ही कहा गया कि अगर मामला देर से दाखिल कराया गया है, तब भी उस महिला के बयान को पूरी तरह स्वीकार किया जाए।

न्यायमूर्ति पी सदाशिवम और न्यायमूर्ति आर एम लोढ़ा की बेंच ने फैसला देते हुए कहा कि किसी स्वाभिमानी महिला के लिए बलात्कार का बयान देना अपने आप में अत्यंत अपमानजनक अनुभव है। और जब तक वह लैंगिक अपराध की पीड़ित नहीं होगी, वह वास्तविक अपराधी के अलावा किसी पर आरोप नहीं लगा सकती।

कर्नाटक के दक्षिण कनारा जिले की दो खान मजदूर बहनों के साथ 2004 में हुए बलात्कार के मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह बात कही। इस मामले में घटना के 42 दिन बाद रिपोर्ट लिखाई गई थी, जब तक मेडिकल सबूत नष्ट हो चुके थे। दोनों महिलाओं का कहना था कि उन्हें धमकाया गया था और उन्हें सहारा देने के लिए परिवार में कोई पुरुष सदस्य भी नहीं था। इसलिए उन्हें रिपोर्ट लिखवाने में देरी हुई। उन बहनों की मां ने भी बहनों के पक्ष में गवाही दी।

जब स्त्री धर्म के प्रतिकूल आचरण करती है तो धर्म उसका विनाश कर देता है

सच यह है कि "स्त्री का कोई धर्म नही होता ,हर धर्म ने उसके लिए सिर्फ और सिर्फ बेड़ियाँ ही बनाई हैं "
इस पोस्ट को लिखे बहुत दिन नही हुए ! मनोज-बबली काण्ड को बीते भी अधिक दिन नही हुए । LSD ने फिल्म जगत मे क्या मुकाम बनाया पता नही , लेकिन उसकी एक कहानी ऐसे ही सच से रूबरू कराती है जो रोंगटे खड़े कर देने वाला है। निरुपमा पाठक के पिता का यह पत्र फिर से साबित करता है कि "धर्म" से टकराना स्त्री के लिए कभी आसान नही रहा और यह वह सबसे बड़ी दीवार है जो उसके रास्ते मे खड़ी है।धर्म के ठेकेदार और पितृसत्ता के चौकीदार हाथ मे हाथ मिलाए सत्ता की सीढियाँ चढते हैं और मिल बाँट कर 'धर्म विमुख औरतों' को सबक सिखाते हैं।
निश्चित रूप से यह पत्र एक पिता ने पुत्री को समझाते हुए नही लिखा है , यह एक आहत दर्प वाले पितृसत्ता के मुखिया ने बागी के प्रति दाँत कसमसाते हुए लिखा है, मुट्ठियाँ भींचते हुए ,शब्द चबा-चबा कर लिखा है,गुस्साई रक्तिम आँखों से लिखा है।
यह वह धर्म , परिवार , समाज -व्यवस्था है जो स्त्री के सामने कोई विकल्प नही छोड़ना चाहती।मयंक सवाल उठाते हैं कि क्या यह सच मे आत्महत्या है हत्या नही !!तो मै साफ करना चाहूंगी कि केवल आत्महत्या का विकल्प बेटी के सामने छोड़ना भी हत्या ही है ! यदि सच मे निरुपमा ने आत्महत्या ही की हो तो भी वह धर्म , समाज और पिता इसके कम आरोपी नही हो जाते।शादी में बेटी को ढेर सा गहना कपड़ा देते हैं लेकिन कभी आत्मसम्मान ,स्वाभिमान और भरोसा नही देते ।उसे पालते हुए कभी यह विश्वास नही दिलाते कि हम सदा तुम्हारे साथ हैं , मुड़कर देखोगी तो हमें पाओगी । क्या हम अपने समाज में लडकियों को बेहद असुरक्षित [भावनात्मक , शारीरिक,आर्थिक ] वतावरण नहीं दे रहे जहाँ वे कभी अपना दर्द खुल कर नही कह पाती । वे कभी लौट नही पातीं । क्यों?
हे अन्धे पिताओं, अपनी अजन्मी /जन्मी बेटियों को बख्शो !वे तुम्हे चाहती हैं और एक बार भी यह नही सोचतीं कि तुम अपने 'अहंकार ' के लिए उनकी जान के दुश्मन हो जाओगे। वे तुम्हारी जागीर नही हैं !वे तुम्हारे उपनिवेश नही है !वे तुम्हारी सल्तनतें नहीं है!

चुड़ैल

- अनामिका


"क्योंकर हुआ करते हैं उलटे पाव चुड़ैलों के ?
क्योंकर चुड़ैल बन जाती हैं
जच्चा-चर में टन्न बोल गयी औरतें? "

डरते डरते मैने नानी से पूछा था!

नानी थी फूलों की टोकरी!
जब भी हम घबराते उसमे ही ढूह लगाते।

ज़्यादातर प्रश्नों के उत्तर थे उसी टोकरी में
लेकिन जिन प्रश्नों के उत्तर नही थे
यह प्रश्न उनमें ही होगा
क्यो6कि उसने प्रश्न सुनते ही
नाक की नोंक से उठाया चश्मा
अपनी कमर सीधी की
और सुतरी खींच ली
मुंह के बटुए की !

ज़िन्दगी ऐसी कटी
मुझे रह रह कर आती रही याद नानी
और कभी छ्ट्ठी का दूध भी


अनुत्तरित प्रश्नों की पोटली
तकिए के नीचे धरे
एक दिन मै भी मरी,
और मरी भी कहाँ ?
जच्चा-घर में ही!
एक साथ ही मिल गए मुझको
मेरे उन प्रश्नों के उत्तर
जब उलटे पाँव लौट आई मैं दुनिया में!
लौटना ज़रूरी था
और ज़रूरी था देखना-
मेरी वह दुधमुँही सलामत तो है न!
दीए पर ठीक से पड़ा है कि नही पड़ा
उसका कजरौटा !

हाँ ,उलटे हैं मेरे पाँव,
पर दुनिया मे मुझको दिखा दो कोई भी औरत
जो उलटे पाँव नही चलती,
व्यतीत मे जिसके
गड़ा नही कोई खूँटा!
भागती नही औरतें-
लौट आती हैं उलटे पाँव,
अमराई के खाली झूले और पालने
लू के थपेड़ों से नही झूलते
ये ही झुलाती हैं उन्हें-
हर बार उलटे पाँव !

('हँस' ,मई 2010 से साभार्)

Monday, April 26, 2010

रंगमंच पर स्त्री छवि

महिला रंगकर्मियों की रंगमंच पर एक सार्थक उपस्थिति रही है। खास कर स्वातंत्र्योत्तर आधुनिक रंगमंच पर, वरन अपने आरंभिक युग में पुरुष ही महिलाओं की भूमिका निभाते रहे। फ़िर समाज में हाशिये पे रहने वाली जाति बेडिन की महिलओं ने और बदनाम ईलाके की महिलाओं ने में रंगमंच पर पदार्पण किया, धीरे धीरे भद्र महिलाएं भी इस क्षेत्र में आ गयी।
अभी हाल ही में दिल्ली में महिला केन्द्रित दक्षिण एशिययाइ नाट्य समारोह का आयोजन किया गया। इस नाट्योत्सव की थीम थी स्त्री और नाम था लीला। महि्ला केन्द्रित नाट्यआलेख, महिला निर्देशक और महिला अभिनेत्रियों के काम का प्रदर्शन किया गया। भारत के अलावा, बांग्लादेश, पकिस्तान, मालदीव, अफ़गानिस्तान, नेपाल, श्रीलंका इत्यादि दक्षिण एशियाई देशों ने शिरकत की। उदघाटन अमाल अल्लाना द्वारा निर्देशित नाटकनटी विनोदनी से हुआ। यह प्रस्तुति पिछले कुछ वर्षों मे कफ़ी चर्चा बटोर चुकी है। यह अभिनेत्री बिनोदिनी के आत्मकथा अमरकथा पर आधारित है, यह एक महिला के सार्वजनिक जीवन में उतरने और स्वतंत्रता और पहचान को प्राप्त करने का साहसिक प्रयास है। जन्म से वेश्या बिनोदिनी, कोलकात्ता के रंगमंच पर अभिनय करने वाली पहली महिला थी, जिसने सफ़लता की उंचाइयां भी पायी। मंच पर जीवन के समानांतर उसके जीवन के अनुभव कैसे उसके अभिनय में सहायक बने, समाज के उच्च वर्णों द्वारा कैसे उसका शोषण किया गया, यह नाटक इसी की कहानी कहता है। नाटक में वृद्ध बिनोदिनी को सब कुछ याद करते हुए दिखाया गया है, यह स्मृतियां एकाग्र रूप में ना आकर के टुकडो टुकडों में आती है। बिनोदिनी के विभिन्न अवस्थाओं को अलग अलग पात्रों ने जीया है। इससे उसके अंतर्द्वंद्वं को उभारने में सहायता मिली है। मंच सज्जा में सफ़ेद विंग्स और प्लेटफ़ार्म का इस्तेमाल किया गया है। यह विंग्स चलायमान थे और इन पर प्रोजेक्टर के सहारे, महल, स्टेज, घर और बाग का इच्छित दृश्यबंध बना लिया जाता था। निसार अल्लाना की इस मंच सज्जा के साथ साथ नाट्क की वेश-भुषा भी काफ़ी आकर्षक थी। सभी अभिनेत्रियों ने अपनी भूमिकाएं अच्छी तरह से निभाई थी।
सकुबाई, नादिरा जहीर बब्बर द्वारा निर्देशित एकजुट की प्रस्तुति थी। इस एकल अभिनय में सरिता जोशी ने कमाल कर दिया था। पूरे डेढ घंटे दर्शक उनके अभिनय को मंत्रमुग्ध हो देखते रहे। इस नाटक में मुम्बई की चाल में रहने वाली सकुबाइ फ़्लैट और अपार्टमेंट में रहने वाले समुदाय, जिनके यहां वह काम करती है, के जीवन के अंतर्विरोधों को उजागर करती है। यह विपन्न स्त्री की निगाह है जिसका अपना घर बारिश में भीग रहा है और वह दूसरे का घर ठीक कर रही है। वह अमीर बच्चे के पीछे पीछे दु्ध लेकर भागती है और उसके बच्चे एक ब्रेड के लिये टूट पडते हैं। उसे सबसे आश्चर्य होता है कि आजकल पढे लिखे और अनपढ भी घर घर घुमते है। उसका अपना जीवन कई कडवी स्मृतियों से भरा है पर वह जीवन का रस लेना जान गयी है। एक उच्च मध्यवरगीय घर के अंदरूनी हिस्से की तरह दृश्यबंध को यथार्थवादी रूप दिया गया था। उसी के भीतर गति करते हुए सकुबाई के रूप में सरिता जोशी ने दो स्तरों के बीच की खाई को उजागर किया था। यह प्रस्तुति निस्संदेह सरिता जोशी के लिये याद रह जायेगी।
पाकिस्तान की सीमा किरमानी चरचित निर्देशिका है, अरिस्तोफ़ेनिस के नाट्क लिस्स्ट्राटा का रुपांतरण जंग अब नहीं होगी के नाम से ले कर आयी थी। इस नाटक में दो कबीले खुबैनी और फ़ुलमांछी की औरतें जो जंग से आजीज आ चुकी है, निर्णय लेती है कि वे अपने पति से दूर रहेंगी और कबीले के खजाने पर कब्जा कर लेती है। इस घटना से सभी मर्द नाराज होते हैं पर सभी औरतें एकत्र होकर उनका सामना करती हैं और उन्हे घुटने टेकने पर मजबूर करती हैं। दोनों कबीलों मे समझौता होता है कि अब जंग नहीं होगी। औरते अपने दानिश मंदी से जंग को हमेशा के लिये टाल देती हैं। एक सादे रंगमंच पर देह गतियों और गीत संगीत के जरि्ये यह प्रस्तुति अपना आकार लेती है। प्रकाश और ध्वनि प्रभाव भी इस नाटक के प्रभाव को उभारते है खासकर प्रकाश परिकल्प्ना काफ़ी कल्पनाशील है। प्रस्तुति के दौरान नाटक धीरे धीरे समसामयिक हो जाता है दोनों कबिले भारत और पाकिस्तान का रूप ले लेतें हैं। इनका अतीत एक है, आजादी की लडाई उन्होंने साथ लडी है, पर अब एक दूसरे से लड रहें हैं। औरतों को इस जंग में सबसे अधिक नुकसान उठाना पड रहा है इसलिये औरते कदम बढाती हैं और जंग को रोकने की पहल करती हैं।
सावित्री देवी भारतीय रंगमंच पर समकालीन श्रेष्ठ अभिनेत्रियों में से एक है। कन्हाईलाल की प्रस्तुति द्रोपदी में उनकी अभिनय क्षमता का रूप देखने को मिलता है। सैनिक दमन और अत्याचार के विरोध में सक्रिय द्रोपदी के पति को उसी के एक साथी के कारण सैनिक मार देते हैं। संघर्ष का बीडा उठाये द्रोपदी पकडी जाती है और उसका बलात्कार होता है। मंच पर दर्शकों और सैनिको के समने वे निर्वस्त्र होती है तो प्रतीत होता है कि हम खुद नंगे हो गयें हैं। कन्हाईलाल के प्रदर्शन की खासीयत इसमें मौजुद हैं। सादे रंगमंच और अभिनेता की देह गाति के द्वारा ही दृश्यबंध का निर्माण शैली बद्ध अभिनय और प्रकाश का उपयोग। यह नाटक पूरे पूर्वोत्तर में चल रहे सैनिक दमन के विरोध की प्रेरणा प्रदान करता है। सैनिकों के बधन में फ़ंसी सावित्री की कसमसाहट और चेहरे का तनाव सब कुछ उल्लेखनीय है। सावित्री अभिनय के दौरान अपनी एक एक मांशपेशियों से काम लेती हैं। सारा दमन और प्रतिरोध हम एक साथ उनके चेहरे पर देखते हैं।
अपने द्वारा देखी गयी इन प्रस्तुतियों की कुछ बातें उजागर कर दूं;
इन सारी प्रस्तुतियों में हाशिये की स्त्री और उनकी आंखों से समाज के चरित्र का चित्रण किया गया है।
औरतें अब चूप रहने वाली नहीं हैं वो मर्दों के बिना रहना जान गयी हैं, वक्त आने पर वह ने्तृत्व भी कर सकती है,और मर्दों से मुकाबला भी।
लगातार दमित होने के अभिशाप से उबरने के लिये अब नारियों को ही आगे आना होगा और अपने दमन का सक्रिय प्रतिरोध करना होगा।
और सबसे महत्त्वपूर्ण की जिस सभ्यता को मर्दों ने लहुलुहान कर दिया है उसकों बचाने और सुधारने की जिम्मेदारी महिलाओं को ही उठानी होगी।
यही इस लीला का सार है।

Saturday, April 24, 2010

ये रचती इतिहास सखी !

                                  
                          गर ये जीवन बन जाए जंग ,
                          तो उठा चलो तलवार सखी,
                          नामर्दों की सेना से भिड़ कर
                           बस कर दो नर संहार सखी.
                           दिखला दो अपनी ताकत को
                           अब नहीं किसी पर भार सखी.
                           काँधे पर डालो तरकश तुम
                           लक्ष्य से  कर दो पार सखी. 


                ये पंक्तियाँ एक ऐसी नारी के लिए निकली हैं, जिसने इस समाज में लीक से हट कर इतिहास रचा है. आज तक कुशल महिलाओं ने जो इतिहास रचा और वे अखबारों में छा गयीं. ये बहुत ख़ुशी का विषय रहा किन्तु अकुशल श्रम जो सिर्फ दूसरों के घर में घरेलु काम करके आजीविका कमा रही हैं. इस काम से इतर और वह भी ऐसा काम जो स्त्री जाति के द्वारा न किया गया हो, एक महिला पुरुषों की बराबरी से चल पड़ी हो तो उसके साहस और आत्मविश्वास को हजार बार स्वीकार करना पड़ेगा. 
                                              
                                         प्रस्तुत चित्र और आलेख दैनिक जागरण के साभार है और इस इतिहास को रचने वाली है बुंदेलखंड के हमीरपुर जिले के बदनपुर गाँव कि रहने वाली फूलमती. शायद लक्ष्मीबाई से प्रेरित ये महिला निकल पड़ी है अपनी जंग अकेले लड़ने के लिए. गाँव की  नारी पढ़ी लिखी तो नहीं है कि कहीं नौकरी कर ले और गाँव के वातावरण में उसे वहाँ कोई और नौकरी मिलने से रही. अकर्मण्य और नशेबाज या व्यसनी पति का होना ऐसी कई महिलायों का प्रारब्ध बन चुका है और फिर परिवार का पालन कौन करे? तब ही वह सिर से पल्ला हटा कर कमर में कसती है और चल पड़ती है अपनी लड़ाई खुद लड़ने के लिए. अपनी ताकत का अहसास होता है उसे, और उस के अनुरूप ही वह परिवार के लिए समर्पित होती है. 
ये महिला भी हमीरपुर से बदरपुर के बीच रिक्शा चला कर सवारियां ढोती  है और अपने परिवार का पालन करती है. 
ऐसी नारी शक्ति को प्रेरणा बनाना होगा कि गर हम ठान  लें तो कुछ भी कर सकती हैं.
इस जगह सुभद्रा कुमारी चौहान की पंक्तियाँ का उल्लेख भी प्रासंगिक होगा:
वीर पुरुष यदि भीरु हो तो दे ऐसा वरदान सखी
अबलायें उठ पड़ें देश में करे युद्ध घमासान सखी,
पंद्रह  कोटि असहयोगिनियाँ दहला दें ब्रह्मांड सखी,
भारत लक्ष्मी लौटने को रच दें लंका काण्ड सखी.

Tuesday, April 20, 2010

वर्ना रोज़ कोई न कोई श्रीधरम अफसोस करेगा......

"माँ कहती है कि भगवान की लीला देखो । अपने गाँव के दुखी मियाँ की चौदह साल की बेटी सबीना की दो-ढाई वर्ष पहले शादी हुई थी ।वह गर्भवती हुई और प्रसव के दौरान ही चल बसी ।दो महीने के भीतर ही दुखी मियाँ ने अपने दामाद का गम दूर करने के लिए अपनी दूसरी बेटी रुबिना का निकाह उससे कर दिया ।जैसे प्रसव के दौरान सबीना मरी थी वैसे ही रुबिना भी अपने नवजात बच्चे सहित अल्लाह को प्यारी हो गयी।मैने माँ से पूछा कि दुखी ने डॉक्टर को क्यों नही दिखाया । माँ बोली - "कितने डॉक़्टर हैं तुम्हारे गाँव-जवार में?अगर डॉक़्टर होते तो मै ज़िन्दगी भर अस्पताल-अस्पताल भटकती ही रहती ।" कई ऑपरेशन झेल चुकी माँ अब शायद ओपरेशन नही कराना चाहती थी तभी डॉक्टर चिल्लाई - 'पता नही है तुमको कि कैंसर है ? सर्जरी नही करवाओगी तो कैसे झेलोगी इस बीमारी को ।।अभी तो खून रिस रहा है धीरे धीरे कीड़े पड़ जाएंगे ।बदबू फैलेगी।"
......
यह लेख लिखते हुए(अंतिम अरण्य में , जनसत्ता, 19 अप्रैल 2010) श्रीधरम बताते हैं कि एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में प्रति सात मिनट में एक औरत गर्भाशय के मुँह के कैंसर से मरती है। अब इस बीमारी का टीका उपलब्ध है। काश मेरी माँ और नानी यह टीका लगवा चुकी होतीं क्योकि नानी भी इसी बीमारी से मरी थी।

यह सच है कि सर्विकल कैसर (cervical cancer) अक्सर चुपचाप आता है और स्त्रियों के लिए मौत का कारण बनता है।कम उम्र के विवाह , कम उम्र मे गर्भधारण,बार-बार गर्भधारण (अक्सर बेटे की चाह में) के साथ साथ् और भी कई अन्य वजहों से।HPV वायरस जो बहुत आम है इस रोग का कारण बनता है और कभी भी किसी स्त्री को हो सकता है। लेकिन जो स्थिति चिंता मे डालती है वह यह कि स्त्री-स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही गाँवों मे अत्यधिक है। उस पर से स्वास्थ्य सुविधाएँ न के बराबर । अन्यथा श्रीधरम की माँ को यह कहने की आवश्यकता न पड़ती कि अगर डॉक़्टर होते तो मै ज़िन्दगी भर अस्पताल-अस्पताल भटकती ही रहती ।ग्रामीण समाज -परिवारों की शक्ति -संरचना मे स्त्री का स्थान सम्मानित मनुष्य का नही है ।जबकि वह न केवल परिवार के सभी काम करती है , बच्चे जनती और पालती है वरन खेतों मे भी अपनी सामर्थ्य -भर परिश्रम करती है।अपनी छोटी छोटी बीमारियों को छिपाती है , सहती चुप रहती और करती चली जाती है क्यों ? इसी लेख के अनुसार - "कोई माँ कैसे अपने बच्चों का पेट काटकर अपना इलाज करवा सकती है?"
शहरों में जागरूकता है । लेकिन क्या यहाँ भी पूरी तरह से स्त्रियाँ खुद के स्वास्थ्य और उनके परिवार वाले अपने 'कुलदीपकों' की माँओं के स्वास्थ्य के प्रति सचेत हैं ? नही ! क्या वे जानते हैं कि सर्विकल कैसर कितना आम है और क्या वे यह भी जानते हैं कि इस बीमारी को रोका जा सकता है और इस बीमारी का टीका अब बाज़ार मे उपलब्ध है ? जहाँ गरीबी , अशिक्षा , जहालत नही है क्या वहाँ भी पति , पिता , भाई अपनी बहनों , माताओं , पत्नियों के स्वास्थ्य के लिए सचेत हैं ? और पढी-लिखी , समझदार स्त्रियाँ भी खुद क्या इसकी जानकारी हासिल कर लाभ लेना चाहती हैं ? यदि नही , तो रोज़ कोई न कोई श्रीधरम अफसोस करेगा कि काश ! वह टीका मेरी माँ , नानी या पत्नी भी लगवा पाती !

Saturday, April 17, 2010

स्त्री का कोई धर्म नही होता !

प्रिय फिरदौस ,

आपके साहसी लेखन की मै मुरीद हो चली हूँ । पिछले दिनों ब्लॉग पर हो रहे धर्म-शादी -लव जिहाद के बवाल पर नज़र पड़ी । सच यह है कि "स्त्री का कोई धर्म नही होता ,हर धर्म ने उसके लिए सिर्फ और सिर्फ बेड़ियाँ ही बनाई हैं " । धर्म , ताकत और सत्ता यह एक ही पलड़े में साथ साथ झूलते हैं , पींगे बढाते हैं ।धर्म उसी को ताकत बख्शता है जिसके पास सामर्थ्य है। यह कहना कतई गलत नही होगा कि कोई भी धर्म स्त्री को समर्थ ,सबल, समान मनुष्य नही मानता ।इसलिएमेरे तईं यह बात सिरे से बेकार है कि कौन सा धर्म स्त्री के पक्ष मे है !! क्योंकि दर अस्ल कोई धर्म ऐसा है ही नही ।
मै इस बात को नकारती हूँ कि धर्म किसी ईश्वर या उसके प्रतिनिधि ने बनाया है । मै नकारती हूँ कि ईश्वर भी कोई है! पुरानी दलील ही सही पर सच है कि ईश्वर पुल्लिंग है , धर्म ग्रंथों के रचयिता भी पुरुष ही थे , उपदेश देने वाले पैगम्बर या महापुरुष ही थे। मुझे यह कहने मे कतई संकोच नही कि धर्म ऐसी संरचना है जिसे पुरुषों ने अपने हितों की रक्षा और सुविधाओं के लिए बनाया । इसलिए किसी धर्म मे स्त्री के प्रति समानता -सम्वेदनशीलता कहीं दिखाई नही देती।
यदि आस्था का ही सवाल हो तो मुझे निस्संकोच अपने जीवन मे सही पथ पर चलने के लिए धर्म से ज़्यादा लोकतांत्रिक मूल्यों मे आस्था है । धर्म आधारित किसी नैतिकता से अधिक मानवता और मानवाधिकारों में आस्था है ! कोई धर्म मानवीय नही है यदि वह समाज को बराबरी न देकर एक पद सोपानगत संरचना मे बदलता है और किसी खास वर्ग के लिए विशेषाधिकार सुनिश्चित करता है।
त्योहार , रीतियाँ -रिवाज़ , परम्पराएँ , व्रत -उपवास ,हिजाब या सिन्दूर ,मंगलसूत्र या चार शादियाँ .....अनेक उदाहरण हैं जो साबित करते हैं पुरुष के ईश्वर ने स्त्री को पुरुष की सुविधा और मन बहलाव के लिए बनाया और स्त्री का ईश्वर खुद पुरुष बन बैठा !
स्त्री न ज़मीन के लिए लड़ती है , न धर्म के नाम पर ! यह धर्म और सत्ता की लड़ाई पुरुष की है , जीत भी उसकी ही है । स्त्री या अन्य दमितों के लिए सिर्फ उपेक्षा है !
इसलिए मै "राज्य" और कानून की तरफ आस से देखती हूँ । हालांकि वे भी मर्दवादी सोच से बाहर नही निकल पाए हैं , लेकिन उम्मीद की ही बात हो तो शायद धर्म के मुकाबले उन पर अधिक विश्वास किया जा सकता है ।
धर्म से टकराए बिना स्त्री का भला होने वाला नही है , यह सबसे कड़ी लड़ाई है स्त्री के लिए । इसलिए प्रिय फिरदौस ,आत्मालोचन की इस प्रक्रिया में मेरी ओर से तुम्हें बहुत शुभकामनाएँ !

Saturday, April 10, 2010

सानिया और शोएब की शादी में कमजोर कड़ी कौन?

सानिया मिर्जा के शोएब से शादी के मामले में ताजा खुलासा यह है कि शोएब ने मान लिया है कि उसकी शादी पहले आएशा से हुई थी, जो हैदराबाद की निवासी है। दूसरे दिन ऐसी भी चर्चा थी कि आएशा को चुप कराने के लिए शोएब ने 15 करोड़ का की डील की। खैर!

आएशा को, खुद को शोएब की बेगम साबित करने के लिए सुहागरात का जोड़ा सबूत के तौर पर पेश करना पड़ा जिसमें शोएब का वीर्य लगा था। यह शर्मनाक है कि एक जिम्मेदार पाकिस्तानी नागरिक, सम्मानित खिलाड़ी और जल्द ही सानिया जैसी हिंदुस्तान की सफल, चोटी की टेनिस खिलाड़ी का दूल्हा बनने जा रहे शोएब में इतनी हिम्मत या साफगोई नहीं कि वह कह सके कि हां, उसकी शादी हो चुकी है। उसे ऐसा करने में कोई दिक्कत भी नहीं थी, क्योंकि तलाक लेना उसके लिए चुटकी बजाने जैसा ही था- और आखिरकार यही उसने किया भी- फिर भी उसने सानिया से शादी के लिए सच्चाई छुपा कर खुद को गैर-शादीशुदा बताया।

शुरू-शुरू में ज्यादातर मीडिया ने यही कहा कि किसी सेलीब्रिटी की शादी की खबर आते ही उसके कई चाहने वाले खुद को उसका वैवाहिक जोड़ीदार बताने लगते हैं। यहां तक कि कुछ लोग पागलपन की हद तक ऐसा करते हैं। आएशा सिद्दीकी के दावे को भी ऐसा ही झूठा और भावनाओं में बह कर किया गया दावा बताया गया। पर अब यह साबित हो गया है कि शोएब ने सारी दुनिया को धोखा दिया। वह फरेबी, अविश्वसनीय, स्वार्थी, झूठा साबित हुआ।

शोएब के कन्फेशन के बाद मीडिया के लिए किस्सा खत्म हो चला है। पर मेरे सवालों की शुरुआत यहां से होती है। इस पूरे किस्से में सानिया सबसे कमजोर चरित्र बनकर उभरी है। क्या उसे शोएब के पहले विवाह का पता था, क्या शोएब ने उसे सब बता दिया था और उसके बावजूद वह लगातार उसके साथ खड़ी रही? और अगर पहले नहीं पता था तो फिर आएशा के दावे के बाद उसके कान खड़े नहीं हुए? क्या उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका पति पहले से शादीशुदा है- क्या इसलिए कि वह मुसलमान है और हिंदुस्तान में मुसलमान मर्द को एक से ज्यादा शादियां करने की छूट है और उसने भी अपने को इस परिस्थिति में देखने के लिए तैयार कर लिया है? फिर शोएब के कन्फेशन, झूठा साबित होने से भी उसे फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वह शोएब से प्यार करती है?

अगर सानिया शोएब को ऐसे ही टूट कर चाहती थी तो पिछले साल जुलाई में अपने बचपन के मित्र, पांच साल से दोस्त उद्योगपति सोहराब मिर्जा से धूमधाम से सगाई क्यों की और फिर उसे जनवरी आते-आते तोड़ भी दिया? हां, खबरें बताती हैं कि सानिया और शोएब का इश्क पिछले छह महीने से चल रहा है। इसके पहले महेश भूपति, फिल्म स्टार शाहिद के साथ भी सानिया का नाम जोड़ा गया।

लगता है सानिया को सिर्फ लाइम-लाइट में रहने का शौक या चस्का है, जिसके वशीभूत वह यह सब सनसनीखेज करती चली जा रही है। अल्लाह उसे सही-गलत का फैसला करने की बुद्धि दे। आमीन!