Friday, January 15, 2010

भरोसे का रंग

अपने कुछ ऑब्ज़र्वेशन्स पर आधारित एक लेख लिखा जो जनसत्ता में पब्लिश हुआ 'दुनिया मेरे आगे' कॉलम में। बदलती दुनिया, बदलते समाज की एक झलक हमारे आसपास किस रूप में बिखर रही है...Aapse sajha karne ka man kia

पूजा प्रसाद

अब के समय में जीने के साधन बढ़े हैं, पर जीने की जगह घटी है। रोजगार के अवसरों का जितना बड़ा बाजार सामने सजा है, उसे पाने की चुनौतियां भी उतनी ही बड़ी हुई हैं। ऐसा नहीं कि ये चुनौतियां या ये संघर्ष पहले नहीं थे। पहले भी थे पर अब के तीखेपन के साथ नहीं। पहले गलाकाट स्पर्धा के उदाहरण इक्के-दुक्के मिलते थे, पर अब तो यह अभ्यास की चीज बनती गई है। कहने का मतलब यह कि अच्छे और बुरे दोनों अर्थ में स्थितियां बदली हैं।

निजी क्षेत्र के रोजगार में स्त्रियों के शोषण की बात नई नहीं है। नई बात यह है कि अब के दौर में 'शोषण' को कुछ स्त्रियों ने हथियार बना लिया है। उन्हें पता है कि दफ्तर में अपनी जगह बनाने के लिए किन लटके-झटकों की जरूरत होती है। या फिर पॉवरफुल होने के लिए कैसे अपने 'शोषण' के रास्ते की सीढ़ियां चढ़नी हैं। मैं इस बात की हिमायती कतई नहीं हूं कि 'शोषण' को सीढ़ी बना लिया जाए। या यह भी स्वीकार नहीं सकती कि शोषण के डर से हम घर में दुबके रह जाएं। हमें इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा में शामिल होना होगा बगैर दूसरों का गला काटे और खुद का गला बचाते हुए। हमें सीखना होगा कि किसी हाल में कोई भी हाथ हमारे गले तक न पहुंचे, भले ही वह हाथ पिता का हो, पति का हो, भाई का हो, बहन का, दोस्त का, कूलिग का या फिर बॉस का। लतर वाले पौधे की तरह बढ़ने की बजाय हमें अपनी जड़ें मजबूत करनी होंगी, अपने तने को कठोर बनाना होगा अपनी शाखें फैलानी होंगी। आइए दो पेड़ों की कथा सुनाऊं।

एक परिचित आंटी हैं। उम्र है 58 साल। ठीक-ठाक नौकरी है। इस नौकरी की उम्र हो चुकी है 25 साल। दो बच्चे हैं। लड़की की शादी के झमेले से निबट चुकी हैं। लड़का कभी बीमार रहता है कभी परेशान - जुटी हैं इलाज करवाने में। आंटी के पति नौकरी नहीं करते। शराब और जुआ की चाकरी में वक्त कटता है। जब ये दोनों लत सिर चढ़कर बोलते हैं तो आंटी के चेहरे-शरीर पर निशान छोड़ जाते हैं। यह सिलसिला बरसों से चल रहा है। पिट कर आंटी का डॉक्टर के पास जाना, लंगड़ाते पांवों से या सूजे चेहरे के साथ ऑफिस जाने की बात लंबे अर्से से देखती-सुनती रही हूं। कई बार मामला पुलिस तक पहुंचा। उन्होंने सलाह दी, रिश्तेदारों ने भी समझाया, पर आंटी अपने पति-परमेश्वर को घर से निकालने को तैयार नहीं। कहती हैं - घर में एक मर्द का होना जरूरी है...निकाल दिया तो बाहर के भेड़िए नोंच खाएंगे।

घर के भेड़िए से तंग एक और लड़की को मैं जानती हूं। तकरीबन १० साल पहले हुई थी उसकी शादी। दो बच्चे झोली में आ चुके हैं। अभी उसकी उम्र ३२ के आसपास होगी। प्रफेशनल क्वालिफिकेशन से लैस है। पर कभी नौकरी नहीं की। पति बिजनसमैन हैं। घर की कमाई ठीक-ठाक है, पर दोनों के रिलेशन नहीं। शादी के दो साल तो ठीक गुजरे। बाद के बरसों में तनाव की लकीर मोटी होती गई। हालांकि, अपनी सोसायटी में दोनों ने परफेक्ट कपल का स्टेटस बरकरार रखा। पर अब उनका रिश्ता चरमराने लगा है। रिश्तेदार और घर के बड़े-बूढ़े समझाते हैं - किसी तरह चलाओ...बच्चों का भी सवाल है। पर लड़की डिटरमाइन है। कहती है, अब और नहीं। कुछ भी कर लूंगी, कैसे भी जी लूंगी, पर साथ रहना मुश्किल है। एक दफे मैंने आंटी का रटा-रटाया संवाद उसके सामने रखा - बाहर के भेड़िए नोंच खाएंगे। उसके जवाब ने मुझे सन्न कर दिया। उसने बड़े सपाट लहजे में कहा - दोनों तरफ भेड़िए हैं। दोनों को शरीर चाहिए। घर में शरीर सौंप कर भी सुख नहीं। सम्मान नहीं। बाहर के भेड़िए कभी-काल ही हमला करेंगे, मेरी मजबूरी का बेजा लाभ उठाएंगे... पर आत्मसम्मान के साथ जी तो सकूंगी। पैसे की तंगी तो रह सकती है क्योंकि मेरे साथ मेरे दो बच्चे भी होंगे, पर पैसे के लिए दूसरे का मुंह तो नहीं ताकूंगी। प्रफेशनल क्वॉलिफिकेशन है। पढ़ी-लिखी हूं। काम करने का साहस है। तो क्या बाहर के भेड़िए के हमले का जोखिम क्यों न उठाऊं? क्यों जरूरी है कि भेड़िया कामयाब ही हो जाए। जरूरत पड़ी तो अपने भीतर मैं भेड़िया उगाऊंगी...।

मैंने खूब गौर से देखा उसे। आंटी के चेहरे का संतोष यहां भी दिखा। पर दोनों के संतोष में फर्क था। आंटी का संतोष घर में मर्द के होने से दिखता है। उनके संतोष से मुझे चिढ़ है। जबकि इस लड़की का संतोष आत्मसम्मान के साथ जीने के लिए किए गए फैसले से बन रहा है। हर जोखिम से भिड़ने का साहस इस लड़की के संतोष एक नया रंग दे रहा है। इस नए रंग को मैं चूम लेना चाहती हूं, उसे सलाम करना चाहती हूं।

Wednesday, January 13, 2010

आम औरतों का इस ‘मुक्ति’ से कोई सरोकार नहीं है? गलत।

स्त्री-मुक्ति का यथार्थ और यूटोपिया:भाग-3

- राजीव रंजन गिरि

स्त्री होने भर से सबकी समस्याएं और हित एक नहीं हो जाते, मुक्तिकामी यूटोपिया की दरकार सबके लिए है:स्त्री-मुक्ति का यथार्थ और यूटोपिया:भाग-2

स्वप्न भी एक यथार्थ है:स्त्री-मुक्ति का यथार्थ और यूटोपिया:भाग-1

आरोप है कि स्त्रीवाद और स्त्री-मुक्ति जैसी धारणाओं की देशी जड़ें नहीं हैं और इसका यहाँ के अतीत, सभ्यता और संस्कृति से लेना-देना नहीं है। यहाँ की आम औरतों का भी इस ‘मुक्ति’ से
कोई सरोकार नहीं है। इसे मान भी लें तो क्या अगर कोई विचारधारा अपने मुल्क में नहीं जन्मी तो उसे नहीं अपनाना चाहिए? लोकतंत्र सरीखी धरणाओं का जन्म जिन मुल्कों में नहीं हुआ, उन्हें इन धरणाओं को त्याग देना चाहिए? ये और ऐसे कई सवाल उठा रहा है राजीव के लेख का तीसरा और आखिरी हिस्सा।


जब भी स्त्री-मुक्ति की चर्चा होती है, पितृसत्तात्मक व्यवस्था के
अलमबरदार इसे खतरे के तौर पर प्रचारित करते हैं। ऐसे लोग यह फैलाते हैं
कि मुक्ति की आवाज उठाने वाली ये औरतें पुरुषों से नफरत करने वाली,
परिवार तोड़ने वाली, ब्रा जलाने वाली, परकटी समुदाय की हैं। इनकी कोई देशी
जमीन नहीं है। अव्वल तो यह है कि स्त्री-मुक्ति का सपना देखने वाली या इस
दिशा में चिंतन-मन्थन करने वाली औरतों की कोई एक धारा नहीं है न ही
स्त्री-मुक्ति सम्बन्धी कोई एक अवधारणा। हर बड़े मकसद की तरह इसमें भी
तरह-तरह की वैचारिक सरणियों में यकीन रखने वाले लोग सक्रिय हैं। किसी भी
अस्मितावादी, मुक्तिकामी समूह का अपने ऊपर अत्याचार करने वाले लोगों के
प्रति नफरत पैदा कर अपनी अस्मिता की तरफ ध्यान खींचने और इस ‘अन्य’ के
बरअक्स ‘अपने’ लोगों को एकजुट करना आसान होता है।

नोट करने की बात है कि अगर यह नफरत की प्रवृत्ति बढ़ती गई तो कोई भी मुक्तिकामी परियोजना सफल होने के बजाय एक-दूसरी वर्चस्वकारी शक्ति में तब्दील हो जाएगी। फिर यह एक लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाने की बजाय, इन मूल्यों के लिए खुद भी चुनौती बन जाएगी। इसलिए किसी भी मुक्तिकारी समूह के यूटोपिया में उसके ‘अन्य’ के
लिए क्या भाव-स्थान है, इसके जरिए उस यूटोपिया की जाँच बिल्कुल जरूरी
होती है। यह अच्छी बात है कि स्त्री-समूहों में अपने ‘अन्य’ (पुरुष) के
लिए नफरत का भाव नहीं है। इनकी स्पष्ट समझ है कि हमारा संघर्ष पितृसत्ता
के विविध आयामों से है, न कि पुरुष-व्यक्ति-सत्ता से। स्त्री-मुक्ति के
यूटोपिया में पुरुषों के लिए भी बराबर अधिकार और जगह होगी। अलबत्ता ये
औरतें नफरत पफैलाने वाली नहीं हैं बल्कि समाज में बराबरी, प्रेम और
सौहार्द को स्थापित करना चाहती हैं। हाँ, अगर परिवार का ढाँचा अपने को
बदलकर लोकतांत्रिक नहीं बनाता, पितृसत्ता से चिपका रहना चाहता है, तो
इसका बना रहना क्यों जरूरी है ?

पितृसत्ता पर आधरित मौजूदा ‘परिवार’ में लोकतांत्रिक बनने की प्रक्रिया के दौरान दरार आएगी और एक बेहतर परिवार की
रचना होगी। इस नए बने ‘परिवार’ (या इसका कुछ नया नाम पड़ जाए) में
स्त्री-पुरुष समानता होगी। दोनों को बराबर हक होगा। क्या यह कहने की
जरूरत है कि ऐसा होना सिर्फ स्त्री के लिए नहीं बल्कि पुरुषों के हित के
लिए भी आवश्यक है। जिस ‘ब्रा- बर्निंग’ की चर्चा बार-बार होती हैं, उसे
भी समझने की जरूरत है। असल में, मुक्तिकामी स्त्रियों ने ब्रा को
‘जेण्डर’ के साथ जोड़कर देखा था। अमेरिका में सम्पन्न एक विश्व सुंदरी
प्रतियोगिता के दौरान स्त्रीवादियों ने एक कूड़ेदान में अपना-अपना ब्रा
उतारकर फेंक दिया। इन लोगों ने स्त्रियों से यह अपील भी की ब्रा गुलामी
का प्रतीक है अतः इसे फेंक दें। इन स्त्रियों का मानना था कि स्तन बच्चे
के दूध पीने के लिए है, न कि पुरुष के उपभोग की खातिर। पुरुष-सत्ता ने
इसे भोग की वस्तु बनाकर खास ‘आकार’ में रखने के मकसद से ब्रा का ईजाद
किया है। आशय यह कि स्त्री ‘सेक्स’ के इस अंग को ‘ब्रा’ ने ‘जेण्डर’ में
तब्दील कर दिया है। लिहाजा, गुलामी के इस निशानी को फेंककर जला देना
आवश्यक है।

आज का स्त्रीवाद इस समझ से काफी आगे बढ़ चुका है। दूसरा, ‘ब्रा-बर्निंग’ के मुद्दे पर इतनी हाय-तौबा की दरकार भी नहीं है। यह भी ऐसी ही घटना है जैसा कि गर्भपात के अधिकार के लिए हो रहे आंदोलन के दौरान सीमोन सहित फ्रांस की अनेक स्त्रीवादी महिलाओं ने अपना दस्तख्त कर सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उन्होंने
अपने जीवन में गर्भपात कराया है। गर्भपात कराना उनका हक है और यह अधिकार
कानूनी तौर पर उन्हें मिलना चाहिए। कानूनी हक मिलने के साथ समाज में
गर्भपात को लेकर मौजूद ‘टैबू’ भी इससे दूर हुआ। अतः इतिहास की इन घटनाओं
को उसके संदर्भ में ही देखने से, इन्हें ठीक से समझा जा सकता है। बहरहाल
ऐसी अपेक्षा तो स्त्री-पुरुष समता में भरोसा रखने वालों से की जा सकती
है, पितृसत्ता के अलमबरदारों से नहीं।

स्त्रीवाद और स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया के समर्थकों पर आरोप लगाया जाता है कि इनकी देशी जड़ें नहीं हैं। ऐसा कहकर इस विचार को फैलाने की पुरजोर कोशिश होती है कि ये विदेशी धरणाएँ हैं और इसका यहाँ के अतीत, सभ्यता और
संस्कृति से लेना-देना नहीं है। यहाँ की आम औरतों का भी इस ‘मुक्ति’ से
कोई सरोकार नहीं है। अव्वल तो यह कि कोई भी विचारधारा, वैचारिक सरणी अपने
मुल्क में नहीं जन्मी तो क्या इसे नहीं अपनाना चाहिए ? क्या लोकतंत्र,
आधुनिकता सरीखी धरणाओं का जन्म जिन मुल्कों में नहीं हुआ, उन्हें इन
धरणाओं को त्याग देना चाहिए ? ऐसी कूपमंडूकता के खरतनाक मंसूबों को हमेशा
याद रखना होगा।

दूसरी बात यह कि स्त्री-मुक्ति की देशी जड़ें यहाँ मौजूद रही हैं। स्त्रीवादी बुद्धिधर्मियों ने इसकी गहरी पड़ताल कर हमारी इस
महत्त्वपूर्ण विरासत का विवेचन-विश्लेषण किया है। जबसे पितृसत्ता का अंकुश कायम हुआ है, इसके प्रतिरोध में स्त्री-आवाजें भी आई हैं। क्या इन आवाजों में मुक्ति-कामना नहीं झलकती ? अपनी पीड़ा का अहसास कराती इन
आवाजों में मुक्ति की गहरी लालसा का म(मिराग भी लबरेज़ है। गार्गी, थेरी
गाथा की स्त्रियाँ, आंडाल, अक्का महादेवी, मीराबाई, सहजोबाई से लेकर
रमाबाई, ताराबाई शिंदे, महादेवी वर्मा सरीखी अनेक स्त्रियों की आवाज़ में
अपनी पीड़ा और पितृसत्ता की मुखालफत शामिल है। पितृसत्ता ने कई स्तरों पर
काम किया है। इनकी आवाज को दबाने से लेकर इनके विचारों को नष्ट करने तक
पितृसत्ता की प्रत्यक्ष हिंसा तो दिखती है, पर चुप कराने वाली परोक्ष
हिंसा जल्द दिख नहीं पाती। आलम यह रहा है कि निकट अतीत में सीमंतनी उपदेश
की महान रचनाकार ‘एक अज्ञात हिंदू औरत’ ही बनी रही। आज तक उस साहसी
स्त्री का नाम पता नहीं चल पाया है। क्या यह उस परोक्ष हिंसा का एक बुरा
नतीजा नहीं है?

ऐसा नहीं है कि पितृसत्ता की मुखालफत करने वाली ये स्त्रियाँ सिर्फ भारत या यूरोप में हुई हैं। जिस तरह हर मुल्क में
पितृसत्ता थी, उसी तरह इसकी विरोधी भी थीं। मसलन, काफी पहले न जाकर निकट अतीत, उन्नीसवीं सदी में गौर करें तो चीन में जिउ जिन, श्रीलंका में सुगला तथा गजमन नोना, इण्डोनेशिया में कार्तिनी, ईरान में कुर्रत उल ऐन
सहित अनेक महिलाएँ हर मुल्क में मिल जाएंगी। यह अलग बात है कि पितृसत्ता
का विरोध करने के साथ-साथ, मौजूदा दौर के हिसाब से देखने पर, इनकी सीमाएं
भी सामने आती हैं। अपनी इस विरासत को न तो नकार कर और न ही बढ़-चढ़कर तारीफ
करके इसे समझा जा सकता है। विरासत के सर्जनात्मक विकास के लिए
खूबियों-सीमाओं को ध्यान में रखते हुए इसके साथ जिरह जरूरी होता है और
कारगर भी।

अपने देश में स्वाधीनता आंदोलन ने स्त्रियों को घर की दहलीज से बाहर
निकाला। इसी दौरान बड़ी तादाद में स्त्रियों ने सामाजिक-राजनीतिक कार्य
में हिस्सा लिया। राजनीतिक प्रश्न के तौर पर स्त्रियों का सवाल इसी दौर
में उभरा। स्त्रियों का घर की चारदीवारी से बाहर आकर सामाजिक-राजनीतिक
कामों में हिस्सा लेना, सभा-संगोष्ठी में जाना अपने आप में स्त्री-मुक्ति
की दिशा में बढ़ी हुई घटना थी। इसके लिए स्वाधीनता-आंदोलन की अगुवाई करने
वाले नेताओं को इसका श्रेय देना चाहिए। पर यह भी याद रखना चाहिए कि दलित
मजदूरों और किसानों के सवाल की तरह स्त्रियों का प्रश्न भी उनके लिए
स्वाधीनता-आंदोलन का ही मसला था, अलग से स्त्री-मुक्ति का सवाल नहीं।

उस दौर के राष्ट्रवादी नेताओं ने स्त्रियों के मसले को अपने नजरिये
से स्वाधीनता आंदोलन की जरूरत के नजरिये से उठाया। स्त्रियों को घर से
बाहर लाकर आंदोलन से जोड़ना उनकी ऐतिहासिक जरूरत थी। यही वजह है कि १९१७
में सरोजनी नायडू की अगुवाई में स्त्रियों के एक प्रतिनिधिमंडल को
मांटेस्क्यू से मिलकर कांग्रेस, मुस्लिम लीग और काउंसिल के उन्नीस
गैर-सरकारी सदस्यों द्वारा उठाए गए स्वराज्य की मांग को अपना समर्थन देते
हुए स्त्रियों के सवाल को अलग से उठाना पड़ा। स्वाधीनता आंदोलन के अगुआ
खुद ‘जेण्डर’ की धरणा से ग्रसित थे। उन्हें लगता था कि स्वाधीनता आंदोलन
में जो काम पुरुष कर सकते हैं, स्त्रियां नहीं कर सकतीं। इसे समझने के
लिए महात्मा गांधी द्वारा आहूत नमक सत्याग्रह को याद किया जा सकता है।
गांधी जी स्वाधीननता आंदोलन में स्त्रियों को भाग लेने के लिए प्रेरित
करते थे परंतु नमक सत्याग्रह के लिए हुए दांडी मार्च में हिस्सा लेने से
रोक रहे थे। इन्हें लगता था कि इतना दूर चलने से स्त्रियां थक जाएंगी।
गांधी जी की इस मनाही का सरोजनी नायडू सहित कुछ स्त्रियों ने विरोध किया
और दांडी-मार्च में शामिल होने हेतु जिद की। इनकी जिद के सामने झुककर
गांधी जी ने बाद में अपनी हामी भरी। दांडी-मार्च और इसकी परिणति नमक
सत्याग्रह में शामिल स्त्रियों ने गांधी जी की पूर्व मान्यता को गलत
साबित करते हुए पुरुषों की तुलना में ज्यादा काम किया।

इस तरह की कई घटनाएँ बताती हैं कि स्वाधीनता-आंदोलन के नेताओं की मानसिक बनावट में
‘जेण्डर’ की पितृसत्तात्मक मान्यताओं का कितना असर था। इसी के साथ कुछ
ऐसी बातें भी हैं जिनमें भारत की स्त्रियों को, अपने हक के लिए यूरोप की
महिलाओं की तुलना में काफी कम संघर्ष करना पड़ा। यूरोपीय महिलाओं को अपने
राजनीतिक हक, ‘वोट देने का अधिकार’ पाने के लिए लंबी जद्दोजहद करनी पड़ी
थी।

१९२८ ई में हुए मुंबई (तब बम्बई) कांग्रेस में सरोजिनी नायडू ने
काउंसिलों के चुनाव में स्त्रियों के मताध्किार का प्रस्ताव रखा। इस
प्रस्ताव का मदन मोहन मालवीय ने मुखर विरोध किया था। हालांकि मालवीय के
विरोध के बावजूद यह प्रस्ताव पास हो गया। आशय यह है कि स्त्रियों के पक्ष
में, भले ही कुछ कदम आगे बढ़कर साथ देने के लिए, स्वाधीनता-आंदोलन में
शामिल शिक्षित मध्य वर्ग सामने आता था।

भारत में स्त्रीवाद और स्त्री-मुक्ति के हिमायतियों ने सिर्फ स्त्रियों
का सवाल उठाकर, उसके लिए जोखिम भरा संघर्ष नहीं किया है। बोधगया मुक्ति
आंदोलन, चिपको आंदोलन और आंध्र प्रदेश में शराब के खिलाफ हुए आंदोलन
जिसकी वजह से सरकार गिर गई थी, स्त्रियों द्वारा किए गए आंदोलन हैं
जिसमें अपनी-अपनी तरह की स्त्रीवादी महिलाएं शामिल रही हैं। इन सारे
संघर्षों में स्त्रियों को काफी सफलता भी मिली है। इस लिहाज से गौर
फरमाएं तो भारत के स्त्री-मुक्ति आंदोलन की यह निजी खासियत है और इसके
विस्तार तथा व्याप्ति का सूचक भी।

स्त्री-मुक्ति का एक यूटोपिया एक सदी पहले रुकैया सखावत हुसैन ने अपनी
कहानी सुल्ताना का सपना में रचा था। इसके हिसाब से पुरुष घरों में सारा
काम कर रहे हैं और औरतें बाहर के सारे काम को कर रही हैं। इस यूटोपिया को
लागू करने की प्रक्रिया नफरत पर आधरित तो नहीं थी, परंतु इसमें सारा क्रम
सिर्फ उल्ट दिया गया था। मौजूदा स्त्री-मुक्ति-विमर्श इस समझ से काफी आगे
बढ़ चुका है। अब क्रम को सिर्फ उल्टा नहीं जाता बल्कि सहभागिता,
स्वतंत्रता और समता को सुनिश्चित किया जाता है।

नोट करने लायक बात यह है कि यथार्थ और यूटोपिया एक-दूसरे से बिल्कुल
अलहदा नहीं होते। दोनों के बीच द्वन्द्वात्मक रिश्ता होता है। यथार्थ के
घात-संघात और समझ से यूटोपिया आकार ग्रहण करता है तो यूटोपिया हमें
यथार्थ को जाँचने-समझने की समझ भी देता है, जिससे उस यथार्थ की जटिल
संरचना में निहित वर्चस्वकारी रूप को जानकर उसे दूर करने की दिशा में
बढ़ते हैं। स्त्री-मुक्ति का यूटोपिया यथार्थ के विभिन्न आयामों को समझे
बगैर नहीं रचा जा सकता। व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं के साथ पितृसत्ता ने
अन्योन्याश्रित सम्बन्ध बना रखा है। इसलिए इन सारे पहलुओं को ध्यान में
रखकर ही स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया का खाका निर्मित हो सकता है।
पितृसत्ता के इस मकड़जाल को देखते हुए ऐसा लगता है कि बगैर पूरी व्यवस्था
बदले पूर्णतः स्त्री-मुक्ति संभव नहीं। एक न एक दिन स्त्री-मुक्ति का
यूटोपिया यथार्थ जरूर बनेगा। मुक्ति का स्वप्न इसे हकीकत तक जरूर
पहुँचायेगा। कवि वेणु गोपाल की कविता का सहारा लेकर कहें तो …

न हो कुछ भी
सिर्फ सपना हो
तो भी हो सकती है शुरुआत
और यह एक शुरुआत ही तो है
कि वहाँ एक सपना है।

Friday, January 8, 2010

लड़ाकू भूमिका में महिला सैनिक क्या मिसफिट हैं?

आज, 8 जनवरी 2010 के नवभारत टाइम्स में संपादकीय पृष्ठ पर भी मेरा यह लेख पढ़ा जा सकता है। ऑनलाइन एडीशन का लिंक है-
लड़ाकू विमान में प्रेजिडेंट की उड़ान का मतलब- आर. अनुराधा

अपने सिर को हमेशा साड़ी के पल्लू से ढक कर रखने वाली 74 वर्षीया राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने पिछले दिनों पूरे कॉम्बैट सूट में सुखोई फाइटर जेट में उड़ान भरी। इसके महीना भर बाद ही वे भारत के इकलौते विमानवाहक पोत आईएनएस विराट पर भी सवार हुईं। हमारी राष्ट्रपति की ये पहलकदमियां स्त्री शक्ति में बढ़ोतरी और उसमें देश के भरोसे की प्रतीक हैं।

राष्ट्रपति ने अपने इन कामों से इस भरोसे को और मजबूत किया है कि महिलाएं न सिर्फ फाइटर प्लेन उड़ा सकती हैं, बल्कि इस तरह के जटिल से जटिल मोर्चे पर सफलतापूर्वक काम कर सकती हैं। हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान ने अपनी वायु सेना में महिला लड़ाकू विमानचालकों की भर्ती की इजाजत दी हुई है, पर भारत में इस पर रोक है। हमारे यहां ऐसा क्यों है?

पिछले साल 13 दिसंबर को केंद्र सरकार ने एक मामले में दिल्ली हाई कोर्ट से कहा कि भारतीय थलसेना और वायुसेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमिशन देने की कोई संभावना नहीं है क्योंकि उनकी भर्ती के लिए जगह खाली नहीं है। उसके मुताबिक सेना में पहले से ही जरूरत से ज्यादा अधिकारी भर्ती हैं। ऐसे में अगर शॉर्ट सर्विस कमिशन (एसएससी) की महिला अधिकारियों को स्थायी कमिशन दिया जाएगा, तो उन्हें कहां काम दिया जाएगा?

हमारे देश में महिला सेना अधिकारियों को स्थायी कमिशन का विकल्प नहीं दिया जाता। एसएससी के जरिए भर्ती के बाद ज्यादा से ज्यादा 14 साल की नौकरी के बाद उन्हें सेना छोड़नी पड़ती है और फिर उन्हें कोई सिविल नौकरी ढूंढनी होती है, क्योंकि पुरुष अधिकारियों की तरह उन्हें सेवानिवृत्ति पर पेंशन वगैरह की सुविधाएं देने का भी कोई प्रावधान भारतीय सेना में नहीं है।

थल और वायुसेना की 20 महिला अधिकारियों ने यह मामला कोर्ट में दायर किया है कि उन्हें पुरुषों की तरह ही स्थायी कमिशन क्यों नहीं दिया जाता, जबकि वे भी पुरुषों की ही तरह हर परीक्षा और ट्रेनिंग से गुजरती हैं। इसके जवाब में सेना ने ए. वी. सिंह समिति की रिपोर्ट के हवाले से दलील दी कि फिलहाल युवा अधिकारियों की ग्राउंड ड्यूटी के लिए ज्यादा जरूरत है इसलिए महिलाओं को सेना में नहीं लिया जा सकता। सेना की ओर से कुछ दूसरे तर्क भी पेश किए गए, जैसे महिला अधिकारी हमेशा अपनी पसंद की पोस्टिंग चाहती हैं, जबकि पुरुष उतना हो-हल्ला नहीं करते। यह भी कहा गया कि अगर महिलाओं को सीमा पर तैनाती किया जाएगा, तो वहां उनके लिए ज्यादा खतरे हो सकते हैं। हालांकि डिविजन बेंच ने इन सभी तर्कों को नकारते हुए कहा कि कोई राय भावनाओं के आधार पर नहीं बनाई जाए। साथ ही सवाल किया कि क्या यह जरूरी है कि महिला अधिकारियों को फॉरवर्ड इलाकों में ही भेजा जाए। कई दूसरी ऐसी महत्वपूर्ण जगहें हैं जहां महिलाओं की तैनाती में कोई समस्या नहीं है।

महिलाओं की सेना में भर्ती के मसले पर वायुसेना के एयर मार्शल पी. के. बारबोरा ने भी हाल में एक टिप्पणी करके सनसनी फैला दी। उनके मत में महिलाओं को फाइटर पायलट बनाना आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं है। फाइटर पायलट की ट्रेनिंग पर बहुत खर्च आता है। भर्ती के कुछ साल बाद शादी करके वे मां बनना चाहें तो इससे वे कम से कम 10 महीने के लिए काम से दूर हो जाती हैं। इस कारण उन पर हुए खर्च के मुकाबले उनकी सेवाओं का पूरा फायदा नहीं लिया जा पाता है। सिर्फ दिखावे के लिए उनकी भर्ती नहीं की जानी चाहिए।

भारतीय सेना में महिलाओं की भूमिका लंबे समय तक डॉक्टर और नर्स तक ही सीमित रही है। 1992 में एविएशन, लॉजिस्टिक्स, कानून, इंजीनियरिंग, एग्जेक्यूटिव जैसे काडर में रेग्युलर अधिकारियों के तौर पर भर्ती के दरवाजे उनके लिए खुले। इन पदों के विज्ञापनों के जवाब में रिक्तियों से कई गुना ज्यादा अर्जियां पहुंचीं। जोश से भरपूर महिलाओं ने रोजगार के इस नए मोर्चे पर कामयाबी के झंडे गाड़े और कई शारीरिक गतिविधियों में पुरुषों से आगे रहीं। उनमें नेतृत्व के गुण थे और सहकर्मियों और अपने अधीनस्थ सैनिकों के साथ उनका व्यवहार सकारात्मक पाया गया।

झांसी की रानी लक्ष्मी बाई, रजिया सुल्तान, बेगम हजरत महल, जीनत महल, रानी चेन्नम्मा जैसे अनगिनत नाम हैं जो युद्धों में दुश्मनों के दांत खट्टे करने में इंच भर भी पुरुषों से पीछे नहीं रहीं। सुभाष चंद्र बोस की सेना में भी महिला ब्रिगेड ने कठिन जिम्मेदारियों को बखूबी पूरा किया था। विश्वयुद्ध रहे हों या हाल के इराक, अफगानिस्तान, फॉकलैंड युद्ध, मित्र देशों की जमीनी और हवाई सेनाओं की लड़ाकू टुकड़ियों में महिलाएं बहुतायत में रही हैं। हिटलर की बदनाम एसएस सेना ने महिला दुश्मनों के साथ जरा भी ढील नहीं बरती और उन्होंने भी पुरुषों के बराबर ही मार खाई।

महिलाएं मानसिक काम ज्यादा स्थिरचित्त होकर कर पाती हैं, इसलिए आज के तकनीक प्रधान युद्ध में उनकी भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है। फिर भी हमारे देश की सीमाओं की दुर्गम स्थितियों के मुताबिक सख्त शारीरिक तैयारी की जरूरत को हल्के में नहीं लिया जा सकता। महिला सैनिकों को भर्ती के समय और बाद में एक कैडेट के तौर पर पुरुषों के समान ही शारीरिक और मानसिक क्षमता से जुड़ी कठिन ट्रेनिंग और परीक्षाओं से होकर गुजरना पड़ता है। नौकरी के दौरान भी ऐसे अभ्यास लगातार चलते रहते हैं। ऐसे में वे युद्धक जिम्मेदारियों के लिए पुरुषों के मुकाबले मिसफिट कैसे मानी जा सकती हैं?

मेजर जनरल मृणाल सुमन( सेवानिवृत्त) ने अपने एक पर्चे में साफ किया है कि दरअसल ज्यादा बड़ी समस्या पुरुषों की तरफ से इस माहौल के लिए आनाकानी है। शारीरिक दमखम वाले किसी काम में एक महिला के अधीनस्थ होना भी उन्हें पसंद नहीं आता। ऊंचे पदों पर पहुंचने के बाद भी महिला अधिकारियों को पुरुष सैनिकों की इसी मानसिकता का शिकार होना पड़ता है।

हालांकि मेजर जनरल मृणाल का कहना है कि भारत में महिला सैनिकों को अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है और उनके साथ जिम्मेदारी के बंटवारे में अब तक भेदभाव किया जा रहा है, इसलिए इस बारे में किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगा। पर मुद्दे की बात यही है कि बिना पूरी तरह परीक्षा किए सिर्फ भावनाओं के आधार पर महिलाओं से यह मौका छीनना अनुचित है।

Thursday, January 7, 2010

स्त्री होने भर से सबकी समस्याएं और हित एक नहीं हो जाते, मुक्तिकामी यूटोपिया की दरकार सबके लिए है

स्त्री-मुक्ति का यथार्थ और यूटोपिया:भाग-2



-राजीव रंजन गिरि


स्वप्न भी एक यथार्थ है:स्त्री-मुक्ति का यथार्थ और यूटोपिया:भाग-1 में एक कविता के बहाने से पितृसत्तात्मक व्यवस्था में स्त्री की स्थिति और मुक्ति के लिए खतरा मोल लेकर 'अपनी गर्दन ऐंठने तक खूंटा उखाड़ने की कोशिश करके यूटोपिया रचने के साहस' की चर्चा हुई। राजीव के लेख का दूसरा हिस्सा विमर्श के लिए आपके सामने है।


दुनिया के सभी समुदाय, सभ्यता, धर्म और मुल्क में पितृसत्ता मौजूद है। नतीजतन स्त्रियों को पुरुषों की तुलना में कमतर मानने की रवायतहै। अपवादस्वरूप भले ही कुछ इससे मुक्त हों। यह दीगर बात है कि इन सबमें पितृसत्ता का एक समान या सर्वमान्य रूप नहीं है। अपने अलग-अलग गुण, धर्म के साथ इसकी मौजूदगी बरकरार है। समय-समय पर इसने विभिन्न शक्तियों से नापाक गठजोड़ करके अपना रूप भी बदला है। इसीलिए अलग-अलग देश-काल में यह एक जैसा नहीं दिखता। कुछ लोगों को लगता है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था सामंतवादी संरचना की उपज है और सिर्फ इसी सामाजिक ढाँचे में मौजूद रहती है। जाहिर है ऐसा मानने वालों की समझ है कि पूँजीवाद के साथ यह खुद-ब-खुद समाप्त हो जाएगी। ऐसा सोचने वाले लोगों में वे भी शामिल है जो पितृसत्ता को दरकते देख दुखी होते हैं और वे भी हैं जो पितृसत्ता की शोषणकारी, अमानवीय रूप से दुखी होकर इसे बदलना चाहते हैं। इसके पक्ष में दुखी होने वाले लोग पितृसत्ता को मजबूत बनाने की कामना करते हुए पुराने दिनों को याद करते हैं तथा पूँजीवाद और इसके साथ आए बदलाव को कोसते हैं। जबकि पितृसत्ता के चालाक समर्थक नित्य हो रहे बदलाव से किसी भी तरह गठजोड़ करके इसे बरकरार रखने का प्रयास करते हैं। पितृसत्ता की मौजूदगी से आहत उपरोक्त श्रेणी के लोग पूँजीवाद की भूमिका से कुछ ज्यादा ही अपेक्षा पालते प्रतीत होते हैं।

इतना तय है कि पितृसत्ता सिर्फ सामंतवादी व्यवस्था में ही मौजूद नहीं होती। अगर ऐसा होता तो विकसित पूँजीवादी मुल्क में इसे पूरी तौर पर समाप्त हो जाना चाहिए था। तथ्य तो यह बताता है कि ऐसी संरचना में भी पितृसत्ता की मौजूदगी बनी हुई है, भले ही बदले रंग-ढंग में। इसका आशय यह नहीं है कि सामंतवाद और पूँजीवाद औरतों के मामले में, पितृसत्ता की मौजूदगी को लेकर, एक समान हैं। निश्चित तौर पर पूँजीवाद की भूमिका इस लिहाज से कई कदम आगे की है। इसने पितृसत्ता को एक हद तक चोट पहुँचाया है, बदला है, औरतों को आजादी मुहैया कराई है। पर पितृसत्ता में अपना हित दिखते ही पूँजीवाद ने इसके साथ गठजोड़ कर लिया। पितृसत्ता के सहयोग से औरतों के श्रम को कम करके आँका गया। इससे पूँजीवाद का हित सधता है। इसी तरह स्त्री-देह का मसला है। पूँजीवाद और इसके कई उत्पादों ने स्त्री-देह को एक स्तर पर आजाद करने में भूमिका अदा की। लेकिन दूसरे स्तर पर अपने हित के लिए पितृसत्ता से गलबहियाँ कर स्त्री-देह को महज पण्य में भी बदलने की कोशिश की। स्त्री-देह की मुक्ति जरूरी है। स्त्रियों को अपने देह पर पूरा-पूरा अधिकार होना चाहिए। लेकिन इस देह-मुक्ति का नारा देकर स्त्री-देह को अपने लिए, सबके लिए, उपलब्ध करने की चालाकी भी हुई है। दूसरे शब्दों में कहें तो देह की आजादी पितृसत्तात्मक बंधनों, मूल्यों, मान्यताओं से होनी चाहिए। पूँजीवाद के जरिए कई कदम आगे तक स्त्रियों को देह पर आजादी मिली है। स्त्रियों में यह चेतना भी विकसित हुई है कि उनके देह पर उनका हक है। पर आजाद देह को पुरुष-भोग के लिए ‘उपलब्ध देह’ बनाने की कोशिश अंततः पितृसत्ता को चोर दरवाजे से लागू करने का ही प्रयास है।

यहीं एक बात और। पूँजीवाद के विभिन्न उपकरण, मीडिया आदि ने स्त्री-देह को खूब दिखाया और घुमाया है। घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर सार्वजनिक जगहों पर जाना, अपने आप में स्त्री-मुक्ति की दिशा में बढ़ा हुआ कदम है। पर यह भी गौर करना होगा कि इस बाहर आने में क्या सिर्फ स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया को यथार्थ बनाया जा रहा है ? अथवा पितृसत्तात्मक संरचना अपने को नए रूप में ढालकर स्त्री-देह का वस्तुकरण कर रही है। संभव है इसके पक्ष में ऊपरी तौर पर स्त्री की मर्जी भी दिखे। पर सोचने की बात है कि इस ‘मर्जी’ को कौन-सी सत्ता परिचालित कर रही है, नियंत्रित कर रही है? लिहाजा पितृसत्ता की कुछ की दहलीज लाँघने के बावजूद स्त्री-देह किसके नियंत्रण में है, कौन-सी ताकत इस दिशा में ठेल रही है। इस पहलू को नजरअंदाज करके स्त्री-मुक्ति का न तो यथार्थ समझा जा सकता है और न ही यूटोपिया की रचना हो सकती है। दरअसल, ये सारी परिस्थितियाँ इतनी जटिलताओं से युक्त हैं कि इसका एक पक्ष देखकर न तो इसे सीधे खारिज किया जा सकता है और न ही इसका पुरजोर समर्थन। लिहाजा, पूँजीवाद या इसके विभिन्न उपकरणों को उनकी प्रगतिशीलता का वाजिब श्रेय भी देना होगा। साथ ही इसके ‘मुनाफे’ के लिए बने शोषणमूलक तंत्रा की जटिलता और पितृसत्ता के साथ रिश्ते को समझते हुए मुखालफत भी करना होगा। इन दो व्यवस्थाओं के अलावा समाजवादी/साम्यवादी मुल्कों में पितृसत्ता की क्या स्थिति रही? क्या यह बिल्कुल समाप्त हो गई?

फिलहाल यहाँ इस पर बहस किए बगैर कि वे मुल्क कितने समाजवादी या साम्यवादी थे यह सवाल इसलिए पूछा जाना जरूरी है, क्योंकि कुछ लोगों का मानना है, समाजवाद आते स्त्री-मुक्ति का मकसद आप पूरा हो जाएगा। असल में, ‘आधार’ और अधिरचना की यांत्रिक समझ के कारण ही कुछ लोग ऐसा समझते हैं। स्त्री-मुक्ति का सवाल ही नहीं बल्कि जाति के सवाल को भी कापफी समय तक ऐसे ही देखा जाता रहा है। कुछ लोग स्त्री-मुक्ति ;जेंडर के संदर्भ मेंद्ध के सवाल को सिपर्फ ‘अधिरचना’ से सम्ब( मानते हैं। ऐसे लोगों को लगता है कि क्रांति के बाद जब ‘आधार’ ही बदल जाएगा तो अधिरचना का बदलना अवश्यम्भावी है। लिहाजा स्त्री-मुक्ति का प्रश्न ही नहीं बचेगा। पितृसत्ता बिल्कुल समाप्त हो जाएगी। ऐसे लोग ‘आधार’ के साथ पितृसत्ता के जटिल रिश्तों को नजरअंदाज करते हैं। जबकि कुछ लोगों को पितृसत्ता का भौतिक आधार ही ज्यादा दिखता है। लिहाजा, ऐसे लोग इसे सिपर्फ ‘आधार’ से जुड़ा मानते हैं। इस समझ का प्रतिफलन इस रूप में विकसित होता है कि जब उत्पादन का सम्बन्ध बदल जाएगा, उत्पादन प्रक्रिया बदल जाएगी तो फिर स्त्री-मुक्ति तो अपने आप हो जाएगी। ऐसे में यह कहना जरूरी है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था का भौतिक आधार और सांस्कृतिक अधिरचना दोनों के साथ चोली-दामन का रिश्ता है। एक को दूसरे पर तवज्जो देना इसके जटिल अंतर्संबन्धें को नजरअंदाज करना होगा। यह भी याद करने की जरूरत है कि ‘आधार’ के बदलने मात्रा से ‘अधिचना’ भी पूरी तरह नहीं बदलती। आधार और अधिरचना के बीच इस तरह का सरल सम्बन्ध होता तो कई समस्याएँ खुद-ब-खुद मिट गयी होती। आधार और अधिरचना के द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध को नजरअंदाज करके इसकी परस्परता को नहीं समझा जा सकता। बहरहाल, समाजवादी मुल्कों में गोकि पूर्णतः स्त्री-मुक्ति न हुई, पर स्त्रियों के हालात बेहतर हो गए थे। पूँजीवाद की तुलना में स्त्री-मुक्ति के लिए समाजवादी व्यवस्था ज्यादा माकूल है।

स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया की रचना इसलिए भी ज्यादा जटिल है कि स्त्री की पहचान सिर्फ और सिर्फ स्त्री के तौर पर नहीं है। हो भी नहीं सकती। लिहाजा स्त्री की समस्याएँ भी कई स्तर भेदों से जुड़ी हुई हैं। स्त्री अपने आप में कोई ‘वर्ग’ नहीं है। स्त्री होने मात्र से सारी स्त्रियों की न तो सभी समस्याएँ हो सकती हैं और न सबका हित एक हो सकता है। हाँ, किसी-न-किसी रूप में सभी स्त्रियाँ शोषण की शिकार होती हैं। मसलन, अमीर स्त्री और गरीब स्त्री दोनों का शोषण होता है। पर एक वर्ग का न होने के कारण इनका साझा वर्गीय हित-अहित नहीं हो सकता। संभव है, अमीर स्त्री अपने परिवार, समुदाय में पितृसत्ता की शिकार हो और अपने वर्गीय हित में गरीब स्त्री का शोषण कर रही हो। दूसरे शब्दों में कहें तो जाति-धर्म, वर्ग के साथ स्त्री अपनी अलग ‘कैटेगरी’ भी बनाती है।

तो क्या यह कहा जा सकता है कि सेक्स और जेण्डर के हिसाब से ऊपरी तौर पर समान होने के बावजूद ये स्तर-भेद ‘सार्वभौम बहनापा’ के मार्ग में अवरोध हैं? क्या इन स्तर भेदों को बिल्कुल नकारा जा सकता है? प्रसंगवश, स्त्री-मुक्ति विमर्शकारों के यहाँ ‘सेक्स’ और ‘जेण्डर’ एक नहीं है। अब हिन्दी में इसके अनुवाद की समस्या हो सकती है। इन दोनों का अनुवाद ‘लिंग’ करने से उनके साथ का अर्थवृत्त नहीं आ सकता और अवधरणा भी स्पष्ट नहीं हो सकती। लिहाजा जब तक उस अवधरणा को स्पष्ट करने वाला शब्द नहीं मिलता, तब तक सेक्स के लिए लिंग और जेण्डर के लिए जेण्डर का उपयोग करने में क्या दिक्कत है? कुछ अन्ध हिन्दी-प्रेमी दूसरी भाषा के शब्दों को बिल्कुल लेना नहीं चाहते। नतीजतन ऐसा शब्द बना देते हैं जो उस अवधरणा को स्पष्ट करने में कहीं से कारगर नहीं होता। गौरतलब है कि लिंग (सेक्स के अर्थ में) एक बायोलॉजिकल कंस्ट्रक्ट है और जेण्डर एक सोशियोलॉजिकल कस्ट्रक्ट। यानी सेक्स जैविक या प्राकृतिक होता है। जबकि जेण्डर जैविक या प्राकृतिक नहीं होता। जेण्डर की रचना विभिन्न सत्ताओं ने ऐतिहासिक रूप से सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों, मान्यताओं के तौर पर किया है। मतलब कि स्त्री- ‘सेक्स’ के लिहाज से पुरुष से भिन्न है। इन्हें ‘जेण्डर’ की भिन्नता पितृसत्ता ने अपने स्वार्थ के लिए स्त्रियों को विभिन्न ‘भूमिका’ देने के मकसद से और कमतर ठहराने के लिए किया है। इस लिहाज से देखें तो ‘सेक्स’ और ‘जेण्डर’ में बड़ा फर्क नजर आएगा। पितृसत्ता ने ‘जेण्डर’ को भी प्राकृतिक, स्वाभाविक गुण के रूप में प्रचारित-प्रसारित किया है। स्त्री-मुक्ति इसी ‘जेण्डर’ से मुक्ति में है।

बहरहाल, स्त्री-मुक्ति का यूटोपिया रचने वालों को स्त्री के स्तरभेदों को ध्यान में रखना होगा। स्त्रियों के भीतर मौजूद परस्पर विरोधी पहचान के कई रूप हो सकते हैं। इन पहचानों को रेखांकित करने से स्त्री-मुक्ति का यूटोपिया कमजोर नहीं बल्कि ज्यादा सार्थक, विश्वसनीय और कारगर होगा। अलबत्ता यह स्तर भेद चुनौती जरूर पेश करेगा पर मुक्ति का मजबूत और चौड़ा रास्ता इसी से निकलेगा। जाति और वर्ग दोनों से निरपेक्ष जेण्डर की समझ मुक्तिकारी यूटोपिया की पुख्ता जमीन तैयार नहीं कर सकती। साथ ही इस यूटोपिया की संरचना तब तक पूर्णतया सफल नहीं हो सकती जब तक तमाम स्त्रियों के लिए इसमें जगह न हो। कहने का आशय यह है कि स्त्री-मुक्ति के यूटोपिया की बाबत यह नहीं कहना होगा कि फिलहाल इस श्रेणी की स्त्री मुक्त होगी और उस श्रेणी की स्त्री बाद मुक्त होगी। आपसी परस्पर विरोधी भेदों के बावजूद सारी स्त्रियाँ पितृसत्ता की शिकार हैं। और सबके लिए मुक्तिकामी यूटोपिया की दरकार है।

Monday, January 4, 2010

स्वप्न भी एक शुरुआत है

स्त्री-मुक्ति का यथार्थ और यूटोपिया:भाग-1

-राजीव रंजन गिरि

पटना से छपने वाली पत्रिका 'वर्तमान संदर्भ' ने अपना अगस्त 2009 अंक 'स्त्री मुक्ति: यथार्थ और यूटोपिया'पर केंद्रित किया है। संपादक संगीता आनंद 'बातें तेरी मेरी' में लिखती हैं- "जो स्त्री-अस्मिता और विमर्श का जन्म आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक गैर-बराबरी से मुक्ति के रूप में हुआ था, वह भटक कर महज देह पर केंद्रित हो गया है।"

पत्रिका के इस अंक के अतिथि संपादक राजीव रंजन गिरि दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं। उनका अतिथि-संपादकीय 'स्वप्न भी एक शुरुआत है' एक कविता के बहाने स्त्री मुक्ति के यथार्थ और यूटोपिया की पड़ताल करता है। यह लेख लंबा है। पढ़ने की सुविधा के लिए इसे तीन हिस्सों में बाट रही हूं। इस बार पहला हिस्सा दे रही हूं। मुझे पूरी उम्मीद है कि इस पर अच्छी चर्चा होगी। - अनुराधा


वह बार-बार भागती रही
बार बार हर रात एक ही सपना देखती
ताकि भूल न जाये मुक्ति की इच्छा
मुक्ति न भी मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न
बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न


कवि अरुण कमल की एक कविता है – स्वप्न। इस कविता में एक औरत बार-बार
ससुराल से भागती है। मार खाकर। कभी किसी मंदिर की सीढ़ी पर घंटों बिताती
है। फिर अंधेरा होने पर उसी जगह लौट आती है। कभी किसी दूर के सम्बन्धी या
परिचित के घर दो चार दिन काटती है। कभी अपने नैहर चली जाती है। पर हफ़्ता
या महीना भर बाद थक कर उसी जगह लौटती है। बेहतर होगा यह कहना कि उसे हर
बार लौटना पड़ता है। यह उसकी विवशता है। यह भी याद रखने की बात है कि वह
हर बार मार खाकर ही भागती है और लौटने पर भी मार खाती है। तो क्या इस
स्त्री को अपनी ट्रैजिक नियति का पता नहीं है? कविता बताती है कि उसे
बखूबी पता है कि मार खाने के बाद जहाँ से भागती है, बार-बार उसे वहीं
लौटना है। साथ ही लौट कर फिर मार खाना है। जानती थी वो कहीं कोई रास्ता
नहीं है / कहीं कोई अंतिम आसरा नहीं है / जानती थी वो लौटना ही होगा इस
बार भी। फिर भी भागती है। उसके यहाँ से गंगा भी ज्यादा दूर नहीं थी। रेल
की पटरियाँ भी पास थीं। पर वह अपनी ट्रैजिक नियति को जानते हुए भी कि उसे
फिर लौटना पड़ेगा, और मार खाना पड़ेगा; भागती है। कुछ दिन के लिए ही सही।

वह मरण का वरण नहीं करती। आत्महत्या का रास्ता नहीं अख्तियार करती है।
लिहाजा गंगा नदी का ज्यादा दूर न होना या रेल की पटरियाँ पास होना उसके
लिए कोई विकल्प नहीं रचता। मार खाने से बचने के लिए जीवन को समाप्त करना
उसे गवारा नहीं है। क्योंकि वह बार-बार जीवन से मृत्यु नहीं, मृत्यु से
जीवन के लिए भाग रही थी। भागती भी है तो खूँटे से बंधी बछिया-सी जहाँ तक
रस्सी जाती, भागती / गर्दन ऐंठने तक खूँटे को डिगाती। आखिरकार वह औरत किस
खूँटे से बंधी है, जिसे उखाड़ने की बार-बार असफल कोशिश करती है। गौर करें
गर्दन ऐंठने तक कोशिश करती है और उखाड़ भले न पाये पर डिगा देती है। गर्दन
ऐंठने तक कोशिश करना मानीखेज है। धीरे-धीरे यह खूँटा जड़ से उखड़ भले न
पाये, टूटेगा जरूर। क्योंकि वह औरत बार-बार हर रात एक ही सपना देखती है।
ताकि भूल न जाये मुक्ति की इच्छा। सपना है- मुक्ति न भी मिले तो बना रहे
मुक्ति का स्वप्न और बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न।

इस कविता में, जहाँ से वह औरत मार खाकर भागती है, वहीं उसे बार-बार लौटना
तथा मार खाना पड़ता है। जाहिर यह उसका ससुराल है। इसके लिए अरुण कमल ने
‘घर’ या ‘परिवार’ शब्द का प्रयोग नहीं किया है। क्या यह अनायास है? जबकि
शादी के बाद, इस सामाजिक संरचना में, यही उसका ‘घर’ है या ‘परिवार’ भी।
इस कविता में ‘घर’ शब्द एक बार आया है। जहाँ वह दो-चार दिन काटती है। कभी
किसी दूर के संबंधी या किसी परिचित के घर जाहिर है यहाँ भी वह अपनी
जिन्दगी का दो-चार दिन ही सही जीती नहीं, काटती है। कभी भागकर नैहर जाती
है। पर यहाँ भी कितने दिन के लिए? हफ़्ता या महीना। वहाँ से भी थककर
लौटती है। आशय यह कि पीहर में भी जिन्दगी का कुछ दिन ही काट पाती है। भले
ही परिचित या किसी दूर के रिश्तेदार के घर के तुलना में कुछ ज्यादा दिन।

थक कर लौटना दो बातों की तरफ इशारा करता है। एक, जिन्दगी जिया नहीं गया
है, काटा गया है। दो, जो संरचना मौजूद है उसमें उसके लिए नैहर अब विकल्प
नहीं रह गया है। चाहे जो हो उसे ससुराल में ही ‘निबाहना’ है। इस सामाजिक
ढाँचे में माना यह जाता है कि डोली नैहर से उठी है तो अर्थी ससुराल से
उठेगी। ऐसे में, वह ससुराल जहाँ बार-बार पीटी जाती है, शब्द के सच्चे
मायने में ‘घर’ या ‘परिवार’ हो सकता है? हरगिज नहीं। वह उस स्त्री के लिए
‘जगह’ भर ही है। न तो ‘घर’ महज छत के नीचे का बसेरा है और न ही ‘परिवार’
कुछ लोगों के साथ भर रह लेने वाली व्यवस्था। जब तक आपसी संवेदनात्मक
रिश्ता और उससे पैदा होनेवाली उष्मा मौजूद नहीं हो, उसे ‘घर’ या ‘परिवार’
की संज्ञा नहीं दी जा सकती। आखिरकार, जब वह जगह ‘घर’ और वहाँ के लोग
‘परिवार’ नहीं है तब वह वहाँ क्यों है? वह किस ‘खूँटा’ के मजबूत रस्सी से
बंधी है जिसे गर्दन ऐंठने तक उखाड़ने या तोड़ने की हर बार कोशिश करती है।
यह खूँटा पितृसत्तात्मक व्यवस्था है। याद रखें पितृसत्तात्मक व्यवस्था के
मायने परिवार में पुरूष का सिर्फ मुखिया होना नहीं है। यह महज इतना ही
होता तो इसका ‘खूँटा’ कब का उखड़ चुका होता या इसकी ‘रस्सी’ टूट गयी होती।
क्या यह कहने की जरूरत है कि इस ढाँचे की रचना धूर्तता और चालाकी के साथ
की गयी है और आज भी हो रही है। आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक, वैधानिक,
सांस्कृतिक व्यवस्था और मूल्यों-मर्यादाओं, संस्कारों, आदर्शों तथा चिंतन
के विभिन्न रूपों, विचारधाराओं, निर्मितियों, गतिविध्यिों के जरिये बड़े
महीन ढंग से इसे रचा-बुना गया है। इन सबके जरिये पितृसत्ता पुरूष को औरत
की तुलना में श्रेष्ठ स्थापित करने का पाखंड रचती और फैलाती है।

इस कविता में स्त्री के पास कहीं कोई रास्ता नहीं है और कहीं कोई अंतिम
आसरा भी नहीं। जाहिर है उसे अपना रास्ता खुद बनाना है और अपना आसरा भी
खुद ही बनना है। इस स्त्री को इसका बोध् है। इस बोध और गहरी जिजीविषा ने
इसे रेल की पटरी पर या गंगा में जाने से रोका है। लिहाजा, ससुराल से मार
खाकर बार-बार भागना महज पलायन नहीं है बल्कि विकल्प रचने के लिए रास्ता
बनाने की प्रक्रिया की एक कड़ी है। इसके साथ ही पीटने की पीड़ा का अहसास
होते रहने के लिए जरूरी कदम भी है। इस पीड़ा का अहसास होना बेहद जरूरी है।
बगैर इस अहसास के न तो मुक्ति का स्वप्न याद रहेगा और न ही जीवन को बदलने
के लिए यत्न करने की अभीप्सा बचेगी। इस अभीप्सा के बगैर वह गर्दन ऐंठने
तक बार-बार खूँटे को डिगाने की असफल ही सही, कोशिश नहीं कर पायेगी।

पितृसत्ता ने एक तरफ स्त्री को घर के अंदर कैद किया है और उसके घरेलू
श्रम का अवमूल्यन किया है। दूसरी तरफ विभिन्न मूल्यों-मान्यताओं और
संस्कारों के जरिये शोषण को सहज एवं स्वाभाविक मान्यता के रूप में
मन-मस्तिष्क में बैठाने की कोशिशा की है। इस कविता की स्त्री का आर्थिक
तौर पर स्वावलंबी नहीं होना और विभिन्न संस्कारों का मकड़जाल अपना आशियाना
अलग बनाने से रोकता है। इन वैचारिक जकड़बंदियों का दबाव ऐसा मजबूत है कि
जहाँ तक रस्सी जाती है (यानी मंदिर की सीढ़ी, नैहर या किसी रिश्तेदार के
घर) वहीं तक भाग पाती है। फिर ससुराल में लौटकर आना इसकी ट्रैजिक नियति
है। लेकिन बार-बार, हर रात जो मुक्ति का स्वप्न देखती है उसके जरिये
रास्ता जरूर बनेगा, मुक्ति जरूर मिलेगी, जीवन जरूर बदलेगा।

इस कविता पर किंचित विस्तार के साथ विचार करने की वजह यह है कि इसमें एक आम स्त्री के
जीवन का यथार्थ है और साधरण स्त्री की मुक्ति-कामना के साथ, खतरा मोलकर
अपनी गर्दन ऐंठने तक कोशिश कर यूटोपिया रचने का साहस भी।

स्वप्न शीर्षक कविता के मार्फ़त स्त्री मुक्तिः यथार्थ और यूटोपिया पर
विचार करने की एक वजह यह है कि यह कविता जिस स्त्री के जीवन पर हो रहे
पारिवारिक अत्याचार को अपना विषय बनाती है, वह ‘स्त्रीवाद’ का सिद्धांत
पढ़कर अपनी मुक्ति-कामना से लबरेज नहीं है, बल्कि जीवन-जगत के यथार्थ से
उसमें यह मुक्ति-कामना पैदा हुई है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि
अगर कोई स्त्री ‘स्त्रीवाद’ या स्त्री-मुक्ति से सम्बन्धित धरणाओं को
पढ़-सुन या समझकर अपनी मुक्ति की कामना करती है या इसके लिए अग्रसर होती
है तो यह अपराध नहीं बल्कि अच्छी बात है। इसी में मुक्तिकारी अवधरणाओं की
सफलता भी है।

यह उन लोगों के लिए कहा गया है जो ‘स्त्रीवाद’ और उससे जुड़ी
धरणाओं को बदनाम करने के मकसद से अनर्गल प्रलाप करते हैं और मानते हैं कि
आम औरतों का इससे कोई लेना-देना नहीं है। यह कविता पढ़कर समझा जा सकता है
कि इस औरत पर पितृसत्तात्मक ढाँचे का भी असर है। इस संरचना के दायरे में
जन्म लेने और उसकी परवरिश होने की वजह से यह स्वाभाविक भी है। काबिलेगौर
बात है – इस ढाँचे के भीतर रहते हुए उसका ‘स्वप्न’ देखना और उस स्वप्न के
लिए ‘यत्न’ करना। यही स्वप्न और यत्न उसे मुक्ति भी दिलाएगी।

Sunday, January 3, 2010

शादी के नाम पर खरीदी-बेची जाती लड़कियां ??

सुनने में अजीब लगता ही, पर भारत में अभी भी लड़कियां खरीदी-बेची जा रही हैं. बिहार के मोतिहारी जिले के पूर्वी चंपारण के बंजरिया प्रखंड में गोखुला गांव में तो यह आम बात है.महादलितों की इस बस्ती में शादी के नाम पर खरीदी या बेची जाने वाली लड़कियों की कीमत आमतौर पर दस से पंद्रह हजार होती है। यहां 10-12 वर्ष से कम उम्र वाली विवाहिताओं की लंबी सूची है। उन्हें न तो शादी का उद्देश्य पता है और न ही सिंदूर का मतलब। अब तक इस कार्य में उन्हें कोई सामाजिक अड़चन नहीं आयी। सदियों से चली आ रही यह परंपरा कायम है।

इससे भी दुखद पहलू यह है कि कई विवाहिता ऐसी भी है जो ससुराल में समान उम्र के लड़कों में यह फर्क नहीं कर पाती कि कौन उनका पति है। वे हर रोज मांग में पति के नाम का सिंदूर भरती है। सुहागन की तरह सजती और संवरती है, लेकिन उसने पति को झलक भर भी नहीं देखा है। ससुराल वाले यदाकदा उनके घर आते हैं और कुशलक्षेम पूछकर चले जाते हैं. कारण पूछने पर गांव के बड़े-बुजुर्ग कहते हैं, 'मेरी दादी भी खरीदकर लाई गई थी, मां भी और अब बहुएं भी खरीदकर ही आती हैं। हम इसे नहीं रोक सकते, क्योंकि यह हमारी परंपरा है।' फ़िलहाल इस परंपरा को गाँव से ही चुनौती मिलने लगी है और कुछ महिलाएं मानती हैं कि परंपरा के नाम पर ऐसा नहीं होना चाहिए। इनका कहना है कि अपनी बेटियों को बालिग होने पर ही ससुराल विदा करेंगे।....पर यह बड़ा शर्मसार करने वाला पहलू है कि स्वतंत्र भारत में ऐसी घटनाएँ हो रही हैं और हमारे पहरुए आँखों पर पट्टी बांध कर पड़े हुए हैं.

आकांक्षा यादव