Wednesday, February 24, 2010

दर्द का महिमामण्डन खतरनाक है !

एक वक़्त था जब अमिताभ बच्चन की फिल्म 'मर्द' का यह डायलॉग बहुत मशहूर हुआ था- जो मर्द होता है, उसे दर्द नही होता ।मैने यह फिल्म नही देखी पर अन्दाज़ा लगा सकती हूँ कि मर्द होने के क्या प्रतिमान इस फिल्म ने कायम किए होंगे।दर्द स्त्रैण है या पुरुष यह क्लासिफिकेशन करना ही मुझे अन्याय जान पड़ता है क्योंकि मनुष्य होने के नाते दर्द महसूस करना एक सामान्य बात है।किसी भी शारीरिक समस्या का यह ऐसा लक्षण है जो स्त्री या पुरुष देख कर नही उपजता है।साथ ही , स्त्री के बनाए जाने की प्रक्रिया मे जैसे उसे कुछ स्त्रियोचित (?) बातें सिखाई जाती हैं ठीक वैसे ही दर्द सहने की शक्ति के अभिमान के साथ पुरुष को भी ढाला जाता है।इस मिथ्याभिमान के चलते न जाने लड़के क्या क्या कर गुज़रते हैं !सिर्फ इसलिए कि इससे वे अपने पुरुषत्व का प्रमाण दे पाएंगे।यह 'दर्द नही होता' दर अस्ल दर्द को सहजाने की क्षमता ही है।न कि यह कि सच मे ही दर्द नही होता।

समाज-मन के भीतर अब भी मर्द को दर्द नही होता -वाला प्रतिमान बसा हुआ है इससे पूरी तरह इनकार नही किया जा सकता हालाँकि अन्दरखाने परिवार की बड़ी महिलाएँ अब भी मानसिक-शारीरिक दर्द के लिए सहनशीलता के पाठ स्त्री को ही पढाती हैं।इसे दोगलापन ही कहा जा सकता है।लेकिन कम से कम शहर में काफी हद तक तथाकथित स्त्रैण गुण पुरुष के लिए परहेज़ की वजह नही रह गए हैं।विज्ञापन और फिल्मों ने भी काफी हद तक अपनी भूमिका इसमे निभाई है। रोते हुए ,और कमर दर्द से हलकान पुरुष टीवी और सिनेमा स्क्रीन पर देख कर अब हैरानी नही होती।

वहीं दूसरी ओर,दर्द की बात स्त्री के सन्दर्भ मे उठे तो मुझे अपने आस पास देख कर हमेशा यही लगा कि स्त्री में दर्द को सह जाने,या कहें पी जाने की अद्भुत क्षमता है।सर मे दर्द,बुखार मे बच्चों व पति के लिए खाना बनाती स्त्री किसने अपनेघर मे नही देखी होगी।दिन भर रसोई मे खड़ी व्यंजन बनाती ,मुँह से उफ्फ न करती ,एक से दूसरे पाँव पर अदल-बदल कर खड़ी ,थक कर चूर रात को शांत पड़ी स्त्री किसने नही देखी अपने परिवार में ,और जन्म का दर्द सहती स्त्री,प्रणय के सुख मे भी दर्द से अपनी खुशी का आगाज़ करती स्त्री क्या नई है ? मैने अक्सर देखा है जिस हालत मे आकर पति ,पिता बिस्तर पर लेट जाते हैं ठीक उसी हालत में पत्नी या माँ घरेलू ,दैनिक काम निबटा रही होती है ।यह भी सही है कि कुछ स्थितियों मे स्त्री केहीपास यह स्वतंत्रता है कि वह बाहर की दुनिया की चुनौतियों से खुद को बचा भी ले और दर्द की परछाईं भी उस पर् न पड़े। वहाँ भी अन्य पेंच अवश्य होंगे। खैर, वर्ग विशेष की बात की जाए तो स्त्री का जीवन उससे कहीं कठिन है जिस कठिनाई में उपरोक्त सम्वाद किसी पुरुष के मुँह से निकलता है।पहाड़ की स्त्री ,कन्स्ट्रक्शन साइट पर एक बच्चा गर्भ मे और एक नवजात को फुटपाथ पर लिटा काम करती स्त्री ,रेगिस्तान मे पानी ढोकर लाती स्त्री किसने नही देखी, पिटती हुई और पिट कर चुप्प लगा जाने वाली स्त्री किसने नही देखी !!
ऐसे में यदि मै कहूँ कि स्त्री को दर्द नही होता तो इसमे कतई अतिशयोक्ति नही मानी जानी चाहिए।देखने वाली बात है कि हम जब कहते हैं (यही कि- मर्द को दर्द नही होता) वह कितनी समझदारी से कहते हैं कि उसमें से स्त्री के दर्द और सहनशीलता को साफ छिपा ले जाते हैं।भनक भी नही लगने देते।स्त्री का दर्द सिर्फ सखियों के एकांत पलों में आवाज़ पाता है या माँ की चुप्पी से बेटी की आँखों में धीरे से उतर जाता है।

साथ ही यह भी समझ लेना होगा कि इस "दर्द" का महिमामंडन स्त्री और पुरुष दोनो के ही लिए खतरनाक है।यह पुनर्बलीकरण है एक गलत व्यवहार का ।जब भी दर्द को सह जाने की सीमा समाज हमारे जेंडर रोल के हिसाब से तय करेगा ,तभी हमारे बच्चे-बच्चियाँ एक गलत प्रतिमान को ध्यान में रखकर अपना व्यक्तित्व निर्माण करेंगे।इसलिए उचित ही होगा कि सहनशीलता और दर्द के बँटवारे जेंडर के आधार पर कर उसे सम्मानित न किया जाए।

Saturday, February 20, 2010

तू निर्बंध सारी धरती पर घूम सके

मनीषा की डायरी से यह एक पन्ना आज चुरा लाई हूँ ...एक भावुक ,रूमानी अन्दाज़ मे लिखी गई यह पोस्ट जाने क्यों आकर्षित कर गई।.जब "पा"देखी थी तो मन मे यही कामना की थी कि दुनिया की सब माएँ ऐसी ही हो जाएँ।और सब पिता .....

उसने अपनी बेटी के लिए एक कविता लिखी थी। उसने कामना की थी कि उसकी बेटी हरसिंगार सी खिले और हर ओर छा जाए। बेले सी उसकी खुशबू संसार की वादियों में बिखर जाए। वह पहाड़ी बर्फ सी निर्मल हो। उसकी चमक के आगे शर्मसार हों सितारे। वह अलकनंदा सी बहे और राह की हर चट्टान को निर्मल कर दे। वह हवाओं सी उन्‍मुक्‍त हो और हिमालय सी उदात्‍त।

पिता ने चाहा कि वह संसार के हर बंधन से ऊपर उठ सके। वह अपनी अंतरात्‍मा में अवस्थित हो। हवाएं उसका रूप गढ़ें और प्रकृति उसका मन। उस कविता में बेटी के लिए प्रेम, गरिमा, उदात्‍तता और स्‍वतंत्रता की सम्‍मोहक पुकार थी।

तू निर्बंध सारी धरती पर घूम सके

अपने दीवाने को तू चूम सके।

इसी सदी के पूर्वार्द्व में पहाड़ों की गोद में बैठा एक पिता कह रहा था अपनी बेटी से कि अपने दीवाने को तू चूम सके।

बेटी तब महज दो साल की थी।

मां ने सुनी कविता। आखिरी पंक्ति पर अटक गई। ये क्‍या दीवानों सी बातें करते हो तुम। मैं कभी अपनी बेटी को यह कविता पढ़ने नहीं दूंगी, मां ने बनावटी गुस्‍से में कहा।

उस रात जब सोई थी मां और दो साल की बच्‍ची उसके सीने से लिपटी, मां सोच रही थी। उस रात मां को पहली बार थोड़ा रश्‍क हुआ अपनी बेटी से। कैसा पिता मिला है इसे? मां ने अपने पिता से तुलना की अपनी बेटी के पिता की। भीतर कुछ टूटा। फिर मां ने धीरे से झुककर बेटी को चूम लिया और बोली,

तू निर्बंध सारी धरती पर घूम सके

अपने दीवाने को तू चूम सके।

(मेरे एक दोस्‍त ने अपनी बेटी के लिए एक लंबी कविता लिखी थी और उसी कविता की एक पंक्ति थी यह अपने दीवाने को तू चूम सके।)

मनीषा पांडे

Wednesday, February 17, 2010

नादीन को चार शौहर चाहिए

(दुबई, साउदी अरब के अल हुर्राटीवी नेटवर्क में पत्रकार नादीन अल-बेदैर ने मुसलमान पुरुषों में बहुविवाह को चुनौती दी,जिसके लिए उन पर इस्लाम विरोधी होने का आरोप लगा।)

- राजकिशोर

घटना यह है। सऊदी अरब की पत्रकार नादीन अल-बेदैर का एक लेख मिस्र के दैनिक 'अल मसरी अल यूम' के 11 दिसंबर 2010 के अंक में एक लेख छपा। लेख का शीर्षक था - 'मैं और मेरे चार शौहर'। लेख की शुरुआत यहां से होती है - 'मुझे चार, पांच या नौं या मै जितने भी चाहूं उतने शौहर चुनने की इजाजत दें। मैं तरह-तरह के साइज और शेप वाले शौहर चुनूंगी। एक काला, एक सुनहरे बालों वाला, एक लंबा और हो सकता है एक नाटा। उनका चुनाव जुदा-जुदा किस्मों, धर्मों, नस्लों और देशों से होगा। मैं वादा करती हूं कि उनके बीच पर्याप्त सौहार्द रहेगा।'

नादीन को यह तर्क मंजूर नहीं है कि औरतों के लिए एक से अधिक मर्दों को झेलना मुमकिन नहीं है। वे कहती हैं कि यह मुमकिन है, यह तो साबित हो ही चुका है उन औरतों द्वारा जो अपने शौहर से चोरी-छिपे गैर मर्द से प्यार करती हैं या उन औरतों के द्वारा जिनका प्यार पैसे से खरीदा जा सकता है। नादीन का सवाल है : 'एक औरत से बोर हो जाने के बाद दूसरी, और दूसरी से बोर हो जाने के बाद तीसरी और उससे भी बोर होने के बाद चौथी औरत से शादी करने का हक सिर्फ मर्दों को ही क्यों है? यह हक औरतों को भी होना चाहिए। आखिर औरत भी तो अपने एकमात्र शौहर से बोर हो जा सकती है। या हो सकता है, सुहागरात से ही उसका दांपत्य जीवन ठीक न चल रहा हो।' आखिर ऐसी औरतों को भी सुख-चैन से जीने का अधिकार है।

वास्तव में नादीन का यह लेख बहुगामी होने की उनकी ख्वाहिश का इश्तहार नहीं है। वे तो मुसलमान पुरुषों के चार शादियां करने के अधिकार को चुनौती देना चाहती हैं। इसीलिए उनके लेख का अंत इन पंक्तियों से होता है कि या तो मर्द-औरत दोनों को बहुगामी होने का अधिकार मिले या विवाह संस्था को नए सिरे से गढ़ा जाए। जाहिर है, यह मुस्लिम नारीवाद का एक क्रांतिकारी चेहरा है। चूंकि सऊदी अरब की इस साहसी पत्रकार ने स्त्री-पुरुष समानता की ख्वाहिश को बेहद नाटकीय ढंग से पेश किया है, इसलिए उनके लेख पर मुस्लिम जगत में हाहाकार मचा हुआ है। नादिम की कटु से कटु आलोचना की जा रही है और उन्हें फाहशा, चरित्रहीन, मर्दखोर आदि बताया जा रहा है। व्यंग्य की शैली बहुत ही प्रभावशाली होती है, लेकिन इसे अपनाने के अपने खतरे भी हैं। मैं तो सऊदी पत्रकार नादीन अल-बेदैर को बधाई ही दूंगा कि उन्होंने अपनी बात इतनी तल्खी से रखी है। इसके लिए जहां उन पर अपशब्दों की बौछार हो रही है, वहीं शुक्र यह है कि बहुत-से पुरुष उनके प्रतिपादन के मर्म तक पहुंच सके हैं, इसलिए उन्होंने लेखिका का पक्ष लिया है।

उदाहरण के लिए, काहिरा में एक मस्जिद के प्रबंधक शेख अम्र जाकी ने लिखा, 'लोगों को अब जाग जाना चाहिए और इस पर विचार करना चाहिए कि औरतों के साथ मर्दों का सलूक क्या रहता है। उन्हें इस पर भी विचार करना चाहिए कि आज के जमाने में बहुगामिता को मंजूर नहीं किया जा सकता। इसकी कोई जरूरत नहीं है। इसके अलावा, कोई भी मर्द एक से ज्यादा औरतों से सच्चा प्यार नहीं कर सकता न कोई औरत ही एक से ज्यादा मर्दों से सच्चा प्यार कर सकती है।' एलान पत्रिका की आयशा गवाद ने लिखा, 'मैं औरतों या मर्दों की बहुगामिता की तरदारी नहीं कर रही हूं। मैं मिज अल-बेदैर की ओर से भी कुछ कहना नहीं चाहती। लेकिन मुझे लगता है कि वे भी औरत या मर्द की बहुगामिता की वकालत नहीं कर रही हैं। वे तो उस गैरबराबरी को रेखांकित करना चाहती थीं जो बहुत-से बहुगामी विवाहों में मौजूद होती है।

हिन्दी में इस प्रसंग को उठाया है जेएनयू की शोध छात्र शीबा असलम फ़ाहमी ने। शीबा 'हंस' पत्रिका में हर महीने 'जेंडर जिहाद' नाम से एक अत्यंत लोकप्रिय कॉलम लिखती हैं। फरवरी अंक में इस प्रसंग की चर्चा करते हुए उन्होंने फ़रीद बुक डीपो, जामा मस्जिद, दिल्ली द्वारा प्रकाशित हकीमुल उम्मत हज़रत मौलाना अशरफ़ अली साहब थानवी रह की पुस्तक 'अहकामे इस्लाम की नज़र में तालीफ़' से एक लंबा उद्धरण दिया है, जिससे इस बात का संकेत मिलता है कि मुस्लिम मर्दों को चार शादी करने का हक क्यों है या क्यों होना चाहिए, इसकी तरफदारी में कैसे-कैसे बेहूदा तर्क दिए जा सकते हैं।


मौलाना का तर्क यह है : 'तफसील इस इजमाल की ये है कि ऐसा आदमी जब किसी एक औरत को निकाह में लाएगा तो कम अज कम ये औरत उसके लिए तीम माह तक काफी है। क्योंकि हमल की शनाख्त कम अज कम तीन माह तक मुकर्रर है। पर अगर उस मीयाद में उस औरत को हमल ठहर जाए तो ऐसे हैजान व जोशे शहवत वाला आदमी अगर उस औरत से सुहबत करेगा तो जनीन पर बुरा असर पड़ेगा और हमल गिर जाने का अंदेशा है। लिहाजा उस औरत को आराम देवे और उस औरत की सुहबत तर्क करके दूसरी औरत निकाह में लाएगा। अगर दूसरी औरत को भी तीन माह तक करारे हमल हो जाए तो उससे भी सुहबत तर्क करनी पड़ेगी। … ये 6 माह हुए। अब तीसरी औरत से निकाह करेगा। अगर तीसरी औरत को भी हमल हो गया तो अब उससे भी उसको सुहबत तर्क करनी पड़ेगी। ये 9 माह हुए। अब पहली औरत का वजए-हमल हो जाएगा मगर वह गालिबन तीन माह तक काबिले-सुहबत नहीं हो सकती। लिहाजा उसको चौथी निकाह में लानी होगी। अब चौथी औरत के हमल की शनाख्त भी तीन माह तक मुकर्रर है। यह एक साल हुआ और इस अस्ना में पहली औरत जिसको वजए-हमल से तीन माह गुजर चुके हैं तअल्लुकात जनान व शोई के लिए तैयार हो जाएगी। इस तरह वजए-हमल के बाद हर एक औरत नौबत-बनौबत उसके लिए मुहैया होगी।'

है न कमाल का गणित ! इस गणित को चुनौती देने के लिए सऊदी अरब की नादीन अल-बेदैर और भारत की शीबा असलम फ़ाहमी को मेरा सलाम।

Sunday, February 14, 2010

प्रेम : एक अनसुलझा रहस्य

प्यार क्या है। यह एक बड़ा अजीब सा प्रश्न है। पिछले दिनों इमरोज जी का एक इण्टरव्यू पढ़ रही थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि जब वे अमृता प्रीतम के लिए कुछ करते थे तो किसी चीज की आशा नहीं रखते थे। जाहिर है प्यार का यही रूप भी है, जिसमें व्यक्ति चीजें आत्मिक खुशी के लिए करता है न कि किसी अपेक्षा के लिए। पर क्या वाकई यह प्यार अभी जिन्दा है? हम वाकई प्यार में कोई अपेक्षा नहीं रखते। यदि रखते हैं तो हम सिर्फ रिश्ते निभाते हैं, प्यार नहीं? क्या हम अपने पति, बच्चों, माँ-पिता, भाई-बहन, से कोई अपेक्षा नहीं रखते।

...सवाल बड़ा जटिल है पर प्यार का पैमाना क्या है? यदि किसी दिन पत्नी या प्रेमिका ने बड़े मन से कोई कार्य किया और पति या प्रेमी ने तारीफ के दो शब्द तक नहीं कहे, तो पत्नी का असहज हो जाना स्वाभाविक है। अर्थात् पत्नी/प्रेमिका अपेक्षा रखती है कि उसके अच्छे कार्यों को रिकगनाइज किया जाय। यही बात पति या प्रेमी पर भी लागू होती है। वह चाहे मैनर हो या औपचारिकता हमारे मुख से अनायास ही निकल पड़ता है- थैंक्यू या इसकी क्या जरूरत थी। यहाँ तक की आपसी रिश्तों में भी ये चीजें जीवन का अनिवार्य अंग बन गई हैं। जीवन की इस भागदौड़ में ये छोटे-छोटे शब्द एक आश्वस्ति सी देते हैं।...पर अभी भी मैं कन्फ्यूज हूँ कि क्या प्यार में अपेक्षायें नहीं होती हैं? सिर्फ दूसरे की खुशी अर्थात् स्व का भाव मिटाकर चाहने की प्रवृत्ति ही प्यार कही जायेगी।...अभी भी मेरे लिए प्रेम एक अनसुलझा रहस्य है।

Sunday, February 7, 2010

गुरु का स्वाभाविक स्वरूप्

अभय तिवारी
शिक्षक सब जगह होते हैं पर भारत के शिक्षक मात्र शिक्षक नहीं गुरु होते हैं। गुरु एक ऐसा भारी शब्द है कि अंग्रेज़ इसका अर्थ अपनी भाषा के किसी शब्द के आवरण में उठा के नहीं ले जा सके - गुरु का एक अन्य अर्थ भारी होता ही है – समूचे शब्द को ज्यों का त्यों स्वीकार करना पड़ा।

गुरु का नाम लेते ही मन में एक छवि उभरती है जिसकी काली-सफ़ेद, लम्बी दाढ़ी हृदय प्रदेश तक लहरा रही है, शिर के केश जटाओं में गुम्फित हैं, गले में रुद्राक्ष या तुलसी की माला है, बाएं कंधे से कमर में दाईं तरफ़ तक जनेऊ पड़ा हुआ है, अधोभाग सूती धोती से आवृत्त है, मुखमण्डल पर सौम्यता, गाम्भीर्य और ज्ञान की आभा है और साथ में कम से कम दो चार शिष्य तो हैं ही। कुछ लोगों को यह छवि पुरातन पंथी मालूम देगी वे एक मोटे चश्मे और खिचड़ी दाढ़ी वाले, पतलून-कमीज़ में अपने गुरु की कल्पना कर सकते हैं जो ब्लैक-बोर्ड पर गणित की एक दुरुह प्रमेय का पथ सरल कर रहा हो।

मुझे ये दोनों छवियां समस्यामूलक लगतीं हैं। क्योंकि ये दोनों ही एक पुरुष की छवि है। मेरा मानना है कि स्त्री स्वाभाविक गुरु होती है जबकि परिपाटी ने यह दरजा पुरुष पर आरोपित कर दिया है। इस मान्यता के पीछे के पुरुषवादी नज़रिया छुपा हुआ है। मैं यह नहीं कहता कि पुरुष गुरु होता ही नहीं। सभी मनुष्य सभी ग्रहों और राशियों का समावेश हैं। समष्टि में सब एक ही तत्व है। और वो इतना विराट है कि उसे उसकी विराटता में एक साथ विचार कर पाना दूभर है। इसलिए इस सब को अलग-अलग खानों में बाँटना ही तो व्यष्टि है।

और जब इस पूरे प्रपंच को समझने के लिए इस तरह के विभाजन करने की बारी आई तो पुरुष ने राशियों में तो क्रम से एक को पुरुष और एक स्त्री के रूप से चिह्नित किया। लेकिन ग्रहों को गुणधर्मिता तय करते हुए एक चन्द्रमा और दूसरे शुक्र को ही स्त्रीत्व के योग्य माना। चन्द्रमा यानी मन और कल्पना के दायरे के तमाम तत्व। और शुक्र यानी सजने-सँवरने, कला और विलास के सभी विषय। देखा जाय तो सूक्ष्मतम चीज़ों का सम्बन्ध शुक्र से है जैसे घी और इत्र और शुक्राणु। हालांकि शुक्राणु किन अर्थों में स्त्रीलिंग माना जाएगा यह संशय के घेरे में है।

चन्द्रमा बावजूद सूर्य का प्रतिबिम्ब होने के सभी इच्छाओं, अस्थिरता और विचलन का कारक होने के कारण और शुक्र भोग-विलास के विभाग का स्वामी होने के कारण भारतीय दार्शनिक परम्परा के अनुसार प्रतिगामी ग्रह हो जाते हैं। योग भोग-शुक्र पर संयम और मन-चन्द्रमा-स्त्री- पर नियंत्रण रखने का निर्देश देता है और धर्म बताता है कि स्त्री नरक का द्वार है।

आत्मा का प्रतीक सूर्य, पुरुष है। सामर्थ्य का प्रतीक मंगल, पुरुष है। बुद्धि का प्रतीक बुध और दुख और वैराग्य का प्रतीक शनि, नपुंसक हैं। गुरु आनन्द और ज्ञान का कारक है और पुरुष है। सूर्य, मंगल, बुध और शनि की श्रेणियों के लिंग निर्धारण पर सवाल किए जा सकते हैं। लेकिन वे अपनी दार्शनिक परम्परा में अतार्किक नहीं है। परन्तु उन पर चर्चा करने से बात फैल जाएगी। बात अभी गुरु की है, उसी तक सीमित रखते हैं। गुरु को पुरुष घोषित ज़रूर किया गया है मगर मुझे वह इस अनुशासन के आन्तरिक तर्क पर सही बैठता नहीं दिखता। इस परम्परा के आन्तरिक तर्क के अनुसार ही देखें कैसे-

१] सूर्य, मंगल आदि क्रूर हैं गुरु सौम्य है, कोमल है, मृदु है। कोमलता स्त्री स्वभाव है।

२] किसी को वश में करने के लिए सूर्य और मंगल दण्ड की नीति अपनाते हैं, चन्द्रमा दान की, बुध और शनि भेद की और गुरु और शुक्र साम की। यह भी स्त्री स्वभाव है।

३] जन्म कुण्डली में विवाह, परिवार, बच्चों और बुज़ुर्गों का कारक गुरु ही होता है। किसी भी सामान्य स्त्री का जीवन इन्ही विषयों के इर्द-गिर्द घूमता है। पुरुष विवाह करता है पर उसकी मर्यादा की रक्षा स्त्री उस से अधिक करती प्रतीत होती है। बच्चे विशेष रूप से स्त्री की ही ज़िम्मेदारी होते हैं। परिवार में सब का ख्याल और बुज़ुर्गों की देखभाल भी स्त्री का ही विभाग है।

पुरुष एक गर्भाधान को लेकर लालायित रहता है लेकिन वह सम्पन्न होते ही उसे जीवन के उद्देश्य की चिंता सताने लगती है। स्त्रियां आम तौर पर जीवन के उद्देश्य को लेकर व्यथित नहीं होती। वे अपने दैनिक पारिवारिक जीवन से सार्थकता पाती रहती हैं। ऐसी स्त्री की उपेक्षा करके परिवार से इतर जीवन की सार्थकता खोजने वाला पुरुष क्या स्वाभाविक गुरु हो सकता है?

४] गुरु शरीर में स्थूलता का कारक भी होता है। आम तौर पर गुरु मोटा होगा ही। और गुरु जनित मोटापे के बारे में राय है कि वह शरीर में चारों ओर से मोटा होगा मगर विशेषकर मध्यभाग यानी कि पेट, कमर, नितम्ब और जंघा से मोटा होगा। कोई अंधा भी देख सकता है कि ये स्त्री के आकार का विवरण है।

जन्मकुण्डली में पाँचवे स्थान का कारक है गुरु। पाँचवे स्थान से पेट, भूख, बुद्धि, पुत्र आदि देखते हैं। पेट, भूख और बुद्धि तो स्त्री व पुरुष दोनों में होती है लेकिन पुत्र(!) को पेट में रखकर पालना तो स्त्री ही करती है।

५] गुरु का स्वाभाविक स्थान कोषागार है। स्त्री स्वाभाविक खंजाची है। उड़ाना पुरुष का स्वभाव है, बचाना स्त्री का।

६] बिन घरनी घर भूतों का डेरा। यदि पुरुष स्वभावतः गुरु है तो इस तरह की कहावत बेमानी हो जाती जबकि ये कहावत परखी हुई बात पर आधारित है। दूसरी तरफ़ बिना पुरुष के गृहस्थी कमज़ोर ज़रूर पड़ती है पर चुड़ैलों का अड्डा नहीं बनती।

७] गुरु मध्यमार्गी होता है। और स्त्री न तो पैसे की इतनी भूखी होती है कि अरबों—खरबों की सम्पत्ति जुटाना ही अपना मक़सद बना ले और न ही इतनी वैरागी कि सब कुछ को लात मार के शरीर पर भभूत मल कर भिखारी हो जाय। पुरुष इन्ही दो अतिवादों में फंसा रहता है।

८] धर्म जो कि गुरु का मुख्य विभाग है वह भी स्त्रैण मालूम देता है। यह सही है कि दुनिया के सारे धर्म पुरुषों ने अन्वेषित किए और उनके नियम ग्रंथ में सूची बद्ध किए पर धर्म का विभाग भी पुरुष से अधिक स्त्री के दायरे में आता है। मेरे विवाह के अवसर पर संस्कार सम्पन्न करा रहे पण्डित जी ने कहा कि चार में से तीन पुरुषार्थ- काम, अर्थ और मोक्ष में तो आप आगे रहेंगे लेकिन धर्म में आप अपनी पत्नी के पीछे रहेंगे। ये अनायास नहीं है कि ईश्वर में आस्था और तीज त्योहारों क पालन पुरुष से अधिक स्त्रियां करती हैं।

धर्म का मूल समर्पण है और समर्पण यदि स्त्रैण नहीं तो क्या है?

९] गुरु, शिष्य के बिना अधूरा है। पुरुष, बच्चे के बिना अधूरा नहीं है। लेकिन स्त्री माँ के रूप में बच्चे के बिना अधूरी है।

१०] नियम है कि गुरु जिस स्थान में बैठता है वहाँ की हानि करता है लेकिन जहाँ देखता है वहाँ की वृद्धि करता है। अपना नुक़्सान करके बच्चे पर सब न्योछावर करने की आत्म बलिदान की भावना को माँ से बेहतर कौन जानता है?

इतना कुछ सोचने के बाद मैंने पाया कि गुरु का स्वाभाविक स्वरूप स्त्री का है। और वह भी एक बच्चे के साथ या बच्चों से घिरी स्त्री का। हर स्त्री माँ हो यह ज़रूरी नहीं लेकिन हर माँ गुरु ज़रूर होती है। अपने बच्चे की प्रथम गुरु और सम्भवतः सबसे महत्वपूर्ण गुरु भी। माँ स्वाभाविक गुरु है, बच्चा स्वाभाविक शिष्य है। आज शिक्षक दिवस के दिन मैं अपनी प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण गुरु अपनी माँ को नमन करता हूँ और धन्यवाद करता हूँ।
पुनश्च : प्रत्येक व्यक्ति ग्रहों और राशियों का समावेश है। सब में सब गुण मौजूद हैं। यहाँ प्रयोग की गई श्रेणियां का उद्देश्य स्त्री या पुरुष पर कोई विशेष चरित्र आरोपित करना नहीं बल्कि पहले किए जा चुके ऐसे आरोपण से पीछा छुड़ाना है।

मानव डी एन ए के एक्स क्रोमोज़ोम में बमुश्किल २०-३० वाक्य हैं जो स्त्री को हासिल नहीं होते। वरना मानव के सभी गुण स्त्री में मौजूद हैं - हिंसा भी

Wednesday, February 3, 2010

इस परदे को और न खींचो मौलवी साहब !

2 फरवरी के नवभारत टाइम्स के संपादकीय पेज पर यह लेख है, यूसुफ किरमानी का जो मुसलमान महिलाओं के लिए वोटर पहचानपत्र में बिना बुर्के का, चेहरा दिखाने वाला फोटो लगाने के न्यालय के निर्देश को सही ठहराता है। साथ ही उभर कर ये बात सामने आती है कि मौलवियों द्वारा बनाए गए कट्टर नियमों पर आम मुसलमान की सहमति हो यह जरूरी नहीं है। इस मसले पर इतनी सहजता से लेकिन ठोस और सीधी बात शायद इससे बेहतर ढंग से नहीं कही जा सकती थी। लेख पूरा का पूरा यहां दे रही हूं।

- यूसुफ किरमानी

मुस्लिम महिलाओं का फोटो मतदाता सूची में हो या न हो, इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति बिल्कुल स्पष्ट कर दी है। उसने कहा कि बुर्का पहनने वाली उन महिलाओं को मतदाता पहचान पत्र जारी नहीं किया जा सकता जिनका चेहरा फोटो में दिखाई नहीं देता हो। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से तमाम भारतीय मुस्लिम संगठनों, मौलवियों, विद्वानों ने सहमति जताई है, लेकिन इसके बावजूद कुछ लोगों ने शरीयत और कुरान को लेकर इस पर नए सिरे से बहस छेड़ दी है।

तकरीबन हर साल ही कोई न कोई ऐसा मुद्दा आता है जब शरीयत को लेकर बहस छिड़ जाती है और मुसलमानों का बड़ा तबका इससे खुद को असुविधाजनक स्थिति में पाता है। अभी मदुरै के जिन सज्जन की याचिका पर परदानशीं महिलाओं की फोटो को लेकर सुप्रीम कोर्ट को कड़ी टिप्पणी करनी पड़ी, उसकी नौबत जानबूझकर पैदा की गई। हालांकि इस तरह के मसलों पर तो कायदे से याचिका स्वीकार ही नहीं की जानी चाहिए थी।

आम मुसलमान की राय जानें

इन मुद्दों पर कभी यह जानने की कोशिश नहीं की जाती है कि इस बारे में आम मुस्लिम जनमानस क्या सोचता है। जुमे की नमाज में एकत्र नमाजियों की तादाद से गदगद मुस्लिम उलेमा या राजनीतिक दल जनमानस का मन नहीं पढ़ पाते। अगर अभी कोई सर्वे कराया जाए तो पता चल जाएगा कि मुसलमानों का एक बहुत बड़ा तबका सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमत है। असल में मुसलमानों के कुछ तबके और मुल्ला-मौलवी एक बहुत आसान सी बात नहीं समझ पा रहे हैं। वह यह है कि जिस तरह अन्य धर्मों और समुदायों में नई पीढ़ी अपने विचारों के साथ सामने आ खड़ी हुई है, ठीक वही प्रक्रिया भारतीय मुसलमानों में भी जारी है। मुसलमानों का यह वह तबका है जिसमें पढ़ाई-लिखाई का अनुपात बहुत ज्यादा है। इनमें थोड़े बहुत वे युवक भी शामिल हैं जिन्होंने भले ही दिल्ली-मुंबई की चकाचौंध नहीं देखी है और वे छपरा या फैजाबाद के गांवों में महज 12वीं क्लास तक पढ़े हुए हैं, पर उनमें भी आगे बढ़ने की ललक है। लेकिन हर बार शरीयत का मामला खड़ा किए जाने पर वे खुद को असुविधाजनक स्थिति में पाते हैं। चाहे वह दारुल उलूम देवबंद के मंच से राष्ट्रीय गीत का विरोध हो या फिर मुस्लिम महिलाओं की फोटो वाली मतदाता सूची का मामला हो, वे नहीं चाहते कि उनके कौम की रहनुमाई के नाम पर मुट्ठी भर लोग उनके प्रवक्ता भी बन जाएं।

हम लोगों में से तमाम लोग उत्तर भारत या फिर दक्षिण भारत की संस्कृति में पले-बढ़े हिंदू-मुसलमान हैं। दिनचर्या पर नजर डालने से पता चल सकता है कि इबादत के फर्क के अलावा उत्तर और दक्षिण के मुसलमान एक दूसरे से अलग जिंदगी नहीं जी रहे हैं। मिसाल के तौर पर यह देखें कि देश के मुसलमानों की कुल आबादी में एक फीसदी मुसलमान भी ऐसे नहीं हैं जिनके घर में फोटो वाली अलबम नहीं होगी या परिवार के किसी व्यक्ति का फोटो मौजूद न हो। इसी तरह आज किसी मुसलमान के घर में शादी हो, तो यह नहीं हो सकता कि वहां फोटोग्राफर मौजूद न हो या शादी की विडियोग्राफी नहीं हो रही हो। कौम के तथाकथित प्रवक्ता मुल्ला-मौलवियों के घरों की नई पीढ़ी भी इन सब चीजों से अलग नहीं है। मुझे मुसलमानों के किसी भी मतावलंबी (स्कूल ऑफ थॉट्स) में अभी तक ऐसा कोई मौलवी नहीं मिला, जिसके मत की अपनी वेबसाइट न हो और उस पर फोटो न हों।

प्रियंका आगे, शबनम पीछे क्यों

बेंगलूर या फिर दिल्ली में ओखला के किसी भी बस स्टॉप पर सुबह-सुबह खड़े हो जाइए तो दिखेगा कि तमाम मुस्लिम लड़कियां बुर्के या चादर से अपना शरीर तो ढके रहती हैं पर उनके चेहरे पर किसी भी तरह का परदा नहीं होता। उनके कंधे पर लैपटॉप लटक रहा होता है। ये लड़कियां बुर्के या चादर के साथ कभी-कभी जींस में भी नजर आती हैं। पहनावे में आए इस बदलाव को आम मुस्लिम समाज स्वीकार कर चुका है। पर मौलवियों-मौलानाओं को शायद यह जवान पीढ़ी नहीं दिखती है, जो परदे का आदर कर शरीयत का सम्मान कर रही है पर अपने वजूद का भी अहसास करा रही है। मौलवियों की चले तो वे परदे के नाम पर मुस्लिम लड़कियों को न पढ़ने दें और न नौकरी करने दें। यह साजिश नहीं तो और क्या है कि शबनम और प्रियंका पढ़ें तो साथ-साथ, लेकिन परदे की वजह से शबनम 12वीं क्लास से आगे न बढ़ पाए और प्रियंका आगे निकल जाए? मक्का-मदीना की मस्जिदों के इमाम की बेटियां तो अमेरिका में पढ़ें, लेकिन आम भारतीय मुसलमान की बेटी को दिल्ली यूनिवर्सिटी या लखनऊ यूनिवसिर्टी की पढ़ाई भी नसीब न हो पाए?

परदा कितना, महिला खुद तय करे मुझे उत्तर प्रदेश से लेकर पंजाब, हरियाणा, यूपी, दिल्ली, आंध्र प्रदेश में ऐसी तमाम मतदाता सूचियां देखने को मिलीं, जिनमें मुस्लिम महिलाओं के बाकायदा फोटो लगे हुए थे। फोटो इस ढंग से खिंचवाए गए हैं कि उनमें सिर्फ चेहरा ही दिखाई दे रहा है। इस तरह के फोटो खींचे जाने पर न तो उन मुस्लिम महिलाओं ने हाय-तौबा मचाई और न ही उनके शौहरों ने कोई बवाल किया। हज पर जाने वाले मौलाना साहब जब अपनी बेगम साहिबा को ले जाना चाहते हैं तो वह यह जिद कतई नहीं करते कि पासपोर्ट पर उनकी बेगम साहिबा का फोटो न लगाया जाए।

कुरान में कहा गया है कि महिलाओं को अपने पूरे शरीर को इस तरह से ढकना चाहिए कि उनके शरीर का कोई अंग उनके परिवार के अलावा किसी और को न दिखे। बस उनका चेहरा दिखाई दे। महिलाओं को कुरान की यह सिर्फ एक सलाह है। यह उस महिला पर है कि वह खुद को किस तरह ढकना चाहती है।