Saturday, March 27, 2010

बुरके के पीछे से विद्रोह की आवाज

राजकिशोर

नकाब, हिजाब या बुरके के पीछे सिर्फ मुस्सिम कट्टरपंथ की शिकार ही नहीं छिपी होती, बल्कि रेडिकल विचार भी पनप रहे होते हैं, यह सऊदी अरब की कवयित्री हिसा हिलाल ने साबित कर दिया है। सऊदी अरब वह मुल्क है, जिसने इस्लाम की सबसे प्रतिक्रियावादी व्याख्या अपने नागरिकों पर थोपी हुई है। इसकी सबसे ज्यादा कीमत वहां की औरतों को अदा करनी पड़ी है। सऊदी अरब में औरतों को पूर्ण मनुष्य का दरजा नहीं दिया जाता। वे घर से अकेले नहीं निकल सकतीं, अपरिचित आदमियों से मिल नहीं सकतीं, कार नहीं चला सकतीं और बड़े सरकारी पदों पर नियुक्त नहीं हो सकतीं। घर से बाहर निकलने पर उन्हें सिर से पैर तक काला बुरका पहनना पड़ता है, जिसमें उनका चेहरा तक पोशीदा रहता है - आंखें इसलिए दिखाई पड़ती हैं, क्योंकि इसके बिना वे 'हेडलेस चिकन' हो जाएंगी। । पुरुषों की तुलना में उनके हक इतने सीमित हैं कि कहा जा सकता है कि उनके कोई हक ही नहीं हैं -- सिर्फ उनके फर्ज हैं, जो इतने कठोर हैं कि दास स्त्रियों या बंधुवा मजदूरों से भी उनकी तुलना नहीं की जा सकती। ऐसे दमनकारी समाज में जीनेवाली हिसा हिलाल ने न केवल पत्रकारिता का पेशा अपनाया, बल्कि विद्रोही कविताएं भी लिखीं। इसी हफ्ते अबू धाबी में चल रही एक काव्य प्रतियोगिता में वे प्रथम स्थान के लिए सबसे मज़बूत दावेदार बन कर उभरी हैं।

संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबू धाबी में कविता प्रतियोगिता का एक टीवी कार्यक्रम होता है -- जनप्रिय शायर। इस कार्यक्रम में हर हफ्ते अरबी के कवि और कवयित्रियां अपनी रचनाएं पढ़ती हैं। विजेता को तेरह लाख डॉलर का पुरस्कार मिलता है। इसी कार्यक्रम में हिसा हिलाल ने अपनी बेहतरीन और ताकतवर नज्म पढ़ी - फतवों के खिलाफ। यह कविता उन मुस्लिम धर्मगुरुओं पर चाबुक के प्रहार की तरह है, ' जो सत्ता में बैठे हुए हैं और अपने फतवों और धार्मिक फैसलों से लोगों को डराते रहते हैं। वे शांतिप्रिय लोगों पर भेड़ियों की तरह टूट पड़ते हैं।' अपनी इस कविता में इस साहसी कवयित्री ने कहा कि एक ऐसे वक्त में जब स्वीकार्य को विकृत कर निषिद्ध के रूप में पेश किया जा रहा है, मुझे इन फतवों में शैतान दिखाई देता है। 'जब सत्य के चेहरे से परदा उठाया जाता है, तब ये फतवे किसी राक्षस की तरह अपने गुप्त स्थान से बाहर निकल आते हैं।' हिसा ने फतवों की ही नहीं, बल्कि आतंकवाद की भी जबरदस्त आलोचना की। मजेदार बात यह हुई कि हर बंद पर टीवी कार्यक्रम में मौजूद श्रोताओं की तालियां बजने लगतीं। तीनों जजों ने हिसा को सर्वाधिक अंक दिए। उम्मीद की जाती है कि पहले नंबर पर वही आएंगी।

मुस्लिम कट्टरपंथ और मुस्लिम औरतों के प्रति दरिंदगी दिखानेवाली विचारधारा का विरोध करने के मामले में हिसा हिलाल अकेली नहीं हैं। हर मुस्लिम देश में ऐसी आवाजें उठ रही हैं। बेशक इन विद्रोही आवाजों का दमन करने की कोशिश भी होती है। हर ऐसी घटना पर हंगामा खड़ा किया जाता है। हिसा को भी मौत की धमकियां मिल रही है। जाहिर है, मर्दवादी किले में की जानेवाली हर सुराख पाप के इस किले को कमजोर बनाती है। लंबे समय से स्त्री के मन और शरीर पर कब्जा बनाए रखने के आदी पुरुष समाज को यह कैसे बर्दाश्त हो सकता है? लेकिन इनके दिन अब गिने-चुने हैं। विक्टर ह्यूगो ने कहा था कि जिस विचार का समय आ गया है, दुनिया की कोई भी ताकत उसे रोक नहीं सकती। अपने मन और तन की स्वाधीनता के लिए आज दुनिया भर के स्त्री समाज में जो तड़प जाग उठी है, वह अभी और फैलेगी। दरअसल, इसके माध्यम से सभ्यता अपने को फिर से परिभाषित कर रही है।

वाइरस की तरह दमन के कीड़े की भी एक निश्चित उम्र होती है। फर्क यह है कि वाइरस एक निश्चित उम्र जी लेने के बाद अपने आप मर जाता है, जब कि दमन के खिलाफ उठ खड़ा होना पड़ता है और संघर्ष करना होता है। मुस्लिम औरतें अपनी जड़ता और मानसिक पराधीनता का त्याग कर इस विश्वव्यापी संघर्ष में शामिल हो गई हैं, यह इतिहास की धारा में आ रहे रेडिकल मोड़ का एक निश्चित चिह्न है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस तरह के प्रयत्नों से यह मिथक टूटता है कि मुस्लिम समाज कोई एकरूप समुदाय है जिसमें सभी लोग एक जैसा सोचते हैं और एक जैसा करते हैं। व्यापक अज्ञान से उपजा यह पूर्वाग्रह जितनी जल्द टूट जाए, उतना अच्छा है। सच तो यह है कि इस तरह की एकरूपता किसी भी समाज में नहीं पाई जाती। यह मानव स्वभाव के विरुद्ध है। धरती पर जब से अन्याय है, तभी से उसका विरोध भी है। रूढ़िग्रस्त और कट्टर माने जानेवाले मुस्लिम समाज में भी अन्याय और विषमता के खिलाफ प्रतिवाद के स्वर शुरू से ही उठते रहे हैं। हिसा हिलाल इसी गौरवशाली परंपरा की ताजा कड़ी हैं। वे ठीक कहती हैं कि यह अपने को अभिव्यक्त करने और अरब स्त्रियों को आवाज देने का एक तरीका है, जिन्हें उनके द्वारा बेआवाज कर दिया गया है 'जिन्होंने हमारी संस्कृति और हमारे धर्म को हाइजैक कर लिया है।'

तब फिर अबू धाबी में होनेवाली इस काव्य प्रतियोगिता में जब हिसा हलाल अपनी नज्म पढ़ रही थीं, तब उनका पूरा शरीर, नख से शिख तक, काले परदे से ढका हुआ क्यों था? क्या वे परदे को उतार कर फेंक नहीं सकती थीं? इतने क्रांतिकारी विचार और परदानशीनी एक साथ कैसे चल सकते हैं? इसके जवाब में हिसा ने कहा कि 'मुझे किसी का डर नहीं है। मैंने पूरा परदा इसलिए किया ताकि मेरे घरवालों को मुश्किल न हो। हम एक कबायली समाज में रहते हैं और वहां के लोगों की मानसिकता में परिवर्तन नहीं आया है।' आएगा हिसा, परिवर्तन आएगा। आनेवाले वर्षों में तुम जैसी लड़कियां घर-घर में पैदा होंगी और अपने साथ-साथ दुनिया को भी आजाद कराएंगी।

यह भी नारीवाद का एक चेहरा है। इसमें भी विद्रोह है, लेकिन अपने धर्म की चौहद्दी में। यह जाल-बट्टे को एक तरफ रख कर हजरत साहब की मूल शिक्षाओं तक पहुंचने की एक साहसी कार्रवाई है। इससे संकेत मिलता है कि परंपरा के भीतर रहते हुए भी कैसे तर्क और मानवीयता का पक्ष लिया जा सकता है। अगला कदम शायद यह हो कि धर्म का स्थान वैज्ञानिकता ले ले। नारीवाद को मानववाद की तार्किक परिणति तक ले जाने के लिए यह आवश्यक होगा। अभी तो हमें इसी से संतोष करना होगा कि धर्म की डाली पर आधुनिकता का फूल खिल रहा है।

Friday, March 26, 2010

जो न देवियाँ हैं , न तितलियाँ

नाक-मुँह सिकोड़े टी.वी. पर ‘राखी का स्वयंवर’ देखते हुए बहुतों का जी यह सोचकर हलकान हुआ जाता था कि एक उद्दण्ड लड़की अपने सेलिब्रिटी होने के घमंड मे गंगा किनारे के छोरे को स्वयम्वर से बाहर का रास्ता दिखाती है और बहू नही नौकरानी चाहिएजैसी हमारे समाज की मानसिकता की ऐसी खिल्ली उड़ा रही है! प्रेमचन्द की भाषा मे कहें तो वह ऐसी तितली है जिसके प्रति पुरुष मे आकर्षण और वासना तो जाग सकती है श्रद्धा नही पनप सकती। पुरुष के मन मे ऐसी स्त्री के लिए ही प्रेम उमड़ता है जो श्रद्धेय हो,त्याग और सेवा की मूरत हो।इससे कम कुछ नही चलेगा।इस मायने मे यह देखना बहुत रोमांचक है कि ‘गोदान’ के मालती और मेहता जैसे चरित्र जब गढे जा रहे थे उस समय से लेकर अब तक मेहता का यह कथन आज भी बहुत अटपटा नही दिखाई देता कि ..शिक्षित बहने...गृहिणी का आदर्श त्यागकर तितलियों का रंग पकड़ रही हैं

यह मेरी घृष्टता ही होगी कि आज के परिप्रेक्ष्य मे प्रेमचन्द के साहित्य मे स्त्री की स्थिति की पड़ताल करूँ।बहुत सम्भव है कि उनकी सर्वाधिक यथार्थ और क्रांतिकारी रचना ‘गोदान’भी पितृसत्तात्मक पूर्वग्रहों के प्रमाण प्रस्तुत करे।जबकि यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि हाशिए की अस्मिताओं का पहला सजीव , यथार्थ , मर्मस्पर्स्शी चित्रण हिन्दी कथा-साहित्य के विकास-क्रम मे पहले पहल प्रेमचन्द मे ही मिलता है।स्त्री को समाज का आधा हिस्सा और पुरुष की पूरक मानकर उसकी समस्याओं पर अपने दौर मे सबसे प्रभावी लेखन उन्होने किया।रीतिकाल से निकले और अय्यारी मे जा अटके हिन्दी सहित्य मे यह एक क्रांतिकारी कदम था कि पूरे उपन्यास की केन्द्रीय पात्र स्त्री हो।‘सेवासदन’ और ‘निर्मला’ जैसे उपन्यास उन्ही की कलम से निकले।

देवियों और तितलियों के बीच हाड़-माँस की मानुषी की जो तिलमिलाहट ‘धनिया’ मे है वह प्रेमचन्द मे अन्यत्र कहीं देखने को नही मिलती।लेकिन मालती के चरित्र को मेहता के प्रेम और श्रद्धा का पात्र बनाने के लिए एक टोटल रिफॉर्म से गुज़रना होता है।मेहता को वह स्त्री चाहिए जिसे ‘मार भी डालें तो प्रतिहिंसा का भाव उसमे न जागे’। वही पुरुष को स्त्री मे काम्य है। पतिव्रता गोविन्दी की ओर खन्ना का लौटना और श्रद्धा से भर जाना भी देवी स्वरूप की प्रतिष्ठा के लिए ही है। पीड़क से भला है पीड़ित होना –यह समझने वाली गोविन्दी और अन्याय के प्रति खुल कर बोलती हुई धनिया।क्या इसे एक मानववादी और पुरुषवादी के अंतर्विरोध की तरह देखा जाना चाहिए? सम्भव है कि मर्दवादी व्यवस्था मे अनुकूलित मस्तिष्क इस नज़रिए से सोच भी न पाता हो ।दर असल आदर्श की चाहत और मानवीय सद्प्रवृत्तियों मे विश्वास प्रेमचन्द के हर पात्र व कथा मे दिखाई देता है चाहे वे पुरुष हों या स्त्रियाँ।‘गोदान’का अंत बेशक किसी गान्धीवादी आदर्श को न पेश करता हो लेकिन स्त्री के लिए वहाँ भी आदर्श यही रहता है कि वह सेवा और तप से कामी,अन्यायी पुरुष को भी अपने अनुकूल कर ले।सद प्रवृत्तियों के ऐसे पर्दे मे व्यवस्था की खामियाँ छिप जाती हैं ।प्रसव वेदना मे मरने वाली , जीते जी दो पुरुषों का दोज़ख भरने वाली बुधिया के देवत्व को स्वीकार कर अंत मे सम्वेदना घीसू,माधव पर आकर ही टिकती है।

आज लगभग सत्तर साल बाद परिदृश्य बदला है। स्त्री की उपस्थिति बदल गयी है, स्थिति चाहे वहीं हो जहाँ तब थी।आज स्त्री कामकाजी है,शिक्षित हो रही है,उच्च पदों पर आसीन हो रही है,सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ साथ पारिवारिक व अन्य मोर्चों पर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।साहित्य,राजनीति,व्यवसाय,तकनीक सभी मे उसका दखल है और वह अपना स्पेस गढ भी रही है, प्राप्त भी कर रही है।वह न केवल पूर्वग्रहो को चुनौती दे रही है वरन अपने ‘बनने’ की प्रक्रिया को भी समझ रही है।सुबह से रात तक घर-बाहर के कई टंटो से निबटती हुई,रिपोर्टिंग करती हुई,पढती-पढाती-लिखती हुई,सड़को ,संसदों मे सक्रिय, बोलती हुई यह स्त्री तितली नही है।देवी भी नही है।यह तितलियों और देवियों की परिभाषाओं से परे अपना अस्तित्व खोजती,स्वतंत्र अस्मिता के लिए बेचैन मानवी भर है।वह ‘सूरजमुखी अन्धेरे के’ की रत्ती, ‘मुझे चाँद चाहिये’ कि सिलबिल ‘छिन्नमस्ता’ की प्रिया है।फिर भी एक औसत मध्यवर्गीय पुरुष के भीतर कहीं यह कसक है कि स्त्रियाँ आज तितलियाँ हो गयीं हैबेज़बानी और कुर्बानी को जिस अनिवार्य मूल्य की तरह स्त्री के साथ नत्थी कर दिया गया उसकी अपेक्षा अभी मिटी नही है।तो क्या इसलिए हमारा समय उन्हे क्षमा करता है ? शायद !

इंटरनेट क्रांति और ग्लोबल होने के युग मे जब अभिव्यक्ति के आड़े आने वाली अड़चने लगभग न्यून हैं ,ब्लॉग जैसे आभासी स्पेस मे भी यह पढने को मिल जाता है कि ‘पत्नी को पाब्लो नेरुदा पढते देख डर लगता है;किसी दिन दफ्तर से लौटें और पत्नी के हाथ मे चाय के कप की बजाए किताब मिले तो यह लगेगा कि इससे तो दफ्तर ही लौट जाएँ, वहाँ कम से कम चपरासी चाय के साथ समोसे भी खिला देगा।‘ लेकिन हाँ , यह अवश्य है कि आज ऐसा कहकर आप विरोध का सामना किए बिना नही रहेंगे! प्रेमचन्द भी नही रह पाते !

(पिछले वर्ष यह लेख एक अखबार के लिए लिखा था जो आज यहाँ छापना सार्थक लगा - सुजाता )

Thursday, March 25, 2010

सहजीवन के दो उदाहरण - प्रेमचंद से


राजकिशोर

प्रेमचंद को जितनी बार पढ़ा जाए, उतनी बार लगता है कि वे अपने समय से आगे थे। उन्होंने सिर्फ बात बनाने के लिए नहीं कहा था कि साहित्य राजनीति की मशाल है। वे इसमें यकीन भी रखते थे। यह दुख की बात है कि प्रेमचंद के प्रशंसक कुछ खास बातों के लिए ही उन्हें याद रखते हैं। यह प्रेमचंद जैसे महान लेखक के साथ अन्याय है। उनकी और भी ढेर सारी बातें विचारणीय हैं।

उदाहरण के लिए, प्रेमचंद विवाह संस्था के विरोधी थे। उनका विश्वास सहजीवन में था। स्त्री-पुरुष संबंधों के विशाल ताने-बाने का उन्होंने तरह-तरह से परीक्षण किया है। इसी परीक्षण के दौरान उन्होंने एक कहानी लिखी थी - मिस पद्मा। कहानी के अनुसार, मिस पद्मा एक सफल वकील थी। उसके पास अपार पैसा था। साहिर लुधियानवी की लाइनें है - तन्हा न कट सकेंगे जवानी के रास्ते, पेश आएगी किसी की जरूरत कभी-कभी। पद्मा को भी किसी की जरूरत पेश आई। प्रेमचंद लिखते हैं, 'यों उसके दर्जनों आशिक थे - कई वकील, कई प्रोफेसर, कई रईस। मगर सब-के-सब ऐयाश थे - बेफिक्र, केवल भौंरे की तरह रस ले कर उड़ जानेवाले। ऐसा एक भी न था, जिस पर वह विश्वास कर सकती।'

'उसके प्रेमियों में एक मि. प्रसाद था - बड़ा ही रूपवान और धुरंधर विद्वान। एक कालेज में प्रोफेसर था। वह भी मुक्त भोग के आदर्श का उपासक था और मिस पद्मा उस पर फिदा थी। चाहती थी उसे बांध कर रखे, संपूर्णत: अपना बना ले, लेकिन प्रसाद चंगुल में ही न आता था।' एक दिन वह चंगुल में आ गया। मिस पद्मा ने उससे अपने प्रेम का इजहार किया। प्रसाद ने भी अपना दिल खोल दिया। दोनों ने प्रतिज्ञा की कि वे एक-दूसरे से बंधेंगे और उनके बीच किसी तीसरे व्यक्ति के लिए कोई जगह नहीं होगी। मिस पद्मा वकील थी। प्रसाद प्रोफेसर था। दोनों में से किसी ने भी विवाह करने पर जोर नहीं दिया। सहजीवन ही उनका आदर्श था। प्रसाद मिस पद्मा की कोठी में आ कर रहने लगा।

मिस पद्मा के यहां किसी चीज की कमी नहीं थी। प्रसाद को खुली छूट थी। वह मौज-मस्ती के समन्दर में डूब गया। विलासिता के साथ रंगीनी भी आई। प्रसाद ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी। वह मिस पद्मा की उपेक्षा करने लगा। इधर, मिस पद्मा उसके प्रति एकनिष्ठ बनी रही। जब वह गर्भवती हो गई, तो वह प्रसाद के लिए और अवांछित हो गई। एक दिन जब प्रसाद जब आधी रात को घर लौटा, तो पद्मा ने उस पर बेवफाई का आरोप लगाया। प्रसाद घर छोड़ कर चले जाने की धमकी लगा।ल पद्मा झुक गई। प्रेमचंद लिखते हैं, प्रसाद ने पूरी विजय पाई।

इस विजय का नतीजा यह निकला कि जब मिस पद्मा प्रसव वेदना में थी, तब प्रसाद का कुछ अता-पता नहीं था। पांच दिनों के बाद प्रसव संबंधी बिल अदा करने के लिए जब पद्मा ने नौकर को बैंक भेजा, तब मालूम हुआ कि खाता खाली था। सारे रुपए निकाल कर प्रसाद विद्यालय की एक बालिका को ले कर इंग्लैंड की सैर करने चला गया था। सहजीवन का प्रयोग विफल हो गया। कहानी का अंतिम दृश्य यह है : 'एक महीना बीत गया था। पद्मा अपने बंगले के फाटक पर शिशु को गोद में लिए खड़ी थी। उसका क्रोध अब शोकमय निराशा बन चुका था। बालक पर कभी दया आती, कभी प्यार आता, कभी घृणा आती। उसने देखा, सड़क पर एक यूरोपियन लेडी अपने पति के साथ अपने बालक को बच्चों की गाड़ी में बिठा कर चली जा रही थी। उसने हसरत भरी निगाहों से खुशनसीब जोड़े को देखा और उसकी आंखें सजल हो गईं।'

इस कहानी में प्रेमचंद ने सहजीवन पर विवाह की विजय दिखाई है। लेकिन इससे सहजीवनवादियों को निराश नहीं होना चाहिए। इसके माध्यम से प्रेमचंद ने वस्तुत: यह स्पष्ट किया है कि सहजीवन किन स्थितियों में विफल होने को बाध्य है। विवाह की तरह सहजीवन भी एक नैतिक व्यवस्था है। जैसे विवाह के नियम तोड़ने पर वह सफल नहीं हो सकता, उसी तरह सहजीवन की शर्तों के टूटने पर वह भी बिखर जाता है। प्रेमचंद ने शुरू में ही इशारा कर दिया था कि यह रिश्ता क्यों गड़बड़ था। पद्मा और प्रसाद दोनों मुक्त भोग के उपासक थे। 'मुक्त भोग' से प्रेमचंद का आशय शायद फ्री सेक्स से था। सहजीवन शुरू करने के बाद पद्मा ने तो अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण कर लिया, पर प्रसाद जल्द ही पहले की तरह आसमान में उड़ने लगा। इसके बाद सर्वनाश को कौन रोक सकता था?

'गोदान' प्रेमचंद की सबसे प्रौढ़ रचना है। इसमें भी प्रेमचंद ने सहजीवन का एक उदाहरण पेश किया है। यह जोड़ी मालती और मेहता की है। मालती डाक्टर है। मेहता प्रोफेसर है। दोनों का एक-दूसरे के प्रति अनुराग था। मेहता मालती के घर पर रहने लगा। दोनों के बीच प्रेम का बंधन और। मजबूत हुआ। अब उपासक उपास्य में लीन होना चाहता था। लेकिन मेहता ने जब विवाह का प्रस्ताव रखा, तो मालती ने एकदम से इनकार कर दिया। उसका गंभीर जवाब था -- 'नहीं मेहता, मैं महीनों से इस प्रश्न पर विचार कर रही हूं और अंत में मैंने यह तय किया है कि मित्र बन कर रहना स्त्री-पुरुष बन कर रहने से कहीं सुखकर है। ... अपनी छोटी-सी गृहस्थी बना कर अपनी आत्माओं को छोटे-से पिंजड़े में बंद करके, अपने सुख-दु:ख को अपने ही तक रख कर, क्या हम असीम के निकट पहुंच सकते हैं? वह तो हमारे मार्ग में बाधा ही डालेगा। ... जिस दिन मन में मोह आसक्त हुआ और हम बंधन में पड़े, उस क्षण हमारा मानवता का क्षेत्र सिकुड़ जाएगा, नई-नई जिम्मेदारियां आ जाएंगी और हमारी शक्ति उन्हीं को पूरा करने में लगेगी। तुम्हारे जैसे विचारवान, प्रतिभावान मनुष्य की आत्मा को मैं इस कारागार में बंदी नहीं करना चाहती।'

नतीजा? 'और दोनों एकांत हो कर प्रगाढ़ आलिंगन में बंध गए। दोनों की आंखों से आंसुओं की धारा बह रही थी।'

प्रेमचंद ने यह नहीं बताया कि भविष्य में क्या हुआ। हम अनुमान कर सकते हैं कि दोनों के बीच प्रेम का बंधन और मजबूत हुआ होगा तथा दोनों ने एक-दूसरे से बल पाते हुए और एक-दूसरे को बल प्रदान करते हुए आदर्श जीवन बिताया होगा। सहजीवन का यह आदर्श एक रूप है।- राजकिशोर्



(अलग रंग से इटालिक्स मे लिखी पंक्तियों से मै सहमत हूँ ,पर लेख की प्रस्थापना से नही। सो, अगली पोस्ट में प्रेमचन्द को ही लेकर मेरा दृष्टिकोण व्यक्त होगा- सुजाता)

Monday, March 15, 2010

महिला दिवस की बिलेटेड शुभकामनाएं?

नोन, तेल, लकड़ी...जब से होश संभाला, तब से इन्हीं में मन रमाया। आस पास वालों की नजर में शादी लायक देह हुई तो शादी के लिए लड़का खोजना शुरू किया। लंबी ऊंची गोरी गठीली देह। खेत में हाथ चलाती तो घास सरपट कट जाती। खड़ी फसल भी फर्र फर्र कटवा डालती। लड़की किस्मत वाली थी, लड़का जल्द ही मिल गया। जमीन का एक हिस्सा बेचा। साहूकार से कर्ज लिया। शादी में दही बूरा समेत आलू की सब्जी भी खिलाई बारातियों को। लड़के को मोटरसाइकिल पर चढ़ने का शौक था। लड़की के पिता ने पूरा किया। सेकेंड हैंड सही दाम में मिल गई। जमाई राजा खेत जाया करेंगे फटफटिया पर- सोचते तो छाती कुछ इंच फूल जाती। शादी में 5 रुपए की चिल्लड़ भी उड़ाई थी। सब निपट गया।

..पांच महीने बीतते बीतते पिता सूख गए। लोग कहते टीबी हो गई। मां की खांसी चलती तो थमती नहीं...सांस नहीं ली जाती...लड़की फिर धमकी घर तो अबकी मां नहर में डूब मरेगी...और क्या क्या बेचेंगे बापू...गांव में बिजली नहीं..लड़के को मोबाइल चाहिए...और भी पता नहीं क्या क्या चाहिए...नहीं दे पाएंगे कह दे जाकर...कैसे कह दे लड़की...दूसरे ब्याह के नाम पर धमकाते हैं...अबकी खाली लौटी तो लेंगे नहीं...और और और..दूसरी कर लेंगे...फिर भी लौट गई।

...छठा महीना बीत गया। पड़ोस की चाची ने खबर दी- लड़की को नहर में डुबो दिया...गर्दन काट डाली...दरांती से काटी...पूरी नहीं कटी...लड़की मर गई तो रेतना छोड़ दिया होगा...नहर में बहा दी...।

...मरी देह हाथ लगी घंटे बीतते बीतते। बही नहीं थी। कोने में कहीं सरक गई थी। या पता नहीं कैसे कहां से हाथ लग गई मरी देह।

...पैसे की खनक ने प्रधान के कान में शोर भर दिया था। मां चिल्लाई थी- तुमने मेरी बेटी खा ली।

पूरी बात बता चुकने के बाद गांव से आईं दूर के रिश्ते की मेरी भाभी कहती हैं कि घर में दो बेटी और हैं। उम्र कम है। पर शादी लायक हो चुकी हैं। दोनों अपने पिता से कहती हैं, दोनों अपने पिता से कहती हैं शादी नहीं करेंगी...

नहीं चाहिए मोटर गाड़ी,
नहीं चाहिए बंगला साड़ी
हम घांघरे में रह लेंगे
बापू हम कुंवारे रह लेंगे।।

नहीं चाहिए सेज पिया की
नहीं चाहिए सास मईया सी
हम तुम संग सब सह लेंगे
बापू हम कुंवारे रह लेंगे।।

गोटे वाली चुनर न चाहिए
कोरी चूड़ी भली, रंग न चाहिए
हम बिन कंगन जंच लेंगे
बापू हम कुंवारे रह लेंगे।।

जीजा जैसा खसम न चाहिए
सपने जैसा भरम न चाहिए
गई जीजी की याद बो लेंगे
बापू हम कुंवारे रह लेंगे।।

आपस में चुप रहेंगे
छोटे संग न लड़ेंगे
सयानी बिटिया बनेंगे
बापू हम कुंवारे रह लेंगे।।

---पूजा प्रसाद

Saturday, March 13, 2010

महिलाओं ने जीती एक और जंग

आरक्षण पर शुरुआती किला फतह करने के बाद शुक्रवार को महिलाओं ने एक और जंग जीत ली। सेना में स्थायी कमीशन देने को लेकर जारी भेदभाव के खिलाफ लड़ाई में महिलाओं ने विजय श्री हासिल कर ली है। दिल्ली हाईकोर्ट ने सैन्य सेवा में महिलाओं को स्थायी कमीशन देने का सरकार को आदेश दिया है। कोर्ट के अनुसार, 2006 से पहले सेना में भर्ती महिलाओं को स्थायी कमीशन प्रदान किया जाए। हाईकोर्ट ने सेना में भर्ती में महिला-पुरुष लिंगभेद पर सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। अपने ऐतिहासिक फैसले में हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह भविष्य में सैन्य सेवाओं की भर्ती व नौकरियों में लिंगभेद की नीति न अपनाए।

गौरतलब है कि 2006 से पूर्व भर्ती महिलाओं को स्थायी कमीशन न देकर 14 साल के बाद उन्हें नौकरी से रिटायर कर दिया जाता है। जबकि पुरुष व महिलाओं की भर्ती पहले शार्ट सर्विस कमीशन के माध्यम से ही होती थी। पांच साल बाद पुरुषों को स्थायी कमीशन दे दिया जाता था, जबकि महिलाओं को शार्ट सर्विस कमीशन में ही रखकर 14 साल बाद रिटायर कर दिया जाता है। करीब 60 मौजूदा व पूर्व महिला सैन्य अफसरों ने इस नीति के खिलाफ कोर्ट में याचिकाएं दायर कर रखी थी। जिसमें सरकार पर स्थायी कमीशन देने के नाम पर भेदभावपूर्ण नीति अख्तियार करने का आरोप लगाया गया था।

सेवारत एवं सेवानिवृत्ता महिला अधिकारियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने बीते 14 दिसंबर को इन याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रखा लिया था। याचिका में सशस्त्र सेनाओं में पुरुष अधिकारियों की तरह ही महिला सैन्य अधिकारियों को भी स्थायी कमीशन प्रदान करने संबंधी निर्देश दिए जाने की मांग की गई थी। यह भी कहा गया था सुनहरे भविष्य का सपना दिखा उन्हें भर्ती किया जाता है और 14 साल बाद रिटायर कर दिया जाता है।

फैसले में पीठ ने कहा है कि वह सरकार की नीति में हस्तक्षेप नहीं करना चाहती। लेकिन सरकार ने जो नीति बना रखी है, उसमें लिंगभेद नहीं बरती जानी चाहिए। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी महिलाएं जिन्होंने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है और वे जो सेवानिवृत्ता हो चुकी है, उन्हें फिर से बहाल कर स्थायी कमीशन दिया जाए। पीठ ने सरकार से महिला सैन्य अधिकारियों को सभी प्रकार के अनुवर्ती लाभ मुहैया कराने को भी कहा है। कोर्ट ने दो महीने के अंदर फैसले पर अमल करते हुए याचिकाकताओं को सुविधाएं देने को कहा है।

कोर्ट ने माना कि 2006 में सरकार ने जो नई नीति बनाई है, वह तो ठीक है। किंतु इससे पहले तो कोई नीति ही नहीं थी। इससे पूर्व सैन्य सेवाओं में भर्ती हुई महिलाओं को 14 साल बाद रिटायर कर दिया जाता था। यह भेदभाव ठीक नहीं था।

ध्यान रहे कि 2006 के बाद सरकार ने जो अधिसूचना जारी की है, उसके तहत महिला या पुरुष किसी को भी स्थायी कमीशन दिए जाने का प्रावधान नहीं है। इसलिए कोर्ट ने सरकार की इस पालिसी पर कोई टिप्पणी नहीं की है। याचिका में इस नई पालिसी को भी रद करने की मांग की गई थी। किंतु उनकी इस मांग को ठुकरा दिया गया।

संघर्ष ने भरी सफलता की 'उड़ान'

वायुसेना में शुरुआती पांच साल के करियर में उनके प्रदर्शन को सभी ने सराहा। अधिकारियों ने उनकी खूब तारीफ की। मेडल दिए गए और सर्टिफिकेट भी। साथ ही एक झटका भी। उन्हें कहा गया कि वह अब आगे काम नहीं कर सकती। मन ही मन सोचा जब मैं पुरुषों से बेहतर कर सकती हूं तो फिर आगे बढ़ने से क्यों रोका जा रहा है। आला अधिकारियों से लेकर चीफ तक से इस पर प्रश्न पूछा, लेकिन जवाब किसी ने नहीं दिया। अंत में हाईकोर्ट की शरण ली। रिटायरमेंट के बाद थकी नहीं, अपने संघर्ष को जारी रखा। नतीजा आज सेना में काम करने वाली महिलाओं को स्थायी कमीशन देने के रूप में सामने आया। इस नतीजे से वह बहुत खुश हैं। वे इसे महिला अधिकारों की जीत मानती हैं। उन्हें उम्मीद है कि महिलाओं को अब कांबेट ट्रेनिंग में भी लिया जा सकेगा।

बात हो रही है देहरादून में रहने वाली विंग कमांडर अनुपमा जोशी की। जिन्होंने सेना में रहते हुए महिला अधिकारियों के अधिकार की आवाज बुलंद की और अपने संघर्ष को अंजाम तक पहुंचाया। अनुपमा जोशी का 1992 में एयर फोर्स में पहली महिला अधिकारी के रूप में चयन हुआ। इसके बाद वह अपनी मेहनत और जज्बे के बल पर आगे बढ़ती रही। पहले पांच साल की सर्विस के बाद उन्होंने आवाज उठाई तो उन्हें तीन साल और फिर तीन साल का एक्सटेंशन मिला। हर बार टुकड़ों में मिल रहे एक्सटेंशन से वह खिन्न आ गई। उन्होंने 2002 में इसके लिए अपने सीनियर अधिकारियों से लिखित में जवाब मांगा। यहां से कोई जवाब न मिलने पर वायु सेना प्रमुख को पत्र लिखकर जवाब मांगा। कहीं से कोई जवाब नहीं आया तो फिर उन्होंने इसके लिए कोर्ट में मुकदमा करने की ठान ली। 2006 में उन्होंने अन्य महिला अधिकारी के साथ कोर्ट में याचिका दर्ज की। ऐसा करने वाली वह पहली महिला अधिकारी थी। कोर्ट ने इस केस की सुनवाई में नई भर्तियों को स्थायी कमीशन देने का फैसला दिया, लेकिन सर्विग महिला अधिकारियों का फैसला नहीं हो पाया। 2008 में वह रिटायर हो गई, लेकिन उनका संघर्ष जारी रहा। इस बीच कुछ अन्य अधिकारियों ने भी सेना में तैनात महिलाओं को स्थायी कमीशन देने के लिए मुकदमा दायर किया। इस पर हाईकोर्ट ने एक संयुक्त सुनवाई ने महिला अधिकारियों के पक्ष में अपना निर्णय सुनाया है।

दोबारा कर सकती हैं सेवा

विंग कमांडर जोशी दोबारा वायुसेना को अपनी सेवाएं दे सकती हैं। विंग कमांडर अनुपमा जोशी कहती हैं कि कोर्ट ने याचिका में शामिल महिला अधिकारियों की सर्विस कंटीन्यू करने की बात कही हैं। ऐसे में उन्हें उम्मीद है कि दोबारा अपनी सेवाएं देने का मौका मिल सकता है।

महिला अधिकारियों में खुशी की लहर

नई दिल्ली। सेना में स्थायी कमीशन देने के कोर्ट के फरमान से महिला अधिकारियों की खुशी का ठिकाना नहीं है। उनका कहना है कि अब वे अपने पुरुष सहकर्मियों की तरह ही बगैर किसी भेदभाव के देश की सेवा कर सकती हैं।

कोर्ट में महिला अधिकारियों की ओर से पेश वकील रेखा पाली ने कहा कि यह एक बड़ी जीत है। महिलाओं को समानता का हक दिलाने वाले इस फैसले के लिए मैं कोर्ट की शुक्रगुजार हूं।

याचिकाकर्ता विंग कमांडर रेखा अग्रवाल ने खुशी जाहिर करते हुए कहा, 'मैं काफी खुश हूं। मैं फिर से काम पर जाऊंगी और राष्ट्र की सेवा करूंगी।' रेखा के मुताबिक, खुशी है कि आखिरकार महिलाओं को भी स्थायी कमीशन का अधिकार मिल गया। सेना में पहले महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार नहीं प्राप्त था, लेकिन इस फैसले से अब हमें भी वह सभी अधिकार मिल जाएंगे, जो पुरुष सैन्य अधिकारी को मिलते हैं। यह सचमुच महिलाओं की जीत है।

मेजर सीमा सिंह ने कहा, 'तीन वर्ष की लड़ाई रंग लाई। न्यायालय ने सेना में महिला अधिकारियों के साथ होने वाली असमानता को आखिर समझ लिया है।' उनका कहना है कि इस आदेश से न केवल मौजूदा अफसरों को ही फायदा होगा, बल्कि सेना ज्वाइन करने की सोच रहीं महिलाएं भी इससे उत्साहित होंगी।

याचिकाकर्ता अवकाश प्राप्त विंग कमांडर पुष्पांजलि ने कहा, 'हाईकोर्ट के फैसले ने हमारे दिल की मुराद पूरी कर दी है। यह हमारा हक था, जिसके लिए हम संघर्ष कर रहे थे। 14 साल की देश सेवा के बाद मुझे अवकाश दिया गया तो बहुत दुख हुआ था। ऐसे में हमने कोर्ट में याचिका दायर की और अपने हक के लिए संघर्ष शुरू किया।'

साभार : जागरण

आकांक्षा यादव

Wednesday, March 10, 2010

धर्म का लबादा ओढ़े ये मानवता के भक्षक

कानपुर भले ही छूट गया हो, पर अभी भी वहाँ की ख़बरें देख-पढ़ लेती हूँ. चार साल से ज्यादा का रिश्ता इतनी जल्दी छोड़ भी तो नहीं पाती. कानपुर भले ही कभी उत्तर प्रदेश की औद्योगिक राजधानी रहा हो, पर आज का कानपुर अपराध के लिए कुख्यात है, वो भी मूलत: महिलाओं के सम्बन्ध में. यहाँ पोर्टब्लेयर में जब लोगों को बेरोकटोक भारी गहने पहने देखती हूँ तो कानपुर का वो मंजर याद आता है जहाँ रोज गले से चेन की छिनैती, महिलाओं से छेड़-छाड़ आम बात है. कभी गौर करें तो कानपुर से सबसे ज्यादा अख़बार प्रकाशित होते हैं और स्थानीय ख़बरों में ऐसी ही समाचारों की भरमार रहती है.

अभी एक खबर पर निगाह गई कि कानपुर में लड्डू खिलाने के बहाने घर से ले जाकर एक पुजारी के बेटे ने सात साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म किया और बाद में उसकी गला दबाकर हत्या कर दी। पुजारी का यह बेटा कुछ दिनों से पिता के बीमार होने के कारण पूजा-पाठ का काम खुद ही कर रहा था। और इसी दौरान उसने यह कु-कृत्य किया. पता नहीं ऐसे लोग किस विकृत मानसिकता में पले-बढे होते हैं, जो कभी ढोंगी बाबा का रूप धारण करते हैं तो कभी पुजारी का. उन्होंने आवरण कितना भी बढ़िया ओढ़ रखा हो, पर मानसिकता कुत्सित ही होती है. मंदिर में बैठे पुजारी से लेकर बड़े-बड़े धर्माचार्य तक सब लम्बे-लम्बे उपदेश देते हैं, पर खुद के ऊपर इनका कोई संयम नहीं होता. ऐसे लोग समाज के नाम पर कोढ़ ही कहे जायेंगें. सात साल की बच्ची से बलात्कार..सोचकर ही दिल दहल जाता है. अभी कुछ दिनों पहले कोलकाता एयरपोर्ट पर थी, तो पता चला कि 7-8 साल की बच्ची के साथ वहाँ के एक स्टाफ ने छेड़खानी की, जिसके चलते वहाँ सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है. अपने चारों तरफ देखें तो ऐसी घटनाएँ रोज घटती हैं, जिनसे मानवता शर्मसार होती है. पर धर्म के पहरुये ही जब मानवता के भक्षक बन जाएँ तो क्या कहा जाय...???

आकांक्षा यादव

आरक्षण में आरक्षण बेमानी क्यों है


राजकिशोर

पिछ़ड़े वर्ग के तीनों नेता - मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और शरद यादव -- देश भर की निगाह में खलनायक बन गए हैं। उनके गुस्से के कारण महिला आरक्षण विधेयक 8 मार्च के ऐसिहासिक दिन लागू नहीं हो सका। हालांकि मैं विधायिका में किसी भी प्रकार के आरक्षण के सख्त खिलाफ हूं और मेरा मानना है कि विधायिका के बजाय नौकरियों में -- सरकारी और गैरसरकारी दोनों -- आरक्षण देने से आम महिला का बेहतर सशक्तीकरण होता, फिर भी यह स्वीकार करने में मुझे कोई कठिनाई नहीं है कि इस वक्त देश का मूड इस विधेयक के पक्ष में है। महिला आरक्षण का मामला इतने अधिक दिनों से लटकता चला आ रहा है और इस मुद्दे पर सभी दल जिस तरह कठघरे में आए हुए है, उसे देखते हुए कांग्रेस पार्टी की पहल प्रशंसनीय ही कही जाएगी।
याद कीजिए, जब विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की थीं, तब देश भर में कितना हंगामा मचा था। पिछड़े वर्गों को दिया जानेवाला आरक्षण एक सर्वथा नई बात थी, जिसे गले उतारने में देश को काफी वक्त लगा। अंतत: इस प्रस्ताव को सार्वजनिक स्वीकृति मिल गई और पिछड़ा आरक्षण को ले कर आज किसी को कोई मलाल नहीं है। उन दिनों भी कहीं-कहीं से हलकी-सी आवाज उठी थी कि विधायिका में भी पिछड़ी जातियों को आरक्षण दिया गया, लेकिन यह मांग खारिज कर दी गई।
दरअसल, धर्म, जाति, भाषा आदि के आधार पर विधायिका में आरक्षण एक खतरनाक चीज है, क्योंकि विधायिका का काम कानून बनाना है और विधायिका में बहुमत के आधार पर ही सरकार बनती है जिसकी प्रतिबद्धता किसी एक वर्ग के प्रति नहीं, बल्कि पूरे समाज के प्रति होती है। प्रशासन का चरित्र भी ऐसा ही होता है यानी वह भी पूरे समाज के प्रति जिम्मेदार होता है - किसी एक वर्ग के प्रति नहीं, लेकिन सरकारी नौकरियों में आरक्षण न तो दया के रूप में दिया गया था न पिछड़ी जातियों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए। इस प्रावधान की जरूरत इसलिए थी कि ऐतिहासिक कारणों से प्रशासन में इन जमातों की पर्याप्त हिस्सेदारी नहीं थी। इन्हीं कारणों से अनुसूचित जातियों और जनजातियों को भी सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया गया था।
विधायिका का मामला भिन्न इसलिए है कि इसके प्रतिनिधि मतदाताओं द्वारा चुन कर आते हैं। मतदाताओं को बाध्य नहीं किया जा सकता कि वे किसी खास धर्म या जाति के उम्मीदवारों को ही चुनें। नौकरी की तुलना में राजनीति एक बहुत व्यापक चीज है। लोकतांत्रिक समाज में वह एक तरह से हमारी सामाजिक और आर्थिक नियति को तय करती है। इसलिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व को किसी खास वर्ग या समुदाय तक सीमित नहीं किया जा सकता।
कायदे से अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए भी विधायिका में सीटें आरक्षित नहीं की जानी चाहिए। लेकिन इसके पीछे एक ऐतिहासिक समझौता है जिसे हम पूना पैक्ट के नाम से जानते हैं। यह पैक्ट इसलिए किया गया था कि दलितों के लिए अलग मतदाता मंडल का गठन होने से रोका जा सके। गांधी जी की नजर में इस तरह की पृथकतावादी व्यवस्था बहुत खतरनाक होती, क्योंकि इससे हिन्दू समाज सदा के लिए सवर्ण और अवर्ण में बंट जाता। आंबेडकर भी ऐसा नहीं चाहते होंगे, तभी उन्होंने पूना पैक्ट को स्वीकार किया था। दुख की और शर्म की बात है कि गांधी और आंबेडकर, दोनों की अपार कोशिशों के बाद भी सवर्ण और अवर्ण के बीच की विभेदक रेखा मिट नहीं पाई है। दूसरी ओर, पूना पैक्ट को इस आधार पर भी सफल नहीं कहा जा सकता कि दलितों और जनजातियों को दिए गए आरक्षण से इन समूहों को कोई वास्तविक लाभ नहीं पहुंचा है। इन समुदायों के प्रतिनिधि संसद और विधान सभाओं में अपने शोषित और उत्पीड़ित सदस्यों की आवाज नहीं उठाते न उनकी सुरक्षा के लिए कोई प्रयत्न करते हैं। उनकी ज्यादा रुचि माल जमा करने में होती है। वे सत्ता पक्ष के साथ तरह-तरह के समझौते करते हैं, ताकि अपने को अमीर और सत्तावान बना सकें।
जहां तक महिला आरक्षण का सवाल है, महिलाएं एक अलग कोटिगरी हैं। वे न तो जाति और भाषा से बंधी हैं न वर्ग से। इसके बावजूद विधायिका में उन्हें भी आरक्षण नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि जेंडर के आधार पर संसद और विधान सभाओं को बांट देना एक अलोकतांत्रिक हरकत है। हमारा महिला आरक्षण विधेयक इस मामले में अनोखा है कि आज तक किसी भी देश की संसद में इस तरह का विधेयक पेश नहीं हुआ है। जब विधायिका में जाति के आधार पर पुरुषों का विभाजन नहीं किया गया है, तो स्त्रियों के साथ यह नाइंसाफी क्यों? यहां आ कर समानता का तर्क क्यों हवा हो जाता है? बेशक जाति भी स्त्रियों की सामाजिक स्थिति को निर्धारित करती है, पर इसका इलाज यह नहीं है कि संसद को विभिन्न जातियों के प्रतिनिधियों से भर दिया जाए। जिस दिन ऐसा होगा, देश की राजनीति का सर्वनाश हो जाएगा।
यह प्रश्न और भी बेहूदा है कि महिला कोटे में पिछड़ी जातियों के लिए अलग कोटा नहीं तय किया गया, तो सिर्फ संपन्न और उच्च जातियों की स्त्रियां ही संसद में आ सकेंगी। हमारा अनुभव इसके विपरीत है। जब कोई दल अलोकप्रिय हो जाता है, तब उसके पुरुष उम्मीदवार ही नहीं, स्त्री उम्मीदवार भी हारते हैं। एक समय तो महाबली इंदिरा गांधी भी चुनाव हार गई थीं। पिछड़ी जातियों के नेताओं का पाप यह है कि उन्होंने अपने समुदाय की महिलाओं को बड़ी संख्या में सार्वजनिक जीवन में नहीं उतारा है। स्त्री स्वतंत्रता के मामले में ये समुदाय किसी भी अन्य समुदाय की तुलना में ज्यादा संकीर्ण और दकियानूस हैं। दक्षिण भारत में यह दकियानूसी कम है, इसलिए वहां महिलाएं सार्वजनिक जीवन में ज्यादा हैं। इसलिए अपने समुदाय की स्त्रियों के लिए अलग से कोटा मांगने के बजाय पिछ़ड़ावादी नेताओं का कर्तव्य यह है कि वे अपने समुदाय की स्त्रियों को आजाद करें और जन सेवा करने की प्रेरणा दें।

Tuesday, March 9, 2010

८ मार्च - महिला दिवस -- उत्तराखंड

महिला दिवस की बधाई .......
see the hurdles , women's bill is facing...that's the real situation...

Monday, March 8, 2010

नारी होने पर गर्व !!

महिला-दिवस सुनकर बड़ा अजीब लगता है. क्या हर दिन सिर्फ पुरुषों का है, महिलाओं का नहीं ? पर हर दिन कुछ कहता है, सो इस महिला दिवस के मानाने की भी अपनी कहानी है. कभी महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई से आरंभ हुआ यह दिवस बहुत दूर तक चला आया है, पर इक सवाल सदैव उठता है कि क्या महिलाएं आज हर क्षेत्र में बखूबी निर्णय ले रही हैं. मात्र कुर्सियों पर नारी को बिठाने से काम नहीं चलने वाला, उन्हें शक्ति व अधिकार चाहिए ताकि वे स्व-विवेक से निर्णय ले सकें. आज नारी राजनीति, प्रशासन, समाज, संगीत, खेल-कूद, फिल्म, साहित्य, शिक्षा, विज्ञान, अन्तरिक्ष सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठ प्रदर्शन कर रही है, यहाँ तक कि आज महिला आर्मी, एयर फोर्स, पुलिस, आईटी, इंजीनियरिंग, चिकित्सा जैसे क्षेत्र में नित नई नजीर स्थापित कर रही हैं। यही नहीं शमशान में जाकर आग देने से लेकर पुरोहिती जैसे क्षेत्रों में भी महिलाएं आगे आ रही हैं. रुढियों को धता बताकर महिलाएं हर क्षेत्र में परचम फैलाना चाहती हैं.

पर इन सबके बावजूद आज भी समाज में बेटी के पैदा होने पर नाक-भौंह सिकोड़ी जाती है, कुछ ही माता-पिता अब बेटे-बेटियों में कोई फर्क नहीं समझते हैं...आखिर क्यों ? क्या सिर्फ उसे यह अहसास करने के लिए कि वह नारी है. वही नारी जिसे अबला से लेकर ताड़ना का अधिकारी तक बताया गया है. सीता के सतीत्व को चुनौती दी गई, द्रौपदी की इज्जत को सरेआम तार-तार किया गया तो आधुनिक समाज में ऐसी घटनाएँ रोज घटित होती हैं. तो क्या बेटी के रूप में जन्म लेना ही अपराध है. मुझे लगता है कि जब तक समाज इस दोगले चरित्र से ऊपर नहीं उठेगा, तब तक नारी की स्वतंत्रता अधूरी है. सही मायने में महिला दिवस की सार्थकता तभी पूरी होगी जब महिलाओं को शारीरिक, मानसिक, वैचारिक रूप से संपूर्ण आज़ादी मिलेगी, जहाँ उन्हें कोई प्रताड़ित नहीं करेगा, जहाँ कन्या भ्रूण हत्या नहीं की जाएगी, जहाँ बलात्कार नहीं किया जाएगा, जहाँ दहेज के लोभ में नारी को सरेआम जिन्दा नहीं जलाया जाएगा, जहाँ उसे बेचा नहीं जाएगा। समाज के हर महत्वपूर्ण फैसलों में उनके नज़रिए को समझा जाएगा और क्रियान्वित भी किया जायेगा. समय गवाह है कि एक महिला के लोकसभा स्पीकर बनाने पर ही लोकसभा भवन में महिलाओं के लिए पृथक प्रसाधन कक्ष बन पाया. इससे बड़ा उदारहण क्या हो सकता है. जरुरत समाज में वह जज्बा पैदा करने का है जहाँ सिर उठा कर हर महिला अपने महिला होने पर गर्व करे, न कि पश्चाताप कि काश मैं लड़का के रूप में पैदा होती !!
!!! अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस के 100 वर्ष पूरे होने पर शुभकामनायें !!!

आकांक्षा यादव

कुछ निवेदन

राजकिशोर

आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है। भारत के लिए यह दिन विशेष महत्व का होनेवाला है। मीडिया को उम्मीद है कि सोमवार को महिला आरक्षण विधेयक पास हो कर रहेगा। सरकार अगर सचमुच चाहती है, तो यह असंभव नहीं है। संख्या का गणित उसके पक्ष में है। लेकिन आरक्षण के विरोधी इस विधेयक को रोकने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। हंगामा तो मामूली बात है।

बहरहाल, महिला आरक्षण विधेयक पारित हो जाता है तो और नहीं पारित हो पाता है, तब भी स्त्रीवादियों से मुझे कुछ निवेदन करना है। जो महिला आंदोलन का विरोध करता है, उसे अच्छा आदमी मान पाना मुश्किल है। ऐसा आदमी औरतों की गुलामी को अनंत काल तक बनाए रखना चाहता है। लेकिन महिला आंदोलन के समर्थकों ने, एक बहुत जरूरी काम की उपेक्षा की है। वे हमेशा यही बताते रहते हैं कि अच्छे पुरुष को कैसा होना चाहिए और कैसा नहीं होना चाहिए। यह एक जरूरी और उचित मांग है। हर आंदोलनकारी जिनका विरोध करता है, उनकी गलतियों और कमियों को रेखांकित करता है और उनसे अपने चरित्र को बदलने की मांग करता है। इसलिए महिलाए अगर पुरुषों के लिए आचार संहिता तैयार कर रही है, तो यह उनका हक है। हर अच्छा पुरुष इस आचार संहिता पर गौर करेगा और उसकी रोशनी में अपने को सुधारने की कोशिश करेगा। लेकिन कोई भी अच्छा आंदोलन सिक्के के सिर्फ एक पहलू तक अपने को सीमित नहीं रखता। वह आंदोलनकारियों के लिए भी एक आचार संहिता बनाता है और उसे सख्ती से लागू करने की कोशिश करता है। दुनिया को आदर्श पुरुष चाहिए, तो उसे आदर्श नारियां भी चाहिए। खेद है कि श्रमिक आंदोलन से भी ज्यादा आयामों के धनी महिला आंदोलन ने इस तरफ ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी है। मेरे खयाल से, यह बहुत बड़ी कमी या खामी है और इस कारण भी महिला आंदोलन के लक्ष्यों के पूरे होने में देर लग रही है।

चीन के एक बड़े कम्युनिस्ट ने एक किताब लिखी थी - अच्छा कम्युनिस्ट कैसे बनें। चीन की माओवादी क्रांति के दिनों में और बाद के अनेक वर्षों में भी यह किताब कम्युनिस्ट दायरे में बहुत रुचि के साथ पढ़ी जाती थी। इसे पढ़ने के बाद शायद अनेक कम्युनिस्टों ने अपने को बदला भी होगा। वे कम्युनिज्म के उठान के दिन थे। तब इसमें कुछ रचनात्मक शक्ति थी। लेकिन आजकल यह पुस्तक खोजे से भी नहीं मिलती। इसलिए नहीं मिलती, क्योंकि कम्युनिस्टों को इसकी जरूरत नहीं रह गई है। निर्माण काल में किताबें उपयोगी होती है। पतन के दौर में वे दुश्मन जान पड़ती हैं। ठीक ही कहा गया है, वो मुझे दुश्मन लगे है जो मुझे समझाए है।

महात्मा गांधी ने भारत में जब असहयोग आंदोलन शुरू किया, तब उन्होंने असहयोगियों के लिए एक आचरण संहिता तैयार की। यह संहिता बताती थी कि असहयोगी क्या करेगा और क्या नहीं करेगा। बाद में कांग्रेस पार्टी की सदस्यता के लिए भी कुछ नियम बनाए गए। इन नियमों में एक यह था कि कांग्रेस का सदस्य छुआछूत का बरताव नहीं करेगा। एक और नियम यह था कि वह आदतन खादी पहनेगा। सत्याग्रहियों के लिए तो गांधी जी ने बहुत सख्त नियम बनाए थे। इनके अलावा, उनकी अपनी कुछ अपेक्षाएं भी रहती थीं। इसी सबके परिणामस्वरूप कांग्रेस के उस दौर के सदस्यों का चरित्र निर्माण हुआ। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान ही इतनी बड़ी संख्या में सभी वर्गों की स्त्रियां सार्वजनिक जीवन में उतरीं। उनमें से सभी का आम औरतों से अलग व्यक्तित्व बना।

समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया औरतों में कुछ विशेष गुण देखना चाहते थे। दब्बू और हुक्म का गुलाम औरतें उन्हें पसंद नहीं थीं । वे स्त्री को स्वाभिमानी, विवेकशील और साहसी देखना चाहते थे। इसी इरादे से उन्होंने यह बहस छेड़ी थी - आदर्श स्त्री कौन - सावित्री या द्रौपदी ? हिन्दुस्तान के स्त्री समाज ने अभी तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया है। महिला आंदोलन के पास इसका जवाब होना चाहिए।

बेशक, आंदोलनकारियों में दूसरों को दोषी ठहराने की प्रवृत्ति हावी होती है। वे सारी कमियां उन्हीं में खोजना पसंद करते हैं जिवके खिलाफ उनका आंदोलन होता है। बेशक, अगर पुरुष स्त्रियों को अपने आधिपत्य से मुक्त कर दें, तब स्त्रियों को यह सोचने को मजबूर होना पड़ेगा कि वे अपनी जिंदगी का क्या करें। मेरा निवेदन यह है कि यह खोज अभी से शुरू हो जाना चाहिए। नई स्त्री अपना व्यक्तित्व खोजने में लगेगी, तभी वह पुरुष के चरित्र में भी परिवर्तन कर पाएगी। अगर वह अपने को अपने आदर्शों के अनुसार संस्कारित नहीं करती, तो उसका व्यक्तित्व मिलिटेंट का बना रहेगा और पुरुष उसका प्रतिवादी बने रहने में सुख का अनुभव करेगा। स्त्री के संघर्ष में पुरुष तभी सहयोगी भूमिका निभा सकता है, जब वह स्त्री को रचनात्मक रोल में देखेगा। रचना भी संधर्ष का ही एक चेहरा है।

मैं यह तर्क स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हूं कि जब तक व्यवस्था नहीं बदलती, तब तक व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता। महाभारत काल की व्यवस्था में ही द्रौपदी पुरुषों की क्रूरता, कायरता और मूढ़ता की आलोचना किया करती थी। रजिया बेगम, मीरां, लक्ष्मीबाई, झलकारी देवी आदि जिन तेजस्वनी महिलाओं की चर्चा की जाती है, वे सभी उस समय की व्यवस्था में नहीं, उस व्यवस्था के बावजूद ऐसी बनी थीं। इसलिए स्त्री आंदोलन का विस्तार करना है और इसमें क्रांतिकारी कंटेन्ट भरना है, तो स्त्रियों को भी गहरे आत्मनिरीक्षण और स्वनिर्माण से गुजरना होगा। उन्हें अपने फैसले खुद लेना सीखना होगा और इसके लिए आवश्यक योग्यता तथा क्षमता अर्जित करनी होगी। उन्हें यह भी साबित करना होगा कि नई स्त्री सिर्फ अपने लिए ही नहीं, पूरे समुदाय के लिए बेहतर है। यह वर्तमान व्यवस्था में भी काफी दूर तक संभव है और इससे भी इस व्यवस्था को बदलने में सहायता मिलेगी। एक हाथ की ताली कितने दिनों तक बजती रह सकती है?

स्त्रियां,जो मर्दवादी विमर्श से बाहर है


वर्चुअल स्पेस में मर्द लेखकों की एक ऐसी जमात है जो कि देश और दुनिया के तमाम मसलों पर लिखने का अधिकार रखते हैं। जाहिर है इन तमाम मसलों में स्त्रियां भी शामिल हैं। बल्कि स्त्रियों पर लिखते हुए अधिकार इतना अधिक है कि उनका लेखन विमर्श से कहीं ज्यादा गार्जियनशिप या कहें तो डिक्टेटरशिप का हिस्सा बनता चला जाता है। अब लेखन का ये मिजाज इस मुद्दे को लेकर औरों से अधिक ठोस और ज्यादा जानकारी को लेकर होता है या फिर मर्द होने की वजह से इसका आकलन अभी उनके खित्ते में ही छोड़ दिया जाए तो बेहतर होगा। फिलहाल इस मुद्दे पर बात करें कि वो जब स्त्री के सवालों पर लिखता है तो वो अपने लेखन से क्या करना चाहता है? इस क्रम में विश्लेषण के बिन्दुओं की एक लंबी फेहरिस्त बन सकती है। पूरा का पूरा एक शोधपरक लेख लिखा जा सकता है कि -आखिर क्यों मर्द लेखक करते हैं वर्चुअल स्पेस में स्त्री विमर्श? लेकिन हम यहां ऐसा कुछ भी नहीं करने जा रहे हैं। हम बस ये समझने की कोशिश में हैं कि वो क्यों अपने रोजमर्रा की जिंदगी के कई छोटे-बड़े अनुभूत सत्य को नजरअंदाज करके स्त्री सवालों को प्रमुखता से पकड़ता है? दूसरा कि उसका ये स्त्री-विमर्श किन स्त्रियों को संबोधित है? मेरे दिमाग में ये दोनों सवाल उनकी ही हरकतों को झेलते हुए,पोस्टों और कमेंट्स को पढ़ते हुए आए हैं।

वर्चुअल स्पेस में लिखनेवाले मर्द लेखकों(मर्द शब्द इसलिए कि वो लेखन के जरिए संवाद से कहीं ज्यादा लीड करने में भरोसा रखता है)की इस जमात में दर्जनों ऐसे लेखक हैं जिनकी पत्नियों को,उनकी बेटियों को,बहनों को ये नहीं पता कि उसका मर्द संबंधी उसके बारे में क्या लिखता है? लेखन की दुनिया में दिन-रात उसकी बेहतरगी की चिंता में डूबा रहता है। वो चाहता है कि हम मर्दों की तरह ही स्त्रियों को भी खुलकर जीने और अपनी बात रखने का अधिकार मिले। लेकिन वो आए दिन इन मर्द लेखकों से जरुर पछाड़ खाकर गिरती है,उसके रवैये से लगभग रोज चोटिल होती है और शिकस्त होकर अपने स्त्री होने और उसके मर्द होने के बीच के फासले को समझना चाहती है। लगातार बेटी जनने पर उसकी पत्नी को रह-रहकर बेहोशी छा जाती है। होश आने पर बस एक ही चिंता में दहाड़े मारकर रोती है,फिर गुमसुम हो जाती है कि उसकी सास उसे जीने नहीं देगी। मर्द लेखक अपनी पत्नी के भीतर इतना भी मनोबल पैदा नहीं कर पाता कि तुम्हें किसी से डरने की जरुरत नहीं है। वो मर्द एक अच्छा भाई साबित करने के लिए अपनी बहन के लिए ज्यादा से ज्यादा दहेज देकर शादी रचा सकता है लेकिन अगर उस शादी के बाद ससुराल में प्रताड़ना झेलनी पड़ जाए तो एडजस्ट करने की नसीहत के आगे वो और कुछ नहीं दे सकता। आजाद ख्याल का पैरोकार ये मर्द लेखक पैरों पर चलने के साथ ही बेटी को स्लीवलेस फ्रॉक या टॉप पहनाता है लेकिन चौदह की उम्र होते ही हमारे घर में लड़कियों को जींस अलाउ(allow)नहीं है जैसे मुहावरे में जकड़कर रह जाता है। वर्चुअल स्पेस में आते ही ये मर्द लेखर साड़ी,बिन्दी चूड़ी पहनने,न पहनने के जरिए स्त्री-विमर्श को समझने में जुट जाता है। इस मर्द लेखक के पाले में जीनेवाली स्त्रियों को ये बिल्कुल भी पता नहीं होता कि उसका ये मर्द संबंधी आए दिन स्त्रियों के लिए जो पाठ निर्मित कर रहा है वो उसके जीवन का अनुभूत सत्य है या फिर रोजमर्रा की जिंदगी के विकृत अनुभवों से बटोर-बटोरकर बनाए गए नियम जिसे कि वो वर्चुअल स्पेस पर आकर कठोरता से लागू करना चाहता है। अगर ऐसा नहीं होता तो मुझे नहीं लगता कि स्त्री-विमर्श का उनका दायरा साड़ी,बिन्दी और चूड़ी तक आकर सिमट जाता।

आजाद मानिसकता के दावे करने और तंग मानसिकता के साथ जीवन जीने के बीच से जो पाठ निर्मित होते हैं वो किसी भी विमर्श के लिए संकीर्णतावादी सोच से ज्यादा खतरनाक होते हैं। जो आजाद ख्याल जीवन में नहीं है वो पाठ के स्तर पर लाने से लिजलिजा हो जाता है और ये पाठ न तो साथ जीनेवाले संबंधियों के काम का होता है और न ही विमर्श को आगे ले जाने के काम आता है। संबंधियों पर अगर इस पाठ को लादे जाएं तो आजादी का कुछ हिस्सा उनके हाथ लग जाएगा जो कि मर्द लेककों के हित में नहीं है और विमर्श में इसे शामिल कर लिया जाए तो एक अध्याय ये भी निर्मित होता चला जाएगा कि स्त्री-विमर्श के भीतर स्त्री-बेडियों को कैसे बनाया जा सकता है? दूसरी स्थिति ये भी है कि एक मर्द लेखक वर्चुअल स्पेस में स्त्री को लेकर,उसके चरित्र और पोशाक को लेकर जो कुछ भी लिख रहा है वो समाज की उन स्त्रियों के लिए आंय-वांय है,कूड़ा-कचरा है। उनके इस लिखे से उन पर रत्तीभर भी असर होनेवाला नहीं है क्योंकि ये स्त्रियां स्त्री-विमर्श का पाठ निर्माण लिखकर नहीं बल्कि असल जिंदगी में जीकर निर्मित कर रही होती है। तो फिर ऐसे पाठ का काम क्या है? ले देकर इस पाठ को उन स्त्रियों पर जबरिया लादने की कोशिश की जाती है जो कि अपने अनुभवों से स्त्री-विमर्श का पाठ रचने में लगी है। ये स्त्रियां वर्चुअल स्पेस को संभावनाओं की वो दुनिया मानती हैं जहां से कि अपने हिस्से के लिए बेहतरगी के कुछ सूत्र तलाश कर सके। ऐसे में उस पुराने लिटररी बहस में न जाकर भी कि अनुभूत सत्य ही विमर्श को सही दिशा में ले जा सकता है,इतना तो समझा ही जा सकता है कि वर्चुअल स्पेस में इस स्त्री के लिखने में और उस मर्द लेखक के लिखने में फर्क है। ये फर्क उसकी नियत और सरोकार को लेकर है।



एक मर्द लेखकर जब अपनी पोस्ट के साथ स्त्री या उसके आसपास के शब्दों को जोड़ता है और तीन घंटे बाद ही उसे हिट्स मिलने शुरु होते हैं तो दोपहर होत-होते हुलसकर लिंक भेजता है। बर्दाश्त नहीं होता तो फोन करके बताता है कि आज उसकी पोस्ट सबसे ज्यादा पढ़ी जा रही है। इस मनोदशा में वो आजाद और तंग मानसिकता से अलग एक ऐशी मानसिकता में जीना शुरु करता है जो कि स्त्री क्या किसी भी विमर्श का हिस्सा नहीं हो सकता। वर्चुअल स्पेस में स्त्री उसके लिए एक फार्मूला भर है। ये फार्मूला हर गिरते हुए ब्लॉग,लगातार हताश होती पोस्टों को जिलाए रखने के काम आती है। रीयल वर्ल्ड में स्त्री शब्द चाहे उन्हें भले ही परेशान करता हो लेकिन वर्चुअल स्पेस में ये राहत का काम करता है। जाहिर है हम ऐसे तंग उद्देश्यों के लिए स्त्रियों के सवालों पर बात करनेवाले से और कुछ ज्यादा की उम्मीद नहीं कर सकते।

दूसरा कि हर मर्द के लिए फैशन का मतलब एक नहीं हो सकता। जरुरी नहीं कि सबों के चेहरे की चमक ऑफ्टर शेव और इमामी हैंडसम लगाकर ही बनी रहती हो। एक जमात ऐसा भी है जो कि बौद्धिकता के टूल्स जिसमें कि तमाम तरह के विमर्श शामिल है उन्हें अलग और चमकीला दिखने का एहसास कराता है। उनके लिए यही विमर्श कॉस्ट्यूम्स का काम करते हैं। स्त्रियों पर लिखते हुए ब्लॉगवाणी की टॉप पोस्ट में आनेवाले मर्द लेखक अपने चेहरे की चमक इसके जरिए ही बरकरार रखने की कोशिश में हैं।..तीसरी स्थिति उन मर्द लेखकों की है जिनमें कि कमेंट्स करनेवाले लोग भी शामिल हैं। वो स्त्री शब्द के प्रयोग से कुछ साझा करने या फिर डोमेस्टिक लेबल से लेकर पब्लिक डोमेन तक की समस्याओं पर बात करना नहीं चाहते,वो इसमें सब्सटीट्यूट पोर्नोग्राफी का सुख बटोरना चाहते हैं। इसे समझने के लिए बहुत अधिक मशक्कत करने की जरुरत नहीं। स्त्री के मसले पर लिखी गयी किसी भी पोस्ट में मर्द लेखकों के कमेंट पर गौर करें तो आपको उसकी इस मानसिकता का अंदाजा लग जाएगा। ये तब भी होगा जब वो किसी स्त्री-पोस्ट की तारीफ में बात कर रहे होंगे और तब भी हो रहा होगा जब वो लानतें भेज रहे होंगे।

अब जिस वर्चुअल स्पेस में एक स्त्री अपने अनुभवो को,समस्याओं को,तकलीफों और गैरबराबरी को सामने ला रही है,उसी स्पेस में ये मर्दवादी लेखक इन तमाम तरह की कुंठाओं और सहज सुख की तलाश कर रहे हैं। इस पर बार-बार विमर्श का लेबल चस्पाए जा रहे हैं। ऐसे में लेखक का फर्क सीधे-सीधे स्त्री के स्त्री होने और मर्द के मर्द होने को लेकर नहीं है बल्कि फर्क इस बात को लेकर है कि दोनों का इस स्पेस का इस्तेमाल अलग-अलग मतलब के लिए है। इसलिए वर्चुअल स्पेस में स्त्री सवालों को लेकर जो कुछ भी लिखा जा रहा है उसमें सामंती सोच,कुंठा और फ्रस्ट्रेशन का एक बहुत बड़ा हिस्सा शामिल है। इसी समय प्रतिकार में ही सही एक स्त्री जब जबाब देती है तो उसे सरोगेट प्लेजर का एहसास होता है। ऐसे में ये लेखन जितना प्रत्युत्तर की मांग करता है उससे कहीं ज्यादा इग्नोरेंस की मांग करता है। हमें चस्पाए गए लेबलों की जांच करनी होगी और इन मर्दवादी लेखकों के तात्कालिक सुख की मानसिकता को हतोत्साहित करना होगा।

नोट-(जिन मर्द लेखकों की चर्चा हमने उपर की,ये बहुत संभव है कि उनमें मैं खुद भी शामिल हूं।)

Saturday, March 6, 2010

ये हाईप्रोफाइल युवतियां ??

कई बार कुछ ख़बरें मन को झकझोरती हैं, ग्लानि पैदा करती हैं. ऐसी ही इक खबर पर नज़र गई कि सैक्स रैकेट के आरोप में ढोंगी बाबा राजीव रंजन द्विवेदी के साथ पकड़ी गई छह हाईप्रोफाइल युवतियों को लेकर दुनिया चाहे कुछ भी सोच रही हो, लेकिन उनको इसका मलाल नहीं है। किसी तरह पैसा कमाना और मौजमस्ती ही उनका लक्ष्य है। इसके लिए ही वह इस धंधे में हैं। मामले के जांच अधिकारी द्वारा युवतियों से पूछे गए सवालों के जवाब से इसकी पुष्टि हुई।

पुलिस के मुताबिक ये युवतियां काफी अच्छे घराने की हैं। इनमें एक पश्चिम बंगाल, एक पंजाब, एक अंबाला व तीन दिल्ली की है। चार लड़कियां एयर होस्टेस हैं। इनमें एक की तनख्वाह एक लाख 30 हजार रुपये मासिक है। वह दिल्ली के पॉश इलाके में 25 हजार रुपये किराये पर घर लेकर रहती है। सभी युवतियां फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती है। पुलिस को दिए बयान में युवतियों ने बताया है कि अपनी मर्जी से वह इस धंधे में आई है। पूछताछ में इन युवतियों में गजब का आत्मविश्वास दिखाई दिया। कुछ युवतियों ने बड़ी बेबाकी से बताया कि वह बचपन से शराब पीती है। पुलिस के सवालों से तंग आकर युवतियों ने कहा-'यह बताइए कि हमें जमानत कब मिलेगी।'

आकांक्षा यादव

Friday, March 5, 2010

अमेरिकी महिला सैनिक पुरुष साथियों की हवस तले

कई बार विकसित देश यह दर्शाते हैं कि उनके यहाँ महिलाओं की स्थिति बेहतर है, पर तथ्य तो कुछ और ही कहते हैं. अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट के मुताबिक अफगानिस्तान और इराक में तैनात अमेरिकी महिला सैनिक अपने पुरुष साथियों की हवस का शिकार हो रही हैं। वह शाम को सात बजे के बाद खेमे के बाहर न तो पानी लेने जाती हैं और न ही बाथरूम। उन्हें डर सताता है कि कहीं अपने ही किसी साथी के हाथों उनका दुष्कर्म न हो जाए। आंकड़ों पर गौर करें तो '2008 में इराक और अफगानिस्तान में तैनात तीन हजार महिला सैनिकों को यौन प्रताड़ना झेलनी पड़ी। 2007 की अपेक्षा यह आंकड़ा 9 फीसदी ज्यादा है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि महिला सैनिकों के दुष्कर्म के 80 से 90 फीसदी मामलों की कोई शिकायत दर्ज नहीं होती। ज्यादातर महिला सैनिक मात्र इसलिए खामोश रह जाती हैं क्योंकि उन्हें कोई भी कार्रवाई न होने का विश्वास होता है। शिकायत करने के चलते उन्हें खुद के प्रताड़ित होने और सच्चाई के अफवाह बन जाने का डर होता है। दुष्कर्म की शिकार महिला सैनिक इस बात से भी भयभीत रहती हैं कि उन्हें सेना से निकाल दिया जाएगा।...जब अपने को दुनिया का पहरुआ मानने वाला देश अमेरिका अपनी महिला-सैनिकों की रक्षा नहीं कर पा रहा है तो अन्य देशों से क्या आशा रखी जाय. क्या यही महिला-सशक्तिकरण है जिसकी बात बड़े-बड़े मंचों पर कही जाती है.

आकांक्षा यादव

Thursday, March 4, 2010

जगमगाती रहे ये 'किरण'

आज अपने एक परिचित से मिलने जाना हुआ, वहाँ दैनिक जागरण कानपुर का 03 मार्च का अंक देखा। एक समाचार देखकर उसे पढ़े बिना नहीं रहा गया। एक महिला की कर्मठता की कहानी है, स्वयं को बहुत अच्छा सा लगा। आपके सामने बिना किसी भूमिका के उस महिला किरन की कहानी रख रहे हैं।

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करीब दो सौ लोगों की आबादी वाले गाँव सुभौली में वर्तमान में प्रधान एक महिला है - किरन। इस महिला की उम्र इस समय 40 वर्ष है और शिक्षा में स्नातक है। परिवार में 80 वर्षीय माँ और 35 वर्ष की भाई है।

किरन की उम्र जब 18 वर्ष की थी तो उसके पिता उसके विवाह के लिए रिश्ता लेकर गये थे। वहाँ पर दहेज की रकम को लेकर कुछ अपमानजनक बातें किरन के पिता को सुननी पड़ीं। इस घटना के बाद किरन ने शादी न करने की कसम खा ली।

किरन के पिता फौज में सैनिक थे और उनके द्वारा दी गई सीख को किरन ने सदा गाँठ बाँध कर रखी। समाज के प्रति भला करने और समाज सेवा के प्रति ईमानदारी बरतने का किरन के पिता का संदेश सदैव किरन के लिए प्रेरणा बना रहा।

सुभौली गाँव किरन की ननिहाल है और उन्होंने यहाँ अपना काम करने का व्रत लिया। किरन ने गाँव के लोगों को नशे और जुए की लत से बाहर निकाला। वर्तमान में सरसौल ब्लाक का सुभौली गाँव नशा-जुआ मुक्त गाँव के रूप में जाना जाता है। अब उनका प्रयास है कि गाँव को मुकदमेबाजी से दूर किया जाये।

किरन के प्रयासों से गाँव में कच्ची शराब बनना और बिकना बन्द हो गई। चोरी छिपे गाँजा, चरस बेचने वाले भी अब इस काम को छोड़ चुके हैं। वर्तमान में किरन मुकदमेंबाजी को कम करने की दुष्टि से गाँव में पंचायत लगाकर लोगों के अपासी मतभेद को दूर करतीं हैं।

उनका कहना है कि आगामी वर्षों में वे अपने गाँव तथा आसपास के गाँवों में नशा-जुआ-शराब मुक्ति का अभियान और जोरों से चलायेंगी।

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दैनिक जागरण, कानपुर दिनांक 03 मार्च 2010 के बुन्देलखण्ड संस्करण में प्रकाशित खबर ‘‘काश! ये ‘किरन’ गाँव-गाँव चमके’’ के आधार पर

Monday, March 1, 2010

लिपस्टिक की औकात

राजकिशोर

बीसवीं शताब्दी की एक बड़ी खूबी यह थी कि उसने सबको उसकी औकात बता दी। और तो और, महाबली पूंजीवाद को भी नहीं छोड़ा। देखते-देखते दुनिया का एक हिस्सा लाल हो उठा। इस हिस्से में पूंजी थी, पर पूंजीपति नहीं था। तानाशाही को भी उसकी औकात बताई गई। हिटलर की मूंछ उसकी लाश के साथ जमीन पर आ गिरी। भारत में अंग्रेजों को उनकी औकात बताई गई, हालांकि इसमें सौ से ज्यादा साल लग गए। प्रेमचंद जब 'गोदान' लिख रहे थे, तब जमींदार अमर जान पड़ते थे। आजाद भारत ने जमींदारों की औकात भी खोल कर रख दी। इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा कर भारत के लोकतंत्र को उसकी औकात बताई, तो इमरजेंसी हटने के बाद होनेवाले आम चुनाव में जनता ने इंदिरा गांधी को उनकी औकात बता दी।

बीसवीं शताब्दी औरतों के लिए भी बहुत मेहरबान रही। उसने औरतों को बहुत मौका दिया कि वे मर्दों को उनकी औकात बता दें। इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी तादाद में औरतों ने तलाक लिया, अपना अलग घर बसाया और स्वतंत्र हो कर रहने लगीं। अपनी मर्जी के मुताबिक पहनने-ओढ़ने लगीं। अपने मिजाज के अनुसार जीने लगीं। अपने समय से सोने और उठने लगीं। मर्द बोहेमियन बने, तो औरतों ने भी यह आजाद जिंदगी अपना ली। कुछ औरतों ने मर्दों की इच्छा और जरूरत के मुताबिक सजने-संवरने से भी इनकार कर दिया। यहां तक कि ब्रा को भी उसकी औकात बताने की कोशिश की गई।

इक्कीसवीं सदी की जीवन शैली पर इन सब की छाया दिखाई पड़ती है। अगर कनॉट प्लेस में कोई जवान औरत आधे-अधूरे कपड़े पहन कर घूमती नजर आए, तो उसे न घूर-घूर कर देखने की जरूरत है न कोसने की। उस औरत के पास इतना वक्त नहीं है कि वह दिल्ली के मर्दों को उनकी औकात बताने की कोशिश करे। दरअसल, ऐसा करके वह नए समाज में अपनी औकात घोषित कर रही है -- जान-बूझ कर नहीं, बल्कि अवचेतन स्तर पर। दूसरे भी हैं और उनके सोच के अपने दायरे हैं, यह खयाल तक उसके दिमाग में नहीं था जब वह बाहर निकलने के लिए अपने फ्लैट के दरवाजे पर ताला लगा रही थी। वह पूरी तरह सहज है। उसकी वजह से कोई पुरुष असहज हो उठता है, तो यह उसकी समस्या है।

करनेवाले हजारों होते हैं, तो लिख कर बतानेवाले सैकड़े में पांच भी नहीं। इन पांच में दो-तीन तो ऐसे होते हैं जिन्हें मिर्ची लगाए बिना न तो जबान खोलना आता है न कलम उठाना। जब औरतें ऐसा करती हैं, तो मर्दों को नारीवाद को बदनाम करने का मौका मिल जाता है। लेकिन एक-दो ऐसी भी होती हैं जो अपनी बात बहुत सहज भाव से कहती हैं। उनका उद्देश्य किसी को चुनौती देना नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र चेतना को अपनी जीवन शैली के माध्यम से अभिव्यक्त करना है। वे किसी को चोट पहुंचाना नहीं चाहतीं, पर इतनी ही उत्कटता से यह भी चाहती हैं कि उन्हें भी कोई चोट न पहुंचाए। मैं जानना चाहता हूं कि अगर इसे लोकतंत्र नहीं कहेंगे, तो और किसे कहेंगे?

इलाहाबाद में पैदा हुई और बरास्ता मुंबई आजकल भोपाल में डेरा डाले मनीषा पांडे ऐसी ही एक युवा नाजनीन हैं। वे दैनिक भास्कर में फीचर संपादक हैं। 'बेदखल की डायरी' नाम से ब्लॉग भी लिखती हैं। हाल ही में उन्होंने अपने ब्लॉग पर 'मेरी जिंदगी में किताबें' पर लिखते हुए बताया : 'ऐसा नहीं कि मैं लिपस्टिक नहीं लगाती या सजती नहीं। फुरसत में होती हूं तो मेहनत से संवरती हूं। लेकिन अगर काफ्का को पढ़ने लगूं तो लिपस्टिक लगाने का होश नहीं रहता। हॉस्टल के दिनों में नाइट सूट पहने-पहने ही क्लास करने चली जाती थी और आज भी अगर मैं कोई इंटरेस्टिंग किताब पढ़ रही हूं तो ऑफिस के समय से पांच मिनट पहले किताब छोड़ जो भी मुड़ा-कुचड़ा सामने दिखे, पहन कर चली जाती हूं। होश नहीं रहता कि बालों में ठीक से कंघी है या नहीं। यूं नहीं कि मैं चाहती नहीं कि लिपस्टिक-काजल लगा लूं, पर इजाबेला एलेंदे के आगे लिपस्टिक जाए तेल लेने। लिपस्टिक बुरी नहीं है, लेकिन उसे उसकी औकात बताना जरूरी है। मैं सजूं, सुंदर भी दिखूं, पर इस सजावट के भूत को अपनी खोपड़ी पर सवार न होने दूं। सज ली तो वाह-वाह, नहीं सजी तो भी वाह-वाह।'

ऐसी भी औरतें होंगी जो ठीक से सजे-संवरे बिना परचून की दुकान तक भी नहीं जा सकतीं। कहने की जरूरत नहीं कि वे दूसरों के द्वारा देखे जाने से कम अपने को नहीं निहारती रहतीं। ऐसी औरतों ने अपनी एक आत्मछवि बना रखी होती है, जिससे विचलित होना उनके लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन जाता है। इन्होंने अपनी एक औकात बना रखी है और उसकी कीमत एक छदाम भी गिरे, यह उन्हें गवारा नहीं। दुर्भाग्य से, यह आत्मछवि देह के दायरे से बाहर जाने के लिए राजी नहीं होती। औरतें अकसर पुरुषों से पूछती रहती हैं, क्या हम मात्र देह हैं? लेकिन जरूरत से ज्यादा शृंगार करते हुए वे अपने आपसे यह सवाल पूछना भूल जाती हैं। बहुत पहले एक बार मेरे मन में आया था कि सुंदर होना या सुंदर दिखना स्त्री के लिए पासपोर्ट है, वीसा नहीं। वीसा तो वे बौद्धिक और चारित्रिक गुण हैं जो किसी को बेहतर इनसान बनाते हैं। ये गुण पुरुष में अपेक्षित हैं और स्त्री में भी। जेंडर से परे कोई तो कॉमन आदमीयत होगी, जहां स्त्री-पुरुष की नागरिकता एक जैसी होती है।

मनीषा का उपर्युक्त बयान स्त्री नागरिकता से उनका इस्तीफा नहीं है। न उसकी अवमानना है। यह बयान स्त्री नागरिकता और मानव नागरिकता दोनों को स्वीकार करना है और यह बताना है कि किसका स्थान ऊपर है। लिपस्टिक को उसकी औकात बता कर ही यह प्रमेय सिद्ध किया जा सकता था