Wednesday, May 26, 2010

विरोध के "हथियार' - ब्लॉग,फेसबुक ,इंटरनेट .......

मनीषा

शिकागो की जैन मैकराइट ने ईरानी धर्म गुरु का विरोध शुरू करके फेसबुक पर अपनी तरह का आंदोलन ही चला दिया है। इस धर्माधिकारी ने कहा था कि औरतों के उघड़े बदन को देखकर ईश्वर नाराज हो जाता है और इससे जलजले आते हैं। इसका विरोध छुटपुट रूप में कई जगह दिखा। विद्रोही किस्म की औरतों ने इसके विरोध में ब्लॉग भी लिखे पर जैन की मानसिक रूप से झकझोरने वाली राय को हफ्ते भर में दो लाख सपोर्टर मिले। यह देखकर सीएनएन, बीबीसी, फॉक्स सब हैरान हैं। "बूब क्वेक' के नाम से चलाये जा रहे इस विरोध पर दुनिया भर में गर्मागर्म कमेंट्स औरतों के उग्र तेवर से परंपरावादियों की बोलती बन्द करवाते जा रहे हैं। रियल बूब क्वेक (8 पोस्ट), गो टॉपलेस (24), द बूबक्वेक (71), डिबंकिंग इरानियन क्लरिक नॉनसेंस (71), द टØथ अबाउट ईरान (36), च्वाइस ऑफ सेंसरशिप (56), इस्लाम विल लूज(246), व्हाट एग्जेक्टली बूब क्वेक (50 पोस्ट) बताने के लिए काफी हैं कि पुरातन पंथ पर झाड़ू फेरने वाली फौज को रोकना आसान नहीं है। सामाजिक क्रांति का इससे बहतर कोई उदाहरण नहीं हो सकता। दुनिया भर की औरतें "बहनापे' को लेकर केवल संवेदनशील ही नहीं हो रही हैं, वे यह भी दिखा दे रही हैं कि औरतों के नाम पर होने वाले सम्मेलनों की बजाय मानसिक रूप से एक होने का असर ज्यादा होता है। "बूब क्वेक' को पसंद बताने वालों की संख्या एक लाख से ऊपर नजर आना कोई हंसी-खेल नहीं है। यह शुद्ध रूप से दकियानूस विचारधारा का विरोध है, जिसे कोई राजनैतिक रंग नहीं दिया जा सकता।

वह समय आ चुका है, जो खुलकर कह रहा है कि औरतों के कटावों और उभारों पर वारी जाने वाली दुनिया में पर्दे के लिए कोई जगह नहीं है। उत्तरी अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका की तमाम पारंपरिक संस्कृतियों में आज भी टॉपलेस को बुरा नहीं माना जाता। दुनिया भर की तमाम संस्कृतियों में पूजी जाने वाली देवियों को टॉपलेस ही माना गया है, उनको देखकर किसी ईश्वर प्रेमी के दिमाग की नसें नहीं फटीं। ना ही ऐसा कोई जलजला आया, जिसने दुनिया तबाह कर डाली हो। उन्नीसवीं सदी में यूरोप में संभ्रांत घरों की औरतें अपने सौंदर्य का प्रदर्शन करने के लिए घुटनों से नीचे और सीने को खुला ही रखती थी, क्योंकि तब यह स्टेटस सिंबल हुआ करता था। स्विम सूट और बिकनी पहनने वाली लड़कियों को तो जाने ही दीजिए पर अपने यहां पारंपरिक लिबासों, मसलन साड़ी, कुर्ता-सलवार और कमीज पहनने वाली अधेड़ और बूढ़ी औरतों को खुली छाती में देखा जाता है। जिसे झीनी ओढ़नी या पल्लू से ढांपा गया होता है। थुलथुल टाइप की कोई भी बूढ़ी अपने विशाल वक्ष को छिपाने के प्रयास करती नजर नहीं आती, इनके बड़े और ढीले गलों से लगभग आधे वक्ष बाहर ही दिखते हैं, जिनको देखकर घृणित मानसिकता वाला ही कोई घिनौनी बात सोच सकता है।

सीधे कहूं तो सेक्स अपील और नग्नता देखने वाले की नजरों से ज्यादा मानसिकता में होती है। खुले समाज में तो विरोध प्रदर्शन करने वाली औरतें टॉपलेस होकर अपनी बात कहने का अद्भुत तरीका अपनाती हैं। जिसमें "टॉप फ्रीडम' टाइप के सोशल मूवमेंट भी शामिल हैं। बीच, स्विमिंग पूल, पार्कों जैसी सार्वजनिक जगहों पर ये बराबरी का अधिकार मांगने के लिए ऊपर के कपड़े खोलकर विरोध जताती हैं। सितंबर 2007 में स्वीडन में "बारा ब्रास्ट' (बेयर ब्रोस्ट) के नाम पर आंदोलन किया था। इनको उन जगहों पर खुली छाती के साथ घूमने की इजाजत चाहिए थी, जहां मर्द ऐसे ही घूम सकते हैं। मध्य पूर्व में अकेले इज्राइल ही ऐसी जगह है, जहां औरतें चाहें तो उघड़ी छाती के साथ घूम सकती हैं। हालांकि तेल अवीव जैसे कुछ बीचों पर भी औरतें उन्मुक्त भ्रमण करना पसन्द करती हैं। कुछ विदुषियां इसको "टॉप फ्री' कहने पर अड़ी हुई हैं। जिस वक्त इस्लाम की सलामती मानने वाले धर्म गुरू औरतों के खुले कपड़ों को कोस रहे थे, ठीक उसी समय फ्रांस के राष्ट्रपति ने बुर्के पर रोक लगाकर क्रांतिकारी कदम उठा दिया। औरतों को परदों में लपेटे रहने वाली मानसिकता पर चोट करने का मुफीद समय है, जिस पर दुनिया की तमाम औरतें एकजुट हो चुकी हैं। (देखें ब्लॉग चर्चित स्टार सुचित्रा कृष्णमूर्ति का) यह सच है कि परदे को एकदम से खोलकर बाहर आने का साहस करना केवल सामाजिक ही नहीं मानसिक आंदोलन भी है। खुद को बेपरदा करने को तैयार होना भी मामूली काम नहीं है।

खासकर उन औरतों के लिए जिनकी कई पीढ़ियां पूरा मुंह ढक कर ही बाहर निकली हैं। क्रांति की घुट्टी जबरन नहीं पिलाई जा सकती, लेकिन यह सच है कि अब और कुचला नहीं जा सकता। औरतों को खुलेपन में मजा आ रहा है। वे दिमागी रूप से बराबरी करने को आमादा हैं। भीतर से उठने वाली अपनी आवाज को वे दबाने को तैयार नहीं हैं। उनके साहस को दबाने का प्रयास करने वाले परिवार अब जान भी नहीं सकते कि उनकी बिटिया का ब्लॉग क्या कह रहा है, या किस सोशल साइट पर उसका कितना समर्थन है। सड़कों पर आंदोलन या बहस-मुबाहिसों के नाम पर बाहर निकलने की पाबंदी से भले ही दकियानूस उसे रोक ले रहा था पर मानसिक गुलामी से तो उसने खुद को मुक्त ही कर लिया है।

साभार - राष्ट्रीय सहारा , आधी दुनिया ,26 मई 2010

सुचित्रा कृष्णमूर्ति की उल्लिखित पोस्ट 'बूब्स एण्ड बम्स 'का हिन्दी अनुवाद यहाँ पढें ।

Monday, May 17, 2010

एक काल्पनिक पत्र निरुपमा का, मां के नाम

युवा पत्रकार अनुपमा की पत्र शैली में यह प्रतिक्रिया निरुपमा हत्याकांड से जुड़े पहलुओं को समझने की कोशिश करती है। मोहल्ला लाइव पर प्रकाशित यह मां के नाम बेटी निरुपमा का काल्पनिक पत्र मन को छूने के साथ ही, वो सारे सवाल भी उठाता है, जो निरुपमा की स्थिति में पड़ने वाला या उसकी हालत को समझने वाला कोई भी समझदार व्यक्ति सहज ही करता।- अनुराधा

मेरी प्यारी मां,
तुझे बहुत-बहुत-बहुत सारा प्यार!
मां, परसों मदर्स डे था न। मुझे यहां स्वर्गलोक में जरा भी अच्छाप नहीं लग रहा था मां। सोचा क्योंो न पापा की चिट्ठी का जवाब लिखूं, जो दुनिया से विदा होने के पहले उन्होंने मुझे लिखी थी। लेकिन तू तो जानती है न मां कि मैं पापा से ज्या,दा बातें नहीं कह पाती। जो कहना होता है, तुमसे ही कहती हूं। तो मदर्स डे के दिन अपने अजन्मे बच्चेी के साथ दिन भर यूं ही तुझे याद करती रही और कुछ-कुछ लिखने की कोशिश करती रही।

मां, मुझे अच्छा नहीं लग रहा कि तू मेरे कारण परेशान है और फजीहत झेल रही है लेकिन मैं अब कुछ कर भी तो नहीं सकती न! बहुत दूर हूं मां। अगर करने की स्थिति में होती, तो तुम्हें कष्ट न होने देती। ऐसे भी तुझे पता है न कि मैं अपनी मां पर जान छिड़कती हूं, उसे कितना प्यार करती हूं, यह शब्दोंक में बयां नहीं कर सकती। तू ही बता न कि अगर मैं मां-पापा से प्या,र न करती और भरोसे का कत्ल करना चाहती तो क्यों सिर्फ यह पूछने के लिए दिल्ली से कोडरमा जाती कि क्या् मैं प्रिभयांशु से शादी करूं। मां उसके साथ पति-पत्नी के रिश्ते के बीच जितने भी तरह के भाव होते हैं, उन सभी भावों से तो गुजर ही चुकी थी न, सिर्फ एक सामाजिक मान्यता मिलनी बाकी थी।

मां, प्रिभयांशु के साथ मैं एक दोस्त या प्रेमिका की तरह नहीं बल्कि हमसफर की तरह ही रह रही थी। और फिर मुझे आपलोगों के भरोसे का कत्ल करना होता तो मैं अपनी अन्य सहेलियों की तरह कोर्ट में शादी करने के बाद बताती कि मैंने शादी कर ली। तब आपलोगों की मजबूरी होती मां कि अपनी सहमति की मुहर लगाएं। लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। मैं दो वर्षों के प्या र पर जीवन देने वाली मां और पालन करने वाले पिता के प्यार को हल्का नहीं करना चाहती थी। उसका मान कम नहीं करना चाहती थी।

यह भरोसा था मुझे मां कि जब आपलोगों ने झुमरी तिलैया से मुझे पढ़ाई करने के लिए दिल्ली् भेजा है, अखबारी दुनिया में नौकरी करने की छूट दी है तो फिर अपने तरीके से, अपनी पसंद के लड़के के साथ जिंदगी भी गुजारने देंगे। मैं कानूनन सब करने में सक्षम थी मां, लेकिन मैं कानून से ज्यादा आपलोगों की कद्र करती थी। आपलोगों पर भरोसा करती थी। इसलिए सहमति की मुहर लगाने कोडरमा पहुंची थी। और सुनो न मां, अब तो दो-दो जिंदगियां बरबाद हो ही चुकी हैं। मैं और मेरी संतान ने दुनिया से अलग कर लिया है खुद को। अब प्रियभांशु को भी बरबाद करने के लिए दांव-पेंच क्यों चले जा रहे हैं मां।

मां, क्या- मैं बेवकूफ थी, जो मुझे पता नहीं चल सका था कि मेरे गर्भ में उसका बच्चा पल रहा है? मैं अबॉर्शन करा सकती थी न, लेकिन मैंने नहीं करवाया। मैं और कई उपाय भी अपना सकती थी लेकिन नहीं अपनाये। इसलिए कि मैं प्रिभयांशु को मन से चाहती थी, तो तन देने में भी नहीं हिचकी। मां उसने कोई बलात्कार नहीं किया और न ही संबंध बनाने के बाद मुझे बंधक बनाकर रखा कि नहीं तुझे बच्चे को जन्म देना ही होगा। यह सब मेरी सहमति से ही हुआ होगा न मां, तो उसे क्यों फंसाने पर आमादा है पुलिस। जरा इस बात पर भी सोचना तुम।

हां मां, अब यहां स्वर्गलोक में आ चुकी हूं तो यहां कोई भागदौड़ नहीं। फुर्सत ही फुर्सत है। ऐसी फुर्सत कि वक्त काटे नहीं कट रहा। धरती की तरह जीवन की बहुरंगी झलक नहीं है यहां, जीवन एकाकी और एकरस है। लिखने की आदत भी पड़ गयी है, तो सोच रही हूं कि आज पापा के उस आखिरी खत का जवाब भी दे दूं। पापा से कहना वो मेरे जवाब को मेरी हिमाकत न समझें बल्‍कि एक विनम्र निवेदन समझेंगे।

उन्होंने अपने पत्र में सनातन धर्म का हवाला दिया है। अब यहां स्वर्गलोक में जब फुर्सत है तो सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों से भी परिचित हो रही हूं। सनातन धर्म के बारे में पापा शायद ज्यादा जानते होंगे मां लेकिन मैं अब सोच रही हूं कि मैंने भी तो उसी धर्म के अनुरूप ही काम किया न। मां, सनातन धर्म ने तो प्रेम पर कभी पाबंदी नहीं लगायी और न ही जातीय बंधन इसमें कभी हावी रहा। देखो ना मां, कृष्णन की ही बात कर करो। जगतपालक विष्णुग के अवतार कृष्ण । प्रेम की ऐसी प्रतिमूर्ति बने कि रुक्‍मिणी को भूल लोग उन्हें राधा के संग ही पूजने लगे। घर-घर में तो पूजते हैं लोग राधा-कृष्ण को। फिर राधा-कृष्ण की तरह रहने की छूट क्यों नहीं देते अपनी बेटियों को? क्याण राधा-कृष्ण सिर्फ पूजे जाने के लिए हैं? जीवन में उतारे जाने के लिए नहीं? और यदि जीवन में जो चीजें नहीं उतारी जा सकतीं, उसे वर्जना के दायरे में रखा जाना चाहिए न मां। मां अपने कोडरमा वाले घर में भी राधा-कृष्ण की तस्वीर है, हटा देना उसे सदा-सदा के लिए।

हां मां, पापा से कहना कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की तस्वीर भी फेंक दें, वह भी सनातन धर्म की कसौटी पर पूजे जाने लायक नहीं हैं। याद हैं मां, बचपन से एक भजन मैं सुना करती थी – बाग में जो गयी थी जनक नंदिनी, चारों अंखियां लड़ी की लड़ी रह गयीं। राम देखे सिया और सिया राम को। चारों अंखियां लड़ी की लड़ी रह गयीं… फिर भाव समझाते थे प्रवचनी बाबा कि शिवधनुष तोड़ने से पहले का नजारा है यह। सीता जी फूल तोड़ने बाग में गयी थीं, राम से नैन लड़े तो दोनों एक दूसरे पर मोहित हो गये। जानती हो मां, इस भजन को याद आने के बाद मैं यह सोच रही हूं कि राम ने भी तो अपने पिता की मर्जी से सीता से शादी की नहीं थी। वह तो गये थे अपने गुरू के साथ ताड़का से रक्षा के लिए लेकिन जब नजरें सीता से मिलीं तो चले गये शिवधनुष तोड़ने। क्या राम को यह नहीं पता था कि धनुष तोड़ने का मतलब होगा शादी कर लेना। फिर क्यों नहीं एक बार उन्होंने अपने पिता दशरथ से यह अनुमति ली। दशरथ को तो बाद में पता चला न मां कि जनक की बेटी से उनका बेटा शादी करने जा रहा है। तो मां, क्या गुरु के जानने से काम चल जाता है। मेरे भी गुरू तो जानते ही थे न। दिल्ली में रहनेवाले सभी गुरु और मित्र इस बात के जानते थे कि मैं प्रिभयांशु से शादी करने जा रही हूं। फिर भी मैंने गुरु के बजाय आपलोगों की सहमति लेना जरूरी समझा। राम की तस्वीमर हटा देना मां उन्होंने भी अपने पिता से पूछे बिना अपना ब्यागह तय कर लिया था।

मां, पिताजी को माता कुंती की भी याद दिलाना न। सनातनी कुंती की। उन्हें तो कोई कभी कुल्टा नहीं कहता। उन्हें आदर्श क्योंस माना जाता है जबकि उन्होंने छह पुत्रों का जन्म पांच अलग-अलग पुरुषों से संबंध बनाकर दिया। और मां कर्ण वह तो विवाह से पहले ही उनके गर्भ से आये थे न। यह तो सनातनी पौराणिक इतिहास ही कहता है न मां। फिर कुंती को कुल्टाप क्यों नहीं कहते पापा। पापा की कसौटी पर तो तो वह चरित्रहीन ही कही जानी चाहिए।

और द्रौपदी, मां। कोई द्रौपदी को दोष क्योंप नहीं देता। अच्छात जरा ये बताओ तो मां कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, कोई एक स्त्री पांच-पांच पुरुषों के साथ कैसे रह सकती है। लेकिन वो रहती थी और उसे कोई दोष नहीं देता। पापा को कहना कि वह द्रौपदी को भी अच्छीद औरतों की श्रेणी में न रखा करें। एक बात कहूं मां, पापा ने शुरुआती दिनों में ही एक गलती कर दी थी। मुझे धर्म प्रवचन की बातें बताकर। उन्होंने ही एक बार बताया था कि इस जगत में ब्रह्मा की पूजा क्यों नहीं होती क्योंकि ब्रह्मा ने अपनी ही मानस पुत्री से शादी कर ली थी। छि: कितने गंदे थे न ब्रह्मा।

और मां, रामचंद्र के वंशजों में तो किसी की तस्वीकर घर में नहीं रखना, क्योंककि तुम्हें भी तो पापा ने बताया ही होगा कि धर्म अध्यात्म और सनातनी इतिहास के क्रम में भागीरथी कैसे दुनिया में आये थे। दो महिलाओं के आपसी संबंध से उत्पन्न हुए थे न मां वो। यानी लेस्बियनिज्म की देन थे। बताओ तो सही, भला नैतिक रूप से कहां आये थे वो? मैं भी गंदी थी मां। अनैतिक। इन लोगों की तरह ही अनैतिक। मैं कुतर्क नहीं कर रही और न ही अपने पक्ष में कोई दलील ही दे रही हूं मां। यह सब मन में बातें आयीं तो सोचा तुमसे कह दूं। खैर, एक बात कहूं मां, मुझसे तू चाहे जिंदगी भर नफरत करना, घृणा करना, लेकिन अब छोड़ दो न प्रिभयांशु को। उसने कुछ नहीं किया जबरदस्ती मेरे साथ। मैं बच्चीफ नहीं थी मां और न ही अनपढ़-गंवार थी। सब मेरी रजामंदी से ही हुआ होगा न मां।

और हां मां, मुझे फिर से धरती पर भेजने की तैयारी चल रही है। मेरे बच्चे को भी फिर से दुनिया में भेजा जाएगा। मैंने तो सोच लिया है कि इस बार अपने नाम के आगे पीछे कोई टाइटल नहीं लगाऊंगी। सीधे-सीधे नाम लिखूंगी। कोई पाठक, तिवारी, यादव, सिंह नहीं। सीधे-सीधे सिर्फ नाम। जैसे कि दशरथ, राम, कृष्ण… इन सबकी तरह। इनके नामों के साथ कहां लिखा हुआ मिलता है कि दशरथ सिंह, राम सिंह, कृष्णी यादव। मां मैं फिर आ रही हूं। इस बार फिर प्याार करुंगी। अपने तरीके से जीने की कोशिश करुंगी। फिर मारी जाऊंगी तो भी परवाह नहीं। पर एक ख्वाफहिश है मां, ईश्वर से मेरे लिए दुआ मांगना कि इस बार किसी अनपढ़ के यहां जन्म लूं… जो ज्यादा ज्ञान रखता हो। जो सनातनी हो लेकिन व्यावहारिक सनातनी, सैद्धांतिक नहीं। जो कम से कम अपने संतान को अपने तरीके से जीने की आजादी दे।

बस मां! अभी इतना ही । शेष फिर कभी। तुम अपना ख्याल रखना मां और पापा का भी। भाई-मामा को प्रणाम कहना। जल्दी ही मिलती हूं मां। नाम बदला हो सकता है लेकिन तू गौर करती रहना… तुम मुझे पहचान ही लोगी।

तुम्हारी बेटी
निरुपमा

(अनुपमा। झारखंड की चर्चित पत्रकार। प्रभात खबर में लंबे समय तक जुड़ाव के बाद स्वतंत्र रूप से रूरल रिपोर्टिंग। महिला और मानवाधिकार के सवालों पर लगातार सजग। देशाटन में दिलचस्पी‍। प्रभात खबर के लिए ब्लॉगिंग पर नियमित स्तंभ लेखन।)

-साभारः मोहल्ला लाइव

Friday, May 14, 2010

एक जादुई गोली के पचास साल

राजकिशोर

उस गर्भनिरोधक गोली को, जिसे अंग्रेजी की दुनिया में पिल कहते हैं, आधिकारिक मान्यता मिले हुए पचास साल हो गए। यह अवसर खुशी मनाने का है। स्त्री स्वतंत्रता के पक्षधरों को कुछ खास खुशी होनी चाहिए, क्योंकि पिल ने स्त्री समुदाय को एक बहुत बड़ी प्राकृतिक जंजीर से मुक्ति दी है। अगर पिल न होता, तो यौन क्रांति भी न होती। यौन क्रांति न होती, तो स्त्री स्वतंत्रता के आयाम भी बहुत सीमित रह जाते।

बेशक यह जादुई गोली उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितना पेनिसिलिन का आविष्कार, जिसने चिकित्सा के क्षेत्र में एक चमत्कार का काम किया। पिल का महत्व एसपिरिन या पैरासिटामोल जितना भी नहीं है। लेकिन ये दवाएं हैं। पिल कोई दवा नहीं है। वैसे गर्भनिरोधक गोली का आविष्कार भी स्त्रियों में बांझपन का इलाज खोजने की प्रक्रिया में हुआ था। आज भी पिल का प्रयोग कई स्त्री रोगों का इलाज करने के लिए होता है, लेकिन अधिकतर मामलों में यह गर्भनिरोधक की तरह ही प्रयुक्त होता है और गर्भाधान कोई बीमारी नहीं है। लेकिन अनिच्छित गर्भाधान एक बहुत बड़ी समस्या जरूर है, जिसके कुफल स्त्री को ही भुगतने पड़ते हैं। कहा जा सकता है कि उसके लिए तो यह बीमारियों की बीमारी है। पिल ने उन्हें सुरक्षित और स्वतंत्र जीवन जीने का अवसर प्रदान किया है। इस मायने में यह छोटी-सी गोली जितनी जादुई है, उतनी ही क्रांतिकारी भी।

गर्भाधान की जिम्मेदारी सौंप कर प्रकृति ने स्त्रियों के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है। पुरुष के हिस्से सिर्फ आनंद और स्त्री के हिस्से आनंद के साथ-साथ एक बड़ी और लंबी जिम्मेदारी। इसी आधार पर अनेक स्त्रीवादी विचारकों का मत है कि स्त्री का शरीर तंत्र ही उसका सबसे बड़ा शत्रु है। रेडिकल मार्क्सवादी विचारक शुलामिथ फायरस्टोन मानती थीं कि जब तक स्त्री को गर्भाशय से मुक्ति नहीं मिलती, तब तक उसकी वास्तविक मुक्ति संभव नहीं है। गर्भाशय स्त्रियों को कई तरीकों से बाधित और कंडीशन करता है। यह उसके व्यक्तित्व को ही बदल देता है।

अनिच्छित गर्भाधान से छुटकारा पाने का प्रयास शायद उतना ही पुराना है जितना मानव संस्कृति का इतिहास। गर्भाधान न हो और हो जाए तो उससे छुटकारा पाया जा सके, इसके लिए अनेक तरीके खोजे जाते रहे। उनमें से कोई भी तरीका संतोषजनक नहीं था। कुछ तरीके तो ऐसे थे जिनसे स्त्री की जान पर बन आती थी। उस बेचारी को इज्जत और परिवार के सुख-चैन के लिए इस कठोर अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ता था। दुर्भाग्यवश आज भी दुनिया के बहुत बड़े इलाके में यह अग्निपरीक्षा जारी है। इन इलाकों में हमारा अपना देश भी शामिल है। हर साल हजारों या क्या पता लाखों स्त्रियां अनचाहे गर्भ से मुक्ति पाने की प्रक्रिया में भयावह यंत्रणा सहती हैं और उनमें से अनेक तो जान से भी हाथ धो बैठती हैं। स्पष्ट है कि मानव स्वाधीनता के औजार अभी भी कुछ खास देशों और एक खास वर्ग तक सीमित हैं। पिल भी ऐसा ही एक औजार है।

कुछ लोगों का मानना है कि पिल (और कंडोम) ने यौन अराजकता को बढ़ावा दिया है। अगर पिल न होता, तो स्त्रियां और पुरुष मर्यादा में रहते। पिल के कारण गर्भ निरोध की युक्ति इतनी आसान और इतनी कम खर्चीली हो गई है कि किसी को भी लंबे समय के रिश्तों में दिलचस्पी नहीं रही। मनुष्य पशुओं की तरह आचरण करने लगे हैं। व्यभिचारी स्त्री-पुरुषों की बन आई है। उन्हें अपने कर्म के परिणाम की चिंता नहीं रही, क्योंकि पिल है न।

यह आलोचना पूरी तरह निस्सार नहीं है, लेकिन इतना खतरा तो किसी भी नए आविष्कार के साथ जुड़ा हुआ होता है। सवाल यह है कि जब तक पिल बाजार में नहीं आया था, क्या दुनिया में व्यभिचार नहीं था ? या, यौन उच्छृंखलता नहीं थी? अपनी विवाहिता को साल-दर-साल गर्भवती करते जाना पुरुष सत्ता की यौन उच्छृंखलता नहीं थी तो क्या था? पिल का सबसे अहम योगदान यह है कि यह स्त्री को अपने शरीर पर नियंत्रण प्रदान करता है और इस तरह उसे स्वाधीन बनाता है। लेकिन यह कहना गलत है कि सिर्फ पिल ने स्त्री को स्वतंत्रता दी। सच यह है कि स्वतंत्रता का वातावरण और पिल, दोनों लगभग साथ-साथ आए। इसे सामाजिक विकास और वैज्ञानिक विकास का युग्म कहा जा सकता है। दोनों का ही ज्ञान और चेतना के प्रसार से गहरा संबंध है। ज्ञान की पुरानी अवस्था में न तो पिल की खोज की जा सकती थी और न चेतना की पुरानी अवस्था में इसका प्रयोग उतना व्यापक हो सकता था जितना आज है।

सवाल यह भी है कि स्वतंत्रता का दुरुपयोग किसे कहेंगे? स्त्री के संदर्भ में क्या पुरुष अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग हजारों वर्षों से नहीं करता आया है? लेकिन पिल ने अगर इन पचास वर्षों में स्त्री को यह चुनने की आजादी दी है कि जब वह चाहे, तभी गर्भाधान हो और औरत इसका लाभ उठाती है, तो किस तर्क से इसे स्वतंत्रता का दुरुपयोग कहा जा सकता है? वस्तुत: जिस यौन अराजकता की बात की जाती है, वह पिल की नहीं, वर्तमान उपभोक्ता संस्कृति की देन है। हां, पिल ने जिस एक महत्वपूर्ण सत्य से हमारा साक्षात्कार कराया है, वह यह है कि यौन समागम कोई उतनी बड़ी घटना नहीं है जितना इसे बना दिया गया है। यह वैसा ही एक मानव व्यवहार है जैसा खाना, पीना या चलना-फिरना। पिल का शुक्रिया कि उसकी मदद से हम एक बहुत बड़े मिथक से मुक्त हो पाए हैं, जिसने मानव जीवन को नरक बना रखा था।

यह शिकायत जरूर वाजिब है कि सत्ता और अर्थव्यवस्था की संरचना ने पिल तक औरतों की पहुंच को सीमित कर रखा है। यह इस बात का प्रमाण है कि गुलामी की कौन-सी बेड़ियां अभी तक मानव समाज के विकास को निरुद्ध किए हुए हैं। दूसरी ओर, पिल ने केवल स्त्री को ही नहीं, उसके साथी पुरुष को भी मुक्त किया है, जो इस बात का एक और प्रमाण है कि स्त्री मुक्ति और पुरुष मुक्ति दोनों साथ-साथ चलते हैं।

Sunday, May 9, 2010

मदर्स डे के बहाने

ये जानते हुये भी कि जीवन रचने की अनूठी शक्ती सिर्फ औरत के हिस्से आयी है, और पालन पोषण की जिम्मेदारी भी. फिर भी औरत की कोख पर उसका अधिकार नहीं है, स्त्री का माँ रूप सिर्फ एक ख़ास सन्दर्भ में ही स्वीकार्य है, बाकी वों लगातार स्त्री के लिए अपमान और बंधन और पीड़ा का सबब है. निरुपमा के बहाने अविवाहित मात्र्तव पर खासी बहस जारी है. विवाहित महिलाए भी कभी सामाजिक दबाव में बच्चे जनने को, एक ख़ास लिंग का बच्चा जनने और न जनने को, गर्भपात से लेकर कई तरह के संत्रास से रोज गुजरती ही है. इसीलिए मात्रत्व को स्त्री के सिर्फ व्यक्तिगत प्रश्न देखने के बजाय इसे स्त्री के स्वास्थ्य, अस्मिता, और उसके वृहद् सामाजिक भूमिका से जोड़ कर देखने की ज़रुरत है. स्त्री के स्वास्थ्य, सेक्सुअलिटी पर पितृसत्ताक, नजरिया बहुत लम्बे समय तक रहेगा, स्त्री का सामाजिक अनुकूलन भी नित नए रूप में सामने आयेगा. अलग-अलग समाजो की फांस और अपनी ख़ास तरह की अनूठी जीवन रचने की जो शक्ती स्त्री के पास है, उसको समझते हुये, ही स्त्री उनसे कई स्तरों पर तैयारी से उलझती रहे, और सशक्त बने, सक्रिय तरीके से किसी स्तर पर सामाजिक चेतना को कुछ आगे धकेले. इन सबके बीच स्त्री तभी पार पा सकती है जब उसके पास आधुनिक नजरिया हो कि किस तरह स्त्री अपने शरीर, अपनी इच्छाओं, को देखे समझे ( Our Bodies, Ourselves: A New Edition for a New Era, Boston Women's Health Book Collective). स्त्री शिक्षित हो, अपने बारे में. मात्र्तव उसके लिए दुर्घटना न बने, माता बनने और माँ न बनने के जो पारिवारिक और सामाजिक दबाव स्त्री पर लगातार बने रहते है, उनसे पार पाए. मातृत्व का चयन स्त्री का हो और वों बच्चे और माँ के जीवन का उत्सव हो. आज गर्भ-निरोधक पिल्स को मान्यता मिले ५० साल हुये है. और निसंदेह इन ५० सालों में स्त्री को सिर्फ अनचाहे मात्रत्व से ही मुक्ती नहीं मिली है, उसे समाज में अपने लिए जगह बनाने के अवसर मिले है, और परिवार और समाज पर बढ़ती जनसंख्या का दबाव भी कम हुया है.आज पिल्स की ५०वी सालगिरह भी है

सायंस और तकनीकी के समाधान हमारी साझी सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया के ही हिस्से है, सिर्फ यही अकेले समाधान नहीं है. सायंस के समाधान भी देर सबेर शोषक और सबल का हथियार बन जाते है और शोषण के दूसरे रूप उनका इस्तेमाल करने में आगे रहते है.

समाज बदलने की दिशा में और स्त्री को एक सम्पूर्ण मानव की गरिमा मिलने तक स्त्री की अपने बारे में और अपने समाज के बारे में एक सचेत राजनैतिक शिक्षा की ज़रुरत लगातार बनी रहेगी. इस मायने में स्त्रीत्व की लड़ाई सिर्फ भारतीय समाज में ही नहीं है, अलग-अलग तरह से दूसरे समाजो में भी है. जिन समाजो में अविवाहित मात्र्तव कुछ हद तक स्वीकृत है, और सायंस, तकनीकी और तकनीकी जानकारी का अभाव नहीं है, वहाँ भी स्त्रीत्व की यात्रा सरल और सुखद नहीं है. अमरीकी समाज में एक बड़ी होती लड़की अपनी इस यात्रा को किस तरह से देखती है, नोमी वूल्फ की ये किताब कुछ कठिन सवालों से रूबरू होती है. ये सवाल कुछ दूसरी तरह से भारतीय समाज में लड़की के बड़े होने और स्त्रीत्व की यात्रा के बहुत नजदीक ही है। सामाजिक अनुकूलन की प्रक्रिया को समझते हुये स्त्री का सचेत रूप से अपने स्त्रीपन से उलझे बगैर काम नहीं चलता.

विवाह,जाति-प्रथा और यौन शुचिता आदि पर बहुसंख्यक समाज के जो विचार है उन्हें इतने सालों बाद भी लोहिया जी की तरह बार-बार कटघरे में खड़े किये जाने की ज़रुरत है. कम से कम स्त्री का माँ बनना या न बनना, विवाह के भीतर या बाहर बनना सिर्फ उसकी ही मर्जी होनी चाहिए. . सवाल लेकिन सिर्फ माँ बनने और नहीं बनने का नहीं है, सवाल ये है कि क्या स्त्री एक सम्पूर्ण मनुष्य है? या उसका शरीर और उसकी योनिकता का मालिक कोई दूसरा है? पिता, पुरुष या समाज? और जब तक ये सवाल नहीं सुलझाया जाएगा, स्त्री को एक सम्पूर्ण मनुष्य की गरिमा नहीं मिल सकती.

सवाल तो हैं ही, निरुपमा के लिए भी और प्रियभांशु के लिए भी

- प्रणव प्रियदर्शी

(निरुपमा मसले पर मेरी पिछली पोस्ट निरुपमा के बहाने अब एक बार अपने भीतर झांकें, प्लीज़! पर प्रणव प्रियदर्शी ने यह लंबी टिप्पणी मेल के जरिए मुझे भेजी। इसे एक नई पोस्ट की तरह लगाना ज्यादा सुविधाजनक रहेगा, यह मान कर इसे यहां दे रही हूं। प्रणव चोखेर बाली के नियमित पाठक, टिप्पणीकार और लेखक भी हैं।- अनुराधा)

अनुराधा, तुम्हारी पिछली पोस्ट धर्म पर नहीं है, फिर भी चूंकि तुमने शुरू में उसका उल्लेख कर दिया है, इसलिए मैं भी यह कहना चाहता हूं कि सिर्फ औरतों के लिए नहीं, धर्म ने उन सबको छलने में सत्तारूढ़ तबकों का साथ दिया है… लगातार… जो आज वंचित, पीड़ित, शोषित तबकों के रूप में नजर आते हैं।

दूसरी बात ( यह भी तुम्हारी इस पोस्ट की मुख्य बात नहीं है, पर है केंद्रीय महत्व की) जो तुमने स्त्रियों के लिए कही है कि कब तक हम पुरुषों से मुखातिब रहेंगे? यह बात भी स्त्रियों समेत सभी वंचित तबकों के लिए सच है कि जिन्हें हम अपना विरोधी मानते हैं उन्हें ही संबोधित करते हुए अपनी उम्र गुजार देते हैं। अनुरोध करते हुए, अपील करते हुए, ज्ञापन देते हुए और सांकेतिक विरोध करते हुए भी हम उन्हें ही संबोधित करते रहते हैं। इस उम्मीद में कि शायद वह अपना रास्ता थोड़ा बहुत बदल लें और हमें चैन मिले। यह नहीं सोचते कि अपनी दुर्गति के लिए किसी और से ज्यादा हम खुद जिम्मेदार हैं, दूसरे हमें फॉर ग्रांटेड तभी लेते हैं जब हम इसकी गुंजाइश छोड़ते हैं। दूसरे अगर हम पर ज्यादती करते हैं तो उसके लिए उनसे ज्यादा हम जिम्मेदार होते हैं क्योंकि हम उस ज्यादती को बदार्श्त कर रहे होते हैं। इस हिसाब से दूसरों के मुखातिब होने के बजाय खुद को संबोधित करना ज्यादा जरूरी है क्योंकि तौर-तरीके बदलने की जरूरत दूसरों से ज्यादा उन तबकों को है जो खुद को पीडि़त, दमित, शोषित मानते हैं।

अपेक्षाकृत कम प्रासंगिक पर ज्यादा जरूरी इन दो बातों के बाद मैं तुम्हारी पोस्ट के मुख्य बिंदुओं पर आता हूं। निरुपमा से जो कुछ पूछने की तुम सोच रही हो, वह बिल्कुल सटीक है, पर काफी नहीं। हालांकि मैं न तो निरुपमा को व्यक्तिगत तौर पर जानता था और न ही प्रियभांशु को जानता हूं । इस मामले की मेरी जानकारी भी अखबारी रिपोर्टों तक सीमित है।

इसीलिए इन दोनों के रिश्तों पर मेरा टिप्पणी करना निजता के दायरे का उल्लंघन भी हो सकता है। सभी संबंधित पक्षों से अग्रिम माफी मांगते हुए मैं कहना चाहूंगा कि मेरी बातों को उन दोनों के सच के रूप में न लेकर ऐसे किसी भी मामले में मेरे नजरिए या मेरे सोचने के ढंग के रूप में लें।

इस निवेदन के बाद मैं कहूंगा कि मेरे हिसाब से निरुपमा ने अपने शरीर के बारे में ही नहीं, जीवन के बारे में भी, रिश्तों को समझने में भी, जीवन साथी के चयन में भी घोर लापरवाही बरती। अगर यह सच नहीं है तो फिर यही कहना होगा कि उसमें सही फैसला करने की शक्ति ही नहीं थी।

अगर सचमुच अपने किसी साथी से असुरक्षित यौन संबंध के चलते प्रेग्नंट होने के तीन महीने बाद भी वह साथी को यह बात नहीं बता पाती है तो उस रिश्ते की अर्थहीनता का इससे बड़ा सबूत दूसरा नहीं हो सकता। अगर वह साथी पता होते हुए भी अपनी खाल बचाने के लिए पता होने की बात छिपा रहा है तो फिर उसे साथी कहना ही बेकार है। उस स्थिति में इस पर कुछ और कहने-सुनने की जरूरत ही नहीं बचती।

मुझे अचरज इस बात पर भी हुआ कि निरुपमा की मौत (हत्या) के बाद भी कुछ समय तक प्रियभांशु मीडिया में आने से बचता रहा, क्योंकि वह सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा है और शायद उसे उसके कुछ दोस्तों ने सलाह दी कि इस केस में सामने आने से उसका करियर प्रभावित हो सकता है। पता नहीं, यह बात कितनी सच है, लेकिन अगर इसमें जरा सी भी सच्चाई है तो निरुपमा और प्रियभांशु के रिश्तों को इससे बड़ी गाली कुछ और नहीं हो सकती।

हत्या भूल जाएं अगर निरुपमा की मौत भी मान लें तो भी यह असहज मौत तो थी ही, उसके बाद अगर प्रियभांशु यह सोचते हैं कि अब जो होना था वह हो चुका, अब तो अपने बारे में सोचें तो वह रिश्तों को किस स्तर पर जीते हैं, यह बात स्वतः सिद्ध है।

यहां मेरा मकसद बड़ी-बड़ी बातें करना नहीं, सिर्फ यह बताना है कि रिश्तों को दूसरे स्तर पर जीने के भी उदाहरण अपने इसी समकालीन समाज में हमारे सामने बिखरे पड़े हैं।

जेसिका लाल की बहन सबरीना लाल भी इसी दुनिया, इसी जमाने में हमारे ही बीच रहती है, जिसने बहन की हत्या के बाद उस लड़ाई को पूरी निष्ठा के साथ अंजाम तक पहुंचाया। नीतीश कटारा की मां नीलम कटारा भी ऐसी ही महिला है। अगर कोई इन्हें खून का रिश्ता मान कर खारिज करना चाहे तो उसके लिए रुचिका गिरहोत्रा की दोस्त आराधना को याद करना चाहिए। डीजीपी राठौर ने जब रुचिका के साथ बदमाशी की थी तब (आराधना) भी १३-१४ साल की ही थी। तीन साल बाद रुचिका ने खुदकुशी कर ली, पर आराधना ने यह नहीं सोचा कि अब अपने भविष्य का खयाल किया जाए। बीस साल तक वह लगभग हारी हुई यह लड़ाई लडती रही और आखिर डीजीपी राठौर को सजा दिलवाई। बेशक, आराधना के माता- पिता और पति भी अभिनंदन के पात्र हैं, लेकिन आराधना इस पूरे प्रकरण में केंद्रीय पात्र बन कर उभरती है।

अब हम-आप चाहें तो इस पर भी माथा पच्ची कर सकते हैं (और हमें करनी भी चाहिए) कि समकालीन समाज से अनायास लिए इन तीनों उदाहरणों में मिसाल बनकर उभरने वाली तीनों पात्र महिलाएं ही क्यों है?

Tuesday, May 4, 2010

निरुपमा के बहाने अब एक बार अपने भीतर झांकें, प्लीज़!

स्त्री का कोई धर्म नहीं होता और धर्म ने उसके लिए सिर्फ बेड़ियां बनाईं हैं, और धर्म के ठेकेदार और पितृसत्ता के चौकीदार हाथ मे हाथ मिलाए सत्ता की सीढियाँ चढते हैं और मिल बाँट कर 'धर्म विमुख औरतों' को सबक सिखाते हैं, और....सब मंजूर, सब सही। पर हम कब तक पुरुषों से मुखातिब रहेंगे? क्या अब समय नहीं आया कि एक बार अपनी तरफ नजरें घुमाएं, अपने भीतर देखें। एक बार!

निरुपमा का मामला लें तो इससे ज्यादा नृशंस, अमानवीय कुछ हो नहीं सकता था कि एक पढ़े-लिखे शहरी परिवार के लोग अपनी ही पाली-पोसी बेटी को मार दें चाहे किसी कारण से हो। गांवों में सामाजिक दबाव और मजबूरी, जकड़न ज्यादा होती है। पर शहर के लोग भी अपनी मानसिक जकड़न से नहीं निकल पाए हैं।

लेकिन निरुपमा अपनी मौत के पहले की स्थिति में किसी भी दिन मुझे मिलती तो कुछ स्वाभाविक सवाल मेरे मन में हैं जो मैं उससे करती। अपनी शादी का फैसला खुद करना और उस पर अड़ने की हिम्मत रखना वाकई साहस का काम है। पर बिन ब्याही मां बनना उसका ‘फैसला’ कतई नहीं था, यह मेरा सोचना है। और उसकी इस स्थिति का गुणगान आज उसकी हिम्मत बताकर किया जा रहा है, पर उसके जीते जी सब उसे क्या सलाहें देते? हम जो पुरुषों पर लगातार दोष धरती हैं, खूब तर्क-वितर्क करती हैं, मौके पर खुद क्या करती हैं, और किसी को ऐसे मौकों पर कोई सहारा, दिलासा दे भी पाती हैं?

मैं क्रांतिकारी नहीं हूं। मैं उससे सबसे पहले पूछती कि ये क्या हाल बना लिया? क्या अपना इतना भी ख्याल नहीं? क्या तुम सचमुच, जानबूझ कर बिन ब्याही मां बनना चाहती हो, ऐसे सामाजिक माहौल में? और मुझे लगता है कि वह इससे इनकार करती कि उसने चाह कर यह हालात अपने लिए बनाए हैं। यह उसकी हिम्मत नहीं, कायरता थी।

एक तो, वह पढ़-लिख कर भी खुद अपने शरीर के बारे में कुछ नहीं जानती। वह चाहती है, पर नहीं जानती कि इसका क्या करे? इस शरीर का सम्मान किस तरह करे। दुनिया भर की खबरें, लेख उसने पढ़े, एडिट किए, पर उसे इतना भी नहीं पता था कि अपने को इस हालत तक पहुंचाने से रोकने के कई तरीके हैं, और सब सहज और जायज है। वह दिल्ली शहर में आर्थिक रूप से आत्म निर्भर, अपने रोज के फैसले खुद करने वाली आज़ाद लड़की थी। और वह उसका प्रेमी भी, जो कि कोई अनपढ़ गंवार नहीं था और उसे इतनी अंतरंगता से जानता था, जो कभी उसकी हालत जान नहीं पाया तो क्या इस आशंका के बारे में सोच कर उसे आगाह भी नहीं कर पाया?

अच्छा, माना कि वह खुद इतनी हिम्मत नहीं रखती थी, डर गई थी, तो फिर स्वाभाविक था कि अपने उस साथी पर तो इतना भरोसा करती और उसे अपनी इस हालत के बारे में बताती तो सही। उसने क्यों ऐसा नहीं किया, वह भी कन्फर्म होने के कोई पांच हफ्ते तक भी? क्या उसे उस पर भरोसा नहीं था? क्या वह उसे ‘परेशान’ नहीं करना चाहती थी? अगर यह भी नहीं करना था तो फिर अफसोस तो नहीं करते रहना था कि इस समय जिंदगी सबसे बुरे दौर से गुजर रही है-

(NIrupama Pathak on Facebook: Deplorable, disgusting,disgrace ful, distructible, diminishing, dam it, deteriorating are the few derogatory words that I want to associate with my life at this juncture. March 26 at 12:00 am 2010- यह लगभग वही समय होगा जब उसे अपने गर्भवती होने का पता चला होगा)

कुछ तो करना था निरुपमा, कुछ तो!

अब निरुपमा नहीं है, पर हम अपने शरीरों का क्या कर रहे है? हममें से कितने हैं जिन्हें इच्छाओं और सपनों का तो छोड़ ही दे, यह भी पता है कि देह का कौन सा दर्द मीठा है, बर्दाश्त करने लायक है और कौनसा कड़वा-कसैला?

Monday, May 3, 2010

बलात्कार के मामले में सबूत के तौर पर पीड़िता का बयान काफी है

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि बलात्कार के मामले में, खास तौर पर अगर पीड़ित निरक्षर है तो उसके बयान को पूरी तरह माना जाए। आरोपी को दोशी करार देने के लिए पीड़ित के बयानों की सत्यता की जांच करने की जरूरत नहीं है। साथ ही कहा गया कि अगर मामला देर से दाखिल कराया गया है, तब भी उस महिला के बयान को पूरी तरह स्वीकार किया जाए।

न्यायमूर्ति पी सदाशिवम और न्यायमूर्ति आर एम लोढ़ा की बेंच ने फैसला देते हुए कहा कि किसी स्वाभिमानी महिला के लिए बलात्कार का बयान देना अपने आप में अत्यंत अपमानजनक अनुभव है। और जब तक वह लैंगिक अपराध की पीड़ित नहीं होगी, वह वास्तविक अपराधी के अलावा किसी पर आरोप नहीं लगा सकती।

कर्नाटक के दक्षिण कनारा जिले की दो खान मजदूर बहनों के साथ 2004 में हुए बलात्कार के मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह बात कही। इस मामले में घटना के 42 दिन बाद रिपोर्ट लिखाई गई थी, जब तक मेडिकल सबूत नष्ट हो चुके थे। दोनों महिलाओं का कहना था कि उन्हें धमकाया गया था और उन्हें सहारा देने के लिए परिवार में कोई पुरुष सदस्य भी नहीं था। इसलिए उन्हें रिपोर्ट लिखवाने में देरी हुई। उन बहनों की मां ने भी बहनों के पक्ष में गवाही दी।

जब स्त्री धर्म के प्रतिकूल आचरण करती है तो धर्म उसका विनाश कर देता है

सच यह है कि "स्त्री का कोई धर्म नही होता ,हर धर्म ने उसके लिए सिर्फ और सिर्फ बेड़ियाँ ही बनाई हैं "
इस पोस्ट को लिखे बहुत दिन नही हुए ! मनोज-बबली काण्ड को बीते भी अधिक दिन नही हुए । LSD ने फिल्म जगत मे क्या मुकाम बनाया पता नही , लेकिन उसकी एक कहानी ऐसे ही सच से रूबरू कराती है जो रोंगटे खड़े कर देने वाला है। निरुपमा पाठक के पिता का यह पत्र फिर से साबित करता है कि "धर्म" से टकराना स्त्री के लिए कभी आसान नही रहा और यह वह सबसे बड़ी दीवार है जो उसके रास्ते मे खड़ी है।धर्म के ठेकेदार और पितृसत्ता के चौकीदार हाथ मे हाथ मिलाए सत्ता की सीढियाँ चढते हैं और मिल बाँट कर 'धर्म विमुख औरतों' को सबक सिखाते हैं।
निश्चित रूप से यह पत्र एक पिता ने पुत्री को समझाते हुए नही लिखा है , यह एक आहत दर्प वाले पितृसत्ता के मुखिया ने बागी के प्रति दाँत कसमसाते हुए लिखा है, मुट्ठियाँ भींचते हुए ,शब्द चबा-चबा कर लिखा है,गुस्साई रक्तिम आँखों से लिखा है।
यह वह धर्म , परिवार , समाज -व्यवस्था है जो स्त्री के सामने कोई विकल्प नही छोड़ना चाहती।मयंक सवाल उठाते हैं कि क्या यह सच मे आत्महत्या है हत्या नही !!तो मै साफ करना चाहूंगी कि केवल आत्महत्या का विकल्प बेटी के सामने छोड़ना भी हत्या ही है ! यदि सच मे निरुपमा ने आत्महत्या ही की हो तो भी वह धर्म , समाज और पिता इसके कम आरोपी नही हो जाते।शादी में बेटी को ढेर सा गहना कपड़ा देते हैं लेकिन कभी आत्मसम्मान ,स्वाभिमान और भरोसा नही देते ।उसे पालते हुए कभी यह विश्वास नही दिलाते कि हम सदा तुम्हारे साथ हैं , मुड़कर देखोगी तो हमें पाओगी । क्या हम अपने समाज में लडकियों को बेहद असुरक्षित [भावनात्मक , शारीरिक,आर्थिक ] वतावरण नहीं दे रहे जहाँ वे कभी अपना दर्द खुल कर नही कह पाती । वे कभी लौट नही पातीं । क्यों?
हे अन्धे पिताओं, अपनी अजन्मी /जन्मी बेटियों को बख्शो !वे तुम्हे चाहती हैं और एक बार भी यह नही सोचतीं कि तुम अपने 'अहंकार ' के लिए उनकी जान के दुश्मन हो जाओगे। वे तुम्हारी जागीर नही हैं !वे तुम्हारे उपनिवेश नही है !वे तुम्हारी सल्तनतें नहीं है!

चुड़ैल

- अनामिका


"क्योंकर हुआ करते हैं उलटे पाव चुड़ैलों के ?
क्योंकर चुड़ैल बन जाती हैं
जच्चा-चर में टन्न बोल गयी औरतें? "

डरते डरते मैने नानी से पूछा था!

नानी थी फूलों की टोकरी!
जब भी हम घबराते उसमे ही ढूह लगाते।

ज़्यादातर प्रश्नों के उत्तर थे उसी टोकरी में
लेकिन जिन प्रश्नों के उत्तर नही थे
यह प्रश्न उनमें ही होगा
क्यो6कि उसने प्रश्न सुनते ही
नाक की नोंक से उठाया चश्मा
अपनी कमर सीधी की
और सुतरी खींच ली
मुंह के बटुए की !

ज़िन्दगी ऐसी कटी
मुझे रह रह कर आती रही याद नानी
और कभी छ्ट्ठी का दूध भी


अनुत्तरित प्रश्नों की पोटली
तकिए के नीचे धरे
एक दिन मै भी मरी,
और मरी भी कहाँ ?
जच्चा-घर में ही!
एक साथ ही मिल गए मुझको
मेरे उन प्रश्नों के उत्तर
जब उलटे पाँव लौट आई मैं दुनिया में!
लौटना ज़रूरी था
और ज़रूरी था देखना-
मेरी वह दुधमुँही सलामत तो है न!
दीए पर ठीक से पड़ा है कि नही पड़ा
उसका कजरौटा !

हाँ ,उलटे हैं मेरे पाँव,
पर दुनिया मे मुझको दिखा दो कोई भी औरत
जो उलटे पाँव नही चलती,
व्यतीत मे जिसके
गड़ा नही कोई खूँटा!
भागती नही औरतें-
लौट आती हैं उलटे पाँव,
अमराई के खाली झूले और पालने
लू के थपेड़ों से नही झूलते
ये ही झुलाती हैं उन्हें-
हर बार उलटे पाँव !

('हँस' ,मई 2010 से साभार्)