Friday, June 11, 2010

तलाक की राह आसान

सुना है तलाक अब आसान हो जायेंगे. तलाक आज के दौर की जरूरत बन चुके हैं, सो अदालत को लगता है कि उसकी राह की अड़चनों को भी कम किया जाना चाहिए. अदालत को यह भी लगता है कि इससे जिंदगी कुछ आसान हो जायेगी. ऐसा हो भी सकता है. आखिर हर पल बूंद-बूंद रिसते हुए रिश्तों से निजात पाने में बुराई ही क्या है.

सुनने में कुछ अजीब लग सकता है, (नहीं भी लग सकता है) कि पिछले बरस मैंने जिंदगी में पहली बार एक डिवोर्स पार्टी में शिरकत की थी. तलाक आपसी रजामंदी से हुआ था, सो वर-वधू ने अपने कुछ निकट दोस्तों को बुलाकर खुशी-खुशी एक-दूसरे से अलग होने की इत्तला दी थी. मौका थोड़ा अजीब था लेकिन उस छोटी सी पार्टी का माहौल बहुत ही सुलझा हुआ. दोनों को देखकर बिलकुल भी बेचारगी का अनुभव नहीं हो रहा था. उन दोनों का कहना यही था कि हमें जल्दी ही समझ में आ गया कि हम एक-दूसरे के लिए नहीं बने हैं और हमने एक-दूसरे को समझने में भूल की है. रोज-रोज एक-दूसरे से उलझने और फ्रस्टेशन निकालने से बेहतर है राजी-खुशी अलग हुआ जाए और जिंदगी को बेहतर ढंग से जिया जाए.

उनका तलाक शादी के दो साल बाद फाइल हुआ था और उन्हें तलाक मिलने में 3 साल लगे. वकीलों के मुताबिक उन्हें तलाक जल्दी मिल गया. ऐसे मामलों के बारे में सोचती हूं तो लगता है कि अच्छा ही है कि तलाक की प्रक्रिया आसान हुई. बंधनों से आजाद होना जितना आसान होगा, उतना ही ठीक होगा. लेकिन सवाल यह है कि क्या इस सहूलियत का इकतरफा इस्तेमाल नहीं किया जायेगा. दूसरे विवाह के इच्छुक पति अब आसानी से पहली पत्नी से मुक्ति पा सकेंगे. हमारे यहां कानूनों का ठीक-ठीक फायदा उठाने के मामले में स्त्रियां कितना पीछे हैं, यह किसी से छुपा नहीं है. हर वो कानून जो स्त्रियों के हित के न$जरिये से आता है न जाने कब और कैसे उनके ही खिलाफ खड़ा होने लगता है. कानूनों के मिसयूज की दुहाई देकर समाज उन कानूनों के खिलाफ खड़ा होने लगता है. उदाहरण के लिए डाउरी एक्ट 498 ए को देखा जा सकता है.

सवाल यह है कि क्या हम कानूनों का सही-सही उपयोग करने के लिए भी तैयार नहीं हैं या इन कानूनों में ही कुछ अधूरापन है. लिवइन रिलेशन वाले मामले में अभी कानूनी पेच चल ही रहे हैं कि कितनी वैधानिकता मिलेगी, कब कोई रिश्ता प्रेम की दहलीज लांघकर शोषण की दहलीज में शामिल हो जायेगा. क्या होगा लिवइन रिलेशन से जन्मे बच्चों का, वगैरह. डोमेस्टिक वायलेंस कानून का कितना यूज हो पा रहा है हम जानते ही हैं. हाल ही में आये एक सर्वे में साफ हुआ कि किस तरह महिलाएं पति की मार को उनका हक और प्रेम मानती हैं. ऐसी हालत में कितना कारगर है डोमेस्टिक वायलेंस लॉ. फैमिली कोर्ट की हमारी एक साथी ने बताया कि महिलाएं डरती हैं कि अगर पति, सास या ससुर के खिलाफ डोमेस्टिक वायलेंस का सहारा लिया तो बाद में उनका क्या होगा. कानून हर वक्त तो उनके साथ खड़ा न होगा, जबकि उसे रहना उन्हीं लोगों के बीच है.

बहुत सारे कानूनों से जुड़े बहुत सारे सवाल हैं. लेकिन इन सब सवालों से बड़ा है ये सवाल कि रिश्तों में कानूनों के दखल की जरूरत किस कारण से आई. और अगर आ भी गई है तो उसका इंटरफियरेंस कितना हो, इसे कौन तय करेगा. कानून रिश्तों को सहूलियत देने के लिए बनते हैं लेकिन उस सहूलियत को कितना लिया जा रहा है. इसके पहले कि कानून स्त्रियों के हमसफर बनें, उनके मिसयूज के मामले सामने आने लगते हैं. स्त्रियों के हाथ खाली के खाली. दूसरे, मिसयूज वाले मामलों को इतना हाईलाइट किया जाता है कि लगता है कि सारे कानूनों ने स्त्रियों को आजादी देकर समाज का सर्वनाश कर दिया है. अब भी स्त्रियों को, हर तबके की स्त्रियों को अपने लिए बने कानूनों के बारे में जानने की जरूरत है, उनके महत्व को समझने की जरूरत है और उनका वक्त आने पर सही इस्तेमाल करने की जरूरत भी है.

तलाक बुरी बात नहीं है. लेकिन तलाक कोई खेल भी नहीं है. अदालत का यह फैसला आया तो इसीलिए है कि रिश्तों के नासूर को झेल रहे लोगों को राहत की सांस मिले, देखते हैं क्या होता है.