Monday, August 9, 2010

बेवफा और छिनाल औरतें

जब स्त्री की बात हो तो सामान्य और समान के मापदण्ड अचानक से बदल जाते हैं।अपने मनुष्य होने के अहसास और स्त्री 'बनने' की प्रक्रिया का विश्लेषण करना शुरु करे तो स्त्री और स्त्री आन्दोलनो पर हमले और भी तीखे और तेज़ हो जाते है। कहीं और क्यों जाएँ , हमने ब्लॉग पर ही देखा है। .....वालियाँ आ जाएंगी या, उछलने वाली औरतें , में रेड लाइट एरिया खोलने वाली औरतें ......भ्रष्ट औरतें .....जाने क्या क्या सम्बोधन चोखेर् बाली ने अपनी शुरुआत से ही सुने हैं।अचरज नही होता कि भला से भला , पढा लिखा ,समझदार दिखने वाला पुरुष भी आज की स्त्री के बदलते तेवरों से आक्रांत महसूस करता है और असंतुलित होकर कैसी भी गाली दे जाता है।
इसलिए राय साहब ने जो कहा उसमे भी अचरज नही । ज़रूरी केवल यह है कि राय साहेब को याद दिलाया जाए कि कम से कम पब्लिकली बोलते हुए अपनी भाषा और विचारों को एक लोकतांत्रिक बाना पहनाना सीखें ।संस्कार तो शायद हम ऐसेकई राय साहबों के नही बदल पाएंगे ,ये तो सदियों के प्रशिक़्क्षण के बाद मिले हैं उन्हें , जाते जाते सदियाँ ही लगेंगी पर ज़बान पर तो नियंत्रण रखना ही होगा उन्हें अपने निजी समय व स्पेस मे वे स्त्री को क्या क्या और किस वजह से कहते हैं इस पर शायद किसी की रोक नही।जिसे प्रभु जोशी वी एन राय की नीयत की नही भाषा की असावधानी बता रहे हैं उन्हें भी यह समझना होगा कि भाषा और विचार मे कभी द्वैत होता है यह मानना धोखा है , अनाड़ीपन है।भाषिक विकास के साथ साथ वैचारिक विकास भी होता है।इसलिए मानना होगा कि ऐसी भाषा प्रयोग करने वाले का वैचारिक विकास भी अभी नही हुआ है।भाषा के संस्कार , व्यवहार (या कहें नियंत्रण ) की उन जैसे पढे लिखे कुलपति से पूरी उम्मीद थी यह बात गलत नही है और इसलिए राह चलते किसी लफंगे के मुँह से यही बात सुनकर हम बवाल न मचाते।
भाषा मे छिपी स्त्री के प्रति यह हिंसा न केवल स्त्री की स्वतंत्रता को चुनौती है बल्कि यह अपने पतित होने , बेशर्म होने , अलोकतांत्रिक होने ,सामंती होने का सगर्व उद्घोष भी है।यह चुनौती है हर उस स्त्री को जो स्वयम को मनुष्य समझती है , अभिव्यक्त कर सकती है ,विचार-विश्लेषण करती है ,व्यवस्था पर टिप्पणी करती है जो अपनी रायशुमारी चाहती है .....जो अपनी तरह से जीना चाहती है और इसलिए बदचलन करार दी जाती है। स्त्रियाँ जब तक पितृसत्ता के बस मे रहती है उसके लिए करणीय-अकरणीय के दायरे घर-समाज के पुरुष खींचते हैं।जब वह खुद सोचती समझती है और अपने दायरे खुद बनाती है तो इसे सराहने के बजाए बहुत आसानी से कह दिया जाता है कि वह छिनाल है।
अपने एक हालिया लेख मे मैत्रेयी पुष्पा पूछती हैं कि क्या वी एन राय ने लेखिकाओं से माफी मांगी है, क्या उन्हे अपनी गलती का एहसास हुआ है, क्या वे अपने किए पर शर्मिन्दा हैं?
मै हैरान हूँ । कम से कम मैत्रेयी जी को राय साहेब से ऐसी उम्मीद नही रखनी चाहिए थी कि वे शर्मिन्दा होते।यह अपनी गलती मानने , शर्मिन्दा होने का प्रश्न नही है । एक प्रबुद्ध स्त्री समुदाय के प्रति बेखौफ , साहसी अन्दाज़ मे गाली देते हुए राय साहेब से आप शर्मिन्दा होने की उम्मीद नही कर सकते। यह तो रगों मे जो दौड़ता है वही ज़बान से फूट पड़ता है वाला मसला है।इतनी छीछालेदर के बाद उन्होंने अकेले मे गम गलत करते हुए कितनी गालियाँ लेखिकाओं को दी होंगी मै कल्पना कर सकती हूँ।झूठ ही शर्मिन्दा न हों , बस खुद को काबू मे रखें इतनी ही उम्मीद मुझे है।सदियों की सत्ता उखड़ती देख कर कोई भी बौखला सकता है, प्रलाप कर सकता है।शर्मिन्दा होकर विभूतियों की निर्मिति बदल जाएगी यह सोचना दिवास्वप्न ही है ।जब तक समाज की ही निर्मिति नही बदल जाएंगी तब तक ऐसी भाषा का प्रयोक्ता भी नही बदलेगा और लक्ष्य भी !

23 comments:

शेरघाटी said...

सदियों की सत्ता उखड़ती देख कर कोई भी बौखला सकता है, प्रलाप कर सकता है।शर्मिन्दा होकर विभूतियों की निर्मिति बदल जाएगी यह सोचना दिवास्वप्न ही है ।जब तक समाज की ही निर्मिति नही बदल जाएंगी तब तक ऐसी भाषा का प्रयोक्ता भी नही बदलेगा और लक्ष्य भी !

बिलकुल सही!!!

समय हो तो पढ़ें
ख़ामोशी के ख़िलाफ़ http://hamzabaan.blogspot.com/2010/08/blog-post_08.html

शहरोज़

anshumala said...

मै भी हमेशा यही कहती हु की ये एक दिन में बने विचार नहीं है हजारो साल पुराने है अभी जाने में समय लगेगा पर ये विचार और शब्द सिर्फ स्वतन्त्र होती और अपने स्वाभिमान को जगाती नारी के लिए नहीं है ऐसा तो हर नारी के लिए किया जाता है यदि आज नारी अपनी बात कहने की हिम्मत न कर रही होती और पुरानी परम्परा के अनुसार जी रही होती तो भी उसके लिए यही विचार और शब्द रखे जाते कहे जाते | ये सब कुछ हमारी स्थिति बदलने के कारण नहीं है उनकी सोच ही ऐसी है |

रेखा श्रीवास्तव said...

कितनी सदियाँ तो गुजार चुकी हैं, जबान कर लगाम वे खुद क्या लगायेंगे ऐसी ही लानत मलानत के काबिल है ऐसी मानसिकता वाले लोग. शायद वे अपने घर कि चाहरदीवारी में रहने वाली औरतों के प्रति ऐसी ही मानसिकता रखते होंगे. कहते हैं शिक्षा और परिपक्वता से आदमी में शालीनता आती है लेकिन यहाँ तो कुछ और ही दिखलाई दे रहा है. शायद ये मानसिकता कभी नहीं बदलेगी - ये कुछ प्रतिशत पुरुष अहंकार के चलते खुद को स्वयंभू समझ बैठे हैं.

mukti said...

एक ओर तो राय जैसे लोग बेख़ौफ़ होकर औरतों के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं, और दूसरी ओर प्रबुद्ध माना जाने वाला एक पुरुषवर्ग उस पर लीपापोती कर रहा है. अगर उन्होंने ये बातें जबान फिसलने पर कही हैं, तो उसे कई बार दोहराते ना जाते और मुस्कुरा-मुस्कुराकर अपनी बातों को दोहराने वाले इंसान से कोई माफ़ी की उम्मीद कैसे कर सकता है.

neelima sukhija arora said...

सुजाता,बहुत दिनों से इस मुद्दे को बहुत क्लोजली वाच कर रही थी, एक इतना बड़ा तथाकथित लेखक जो एक यूनिवर्सिटी में कुलपति जैसे पद पर है, क्या वो नहीं जानता कि पब्लिक स्पेस में उसे कैसे बिहेव करना है, कैसे शब्दों का प्रयोग करना है। खासतौर पर तब जब ये शब्द लिखित में जा रहे हों, क्या ऐसा हो सकता हो कि उसे यही न मालूम हो कि वो किन शब्दों का प्रयोग कर रहा है। ..उस पर से तुर्रा ये कि हम तो छिनाल शब्द का प्रयोग इस मायने में किए थे और इस मायने में नहीं। सचमुच तरस आता है इन लोगों की बुद्धि पर , जिनके पास कुछ और नहीं बचता तो बस वही बिलो द बैल्ट हमले शुरू कर देते हैं, और सही कहती हैं आप, सदियों के बाद इन लोगों को ऐसे (कु)संस्कार मिले हैं, इन्हें जाने में भी तो सदियां लगेंगी।

kailash said...

farak padana chahiye sujata,aisi bat kahnevala phir vah chahe lafnga ho ya vc. hai to antat stri-dalit virodhi mansikata vala.

RAJAN said...

purush ki ye aadat hai ki wo stree ko bhi abhivyakt nahi hone dena chahta.jab tak purush uske streetva,uski abhivyakti se darta rahega tab tak uski jubaan yun hi phisalti rahegi.waise is darr ka koi ilaaj nahi hai kya.?

'अदा' said...

किसी भी जानवर की प्रवृति वही होती है ...जो उसे बचपन से मिली हो...फिर चाहे वो इन्सान रुपी जानवर ही क्यूँ न हो....
गन्दा खून ऊंचा ओहदा पा लेने से नहीं साफ़ हो जाता ...ये कुलपति की धमनियों में दौड़ रहा हो या राष्ट्रपति की धमनियों में ....जब अपनी पे आता है तो अपना असली रंग ही दिखाता है....इस राय ने भी वही दिखाया ..जो इसकी माँ ने पिलाया...

Anonymous said...

I am late here as usual but I am glad I am here to see the fall from grace of a so called intellectual. It was okay when male poets described female desire and sexuality during ritikal but it is unacceptable when women word their desire and sexuality. For these so called intellectuals a woman should only be defined and designed through male gaze.

Sujata,
Congratulations for such a wonderful post.

@Ada,

Why blame mother? It is like double victimization. Boys usually model their fathers to imbibe models of masculinity, mothers only reinforce what fathers and society want them to.

Peace,

Desi Girl

RAJAN said...

ada ji se asahmat.maa ke sanskaron ka itna hi asar hota to duniya me koi purush kabhi bhi mahila virodhi. na hot.

Anonymous said...

इस राय ने भी वही दिखाया ..जो इसकी माँ ने पिलाया...
I object to such comments on woman

RAJAN said...

desi girl se bhi asahmat.agar koi purush is tarah ki harkat karta hai to isse ye thode hi saabit ho jata hai ki uska pita bhi aisa hi raha hoga.

daddudarshan said...

एक बार किसी महिला को कोई पुरुष अपनी मर्दानगी दिखा रहा था | अपनी आदत के अनुसार सारी गालियाँ देने के बाद जब उस पुरुष ने महिला को छिनाल कहा तो उसकी माँ ने बढ़ कर मोर्चा सम्हाला | माँ कहने लगी ,"औरत तो जन्मजात छिनाल होती है ;छिनाल न होती तो तुम दुनियां में कैसे आते ?" पुरुष पानी-पानी हो गया | उसने तुरंत उस महिला से माफ़ी मागी ,और आगे से ऐसा न करने की कसम खाई | लगता है कि कुलपति 'राय' को उनकी माँ ने ये संस्कार ही नहीं दिए कि वो किसी स्त्री का सम्मान कर सकें | ऐसा भी नहीं है कि इसके लिए कोई महिला ही जिम्मेदार है | यदि माँ ये सब बताना भूल भी गयी तो दुनियां से या अपने विवेक से सीखना चाहिए था | लेकिन 'सामंतवादी-सोच', ये सब भुला कर 'धमंड' को सर्वोपरि रखती है |
समसामयिक लेख के लिए बधाई | धन्यवाद |

दीपा पाठक said...

बहुत संतुलित पोस्ट है सुजाता। सही कहा आपने.... बाकी कुछ नहीं करना है, बस यह कि पब्लिक में क्या बोला जाए गुणीजन इसका थोड़ा सा प्रशिक्षण ले लें तो कोई समस्या ही न रहे. ...न उनके लिए न उनसे माफी मांगने वालों के लिए।

Anonymous said...

@Rajan,

You are right not all models of masculinity are learnt at home from fathers but definitely quite a few. The socialization practices of caregivers definitely influence the ideas about gender, gender roles, gender expectations, gender entitlement and gendered privilege. Reseacrh has shown there is a generational cycle of abuse. The sons of abusive fathers pick up cues how to treat women especially those intimately related to them and daughters of abused mothers learn how to be victimized. Even then there is a miniscule population of men and women who try to break and end this generational cycle of abuse.

we know the fault lies with the concept of masculinity it self. and femininity as defined by male gaze.

Uttekar, Bella Patel, M.E. Khan, Nayan Kumar, Sandhya Barge and Hemlata Sadhwani. “Experience of Family Violence: Reflections From Adolescents in Uttar Pradesh, India.” Bott Ed. 159-61.

Bott, Sarah, Shereen Jejeebhoy, Iqbal Shah and Chander Puri. “Towards Adulthood: Exploring the Sexual and Reproductive Health and Adolescents in South Asia.” Geneva: WHO 2003.

For more references please email me at girlsguidetosurvival@gmail.com

Peace,

Desi Girl

Anonymous said...

nice blog..
acha laga aakar.....
Meri Nayi Kavita par aapke Comments ka intzar rahega.....

A Silent Silence : Zindgi Se Mat Jhagad..

Banned Area News : 'I am ok with Hampshire's decision': Pietersen tweets

अनूप शुक्ल said...

सही लिखा है।

kushwaha said...

aap ka yah bat behad achchhi hai ki aurat ko s.amanti bicharo ne hi banaya hai pahale aadim yug me sab barabar ki aahmiyat thi tabhi maa ke nam se bans chalta tha gulam yug me aak aak ki 6000 aurate thi aaj bhi aurat ki kuchchh jagaho par yah easthit hai porn site,aadala badli open sex club aarat swam hi badlegi purush to sosar karega

Mired Mirage said...

सुजाता बहुत ही सही व बढिया लिखा है।
घुघूती बासूती

sweatha said...

Your writting could change the world that you want. Express your thoughts!!. Politics , Business , Entertainment , Sports & Games , Life & Events ,and Health what else?. Meet your like minded here. The top social gathering in one place all the top notches meet here. It is not about win the race, participation is all matters. We proud inviting you to the the internet's best Social community. www.jeejix.com .

आर. अनुराधा said...

बहुत देर से यहां आना हुआ हालांक् इस मुद्दे पर लगातार नजर थी। सबसे बुरी बात तो यह है कि जो व्यक्ति एक महत्वपूर्ण पद पर हैस उसके मातहत कई लड़कियां-औरतें छात्राओं और शिक्षिकाओं के रूप में हैं और जिनकी जिम्मेदारी समाज में परिष्कार लाना है (शिक्षा के जरिए) वे खुद परिष्कार की सख्त दरकार रखते हैं। ऐसे में वे उस निर्णयकारी पद पर रह कर और कितनी बार गैर-जिम्मेदाराना बातें, हरकतें करेंगे और कब तक उन्हें यह करने दिया जाता रहेगा, सिर्फ एक माफी की कीमत पर।

शिक्षा संस्कार लाती है। पर इस अति-शिक्षित और शिक्षा के प्रोफेशन में आ चुके व्यक्ति के पास संस्कार नहीं हैं, इससे किसी को कोई परेशानी नहीं दिख रही है, जो निर्णय की ताकत रखते हैं।

पर एक अच्छी बात यह हुई है कि इसी बहाने स्त्री विमर्ष की एक और सतह पर चर्चा तो हुई, भाषा में पुरुषवादी रवैये की तरफ कई लोगों का ध्यान गया और थोड़े संवेदनशील लोगों ने समझा कि दुराचार और स्त्री की प्रताड़ना सिर्फ सारीरिक और मानसिक नहीं, भाषिक भी होती चली आ रही है, सदियों से, जब से भाषा का जन्म हुआ। पर पुरुष की सोच सेसंचालित अब की दुनिया में किसी ने इस करह सोच कर नहीं देखा था कि बाषा भी कैसे स्त्री के खिलाफ चलती है। चलो, ॉइस बुराई से यह अच्छाई तो निकल कर आई, हालांकि यह विमर्ष ज्यादा दूर पहुंच पाएगा, इसमें मुझे थोड़ा शक है। पर फिर--- कील पर हर चोट का कुछ तो असर पड़ता है।

neelima garg said...

I READ THAT ARTICLE RECENTLY . TRUELY DIRTY LANGUAGE....

kobta kumar said...

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