Tuesday, March 29, 2011

मेरी 'ना' मे है 'ना' no means NO

दुनिया बेचारी सोच सोच कर तो नही पर कह्ते कहते हारी कि स्त्री को ईश्वर भी नही समझ सकता ! स्त्री दूसरों द्वारा की गयी अपनी व्याख्याओं से ऐसी आत्ममुग्धा नायिका हो गयी कि स्वयम भी कभी कभी कह उठती कि हाँ ! मुझे कोई नही समझ सकता।स्त्री पहेली है , रहस्य है ,कुट्टनी लीला ,तिरिया चरित्र .......ब्रह्मा भी न जान पाए । आखिर ब्रह्मा भी पुरुष ठहरे :)
मै उकता गयी हूँ यह सुन सुन कर ।एक ऐसे ज़बरदस्त इमेज मे स्त्री जाति कैद हो गयी है कि मै अकेली निकला चाह कर भी निकल नही पाती।एक छात्रा ने अपना दुख बांटा - कि बचपन से ही , घर से ही कभी हमे न बोलना नही सिखाया जाता , इसलिए जब कालेज मे आप बहस के लिए उकसाती हैं तो भी हम लडकियाँ ज़बान नही खोल पातीं।"न" कहना उनकी ट्रेनिंग का हिस्सा नही है, समाज उनकी न को न सम्मान देता है न स्वीकृति , बल्कि हतोत्साहित ही करता है।'अच्छी' की छवि मे जबरन कैद की जाने वाली लडकी के लिए अबोधता , नादानी , नासमझी कैसे महत्वपूर्ण मूल्य हैं यह बताने की ज़रूरत नही।हमेशा उदाहरण देती आई हूँ - आप अपने लड़के की शादी के लिए लड़की देखने जाएंगे तो यह वाक्य कभी सुनना पसन्द नही करेंगे कि -हमारी लडकी बहुत समझदार है । हाँ , गऊ ,सीधी ,सादी , भोली ....यह सुन कर आप धन्य हो जाएंगे !
तो कुल मिलाकर अपनी बात कहने की आज़ादी नही है , ऐसे बात कहने की आज़ादी नही है जिससे अच्छी की इमेज आहत होती है ,स्त्री 'गुलाम' वंश से है । गुलाम का ख्वाहिशें रखना समाज को मंजूर नही ,इसलिए स्त्री की भाषा में ऐसी परतें आ गयीं , ऐसे घुमाव और रहस्य आ गए । वह जब जब 'हाँ' कहना चाहती थी तब भी उसे ना कहना पडा और जब 'ना' कहना चाहती थी तब भी उसे हाँ कहना पडा । अब ऐसे मे बॉलीवुड वाले जब ऐसा गाना बनाएंगे जिसमे काजोल कहेगी - जान लो ऐ जाने जाँ मेरी ना में भी है हाँ .......(शायद यह सलमान के साथ आयी काजोल की एक फिल्म का गीत है , नाम मै याद नही कर पा रही) तो बच्चियाँ इसे आत्मसात कैसे न करेंगी ।
मुझे हार्दिक खुशी होगी कि 'ना' कहना लडकियाँ सीख पाएँ !यह आसान नहीं । अब तक ना मे हाँ वाली मानसिकता को अपने जी पर पत्थर रखने होंगे , कलेजा मज़बूत करना होगा। फिलहाल मै बलपूर्वक कहना चाहती हूँ कि -मेरी ना का मतलब ना है और मेरी चुप्पी मेरी स्वीकारोक्ति नही है ।

Saturday, March 19, 2011

मां क्या है, हम क्या हैं?

टीवी पर एक कार्यक्रम चलता है, रियालिटी शो- मां एक्सचेंज। इसमें दो परिवारों की माताएं आपस में घर-परिवार बदल लेती हैं, एक हफ्ते के लिए। इसके दो-तीन एपीसोड देखने को मिले। शुरुआती एक कार्यक्रम में हाइ प्रोफाइल पूजा बेदी थीं तो कल के कार्यक्रम में गांव और शहर की दो महिलाओं को एक-दूसरे के घर में भेजा गया था।

कार्यक्रम कमर्शली जैसा भी हो, उसमें एक बात बार-बार नजर आती रही- हर देखे हुए एपीसोड में हर प्रतिभागी की दिक्कतें खाने या किचन और सफाई के ही इर्द-गिर्द पसरी हुई दिखाई दीं। पूजा बेदी थोड़ी नफासत से, तो कोई और ज्यादा बदतमीजी से अपने अपनाए हुए नए परिवार के मकान/रहवास की 'गंदगी' और अस्वच्छ आदतों पर खीझती है, कुढ़ती है या झगड़ती है। इसके अलावा खाना कौन बनाएगा, क्यों नहीं बना, कब बनेगा क्या और किस तरह बनेगा (इसमें सेहत की चिंता कतई शामिल नहीं है) जैस मसले उनके सामने होते हैं, हफ्ते-भर के इस प्रवास में। ताजा कार्यक्रम में एक परिवार की सास भी शामिल थीं, जिनकी खासियत थी, अपनाई हुई बहू के काम में मीन-मेख निकालना, बजाए उसे पहले से कोई सीख देने या अपनी आदतें-जरूरतें बता देने के।

नाम के मुताबिक इन भागीदारों में 'मां' वाला पहलू तो दिखाई ही नहीं पड़ता, बस घरेलू कर्मी ही बनी हुई हैं सब, भले ही इसकी कीमत पर घर के बच्चों को ड़ांट-फटकार लगानी पड़े या उन छोटे-बड़े बच्चों को, उनकी जरूरतों को नजरअंदाज करना पड़े।

क्या ये कार्यक्रम हमारे व्यवहार को एडिट करके एक-तरफा बना कर दिखाए जा रहे हैं या ये ही सच्चाई है? अगर यही सच है, तो क्या ज्यादातर भारतीय औरतों के जीवन में इससे ज्यादा कुछ भी सोचने-करने को नहीं है? अगर ये रियालिटी शोज़ हमारा अपना अक्स दिखा रहे हैं तो क्या हमें इसमें कुछ भी विद्रूप नहीं दिखाई पड़ता?

Wednesday, March 9, 2011

8 th March 2011

Happy Women's day to all !!!
where are all our friends ?

वो खुद तय करते   है
मंजिल आसमानों  की ,
परिंदों  को नहीं दी जाती
तालीम उड़ानों  की .............