Saturday, July 30, 2011

For a change...

Let us talk of  hina, mehndi , sawan , barkha, jhule and teej ......


रुकी रुकी सी बारिशों के बोझ से दबी दबी

 झुके झुके से बादलों से -
धरती की प्यास बुझी........

Sunday, July 24, 2011

हंगामा है क्यों बरपा

किन्हीं कपड़ों में महिलाओं के शरीर के कुछ हिस्से कम या ज्यादा दिखाई पड़ते हैं, इससे समाज (स्त्री-पुरुष दोनों- ज्यादा पुरुष, थोड़ा-बहुत स्त्री) इतना विचलित होता क्यों दिखता है! क्या सबके पास अपने-अपने शरीर नहीं हैं? दोनों के शरीरों में क्या और कितना फर्क है कि वह किसी को इतना रहस्यमय लगे कि वह दिख भी जाए तो रोमांच हो उठे! स्त्री की एड़ी दिखे या कलाई, गलती से कपड़ा उलटने से दिखे या जान बूझ कर खुले-आम दिखाई जाए, सभी पुरुष की नजर में है और सभी पर सीसी टीवी कैमरे की तरह लगातार नजर रखी जा रही है।

स्त्री और पुरुष के शरीर में मूल फर्क सिर्फ देखने वाले की नजर में है। और अगर कपड़े पहनने के बाद तथाकथित रहस्य और गहरा हो जाता है कि जाने उसके पीछे-नीचे क्या है, तो भी यह देखने वाले के दिमाग और सोच की समस्या है।

Your own mind is a sacred enclosure into which nothing can enter except by your permission. – Arnold Bennett


ऐसिहासिक प्रमाण बताते हैं कि गर्म इलाकों में हमारे बूढ़-पुरनिए कुछ नहीं या न्यूनतम कपड़े पहनते थे। उसमें शरीर को छुपाने की नहीं बल्कि बाहरी कारकों से शरीर को सुरक्षा देने की बात थी। बल्कि आज भी पूर्वोत्तर, अंडमान, दक्षिण के मूल निवासी कपड़े नहीं पहनते। हां, कुछ मोती-मनका या पेड़-पौधों के हिस्सों से अपने शरीरों को सजाते-संवारते जरूर हैं।

जब इंसान अफ्रीका के गर्म इलाकों से ठंडे इलाकों की ओर बढ़ा तो मौसम की मार और चोट-खरोंच से बचने के लिए उसने जानवरों के चमड़े लपेटने शुरू किए फिर पेड़ों की छाल से, भेड़-बकरियों के फर से, ऊन से, कपास के धागों से बुन कर अपने शरीर को ढकने के लिए सुविधाजनक सामग्रियां बनानी शुरू कीं। मकसद था, ठंड से बचना, जंगलों-झाड़ियों, पत्थरों, हवाओं, जानवरों की चोट से, आग से, कीड़ों-मकोड़ों, जीवाणुओं, संक्रमणों से, जहरीले रसायनों, धूल-मिट्टी से, हथियारों से शरीर को बचाना, सुरक्षा देना।

फिर, जैसी कि मनुष्य और दूसरे जीवों की भी आदत होती है, कपड़ों के आधार पर भी वर्गीकरण होने लगे। ज्यादा शक्तिशाली, बलशाली, समृद्ध, सक्षम, समर्थ, सुदर्शन...। जब मानव ने बसना शुरू किया, परिवार बनाया तो उस समय दूसरे परिवारों के साथ कई बातों पर प्रतिस्पर्धा थी, संघर्ष भी था। ऐसे में कपड़े और पहनावा भी शक्ति और दूसरे मूल्यों से जोड़ा जाने लगा और उसके नियम-से बनते गए।

If most of us are ashamed of shabby clothes and shoddy furniture, let us be more ashamed of shabby ideas and shoddy philosophies…- Albert Einstein


कभी कम पहनना ताकत और शान की निशानी बना तो कभी ज्यादा पहनना। अपने परिवार, समूह, समुदाय की पहचान बताने और बनाने के लिए भी खास प्रकार के कपड़े पहने या न पहने गए। जब कपड़े भी परिवार-समाज में ऊंच-नीच के तहत बंट गए तो इसमें विनय-शील से लेकर दोस्ती-दुश्मनी और प्रेम-राग तक के प्रतीक नत्थी होते गए।

There is much to support the view that it is clothes that wear us and not we them; we may make them take the mould of arm or breast, but they would mould our hearts, our brains, our tongues to their liking. - Virginia Woolf


जो इस वर्गीकरण में नीचे हुए, वे ताकतवरों के लिए अपने ताकतवर होने का अनुभव कराने, अहं की तुष्टि- मनोविनोद, सेवा-सहूलियत का भी साधन रहे। दूसरी तरफ जर-जमीन की तर्ज पर जोरू भी संपत्ति की कतार में ला दी गई। तब उसे सुरक्षित रखने, दूसरों से छुपाने-ढकने और साथ ही संवार कर रखने का चलन चला। तब उसके लिए कपड़ों की ‘मर्यादाएं’ तय की गईं।

धीरे-धीरे कपड़ों, उनके प्रकार-आकार, रंग के सामाजिक-सांस्कृतिक अर्थ तय हो गए। लेकिन एक समाज-समुदाय में किसी पहनावे के एक कारक का जो अर्थ था, दूसरे समुदाय या समुदायों में भी वही अर्थ हो, यह भी कतई जरूरी नहीं था। भारत में कुछ सदी पहले तक भी कम कपड़े पहनना बेहद आम था। फिर ठंडे इलाकों से पुर्तगाली, मुगल, अंग्रेज आए और उन्होंने अपने वहां के ज्यादा कपड़े पहनने के चलन को यहां भी जारी रखा और हुकूमत करते हुए उसे लागू भी किया और राजा की देखा-देखी प्रजा के अपनाने से, सांस्कृतिकरण के जरिए प्रचलन भी शुरू किया।

आज भी कई तौर-तरीके अलग-अलग देश-समाज में भिन्न अर्थ रखते हैं। भारत में महिलाओं का निस्संदेह शालीनतम परिधान साड़ी नाइजीरिया में अश्लील कहलाता है और इस पर पाबंदी का कानून बनाने की कवायद चल रही है। कानून बन गया तो वहां साड़ी पहनने वालों को तीन महीने की जेल या 100 डॉलर जुर्माना!

लब्बो-लुबाब यह कि कपड़े हमने बनाए और इसे अर्थ भी हमने दिए और अपनी मर्जी से दूसरों के लिए भी अर्थ तय कर दिए। कपड़े पहनने का मूल मकसद कहीं गायब हो गया। महिलाओं के लिए यह एक और पाबंदी, बंधन का सबब बना, उनकी गुणवत्ता जांचने का एक और पैमाना बना। इन्हीं अधकचरे पैमानों पर औरतें जिस-तिस द्वारा, जब-तब नापी जाती हैं और उन पर फैसले जारी होते रहते हैं। उसी का नतीजा है कि समाचार के कारोबार के अलावा भी हर किसी क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के काम का आकलन उनके कपड़ों पर ध्यान दिए बिना नहीं किया जाता। उनका परफॉरमेंस बनाम उनके कपड़े वाला सवाल इसीलिए महत्वपूर्ण बनाकर पेश किया जाता है।

और यह पैमाना घर पर, परिवार में भी पूरी तरह सक्रिय रहता है। बहन कॉलेज में क्या और किन रंगों के कपड़े पहन रही है, पत्नी किस मौके पर क्या पहने- पारिवारिक आयोजनों में अनिवार्यतः साड़ी, बच्चे के स्कूल के पेरेंट-टीचर मीट में ट्राउजर्स, सिनेमा-पिकनिक के लिए जींस... (ये पैमाना दिल्ली के मध्य वर्ग का है, दूसरी जगह दूसरा हो सकता है।) सब पैमाने पर नापा जाता है और उन परिणामों के आधार पर ही महिला के कुल व्यक्तित्व का आकलन होता है।

औरतों के कपड़े पुरुषों के लिए चिंता-विचार का मुद्दा हैं। पर क्या जरूरी है कि उस अरचनात्मक, नकारात्मक सोच का ख्याल करने में महिला अपनी ऊर्जा खर्च करे! कतई नहीं। और जड़ की बात तो यह है न कि पुरुष महिलाओं के कपड़ों पर (या कपड़ों की अनुपस्थिती पर) इतना ध्यान क्यों देते हैं। घर में जो अपनी महिलाओं को ढंक-तोप कर चलने की सलाहें देते हैं, खुद समुद्र किनारे नहा रहे विदेशी सैलानियों को आंखें गड़ाकर बेशर्मी से देखते हैं। अच्छा है कि वे विदेशी इन देसी नजरों की परवाह नहीं करते और कहीं न कहीं ऐसी घूरती आंखों को खिसियाने पर मजबूर करते हैं।

काश ऐसा हो कि औरतें इतना बदन उघाड़ें, इतना उघाड़ें कि पुरुषों की आंखें देख-देख कर थक जाएं, उकता जाएं। उन्हें ऐसे शरीर देखने की आदत हो जाए। और तब वे ऐसे घूरना बंद करेंगे, दूसरों के कपड़ों की कमी-बेशी की चिंता करना छोड़ काम के काम में ऊर्जा लगाएंगे।

Saturday, July 9, 2011

टीवी चैनलों पर महिला ऐंकरों के कपड़े और उनकी समझदारी समानुपातिक हैं?


मीडिया खबर नाम की एक वेबसाइट है जो मीडिया के भीतर की, मीडिया के लोगों की खबर देती है। उसकी खबरें कैसी हैं, उसका प्रेजेंटेशन कैसा है, यह तो हर कोई खुद तय करे, पर उसकी एक ताजा खबर बेहद सटीक मुद्दे को उठाती है। वह है- टीवी चैनलों की ऐंकर न्यूज ऐंकर हैं या फैशन मॉडल। न्यूज़ ऐंकर या न्यूज़ मॉडल

इस खबर की आखिरी कुछ पंक्तियां हैं- "दरअसल विरोध बदलाव का नहीं. मॉडर्न और वेस्टर्न ड्रेस का भी कोई विरोध नहीं. टेलीविजन न्यूज़ विजुअल माध्यम है. इसलिए स्क्रीन प्रेजेंस भी बेहतर होना चाहिए. इसके लिए जरूरी है कि न्यूज़ एंकर खूबसूरत दिखे . लेकिन खूबसूरती के पीछे एक पत्रकार का दिमाग भी जरूर हो. महज छोटे कपड़े पहनाकर कुछ पलों के लिए दर्शकों को अपने यहाँ रोकने की प्रवृति पत्रकारिता, महिला सशक्तिकरण और खुद न्यूज़ इंडस्ट्री के लिए खतरनाक सिद्ध होगा.

न्यूज़ चैनल देखने के लिए दर्शक न्यूज़ चैनल पर आता है. इसलिए दर्शक को यह एहसास होना चाहिए कि वह न्यूज़ चैनल ही देख रहा है. लेकिन कई बार न्यूज़ चैनल देखते हुए महसूस होता है कि हम न्यूज़ चैनल नहीं एमटीवी या चैनल - V देख रहे हैं. ऐसे में मन में यह सवाल कौंधता हैं कि यह न्यूज़ एंकर हैं या न्यूज़ मॉडल ?"

इस बहस को यहां आगे बढ़ाया जा सकता है। इसे पढ़ कर आपके दिमाग में कौनसे विचार कौंधे? आप इस स्थिति का खुलासा कैसे करती/करते हैं?

अपनी टिप्पणी जरूर दें।

Friday, July 8, 2011

इस पीड़िता का कोई नाम नही......जज साहब !


अरविंद जैन

अपीलकर्ता मंजू (मां) लेडी हार्डिग मेडिकल कॉलेज के मैटर्निटी वॉर्ड में भर्ती थी। उसने 24 अगस्त 2007 को दोपहर करीब 12:10 बजे कन्या को जन्म दिया। उसी दिन वॉर्ड में बतौर असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट शकुंतला अरोड़ा थीं। वे कन्या के जन्म की गवाह थीं। अपीलकर्ता मंजू को लेबर रूम से निकालकर वॉर्ड में शिफ्ट किया गया। शाम करीब 4:30 बजे बच्ची को मैटर्निटी वॉर्ड में तैनात स्टाफ नर्स बिंदू जॉर्ज ने जच्चा को सौंप दिया। सायं लगभग साढ़े छह बजे बच्ची संबंधित खबर से अस्पताल में खलबली मच गई। नर्स संगीता रानी कहती है, मुझे डय़ूटी पर मौजूद इंटर्न डॉक्टर ने फोन पर बताया- सिस्टर! जल्दी आओ, बच्ची बीमार है।पीएनसी इंटर्न ने दोषी मंजू की बच्ची को उठाया और जल्दी-जल्दी उसे ठीक करने में जुट गई। मैंने एक स्टूडेंट नर्स के जरिए सीनियर रेसिडेंट डॉ. निधि को भी बुलवाया। डॉक्टर ने बच्ची के गर्दन और नाक पर लाल व नीले रंग का निशान दिखाते हुए मुझे और सभी स्टाफ नर्स को दिखाया। उसके बाद डॉक्टर निधि ने पाया कि कन्या जीवित नहीं है। उसके बाद पुलिस को सूचना दी गई।
पोस्ट-मॉर्टम रिपोर्ट
पुलिस को सूचना देने के बाद इंवेस्टिगेटिंग ऑफीसर ने कन्या के मृत शरीर को कब्जे में ले लिया और तहकीकात करने वाले दस्तावेजों को भरने के बाद हॉस्पिटल के मुर्दाघर में पोस्ट-मॉर्टम के लिए भेज दिया। डॉ. अभिषेक यादव ने 26 अगस्त, 2007 की सुबह कन्या के मृत शरीर का पोस्ट-मॉर्टम किया और रिपोर्ट तैयार की। डॉ. यादव ने कन्या के शरीर पर आठ बाहरी चोट का पोस्ट-मॉर्टम रिपोर्ट में उल्लेख किया। उसमें मस्तिष्क में भारी मात्रा में फ्लूड्स के जमाव से सूजन आने के साथ कंजस्टेड भी बताया गया। इसके अलावा गर्दन में खून का परिस्त्रवन (एक्स्ट्रावैशन), कारोटिडशेथ के आसपास सॉफ्ट टिशू और लैरिंक्स मसल्स भी क्षतिग्रस्त पाई गई। ास नली और ब्रॉन्की भी कंजस्टेड बतायी गयी। दोनों फेफड़े कंजस्टेड होने के साथ पैटेशियल हैमरेज इंटर लेबर सर्फेस पर पाया गया। पैटेशियल हैमरेज हार्ट के वेंट्रिकुलर सर्फेस में था। लिवर, स्प्लीन और किडनी भी कंजस्टेड थी और डॉक्टरों की राय थी कि इस तरह की मौत गला घोंटने (एस्फिक्सिया) से होती है।

मंजू बनाम राज्य (2010 सीआरएल. एल. जे. 2307) केस में एक मां ने अपनी ही कन्या की भ्रूणहत्या जैसे दिल दहला देने वाला जुर्म किया। इसमें दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति प्रदीप नंद्रजोग और न्यायमूर्ति सुरेश कैत ने फैसले में सहानुभूतिपूर्वक लिखा, ‘वह नवजात कन्या थी और उसका इस धरती पर आना उनके लिए आफत थी। माता-पिता के लिए चिंता का सबसे बड़ा मुद्दा उसकी शादी थी। नवजात कन्या उनके लिए मजबूरी के सिवाय कुछ नहीं थी। उसकी शादी का ख्याल जैसे उन्हें बर्बाद करने के लिए काफी था। गरीब होना मामूली चीज थी। समाज ने भी पैदा होने से पहले ही उनकी मृत्यु को शोकपत्र पहले ही लिख डाला था। उसकी मां ने तो सिर्फ उसे जगजाहिर किया था। यह एक बेनाम नवजात की दास्तान है। संभवत: यह पहला फैसला है, जिसमें किसी पीड़ित को उसके नाम से संबोधित नहीं किया जा सकता है।न्यायमूर्ति नंद्रजोग ईमानदारी से मानते हैं, ‘मानवता इंसानी जिंदगी से भी बढ़कर है, इसका हमें पता नहीं। मरने के बाद क्या होता है, इसका भी हमें कुछ नहीं पता पर यह मान्यता है और स्वीकृति भी कि मानवीय व्यक्तित्व इंसानी जाति के रूप में आगे तक जाती है। लेकिन कन्या के लिए तो यह भी अस्वीकार्य है।



न्यायमूर्ति नंद्रजोग और न्यायमूर्ति कैत को इस तथ्य का बखूबी पता था कि न्यायिक दायरे में सत्यमेव जयतेका बड़ा असर होता है और सुप्रीम कोर्ट अपने न्यायिक क्षेत्राधिकार के तहत यतो धर्मस्ततो जयतेयानी सिर्फ सच्चाई ही टिकती हैको मानकर काम करता है। न्यायाधीश नंद्रजोग ने फैसला लिखते हुए स्पष्ट किया कि हमारे न्यायिक अधिकार क्षेत्र के दूसरे शब्द नीति से जुड़े हैं और सुप्रीम कोर्ट का क्षेत्राधिकार न्याय करनेसे जुड़ा है। इसलिए सिर्फ सुप्रीम कोर्ट को ही भारतीय संविधान के अनुच्छेद- 142 के तहत संपूर्ण न्यायिक अधिकार प्राप्त हैं। इसलिए जहां तक माफी वाली एलिजाबेथ बुमिलर रचित पुस्तक है- आप सौ बेटों की मां हो सकती हैं।दहेज, बहू जलाना, कन्या भ्रूणहत्या- निजी अनुभवों के आधार पर शोधपरक दस्तावेज होते हैं। वास्तव में, ये उत्तेजित करते और विचारों में हलचल पैदा करने वाली पुस्तक है। 1986 से 2001 के बीच 50 लाख कन्या भ्रूणहत्याएं हुई, क्योंकि ये सब लिंग परीक्षण संबंधी मेडिकल से जुड़े पेशेवरों के हाथ में था। 1994 में संसद ने पीएनडीटी (प्रीनेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक) कानून बनाया, जो पैदा होने से पहले परीक्षण तकनीकों के दुरुपयोग का जवाब था। बावजूद इसके, सुप्रीम कोर्ट ने मई, 2001 में सरकार को इसे लागू करने का निर्देश दिया। फिर भी हालात की पहले जैसे हैं। कितने अपराधियों को सजा मिली? कानून बेमानी साबित हुआ है।
कन्या का हत्यारा कौन?
आत्मा में झांकने के क्रम में न्यायमूर्ति नंद्रजोग ने खुद से सवाल किया, लेकिन, क्या अपील करने वाली मां एक ऐसे अपराध की जननी नहीं मानी जानी चाहिए, जिसे समाज ने निर्मित किया है। कन्या भ्रूणहत्या, मोहरे बनकर किया जाने वाली कृत्य है। क्या समाज के पापों का यही भुगतान है? क्योंकि, वह मां अनभिज्ञ है, गरीबी-रेखा से नीचे दयनीय माहौल में रह रही है। उसने अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा- 313 के तहत बांये हाथ के अंगूठे से अपनी निरक्षरता साबित की है। गरीबी-रेखा से नीचे बसर करती वह अपना झुग्गी-झोंपड़ी का पता बताती है। शायद ही वह अपनी आत्मा और शरीर को खंडित होने से बचा पायी हो या यह हकीकत साबित कर पायी हो कि उसका पति दैनिक वेतनभोगी है। हमारे सामने सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि यदि वह अपराध करने वाली नहीं है, तो समाज के पापों का वह भुगतान क्यों करे?’

माननीय न्यायमूर्तियों ने विश्लेषण किया कि अपीलकर्ता (मां) से संबंधित मेडिकल पेपर्स दर्शाते हैं कि उसके माता-पिता ने उसकी शादी मात्र 15 वर्ष की कच्ची उम्र में कर दी थी। इस अपरिपक्व उम्र में अपीलकर्ता (मां) बतौर गृहिणी और मां की भूमिका उसी सूरत में निभा सकती है, जब उसे कुछ सिखाया जाए और किसी दूसरे के कहे के अनुसार चला जाए। निस्संदेह, जब तक वह मां बनी होगी, कानून के मुताबिक वह वयस्कता की दहलीज पर पहुंच चुकी होगी। भले ही कहा जाए कि चाहे जिन भी परिस्थितियों में वह खुद के बारे में सोचने व आसपास के सामाजिक वातावरण से लड़ने के लिए परिपक्व हो गयी हो?
भारतीय समाज में कानूनी, सामाजिक और नैतिक माहौल पर गौर करने के बाद न्यायमूर्ति नंद्रजोग ने लाचार स्वर में कहा, ‘प्रतिक्रिया की प्रक्रिया खुद में इतनी अविवेकपूर्ण और एकतरफा है, जिसमें एक अनभिज्ञ और कमजोर के खिलाफ काफी कुछ हो जाता है।इस तरह एक अविवेकपूर्ण प्रक्रिया में कैसे एक अनभिज्ञ और कमजोर न्याय पर भरोसा और उससे उम्मीद करे?
कन्या के खिलाफ होने वाले अपराध विकृत सामाजिक पैमाने और वीभत्स सामाजिक सोच की देन हैं और अपीलकर्ता जो न सिर्फ झुग्गी में रहती बेपढ़ी- गरीब है और जिसकी शादी मात्र 15 साल में हो गई, वह कभी भी कोई जुर्म करने की साजिश खुद से नहीं रच सकती। वह तो उस शख्स के हाथों की कठपुतली भर है, जिसने उसे यह सब करने का हुक्म सुनाया या रास्ता दिखाया। आपराधिक न्याय पण्राली के जरिये कोई नियम क्यों नहीं तैयार किया जाता? माननीय न्यायमूर्तियों ने तब जानबूझकर क्रिमिनल रूल्स ऑफ प्रैक्टिस, केरल-1982 के नियम संख्या-131 को स्पष्ट कि उन सभी मामलों में, जिसमें कोई औरत नवजात शिशु की हत्या की दोषी बताई गई हो, हाई कोर्ट के जरिए सरकार को बताया गया है कि यहां सजा को कम करने या उससे जुड़े मामलों में रिकॉर्ड के लिए संबंधित कॉपियां गत्थी की जाएंगी। पर एक बार फिर हैरानी हुई कि केंद्रशासित क्षेत्र दिल्ली में आपराधिक मामलों में न्यायिक व्यवस्था की प्रभारी राज्य सरकार के रूप में ऐसी सरकार नहीं है और इसीलिए हमने दिल्ली सरकार को नवजात कन्या की हत्या की गुनाह महिला को कम से कम केरल राज्य में बने नियमों के मुताबिक मानने संबंधी सलाह दी।

अंतत: न्यायमूर्ति नंद्रजोग और न्यायमूर्ति कैत ने वकीलों के तर्क सुनने और गवाही से जुड़े सबूतों पर गौर करने के बाद नतीजा निकाला कि यहां शक की कोई वजह नहीं। कारण, दुर्भाग्य से कई उम्र की लड़कियों का गला दबाया जाता है और याचिकाकर्ता मां ने खुद कन्या भ्रूणहत्या संबंधी गुनाह किया और अपनी बच्ची की हत्या की।


जहां कन्या को मारना बड़ा पाप नहीं

न्यायाधीश नंद्रजोग ने साफ कहा कि भारत की जनता का नैतिक पतन होने का मतलब है कि भारत में सजा-संबंधी कानून कारगर नहीं है। इस तरह समझाने- बु झाने की नीति नाकाम हो चुकी है और कुशलता और काव्यमय ढंग से समझाया गया है कि दुनिया की उम्र काफी कम हो गयी है, इसके लिए महज आंकड़ों से इस तरह समझाया जा रहा है- दुनिया की आबादी बढ़ने में सिर्फ एक संख्या ही तो जोड़ी जाती है, दुनिया में औरत की आबादी में सिर्फ एक संख्या ही तो जोड़ने से काम चल जाता है, इस तरह एक संख्या कम करने से दुनिया की आबादी में वह कम हो जाती है, भारत में पुरुष-महिला के औसत आगे भी असंतुलित होना है, पैदा होने वालों के रजिस्टर में एक एंट्री भर ही तो हुई, इस तरह मृत्यु संबंधी रजिस्टर में एक ही तो कम हुआ! एक मुस्कराहट ही तो हमेशा के लिए छिन गयी!
अजन्मा बच्चा सुरक्षित होना चाहता है। धरती विकृत हो रही है और अजन्मा बच्चा ईर से प्रार्थना कर रहा है कि वे उसे शारीरिक, मानसिक और भावनत्मक रूप से सेहतमंद रखें|

न्यायमूर्ति नंद्रजोग ने टिप्पणी की, ‘कोई तार्किक व्यक्ति कन्या भ्रूणहत्या की तरफदारी नहीं करेगा। यह न सिर्फ दंडनीय अपराध है बल्कि ईर के प्रति पाप भी है। जिंदगी रूपी तोहफा मानवता के प्रति ईर का महानतम उपहार है। बच्ची की पैदाइश जीवन की पैदाइश है, यह अभिभावकों की ओर से दिया गया जीवन नहीं है लेकिन अभिभावक द्वारा दिया गया जीवन अवश्य है। व्यापक रूप से सामाजिक तरंगों पर गौर करें तो आने वाली ज्यादातर याचिकाओं में कन्या के खिलाफ क्रूरता ज्यादा दिखती है। इससे पता चलता है कि पुरुष के खिलाफ काफी कम मामले हैं : औसतन औरतों का सेक्स जैविक रूप से ज्यादा सशक्त है, फिर भी वह अल्पसंख्यक है। आजादी के साठ साल बीतने के बाद भी तथाकथित आधुनिक समाज कन्याओं को लेकर अपना रवैया नहीं बदल पाया है। चाहे गांव हो या शहर, शिक्षित हो या बेपढ़ा, धनी हो या निर्धन, हर जगह कन्या को लेकर प्रतिकूल हालात हैं। 21 वीं सदी में भी सामाजिक सोच का यह दुखद पहलू है।
आगे चलकर न्यायमूर्ति नंद्रजोग ने यह भी कहा, ‘इसका कारण कन्या की शादी के दौरान दहेज है। इसीलिए कन्या के साथ ऐसा बर्ताव होता है और पुत्र को इसीलिए पूंजी की तरह देखा जाता है। समाज भूल जाता है कि एक पुत्र तभी तक पुत्र है जब तक उसकी शादी नहीं हुई रहती लेकिन एक पुत्री ताउम्र पुत्री होती है।
अगर कन्या को लेकर आजादी के 60 साल की समयावधि में समाज का तथाकथित आधुनिकीकरण होने के बावजूद सामाजिक रवैये में बदलाव नहीं आया, तो फिर क्या रास्ता है?’ क्या न्यायिक तौरतरीकों में सामाजिक बर्ताव शामिल नहीं है? क्या न्याय दिलाने की संस्कृति में कोई अहम बदलाव आया है? इस अन्याय को होने से कैसे रोका जाए और वह भी तब, जब कानून के चीलों ने भी लाचारी से सवरेत्तम क्रिया-प्रतिक्रिया दी हो!

किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले माननीय न्यायमूर्तियों ने एक बार दोहराया- हमने साफ कहाहै कि अपीलकर्ता के प्रति सहानुभूति जैसी चिंता दर्शाने का अर्थ हमारी ओर से यह नहीं है कि हम कन्या शिशुहत्या को मानते हैं न कि कोई संगीन जुर्म। हकीकत यह है कि यह संगीन जुर्म है और दोषी के प्रति किसी प्रकार की हमदर्दी नहीं दिखाई जा सकती, सिर्फ इस तथ्य पर गौर हो कि दोषी खुद ही अपने निरक्षर, गरीबी और सामाजिक वंचना के कारण समाज की उपेक्षा का शिकार थी।

(लेखक सुप्रीमकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं)

Tuesday, July 5, 2011

देसी संस्कृति के ठेकेदार चेतें- सुरेंद्र प्रताप सिंह

सुरेंद्र प्रताप सिंह या एस पी सिंह। वही, आजतक वाले! नहीं याद आया..."तो ये थी खबरें आजतक इंतजार कीजिए कल तक..." अब तो अच्छी तरह याद आ गया होगा चश्मे वाला एक भाव-प्रवण पारदर्शी चेहरा जो अपने खास लहजे की हिंदी के साथ-साथ खबरें बेहतरीन ढंग से देने के लिए भी बेहद लोकप्रिय हुआ। शायद उससे ज्यादा पॉपुलर पत्रकार भारत ने नहीं देखा है। वे पत्रकारिता के पहले और आखिरी सुपर हीरो थे।

उन्हीं एसपी के आलेखों-साक्षात्कारों और आजतक की कुछ कड़ियों और उनके लिखे फिल्म 'पार' के संवादों के ट्रांसक्रिप्शन को एक किताब में समेटा गया है। 'पत्रकारिता का महानायक- सुरेंद्र प्रताप सिंह संचयन' का संकलन-संपादन आर. अनुराधा ने, यानी मैंने किया है। 27 जून को उनकी 14 वीं बरसी पर उनकी याद में आयोजित कार्यक्रम में इस किताब को प्रथम अवलोकन के लिए रखा गया।

महानायक पत्रकार सुरेंद्र प्रताप सिंह की रचनाओं का यह पहला संचयन बाजार में आ गया है। इसे राजकमल प्रकाशन ने छापा है। पेपर बैक में पृष्ठ संख्या है- 460 और कीमत है-250 रुपए। जल्द ही यह पुस्तक ई-खरीद के लिए भी उपलब्ध होगी। फिलहाल ईमेल कर यह पुस्तक मंगवाई जा सकती है। (marketing@rajkamalprakashan.com)

इसी पुस्तक में शामिल, इंडिया टुडे हिंदी के उनके नियमित कॉलम मतांतर (15 सितंबर 1993, मतांतर, इंडिया टुडे) में प्रकाशित इस लेख की पृष्ठभूमि अभी के बवली-मनोज प्रकरण से बिल्कुल मिलती-जुलती है। ऐसी घटना पर एसपी के विचार एकदम साफ थे। एस पी महिलाओं और समाज के पिछड़े तबकों के साथ खड़े रहने से कभी पीछे नहीं रहे। उनका यह लेख भी इसी का सबूत है।
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मुजफ्फरनगर के गांव खंदराबली में छह अगस्त की शाम सरिता और सतीश की नृशंस हत्या का मामला अब और जटिल हो गया है। जटिल इसलिए कि उस अमानवीय हत्याकांड को वे लोग जायज ठहराने की कोशिश कर रहे हैं जो समाज के एक वर्ग के नेता माने जाते हैं और जिनसे अपेक्षा है कि वे अपनी नेतृत्व क्षमता से इस देश और समाज को एक रहने योग्य समाज बनाएंगे।

प्रारंभ में जब यह समाचार मिला, तो अनेक लोगों ने यह कहा कि इस तरह का काम मध्ययुगीन समाज में ही संभव है, यानी इस अपराध को दरिद्रता, अशिक्षा और पिछड़ेपन से जोड़ दिया गया। कहने का तात्पर्य यह था कि आधुनिक नागर सभ्यता के पढ़े-लिखे समाज में यह कुकर्म संभव नहीं और न ही इसे समाज की मान्यता मिल सकती है। हालांकि तब भी यह विश्लेषण अति सरलीकरण का शिकार था। इस हत्याकांड में सिर्फ एक परिवार के लोग ही शामिल नहीं थे। भले ही वास्तविक हत्या तीन लोगों ने की हो पर उस हत्याकांड का फैसला एक पंचायत ने किया था। पंचायत यानी कम से कम पांच लोग तो उसमें होंगे ही- गांव के सबसे प्रभावशाली पांच लोग, वहां सैकड़ों की संख्या में गांव वालों ने अपनी आंखों के सामने होते हत्याकांड को निर्विकार भाव से देखकर उस पर अपनी सहमति की मुहर लगाई। इसलिए इसे यह कह कर खारिज नहीं किया जा सकता कि यह एक देहाती, पिछड़े और मध्ययुगीन समाज की प्रतिक्रिया थी। निश्चय ही इसकी जड़ें कहीं बहुत गहरी हैं।

किसानों के नेता तथा जाट समुदाय के सिरमौर महेंद्र सिंह टिकैत ने जब बर्बर हत्याकांड को जायज ठहराया तो अधिकांश लोगों को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि यह माना जाता है कि टिकैत मध्ययुगीन मानव मूल्यों में विश्वास करते हैं। महिलाओं, दलितों तथा आधुनिक युवाओं की महत्वाकांक्षाएं तथा जीवन शैली एवं टिकैत के मानव मूल्यों में कोई सामंजस्य नहीं है। टिकैत के अनुमोदन ने इसे उस ग्रामीण समाज का भी अनुमोदन प्रदान कर दिया है जो मानवीय संबंधों में इस तरह की विकृति का जवाब इसी भाषा और शैली में देने में विश्वास करता है। यह हमारे समाज की विडंबना ही है कि एक तरफ देश सैकडों कानूनों की मदद से कानून का राज स्थापित करने की चेष्टा में लगा रहता है तो दूसरी ओर उसके धुर विपरीत चलने वाली व्यवस्था को भी करोड़ों का मूक समर्थन मिलता रहता है। इस विरोधाभास को भी न्यायोचित ठहराने वाले लोग मौजूद हैं जो यह दावा करते हैं कि गांवों में बसने वाले भारत का शहरी इंडिया से कोई सामंजस्य नहीं बैठ सकता और उस दुनिया में तो वही चलेगा जो परंपरागत रूप से उस समाज की विशिष्टता रही है।

लेकिन उत्तर प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पंडित लोकपति त्रिपाठी भी उस जघन्य हत्याकांड को इस आधार पर जायज ठहराने लगे कि हमारे समाज से संबंधों की मर्यादा इस तरह के दुराचार की अनुमति नहीं देती तो इसका कोई क्या करे। पंडित लोकपति त्रिपाठी पिछड़े, दरिद्र और मध्ययुगीन समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करते। आधुनिक जीवन के विभिन्न पहलुओं से उनका घनिष्ठ सरोकार रहा है। ऐसे स्वानमधन्य पंडित कमलापति त्रिपाठी के कुलदीपक यदि इस जघन्य तथा बर्बर व्यवहार का अनुमोदन करते हैं तो स्पष्ट है कि हमारे समाज के सोच में भारी विरोधाभास छिपा हुआ है उससे हम अपरिचित हैं।
खंदरावली के अनपढ़ ग्रामीणों की बात फिलहाल छोड़ देते हैं, लेकिन टिकैत और लोकपति जिन मानव मूल्यों की वकालत करते हैं, उस सोच के पीछे के कारणों की पड़ताल करना आवश्यक है। वरना बिहार के किसी गांव में अपने को घोर क्रांतिकारी कहने वाले राजनीतिक समूह के लोग अपनी बर्बर दंडसंहिता चलाते रहेंगे, तो राजस्थान के गांवों में आदिवासी तबके के लोग अपनी न्यायव्यवस्था को राष्ट्र-राज्य की न्याय व्यवस्था से ऊपर मान कर उसे तरजीह देते रहेंगे। और जिन्हें हम नागर तथा सभ्य और आधुनिक कहते हैं वे अपनी राजनीति चमकाने के लिए कभी परंपरा, कभी प्राचीन जीवन मूल्य और उनके आदर्श और शहरी सभ्यता के मुकाबले ग्रामीण सभ्यता को श्रेष्ठ सिद्ध करने के प्रयास में इन बर्बर प्रयोगों का अनुमोदन करते रहेंगे।