Thursday, August 18, 2011
लड़कियाँ
'कथादेश' में श्री दिनेश शुक्ल के कुछ समकालीन दोहे पढ़े। अच्छे लगे। और सब भी पढ़ सकें, इसलिये यहाँ पोस्ट कर रही हूँ।
कम्प्यूटर युग लड़कियाँ
बहती नदी की तरह, पानी के घर प्यास
इस पृथ्वी पर लड़कियाँ, जीवन का उल्लास।
सपने, कोशिश, हौसले, सुख, दुख, चिन्ता, हर्ष,
लड़की का अपना रहा, जीवन का संघर्ष।
कम्प्यूटर लड़कियाँ, आफ़िस, बस्ता, पेन,
महानगर की ज़िन्दगी, पकड़ें लोकल ट्रेन।
लड़की के दुख अलग हैं, दुनिया के कुछ और,
हर मुश्किल में लड़कियाँ, सदा हँसीं इस दौर।
मुट्ठी में बाँधे हुए, चाँद, रोशनी, फूल,
खोले बैठी लड़कियाँ, सपनों के स्कूल।
एक फूल ने भर दिये, मन में गंध, पराग,
लगी महकने लड़कियाँ, लिये प्रेम की आग।
ढेरों दुख और मुश्किलें, झिड़की, बंदिश, डाँट,
लड़की का मन काँच था, कहीं नहीं थी गाँठ।
सुख सपनों के आइने, उम्मीदों के रंग,
बँधी प्रेम में लड़कियाँ, रंगी प्रेम के रंग।
टूटा कोई स्वप्न जब, छूटा कोई हाथ,
रोई सहसा लड़कियाँ, जब-तब आधी रात।
रोटी के संघर्ष को, देकर मोड़ विशेष,
हँसती लड़की देख कर, ईश्वर हँसा 'दिनेश'।
-दिनेश शुक्ल
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5 comments:
रों दुख और मुश्किलें, झिड़की, बंदिश, डाँट,
लड़की का मन काँच था, कहीं नहीं थी गाँठ।
बहुत सुंदर कविता । नारी के स्वभाव हिम्मत संघर्ष,प्रेम भावना सभी तो है इस कविता में ।
श्री दिनेश शुक्ल जी की इस खूबसूरत रचना को साझा करने लिए बहुत बहुत धन्यवाद. आभार.
सादर,
डोरोथी.
बहुत सुन्दर भाव समन्वय्।
"मुट्ठी में बाँधे हुए, चाँद, रोशनी, फूल,
खोले बैठी लड़कियाँ, सपनों के स्कूल।"
मनमोहक!
sooo beautiful.. :')
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