Thursday, December 27, 2012

बदलाव की हवाएँ....



  श्रेया कबीर जो दिल्ली विश्वविद्यलय की छात्राहैं उन्होने यह लेख हमें मेल किया है।उनका कहना है कि वे हाल-फिलहाल मे स्त्री की स्थिति से बेहद परेशान हैं और अभी यह लेख लिखा है जिसे वे हम  सब से साझा करना चाहती हैं और फीडबैक भी चाहतीहै                                                                   



 Winds of change


Shyly looking through the veil,  blood-red powder in the middle of her hair and a thread of black and golden beads around her neck. She is the pretty and charming bride. Today, was her wedding. Like many other guests in the ceremony, I also stood there observing the post-marriage rituals. Though I was paying attention, I was gripped with some thoughts, I couldn’t resist thinking on.

Beautiful and tender she is, so many dreams she carries in her eyes. Its hard, hard to leave the souls who nurtured her with their blood and sweat. She knows already, there is no love in this whole world that could match her mother’s love, still she walks out of her ‘home’ because her now ‘going-to-be-mother’ has given the promise of adopting the bride as her daughter. Oh! And so she believes and so does her mother, though her heart is pounding terribly. What else can they do? They had to put faith. 

She hasn’t seen her father so weak before. The fingers, that earlier used to wipe tears away from her face are now trembling to leave her hand, to let her go.
She whispers in her mother’s ear ‘Mother, can’t you come with me?’ Speechless, her mother gazes at her face, a wince of pain and tears stream down from her already swollen eyes. If only, she could say ‘yes’ to her innocent daughter. If only, she could break the societal  fences in which she is curbed. She gently kisses her daughter’s forehead and gives her a piece of stereotyped advice, ‘now we are your second parents, your life is changed and so are your relations. You need to accept it. As a woman, you now have multiple roles, you need to fit into each role and play it very well. Don’t let us or our upbringing down. Take care.’ The girl gives the reassuring gesture and then hugs her parents tightly as if she is seeing them for the very last time. Her brother, could not believe that his little sister is now a grown up young lady, leaving him today, to enter into her new world. With a heavy stone on his heart he escorts her to the car. 

…..And she left her heavenly abode. Deserted it is without her. This is the common, moving scene in any Indian wedding! 

I was lead  into a deep contemplation. Why is the bride burdened to move to her husband’s place? Why is there such a custom? Why after marriage, her everything gets metamorphosed, even her name? Why does only her family has to go through the ache? What once used to be her priority before, why it is subordinated after she ties the knot? May be these are the lethal aftermath of marriage a girl has to go through, just because she is born as a ‘girl’. May be it is injustice, or may it is just a practice!

On second thoughts! What if the laws are reversed? What if a day comes when the groom will part with his family and his family with him? Can it happen? Will he be able to endure it? Can he put aside his ego and try to please his ‘new’ family. Can he put himself in his wife’s  shoes? Can he ever treat his in-laws as his own parents? Can his family ever agree to go through the trauma? Will they? Will he?

Such anti-societal thoughts are far from reality! Why? Because they are a toll on the patriarchal society we live in, which entitles men to be supreme. In the name of tradition, chauvinism is followed. The roots are deep and its difficult to take a leap.
I sincerely wish a day comes bringing the winds of change. Change of beliefs and most importantly change of personification!

Wednesday, December 19, 2012

home-ministry-delhi-government-set-up-fast-track-courts-to-hear-rape-gangrape-cases

दिल्ली में चलती बस में 23 साल की लड़की के साथ बलात्कार के साथ दरिंदगी से उसकी हत्या का जो प्रयास हुआ, वो मुझे बहुत दुःख, गुस्से और हताशा से भर गया है, सुषमा स्वराज की तरह ये नहीं कहूंगी की वो लड़की जियेगी तो जीती जागती लाश बन जायेगी, मेरी आशा है कि वो लड़की जीवित बचे, सकुशल रहे और अभी अपना लम्बा अर्थपूर्ण जीवन जिये. बलात्कार एक एक्सीडेंट ही है, इससे उबरने की शक्ति वो लड़की जुटा सके...

सिर्फ दिल्ली ही नहीं पूरे देश में हर जगह बच्चों और औरतों पर हमले बढ़ रहे हैं, गोपाल कांडा की वजह से एक इसी उम्र की लड़की की आत्महत्या का मामला हो, या सोनी सोरी की हिरासत में हालत, या बारह साल से धरने पर बैठी इरोम शर्मीला का मामला, ये सब एक ही कहानी के हिस्से हैं, जगह जगह से फटे कोलाज के टुकड़े हैं . एक मित्र से बातचीत हुयी कि ठीक दिल्ली के आस-पास के राज्य हरियाणा, राजस्थान आदि में इतनी बड़ी संख्या में मादा भ्रूण हत्याएं (अमर्त्य सेन इसे नेतेलिटी कहते हैं, ख़ास हिन्दुस्तानी मामला) हुयी हैं, कहीं लड़कियां बची ही नहीं है . दिल्ली में बलात्कार, से लेकर छेड़छाड़ की घटनाओं में इजाफा भी भारी संख्या में हुयी 'नेतेलिटी' का इफेक्ट है, जो भी है, स्त्री के लिए जीवित रहना, सम्मान के साथ रहना लगातार असंभव हुआ जाता है ..

हम सब मिलकर किसी तरह इस तरह का माहौल बना सके इस तरह की घटना फिर न हो, या अपवाद भर रह जाय— चाहे जिस भी तरह से, कुछ दूरगामी प्रयोग, कुछ जल्दबाजी की सावधानियाँ, कानून व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त और जबाबदेह बनाकर, अपनी सरकारों और राजनितिक पार्टियों पर जनमत का दबाव बनकर, जैसे भी हो....

फिलहाल ये पिटीशन का लिंक है , इस पर हस्ताक्षर हम कर ही सकते हैं ...

http://www.change.org/petitions/union-home-ministry-delhi-government-set-up-fast-track-courts-to-hear-rape-gangrape-cases?utm_campaign=share_button_action_box&amp%3Butm_medium=facebook&amp%3Butm_source=share_petition&amp%3Butm_term=36841248

Monday, November 26, 2012

क्या अच्छा है


सब कुछ तो देखती सुनती हो तुम
पर जुबां बंद ही रहती है
या फिर खुलती है तो सिर्फ
सहमती जताने के लिये ।

कहने को तो स्वतंत्र हो तुम,
पर अपने धन पर भी तुम्हारा अधिकार कहां है,
कभी सीधे शब्दों में तो कभी भावनात्मक छल से
यह भी हथिया लिया जाता है ।

तन पर भी वश कहां है तुम्हारा,
खटती तो हो ही,
पर तुम्हारी इच्छा अनिच्छा को कौन समझता है
और तो और तुम्हारी कोख भी तुम्हारी अपनी कहाँ,
लडके पैदा करने की मशीन बनाना चाहते हैं तुम्हे
ये परिवार ये समाज सब ।

और मन पर अधिकार भी छूटता ही चला जाता है
जब उसके पंख ही कतर दिये जाते हैं या तुम खुद ही बांध देती हो उन्हे ।

परिवार के लिये सोचना कर्तव्य निभाना, तुम्हारी जिम्मेदारी है
औरों का तो सिर्फ हक होता है । तुम अपना समय ,तन, मन, धन, सब दो.........

विनम्र होना अच्छा है पर तब, जब अपने हक ना कुचले जायें ।

और ये जो तथाकथित स्वतंत्र नारियां तुम्हे दिखती हैं, आधुनिक कहलाती हैं,
ये भी शिकार हैं पुरुष के अहम का । ज्यादा से ज्यादा तन खुला छोडने के
लिये मजबूर करते ये फैशन के चलन ।
स्वतंत्रता के नाम पर रात बेरात की पार्टियां ।
और स्त्रीत्व का कुचला जाना । उसमें झेलना तो तुम्हे ही है ।
लिव इन के नाम पर अपना सब कुछ मुफ्त में न्योछावर कर देती हो तुम ,
और वो खत्म हो जाने पर टूटने की नियती भी तुम्हारी है ।
ये जो बडे बडे भाषण देती हैं स्त्री मुक्ति के लिये,
जानो कि कितनी मुक्त हैं ये, या कितनी खुश ।

स्वतंत्र होना अच्छा है, पर स्वतंत्रता सोच में होनी चाहिये बिना किसी फैशन -चलन
या  तथा कथित दोस्तों के दबाव के ।

तुम कर सकती हो कि स्वतंत्र तो रहो पर उध्दत नही ।
अपना हक भी लो पर दूसरों का कुचले बिना ।
अपने चुनाव खुद करो पर सामंजस्य बिठा कर ।
आखिर एक दूसरे के साथ ही चलना है हमे ।




Friday, August 31, 2012

शरीर अगर हमारे लिए शर्म का विषय है तो हमारा पूरा वजूद भी!

मेरी पिछली पोस्ट स्तन ढकने का अधिकार पाने के लिए केरल में महिलाओं का ऐतिहासिक विद्रोह को कई प्रिंट और ऑनलइऩ अखबारों और ब्लॉगर्स ने इसे अपने स्पेस में जगह दी, इन पर ढेर सारी टिप्पणियां आईँ।  ऐसी  ही एक टिप्पणी रश्मि रविजा के ब्लॉग 'अपनी, उनकी, सबकी बातें' में राजस्थान के शेखवाटी अंचल में  लहंगा ओढ़नी पहने के तरीके पर थी। इसमें महिलाओं के चेहरा घूघट में लेकिन सामने छाती बिलकुल खुली रखने के व्यवहार पर सवाल और आपत्ति की गई। 


 "...मेरी बहुत बहस हो जाती थी इन महिलाओं से कि ये क्या रिवाज़ है , अच्छा ख़ासा चेहरा छिपाना और जो ढकना है उसे ही उघाडा जाए"


इसके समर्थन में एक और टिप्पणी थी-


 "शेखावटी यात्रा के दौरान मैंने भी ऐसा ही देखा था और बहुत अजीब लगा था ..."


ऐसी सभी टिप्पणियां, बातें, विचार मुझे पुरुषवादी विचारों को पोषित करते लगते हैं। इस नजरिए से सोचकर हम, जिस आजादी के लिए लड़ रही हैं, उसी के खिलाफ हो जाती हैं। कोई महिला अपना सीना भी छुपाए तो क्यों? क्या वह उसके शरीर का कोई शर्मनाक हिस्सा है, जिसे कोई देख ले तो वह औरत शर्मिंदा रहे? 


अपने शरीर के हिस्सों पर शर्मिंदा होना भी हमें पुरुषों ने ही सिखाया है, उन्होंने ही तय किया है कि जो किसी जगह पर छिपाया जाना है, वही कहीं और उघाड़ना भी है। कहां, यह भी उन्होने हमें सिखा दिया है। घर-परिवार में दुपट्टा लो , शरीर ढको। न ढको तो लांछन पाओ। लेकिन चमकीली पत्रिकाओं, विज्ञापनों में खूब उघाड़ो। 


पुरुष एक साथ दो लगाम थामे हैं और हमें दौड़ा रहे हैं। हम मूर्ख औरतें उनके लगाम का इशारा होने पर हांफती-थकती भी दौड़ती चली जा रही हैं।


मैं अपने स्तन/सीना क्यों छुपाऊं, जबकि उन्होंने ऐसी कोई गलती नहीं की। न ही मैंने ऐसी कोई गलती की कि मैं अपने शरीर को लेकर शर्मिंदा होऊं। पुरुष गर्मियों में क्वार्टर पैंट में, ढीले-ढाले बरमूडा में, सैंडो बनियान में 'कूल' लगते हैं, उन्हें किसी की शर्म की चिंता नहीं करनी पड़ती। मेहमान घर पर आ जाएं तो उन्हें संकोच नहीं होता (होना भी नहीं चाहिए) लेकिन औरतें क्यों दरवाजा खोलने से पहले दुपट्टा लेने घर के भीतर भागती हैं?

 
मैं बताना चाहती हूं कि मेरे दोनों स्तन कैंसर के इलाज के लिए निकाल दिए गए और मुझे अपने शरीर को इस तरह स्वीकारने और किसी के सामने लाने में कभी कोई शर्मिंदगी, ग्लानि, परेशानी नहीं होती। एक स्तन हटने के बाद शरीर बेडौल हो गया, जिससे पीठ-कंधे में दर्द-स्थायी नुकसान का खतरा बढ़ जाता है। वैसे भी ऐस्थेटिक्स के लिहाज से मैंने कुछ साल नकली स्तन पहना। फिर कोई सात साल बाद जब दूसरा स्तन भी इसी वजह से निकाल दिया गया तो मैंने राहत महसूस की। अब उस नकली के बोझ को ढोते रहने की मजबूरी नहीं थी। चाहूं तो पहनूं दो नकली स्तन, न चाहूं तो न पहनूं। यह सात साल पुरानी बात है। तब से मेरे आस-पास के लोग सहज हैं इस बात को लेकर कि मेरे 'स्तन'' कभी होते हैं, कभी नहीं। घर में ही नहीं, बाहर भी। बाजार से लेकर दफ्तर तक।


अपने शरीर को जैसा है, वैसा स्वीकार न करने के पीछे ही हजारों करोड़ रुपए के उद्योग चल रहे हैं। मोटापा कम करने, चमड़ी का रंग काले से गोरा बनाने, त्वचा चिकनी, चमकीली बनाने, हमेशा जवान दिखने, झुर्रियां हटाने, दाग-धब्बे, निशान हटाने, त्वचा के 'अनचाहे' बाल हटाने, सिर के बाल लंबे, चमकीले बनाने, काले बनाने के लिए लाखों उत्पाद हैं और इनका मुख्य लक्ष्य औरतें ही हैं- हर उम्र, देश, रंग और रेस की। शो बिज़नेस के लोगों के अलावा दूसरे पुरुषों के लिए ये सब काम दैनिक परिचर्या का हिस्सा नहीं है, लेकिन औरतों के लिए हैं।
हम पढ़ी-लिखी शहरी महिलाओं को लगता है कि हम आज़ाद हैं, क्योंकि हम अपनी कहानी कह पाती हैं, अपनी मर्जी से पैसे खर्च कर पाती हैं, अपनी इच्छा से बहुत कुछ कर पाती हैं। लेकिन इन सबके बावजूद अगर हम अपने शरीर को अपनी नज़र से नहीं देख पातीं, अपने पैसे खर्च करने के फैसले अपने स्वतंत्र विवेक से नहीं ले पातीं तो हमारी आजादी अधूरी है। 


अपना शरीर अगर हमारे अपने लिए या किसी के लिए भी शर्म का विषय है तो हमारा पूरा वजूद भी, क्योंकि शरीर नहीं, तो हम कहां। हमें अपने शरीर पर, वह चाहे जैसा है, चाहे जिस आकार-प्रकार में है या नहीं है,  गर्व करना सीखना होगा, तभी हम इसकी इज्जत कर पाएंगे और अपना सम्मान पुरुषों से छीन कर ले पाएंगे। 


वरना बदलाव सिर्फ दुपट्टे का कपड़ा, रंग या स्टाइल बदलने तक ही सीमित रह जाएगा। दुपट्टा बना रहेगा, कभी खत्म नहीं होगा।

Wednesday, August 22, 2012

स्तन ढकने का अधिकार पाने के लिए केरल में महिलाओं का ऐतिहासिक विद्रोह

केरल के त्रावणकोर इलाके, खास तौर पर वहां की महिलाओं के लिए 26 जुलाई का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन 1859 में वहां के महाराजा ने अवर्ण औरतों को शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े पहनने की इजाजत दी। अजीब लग सकता है, पर केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा सघन संघर्ष करना पड़ा।

इस कुरूप परंपरा की चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया। नादर की ही एक उपजाति नादन पर ये बंदिशें उतनी नहीं थीं। उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे। नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था। वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं। लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था।

नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था। सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी। पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी। एक घटना बताई जाती है जिसमें एक निम्न जाति की महिला अपना सीना ढक कर महल में आई तो रानी अत्तिंगल ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला।

इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं। 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए। बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने औऱ यूरपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं। धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया। इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर सम्मानजनक जीवन पाने की कशिश करती रहीं।

यह कुलीन मर्दों को बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले होने लगे। जो भी इस नियम की अहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता। अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते। यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध कर सरे आम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ऐसा करते डरें।

लेकिन उस समय अंग्रेजों का राजकाज में भी असर बढ़ रहा था। 1814 में त्रावणकोर के दीवान कर्नल मुनरो ने आदेश निकलवाया कि ईसाई नादन और नादर महिलाएं ब्लाउज पहन सकती हैं। लेकिन इसका कोई फायदा न हुआ। उच्च वर्ण के पुरुष इस आदेश के बावजूद लगातार महिलाओं को अपनी ताकत और असर के सहारे इस शर्मनाक अवस्था की ओर धकेलते रहे।

आठ साल बाद फिर ऐसा ही आदेश निकाला गया। एक तरफ शर्मनाक स्थिति से उबरने की चेतना का जागना और दूसरी तरफ समर्थन में अंग्रेजी सरकार का आदेश। और ज्यादा महिलाओं ने शालीन कपड़े पहनने शुरू कर दिए। इधर उच्च वर्ण के पुरुषों का प्रतिरोध भी उतना ही तीखा हो गया। एक घटना बताई जाती है कि नादर ईसाई महिलाओं का एक दल निचली अदालत में ऐसे ही एक मामले में गवाही देने पहुंचा। उन्हें दीवान मुनरो की आंखों के सामने अदालत के दरवाजे पर अपने अंग वस्त्र उतार कर रख देने पड़े। तभी वे भीतर जा पाईं। संघर्ष लगातार बढ़ रहा था और उसका हिंसक प्रतिरोध भी।

सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था। क्यों न होता। आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें। उस रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में औरतों को ख़ड़ा रखा जाता था। राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते थे।

आखिर 1829 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया।

कुलीन पुरुषों की लगातार नाराजगी के कारण राजा ने आदेश निकलवा दिया कि किसी भी अवर्ण जाति की औरत अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढक नहीं सकती। अब तक ईसाई औरतों को जो थोड़ा समर्थन दीवान के आदेशों से मिल रहा था, वह भी खत्म हो गया। अब हिंदू-ईसाई सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत बढ़ गई। सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं।

इस पूरे आंदोलन का सीधा संबंध भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी है। विरोधियों ने ऊंची जातियों के लोगों दुकानों और सामान को लूटना शुरू कर दिया। राज्य में शांति पूरी तरह भंग हो गई। दूसरी तरफ नारायण गुरु और अन्य सामाजिक, धार्मिक गुरुओं ने भी इस सामाजिक रूढ़ि का विरोध किया। 

मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी बदनामी हो रही है। अंग्रेजों के और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी हिस्सा वस्त्र से ढंक सकती हैं। 26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के कानून को बदल दिया गया। कई स्तरों पर विरोध के बावजूद आखिर त्रावणकोर की महिलाओं ने अपने वक्ष ढकने जैसा बुनियादी हक छीन कर लिया।

इस लेख को जनसत्ता, प्रभात खबर जैसे कई अखबारों और ऑनलाइन मंचों ने शेयर किया।लिंक ये रहे--

Wednesday, August 1, 2012

गृहकार्य की अपरिहार्यता- विचार के कुछ बिंदु

दुनिया में ज्यादातर औरतें अपने को घर के कामों का विशेषज्ञ मानती हैं, बना लेती हैं। उनका यह व्यवहार लगातार हाशिए पर धकेले जाने के कारण अनावश्यक मान लिए जाने की असुरक्षा के बीच घर और समाज में अपनी जगह सुनिश्चित करने और खुद को परिवार के लिए जरूरी बनाने की जाने-अनजाने की गई कोशिश है। साथ ही लगातार करने के कारण स्वाभाविक तौर पर वे उन कामों की विशेषज्ञ हो भी जाती हैं।


उधर घर के पुरुष महिलाओं के ऐसे व्यवहार के आदी हो जाते हैं और उनकी महिलाओं से अपेक्षाएं भी यही हो जाती हैं। आखिरकार यह विशेषज्ञता धीरे-धीरे महिलाओँ का स्थापित, आधारभूत पारिवारिक कर्तव्य बनकर रूढ़ हो जाती है।


इस अवलोकन के आधार पर महिलाओं के मन की आम भ्रामक धारणाएं नीचे दे रही हूं।


1. कुछ घरेलू काम बेहद जरूरी हैं, जिनके बिना दुनिया का चलन रुक जाएगा।

2. उन कामों को बेहतरीन ढंग से करना भी उतना ही जरूरी है।

3. उन कामों को वे खुद अपने बेहतरीन ढंग से करें, यह भी उतना ही जरूरी है।

4. वे काम सिर्फ वे ही कर सकती हैं कोई दूसरा नहीं, क्योंकि वे ही उनमें पारंगत हैं।

5. चाहे कुछ भी हो, वे काम वे खुद ही करेंगी, वरना घर के लोग नाराज होंगे या असंतुष्ट रहेंगे।


 कृपया इन विचारों पर पर जम कर विचार, लानत-मलामत करें।  इसमें और बिंदु भी जोड़े जा सकते हैं। 

समीकरण हमेशा स्त्री-बनाम-पुरुष नहीं होता। हालांकि पुरुषवादी सोच भी उसी पुरुष- प्रभाव/प्रभुत्व के कारण आती है, लेकिन इससे उबरने की जहद तो हमें करनी होगी। खुद को इसके लिए तैयार करना होगा।

Friday, July 27, 2012

कात्यायनी की दो कविताएँ

स्त्री का सोचना एकांत में 

चैन की एक साँस
 लेने के लिए स्त्री
अपने एकांत को बुलाती है।
एकांत को छूती है स्त्री
 सम्वाद करती है उससे

जीती है
 पीती है उसको चुपचाप

 एक दिन 
वह कुछ नही कहती अपने एकांत से
 कोई भी कोशिश नही करती 
दुख बाँटने की
 बस,सोचती है।
वह सोचती है
 एकांत में
 नतीजे तक पहुँचने से पहले ही 
खतरनाक घोषित कर दी जाती है।


भाषा मे छिप जाना स्त्री का 

न जाने क्या सूझा
एक दिन स्त्री को
खेल खेल मे भागती हुई
भाषा मे समा गई
छिप कर बैठ गई।

उस दिन
 तानाशाहों को
नीन्द नही आई रात भर

उस दिन
 खेल न सके कविगण
अग्नि पिंड की मानिन्द
तपते शब्दों से

भाषा चुप रही सारी रात ।

रुद्रवीणा पर
कोई प्रचण्ड राग बजता रहा।

केवल बच्चे
निर्भीक
गलियों मे खेलते रहे।


युद्धरत आम आदमी
जुलाई -सितम्बर ,पृ.20

Wednesday, July 4, 2012

नारी है ना - री !

नारी कीर्तिमान 
बना रही है,
धरती से आकाश तक 
बुलंदियों के परचम 
फहरा रही है।
जयजयकार भी 
सब जगह  पा  रही है।
लेकिन कितनी हैं? 
बस अँगुलियों पर 
गिन सकते हैं।
आज भी 
हाँ आज भी पुरुष 
पत्नी का रिमोट 
अपने हाथ में ही 
रखना चाहता है,
वह गृहिणी हो या हो कामकाजी 
अगर वह(पुरुष)) चाहे तो  
मुंह खोले 
न चाहे तो रहे खामोश 
प्रश्न करने का हक 
तो बस उसी का है ,
जब चाहे दे सकता है 
अपमान के थपेड़े 
जब वो चाहे तो 
करेगी तू समर्पण 
वो तेरा दायित्व है 
और उसका अधिकार।.
कब और किसे  तू जन्म देगी
 ये निश्चित भी तू नहीं
 वह करेगा .
सिर्फ और सिर्फ प्रजनन का 
एक यन्त्र हो तुम .
विरोध अपने प्रति अन्याय का 
ये हक तो पैदा होते ही 
खो दिया था।
नारी को समझो पहले,
हर बात पर ना - री 
पहले ही दिया गया है।
फिर सोचो अपने अस्तित्व को
 फिर उसके लिए 
आने वाली के अस्तित्व को 
बचाना ही .होगा
 खुद अधिकार नहीं मिले 
पर अब उसके लिए तुझे 
दुर्गा बन जाना होगा।
जब तक तू सीता रहेगी,
त्रसित स्वयं औ' उसे भी रखेगी।.
दुर्गा बन संहार न कर
बस अपनी शक्ति से अवगत करा उनको 
अगर विध्वंस पर उतरी तो 
ये सृष्टि रसातल में चली जायेगी 
तब इस ना-री का अर्थ
 सारी  दुनियां समझ जायेगी .
सारी  दुनियां  समझ जायेगी।.

Sunday, July 1, 2012

आवाज़ उठाना कोई गलत बात नहीं


पेशे से ज्वेलरी डिज़ायनर , जेमोलॉजिस्ट एवं अस्ट्रालजर परंतु ह्रदय से लेखिका स्वप्निल शुक्ल'  'स्वप्निल ज्वेल्स' नामक ब्लॉग पर सक्रिय हैं विभिन्न पत्रिकाओं मे इनके लेख प्रकाशित हैं। गहने- दि आर्ट आफ वेअरिंग ज्वेलरी ' इनकी प्रथम प्रकाशित पुस्तक है.वे लिखती हैं : "'धूल तब तक स्तुत्य है जब तक पैरों तले दबी है , उड़ने लगे...... आँधी बन जाए ....तो आँख की किरकिरी है.....चोखेर बाली है ' .....ये चंद पंक्तियाँ जाने क्यों मुझे हर वक़्त अपनी ओर आकर्षित करती हैं और जो मुझे चोखेर बाली से नियमित रुप से जुड़े रहने का सबब हैं. चोखेर बाली  को मैं पिछले एक वर्ष से पढ़ रही हूँ. चूंकि अभी कुछ समय पूर्व अपने खुद के ब्लॉग 'स्वप्निल ज्वेल्सपर सक्रिय हुई हूँ तो 'चोखेर बालीकी फॉलोवर भी बन गई हूँ. चोखेर बाली  मेरे लिये प्रेरणा का स्रोत है. इसका हर लेख मुझे ज्ञान के प्रकाश की ओर अग्रसर करता है  समाज के विभिन्न वर्गों को जागरुकता प्रदान करता है. अत: चोखेर बाली  से मुझे विशेष लगाव है और ये मेरे ह्रदय के सबसे करीब है."आज स्वप्निल का ही एक लेख यहाँ पोस्ट कर रही हूँ :-



 आज  शायद ही कोई  ऎसा क्षेत्र हो जिसमें महिलाओं ने अपना लोहा  मनवाया हो ,हम कार्पोरेट जगत की बात करें या राजनीति की या फिल्म जगत की ।यह भी सच है कि महिलायें हर चुनौतियों को स्वीकार कर अपने कार्यक्षेत्र  ज़िम्मेदारियों में सफलतापूर्वक अग्रसर हो रही हैं।लेकिन इसके बावजूद भी  महिलाओं के सामने पुरुषों की अपेक्षा कई गंभीर समस्याएँ खड़ी हैं।ये उलझने घर के भीतर और कार्यक्षेत्र ,दोनो जगह अलग अलग तरीके से सामने आती हैं।
 शाम को जब अपना सारा कार्य संपूर्ण कर लड़की घर को आएगी तो बस पहला शब्द,  "बेटी ! बहुत देर हो गई. कहाँ थी ? किसके साथ थीमैंने तुम्हे कल उस इलाके में फलाना लड़के के साथ देखा था." वगैरह- वगैरह और सबसे बड़ी बातइन प्रश्नों की झड़ी लगाने वाले लड़की के माँ - बाप नहीं बल्कि रिश्तेदार होंगे.आज भी समाज में कई ऐसे परिवार हैं जिसमें लोग लड़की की नौकरी लगते ही शादी के लिये दबाव बनाने लग् जाते हैं फिर लड़की ने अपने कैरियर और अपनी ज़िंदगी को किस तरह प्लान किया हैये तो कोई सुनना भी नहीं चाह्ता. परिवार वालों के साथ-साथ लड़की के रिश्तेदार बस या तो आए दिन नये लड़कों  का प्रस्ताव लेकर घर  जाएंगे या तो हर वक़्त लड़की के बारे में जासूसी करते रहेंगे।भले ही महिला पढ़ी-लिखी हैकामकाजी है  अपने परिवार की पूरी श्रद्धा से ज़िम्मेदारियों का पालन कर रही हो , फिर भी उस पर नौकरी छोड़ने का दबाव बनाया जाता है। .आज भी कई परिवारों में घरेलू हिंसा जैसे गंभीर अपराध हो रहे हैं . 

 आज के समाज में ये एक कटु सत्य है कि ऐसे परिवार भी देखने को मिल जाते हैं जो लड़की की ज़िंदगी में हद से ज्यादा दखल अन्दाज़ी करने को ज़िम्मेदारी का नाम देते हैं. पर ये ज़िम्मेदारी स्वयं लड़की की होनी चाहिये कि यदि वो अपने पैरों पर खड़ी हुई है और अपने भविष्य को सँवार रही है तो वो खुद को एक बेह्तर इंसान बनाने के साथ साथ समाज को एक खुशहाल परिवार ही भेंट दे रही है. क्योंकि एक लड़की ही आगे चलकर एक सफल पत्नी, माँ और अन्य रिश्तों से जुड़ती है  नए समाज की स्थापना करती  है.
ऐसे में परिवार वालों की ये ज़िम्मेदारी होनी चाहिये की कामकाजी महिला चाहे शादीशुदा हो या कुँवारी लड़की उन्हे अपनी बेटी  बहु का सहयोग करना चाहिये  कि जरुरत से ज्यादा दखल देकर अपनी ही बहु - बेटी को मानसिक तनाव की ओर ढकेलना चाहिए . महिलाओं को स्वयं ही अपने पारिवारिक या आस-पास मौजूद उपद्रवी लोगों से संभंल कर रहना चाहिये .

 प्रोफेशनल जगत में सेक्शुअल हैरसमेंट जैसे कई मुद्दे   सिर्फ एक स्त्री के मन मस्तिष्क को कुंठित बनाते हैं बल्कि अगर उसके दर्द को समझा  जाए तो यही घुटन उनके जीवन को अंधकार की ओर ले जाती है . ऐसी स्थिति में अपने साथ कार्य करने वाले कर्मचारियों  अपने बॉस के बीच प्रोफेशनल रिश्ता ही कायम रखें. अपनी पर्सनल  प्रोफेशनल लाइफ में अंतर बना कर रखें . यदि आपको ऐसा मह्सूस हो रहा है कि आपके बॉस या आफिस के किसी भी कर्मचारी की आप पर गलत निगाह है तो बेहतर होगा कि सख्त रवैया अपनायें . ऐसी स्थिति में आवाज़ उठाना कोई गलत बात नहीं . जरुरत पड़ने पर आस-पास की समाज सेवी संस्थाओं से सदैव संपर्क कायम रखें . आफिस के हर कार्य को लिखा पढ़ी में ही करें . लेटनाइट ड्यूटी की स्थिति में अपनी सतर्कता  सुरक्षा को प्राथमिकता दें और सावधानी बरतें . अपने वर्क प्रोफाइल के लिये मानसिक तौर पर स्पष्ट रहें . और यदि आपको लग रहा है कि आप का बॉस आप पर आपके वर्क प्रोफाइल के अलावा जरुरत से ज्यादा वर्क लोड बढ़ा रहा है तो इसका विरोध करें या स्पष्टीकरण माँगें.

यदि किसी तरह की फ्रस्ट्रेशन या मानसिक तनाव हो रहा है तो अपने प्रिय मित्र या परिवारिक सदस्य से खुलकर चर्चा करें . धैर्य  संयम कायम रखें . अपने खान पान पर विशेष ध्यान दें क्योंकि जब तक आप स्वस्थ नहीं होंगी तो आप अपने परिवार  कार्य को कैसे संभालेंगी ?

हम महिलाओं के ऊपर पुरुषों की अपेक्षा अधिक कार्य भार होता है. यदि कामकाजी महिलायें आफिस  घर दोनो ही संभालती हैं तो घरेलु महिलायें घर पर रह कर भी एक पुरुष से कई गुना ज्यादा कार्य संभालती हैं . परंतु समाज का कुछ वर्ग आज भी महिलाओं के मामले में पक्षपाती  ढीला रवैया अपनाता है तो ऐसी स्थितियाँ तनाव उत्पन्न करती हैं जो 'डिप्रेशन ' का रुप ले लेता है.

अपने पारिवारिक सदस्योंआसपास के वातावरणरिश्तेदारों की सोच  रवैये को समझें.  कौन किस तरह आपके कार्य में विघ्न डाल रहा हैउसका तुरंत विरोध करें . याद रखें कि हमें हमारी बेहतर ज़िन्दगी के लिये स्वयं स्वावलंबी होना होगा. अपनी मर्यादा में रहते हुए अपने अधिकारों का पूर्ण उपयोग कर हम अपने पैरों पर खड़े होकर ही एक स्वस्थ समाज को स्थापित कर सकते हैं.